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जब उन की आदतें न हों पसंद

बंटी और रोशनी कुछ समय पहले ही दोस्त बने थे. हर मुलाकात के दौरान रोशनी को बंटी का व्यक्तित्व और साथ बहुत भला लगता. हर मुलाकात में बंटी वैलडै्रस्ड दिखता, जिस से रोशनी बहुत प्रभावित होती. धीरेधीरे दोनों का प्रेम परवान चढ़ा और फिर उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. बंटी हमेशा रोशनी से स्त्रीपुरुष समानता की बातें करता. अंतत: रोशनी ने बंटी से शादी करने का फैसला कर लिया.

शादी हुए साल भर भी नहीं बीता था कि रोशनी के सामने बंटी की कई बुरी आदतें उजागर होने लगीं. उसे पता चला कि बंटी तो रोज नहाता भी नहीं है और जब नहाता है, तो नहाने के बाद गीले तौलिए को कभी दीवान पर तो कभी सोफे पर फेंक देता है. रात को सोते समय ब्रश भी नहीं करता है. रोशनी को बंटी से ज्यादा फोन करने की भी शिकायत रहने लगी. अब बंटी की स्त्रीपुरुष समानता की बातें भी हवा हो गईं. शादी के तीसरे ही साल दोनों अलग हो गए.

जब भी लव मैरिज की बात होती है तो उस के समर्थन में सब से बड़ा और ठोस तर्क यही दिया जाता है कि इस में दोनों पक्ष यानी लड़कालड़की एकदूसरे को अच्छी तरह जान लेते हैं. लेकिन क्या हकीकत में ऐसा हो पाता है? वास्तव में दूर रह कर यानी अलगअलग रह कर किया जाने वाला प्रेम बनावटी, अधूरा और भ्रमित करने वाला हो सकता है. ऐसा प्रेम करना किसी भी युवा के लिए काफी आसान होता है, क्योंकि इस में उसे अपने व्यक्तित्व का हर पक्ष नहीं दिखाना पड़ता. वह बड़ी आसानी से अपनी बुरी आदतें छिपा सकता है. इस प्रकार के प्रेम में ज्यादातर मुलाकातें पहले से तय होती हैं और घर से बाहर होती हैं, इसलिए दोनों ही पक्षों के पास तैयारी करने और दूसरे को प्रभावित करने का काफी समय होता है.

असली परीक्षा साथ रह कर

घर से बाहर प्रेमीप्रेमिका को एकदूसरे की अच्छी बातें ही नजर आती हैं. विभिन्न समस्याओं के अभाव में कुछ तो नजरिया भी सकारात्मक होता है, तो सामने वाला भी अपना सकारात्मक पक्ष ही पेश करता है. प्रेमी सैंट, पाउडर लगा कर इस तरह घर से निकलता है कि प्रेमिका को पता ही नहीं चल पाता कि वह आज 2 दिन बाद नहाया है. प्रेमिका को यह भी नहीं पता चलता कि उस का प्रेमी अपने अंडरगारमैंट्स रोज बदलता भी है या नहीं. और पिछली मुलाकात में उस के प्रेमी ने जो शानदार ड्रैस पहनी थी वह उसी की थी या किसी दोस्त से मांग कर पहनी थी.

कुल मिला कर लव मैरिज हो या अरेंज्ड मैरिज, किसी भी जोड़े की असली परीक्षा तो साथ रह कर ही होती है. इस लिहाज से विवाह के स्थायित्व की गारंटी को ले कर लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज में ज्यादा अंतर नहीं है, क्योंकि दोनों ही मामलों में साथी का असली रूप तो साथ रह कर ही पता चलता है. दोनों ही तरह की शादियों में यह दावा नहीं किया जा सकता कि जीवनसाथी कैसा निकलेगा?

सामंजस्य भी जरूरी

हम यहां इस बहस में नहीं पड़ रहे कि दोनों तरह की शादियों में कौन सी शादी सही है, लेकिन इतना जरूर कह रहे हैं कि शादी से पहले किया गया प्रेम शादी के बाद किए जाने वाले प्रेम से आसान होता है. शादी के बाद जोड़े को एकदूसरे के बारे में सब पता चल जाता है. एकदूसरे की असलियत खुल जाती है. अच्छीबुरी सब आदतें पता चल जाती हैं. जिंदगी की छोटीबड़ी समस्याएं भी साथ चलने लगती हैं.

इस के बाद भी यदि उन में प्रेम बना रहता है तो हम उसे असली प्रेम कह सकते हैं. बेशक कुछ लोग इसे समझौता भी कहते हैं, मगर हर रिश्ते का यह अनिवार्य सच है कि कुछ समझौते किए बिना कोई भी, किसी के भी साथ, लंबे समय तक या जिंदगीभर नहीं रह सकता.अंत में घर के अंदर और बाहर के इसी प्रेम के बारे में चुनौती सी देतीं ये लाइनें भी गौर करने लायक हैं:

घर से बाहर तो प्रेमी सब बन लेते हैं,

घर से बाहर तो प्यार सब कर लेते हैं,

करो घर में, घरवाली से तो जानें.

दाल खाते वक्त कंकड़ जो मुंह में आ जाए,

या रोटी में बाल लंबा तुम्हें दिख जाए,

तब आई लव यू बोलो तो जानें. 

महबूब की खातिर

हमें सड़ा हुआ मुंह ले कर आते देख राजन समझ गया कि आज तो मजनू की अच्छी मलामत हुई है. फिर वह पूछ ही बैठा, ‘‘क्यों आशिकजी, क्या बात है, थूथन फुलाए चले आ रहे हो? लगता है महबूबा ने घास नहीं डाली महबूब को.’’ ‘‘डाली थी यार, महबूबा ने घास तो डाली थी पर महबूब ने नाकमुंह सिकोड़ लिया. बस, जलभुन कर चली गई यह चैलेंज करते हुए कि कभी तुम बना कर लाओ तो पता चलेगा. अब उसे कौन समझाए कि खाना बनाना अपने बस का रोग नहीं,’’ हम ने झुंझलाते हुए बताया.

‘‘पर हुआ क्या?’’ राजन ने पूछा तो हम खिसियाते हुए बोले, ‘‘यार, रागिनी खीर बना कर लाई थी, जो हमें बिलकुल पसंद नहीं आई. हम ने कह दिया क्या बेहूदा स्वाद है. बस, इसी पर वह नाराज हो गई और बोली, ‘कभी खुद कुछ बनाया हो, ला कर खिलाया हो तो पता चले न किसी की भावनाओं का. बस, मांबहन बनाती रहें और जनाब नुक्स निकालते रहें. पुरुष सिर्फ खाना जानते हैं.’

‘‘तुम्हें क्या लगता है पुरुष कुछ बना नहीं सकते. हम बनाने लगें तो अच्छेअच्छों को मात दे दें. देखा नहीं, हर फाइव स्टार होटल से ले कर गलीनुक्कड़ के रैस्टोरैंट, ढाबे तक में पुरुष ही तो पकाते हैं और महिलाएं चटखारे ले कर खाती हैं, हम ने कहा.

‘‘तिस पर वह भड़की और बोली, ‘हां, बड़े शैफ समझते हो खुद को, कभी कुछ बना कर लाओ तो जानें. अगली बार तभी मिलने आना जब कुछ अपने हाथों से बना कर लाना,’ कहते हुए उस ने अपना बैग उठाया और चली गई.‘‘

‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है यार. खरीद लेना किसी अच्छी सी दुकान से उस का मनपसंद खाना और खिला देना. तेरी कायल हो जाएगी,’’ राजन ने कुटिल हंसी हंसते हुए कहा.

‘‘अरे, नहीं भाई, खुद बना कर खिलाएंगे अपने हाथों से अपनी महबूबा को इतने भी बेगैरत नहीं हम.’’

‘‘बस, तो फिर लगे रहना किचन में और जलाते रहना बरतन. न डिश बनेगी न महबूबा मानेगी.’’

रागिनी से हमारी मुलाकात पिछले साल हुई. मैट्रो से विश्वविद्यालय जाते और आते अकसर नजरें चार होतीं. इसी तरह मिलते हुए रागिनी कब दिल में उतर गई पता ही न चला. वह अंगरेजी औनर्स कर रही थी और हम इतिहास औनर्स.

हम हर हफ्ते एक बार मिलते और लंच साथ करते. रागिनी हर हफ्ते कुछ न कुछ नया बना कर लाती. कभी चाइनीज चाट, कभी मंचूरियन, कभी परांठे तो कभी सैंडविच आदि और हम बड़े स्वाद से उंगलियां चाटचाट, चटखारे लेले खा जाते. बस, आज ही हमारी मति मारी गई थी जो अंगारा हाथ में उठा लिया.

‘‘अब भुगतो,’’ राजन ने कहा और हिदायत दे दी, ‘‘ले लो कुछ व्यंजन बनाने के नुसखों वाली किताबें और चाटो उन को. कुछ बना पाए तो ठीक वरना…’’

हम ने भी ठान लिया था कि नर हैं, मन को निराश तो करेंगे नहीं, बस, इसी धुन में छांट लीं लाइबे्ररी से कुछ अलगअलग व्यंजन बनाने की विधि बताती किताबें और लगे पार्क में बैठ उन्हें चाटने. देखने वाले पढ़ाकू समझते और सचाई जानने वाले फुद्दू. कई दोस्तों ने तो यहां तक कह दिया कि वाबरची बनने का इरादा है क्या? अब उन्हें कौन समझाए कि हम तो महबूबा की खातिर ये पापड़ बेल रहे हैं.

तरहतरह के व्यंजन बनाने के बारे में अब हम इतना पढ़ चुके थे कि पूरा ग्रंथ लिख दें. दोस्तों से चर्चा भी हम रैसिपी पर ही करते तो उन्हें लगता जैसे महबूबा को मनाने नहीं मास्टरशैफ में भाग लेने जा रहे हैं.

ऐसे में उस दिन क्लासरूम में बैठे हम लौकी के कोफ्ते बनाने की विधि पढ़ रहे थे कि कब प्रोफैसर रूम में आ गए और पढ़ाना शुरू कर दिया, हमें पता ही न चला. हमारी तंद्रा तब भंग हुई जब पास बैठे राहुल ने झिंझोड़ा, ‘‘सर कुछ पूछ रहे हैं.’’

‘‘बताओ, अंगरेज भारत से क्याक्या ले गए थे?’’ सर ने पूछा तो हम आननफानन में खड़े हुए और बताने लगे, ‘‘एक पाव लौकी, बेसन, तलने के लिए तेल, नमक मिर्च…’’ हम बोले जा रहे थे और सब हंसे जा रहे थे.

जब हमें भान हुआ कि हम क्या कह गए हैं और यह भी कि एक सुंदर महबूबा की खातिर क्याक्या करना और सहना पड़ता है. खैर, योजना को परवान चढ़ाने का वक्त आ गया था. कल हम ने रागिनी से मिलना था और सोच लिया था कि मम्मी सुबह उठ कर किचन में लगें उस से पहले ही फारिग हो जाएंगे. सो हम रात को 3 बजे ही उठ गए और लगे बेसन घोलने लौकी घिसने.

किचन में बरतनों की खटरपटर से मम्मी जागीं तो हम ने ‘म्याऊं…’ की आवाज निकाल दी. वे भी बिल्ली समझ करवट बदल सो गईं. अब हमें काम करते हुए समझ आ रहा था कि हम तो मीनमेख निकालते रहते हैं और बनाने वाले को कैसे खटना पड़ता है.

कच्चेपक्के से कोफ्ते तले, टमाटर काट कर ग्रेवी बनाई और फटाफट मिक्स कर एक तरफ रखा. हमें फ्रिज में रात का बचा गुंधा आटा मिल गया सो रोटियां बनाने की भी सोची. 4 रोटियों में एक भी गोल न बनी पता नहीं किसकिस देश का नक्शा बना. तिस पर सड़ गईं सो अलग.

इधर हमें मम्मी के जागने का डर भी सता रहा था. सब फटाफट पैक किया और बरतन धोए, ताकि हमारी करतूत हम तक ही रहे.

फोन कर रागिनी को बता दिया, ‘‘तुम्हारी मनपसंद डिश बना कर ला रहे हैं. उंगलियां चाटती रह जाओगी.’’

यह सुन कर रागिनी भी फूली न समाई और प्रफुल्लित हो नियत समय पर पहुंच गई. फिर कुटिल हंसी हंसती हुई बोली, ‘‘लाओ, देखें क्या बनाया है जनाब ने.’’

डब्बा खोलते ही हमारी हंसी काफूर हो गई और चेहरा पीला पड़ गया, हम ने इतनी मेहनत से जो कोफ्ते बनाए थे, कतराकतरा हो तैर रहे थे, तिस पर चखते ही रागिनी ने नाकभौं सिकोड़ीं. हम समझ गए कि बात बनी नहीं.

‘‘चख कर देखा था कोफ्तों को कैसे बने हैं,’’ रागिनी ने पूछा तो हम ने चखा और अपनी मूर्खता पर माथा पीट कर रह गए.

‘‘नमक की जगह सोडा डाल दिया था क्या,’’ रागिनी ने कहा तो हमें अपनी गलती का भान हुआ लेकिन तब तक रागिनी जा चुकी थी.

हम अपना सा मुंह लिए लौट आए. राजन फिर हंसा और बोला, ‘‘छोड़ो बनाने का चक्कर. इस चक्कर में तुम बनते जा रहे हो. ले लो कहीं से मनपसंद डिश और खिलाओ उसे.’’ पर हम ने तो जैसे प्रण कर लिया था कि खिलाएंगे तो अपने हाथ का बना भले ही कितना भी वक्त लगे रूठी महबूबा को मनाने में. यही सोचते हुए जाते हम एक नुक्कड़ पर रुके. काठीरोल बन रहे थे. सोचा ‘2 पैक करवा लेते हैं, घर जा कर खाएंगे,’

काठीरोल बनते देख हमारे मन में कीड़ा कुलबुलाया, ‘क्यों न अगले हफ्ते काठीरोल ही बना कर ले जाएं. कितना आसान है. परांठा तो थोड़ाबहुत बनाना आता ही है हमें बस, रोल कर के बीच में आलू की सब्जी ही तो भरनी है.’

हमें लगा हमारे हाथ महबूब की खातिदारी का जादुई चिराग लग गया है. फिर कुछ सोच हम ने फिर से व्यंजन पुस्तिकाएं खंगाली, मोबाइल पर नैट में सर्च किया ताकि कोई कमी न रहे. आलू की सूखी जीरे वाली सब्जी बनाने की पूरी विधि पढ़ हम ने ठान लिया कि इस बार मम्मीपापा के औफिस जाने के बाद बनाएंगे. अगले हफ्ते मिलने की बेला आने वाली थी और हमारी परीक्षा की. मम्मीपापा के चले जाने के बाद आलू निकाले, छीले और हो गए शुरू. थोड़ा तेल डाल, आलू छोंक, नमक, मिर्च, हलदी, मसाला सब डाल दिया. सब्जी ढक कर आंच कम की और गूंधा आटा ले लगे परांठे बेलने. 2 परांठे बनाने में ही हमारी हालत पतली हो गई. पसीना पोंछ हम ने सब्जी उतारी और परांठों में भर दी साथ में लच्छेदार प्याज काट कर ऊपर रखी और रोल कर के फौयल में पैक कर दिए.

आज हम खुद पर इतरा रहे थे. साथ में चटनी की जगह सौस के पाउच पैक किए और पहुंच गए मैट्रो स्टेशन. वही मैट्रो की सीढि़यां और वही आशिकमहबूबा. हम ने रागिनी के हाथ में थमा दिया डब्बा और लगे भूखी निगाहों से उसे निहारने. डब्बा खोलते ही उस की बांछें खिल गईं. सौस का पाउच खोला, ढक्कन पर डाला और एक रोल उठा कर मुंह में डालते ही उबकाई लेती हुई बोली, ‘‘क्या बनाया है यह,’’ फिर रोल खोल कर देखती हुई बोली, ‘‘तुम ने इस में जीरे वाले आलू डाले हैं न. झल्लू, जीरे की जगह सौंफ डाल दी है तुम ने. लो, अब खाओ तुम ही.’’

हम ने तो सोचा था अपने हाथों से बने रोल से महबूबा का दिल जीत लेंगे, लेकिन पासा उलटा पड़ गया. हमें खुद पर भी ताज्जुब हुआ कि हम जीरे और सौंफ में फर्क न कर पाए. करते भी कैसे दोनों एक से ही तो दिखते हैं. महबूबा के  मानने की उम्मीद पर पानी फिर गया था. रागिनी पैर पटकती लौट गई थी और हम मुंह लटकाए हाथ में सौंफ वाली सब्जी के रोल थामे अपनी हार का मातम मनाते वापस आ गए.

घर बैठे हमारे जेहन में रागिनी के जलेकटे राग घूम रहे थे. ‘कुछ नहीं बना सकते तुम. कहते हैं हर जगह मर्द ही तो खाना बनाते हैं. घर में उन से एक भाजी भी न बनती होगी.’ तभी राजन ने तंद्रा भंग की, ‘‘भई, ऐसे मजनू भी न बनो कि लैला की उंगलियों पर नाचो. ‘‘बरखुरदार, कभीकभी सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तो उंगली टेढ़ी भी करनी पड़ती है, पर तुम मानो तब न. बात समझ आए तो चलो, मेरे साथ मूलचंद नुक्कड़ पर एक अंडे के परांठे वाला बैठता है, खिला कर लाता हूं, पसंद आएं तो ले जाना अगली बार पैक करवा कर अपनी महबूबा की खातिर वरना…’’

परांठे बनते देख मन किया कि सीख लें. रागिनी भी तो कई बार कई चीजें बना कर लाती है अपने हाथों से, पर हिम्मत न हुई, पिछली कोशिशों के बाद हम हिम्मत हार चुके थे, सो हम ने निर्णय किया कि अगली बार परांठे ही पैक करवा कर ले जाएंगे.

अब हम ने रागिनी को फोन किया तो उस ने साफ मना कर दिया, ‘‘अपनी बावरचीगीरी अपने पास ही रखो, मैं नहीं आने वाली,’’ पर हम भी कहां मानने वाले थे. लाख नानुकर के बावजूद हम ने उसे मना लिया.

इस बार हम दहीचटनी के साथ अंडे के मशहूर परांठे पैक करवा पहुंच गए मिलन की जगह. हम इंतजार कर रहे थे. रागिनी अभी पहुंची नहीं थी. हमारा दिल बैठा जा रहा था. तभी फोन घनघना उठा. स्क्रीन कर रागिनी लिखा देख हम समझ गए कि उल्लू बनाएगी और बोल देगी कि मैं नहीं आ सकती. हम ने हैलो कहा तो उधर से आवाज आई, ‘‘साहब, हम ‘चंदू चाइनीज चाट’ से बोल रहे हैं. दरअसल, मैडम आज चाइनीज चाट लेने आई थीं तो अपना मोबाइल यहीं भूल गईं. काफी इंतजार के बाद देखा तो सब से आखिरी कौल में आप से ही बात हुई थी सो आप को बता रहे हैं. जब मैडम आएं, कहिए फोन हम से ले लें.’’

‘अच्छा तो यह बात है. यहां भी महबूबा द्वारा महबूब की खातिर उंगली टेढ़ी की जा रही है. अब समझ आया कैसे अच्छीअच्छी डिशेज बना कर लाती थी, बल्कि चंदू चाट से लाती थी और हमें उल्लू बनाती थी, तिस पर हमें झोंक दिया चूल्हेचौके में,’ हम सोच ही रहे थे कि रागिनी आ गई. हम ने फोन वाली बात छिपा परांठे परोस दिए. सूंघते ही खाने को दौड़ी. स्वाद चखते ही वाह…वाह…करने लगी. करती भी क्यों न बड़ी मशहूर दुकान के जो थे.

‘‘हूं अब आया है स्वाद तुम्हारे हाथों में. मैं बेकार ही चाइनीज चाट बना कर लाई.’’

‘‘चाइनीज चाट?’’ हम ने कहा तो बोली, ‘‘हां, मैं ने सोचा तुम तो बेकार ही बना कर लाते हो भूखे रहने से अच्छा है कुछ खाने को हो. लो खाओ,’’ कहते हुए उस ने अपना टिफिन खोल कर रख दिया. दरअसल, वह चाइनीज चाट इसलिए अपने डब्बे में पैक करवा कर लाई थी ताकि पता न चले कि खरीदी है बल्कि कह सके कि मैं ने महबूब की खातिर बनाई है.

हम ने खाते ही कह दिया, ‘‘यह स्वाद तो जानापहचाना लगता है. अरे हां, यह तो चंदू चाइनीज चाट की चाट है न…’’

हमारी बात अभी पूरी नहीं हुई थी कि वह बोली, ‘‘हां, तुम्हें तो लगेगा ही. मरखप कर चूल्हे में हाथ जलाओ, इतने प्यार से महबूब की खातिर बना कर लाओ और दूसरा उस की वैल्यू ही न समझे. खुद से तो कुछ बना नहीं और मेरी तारीफ भी न कर पाए,’’ इतना कह कर वह सुबकने लगी.

‘‘अच्छा, सच बताओ, यह चाट तुम चंदू चाइनीज चाट से लाई हो कि नहीं,’’ हम ने पूछा तो वह साफ मुकर गई.

‘‘तो ठीक है लाओ, अपना फोन दो, हम चंदू से ही पूछते हैं,’’ हम ने कहा तो उस का ध्यान अपने फोन पर गया फिर जेब में, पर्स में हर जगह देखखोज लिया. पर फोन न मिलना था न मिला. वह हक्कीबक्की रह गई. उसे याद आ गया था पर फिर भी झूठ बोली, ‘‘शायद घर रह गया है.’’

‘‘नहीं जानू, तुम्हारा फोन घर नहीं बल्कि चंदू चाइनीज चाट पर रह गया है. उन्होेंने अभी मुझे फोन कर बताया है,’’ हम ने पत्ते खोले तो वह शरमा गई.

अपनी पोल खुलती देख उस का चेहरा फक्क रह गया था. हम ने भी चुटकी ली, ‘‘जनाब, महबूब की खातिर क्याक्या करना पड़ता है हम बखूबी जानते हैं, तुम खुद तो पकापकाया  ला कर महबूब की खातिरदारी करती रही और हमें झोंक दिया चूल्हे में. लेकिन महबूबाजी हम भी उंगली टेढ़ी करना जानते हैं. अगली बार मिलना तो कुछ अच्छा सा अपने हाथों से बना कर लाना, चंदूवंदू से नहीं,’’ इस बार उलटे हम ने शर्त थोपी.

‘‘चलो, अब चलें ‘चंदू चाइनीज चाट’ पर तुम्हारा मोबाइल लेने,’’ हम ने कहा तो इस संकल्प के साथ कि अगली बार महबूब की खातिर सच में कुछ ऐसा बना कर लाएगी कि हम उंगलियां चाटते रह जाएं, हमारी बगल में हाथ डाल चल दी हमारे साथ.

खेती की खास मशीन: पावर टिलर

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है. इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं.

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है. इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है.

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं.

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं. यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं. खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है.

आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं. उन्हीं में से एक इटैलियन पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

इटैलियन पावर टिलर

यह बीसीएस इंडिया प्रा. लि. द्वारा बनाया गया पावर टिलर है. इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है. यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है.

खासीयत : यह काफी हलका और चेनरहित होता है. यह चलने में बेहद आसान है. यह 4 मौडलों (एमसी 720, एमसी 730, एमसी 740, एमसी 750) में उपलब्ध है. इस के 2 मौडल पेट्रोल और डीजल दोनों से चलते हैं.

अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर : 0161-2848597 और मोबाइल नंबरों 08427755743 व 08427800753 पर बात कर सकते हैं.

शरीर के लिए घातक है ग्लूटेन

अगर अचानक डाक्टर किसी से गेहूं की रोटी खाना बंद करने के लिए कहे और बताए कि यह आप के लिए जहर है तो एकबारगी सुनने वाला चौंक जाएगा. सदियों से तो लोग गेहूं की ही रोटी खाते आ रहे हैं. भला रोजरोज मक्का, रागी, ज्वार, बाजरा या चने की रोटी खाई जाती है क्या?

गेहूं की रोटी खाने से मना करने की वजह है गेहूं में पाया जाने वाला एक प्रोटीन जो गेहूं के अलावा जौ, राई व टिट्रिकेल (गेहूं और राई के संयोग से तैयार एक प्रजाति) में भी पाया जाता है. इस प्रोटीन को ग्लूटेन कहते हैं. यही वह प्रोटीन है, जो गेहूं के आटे को गूंधने पर उसे बांध देता है

और उसे बेल कर रोटी या पूरी वगैरह बनाई जाती हैं.

जिन अनाजों में यह ग्लूटेन प्रोटीन नहीं पाया जाता है, उन का आटा गूंधना और रोटी बनाना कठिन होता है. लेकिन भारत के गांवों में ऐसे अनाजों की रोटियां भी खूब खाई जाती हैं. अब सेहत का खयाल रखने वाले शहरी लोगों ने भी ऐसे अनाजों को अपने भोजन में शामिल कर लिया है.

ग्लूटेन प्रोटीन सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों के लिए काफी खतरनाक होता है. सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों को गेहूं की रोटी खाने से पेट में अफरा, गैस, डायरिया, उल्टी, माइग्रेन (सिर दर्द) और जोड़ों के दर्द की तकलीफ हो सकती है.

सीलिएक रोग सीधे छोटी आंत की पाचनक्रिया को प्रभावित करता है. डाक्टरों के मुताबिक सीलिएक रोग एक लाइलाज बीमारी है, जिस से बचने के लिए परहेज ही इकलौता रास्ता है. यही वजह है कि आज बाजार में ग्लूटेनफ्री आटा भी मिलता है, जिसे सफेद चावल के आटे, आलू के स्टार्च, टैपियोका के स्टार्च, ग्वार गम और नमक मिला कर बनाया जाता?है.

गेहूं खाने का खास अनाज है, जो 20 फीसदी से ज्यादा ऊर्जा व पोषक तत्त्वों की आपूर्ति करता है. इनसान कम से कम पिछले 10 हजार सालों से गेहूं के साथ ग्लूटेन को भी इस्तेमाल करता चला जा रहा है.

अमेरिकी वैज्ञानिक डा. डेविड पर्लमुटर ग्लूटेन के सख्त विरोधी हैं. उन का कहना है कि आज 40 फीसदी अमेरिकी लोग ग्लूटेन को नहीं पचा सकते. बाकी 60 फीसदी भी इस की चपेट में आ रहे हैं. डा. डेविड ने गेहूं, चीनी व दूसरी कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों को इनसानों लिए घातक बताया है.

डा. विलियम डेविस ने अपनी किताब ‘व्हीट बेली’ में गेहूं के ग्लूटेन को भोजन का जहर मानते हुए इसे दमा, अस्थिरोगों, रक्त वाहिनियों के रोगों व दिमाग के रोगों की वजह बताया है.

गेहूं से होने वाले रोगों से बचने के लिए चौलाई, कुटू, मक्का, काला चना, तिल, रामदाना, चावल, बाजरा, ज्वार, सोयाबीन, अखरोट, बादाम, पिस्ता आदि से बनी चीजें खाने की सलाह दी जाती है.

डबलरोटी बनाने में वाइटल व्हीट ग्लूटेन का इस्तेमाल किया जाता है, जो पेट के लिए खतरनाक होता?है. लिहाजा डबलरोटी खाने से बचना ही बेहतर है.

क्या होती है सीलिएक बीमारी

यह एक वंशानुगत बीमारी है. इस से पीडि़त लोगों को गेहूं, जौ और ओट्स में मौजूद ग्लूटेन नामक प्रोटीन से एलर्जी होती है. इन चीजों से बने पदार्थ पीडि़त लोगों को हजम नहीं होते हैं. ग्लूटेन से होने वाली एलर्जी खासतौर से आंत को प्रभावित करती है. यह रोग मुख्य रूप से बच्चों में होता है. समय पर जांच न कराए जाने पर यह रोग बड़े होने पर भी बना रहता है और दिक्कतें पैदा करता है. इस के मुख्य लक्षणों में दस्त का पुराना रोग होना, पेट का फूल जाना और बच्चे का विकास रुक जाना शामिल हैं. एनीमिया, रिकेट्स, कद का छोटा होना व शरीर का कमजोर होना भी इस बीमारी के लक्षण हो सकते हैं. रोग के लंबे समय तक जारी रहने पर आंतों के कैंसर और लिम्फोमा (प्रतिरोधी प्रणाली का कैंसर) का खतरा पैदा हो जाता है. इस का समय पर इलाज करा लेना जरूरी है.

रोहित वेमुला और दलितों की दुर्दशा

साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले ऊंची जातियों के पढ़ेलिखों ने एक तीखी मुहिम चलाई थी. सोनिया गांधी व कांग्रेस के राज में 10 सालों में जो बेईमानियां हुईं, उन्होंने कांग्रेस की सूरत बिगाड़ डाली. चुप्पे मनमोहन सिंह जवाब देने में पीछे रह गए और राहुल गांधी जब बोले, गलत बोले. नतीजा यह हुआ कि बड़बोले प्रवचनों के माहिर भाजपाई नेता आम जनता को कन्विंस कर गए कि अच्छे दिन आएंगे.

अच्छे दिन आए पर कट्टरपंथियों के लिए जो न केवल विधर्मी को दुश्मन सा मानते हैं, पिछड़ों, जो हिंदू वर्ण व्यवस्था में शूद्र हैं और दलित, जो अछूत, जाति बाहर हैं, को पिछले जन्मों का पाप भुगतने वाले भी मानते हैं. जीतने के बाद सारे देश में ऊंची जातियों का सिर ऊंचा हो गया और एक बार फिर वे उस राम राज्य की कल्पना करने लगे, जिस में हनुमान, बाली, एकलव्य, घटोत्कच केवल दास थे. औरतें तो अहल्या की तरह पैरों में रहती थीं और अछूतों की तो गिनती ही नहीं थी. हाथ में राज आते ही सत्तारूढ़ नेता दलितों के खिलाफ भी मुखर होने लगे और सारे देश में भगवा दुपट्टे और तिलककलेवे दिखने लगे.

विश्वविद्यालयों में दलितों को मिलने वाले आरक्षण पर तो खास सवाल उठाए जाने लगे. देश की धीमी रफ्तार के लिए बारबार आरक्षण को कोसा जाने लगा. पहला निशाना तो गरीब मुसलमानों को बनाने की कोशिश की गई और 2002 के बाद चुप सी रहने वाली कौम को कभी गौमांस के नाम पर, कभी योग के नाम पर, कभी सूर्य नमस्कार के नाम पर, तो कभी वंदेमातरम के नाम पर तंग किया जाने लगा. हिंदू सोच में विधर्मियों की तरह दलितों से भी रोटीबेटी का नहीं, छुआछूत का पुराना रिवाज रखा जाता है. अगर मुसलमानों के बारे में गुस्सा पाकिस्तान बनने का है, तो दलितों के बारे में भीमराव अंबेडकर का 1932 में आरक्षण का हक पा लेने का. दोनों ही ने ऊंची जातियों के अंगरेजों के देश पर सत्ता में आने के बाद बढ़ते असर पर ग्रहण लगाया था.

आंध्र प्रदेश के हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी पर जो बवाल मचा है, वह दलितों का दबा गुस्सा है, जो कई सालों से पनप रहा था. दलितों के ज्यादातर नेताओं को तो ऊंची जातियों की पार्टियों ने खरीद लिया था और सत्ता में रही एकमात्र दलित नेता मायावती को अंबेडकर के मंदिर बनवाने और कीमती जेवर व पोशाकें पहनने से फुरसत न मिली थी. यह हताशा का दौर ही है, जिस वजह से विश्वविद्यालयों में, जहां सब छात्र लगभग बराबर होते हैं, आरक्षण पाने वाले लगातार तानों के शिकार हो रहे हैं. वे पहले से ही गालियों के आदी रहे हैं, पीढि़यों से, इसलिए आमतौर पर चुप ही रहते हैं. रोहित वेमुला के दोस्तों ने अंबेडकर स्टूडैंट्स एसोसिएशन बनाई, पर ऊंची जातियों की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मुकाबले वह कहीं कमजोर निकली. उन की अकसर पिटाई ही होती थी.

उसी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेताओं के कहने पर केंद्रीय मंत्री तिलकधारी बंडारू दत्तात्रेय ने दखल दिया. वैसे तो मंत्रीजी पिछड़े वर्ग के हैं, पर बहुत से दूसरे पिछड़ों की तरह सवर्णों की सेवा करने में इतना जोश दिखाने लगते हैं कि सवर्ण भी अपने को फोका भक्त समझने लगते हैं. देशभर में वर्ण व्यवस्था के हिसाब से शूद्र घरों से निकले इतनी भक्ति से जोशखरोश से उसी भेदभाव वाली वर्ण व्यवस्था का ढोल पीट रहे हैं कि आश्चर्य होता है कि उन्हें हिंदू समाज की असलियत मालूम भी है या नहीं.

जब से शूद्र माने जाने वाले पिछड़ों के हाथों में जमीनें आई हैं और गांवोंकसबों की दुकानदारियां हाथ लगी हैं, वे बढ़चढ़ कर वर्णवादी पौराणिक युग को लाने की कोशिश कर रहे हैं और सवर्णों को बैठेबिठाए जिहादी मिल रहे हैं, जो आकाओं के लिए आंख मूंद कर काम कर रहे हैं. रोहित वेमुला उसी का शिकार हुआ है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में अगर पैसा आएगा तो आम गरीब यानी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की मेहनत पर आएगा. हर देश अमीर तब ही बनता है, जब उस की पूरी जनता ज्यादा व और ज्यादा काम करती है. बीमार, अनपढ़, पिछड़ी, अंधविश्वासी, आलसी, नशेड़ी, बिना हुनर वाली मजदूर जनता देश पर बोझ है. उसे पढ़ाना, अंधविश्वासों के दलदल से निकालना, बराबरी की जगह देना, नशे से बचाना पूरे देश की भलाई के लिए जरूरी है. यह उन पर एहसान ही नहीं है. यह ऊंची जातियों और पैसे वालों के लिए और ज्यादा अमीर बनने की पहली शर्त है.

दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों को नाराज कर के और उन्हें नीचा, पाप योनि का दिखा कर देश चार कदम बढ़ नहीं सकता. आज इसी जमात के लोग विदेशों में जा कर बाहर से देश को 4 लाख करोड़ रुपए भेजते हैं. ऊंची जातियों के लोग तो वहीं विदेशों में आलीशान मकान बना कर मौज कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी जब विदेशों में जाते हैं तो जो भारतीय मूल के लोग उन की सभा में जमा होते हैं, वे ऊंची जातियों के अमीर हैं जो वहां के समाज से कटे हैं और भारत से लाभ कमाने की कोशिशों में लगे रहते हैं.

रोहित वेमुला क्या दलितों की दुर्दशा का प्रतीक बनेगा? क्या वह मर कर साबित कर पाएगा कि बराबरी और इज्जत का हक हर नागरिक के पास है और उसे मांबाप की जाति में जीने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता? रोहित वेमुला की मौत की वजह भारतीय जनता पार्टी के मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, स्मृति ईरानी या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ही नहीं हैं, दूसरी पार्टियों में मौजूद ज्यादातर नेता, धंधों के मालिक, अफसरशाही, मीडिया सब हैं, जो वर्ण व्यवस्था के मकड़जाल से देश को निकालने की कोशिश भी करना छोड़ चुके हैं.

दलित, पिछड़े या उन में से बने मुसलमान, ईसाई या बौद्ध ज्यादातर गरीब हैं, तो उस सामाजिक भेदभाव के कारण हैं, जो पढ़ाईलिखाई व तर्क की भाषा के 200 सालों के बाद भी कम नहीं हो रहा. रोहित वेमुला की मौत शायद एक बड़ा जलजला साबित हो. शायद ऊंचों की सेवा कर रहे पिछड़े व दलित भी समझें कि वे कैसे केवल कठपुतली बने हुए हैं. यह मामला दलित रोहित वेमुला का नहीं, हर गरीब का है.

ऐक्टर से ज्यादा किरदार अहम: रोहित खुराना

मौडलिंग के जरीए टीवी में दस्तक देने वाले रोहित खुराना उन इनेगिने कलाकारों में हैं, जो अपने पहले ही सीरियल से सुर्खियों में आ गए. वे अपने पहले सीरियल ‘उतरन’ में वंश के किरदार से खूब चर्चित हुए. दिल्ली के रोहित ने छोटे परदे पर आने के लिए बहुत संघर्ष किया. अपनी बचपन की फ्रैंड को अपनी जीवनसंगनी बनाने वाले रोहित ने एक इवेंट के दौरान अपनी कुछ बातें साझा कीं:

जितनी ख्याति पहले सीरियल ‘उतरन’ में वंश के किरदार में मिली है क्या किसी और धारावाही में भी मिली है?

मेरी ऐंट्री टीवी पर इसी सीरियल से हुई थी. मेरा किरदार बहुत ही सुंदर तरीके से लिखा गया है और बहुत ही अच्छे तरीके से इसे फिल्माया भी गया है. मुझे वंश के किरदार से मिलताजुलता किरदार ‘लाजवंती’ धारावाही में जमाल का लगा, इसलिए मैं ने इसे करने के लिए हामी भरी. जमाल की कहानी सुन कर मुझे लगा कि यह किरदार मुझे वहां ले जाएगा जहां मैं जाना चाहता हूं. ‘उतरन’ को मैं अपनी जिंदगी का माइलस्टोन मानता हूं. पहला धारावाही भी आप के पहले प्यार की तरह होता है, जिसे आप जीवन भर नहीं भुला सकते.

किसी सीरियल को हिट कराने में सब से ज्यादा क्या अहम है?

मैं उस की राइटिंग को अहम मानता हूं, क्योंकि जब अच्छा लिखा जाएगा तभी तो उसे अच्छी तरह से बोला जा सकता है. धारावाही हिट बनाने में उस की स्टोरी का बहुत बड़ा योगदान होता है. उस के बाद निर्देशन और फिर उस की स्टारकास्ट आती है. अगर कहानी और निर्देशन कसा हुआ हो तो धारावाही का हिट होना पक्का है.

आप की नजर में ऐक्टर प्रमुख होता है या किरदार?

अगर छोटे परदे की बात की जाए तो उस में ऐक्टर से ज्यादा किरदार की अहमियत है, क्योंकि टीवी पर एक कलाकार को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए बहुत समय मिलता है और उस की स्वयं की पहचान उस किरदार के नाम से होती है जैसे मुझे आज भी लोग रोहित खुराना से ज्यादा वंश के नाम से जानते हैं. फिल्मों में ठीक इस के उलटा होता है. 5 मिनट के सीन में आप को अपना 100 फीसदी देना होता है. वहां चेहरे की वैल्यू ज्यादा होती है, क्योंकि फिल्में स्टारकास्ट देख कर ही हिट होती हैं.

धारावाही का कई सालों तक खींचा जाना आप की नजर में सही है?

मैं इसे गलत नहीं मानता, क्योंकि दर्शकों का प्यार मिल रहा है तभी तो धारावाही चल रहा है. मुझे अभी तक लंबे धारावाहिक का औफर नहीं आया है. ऐसे शो में ऐक्टर 4-5 सालों के लिए निश्चिंत हो जाता है कि उसे और कहीं काम ढूंढ़ने के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. सब से अहम बात यह है कि दर्शकों की नजरों में उस की वैल्यू बढ़ जाती है. अगर मुझे इस तरह के किसी सीरियल का औफर मिलता है तो मैं उसे तुरंत स्वीकार कर लूंगा.

ऐक्टिंग में आने के लिए क्या प्रशिक्षण लेना जरूरी मानते हैं?

अगर मैं अपनी बात करूं तो मैं ने बिना कोई ऐक्टिंग कोर्स किए कैमरा फेस किया है. मैं ने जो भी सीखा सैट पर ही आ कर सीखा. मुझे बहुत अच्छे निर्देशक और राइटर मिले. उन से मैं ने बहुत कुछ सीखा. मैं मानता हूं कि ऐक्टिंग कोर्स करने से ऐक्टिंग नहीं आती. ऐक्टिंग आती है लगन और मेहनत से काम करने से.

फिल्मों में काम करने में रुचि नहीं है क्या?

बिलकुल है. मैं ने 4 साउथ की फिल्में की हैं. 2 पंजाबी और 2 हिंदी फिल्मों में भी काम कर चुका हूं. मेरी एक और कौमेडी फिल्म ‘होटल ब्यूटीफुल’ जौनी लीवर व अन्य नए कलाकारों के साथ मार्च में रिलीज होगी. अगर अच्छे रोल मिलते हैं तो जरूर फिल्में करूंगा. मैं हर तरह का किरदार निभाना चाहता हूं. वैसे एक कलाकार के लिए ऐक्टिंग करना माने रखता है यह नहीं कि वह फिल्मों में काम कर रहा है या टीवी पर.

मेरी शादी मेरे हिसाब से होगी: आलिया भट्ट

बौलीवुड की चुलबुली अदाकारा आलिया भट्ट धीरेधीरे शीर्ष अभिनेत्रियों की सूची में शामिल हो ही रही थीं कि इसी बीच उन की रिलीज हुई फिल्म ‘शानदार’ बौक्स औफिस पर औंधे मुंह जा गिरी. इस फिल्म में आलिया ने अपनी भूमिका को सीरियसली नहीं लिया. प्रमोशन के दौरान भी जो बातें उन से पूछी जातीं, उन्हें मजाक में टाल जातीं. इस से लगने लगा कि उन के इस व्यवहार की वजह उन की पहले की फिल्मों की सफलता है. कामयाबी उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. एक इवेंट के दौरान आलिया भट्ट से मुलाकात होने पर उन के अफेयर और शादी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया, ‘‘शादी करने की सही उम्र 32-33 वर्ष है और मैं इस उम्र से अभी काफी दूर हूं. मैं शादी में छोटी गैदरिंग चाहती हूं और वह ग्रीस में हो. मेरी शादी मेरे हिसाब से ही होगी. रही बात मेरे अफेयर की तो फिलहाल मेरा किसी से कोई अफेयर नहीं है.’’

आलिया ने बहुत कम उम्र में सफलता पाई है, जिसे ले कर वे बहुत खुश हैं. लेकिन इस बात से उन्हें डर भी लगता है. वे कहती हैं, ‘‘मैं ने स्कूल में हर रेस को जीता है. केवल एक रेस हारी थी. चौथी कक्षा में जब मैं ने रेस हारी, तो मैं बहुत रोई थी. टीचर से कहासुनी भी हो गई थी. मैं फेस्यर को सहन नहीं कर सकती. मैं जीत को महत्त्व देती हूं.’’

आलिया को कैरियर में तो कामयाबी मिली है पर दूसरे क्षेत्रों में नाकामयाबी हाथ लगी है. वे सीरियस हो कर कहती हैं, ‘‘मैं एक रोमांटिक लड़की हूं. बहुत इमोशनल और सैंसिटिव भी हूं. मुझे हर काम नंबर वन पर अच्छा लगता है. लव लाइफ में मैं ने बहुत असफलता फेस की है. मगर उस से मुझे शक्ति मिली. अगर गिरोगे नहीं तो उठोगे कैसे? इस सोच को मैं हमेशा अपने पास रखती हूं. मैं अभी अपने कैरियर पर फोकस्ड हूं. इस दौरान अगर कुछ गलत भी करती हूं, तो उसे हमेशा पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाना चाहती हूं. यह मेरी कमजोरी और शक्ति दोनों हैं.’’

आलिया हमेशा सोचसमझ कर फिल्में चुनती हैं पर कई बार उन का चुनाव गलत भी हो जाता है. फलस्वरूप तनाव होता है. तनाव को कम करने के लिए वे अपने परिवार का सहयोग लेती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरे परिवार में मेरी मौम मेरी सपोर्ट सिस्टम हैं. खानापीना, पहनना सब कुछ उन का रहता है. वे साइलैंट सपोर्टर हैं. जब मैं तनाव में आती हूं तो उन्हें या अपनी बहन को एक मैसेज छोड़ देती हूं कि मैं तनावग्रस्त हूं. सभी चुप हो जाते हैं. कुछ नहीं पूछते. मेरी मां हर रात मेरे लिए काजूमिल्क बनाती हैं, जो मुझे रिलैक्स करता है. अगर आप फिल्मी परिवार से नहीं हैं तो आप इस तनाव को समझ नहीं सकते. फिल्म साइन करना और अभिनय करना ही केवल काम नहीं होता. सब कुछ देखना पड़ता है. प्रमोशन, दर्शकों की पसंदनापसंद सब कुछ जानना आवश्यक है और मैं यह सब खुद देखती हूं.’’

आलिया भट्ट अलग घर में रहने वाली हैं, जिसे उन्होंने अपनी कमाई से खरीदा है. परिवार से अलग रहने की बात पर वे कहती हैं, ‘‘मेरे मातापिता मेरे इस कदम को सराहते हैं कि मैं सैल्फ डिपैंड हूं. घर खरीदने की वजह अधिक जगह का होना है. मेरे कपड़े ओवरफ्लो हो रहे थे. घर पर तैयार नहीं हो पाती थी. मेरी बहन रात को सोती नहीं. वह नींद संबंधी विकार की शिकार है, इसलिए दिन में सोती है. मैं उसे डिस्टर्ब नहीं करती. मेरा घर मेरे पिता के घर से मात्र 100 गज की दूरी पर है. अभी मुझे चिता हो रही है कि मैं पूरे घर को कैसे संभालूंगी.’’

आलिया को आज भी अपना बचपन याद है जब उन्हें केवल क्व50 पौकेट मनी में महीना निकालना पड़ता था. फिल्म ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ की सफलता के बाद जब उन्हें पहली पेमैंट मिली तो उस से उन्होंने अपने पिता के फार्महाउस में अपने नाम से स्विमिंग पूल बनवाया. वे युवा पीढ़ी से कहती हैं कि यह समय उस के आगे बढ़ने का है. लड़का हो या लड़की हर कोई अपनी प्रतिभा को जाने. उसे करना क्या है और फिर उसी हिसाब से आगे बढ़े तो यकीनन सफलता मिलेगी. केवल ग्लैमर वर्ल्ड को देख कर इस में कदम न रखें. अगर प्रतिभा है तभी प्रशिक्षण ले कर इस क्षेत्र में आएं.

आलिया की फैशन सैंस बहुत अच्छी है. उन्हें पता होता है कि कब क्या पहनना है. आलिया की आने वाली फिल्में ‘उड़ता पंजाब’ और ‘कपूर ऐंड संस’ हैं. उन का कोई ड्रीम प्रोजैक्ट नहीं है.

आग में घी

अब लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी चाहने लगी हैं कि जातिगत आरक्षण पर दोबारा सोचविचार हो. इस संवेदनशील मुद्दे पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बोले थे तो बिहार में भाजपा की दुर्गति हुई. उसे देख भागवत ने इस मुद्दे को प्रणाम करते कह दिया था कि आरक्षण खत्म नहीं होगा.

फिर सुमित्रा महाजन क्यों बोलीं, वह भी उस सूरत में जब उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के चुनाव सिर पर हैं, हालांकि उन्होंने आड़ जातिगत भेदभाव की ली है कि यह क्यों अब तक कायम है. अब इस मासूमियत पर कौन फिदा न हो जाए, सच हर कोई जानता है कि जातिवाद कौन, कैसे और कितनी तादाद में फैलाता है. ऐसे में फिर बहस या पुनर्विचार की गुंजाइश ही कहां बचती है.

 

गरीबी तो हट चुकी

राहुल गांधी  को जब अपनेआप को सियासी तौर पर चार्ज करना होता है तो वे सीधे बुंदेलखंड पहुंच जाते हैं जहां गले लगाने के लिए गरीब आदमी इफरात में मिल जाते हैं. यूरोप में छुट्टियां मना कर लौटते ही बीते दिनों उन्होंने यही किया और पीएम नरेंद्र मोदी को ललकार दिया कि देखो, गरीबों की तरफ देखो.

इधर, नरेंद्र मोदी बहुत व्यस्त हैं. कभी वे विदेश जाते हैं तो कभी विदेशियों को यहां बुला लेते हैं. ऐसे में गरीबों को देखने की जिम्मेदारी उन्होंने विपक्षियों पर ही छोड़ दी है. गरीबी कभी बड़ा राजनीतिक मुद्दा हुआ करती थी अब नहीं है. इस की वजहें कुछ भी हों, चलन में नहीं रही. इसलिए आजम खान राहुल गांधी को पप्पू कहते हुए चौकलेट खाने का मशवरा देते हैं. जाहिर है राहुल को सही दिशा नहीं मिल रही, जिस पर चल कर वे अपनी राजनीति चमका पाएं.

आज जाना

नेह का प्रतिदान भी कितना कठिन है

आज जाना

विस्मृत पलों की सुरभि को

अनजान फूलों में बसाना

फिर नयी माला बनाना

क्या  कहीं इतना सरल है

आज जाना

मौन के वाचाल क्षण को

वाकपटुता से भुलाना

फिर नया इतिहास रचना

क्या कहीं इतना सरल है

आज जाना

 

– सुभाषिनी शर्मा

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