Download App

संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाता माध्यमिक शिक्षा मंडल

10वीं और 12वीं बोर्ड जैसी अहम परीक्षाएं आयोजित कराने वाले मध्य प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने 5 मार्च को बारहवीं के हिन्दी के पर्चे मे छात्रों से एक विषय पर निबंध लिखने को कहा, विषय बड़ा ही दिलचस्प और सामयिक था, जातिगत आरक्षण देश के लिए घातक. 8 मार्च आते आते इस नाजुक मसले पर राजनीति इतनी गरमा गई कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को इस मामले पर जांच के आदेश देने पड़े.

विधानसभा मे विपक्ष ने जमकर हंगामा मचाते हुये आरोप यह लगाया कि सरकार आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है. कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष बाला बच्चन इस मुद्दे पर बेहद आक्रामक मूड मे दिखे जो इस विषय पर बहस की इजाजत चाहते थे, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर सीताशरण शर्मा ने अनुमति नहीं दी. राजनीतिक स्तर पर अब कुछ भी हो, लेकिन यह साफ तौर पर उजागर हो गया है कि शिक्षण संस्थाओं मे सवर्ण मानसिकता बाले कर्मचारियों का दबदबा है जो आरक्षण विरोधी हैं और भगवा खेमे के पक्ष में माहौल बनाने का कोई मौका नहीं चूकते, इन्हे बेहतर एहसास इस बात का है कि दरअसल में सरकार शिवराज सिंह नहीं संघ चला रहा है.

आरक्षित वर्ग के छात्रों की राय और मानसिकता टटोलने के लिए बोर्ड का इम्तहान एक बेहतर जरिया था, जिसके जरिये इस वर्ग के छात्रों को जलील भी किया गया. 12वीं के छात्रों का बौद्धिक स्तर इतना इतना विश्लेषक नहीं होता कि वे यह बता सकें कि जातिगत आरक्षण घातक नहीं, बल्कि 2 हजार सालों से ऊंची जाति बाले रसूखदारों की गालियां और जूतियां खा रहे नीची जाति वालों का संवैधानिक अधिकार और शोषण का मुआवजा है, जिसके चलते ही जेएनयू में कन्हैया जैसे छात्र पैदा होते हैं, क्योंकि वे बचपन से ही देख और भुगत रहे हैं कि कैसे उनके पूर्वजों को सवर्णों के घर के सामने से गुजरते वक्त पैरों से जूते निकालकर सर पर रखना पड़ते थे. यह अमानवीय और घृणित प्रथा आज भी गांव देहातों मे बरकरार है.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में तो हालत यह है कि दलित वोट डालने भी नंगे पांव जाते हैं क्योंकि लाइन मे उनके आगे पीछे सवर्ण भी खड़े होते हैं. ऐसे में पूछा यह जाना बेहतर होता कि कैसे जातिगत आरक्षण ऊंची जाति वालों के लिए घातक है, जो आरक्षण के चलते आई जागरूकता से हैरान परेशान हैं. बहरहाल मुख्यमंत्री की घोषणा का एक मतलब यह भी है कि कम से कम परीक्षा में तो यह नहीं पूछा जाना चाहिए था. मूल्यांकन मे इस सवाल के नंबर न जोड़ने की बात भी शिवराज सिंह ने कही, जबकि होना यह चाहिए कि जिन छात्रों ने इस विषय पर निवन्ध लिखा, उन्हे सार्वजनिक किया जाए, जिससे पता चले कि नाजुक किशोर मन आरक्षण के बारे मे क्या सोचता है.

सरकार छात्रों की राय का बेजा इस्तेमाल नहीं करेगी इस बात की कोई गारंटी नहीं, क्यों न यह माना जाए कि यह एक तरह का सर्वेक्षण था, जिसका फायदा हिन्दुत्व के पेरोकर अपनी नीतियां बनाने में कर सकते हैं. इस विषय पर निबंध लिखने को कहा जाना इत्तफाक कम, साजिश की बात ज्यादा लगती है, क्योंकि मध्य प्रदेश के बाद ठीक यही विषय उत्तरी गुजरात के वी एस लॉ कालेज में भी निबंध लिखने दिया गया, जिस पर सांसद प्रवीण राष्ट्रपाल ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री को पत्र लिखते हुए कार्रवाई की मांग की.

बकौल प्रवीण यह विषय या सवाल ही असंवैधानिक है, इसलिए केंद्र सरकार इस कालेज के खिलाफ कानूनी कदम उठाए. पर शायद ही स्मृति ईरानी या शिवराज सिंह कुछ ठोस करें या इन हकीकतों से इत्तफाक रखें कि सरकारी स्कूलों में जातिवाद की हालत यह है कि ऊंची जाति बालों के बच्चे दलित शिक्षकों के हाथ का छुआ खाना लेने से पंडे पुजारियों की तरह मना कर देते हैं.  तमिलनाडु के कुछ स्कूलों मे तो दलित बच्चों के लिए ड्रेस कोड चलता है, जिससे उन्हे कपड़ो से ही पहचान कर उनसे दूर रहा जाता है. 

बेटी के इस पिता को सलाम

कोख में बेटी को मारने के लिए बदनाम हो रहे हरियाणा राज्य के जींद ज़िले में कुछ ऐसा हुआ कि हर बेटी के साथ साथ उस शख्स को भी फख्र महसूस होगा, जो बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं करता है. जींद के जैजैवंती गांव में एक आदमी संदीप ने अपने घर में बेटी पैदा होने पर 5 गांवों के लोगों को भोज कराया. इतना ही नहीं, संदीप ने इस समारोह को शानदार बनाने के लिए ढोल नगाड़ों के साथ जो धूमधड़ाके वाली रस्म की, वो अमूमन बेटे के पैदा होने पर पर ही निभाई जाती है.

हरियाणा में आज भी ऐसे गांव मिल जाएंगे जहां पूरा एक साल निकल जाने पर भी किसी भी घर में कोई बेटी नहीं पैदा होती है. इस सिलसिले में इस गांव की सरपंच सविता ने बताया कि उन्हें बहुत ख़ुशी है कि हमारा पूरा गांव बेटी पैदा होने की ख़ुशी मनाता हैं.

यह गांव लिंगानुपात में ज़िले में पहले नंबर पर रह कर एक लाख रुपए का इनाम भी जीत चुका हैं.

 

बौलीवुड से क्यों डरता है पाकिस्तान

2015 में रिलीज हुई कई भारतीय फिल्मों पर पाकिस्तान में प्रतिबंध लगाया गया. फिल्म ‘कलेंडर गर्ल’ पर रोक लगाई गई और फिल्म ‘फैंटम’ को सिनेमा हौल्स में दिखाने से इनकार किया गया. पाकिस्तान की इस पाबंदी की काफी चर्चा रही. चूंकि यह रोक पाकिस्तान सरकार की तरफ से लगाई गई, इसलिए सवाल पैदा हुआ कि क्या वहां के लोग भारतीय फिल्में और टीवी सीरियल्स पसंद करते हैं?

भारतीय फिल्मों के शौकीन हैं पाकिस्तानी

यह हैरानी की बात है कि पाकिस्तानी अपने देश में बनी फिल्मों और टीवी सीरियल्स से ज्यादा भारत में निर्मित हिंदी फिल्मों और टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों के शौकीन हैं. यह भी एक सच है कि आपसी रिश्ते सुधारने के लिए सरकारी स्तर पर भारतपाकिस्तान के बीच जिन चीजों का सहज आदानप्रदान पिछले अरसे में होना शुरू हुआ था, उन में एक हिस्सा बौलीवुड की फिल्मों का भी था, जिन के दर्शकों की एक बड़ी तादाद पाकिस्तान में मौजूद है. 1965 के भारतपाक युद्ध के बाद के 4 दशकों के दौरान जब तक इस पर पाकिस्तान की तरफ से पाबंदी थी, हिंदुस्तानी फिल्मों की पाइरेटेड सीडीडीवीडी वहां चोरीछिपे पहुंचती रही हैं. यही नहीं, जब भी मौका मिला, लाहौरइस्लामाबाद के सिनेमाघर मालिकों ने भी भारतीय फिल्मों की बदौलत खूब कमाई की. इस बीच परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में यह रोक हटा दी गई थी और वहां बौलीवुड की फिल्में पहुंचने लगी थीं, लेकिन अब यह सिलसिला एक बार फिर रुकता प्रतीत हो रहा है.

दरअसल, 2013 में पाकिस्तान के सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन को इस दलील के साथ अनापत्ति प्रमाणपत्र देना बंद कर दिया था कि इस संबंध में नए कानून व दिशानिर्देश तैयार किए जा रहे हैं, इसलिए फिलहाल भारतीय फिल्में पाकिस्तान में प्रदर्शित करना गैरकानूनी होगा. इस बीच ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी कुछ फिल्मों को वहां के सिनेमाघरों में दिखाने की इजाजत भी दी गई, पर अन्य फिल्मों से प्रतिबंध नहीं हटा. जैसे 2015 में रिलीज फिल्म ‘कलेंडर गर्ल’ को वहां दिखाने से इसलिए रोक दिया गया कि पाकिस्तानी सैंसर बोर्ड को इस फिल्म के एक संवाद पर एतराज था, जिस में पाकिस्तानी लड़की नाजरीन मलिक का किरदार निभाने वाली अदाकारा अवनी मोदी कहती हैं कि पाकिस्तानी लड़कियां भी उतना ही बोल्ड काम करती हैं जितना बाकी लड़कियां करती हैं, बल्कि कभीकभी उस से ज्यादा भी. इसी तरह फिल्म ‘फैंटम’ में आतंकी हाफिज सईद जैसी भूमिका निभाने वाले पात्र के संवादों को आपत्तिजनक बता कर इस के प्रदर्शन पर रोक लगाई गई.

नुकसान पाक सिनेमा मालिकों का

पाकिस्तान के इस कदम से बौलीवुड को चाहे नुकसान हो या न हो लेकिन पाकिस्तान के सिनेमाघर मालिकों को करोड़ों की चपत लग रही है. इस की वजह है कि उन का असली कारोबार हिंदुस्तानी फिल्मों की बदौलत ही चलता है. वे भी नहीं चाहते कि इस रोक की वजह से मुंबइया फिल्मों के पाकिस्तान आने के चोर रास्ते खुलें यानी चोरीछिपे सीडीडीवीडी आने लगें और उन के सिनेमाघर कंगाली की हालत में पहुंच जाएं.

इधर, पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान में भी सिनेमा उद्योग द्वारा सिनेप्लैक्स आदि के निर्माण में भारी निवेश किया गया है और उन की ज्यादातर कमाई भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर टिकी है. ऐसी स्थिति में यदि भारतीय फिल्में वहां वैध तरीके से नहीं पहुंचतीं और दिखाई जाती हैं तो इस से पाकिस्तान के सिनेमा उद्योग को भारी नुकसान हो सकता है, क्योंकि यह एक सचाई है कि पाकिस्तानी सिनेमाघरों का कारोबार लाख कोसने के बावजूद भारतीय हिंदी फिल्मों के भरोसे ही चलता रहा है. वहां के सिनेमाघर मालिक खुलेतौर पर स्वीकार करते रहे हैं कि अगर मुंबइया फिल्में न हों तो उन के सिनेमाघरों पर ताले पड़ जाएं.

पाकिस्तानी सिनेमाघरों में अकसर तभी रौनक रहती है, जब वहां कोई भारतीय फिल्म चल रही हो. ईद जैसे मौके पर भी पाकिस्तानी सिनेमाघरों को आमतौर पर कोई देसी फिल्म नहीं मिल पाती है और मजबूरी में वहां भारतीय फिल्में चलाई जाती हैं. जैसे कुछ साल पहले ईद के मौके पर ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ की धूम थी, तो 2015 में ‘बजरंगी भाईजान’ छाई हुई थी. ईद पर जब कोई भारतीय फिल्म उन्हें नहीं मिल पाती है, तो उन्हें औसत दर्जे की फिल्मों से काम चलाना पड़ता है. जैसे 2012 में वहां के सिनेमाघरों को देसी फिल्म के नाम पर ‘शेर दिल’ से काम चलाना पड़ा था और 2011 में ईद के मौके पर पंजाबी फिल्में ‘शरीका’ और ‘गुज्जर दा खड़ाक’ दिखाई गई थीं.

अच्छी फिल्में न मिल पाने की हालत में चूंकि सिनेमाघर मालिकों को नुकसान होता है, इसलिए वे किसी तरह से नई भारतीय फिल्मों का जुगाड़ कर लेते हैं और उन्हें चलाते हैं. नई फिल्मों को तरसते पाकिस्तान के सिनेमाघर मालिकों को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे हिंदुस्तानी फिल्म दिखा रहे हैं या पाकिस्तानी, क्योंकि वहां के दर्शक आसानी से हिंदी समझ लेते हैं. भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन के मामले में वहां के सिनेमाघर मालिक कहते हैं कि जिस तरह देश में अनाज की कमी होने पर उसे विदेशों से मंगाया जाता है, उसी तरह अच्छी पाकिस्तानी फिल्मों की भारी किल्लत उन्हें मुंबइया फिल्मों की तरफ मोड़ती है.

परवेज मुशर्रफ बनाम मुबशिर लुकमान

उल्लेखनीय है कि पिछली बार 2006 में परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक हटाई गई थी. हिंदी फिल्म ‘ताजमहल : द इंटरनल लव स्टोरी’ का वहां के सिनेमाघरों में प्रदर्शन शुरू किया गया था और कुछ पुरानी फिल्मों, ‘सोहनी महिवाल’ और ‘मुगले आजम’ के व्यावसायिक प्रदर्शन की इजाजत पाकिस्तान के सैंसर बोर्ड ने दी थी. यह सिलसिला बौलीवुड हिट ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ तक बदस्तूर कायम रहा है. इस के फौरन बाद पाकिस्तान की अदालत और पाक सैंसर बोर्ड की ओर से दोबारा पाबंदियां लगा दी गईं. इस के पीछे भारतीय फिल्मों के विरोधी पाक फिल्म निर्माता मुबशिर लुकमान का हाथ बताया जाता है. मुबशिर लुकमान का तर्क है कि मुंबइया फिल्मों के प्रसारण की वजह से पाकिस्तान के फिल्म उद्योग को घाटा होता है. इस से वहां की फिल्म इंडस्ट्री आगे नहीं बढ़ पा रही है.

मुबशिर की याचिका पर नवंबर, 2013 में लाहौर हाईकोर्ट ने कार्यवाही करते हुए पूरे देश में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी. इस बारे में कहा गया था कि पाकिस्तान के सिनेमाघर मालिक अवैध दस्तावेजों के आधार पर देश में भारतीय फिल्में चला रहे हैं, लिहाजा, इस की इजाजत नहीं दी जा सकती. कुछ राजनीतिक हस्तियां भी पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन का विरोध यह कह कर करती रही हैं कि ये फिल्में वहां के सांस्कृतिक माहौल को बिगाड़ रही हैं. कुछ साल पहले पाकिस्तान के इलैक्ट्रौनिक मीडिया रैगुलेटर ने भी एक टीवी चैनल पर यह कहते हुए 1 करोड़ रुपए का जुर्माना ठोंका था कि वह चैनल भारतीय फिल्मों और सीरियल्स का हद से ज्यादा प्रसारण कर रहा था.

अदनान सामी और गुलाम अली

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारतीय फिल्में ही पाकिस्तान पहुंचती हैं, बल्कि पाकिस्तान के ऐक्टर भी बौलीवुड में आ कर अपना हुनर आजमाते और सफल होते रहे हैं. पाकिस्तानी गायक अदनान सामी से ले कर अभिनेता अली जफर तक ऐसे कई नाम हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं. पाकिस्तान के मशहूर गायक गुलाम अली को चाहने वाले भारत में भी हैं. गुलाम अली अकसर भारत आते रहते हैं पर पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों और कलाकारों के विरोध के कारण अब भारत में भी कुछ लोग उन का विरोध करने लगे हैं, जो ठीक नहीं है.

हालांकि पाकिस्तान की सरकार यह बात अच्छी तरह जानती है कि अगर बौलीवुड फिल्मों के वैध रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तो भी उन का वहां पहुंचना नहीं रुकेगा. तब इन फिल्मों की पाइरेटेड सीडीडीवीडी वहां चोरीछिपे पहुंचने लगती हैं और घरों, सिनेमाहौलों तक में दिखाई जाने लगती हैं. भारतपाकिस्तान की जनता के लिए एकदूसरे के टीवी प्रोग्रामों और फिल्मों को समझना मुश्किल नहीं है. नए मनोरंजन की तलाश में दोनों ओर का आम नागरिक एकदूसरे के टीवी कार्यक्रमों और फिल्मों का शौकीन रहा है. जिस दौर में भारत में ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ जैसे टीवी सीरियल चर्चित थे, उसी दौर में ये प्रोग्राम पाकिस्तान की महिलाओं के भी पसंदीदा थे. इसी तरह कुछ पाकिस्तानी हास्य टीवी सीरियल्स भी भारत में काफी चर्चित रहे हैं.

व्यावसायिक फायदे

अरबों रुपए का कारोबार करने वाली भारतीय फिल्मों को अपने पड़ोसी मुल्क में जब एक और दर्शक वर्ग मिल जाता है, तो इस का व्यावसायिक फायदा तो होता ही है. यही नहीं, तकनीक और शिल्प के मामले में हौलीवुड को टक्कर देती भारतीय फिल्मों से पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री भी काफी कुछ सीख और समझ रही है, लेकिन इस का सब से ज्यादा असर पाकिस्तान के सिनेमाघरों की कमाई पर पड़ता है. वहां के ज्यादातर सिनेमाघर मालिक मानते हैं कि उन की कमाई का अहम जरिया उन में दिखाई जाने वाली भारतीय फिल्में हैं जो भारी भीड़ खींचती हैं. यदि ये फिल्में न हों, तो उन के सामने फाका करने की नौबत आ जाए. अब तो पाकिस्तान में भी सिनेप्लैक्स बनने लगे हैं. उन में टिकट दरें भी ज्यादा होती हैं. ऐसे में यह और भी जरूरी हो गया है कि वहां हाउसफुल चलने वाली फिल्में दिखाई जाएं.

वार छोड़ न यार

जहां तक भारतीय फिल्मों पर अपसंस्कृति फैलाने और पाक विरोधी होने का सवाल है, तो इस बारे में कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्मकार अब काफी परिपक्वता से पेश आते हैं. अपनी फिल्मों के ग्लोबल प्रसार के मद्देनजर वे यह सावधानी बरतने लगे हैं कि उन की फिल्मों की कहानी सीधे तौर पर किसी एक देश या धर्म के खिलाफ न हो. एक दौर था, जब पाकिस्तानी शासकों ने कुछ भारतीय फिल्मों, जैसे ‘गदर : एक प्रेमकथा’ और ‘सरफरोश’ आदि पर पाकिस्तान विरोधी होने का आरोप लगाया था, पर अब तो खुद भारतीय फिल्मकार, ‘वार छोड़ न यार’ जैसी कौमेडी फिल्में बना कर भारतपाक दोस्ती का ही पैगाम देने लगे हैं. इस के उलट पाकिस्तान में 2 साल पहले (2013 में) रिलीज फिल्म, ‘वार’ में भारत विरोधी माहौल दिखाया गया था. इस फिल्म में दिखाया गया कि किस तरह एक भारतीय महिला जासूस पाकिस्तान में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करती है.

अब एकदूसरे को कठघरे में खड़े करने की दलीलें घिसीपिटी मानी जाने लगी हैं. एकदूसरे से नफरत की जमीन पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली बिरादरी को छोड़ कर दोनों ओर ऐसे लोग अब कम ही बचे हैं, जो सिनेमा, कला, साहित्य में भारत या पाकिस्तान को नीचा दिखाने के बजाय अपनी अंदरूनी समस्याओं को नोटिस करने की बात कहते हैं.                    

हैवानियत: हिंसा ही धर्म है

पाकिस्तान के पेशावर में 20 जनवरी, 2016 को कुछ सिरफिरों ने धर्म के नाम पर हिंसा का ऐसा तांडव किया कि पाकिस्तान समेत समूची दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई. पाकिस्तान में यह आतंकवाद का घिनौना रूप था, जिस में कुल 21 लोग मारे गए, जबकि 50 से ज्यादा घायल हो गए थे. इस बार दहशतगर्दों के निशाने पर बाशा खान यूनिवर्सिटी थी. यह यूनिवर्सिटी पेशावर के दक्षिणपश्चिम में तकरीबन 50 किलोमीटर दूर चारसद्दा जिले में है. ‘सीमांत गांधी’ अब्दुल गफ्फार खान उर्फ बाशा खान की याद में इस यूनिवर्सिटी का नाम रखा गया.

बुधवार, 20 जनवरी, 2016 को बाशा खान यूनिवर्सिटी में ‘सीमांत गांधी’ अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि के मौके पर एक मुशायरा कराया गया था. यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति डाक्टर फजल रहीम ने बताया कि उस समय वहां 3 हजार से ज्यादा छात्र और 6 सौ मेहमान मौजूद थे.

सुबह के 9 बज कर 35 मिनट पर यूनिवर्सिटी पर आतंकी हमले की खबर आई थी. आतंकवादियों की एक टोली मेन गेट से गार्डों को गोली मार कर अंदर घुसी थी, जबकि दूसरी टोली कोहरे का फायदा उठा कर दीवार फांद कर भीतर आई थी.

इस के बाद आतंकवादियों ने छात्रों व शिक्षकों पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं. पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के नेता और प्रांतीय सांसद शौकत यूसुफजई ने बताया कि इस हमले को तकरीबन 10 हमलावरों ने अंजाम दिया था. 4 आतंकवादियों को तो सिक्योरिटी बलों ने मार गिराया था.

इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन तहरीक ए तालिबान (पाकिस्तान) ने ली. उस के एक प्रवक्ता उमर मंसूर ने बताया कि यह हमला पेशावर स्कूल हमले के दौरान सिक्योरिटी फोर्स द्वारा मारे गए आतंकवादियों का बदला लेने के लिए किया गया था.

लेकिन तहरीक ए तालिबान (पाकिस्तान) के मुख्य प्रवक्ता मोहम्मद खुरासानी ने इस हमले की निंदा करते हुए इस में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

याद रहे कि मोहम्मद खुरासानी को साल 2014 में पेशावर के एक सैनिक स्कूल में हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है. तब उन्होंने कहा था, ‘‘हम ने स्कूल को इसलिए निशाना बनाया, क्योंकि सेना (पाकिस्तानी) हमारे परिवारों को निशाना बनाती है. हम चाहते हैं कि वह भी हमारा दर्द महसूस करे.’’

दरअसल, कराची इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले और सरकार व तालिबान के बीच शांति को ले कर होने वाली बातचीत टूटने के बाद पाकिस्तान सेना ने वजीरिस्तान इलाके में ‘जर्ब ए अज्म’ नाम से एक मुहिम छेड़ी हुई है. इस मुहिम के तहत सेना ने उत्तरी वजीरिस्तान और इस से सटे कबायली इलाकों में अब तक 13 सौ से ज्यादा तालिबानियों को मार गिराया है, लेकिन तालिबानियों की दलील यह है कि सेना तालिबानियों के बहाने उन के परिवारों, बच्चों को भी मारती?है.

इस मुहिम से तालिबान के आतंकी किसी भी तरह पाकिस्तान में खौफ पैदा कर के जाहिर करना चाहते हैं कि कोई भी उन्हें कमजोर न समझे.

निहत्थे मासूमों पर गोलियां बरसाना ताकतवर होने की निशानी नहीं है? स्कूलों, यूनिवर्सिटियों, मदरसों और मसजिदों पर आतंकी हमला कर के धर्म के ये तथाकथित ठेकेदार आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? जो लोग अपनेअपने मतलब के लिए खुद गुटों में बंट चुके हैं, वे इसलाम के नाम पर मुसलिमों को कैसे एकजुट कर पाएंगे?

अब लगता है कि हर दिन नए तालिबानी पैदा हो रहे हैं. एक से बढ़ कर एक दरिंदे. बंदूक के दम पर वे अपने बनाए कानून जनता पर थोप रहे हैं और दुनिया की नजरों में चढ़ने के लिए वे ऐसी खौफनाक वारदातों को अंजाम देते हैं. उन की सब से बड़ी शिकार औरतें और बच्चियां बनती हैं.

पाकिस्तान को जो यह ताजा जख्म मिला है, वह एक सबक है कि आतंकवादी किसी के सगे नहीं होते. दुनियाभर में आज जो आतंकवाद के जहरीले पेड़ दिखाई दे रहे हैं, उन में खादपानी देने का काम पाकिस्तान ने भी खूब किया है. नतीजतन, अब जब यह जंगल पाकिस्तान में भी जड़ें जमा चुका है, तो वहां के रहनुमाओं को लगता है कि धीरेधीरे बाजी उन के हाथ से निकल रही है.

दरअसल, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां के कट्टरपंथियों के बीच जबरदस्त तालमेल बना हुआ है. सरकार तो वहां नाम की है, सारे फैसले यही जमात लेती है और लागू भी कराती है. वरना ऐसी क्या वजह है कि वहां जनता के द्वारा चुनी गई सरकार को पूरे वक्त तक चलने नहीं दिया जाता है?

आईएसआई के इतना मजबूत होने की वजह यह है कि उसे सरकार से अरबों रुपया मिलता है और साथ ही, वह नशीली दवाओं की तस्करी व आतंकवाद के जरीए बहुत पैसा कमाती है. इस पैसे को वह कट्टरपंथियों में बांटती है, ताकि उस की हुकूमत बरकरार रहे. जो उस के खिलाफ होता है, वह उसे रास्ते से हटा देती है. इस खौफ के दम पर आईएसआई और चंद कट्टरपंथी संगठन पाकिस्तान पर कब्जा जमाए हुए हैं.

पर इस का बुरा असर पाकिस्तान की जनता पर पड़ा है. अल्पसंख्यकों की तो बात छोडि़ए, आम मुसलिम भी डरद के साए में जीते हैं. वहां की कानून व्यवस्था चरमरा चुकी है. यही वजह है कि वहां के आतंकवादी सरकार और कुछ हद तक फौज के कंट्रोल से बाहर जा चुके हैं.

हालांकि अभी भी देर नहीं हुई है. पाकिस्तान के पास संभलने और अपनी नई पीढ़ी को बचाने का समय है. वैसे, आतंकवादियों के खिलाफ की जा रही कार्यवाहियों से तो लगता है कि वहां के आम लोग अब आतंकवाद से तंग आ चुके हैं और इस दलदल से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं.

याद रखें, जो लोग धर्म की दुहाई दे कर मासूमों पर कहर बरपाते हैं, वे ही इनसानियत के सब से बड़े दुश्मन होते हैं. पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के तमाम आतंकियों, चाहे वे किसी भी धर्म की नुमाइंदगी करते हों, की एक ही सूरत और एक ही मकसद दिखता है, खूनखराबा कर के लोगों में दहशत पैदा करना.

ऐसे समय में शरीर से कमजोर महात्मा गांधी के ताकतवर हथियार अहिंसा याद आती है. हिंसा के बारे में उन्होंने कहा था, ‘मरने के लिए मेरे पास बहुत से कारण हैं, लेकिन मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है.’

ऐसा पहली बार नहीं हुआ

पिछले 7 सालों की बात करें, तो पाकिस्तान में आतंकवादियों द्वारा तालीम देने वाली संस्थाओं पर हमले करने की घटनाएं बढ़ी हैं.

दिसंबर, 2014 को पेशाव के एक सैनिक स्कूल में आतंकवादियों ने हमला कर के 134 बच्चों समेत 150 लोगों को मार डाला था.

नवंबर, 2014 में अपर खुर्रम कबायली जिले के निस्ती कोट इलाके में एक स्कूल में बम से हमला किया गया था, जिस में 2 लोगों की मौत हो गई थी.

जनवरी, 2014 में पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के एक सरकारी स्कूल के बाहर एक फिदायीन ने खुद को बम से उड़ाया. एक किशोर समेत 2 लोगों की मौत.

सितंबर, 2013 में पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के बानू कसबे में एक गर्ल्स स्कूल के बाहर बम धमाका किया गया, जिस में 14 लोग घायल हुए थे.

जून, 2013 में इसी इलाके के एक शिया मदरसे में आतंकियों ने हमला किया. 14 लोग मारे गए और 28 घायल.

अक्तूबर, 2012 में स्वात घाटी में जब मलाला यूसुफजई अपनी स्कूल बस पकड़ रही थीं, तब तालिबानी आतंकियों ने उन के सिर में गोली मारी थी.

सितंबर, 2011 में पेशावर के पास आतंकवादियों ने एक स्कूल बस को निशाना बनाया था, जिस में एक टीचर समेत 3 बच्चों की मौत हो गई थी.

अप्रैल, 2009 में स्वात घाटी के पश्चिमी इलाके में बने एक गर्ल्स स्कूल में फुटबाल के अंदर छिपे बम से धमाका किया गया, जिस में 12 बच्चियों की मौत हो गई थी.

फिर से नहीं

तीसरी किस्त

अब तक आप ने पढ़ा:

वादे के अनुसार प्लाक्षा ने विवान के घर जा कर उस के मातापिता को 6 महीने बाद शादी के लिए राजी कर लिया. विवान बहुत खुश था. उधर प्लाक्षा के मातापिता भी उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगे थे. शादी से कुछ समय बचने के लिए प्लाक्षा ने अब विवान से वही सब नाटक करने को कहा, जो विवान ने कुछ दिनों पहले प्लाक्षा से कराया था.

– अब आगे पढ़ें:

विवान बुरी तरह घबरा रहा था. मैं ने माहौल को हलका करने की कोशिश की, ‘‘पापा, बैड मैनर्स. लड़कियों से उन की उम्र और लड़कों से उन की सैलरी नहीं पूछते,’’ सभी हंसने लगे. विवान के चेहरे पर भी हलकी सी मुसकान आ गई.

मम्मी ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘बेटा, पैसेवैसे की तो कोई बात नहीं है. प्लाक्षा भी ठीकठाक कमा लेती है और तुम भी अच्छीखासी जौब कर रहे हो. यह बताओ कि प्लाक्षा के साथ ऐडजस्ट तो कर पाओगे न?’’

‘‘जी आंटी…’’ विवान ने हकलाते हुए कहा.

‘‘देखो बेटा, तुम तो इसे इतने सालों से जानते हो. यह भी जानते होगे कि यह कितनी स्पष्टवादी है, जो इसे अच्छा लगता है वह भी और जो नहीं लगता वह भी, बताने में देर नहीं करती. इस के इसी स्वभाव के कारण कम ही लोग इस के साथ ऐडजस्ट कर पाते हैं,’’ मम्मा ने कहा.

‘‘आंटी, मैं प्लाक्षा को कई सालों से जानता हूं. सब से बड़ी बात जो मैं इस के बारे में कह सकता हूं वह यह है कि मुझे इस के जैसा कोई आज तक नहीं मिला. चाहे जितनी मुंहफट हो पर दिल की साफ है. मैं यह तो नहीं कह सकता कि हम कभी झगड़ेंगे नहीं, क्योंकि इनसान सिर्फ मीठा खा कर तो जिंदा रह नहीं सकता. मैं इतना वादा जरूर कर सकता हूं कि इसे पूरी तरह समझने की कोशिश करूंगा.’’

यह विवान कह रहा था? वह इतनी परिपक्व बातें भी कर सकता है? वह मेरे बारे में सकारात्मक बातें बोल रहा था. क्या वह अब भी मुझ से…? नहींनहीं, वह सिर्फ ऐक्टिंग कर रहा होगा.

‘‘तो कैसा रहा?’’ घर से बाहर आते हुए विवान ने पूछा. मम्मीपापा उस से बहुत खुश नजर आ रहे थे.

‘‘तुम तो बहुत बड़े ऐक्टर निकले. क्या बड़ेबड़े डायलौग मार रहे थे. मम्मीपापा तो बहुत इंप्रैस हो गए तुम से. कहीं सच में हमारी शादी न  करा दें,’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘और अगर मैं कहूं कि वह ऐक्टिंग नहीं थी. वे डायलौग नहीं बल्कि मेरे दिल के जज्बात थे, तो?’’ वह मेरी आंखों में झांकते हुए बोला. पहले कभी वह मेरी आंखों में आंखें डाल कर बात नहीं करता था. उसे शर्म आती थी. आजकल न जाने उसे क्या हो गया था. उस की ये नजरें मेरे अंदर तूफान पैदा कर देती थीं. लगता था जैसे कहीं दबी भावनाएं फिर से सिर उठाने लगी हों. मैं बिलकुल ठहर सी जाती थी.

‘‘मजाक कर रहा हूं. ऐक्टर तो मैं बचपन से ही हूं. बस कोई आज तक मेरा टेलैंट समझ ही नहीं पाया. एक तुम ही हो मेरी सच्ची पारखी,’’ वह शरारती अंदाज में बोला.

उस की धूल उड़ाती कार को देखते हुए मेरे मन में फिर से वही उथलपुथल शुरू हो गई. क्या हम दोनों सिर्फ अपनेअपने स्वार्थ के लिए एकदूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर अब भी हमारे बीच कुछ है? उस का तो मुझे नहीं पता, लेकिन मेरे मन में अब भी उसे देख कर कुछकुछ होने लगता था. जब भी वह पास आता था तो खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता था. मैं अब भी उस से…? नहींनहीं, फिर से नहीं.

आंखों से ढलके आंसू पोंछते हुए मैं वापस अंदर आ गई.

विवान वापस दिल्ली चला गया था. मैं अभी 2 दिन और जयपुर में ही थी. सोचा इसी बहाने कुछ पुराने दोस्तों से भी मिलना हो जाएगा. आदित्य मेरा कालेज के दिनों से दोस्त था. विवान के साथ रिश्ते की शुरुआत करने पर जिन दोस्तों का साथ छूटा था, आदित्य भी उन में से एक था. एक डेढ़ साल पहले हम ने फिर से बात करना शुरू किया था. दोस्ती में कुछ वक्त का अंतराल जरूर आया था, लेकिन दूरी नहीं. हम अब भी अच्छे दोस्त थे.

शाम के वक्त हम दोनों एक मौल में बैठे थे. वह बता रहा था कि उस की शादी पक्की हो गई.

‘‘अच्छा कब चढ़ रहा है सूली पर?’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए पूछा था.

वह शरमा गया था, ‘‘अरे, अभी तो सगाई भी नहीं हुई. सिर्फ रिश्ता पक्का हुआ है.’’

‘‘अच्छा जी. तो कब है सगाई?’’

‘‘अगले महीने और तुझे आना है,’’ वह हक से बोला.

‘‘तू नहीं बुलाएगा तब भी आऊंगी. आ कर यह हंगामा भी तो करना है कि मेरे आदित्य को छीन लिया मुझ से…’’ मैं ने उस की टांग खींचते हुए कहा. वह हंसने लगा.

‘‘अच्छा नाम तो बता दे हमारी होने वाली भाभी का,’’ मैं आज उसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली थी. वैसे भी उस की टांग खींचने

में बड़ा मजा आता था. वह भी हंस कर साथ देता रहता.

‘‘अरे नाम क्या, तू फोटो देख उस का. तू कहे तो बात भी करा दूं,’’ उस ने फोन निकालते हुए कहा.

‘‘अब तू बस नाम बता और फोटो दिखा. अभीअभी शादी पक्की हुई है तेरी, क्यों तुड़वाने पर तुला है?’’

उस ने हंस कर मोबाइल स्क्रीन मेरे सामने कर दी, ‘‘ये देख, नाम साक्षी है. अपनी ही तरह इंजीनियर है. दिल्ली में जौब करती है.’’

फोटो देखते ही मेरा मुंह लटक गया. यह वही साक्षी थी जिस का फोटो मुझे विवान ने दिखाया था. यह तो विवान की गर्लफ्रैंड थी फिर आदित्य से कैसे…?

‘‘तुम…तुम इस से मिले हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कल ही मिला. वैसे बात तो काफी पहले से चल रही थी, लेकिन कल ही यह जयपुर आई थी,’’ उस ने जवाब दिया.

क्या मुझे इसे कुछ बताना चाहिए? नहीं, पहले मुझे विवान से बात करनी होगी. क्या ऐसा कुछ था जो वह मुझ से छिपा रहा था? मैं सोच रही थी.

‘‘क्या हुआ प्लाक्षा, कुछ परेशानी है?’’ आदित्य ने मेरा हाथ थपथपाते हुए पूछा.

‘‘नहीं, कुछ नहीं बहुत देर हो गई. घर चलना चाहिए,’’ मैं ने उठते हुए कहा.

कार में बैठते ही सब से पहले मैं ने विवान को फोन लगाया. फोन उठाते ही वह बोला, ‘‘हां प्लाक्षा, क्या हुआ बोलो?’’

‘‘विवान मुझे तुम से कुछ जरूरी बात करनी है,’’ मैं ने अपनी आवाज संयमित रखते हुए कहा.

‘‘हां बोलो न.’’

‘‘अभी फोन पर नहीं. कल सुबह मैं दिल्ली आ रही हूं. तब तुम मुझ से मिलो.’’

‘‘सुबहसुबह तो कहीं आना मुश्किल है, क्योंकि औफिस जाना है. तुम एक काम करना, लंच टाइम में औफिस ही आ जाना. तब बात कर लेंगे,’’ उस ने कहा.

‘‘ठीक है,’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया.

फिर पता ही नहीं चला कि वहां से घर तक का रास्ता कैसे तय किया. कब मैं मम्मापापा और भाई के साथ बैठ कर टीवी देख रही थी और कब हम ने डिनर किया. वे थोड़े नाराज थे कि मैं एक दिन पहले ही वापस जा रही थी, लेकिन मैं ने औफिस का जरूरी काम है कह कर उन्हें मना लिया. सुबह जल्दी उठाना था इसलिए बिस्तर पर भी जल्दी आ गई, लेकिन आंखों से नींद गायब थी. रात भर बस करवटें बदलती रही.

लंच होने में अभी 10 मिनट बाकी थे. मैं वेटिंग रूम में बैठ कर औफिस की सजावट देख कर टाइम पास कर रही थी. रिसैप्शन के पीछे एक बहुत ही खूबसूरत पेंटिंग लगी हुई थी. हमारा औफिस तो इस की तुलना में कुछ भी नहीं था. कुछ ही देर में हलचल शुरू हो गई. कुछ लोग कैंटीन की तरफ जा रहे थे, तो कुछ बाहर निकल रहे थे. मेरी नजर उन में विवान को ढूंढ़ रही थी. तभी मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी. मुझे लगा मैं ने उसे कहीं देखा है. कहीं यह साक्षी तो नहीं? यह भी मेरे दिमाग में आया. मैं उठ कर उस की तरफ गई.

‘‘ऐक्सक्यूज मी,’’ मैं ने उस का कंधा थपथपाते हुए कहा.

‘‘यस,’’ वह साक्षी ही थी.

‘‘आर यू साक्षी?’’

‘‘यस. आप?’’ वह हैरानी से मुझे देखने लगी.

‘‘आप विवान को जानती हो?’’ उसे सीधे अपना परिचय देना मैं ने ठीक नहीं समझा.

‘‘विवान… यस. ही इज माई फ्रैंड. आप मुझे कैसे जानती हो?’’

‘‘मैं प्लाक्षा…विवान की फ्रैंड. उसी ने मुझे आप के बारे में बताया था.’’ हम दोनों ने हाथ मिलाया.

अब उस के चेहरे पर मुसकान थी, ‘‘ओह प्लाक्षा. विवान बहुत बात करता है तुम्हारे बारे में.’’

विवान मेरे बारे में बात करता है सच में?

‘‘प्लाक्षा….साक्षी…ओह…हाय प्लाक्षा, ये साक्षी है. तुम्हें बताया था न,’’ विवान आ गया था.

‘‘हां, हम मिल चुके हैं,’’ साक्षी ने कहा.

उन दोनों के बीच पल भर को आंखोंआंखों में कुछ बात हुई. फिर विवान ने मुझ से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘कैंटीन में चलें? वहीं बैठ कर बात करते हैं,’’ साक्षी से बाय कह कर हम दोनों कैंटीन की तरफ चल पड़े.

‘‘क्या लोगी?’’ विवान ने बैठते हुए पूछा. मैं ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया.

‘‘अरे कुछ तो खा लो. मुझे पता है तुम ने सुबह से कुछ नहीं खाया. स्टेशन से सीधी यहीं आई हो,’’ उस ने डांटते हुए कहा.

‘‘प्लीज विवान…तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं कि साक्षी वापस आ गई है? तुम तो ऐसे शो कर रहे हो जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो,’’ मेरी आवाज सुन कर कुछ लोग हमारी तरफ देखने लगे.

‘‘प्लाक्षा प्लीज धीरे बोलो. सब हमारी तरफ देख रहे हैं,’’ उस ने इधरउधर देखते हुए कहा,  ‘‘पहले तुम कुछ खा लो फिर तुम जो जानना चाहती हो मैं तुम्हें बताऊंगा, ठीक है?’’ मैं ने कोई जवाब नहीं दिया.

मैं सच में बहुत भूखी और थकी हुई थी, इसी कारण चिड़चिड़ी भी हो रही थी और फिर अचानक साक्षी को देख लिया तो दिमाग बिलकुल खराब हो गया. उसी के बारे में तो बात करने मैं यहां आई थी. मैं ने खाना खाते वक्त विवान से यह कह भी दिया.

‘‘क्या बात करने आई थीं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘पहले तुम मुझे बताओ कि वह यहां क्या कर रही है? वह तो 4 महीने बाद आने वाली थी न. इतनी जल्दी कैसे आ गई?’’ मैं ने पूछा.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ मैं इस बात पर अभी चिढ़ी हुई थी. कभीकभी मैं भूल जाती थी कि अब मेरा विवान पर वह हक नहीं था.

वह सहम गया, ‘‘तुम जयपुर में थीं प्लाक्षा. मैं ने सोचा कि जब वापस आओगी तब बता दूंगा.’’

‘‘उसे पता था तुम जयपुर में मेरे साथ थे?’’ मैं ने पूछा, ‘‘1 मिनट रुको, वह भी जयपुर तुम्हारे साथ ही आई थी न?’’

‘‘हां, पर तुम्हें कैसे पता?’’ विवान मेरी बात सुन कर असमंजस में पड़ गया.

‘‘तुम ने फिर भी मुझे नहीं बताया. विवान तुम ऐसा कैसे…?’’ मेरा दिमाग अब गुस्से से फट रहा था.

‘‘प्लाक्षा, उस वक्त तुम्हारी प्रौब्लम ज्यादा जरूरी थी. तुम वैसे ही इतनी परेशान थीं. तुम्हें कुछ भी बताना ठीक नहीं लगा.’’

उस की बात सुन कर भी मेरा पारा नहीं उतरा, ‘‘ओह हां, तुम्हारी गर्लफ्रैंड का किसी और के साथ रिश्ता हो रहा है और तुम किसी और की बड़ी प्रौब्लम को सौल्व करने में लगे थे. एक बात बताओ विवान, क्या मैं तुम्हें बेवकूफ लगती हूं या फिर तुम कुछ ज्यादा ही सीधे हो?’’ हर एक बात के साथ मेरा स्वर ऊंचा होता जा रहा था.

विवान मेरी बात से भौचक्का रह गया. अब उस का दिमाग भी गरम होने लगा था, ‘‘इतनी बड़ी क्या बात हो गई यार? तुम मेरी बीवी नहीं हो जो मैं तुम्हें हर बात बताऊं और अब तो मेरी गर्लफ्रैंड भी नहीं हो. मेरी पर्सनल लाइफ में कुछ भी हो, उस से तुम्हें क्या मतलब?’’

‘‘राइट, मैं तो बस तुम्हारी भाड़े की गर्लफ्रैंड हूं. एक नौकर, जिसे तुम शायद पैसे या समयसमय पर बोनस दे कर खुश करना चाहते थे,’’ मेरा गुस्सा अब हद से बाहर हो चुका था.

‘‘प्लाक्षा, आई एम सौरी. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. आई एम सो सौरी,’’ उस का स्वर फिर से मीठा हो गया था. वैसे भी जब मेरा गुस्सा चरम पर होता था तो वह कुछ बोल नहीं पाता था, निरुत्तर सा हो जाता था.

‘‘नहीं विवान, तुम्हें यही कहना चाहिए था. अगर तुम ये नहीं कहते तो मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों मुझे तुम से कभी प्यार नहीं करना चाहिए था. मुझे तुम्हारी फिक्र ही नहीं करनी चाहिए. मैं ही पागल थी जो आदित्य और साक्षी की शादी की खबर सुन कर यहां भागीभागी चली आई. मुझे लगा कि तुम्हें पता नहीं होगा. मुझे लगा कि तुम इतने सीधे हो, शायद तुम्हें पता न हो कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है,’’ मेरा गुस्सा अब आंसुओं में बदल गया था.

‘‘मैं ही पागल थी, जो तुम्हारी मदद करने को तैयार हो गई. यह भूल गई थी कि मेरी कितनी इज्जत है तुम्हारे मन में. सोचा शायद बदल गए हो, लेकिन तुम अब भी वैसे ही हो. हमेशा खुद को सब से ऊपर रखने वाले, अपनी गलती न मानने वाले, हमेशा दूसरों को हर बात के लिए दोषी ठहराने वाले.’’

‘‘प्लाक्षा प्लीज, सुनो तो,’’ उस ने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं ने उसे झटक दिया.

‘‘नहीं, अब और नहीं. वैसे भी अब तुम्हारी गर्लफ्रैंड वापस आ चुकी है तो तुम्हें मेरी जरूरत तो होगी नहीं. इतने दिनों में तुम ने मेरे लिए इतना कुछ किया, उस के लिए शुक्रिया और तुम्हारे भविष्य के लिए ‘औल द बैस्ट’. बस एक आखिरी एहसान कर देना मुझ पर कि अब मेरी जिंदगी में कभी वापस मत आना. वैसे तो मैं यह तुम्हारी मदद करने के बदले में मांगना चाहती थी, लेकिन वह हिसाब तो बराबर हो गया, इसलिए एहसान मांग रही हूं, गुडबाय,’’ इतना कह कर मैं कैंटीन से बाहर आ गई. विवान मुझे पीछे से पुकार रहा था.

अब रोने से क्या फायदा? जब पहले से ही पता था कि वह हमेशा दुख देता आया है, तो इस बार कुछ अलग कैसे करता? मैं सोचती रही. लेकिन उस दिन के बाद काफी दिनों तक मेरे मूड में कोई सुधार नहीं हुआ. औफिस में तो सामान्य रहती, लेकिन घर आते ही अकेलापन जैसे काटने को दौड़ता. यही एक ऐसी चीज थी जिस से मैं सब से ज्यादा डरती थी और यही वह चीज है जिस का मैं ने आज तक सब से ज्यादा सामना किया था. रोना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन पिछले 2 सालों में ऐसा लगता था जैसे आंसू सूख गए हों. किसी भी चीज से खास फर्क नहीं पड़ता था. हालांकि इन 2 सालों में मैं ने सब से ज्यादा धोखे खाए थे, लेकिन हमेशा यह सोच कर आगे बढ़ती रही कि इन सब से मैं और ज्यादा मजबूत हो रही हूं.

आज फिर से विवान ने पुराने जख्मों को कुरेद दिया था. मैं भी बहुत बहादुर बन कर उस की बातें मानती चली गई. यह भूल गई कि मैं कभी भी भावनात्मक रूप से मजबूत हो ही नहीं सकती थी और विवान के मामले में तो यह लगभग असंभव था. खुद को भुला कर प्यार किया था उस से. इतना आसान नहीं होता एक दर्द को बारबार जीना.

उस दिन विवान के औफिस से इस तरह आने के बाद उस ने कई बार मुझ से बात करने की कोशिश की, लेकिन मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. 1-2 बार वह मेरे औफिस भी आया, लेकिन मैं ने व्यस्त होने का बहाना बना कर मिलने से मना कर दिया. अब वह मुझ से क्यों मिलना चाहता था, उस का काम तो हो गया था? उस की गर्लफ्रैंड वापस आ चुकी थी. अब उसे मेरी कोई जरूरत नहीं थी.

मुझे नहीं पता मैं किस बात से ज्यादा नाराज थी. उस के मुझे साक्षी के आने के बारे में न बताने की वजह से या फिर साक्षी के सचमुच आ जाने से. पिछले कुछ दिनों में मुझे लगने लगा था कि हम अपने पुराने दिनों में वापस लौट गए हैं, जहां अब मेरी जगह विवान ने ले ली है. अब वह स्पैशल चीजें करता था, अब वह मुझे निहारता था, और अब वह रोमांटिक बातें करता था. पर शायद वह सब मेरा वहम था. वह जो कुछ भी कर रहा था अपने स्वार्थ के लिए कर रहा था. वह जानता था कि मैं एक ‘इमोशनल फूल’ हूं और मुझ से प्यार भरी बातें कर के कोई भी अपना काम निकलवा सकता है. इसी बात का उस ने फायदा उठाया. दुनिया के सामने चाहे मैं कितनी भी मजबूत बन लूं, थी असल में एक ‘इमोशनल फूल’ ही.

अभी मेरे सामने एक और परेशानी थी. मम्मीपापा का भी सामना करना था. उस ने झूठ तो बोल दिया था पर उस झूठ को चलाने के लिए विवान नहीं था. मैं जानती थी कि यह झूठ ज्यादा वक्त तक नहीं चलने वाला था. कभी न कभी तो इसे खत्म होना ही था. मां का जब भी फोन आता, वे विवान के बारे में जरूर पूछतीं.

‘‘हमारा ब्रेकअप हो गया है मां,’’ एक दिन हिम्मत कर के मैं ने कह ही दिया.

‘‘क्या? मजाक मत कर बेटा. यहां हम तेरी शादी की प्लानिंग कर रहे हैं और तू ऐसी बातें कर रही है. क्या हुआ बेटा? किसी बात पर झगड़ा हुआ क्या?’’ मां ने प्यार से पूछा.

‘‘नहीं मां कुछ नहीं हुआ. बस हमारा ब्रेकअप हो गया. आप अब शादी की प्लानिंग करना छोड़ दो. मुझे कोई शादीवादी नहीं करनी,’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘ऐसे कैसे नहीं करनी. मैं तेरे पापा से क्या कहूंगी? मजाक बना रखा है तू ने तो. कभी नहीं करनी, कभी करनी है, अब फिर से नहीं करनी. हम लोगों को क्यों बिना मतलब उलझा रखा है?’’ मां गुस्से में थीं जो एक गंभीर बात थी. वे अकसर शांत रहती थीं. उन्हें गुस्सा छू भी नहीं पाता था. मुझे अब खुद पर गुस्सा आ रहा था और रोना भी.

‘‘मां, मैं क्या जबरदस्ती किसी से शादी करूं?’’ अब ब्रेकअप हो गया तो कैसे करूं उस से शादी? ’’ मैं ने बेबस हो कर कहा.

मेरी आवाज सुन कर मां के स्वर में भी थोड़ी नरमी आ गई, ‘‘अच्छा तू परेशान मत हो. तेरे पापा को मैं समझा लूंगी, लेकिन तुझे मेरी एक बात माननी होगी.’’

मैं कुछ भी मानने को तैयार थी, ‘‘आप जो कहोगी मैं उसे मानने को तैयार हूं. बस शादी करने को मत कहना.’’

‘‘नहीं तुझे बस उस लड़के से मिलना होगा जो हम ने तेरे लिए पसंद किया था.’’

‘‘मां, लेकिन…’’

‘‘मैं शादी कराने को नहीं कह रही सिर्फ मिलने को कह रही हूं. हम अगले हफ्ते दिल्ली आ रहे हैं. तभी उस से मिलना होगा,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया.

मेरे मन में यह बात चल रही थी कि सब मेरी दिमागी शांति के पीछे क्यों पड़े हैं? मुझे नहीं मिलना किसी से. मुझे पता है वह पसंद नहीं आएगा. कभी भी कोई पसंद नहीं आएगा.

– क्रमश:

 

महिलाओं को फाइटर पायलट की सौगात

18 जून, 2016  को महिला फाइटर पायलटों का पहला जत्था भारतीय वायु सेना में शामिल कर लिया जाएगा. एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने इस सिलसिले में जानकारी देते हुए कहा कि इस महिला बैच में 3 ट्रेनी शामिल हैं. इन्हें वायु सेना में कॉम्बैट रोल के लिए शामिल किया गया है. ये सभी अपनी ट्रेनिग के दूसरे दौर में हैं. ख़ुशी कि बात तो यह है कि इन तीनों महिला पायलटों ने खुद लड़ाकू भूमिका में शामिल किए जाने की इच्छा जताई है.

वायु सेना ने साल 1991 में पहली बार किसी महिला को बतौर पायलट भरती किया था. लेकिन यह नियुक्ति सिर्फ हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमानों के लिए थी. यह खबर यक़ीनन महिला उत्थान के महत्व को दर्शाती है. पिछले कुछ सालों से इस के लिए बड़ी तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं और महिला सशक्तिकरण के कार्यों में तेजी भी आई है.

बलात्कारी की हत्या: सलाखों के पीछे गुजर गए बारह साल

अपनी इज्जत बचाने के लिए एक महिला ने बलात्कार करने की कोशिश करने वालों को हंसिया से काट दिया था. निचली अदालत ने उस 53 वर्षीय महिला को हत्या के जुर्म में 14 साल की सजा सुनायी थी. तबसे 12 सालों तक जेल की सलाखों के पीछे गुजारने के बाद अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उसे सजा से बरी किया.

पूर्व मेदिनीपुर रामनगर की गिरिबाला मंडल (बदला हुआ नाम) का पति दिमागी तौर पर अपाहिज है. इसी का फायदा उठा कर गांव का एक व्यक्ति बलात्कार के इरादे से एक दिन उसके घर घुस आया. गिरिबाला ने निहत्थे अपने आपको बचाने की बहुत कोशिश की. पर जब वह सफल नहीं हुई तो उसने हसिया उठा कर बलात्कारी को काट डाला. निचली अदालत ने हत्या को कहीं अधिक महत्व देते हुए उसे 14 साल की सजा सुना दी. तबसे वे पुरुलिया कारागार के महिला सेल में बंद रही हैं. सजा सुनाए जाने के बाद उसके बच्चों ने संबंध तोड़ लिया. तबसे अकेली इस महिला ने निचली अदालत द्वारा सुनाए गए इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की बहुत कोशिश की. लीगल एड से संपर्क किया. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

लेकिन इसके बारे में जयंत नारायण चटर्जी और देवाशीष बनर्जी नाम के दो वकीलों को पता चला तो इन दोनों वकीलों ने अपने खर्च पर कलकत्ता हाईकोर्ट में ‍निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए अपील की. कुछ महीने सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश देवाशीष करगुप्ता और न्यायाधीश मुमताज खान की खंडपीठ ने गिरिबाला की 14 साल की सजा को घटा कर दस साल कर दिया. साथ में यह भी कहा कि गिरिबाला ने अपनी इज्जत बचाने के लिए हत्या को अंजाम दिया था, इसके लिए वे दस सालों से भी अधिक समय तक जेल में रह चुकी हैं. लिहाजा अदालत ने उन्हें तुरंत बरी करने का आदेश सुनाया.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन गिरिबाला मंडल को जेल के अंधकार से तो मुक्ति मिल गयी. लेकिन इस बीच 12 साल गुजर गए. आज उनकी उम्र 65 है. इतने दिनों में गिरिबाला का परिवार बिखर गया. पति नहीं रहा. बेटे-बेटियों ने मां से संबंध तोड़ लिया. सलाखों के बाहर आने के बाद वृद्धावस्था में नए सिरे से जीवन की शुरूआत भले ही मुश्किल हो, लेकिन नामुमकिन नहीं. 

रविशंकर का ‘द आर्ट ऑफ ब्रिज’

आर्ट ऑफ लिविंग के आविष्कारक श्री श्री रविशंकर अभी तक बड़ी शांति और समझदारी से आध्यात्म का अपना कारोबार चला रहे थे, जिसे और विस्तार देने के लिए उन्होने एक अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन के आयोजन की घोषणा कर डाली. इतिहास गवाह है कि धर्म कर्म संबंधी ऐसे आयोजन नदी या समुद्र किनारे ही होते रहे हैं, सो रविशंकर ने भी यमुना नदी का किनारा चुन लिया, पर यह भूल गए कि यह त्रेता या द्वापर नहीं, बल्कि कलयुग है जिसमे लोकतन्त्र के चलते इतने बड़े, ख़र्चीले और भव्य आयोजनों के लिए कई सरकारी एजेंसियों से बाकायदा लिखित इजाजत लेनी पड़ती है.

सरकारी बाबू और अधिकारी अपनी पर आ जाएं तो नियम कायदे और क़ानूनों का हवाला देकर यह तक साबित कर सकते हैं कि जिस मकान मे राम लाल रह रहा है वह दरअसल मे उसका है ही नहीं. ऐसा ही कुछ विवाद उनके कार्यक्रम के लिए बने पुल और संभावित की जाने बाली गंदगी को लेकर हुआ तो श्री श्री का अपने ज्ञानी होने का भ्रम एक झटके मे टूट गया, लिहाजा वे 8 मार्च की शाम सफाई देते नजर आए कि गंदगी नहीं होगी और हुई तो साफ सफाई कर के देंगे.

गौरतलब है कि इस महासम्मेलन का उदघाटन पीएम नरेंद्र मोदी करने बाले हैं इसलिए भी रविशंकर बे-फिक्र थे कि जिस आयोजन मे खुद प्रधानमंत्री आने बाले हों, वहां कोई क्या खाकर अड़ंगा डालेगा. अब भला कौन रविशंकर को समझाता कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं जो बिना आंखे मूंदे ध्यानस्थ रहते हैं, मुमकिन है उनकी भी इच्छा आत्मा और परमात्मा के मिलन के इस खेल को देखने की रही हो, उन्हे अगर स-सम्मान आमंत्रित किया जाता तो नल-नील की भूमिका निभाने बाले बस्सियों की नादानी नजरंदाज कर दी जाती और पुल पर एतराज न जताया जाता और न ही मामला एनजीटी तक जाता.

विश्व शांति का ढिढोरा पीट रहे श्री श्री भीतर से तो उसी दिन अशांत हो गए थे जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कला और आध्यात्म की इस गंगा मे डुबकी लगाने से मना कर दिया था. रही सही कसर एनजीटी ने पूरी कर दी जिस पर उनके धन कुबेर शिष्यों का भी ज़ोर नहीं चल रहा. ये विवाद अगर वक्त रहते नहीं थमे तो रविशंकर का शांति नोबल पुरुस्कार की होड और दौड़ से नाक आउट दौर में ही बाहर होना तय दिख रहा है. 

माया और मुलायम के मुकाबले स्मृति ईरानी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की साख दांव पर लगी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से भाजपा को 73 संसदीय सीटों पर जीत हासिल हुई थी. 2014 से 2017 के बीच 3 सालों में गंगा यमुना के इस प्रदेश में बहुत सारा पानी बह चुका है. केन्द्र सरकार में आने के बाद भाजपा ने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिससे उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी जीत का भरोसा हो सके. ऐसे में भाजपा को उत्तर प्रदेश में किसी ऐसे कद्दावर नेता की तलाश है जो बसपा की मायावती और सपा के मुलायम सिंह यादव का मुकाबला कर सके. उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास इस कद के नेता का अभाव है. भाजपा में कल्याण सिंह को जनाधर वाला नेता माना जाता था. राजनाथ सिंह में भी वह जनाधर कभी नहीं दिखा. कल्याण सिंह राजस्थान में राज्यपाल है. उनको उत्तर प्रदेश की राजनीति में लाया नहीं जा सकता. उनकी उम्र भी ज्यादा हो चुकी है.

भाजपा उत्तर प्रदेश में दलित और पिछडे वर्ग के नेता पर दांव लगाने को तैयार नहीं है. उत्तर प्रदेश में भाजपा ऊंची जातियों को नाराज नहीं करना चाहती. ऐसे में भाजपा की सोच है कि किसी ऐसे चेहरे को उतारा जाये जो अपने ओजस्वी भाषणों से जनता के दिल में जगह बना सके और मुलायम मायावती का मुकाबला कर सके. भाजपा के पास इसको लेकर 2 चेहरों पर विचार चल रहा है. एक नाम गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ का है. योगी आदित्यनाथ भाजपा के फायरब्रांड नेता है. उनकी छवि हिन्दुत्ववादी है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में उनका असर है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह योगी आदित्यनाथ के पक्षधर हैं. केन्द्र सरकार में प्रभावी भाजपा के ही कुछ नेता योगी के विरोध में हें. ऐसे में भाजपा नेताओं को केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम सबसे मुफीद लग रहा है.

हैदाराबाद और जेएनयू मसले पर लोकसभा में जिस अंदाज में स्मृति ईरानी ने सरकार का पक्ष रखा उसने नई उम्मीद जगा दी है. स्मृति ईरानी और मायावती के बीच सवाल जबाब मसले पर मीडिया की खबरों में  मायावती को लाचार और स्मृति ईरानी को भारी पडता दिखाया गया. इससे भाजपा के वोटर में स्मृति ईरानी के पक्ष में महौल बनते देखा गया. भाजपा अब स्मृति ईरानी को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में आजमाने की तैयारी में लग गई है. भाजपा जल्द ही स्मृति ईरानी के अनुकूल प्रदेश भाजपा संगठन में फेरबदल करने की तैयारी में है. स्मृति ईरानी के पक्ष में यह बात भी है कि वह कांग्रेस के अगुवा गांधी परिवार के खिलाफ भी ओजस्वी भाषण देती हैं. जिस तरह से लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी का मुकाबला किया उसे स्मृति ईरानी की खासियत के रूप में देखा जा रहा है. महिला राजनीति के नजरियें से भी स्मृति ईरानी का नाम सबसे आगे माना जा रहा है.

सफर अनजाना

क्रिसमस पर हम लोग गोआ घूमने गए. वहां के प्रसिद्ध चर्च को देख कर निकले ही थे कि सामने जमीन पर बैठा एक बच्चा हाथ में सूखी रोटी ले कर बड़े स्वाद से खा रहा था. मन करुणा से भर उठा. कुछ दूर जा कर हम फिर मौजमस्ती में मशगूल हो गए. शाम तक घूमतेघूमते इतने थक गए थे कि अपने नियत स्थान से दोबारा निकलने की हिम्मत ही नहीं थी. इसलिए हम ने रास्ते में ही खाना पैक करवाया और अपने स्थान पर वापस आ गए.आधी रात को मेरी नातिन भूख के कारण उठ बैठी और खाना मांगने लगी. मरता क्या न करता, हम ने बचा हुआ खाना उस के सामने रख दिया. रोटी सूख चुकी थी और दाल ठंडी थी. पर ये क्या? एकएक कौर पर नखरे करने वाली वह बच्ची वही सूखी रोटी, ठंडी दालसब्जी के साथ बड़े स्वाद से खाए जा रही थी. मैं उस के मुख पर तृप्ति के भाव देख रही थी. जेहन में उस बच्चे की तसवीर फिर से घूमने लगी और मन सोचने लगा, ‘बेचारा कौन है? गरीबी या भूख, जो अमीर व गरीब सब को बेबस कर देती है.’

मन में एक विचार कौंध गया ‘स्वादिष्ठ नहीं है’, ‘इच्छा नहीं है’ या ‘अच्छा नहीं है’ कह कर कितना अच्छाखासा भोजन हम अपनी थाली में छोड़ देते हैं, जिस से अनगिनत लोगों की भूख शांत हो सकती है.

बिमला महाजन, पटियाला (पं.)

*

2 साल पहले मैं अपनी दीदी के यहां से भिवाड़ी से जयपुर आ रही थी. मैं कई सालों बाद अकेले सफर कर रही थी. जब कंडक्टर ने रुपए ले कर मुझे टिकट नहीं दिया और मेरे मांगने पर आगे बढ़ गया तो मैं बहुत चिंतित थी कि कहीं चैकिंग के दौरान मुझे बिना टिकट देख कर बस से बाहर न उतार दिया जाए.

मैं अपनी सीट पर अकेली थी, सो मैं बड़ी व्यग्र हो कर अपनी साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन से पूछ रही थी कि क्या कंडक्टर टिकट नहीं देते? लेकिन वे सज्जन मुझे जवाब नहीं दे रहे थे और इधरउधर देख रहे थे. इतने में पीछे से एक लड़की बोली, ‘‘आंटी, आप परेशान न हों. आप अपनी अटैची चेन से लौक कर हमारे पास आ जाएं.’’ उस ने मुझे अपने पास बैठा लिया. धीरेधीरे हम खुलते गए. हम ने खूब गपें मारीं. 2 स्टौप पहले वह उतर गई, जातेजाते एक यात्री से रिक्वैस्ट कर गई कि आंटी की अटैची उतरवा देना. बिछुड़ते हुए मेरी आंखें भर आईं. बाकी यात्रा काटनी मुश्किल रही. आज भी हमारा यह रिश्ता कायम है. एकदूसरे को त्योहारों पर फोन करते हैं.

आशा गुप्ता, जयपुर (राज.)

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें