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अब एटीएम से रोज़ पाइए 100 रुपये फ्री

दैनिक ज़रूरतों के लिए हम सभी को दिन में कई बार एटीएम जाना पड जाता है लेकिन आपके साथ भी ऐसा कई बार हो जाता होगा कि  जब एटीएम से पैसे निकालते समय आपके अकाउंट से पैसे तो कट जाते हैं, लेकिन मशीन से पैसे नहीं निकलते. ऎसी स्थिति में परेशान न हों और सही समय पर अपने बैंक से संपर्क करें. इतना ही नहीं ऎसी स्थिति में आप अपने बैंक से रोजाना 100 रुपये की पेनल्टी भी वसूल सकते हैं.

इसके लिए यह है तरीका

आरबीआई की गाइडलाइन के मुताबिक अगर ट्रांजेक्शन फेल होने की शिकायत मिलने के 7 वर्किड डेज के अंदर बैंक ग्राहक के अकाउंट में वापस क्रेडिट नहीं करता है तो पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 के तहत बैंक को 100 रुपये प्रति दिन के हिसाब से ग्राहक को पेनल्टी देनी होती है.यह पेनल्टी पाने के लिए जरूरी है कि ट्रांजेक्शन फेल होने के 30 दिन के अंदर ही शिकायत करना जरूरी है. इसके बाद शिकायत करने पर बैंक मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं होगा.

पेनल्टी पाने के लिए स्टेप 1

ट्रांजेक्शन फेल होने पर अपने बैंक में एटीएम स्लिप या अकाउंट स्टेटमेंट के साथ शिकायत करें. एटीएम मशीन में ही संबंधित ब्रांच और मैनेजर का नाम व नंबर लिखा होता है.

पेनल्टी पाने के लिए स्टेप 2

शिकायत ट्रांजेक्शन फेल होने के 30 दिन के अंदर ही करें. बैंक को कार्ड की डिटेल, अकाउंट नंबर, एटीएम आईडी या लोकेशन और ट्रांजेक्शन की तारीख और समय जरूर दें. ध्यान रखें अपने कार्ड का या अन्य कोई भी पासवर्ड आप किसी के साथ शेयर न करें.

पेनल्टी पाने के लिए स्टेप 3

ब्रांच मैनेजर से बैंक की मोहर और साइन के साथ शिकायत की रिसीविंग कॉपी लेना न भूलें. इसकी कॉपी के जरिए आप पेनल्टी के 100 रुपये प्रति दिन पा सकेंगे.

पेनल्टी पाने के लिए स्टेप 4

शिकायत करने के बाद अगर 7 वर्किग डेज में आपके अकाउंट में पैसा न आए तो एनेक्जर5 फॉर्म भरकर मैनेजर को दें.

पेनल्टी पाने के लिए स्टेप 5

बैंक एनेक्जर5 फॉर्म भर कर जमा करने की तारीख से पेनल्टी गिनी जाएगी. आपके अकाउंट में आपकी राशि के साथ ही यह पेनल्टी जोड़ कर आपको दी जाएगी.

ऎसे गिनी जाएगी पेनल्टी की रकम

उदाहरण के लिए आपके अकाउंट से 20000 रुपये कटे, लेकिन मशीन से यह रकम नहीं निकली. अगर आपने 10 अप्रैल को एनेक्जर5 फॉर्म भर कर जमा किया है और आपका पैसा 20 अप्रैल को वापस आया है तो आपके खाते में 21000 रुपये आएंगे. इसमें 10 दिन के लिए 1000 रुपये की पेनल्टी शामिल होगी.

पेनल्टी की रकम न मिलने पर करें यह

अगर बैंक पेनल्टी का पैसा न दे तो आरबीआई के बैंकिंग ऑम्बड्समैन को ऑनलाइन शिकायत करें. इसके लिए www.secweb.rbi.org.in/BO/precompltindex.htm पर लॉग ऑन करें. फोन पर भी शिकायत की जा सकती है. ज्यादा जानकारी के लिए आरबीआई की वेवसाइट पर लॉग ऑन करें.

15 दिन जमीन के 15 फीट नीचे रहने का दावा

खूब ढोल मंजीरे बज रहे थे. बाबा का जयकारा लग रहा था. फूल-मालाओं की बरसात हो रही थी. हुमाद और अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में फैल रही थी. गाजे-बाजे बज रहे थे. ललाट पर राख लगाए बाबा धीरे-धीरे भक्तों के बीच चल रहा था. बाबा को देख कर ऐसा लग रहा था मानों वह कोई बड़ी लड़ाई जीत कर लौटा हो. हकीकत में ऐसा नहीं था. बाबा 15 दिनों तक जमीन के अंदर समाधी लगाने के बाद बाहर निकला था और बाबा के अंध्भक्त बौराए हुए ‘बाबा की जय’ के नारे लगा रहे थे. बाबा मुस्कुरा रहा था. शायद वह अपने भक्तों की बेवकूफी और अपनी धूर्तता पर इतरा रहा था.

पिछले 28 फरवरी को बाबा जमीन के अंदर बने कमरे में समाधि लेने के नाम पर चला गया था. जमीन के 15 फीट नीचे बने 10 फीट लंबे और 10 फीट चौड़े कमरे में बाबा तपस्या करने गया. गड्ढे में बने कमरे के उपर बांस का चचरी डाल कर उसके उपर मोटा कपड़ा बिछा दिया गया और उसके बाद कपड़े पर मिट्टी भर दी गई. बाबा ने ऐलान किया था कि वह 15 दिनों के बाद वापस लौटेगा. इस दौरान वह न कुछ खाएगा और न ही कुछ पीएगा. बाबा के चेलों को दावा है कि आम तौर पर बाबा कुछ भी नहीं खाते है. रोज केवल एक गिलास दूध पीते हैं. समाधि में जाने के एक महीना पहले ही उन्होंने दूध पीना भी बंद कर दिया था. जितने दिन बाबा जमीन के भीतर रहा उतने दिन उसके चेले-चपाटे बाहर भजन-कीर्तन करके चंदा और दक्षिणा इक्ट्ठा करते रहे.

पटना के पिजीशियन डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि बगैर भोजन और पानी के तो कुछ दिन रहा जा सकता है पर हवा के बिना मिनट से ज्यादा समय तक जिंदगी नहीं रह सकती है. जमीन के अंदर बाबा को किसी न किसी रूप से पानी, हवा और रोशनी मिल रही होगी. बाबा को जमीन के अंदर जाते समय केवल उनके अंध्भक्तों ने ही देखा. उस समय प्रशासन और पुलिस का भी कोई आदमी वहां मौजूद नहीं था.

जमीन के अंदर 15 दिनों तक समाधि में बैठे प्रमोद बाबा आखिर 13 मार्च को जमीन के बाहर प्रगट हुए. मधेपुरा के चैसा प्रखंड के अरजपुर पश्चिमी पंचायत के भटगामा गांव के नजदीक जीरो माइल के पास पिछले 28 पफरवरी को बाबा समाधि के लिए जमीन के अंदर गए थे. बाबा के चमत्कार को देखने के लिए हजारों भक्त खड़े थे. नाथ बाबा मंदिर में 14 मार्च से शुरू हुए 5 दिनी विराट महाविष्णु यज्ञ को कामयाब बनाने के लिए बाबा ने जमीन के 15 फीट नीचे समाधि लगाया था.

15 दिनों के बाद वह भले-चंगे बाहर निकले तो लोगों ने बाबा की जयजयकार लगाना शुरू कर दिया. बाबा के बाहर निकलने का समय 2 बजकर 45 मिनट तय था, लेकिन वह 3 बज कर 30 मिनट पर बाहर निकले. भक्तों के बीच कुछ देर रहने के बाद बाबा नाथ बाबा मंदिर में चले गए. बाबा भले ही अपनी इस हरकत को समाधि का नाम दें, लेकिन असलियत यही है कि अपनी पब्लिसिटी और दान-दक्षिणा के नाम पर लाखों रूपए जुटाने के मकसद से ही बाबा ने यह ड्रामा रचा. उसे बिष्णु यज्ञ और श्रीराम महायज्ञ करने का ऐलान कर रखा था और उसके लिए उसे लाखों रूपए जुटाना था. 14 मार्च से 19 मार्च तक उसने यज्ञ का आयोजन कर रखा है. यज्ञ के दौरान पास के मैदान में बड़ा मेला भी लगाया गया है. मेला में झूला, जादू का खेल, खिलौनों की दूकानें, खाने के सामानों के स्टौल, गीत-संगीत का कार्यक्रम समेत तरह-तरह के तमाशे दिखाए जा रहे हैं. बाबा ने अपने अंधभक्तों को रिझाने और पटाने का मुकम्मल इंतजाम कर रखा है. पहले तो उसने अपने भक्तों से दान-दक्षिणा के नाम पर मोटी रकम वसूला और अब मेला के बहाने भी लाखों की कमाई का इंतजाम कर लिया है. अंध भक्तों की मेहनत की कमाई पर ऐश करने का कोई भी मौका इस ढ़ोंगी बाबा ने नहीं छोड़ा है.

प्रमोद मूल रूप से पूर्णियां जिला के रूपौली प्रखंड के बलुआ गांव का है. जब वह 9 साल का था तभी से उसके मन में मक्कारी जगी और बैठे-ठाले खाने-पीने और ऐश-मौज करने का सपना लिए बाबा बन कर लोगों को उल्लू बनाने बनने की राह पर चल पड़ा. उसका दावा है कि 9 साल की आयु में घर छोड़ने के बाद 28 सालों तक वह वृंदावन, मथुरा और काशी घूमता रहा. पिछले 12 सालों से उसने मौन व्रत धरण कर रखा है. वह खुद को बिष्णु के अवतार के रूप में घोषित कर रखा है.

मधेपुरा के एसपी विकास कुमार बताते हैं कि प्रमोद बाबा को जमीन के अंदर समाधि लेते प्रशासन की ओर से किसी ने नहीं देखा था. बाबा जब जमीन के भीतर समाधि लगाने की तैयारी कर रहा था तो पुलिस की टीम उसे रोकने के लिए पहुंची थी, पर वहां मौजूद भीड़ के विरोध की वजह से पुलिस बल को वापस लौटना पड़ गया था. 

अंधविश्वास का लखपति फंदा

समाज कहीं का कहीं पहुंच गया हो, पर उसकी सोच जस की तस है. लोग अब भी चमत्कार में यकीन रखते है. केवल यकीन ही नहीं रखते उस यकीन को सच में बदलने के लिये हत्या जैसे बडे अपराध को करने से भी नहीं चूकते है. उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर इटौंजा में रहने वाले सर्वेश को बिना मेहनत के पैसा कमाने की धुन सवार रहती थी. उसकी मुलाकात कुम्हरांवा गांव के रहने वाले संतोष वाजपेई से हुई. संतोष ने सर्वेश को बताया कि वेदप्रकाश वाजपेई एक तांत्रिक है. अगर किसी आदमी को मारकर रस्सी से लटका दिया जाये तो वह रस्सी का वह फंदा वेद प्रकाश 5 लाख में बिकवा देते हैं. सर्वेश को यह धंधा चोखा लगा जिसमें 100 रूपये की रस्सी 5 लाख में बिक जाती हो.

संतोष ने सर्वेश की मुलाकात वेद प्रकाश के साथी पप्पू से भी कराई जो बक्शी का तालाब इलाके में तकिया मस्जिद के पास रहता था. सर्वेश इंटौजा में लाई चना की दुकान करता था. वहीं रहने वाला हसरत अली उसकी बहन से छेडछाड करता था. सर्वेश ने योजना बनाई की वह हसरत अली को मार कर रस्सी से लटका देगा. इससे उसे पैसा भी मिल जायेगा और हसरत अली को उसके किये कि सजा भी मिल जायेगी. सर्वेश को दोहरा लाभ दिखा. आनन फानन में सर्वेश ने अपना साथ देने वालों की टोली तैयार कर ली. इसमें तेज प्रताप और मनीष प्रमुख थे. यह सभी पढे लिखे नहीं थे. सर्वेश ने अपने सभी साथियों को 50-50 हजार देने का वादा भी किया. अपना खुद का बैंक में खाता भी खुलवा लिया.

27 दिसम्बर को जिस दिन फंदा तैयार हुआ उस दिन हसरत नहीं मिला. तब इन लोगों ने 17 साल के अनुज शुक्ला को पकड लिया. अनुज को लेकर सर्वेश माल इलाके के बसहरी गांव गया वहां मनीष उसको साइकिल पर बैठाकर लोधैरा गांव ले गया. शराब पीने और पिलाने के बाद सूनसान जगह पर आम के पेड में रस्सी का फंदा लगाया. अनुज के हाथ पतली रस्सी से बांध दिया. रस्सी का फंदा अनुज के गले में डालकर खींच लिया. जब अनुज मर गया तो उसके गले से फंदा निकाल कर लोग भाग गये. सर्वेश फंदा लेकर पप्पू से मिला तो उसने कहा कि फंदा वही वाला है इसका टेस्ट होगा जिसकी फीस 1 हजार रूपये है. जब फंदा टेस्ट में पास हो जायेगा तो 5 लाख मिलेगे. सर्वेश के पास 1 हजार रूपये नहीं थे. ऐसे में उसने केवल 700 रूपये देकर फंदा टेस्ट कराने को कहा.

पुलिस ने अनुज की लाश मिलने पर उसको आत्महत्या माना. पोस्टमार्टम होने पर हत्या का मामला सामने आने पर जांच का काम शुरू हुआ. लखनऊ के एसएसपी राजेश पांडेय ने बताया कि सीसीटीवी पफुटेज में अनुज हत्या वाले दिन आरोपियों के साथ दिखा. पुलिस ने जब इन लोगों से पूछताछ की तो पूरी कहानी प्याज की पर्तो की तरह खुलकर सामने आ गई. एसएसपी ने एसओ माल विनय कुमार सहित पूरी टीम की प्रशंसा की. पुलिस ने सभी आरोपियों को पकड कर जेल भेज दिया.

होली की मस्ती से दूर होते किशोर

होली का दिन आते ही पूरे शहर में होली की मस्ती भरा रंग चढ़ने लगता है लेकिन 14 साल के अरनव को यह त्योहार अच्छा नहीं लगता. जब सारे बच्चे गली में शोर मचाते, रंग डालते, रंगेपुते दिखते तो अरनव अपने खास दोस्तों को भी मुश्किल से पहचान पाता था. वह होली के दिन घर में एक कमरे में खुद को बंद कर लेता  होली की मस्ती में चूर अरनव की बहन भी जब उसे जबरदस्ती रंग लगाती तो उसे बहुत बुरा लगता था. बहन की खुशी के लिए वह अनमने मन से रंग लगवा जरूर लेता पर खुद उसे रंग लगाने की पहल न करता. जब घर और महल्ले में होली का हंगामा कम हो जाता तभी वह घर से बाहर निकलता. कुछ साल पहले तक अरनव जैसे बच्चों की संख्या कम थी. धीरेधीरे इस तरह के बच्चों की संख्या बढ़ रही है और होली के त्योहार से बच्चों का मोहभंग होता जा रहा है. आज बच्चे होली के त्योहार से खुद को दूर रखने की कोशिश करते हैं.

अगर उन्हें घरपरिवार और दोस्तों के दबाव में होली खेलनी भी पड़े तो तमाम तरह की बंदिशें रख कर वे होली खेलते हैं. पहले जैसी मौजमस्ती करती बच्चों की टोली अब होली पर नजर नहीं आती. इस की वजह यही लगती है कि उन में अब उत्साह कम हो गया है.

नशे ने खराब की होली की छवि

पहले होली मौजमस्ती का त्योहार माना जाता था लेकिन अब किशोरों का रुझान इस में कम होने लगा है. लखनऊ के लामार्टिनियर गर्ल्स कालेज की कक्षा 11 में पढ़ने वाली राजवी केसरवानी कहती है, ‘‘आज होली खेलने के तरीके और माने दोनों ही बदल गए हैं. सड़क पर नशा कर के होली खेलने वाले होली के त्योहार की छवि को खराब करने के लिए सब से अधिक जिम्मेदार हैं. वे नशे में गाड़ी चला कर दूसरे वाहनों के लिए खतरा पैदा कर देते हैं ऐसे में होली का नाम आते ही नशे में रंग खेलते लोगों की छवि सामने आने लगती है. इसलिए आज किशोरों में होली को ले कर पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया है.’’

ऐग्जाम फीवर का डर

होली और किशोरों के बीच ऐग्जाम फीवर बड़ी भूमिका निभाता है. वैसे तो परीक्षा करीबकरीब होली के आसपास ही पड़ती है. लेकिन अगर बोर्ड के ऐग्जाम हों तो विद्यार्थी होली फैस्टिवल के बारे में सोचते ही नहीं हैं क्योंकि उन का सारा फोकस परीक्षाओं पर जो होता है. पहले परीक्षाओं का दबाव मन पर कम होता था जिस से बच्चे होली का खूब आनंद उठाते थे. अब पढ़ाई का बोझ बढ़ने से कक्षा 10 और 12 की परीक्षाएं और भी महत्त्वपूर्ण होने लगी हैं, जिस से परीक्षाओं के समय होली खेल कर बच्चे अपना समय बरबाद नहीं करना चाहते.

होली के समय मौसम में बदलाव हो रहा होता है. ऐसे में मातापिता को यह चिंता रहती है कि बच्चे कहीं बीमार न पड़ जाएं. अत: वे बच्चों को होली के रंग और पानी से दूर रखने की कोशिश करते हैं, जो बच्चों को होली के उत्साह से दूर ले जाता है. डाक्टर गिरीश मक्कड़ कहते हैं, ‘‘बच्चे खेलकूद के पुराने तौरतरीकों से दूर होते जा रहे हैं. होली से दूरी भी इसी बात को स्पष्ट करती है. खेलकूद से दूर रहने वाले बच्चे मौसम के बदलाव का जल्द शिकार हो जाते हैं. इसलिए कुछ जरूरी सावधानियों के साथ होली की मस्ती का आनंद लेना चाहिए.’’ फोटोग्राफी का शौक रखने वाले क्षितिज गुप्ता का कहना है, ‘‘मुझे रंगों का यह त्योहार बेहद पसंद है. स्कूल में बच्चों पर परीक्षा का दबाव होता है. इस के बाद भी वे इस त्योहार को अच्छे से मनाते हैं. यह सही है कि पहले जैसा उत्साह अब देखने को नहीं मिलता.

‘‘अब हम बच्चों पर तमाम तरह के दबाव होते हैं. साथ ही अब पहले वाला माहौल नहीं है कि सड़कों पर होली खेली जाए बल्कि अब तो घर में ही भाईबहनों के साथ होली खेल ली जाती है. अनजान जगह और लोगों के साथ होली खेलने से बचना चाहिए. इस से रंग में भंग डालने वाली घटनाओं को रोका जा सकता है.’’

डराता है जोकर जैसा चेहरा

होली रंगों का त्योहार है लेकिन समय के साथसाथ होली खेलने के तौरतरीके बदल रहे हैं. आज होली में लोग ऐसे रंगों का उपयोग करते हैं जो स्किन को खराब कर देते हैं. रंगों में ऐसी चीजों का प्रयोग भी होने लगा है जिन के कारण रंग कई दिनों तक छूटता ही नहीं. औयल पेंट का प्रयोग करने के अलावा लोग पक्के रंगों का प्रयोग अधिक करने लगे हैं. लखनऊ के लामार्ट्स स्कूल में कक्षा 5 में पढ़ने वाला आदित्य वर्मा कहता है, ‘‘मुझे होली पसंद है पर जब होली खेल रहे बच्चों के जोकर जैसे चेहरे देखता हूं तो मुझे डर लगता है. इस डर से ही मैं घर के बाहर होली खेलने नहीं जाता.’’

लामार्टिनियर कालेज में कक्षा 4 में पढ़ने वाले उद्धवराज सिंह चौहान को गरमी का मौसम सब से अच्छा लगता है. गरमी की शुरुआत होली से होती है इसलिए इस त्योहार को वह पसंद करता है. उद्धवराज कहता है, ‘‘होली में मुझे पानी से खेलना अच्छा लगता है. इस फैस्टिवल में जो फन और मस्ती होती है वह अन्य किसी त्योहार में नहीं होती. इस त्योहार के पकवानों में गुझिया मुझे बेहद पसंद है. रंग लगाने में जोरजबरदस्ती मुझे अच्छी नहीं लगती. कुछ लोग खराब रंगों का प्रयोग करते हैं, इस कारण इस त्योहार की बुराई की जाती है. रंग खेलने के लिए अच्छे किस्म के रंगों का प्रयोग करना चाहिए.’’

ईको फ्रैंडली होली की हो शुरुआत

‘‘होली का त्योहार पानी की बरबादी और पेड़पौधों की कटाई के कारण मुझे पसंद नहीं है. मेरा मानना है कि अब पानी और पेड़ों का जीवन बचाने के लिए ईको फ्रैंडली होली की पहल होनी चाहिए. ‘‘होली को जलाने के लिए प्रतीक के रूप में कम लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए और रंग खेलते समय ऐसे रंगों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो सूखे हों, जिन को छुड़ाना आसान हो. इस से इस त्योहार में होने वाले पर्यावरण के नुकसान को बचाया जा सकता है,’’ यह कहना है सिम्बायोसिस कालेज में बीबीए एलएलबी कर रहे शुभांकर कुमार का. वह कहता है, ‘‘समय के साथसाथ हर रीतिरिवाज में बदलाव हो रहे हैं तो इस में भी बदलाव होना चाहिए. इस से इस त्योहार को लोकप्रिय बनाने और दूसरे लोगों को इस से जोड़ने में मदद मिलेगी.’’

एमिटी स्कूल में बीए एलएलबी कर रहे तन्मय प्रदीप को होली का त्योहार पसंद नहीं है. वह कहता है, ‘‘होली पर लोग जिस तरह से पक्के रंगों का प्रयोग करने लगे हैं उस से कपड़े और स्किन दोनों खराब हो जाते हैं. कपड़ों को धोने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. कई बार होली खेले कपड़े दोबारा पहनने लायक ही नहीं रहते. ‘‘ऐसे में जरूरी है कि होली खेलने के तौरतरीकों में बदलाव हो. होली पर पर्यावरण बचाने की मुहिम चलनी चाहिए. लोगों को जागरूक कर इन बातों को समझाना पड़ेगा, जिस से इस त्योहार की बुराई को दूर किया जा सके. इस बात की सब से बड़ी जिम्मेदारी किशोर व युवावर्ग पर ही है.

होली बुराइयों को खत्म करने का त्योहार है, ऐसे में इस को खेलने में जो गड़बडि़यां होती हैं उन को दूर करना पड़ेगा. इस त्योहार में नशा कर के रंग खेलने और सड़क पर गाड़ी चलाने पर भी रोक लगनी चाहिए.’’ 

किसी और त्योहार में नहीं होली जैसा फन

होली की मस्ती किशोरों व युवाओं को पसंद भी आती है. लखनऊ के मिलेनियम स्कूल में कक्षा 12 में पढ़ने वाली शांभवी सिंह कहती है, ‘‘होली ऐसा त्योहार है जिस का सालभर इंतजार रहता है. रंग और पानी किशोरों को सब से पसंद आने वाली चीजें हैं. इस के अलावा होली में खाने के लिए तरहतरह के पकवान मिलते हैं. ऐसे में होली किशोरों को बेहद पसंद आती है 

‘‘परीक्षा और होली का साथ रहता है. इस के बाद भी टाइम निकाल कर होली के रंग में रंग जाने से मन अपने को रोक नहीं पाता. मेरी राय में होली जैसा फन अन्य किसी त्योहार में नहीं होता. कुछ बुराइयां इस त्योहार की मस्ती को खराब कर रही हैं. इन को दूर कर होली का मजा लिया जा सकता है.’’ जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल में पढ़ रही गौरी मिश्रा कहती है, ‘‘होली यदि सुरक्षित तरह से खेली जाए तो इस से अच्छा कोई त्योहार नहीं हो सकता. होली खेलने में दूसरों की भावनाओं पर ध्यान न देने के कारण कई बार लड़ाईझगड़े की नौबत आ जाती है, जिस से यह त्योहार बदनाम होता है. सही तरह से होली के त्योहार का आनंद लिया जाए तो इस से बेहतर कोई दूसरा त्योहार हो ही नहीं सकता.

‘‘दूसरे आज के किशोरों में हर त्योहार को औनलाइन मनाने का रिवाज चल पड़ा है. वे होली पर अपनों को औनलाइन बधाइयां देते हैं. भले ही हमारा लाइफस्टाइल चेंज हुआ हो लेकिन फिर भी हमारा त्योहारों के प्रति उत्साह कम नहीं होना चाहिए.’’

लंदन में होगा बॉक्सर विजेंदर सिंह का अगला मुकाबला

विजेंदर सिंह अपनी अगली फ़ाइट के लिए लंदन रवाना हो गए हैं. विजेंदर का अगला मैच 2 अप्रैल को हैरो लिज़र सेंटर में होगा. विजेंदर की फ़ाइट किस बॉक्सर के साथ होगी इसका ऐलान नहीं हुआ है. विजेंदर ने हंगरी के एलेक्जेंडर होरवार्थ को चित कर अपनी चौथी फ़ाइट आसानी से जीत ली. हैरो में 30 साल के विजेंदर इस बार 6 राउंड का मैच खेलेंगे.

विजेंदर ने कहा, 'लंदन, मैं आ रहा हूं. मैं हैरो में लड़ने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकता और लंदन में मौजूद दर्शकों को दिखाना चाहता हूं कि मैं क्या हूं. मैंने मैनचेस्टर, डबलिन और लिवरपुल में फ़ाइट किया और अब लंदन आ रहा हूं.'

ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता ने ये भी कहा, 'मैंने अपनी अगला फ़ाइट के लिए तैयारी शुरू कर दी है और इस बार भी नॉक-आउट से जीतूंगा. जो भी विरोधी मेरे सामने लंदन में आएगा वो मुश्किल में पड़ेगा.'

विजेंदर ने अपने फ़ैन्स से कहा, 'मेरे लंदन आने से पहले ही बातें शुरू हो गई हैं और अपने देश में पहले प्रो-फाइट के लिए मुझे लंदन में जीतना ज़रूरी है.'

टर्निंग विकेट पर खेलने के लिए तैयार रहे भारत: गावस्कर

पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर का मानना है कि वर्ल्ड टी20 के पहले मैच में न्यूजीलैंड ने भारत को उसी की ‘दवा’ से चित कर दिया और मेजबान टीम अगर विरोधी टीमों के लिये टर्निंग विकेट बनाना चाहती है तो उसे खुद भी उन पर खेलने के लिए तैयार रहना चाहिए.

कीवी टीम ने टर्निंग ट्रैक पर दी मात
गौरतलब है कि न्यूजीलैंड ने भारत को टर्निंग विकेट पर 47 रन से हराया. उस मैच में कीवी स्पिनरों ने 10 में से नौ विकेट लिए. गावस्कर ने कहा, ‘यदि आप टर्निंग विकेट दूसरों के लिए बनाना चाहते हैं तो खुद भी उन पर खेलना आना चाहिए. हमें स्वीकार करना होगा कि भारत को उम्दा स्पिन गेंदबाजी के सामने दिक्कत आई है. यदि वे जीत जाते तो पिच पर कोई बात ही नहीं होती.’

नागपुर की पिच को मिल चुकी है वॉर्निंग
आपको बता दें कि नागपुर पिच को आईसीसी ने पिछले साल नवंबर में आधिकारिक चेतावनी दी थी जब भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच टेस्ट मैच ढाई दिन में खत्म हो गया था. गावस्कर ने कहा कि पहला मैच हारने के बाद भारत ने अपने लिये राह बड़ी कठिन कर ली है जिसे अगले मैच में पाकिस्तान से खेलना है. भारत के लिए एक और हार के मायने टूर्नामेंट से बाहर होना होगा.

पाकिस्तान को हर हाल में हराना होगा
गावस्कर ने कहा, ‘आप चाहे जीतें या हारे, पाकिस्तान को हर हालत में हराना होगा. यदि आप हारते हैं तो टूर्नामेंट से बाहर हो जाएंगे. न्यूजीलैंड के खिलाफ भारतीय टीम जूझती नजर आई और पाकिस्तान के खिलाफ और मुश्किलें पेश आएंगी.’

अति आत्मविश्वास की शिकार थी टीम इंडिया
उन्होंने कहा कि भारतीय टीम अति आत्मविश्वास की शिकार थी. गावस्कर ने यह भी कहा कि टीम संयोजन को लेकर न्यूजीलैंड टीम की तारीफ करनी होगी. उन्होंने कहा, ‘भारत अति आत्मविश्वास के कारण हारा लेकिन न्यूजीलैंड को भी जीत का श्रेय जाता है जिसने तीन स्पिनरों को उतारा.’

 

हे राम ! तुम्हारा शिष्य तो असहिष्णु निकला

सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले भजभज मंडली की असहिष्णुता भरी गुंडई की खूब आलोचना हो रही है. वाकया उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का है, जहां धर्म के रथ पर सवार हो कर वोट मांगने वाले भजभजी मंडलियों ने अपने भगवान के रथ को खींचने वाले घोड़े की टांग तोड़ डाली. घोड़े का कुसूर इतना भर था कि उस ने एक भाजपाई को लात मार दी. फिर क्या था, गुस्से से आगबबूला मसूरी के भाजपा विधायक गणेश जोशी ने आव देखा न ताव, घोड़े की टांग पर ताबड़ेतोड़ डंडे मार कर उस का पैर तोड़ डाला. जोशी का गुस्सा तब तक शांत नहीं हुआ जब तक घोड़े की टांग न टूट गई और वह बीच सड़क पर गिर न गया.

हर तरफ हो रही आलोचना

दरअसल, राज्य में भाजपा ने विरोधस्वरूप विधानसभा का घेराव किया था. वहां कई पुलिस वाले भी मौजूद थे. भाजपाईयों की नारेबाजी, गुंडागर्दी में किसी ने घोड़े को छेड़े दिया. घोड़े ने खुद के बचाव में लात क्या चला दी, उस की शामत आ गई. राज्य के सीएम हरीश रावत ने भी इस की जम कर आलोचना की है.

यह कैसी दबंगई

यों भी इस देश में नेताओं की दबंगई सदन की कार्यवाही में देश दुनिया के लोग बराबर ही देखते हैं. माइक तोड़ेने से लेकर कुरसियां फेंकने व आपस में जूतम पैजात करते इन्हें मजा आता है और ये समझते हैं कि इस से ये सुर्खियों में रहेंगे. मगर एक निर्दोष व बेजबान की टांग तोड़े कर मार देने वाली यह शायद पहली ही घटना होगी.

क्या कानूनी डंडा चलेगा अब

यों विरोध जताना और अपनी मांग रखना हर किसी का मौलिक अधिकार है, पर यह अधिकार कानून ने किसी को नहीं दिया है कि कोई तालिबानी जुल्म करे. अब कानून का डंडा नेताजी पर चलेगा. जानवरों की हितों की रक्षा करने वाली संस्था भी नेताजी के पीछे पड़ेगे. पर होगा कुछ नहीं यह तय है. भला नेताओं का कभी कुछ बिगाड़ पाया है किसी ने?

संघ ने विचार नहीं, पोशाक बदली

1925 में जब राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ यानि आरएसएस की स्थापना हुई थी तब उसकी पोशाक पूरी तरह से खाकी की हुआ करती थी. इसको संघ के प्रथम सरसंघचालक केशव बलीराम हेडगेवार ने डिजाइन किया था. 1939 तक यह पोशाक संघ में शामिल थी. 1940 में खाकी कमीज की जगह सफेद शर्ट को ड्रेस का हिस्सा बनाया गया. 1973 में सेनाओं की तरह पहने जाने वाले लंबे बूट को हटाकर चमडे के जूते लाये गये. 2010 में चमडे की बेल्ट को पोशाक में हिस्सा दिया गया. पहले कैनवस की बेल्ट लगाई जाती थी. 2016 में हाफ पैंट को संघ ने बिदा करके भूरे रंग की फुल पैंट को पोशाक का हिस्सा बना दिया. संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने इसकी वजह युवा सोच को बताया.

युवाओं को संघ से जोडने के लिये संघ ने अपनी पुरानी हाफ पैंट वाली पहचान को छोड दिया. आज का युवा उदार मानसिकता का है उसकी मानसिकता को देखते हुये संघ अपने विचारों में बदलाव करता तो शायद ज्यादा तादाद में युवा संघ के साथ जुडते. संघ ने अपने प्रचार प्रसार के लिये अब शाखाओं के साथसाथ वेबसाइट भी शुरू की है. 4 साल पहले शुरू की गई इस बेवसाइट में हर माह 8 हजार युवा जुडते है. संघ की 91 फीसदी शाखायें ऐसी है जिनमें 40 साल से कम उम्र के युवा सबसे अधिक है. संघ की हाफ पैंट को लेकर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी ने कुछ समय पहले कटाक्ष करते कहा था यह कैसा संगठन है जिसमें बूढे लोगों को हाफ पैंट पहनना पडता है  क्या उनको सार्वजनिक जगहो पर जाने से शर्म महसूस नहीं होती. संघ में पोशाक बदलने की कवायदा लंबे समय से चल रही थी. ऐसे में राबडी देवी की बात का असर नहीं लगता पर संघ की पोशाक बदलने पर विरोधी दलो की राजनीतिक टिप्पाणी आपेक्षित थी. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिगविजय सिंह ने कहा ‘संघ को पोशाक नहीं विचारधारा बदलनी चाहिये.’

संघ के पोशाक बदलने से यह साफ हो गया कि समय के साथ चलने के लिये बदलाव जरूरी होता है. देश और समाज के वह हालात अब नहीं है जो 1925 में थे. आज देश और समाज की दूसरी जरूरते है. संघ को देश और समाज की जरूरतों के हिसाब से अपनी सोच और विचारधारा में बदलाव लाना चाहिये. जिससे समाज तरक्की की राह पर आगे बढे. संघ ने जिस पैंट को अपनी पोशाक में शामिल किया है वह पश्चिम के पहनावा का ही हिस्सा है. पैंट कभी भी सनातन हिन्दू समाज की पोशाक का हिस्सा नहीं थी. जब जाति और धर्म के नाम पर देश में अलगाववादी सोच जन्म लेती है तो देश को कमजोर करने वालों को सहायता मिलती है. ऐसे हालातों से बच कर देश की तरक्की के लिये काम करना ही आज की जरूरत है. ऐसे में जरूरी है कि पोशाक के साथ सोच भी बदले.  

VIDEO: ‘शाहिद भाई इंडिया को बता दो, छक्का मारते कैसे हैं’

वर्ल्‍ड कप टी20 का आगाज हो चुका है. इसके साथ ही पिछले साल वर्ल्‍ड कप के दौरान धूम मचाने वाला 'मौका मौका' विज्ञापन भी एक बार फिर आ गया है. पाकिस्‍तान और भारत के बीच होनेवाले मैच को लेकर बनाए गए इस विज्ञापन में पाकिस्‍तानी फैन पाक क्रिकेटर शाहिद अफरीदी से जीत के लिए भावुक अपील करता हुआ दिख रहा है.

गौर हो कि दोनों टीमें (भारत और पाकिस्तान) 19 मार्च को कोलकाता के ईडन गार्डन्‍स में भिडेंगी. वर्ल्‍ड टी20 में अभी तक भारत और पाकिस्‍तान का चार बार आमना- सामना हुआ है और चारों बार भारत को ही जीत मिली है. यह मुकाबला बेहद दिलचस्प होनेवाला है जिसपर दोनों देशों के लाखों क्रिकेट प्रशंसकों की निगाहें रहेंगी.

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क्या हो पत्नी का सरनेम

एशिया महाद्वीप के देश जापान में महिला अधिकारों की हार हुई. तकनीकी रूप से संपन्न देश जापान में 5 महिलाओं ने कोर्ट में याचिका दायर कर अपने नाम के साथ पति का उपनाम न लगाने को ले कर अर्जी दी थी. मगर इस में कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ फैसला सुनाया. इस से अब यह तय हो गया है कि महिलाओं को अपने नाम के साथ पति का उपनाम लगाना आवश्यक है. यह उस देश के संविधान का फैसला है, जिस देश में शिक्षासंपन्न लोग हैं, जो तकनीक में बहुत आगे हैं और जहां बुजुर्गों की संख्या युवाओं के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. ऐसे देश में तो महिलाओं के प्रति ज्यादा उदारता की बात सामने आनी चाहिए थी. लेकिन उसी देश में इस फैसले के बाद महिलाओं के लिए संघर्ष और ज्यादा बढ़ गया है.

जापानी अदालत के मुताबिक यह कानून संविधान का उल्लंघन नहीं करता. इस के अलावा एक अन्य कानून भी है, जो महिलाओं को तलाक के 6 माह के भीतर विवाह करने को असंवैधानिक करार देता है. ये दोनों ही कानून 19वीं सदी के हैं जिन्हें अब भी बदला नहीं जा सका है. उसी देश में महिलाओं को आज भी यह अधिकार नहीं है कि वे पति के नाम से अलग अपने वजूद को उभार सकें.

पति का उपनाम ही क्यों

ऐसे में यह सवाल हर औरत के मन में उठना स्वाभाविक है कि उस के लिए पति के उपनाम को अपने नाम के साथ लगाना कहां तक जायज है? आज के नए युग में यह जरूर है कि कुछ नामचीन महिलाएं अपने उपनाम के साथ पति का भी उपनाम लगा लेती हैं लेकिन सवाल फिर वही है कि आधुनिक समाज में भी पत्नी ही पति का उपनाम क्यों लगाए?

वह लड़की जो शादी से पहले पिता के उपनाम के साथ अपनी शिक्षा पूरी करती है और अपनी पहचान बनाती है, विवाह होते ही एकदम उस की पहचान बदल जाती है. उस के नाम के साथ पति का उपनाम जोड़ दिया जाता है. बिना यह पूछे कि उसे अपने नाम के साथ पति का उपनाम लगाना भी है या नहीं. लेकिन जब यही उपनाम उस पर थोपा जाता है तब वहां महिला की अपनी रजामंदी का सवाल ही कहां रहता है? अर्धांगिनी कह कर घर लाई जाने वाली महिला को आधा अधिकार भी कब दिया गया? मायके से ससुराल आते ही उस का नाम कब बदल जाता है, उसे यह एहसास ही कब होता है. और वह एक नए नाम से पुकारी जाने लगती है, मानो एक रात में एक रिश्ते ने उस की बरसों की पहचान छीन ली हो.

सभी देशों का रवैया एक जैसा

इस से भी ज्यादा तकलीफ तब होती है जब पति से पत्नी का रिश्ता टूटता है. पति बच्चों, घर हर चीज के साथ पत्नी से अपना नाम भी छीन लेता है और पत्नी बरसों एक घर बनाने के बाद एकाएक अपनी पहचान ढूंढ़ने लगती है कि आखिर उस का वजूद क्या है? शादी से पहले पिता का नाम उस की पहचान था, जो खून का रिश्ता होने के कारण सारी उम्र नहीं टूटना चाहिए था. जैसे उस के भाइयों का नाम उस के पिता के नाम के साथ अटूट है, वैसा ही उस के साथ होना चाहिए. लेकिन चूंकि वह लड़की है, इसलिए उस की पहचान उस के पति से है और वही पति जब उस से रिश्ता तोड़ ले तब वह अपनी पहचान कहां खोजे? फिर से पिता का नाम अपने नाम से जोड़ ले या पति के उपनाम को ही नाम के साथ रहने दे? एक विकल्प और भी है. वह अपने नाम को अकेला छोड़ दे. असल में लड़ाई इसी अकेले नाम को रखने की है. यही लड़ाई जापान की महिलाओं ने लड़ी. मगर वे हार गईं.

विश्व के हर मुल्क में महिलाओं के लिए एक जैसे ही कानून हैं. फिर चाहे जापान हो, बौद्ध शिक्षाओं वाला चाइना हो, इसलामिक देश हो, ईसाई मुल्क या फिर सनातन समाज. धर्ममजहब के सांचे में भले ही ये देश एक न हों, लेकिन महिलाओं पर लादे जाने वाले अधिकारों के मामले में सभी देशों का रवैया एक जैसा ही रहा है. फिर चाहे औरत शिक्षित हो या अशिक्षित, गरीब हो या अमीर सब पर पुरुष अधिकार लागू होते हैं.

सवाल सिर्फ वजूद का नहीं

महाराष्ट्र के ठाकरे परिवार की बड़ी बहू स्मिता ठाकरे के लिए भी ऐसे ही हालात बने थे जब उन्होंने अपने पति जयदेव ठाकरे से तलाक के बाद अलग रहने का फैसला किया था. तब ठाकरे परिवार से एक बयान आया था कि उन्हें अलग रहना है तो रहें, लेकिन ठाकरे उपनाम यहीं छोड़ जाएं. वहीं मुंबई हाई कोर्ट ने जनवरी, 2015 में अपने एक फैसले में कहा था कि तलाक के बाद भी महिलाएं अपने पति के उपनाम का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं. पति इस पर तभी रोक लगा सकता है जब उस के उपनाम का पत्नी आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल कर रही हो. सवाल सिर्फ वजूद का नहीं है. एक व्यवस्था जो शादी से पहले कायम होती है, उस में एकाएक बदलाव होने से परेशानियां खड़ी होती हैं. जैसे शादी से पहले सारे शैक्षिक दस्तावेज, पहचान प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, राशनकार्ड पर नाम सब पिता के उपनाम से होते हैं, लेकिन शादी के बाद या तो इन में बदलाव कराया जाता है जोकि बहुत परेशानी का काम है या फिर पत्नी का व्यावहारिक नाम और दस्तावेजों में नाम दोनों अलगअलग पहचान के होते हैं.

हालांकि इस बात से संतोष किया जा सकता है कि महिलाएं अपने इस अधिकार को ले कर जागरूक हुई हैं और भले ही जापान का संविधान उन के पति के नाम से अलग पहचान न दे रहा हो, लेकिन वहां महिलाओं का संघर्ष अब भी जारी है. 2007 में कैलिफोर्निया का एक विधेयक भी बतौर उदाहरण याद किया जा सकता है. इस विधेयक के तहत कोई पुरुष चाहे तो अपनी पत्नी का उपनाम अपने नाम के साथ लगाने को स्वतंत्र है. इस विधेयक का निर्णय एक युगल द्वारा पेश याचिका के बाद लिया गया. उस याचिका में पति ने पत्नी के उपनाम को अपने नाम के साथ लगाने की इच्छा प्रकट की थी.इतिहास में महिलाओं को अधिकार मिले तो हैं, लेकिन इन के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी है. शायद इसी सामाजिक व्यवस्था को देख कर ‘द सैकंड सैक्स’ की फ्रैंच लेखिका सीमोन द बस ने कहा था कि स्त्री होती नहीं बना दी जाती है.

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