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स्टाइल से कोई हीरो नहीं होता

युवा उम्र में हीरो जैसी स्टाइल रखने का शौक कुछ लडको को बहुत होता है.वह सोचते है कि हीरो जैसा स्टाइल रखने, स्पोट्स बाइक से सडको पर फर्राटा भरने से वह हीरो लगने लगते है.कई बार लडकियां इनको हीरो समझ लेती है.दरअसल पढने लिखने की उम्र में ऐसे भ्रम पाल कर लडके खुद को भी धोखा देते है और लडकियों को भी अपने झांसे में फंसा लेते है.सच्चाई पता चलने पर लडकियां भी खुद को ठगा अनुभव करती है.लडकियों को इंप्रेस करने का शौक ऐसे लडको पर भारी पडता है.अपने खर्चो को पूरा करने के लिये यह लडके लूट जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगते है.लखनऊ पुलिस ने सिद्वार्थ मोहन, विशाल चैहान और आयुश आंनद को बाइक चोरी की घटना में पकडा.पुलिस को इनके पास से 2 बाइक, 10 मोबाइल और नकदी बरामद की.लखनऊ के एसएसपी राजेश पांडेय ने बताया कि विकासनगर थाने की पुलिस जांच कर रही थी.यह युवक कुछ सदिग्ध दिखे.3 युवक पक डमें आ गये और 1 आकाश राठौर भागने में सफल रहा.आकाश ही इनका सरगना था.आकाश ने फिल्म ‘किक’ और ‘ धूम’ देखकर 14 बाइकर्स का गैंग बनाया.

यह लोग रेस लगाने के साथसाथ नशे और शाहखर्ची का शिकार हो गये.जिसके लिये यह लूट करने लगे.पुलिस को इन लोगों से 23 लूट की घटनाओं का पता चला.यह लोग केवल महिलाओं का पर्स छीन लेते थे.पर्स में ही इनको कुछ नकद पैसे और मोबाइल के सेट मिल जाते थे.सिद्वार्थ के लंबे बाल देखकर महिलाये उसको लडकी समझ लेती थी.वह अपना चेहरा ढके रहता था.ऐसे में हर कोई लडकी समझ कर पुलिस से उसकी शिकायत करता था.पुलिस लूट करने वाली लडकी को खोजती रह जाती थी.इधर यह अपराधी आराम से पुलिस के सामने से ही निकल जाते थे.पुलिस ने लूट की शिकार 5 महिलाओं के सामने इनको पेश किया तो उन लोगों ने इनको पहचान लिया.यह सभी युवा अच्छे घरो से ताल्लुक रखते है.बाइक, मोबाइल,गर्लफ्रंैड के शौक ने इनमें शाहखर्ची बढा दी.अपने खर्चो को पूरा करने के लिये यह लोग लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देने लगे.यह सभी अपना स्टाइल और लुक ऐसा रखते थे कि दूर से देखकर फैशनेबल युवा नजर आये.

इनकी स्टाइल और फैशन देखकर कोई भी इनको हीरो समझने की गलती कर बैठता था.जब इनके राजखुले तो लगा कि हर स्टाइल वाला युवा हीरो नहीं होता है.कई बार ऐसे लोग अपराध का शिकार हो जाते है.यह लोग खुद तो भम्र में रहते ही है अपने परिवार और दूसरे लोगों को भी भ्रम में रखते है.किशोर उम्र के बच्चों को लेकर उनके पैरेंटस को बहुत सचेत रहने की जरूरत होती है.ऐसे बच्चों को बाइक का शौक लग जाता है.जिन के पास बाइक होती है उनके कई दोस्त भी बन जाते है.यह मौजमस्ती करने के लिये पहले घर से पैसा लेते है जब घर से पैसा कम मिलता है या पैसा देने के समय तमाम तरह के सवाल जवाब होते है तो यह लोग चोरी, लूट और दूसरे अपराध करने लगते है.लडकियां भी ऐसे युवाओं को देखकर सचेत रहे.स्टाइल से कोई हीरो नहीं होता है.

राधिका आप्टे इस्तेमाल करेंगी वर्चुअल रियलिटी टेक्नोलॉजी

एरोस इंटरनेशनल और विकी रजानी द्वारा निर्मित फिल्म फोबिया में राधिका आप्टे अहम भूमिका में नज़र आएंगी. पवन कृपलानी ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया है. राधिका की यह फिल्म एक सायकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है और कहा जा रहा है की यह बॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्म है किसमे वर्चुअल रियलिटी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है. वर्चुअल रियलिटी यह एक कंप्यूटर टेक्नोलॉजी है जिसके ज़रिये पर्यावरण  की उन चीज़ो को दोहराया जा सकता है जो वास्तविक और काल्पनिक हो। और साथ ही साथ इस का प्रयोग करनेवाले व्यक्ति को इस बात का एहसास होता है  की वे उस जगह पर हैं और वो वहां पर  मौजूद लोगो को छू सकते हैं महसूस कर सकते हैं, सुन सकते हैं. चूकि राधिका फिल्म में अग्रोफोबिआ का शिकार होती हैं इसीलिए फिल्म  के मेकर्स ने इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है ताकि पेशेंट इस तरह की बीमारी से खुद को बहार निकाल  पाए.

प्यार में छेड़छाड़

प्रिया का कहना है कि उस का पति जिस्मानी रिश्ता बनाते समय बिलकुल भी छेड़छाड़ नहीं करता और न ही प्यार भरी बातें करता है. उसे तो बस अपनी तसल्ली से मतलब होता है. जब तन की आग बुझ जाती है, तो निढाल हो कर चुपचाप सो जाता है. वह बिन पानी की मछली की तरह तड़पती ही रह जाती है. कुछ इसी तरह राजेंद्र का कहना है, ‘‘जिस्मानी रिश्ता कायम करते वक्त मेरी पत्नी बिलकुल सुस्त पड़ जाती है. वह न तो इनकार करती है और न ही प्यार में पूरी तरह हिस्सेदार बनती है. न ही छेड़छाड़ होती है और न ही रूठनामनाना. नतीजतन, सैक्स में कोई मजा ही नहीं आता.’’

इसी तरह सरिता की भी शिकायत है कि उस का पति उस के कहने पर जिस्मानी रिश्ता तो कायम करता है, पर वह सुख नहीं दे पाता, जो चरम सीमा पर पहुंचाता हो. हालांकि वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है, फिर भी सरिता को ऐसा लगता है, मानो वह अपनी मंजिल पर पहुंच कर भी नहीं पहुंची. सैक्स के दौरान वह इतनी जल्दबाजी करता है, मानो कोई ट्रेन पकड़नी हो. उसे यह भी खयाल नहीं रहता कि सोते समय और भी कई राहों से गुजरना पड़ता है. मसलन छेड़छाड़, चुंबन, सहलाना वगैरह. नतीजतन, सरिता सुख भोग कर भी प्यासी ही रह जाती है.

मनोज की हालत तो सब से अलग  है. उस का कहना है, ‘‘मेरी पत्नी इतनी शरमीली है कि जिस्मानी रिश्ता ही नहीं बनाने देती. अगर मैं उस के संग जबरदस्ती करता हूं, तो वह नाराज हो जाती है. छेड़छाड़ करता हूं, तो तुनक जाती?है, मानो मैं कोई पराया मर्द हूं. समझाने पर वह कहती है कि अभी नहीं, इस के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी हुई है.’’

इसी तरह और भी अनगिनत पतिपत्नी हैं, जो एकदूसरे की दिली चाहत को बिलकुल नहीं समझते और न ही समझने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि शादीशुदा जिंदगी कच्चे धागे की तरह होती है. इस में जरा सी खरोंच लग जाए, तो वह पलभर में टूट सकती है. पतिपत्नी में छेड़छाड़ तो बहुत जरूरी है, इस के बिना तो जिंदगी में कोई रस ही नहीं, इसलिए यह जरूरी है कि पति की छेड़छाड़ का जवाब पत्नी पूरे जोश से दे और पत्नी की छेड़छाड़ का जवाब पति भी दोगुने मजे से दे. इस से जिंदगी में हमेशा नएपन का एहसास होता है.

अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने के दौरान या किसी दूसरे समय पर भी पति अपनी पत्नी को सहलाए और उस के जवाब में पत्नी पूरे जोश के साथ प्यार से पति के गालों को चूमते हुए अपने दांत गड़ा दे, तो उस मजे की कोई सीमा नहीं होती. पति तुरंत सैक्स सुख के सागर में डूबनेउतराने लगता है.

इसी तरह पत्नी भी अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने से पहले या उस दौरान पति से छेड़छाड़ करते हुए उस के अंगों को सहला दे, तो कुदरती बात है कि पति जोश से भर उठेगा और उस के जोश की सीमा भी बढ़ जाएगी.

कभीकभी यह सवाल भी उठता है कि क्या जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए कायम किया जाता है? क्या दिमागी सुकून से उस का कोई लेनादेना नहीं होता? क्या जिस्मानी रिश्ते के दौरान छेड़छाड़ करना जरूरी है? क्या छेड़छाड़ सैक्स सुख में बढ़ोतरी करती है? क्या छेड़छाड़ से पतिपत्नी को सच्चा सुख मिलता है?

इसी तरह और भी कई सवाल हैं, जो पतिपत्नी को बेचैन किए रहते हैं. जवाब यह है कि जिस्मानी रिश्तों के दौरान छेड़छाड़ व कुछ रोमांटिक बातें बहुत जरूरी हैं. इस के बिना तो सैक्स सुख का मजा बिलकुल अधूरा है. जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए ही नहीं, बल्कि दिमागी सुकून के लिए भी किया जाता है.

कुछ पति ऐसे होते हैं, जो पत्नी की मरजी की बिलकुल भी परवाह नहीं करते, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. पत्नी की चाहत का भी पूरा खयाल रखना चाहिए, नहीं तो आप की पत्नी जिंदगीभर तड़पती ही रह जाएगी. कुछ औरतें बिलकुल ही सुस्त होती हैं. वे पति को अपना जिस्म सौंप कर फर्ज अदायगी कर लेती हैं. उन्हें यह भी एहसास नहीं होता कि इस तरह वे अपने पति को अपने से दूर कर रही हैं. कुछ पति जिस्मानी रिश्ता तो कायम करते हैं और जल्दबाजी में अपनी मंजिल पर पहुंच भी जाते हैं, परंतु उन्हें इतना भी पता नहीं होता कि इस के पहले भी और कई काम होते हैं, जो उन के मजे को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

कुछ औरतें शरमीली होती हैं. वे जिस्मानी रिश्तों से दूर तो होती ही हैं, छेड़छाड़ को भी बुरा मानती हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे हालात में क्या पत्नी पति से और पति पत्नी से खुश रह सकता है?

नहीं न… तो फिर ऐसे हालात ही क्यों पैदा किए जाएं, जिन से पतिपत्नी एकदूसरे से नाखुश रहें?

इसलिए प्यार के सुनहरे पलों को छेड़छाड़, हंसीखुशी व रोमांटिक बातों में बिताइए, ताकि आने वाला कल आप के लिए और ज्यादा मजेदार बन जाए.

जट्ट एंड जूलिएट २ के हिंदी रीमेक में मनीष पॉल

खबर है की सलमान खान प्रोडकशन्स और हिमेश रेशमिया ​की एचआर मुसिक यह प्रोडकशन्स मिलकर पंजाबी ब्लॉकबस्टर जट्ट एंड जूलिएट का हिंदी रीमेक कर रहे है।  रुमर है की ​अभिनेता मनीष पॉल जट्ट एंड जूलिएट के हिंदी सीक्वेल में नजर आयेंगे।  सूत्रों की माने तो "​ मनीष नार्थ में बहुत ही पॉपुलर है क्यूंकि वे पंजाबी तो है ही पर साथ में वे टेलीविजन की एक बड़ी हस्ती भी है। जट्ट एंड जूलिएट २ पंजाबी बेहद बड़ी हिट रही है और मनीष की पसंदीदा फिल्म है। जब फिल्म निर्माता सन्नी नरूला ने मनीष को फिल्म के हिंदी रीमेक के लिए अप्र्रोच किया तो वे बेहद ही खुश हुए और प्रोजेक्ट से जुड़ने लिए उत्साही दिखे। जट्ट एंड जूलिएट २ के हिंदी रीमेक "रौनक एंटरटेनमेंट बैनर "के तहत निर्माण किया जाएगा।​

सितारों सी चमक क्रिस्टल से

मैट्रो सिटीज में जगह की कमी, सभी के लिए एक बड़ी समस्या है. ऐसे में कम जगह के घर को अपनी पसंद के अनुसार सजाना बहुत मुश्किल होता है. केवल रंगबिरंगी दीवारों से ही घर खूबसूरत नहीं बनता बल्कि घर में रखे साजोसामान से घर की खूबसूरती निखरती है. यदि आप अपने घर को न्यूलुक देना चाहते हैं तो एक बार क्रिस्टल से बने आइटम्स से घर सजा कर देखें. यह घर की सजावट में नई जान डाल देते हैं. आज के समय में क्रिस्टल से घर सजाना ट्रैंड में है.

क्या है क्रिस्टल : क्रिस्टल एक चमकदार और ट्रांसपैरैंट ग्लास होता है. इस से सजा हुआ आप का छोटा सा घर भी बंगले सा अहसास देता है. क्रिस्टल कई रंगों में मौजूद होने के कारण इस से की गई सजावट काफी अट्रैक्टिव लगती है. मार्केट में क्रिस्टल की एक बड़ी रेंज मोजूद है. आजकल लोग घर को सजाने के लिए बहुत सारी चीजों का प्रयोग करने के बजाए. कम सामान रखना पसंद करते हैं. जिस में क्रिस्टल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हर कोई अपनी पसंद और बजट के अनुसार किस्टल से बनी चीजें ही खरीदता है.

क्रिस्टल का जलवा : क्रिस्टल को सजावट की दुनिया का ट्रैंड सैंटर कहा जा सकता है. करीने से तैयार किए गए प्रिज्म और आकर्षक डिजाइन लोगों के लिद में अपनी खास जगह बनाते जा रहे हैं. क्रिस्टल से छन का आती हुई रोशनी जमीं पर सितारों की चमक बिखेर देती है. आप के घर को सितारों सा सजाने के लिए न सिर्फ क्रिस्टल के गुलदान मौजूद हैं बल्कि क्रिस्टल की आकृतियों और कलात्मक वस्तुओं को भी काफी पसंद किया जाता है. विभिन्न रूपों में हाथ से तराशे गए शीशे वाले क्रिस्टल लोगों के, ड्राइंगरूम, गेस्टरूम और यहां तक कि बेडरूम में भी अपनी जगह बना रहे हैं. आप के घर के दरवाजे से ले कर कमरे को विभाजित करने वाले पिलर, स्टैंड तक क्रिस्टल के होते हैं.

क्रिस्टल के डिफरैंट आइटम्स : क्रिस्टल की बढ़ती मांग को देखते हुए मार्केट में इस के कई औप्शन मौजूद हैं. छोटेबड़े कई तरह के आइटम कम कीमत से ले कर ऊंची कीमत में मौजूद हैं. जहां आप अपनी जेब और पसंद के अनुसार खरीद सकते हैं औप्शन की कमी नहीं है क्रिस्ट के कैंडल, स्टैंड, द्ब्राूमर, शोपीस फ्लावर, फ्लावर पौट आदि कई वैराइटी मौजूद है.

क्रिस्टल का बदलता ट्रैंड : पहले क्रिस्टल के व्हिस्की, बीयर ग्लासेज का चलन ज्यादा था. धीरेधीरे कांच के अन्य प्रोडक्ट जैसे फ्लावर वासेज, कैंडल स्टैंड, मूॢतयां, सेंडिलियर्स, बाउल्स व डेकोरेटिव पीसेज को इंटीरियर डेकोरेशन के तौर पर खरीदा जाने लगा.

क्रिस्टल से औफिस को सजाएं : जब औफिस को एक नया रूप देना होता है तो इस कार्य के लिए क्रिस्टल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ऐसे भी घर सजाने से कहीं अधिक होता है औफिस को सजाना. औफिस को सजाने का मूलमंत्र है सजावट को मूलआर्ट एवं डिजाइन के ंग से भरते हुए ग्लोबल या ट्रैंउी लुक देना, क्रिस्टल आप के औफिस की सुंदरता में चार चांद लगा देता है. इस मार्डन जमाने में यह आर्ट का प्रतीक बन गया है. इस की चमकदार और ट्रांसपरेंट उपस्थिति औफिस को नया लुक देती है.

क्रिस्टल से सजे औफिस का सामान : क्रिस्टल से औफिस में चमकते कई सामान आप के वर्क स्टेश्शन को सजा करते है जैसे क्रिस्टल से गढ़ा पेन, क्रिस्टल से चमकती टेबल क्लौक, क्रिस्टल का पेपर वेअ, पैन स्टैंड, कोस्टर के अलावा स्टेशनरी से जुड़े और भी कई सामानों को क्रिस्टल से जोड़ा जा सकता है. इस के अलावा औफिस की दीवारों पर सजी तस्वीरों के फ्रेम पर अगर क्रिस्टल लगा हो तो वो कई नजरों को खींच सकती है. आप के औफिस को कोई कोना या टेबल क्रिस्टल के किसी जानवर या इंसान की स्टेच्यू या कला के शानदार नमूने से निखर सकता है. अगर आप कुछ अलग करना चाहते हैं तो रंगबिरंगे द्ब्राूमर को भी अपने औफिस में जगह दे सकते हैं. कई खूबसूरत रंग देता हुआ यह द्ब्राूमर अन औफिसों में ज्यादा अच्छा लगेगा. जहां कैजुवल ऐटमौस्फियर हो, इस से औफिस की सजावट में चार चांद लग जाएंगे.

क्रिस्टल आइटम्स की कीमत : क्रिस्टल के आइटम्स प्राय: यूरोपीयन देशों जैसे बेल्जियम, इटली, फ्रांस और आस्ट्रेलिया से आयात किए जाते हैं. इसलिए ये काफी महंगे होते हैं. यह 1000 रुपए से 5000 रुपए तक की रेंज में मिल जाते हैं. आप अपने बजट और जरूरत के मुताबिक खरीद सकते हैं. वहीं छोटे क्रिस्टल पीस 500 से 900 रुपए की रेंज में भी उपलब्ध हैं.

सरकारी बैंकों में 38% बढ़ी डिफॉल्टरों की संख्या

सरकारी बैंकों से कर्ज लेकर चुकता नहीं करने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है. पिछले तीन सालों में इनकी संख्या में 38% की वृद्धि देखी गई है. इसमें ऐसे लोग शामिल हैं जो ऋण चुकाने की हैसियत रखने के बाद भी ऋण नहीं चुकाने के लिए खुद को डिफॉल्टर घोषित कर देते हैं.

डिफॉल्टर घोषित करने वालों की संख्या दिसंबर 2015 तक 7686 पहुंच गई है. जबकि दिसंबर 2012 में ये संख्या 5554 थी. इस दौरान ऋण राशि भी तीन गुना बढ़ कर 66190 करोड़ पहुंच गई. जबकि तीन साल पहले यह राशि 27750 करोड़ रुपये थी.

हालांकि बैंकरों ने चेतावनी दी है कि कुछ बैंक अभी भी बाहर की कंपनियों और उनके प्रवर्तकों को नेट से दूर रख रहे हैं. बैंक्स अभी भी बकाएदारों की पहचान के लिए जान-बूझकर रिजर्व बैंक के पूर्ण दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं. अभी तक इस बात के कोई भी प्रमाण नहीं है कि किसी कर्जदार ने जानबूझकर खुद को डिफॉल्टर घोषित किया है.

यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के एक पूर्व कार्यकारी निदेशक ने बताया कि हाल के वर्षों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि हुई है, लेकिन अभी भी सभी खातों की पहचान नहीं की गई है. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब सिस्टम में एनपीए बढ़ रहा है और बैंक घाटे की बात कह रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह कैसे संभव है.

आरबीआई के नियमों के मुताबिक बैंक किसी भी कर्जदार को डिफॉल्टर तब घोषित कर सकते हैं जब कर्जदार पुर्णभुगतान नहीं कर पाता है. ठीक उसी तरह कोई कर्जदार अपनी चल या अचल संपत्ति को कर्ज चुकाने के लिए बाजार में बेचने की इजाजत देता है तो उन्हें डिफॉल्टर घोषित किया जाता है.

 

आईटीसी ने बंद किए सिगरेट कारखाने

भारत की सबसे बड़ी सिगरेट बनाने वाली कंपनी आईटीसी ने अपनी सभी फैक्‍ट्रियों में उत्‍पादन फिर से बंद कर दिया है. कंपनी ने कहा है कि 85% चित्रात्मक चेतावनी के अनुपालन को पूरा करने तक उसके कारखाने बंद रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने इसी हफ्ते तंबाकू कंपनियों को बड़ी चित्रात्मक चेतावनी के नियम को लागू करने का निर्देश देते हुए मैन्‍युफैक्‍चरर्स की इसके क्रियान्वयन पर रोक की अपील को ठुकरा दिया. नए सिगरेट पैकेजिंग नियम एक अप्रैल से लागू हुए हैं.

4 मई से बंद किए कारखाने

आईटीसी ने बंबई शेयर बाजार को भेजी सूचना में कहा कि इस बीच उसने 4 मई से सिगरेट कारखानों को बंद कर दिया है. कंपनी के ये कारखाने उस समय तक बंद रहेंगे जब तक कि वह इस नियम का अनुपालन नहीं कर लेती. पिछले महीने आईटीसी ने अपने कारखानों में सिगरेट का विनिर्माण फिर शुरू कर दिया था. बड़ी चित्रात्मक चेतावनी के आदेश के विरोध में कंपनी ने एक अप्रैल को उत्पादन बंद किया था.

क्या आदेश दिया था सुप्रीम कोर्ट ने?

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सि‍गरेट और तंबाकू कंपनि‍यों को बड़ा झटका दि‍या था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि‍ कंपनि‍यों को तत्‍काल प्रभाव से तंबाकू प्रोडक्‍ट पैकेट के 85 फीसदी हि‍स्‍से को ग्राफि‍क हेल्‍थ वॉर्निंग से कवर करना होगा.कंपनियों को इस मामले में केंद्र सरकार के इंस्ट्रक्शन को लागू करना होगा. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को कर्नाटक हाईकोर्ट के पास भेज दि‍या है. आईटीसी ने कहा कि जब तक कर्नाटक उच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी नहीं हो जाती वह अपनी कंपनियों में उत्पादन बंद रखेगी.

स्वास्थय मंत्रालय ने जारी किया था नोटिफिकेशन 

 – सि‍गरेट और दूसरे तंबाकू प्रोडक्‍ट्स (पैकेजिंग और लेबलिंग) संशोधन नि‍यम, 2014 को लागू करने के लि‍ए हेल्‍थ मि‍नि‍स्‍ट्री ने नोटि‍फि‍केशन जारी किया था.

– कंपनियों को इसे 1 अप्रैल से लागू करना था. हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने इंटरिम इंस्ट्रक्शन में इस नि‍यम को लागू करने पर स्‍टे लगा दि‍या था.

– आईटीसी समेत कई बड़ी कंपनियों ने अपनी सभी यूनिट बंद करने का फैसला किया था.

 – इससे देश में सिगरेट का प्रोडक्शन काफी हद तक बंद हो गया है.

हर दि‍न 350 करोड़ का नुकसान

1 अप्रैल से चित्रात्मक चेतावनी के नए नियम आने से आईटीसी समेत तमाम बड़ी कंपनियों ने सिगरेट का उत्पादन बंद कर दिया था. माना जा रहा है कि इससे रोज 350 करोड़ रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है. कंपनियों का कहना है कि वे चित्रात्मक चेतावनी पहले से ही छाप रहे हैं. नए नियम में स्पष्‍टता नहीं है.

 

प्रोफेशनल्स और एनबीएफसी को मिलेगा बैंक खोलने का मौका

फाइनेंस कंपनियों और प्रोफेशनल्स को बैंक खोलने का मौका मिल सकता है, लेकिन हो सकता है कि लंबे समय से ऐसा सपना देख रहे कई बड़े बिजनेस हाउसेज के हाथ ऐसा अवसर न आए. आरबीआई ने ड्राफ्ट रूल्स पेश किए हैं. इसमें नए 'यूनिवर्सल बैंकों' के लिए ऑन-टैप लाइसेंस की खातिर कम से कम 500 करोड़ रुपये की पूंजी की शर्त का प्रस्ताव है. ऐसे बैंक लोन देने वाले, डिपॉजिट स्वीकार करने वाले और फीस लेकर सेवाएं देने वाले बैंकों की तरह काम कर सकेंगे.

कम से कम 10 साल का अनुभव रखने वाले प्रोफेशनल्स के लिए दरवाजा खोलते हुए और बड़ी नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को खुद को बैंकों में बदलने का मौका देते हुए आरबीआई ने कहा है कि ऐसे इंडस्ट्रियल हाउसेज को बैंकों को प्रमोट करने की इजाजत नहीं होगी, जिनके टोटल बिजनेस का 40% से ज्यादा हिस्सा नॉन-फाइनेंशियल एक्टिविटीज से आता हो.

नए नियमों के मुताबिक, 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की टोटल एसेट्स वाले और अपने बिजनेस का 60% से ज्यादा हिस्सा फाइनेंशियल सर्विसेज क्षेत्र में रखने वाले बिजनेस हाउसेज बैंकिंग लाइसेंस के लिए अप्लाई कर सकते हैं. एक तरह से आरबीआई ने यह भी कहा है कि कॉरपोरेट्स को किसी भी बैंक में 10% से ज्यादा स्टेक नहीं लेने दिया जाएगा.

पिछले साल आरबीआई ने 20 नए संस्थान बनाने की मंजूरी दी थी. इनमें स्मॉल और पेमेंट्स बैंक शामिल थे. आईडीएफसी और बंधन को ही पूर्ण रूप से कमर्शियल बैंक खोलने की इजाजत दी गई थी. ड्राफ्ट रूल्स के मुताबिक, पहले 5 वर्षों में प्रमोटर का स्टेक 40% तक ही रहेगा और नए बैंक को 6 वर्षों में शेयर बाजार पर लिस्ट होना होगा. 5 साल के बाद प्रमोटर के अतिरिक्त हिस्से को घटाकर 40% पर लाना होगा, फिर कामकाज के 10 वर्षों में 30% और 15 वर्षों में 15% पर लाना होगा.

 

नाम की महिमा

नामों की अपनी महिमा होती है तभी तो बच्चों के दुनिया में आते ही मातापिता अपने बच्चों का बैस्ट व यूनीक नाम रखने की जुगत में लग जाते हैं. कभी इस के लिए पंडितों के चक्कर लगाते हैं तो कभी शब्दकोष खंगालते हैं. यहां तक कि अब वे नैट से भी नामो को खोजने में पीछे नहीं रहते बावजूद इस के वे कभीकभी पसंदीदा नाम नहीं रख पाते.

पुराने जमाने के दकियानूसी कट्टरपंथी लोग अपने बच्चों के नाम देवीदेवताओं के नाम पर यह सोच कर रखते थे कि मरते समय भी उन्हें बुलाने पर भगवान का नाम ले लिया जाएगा इसलिए राम, सीता, वैष्णो, पार्वती जैसे नाम रखने में भी नहीं शर्माते थे.
लेकिन बदलती धारणाओं और जागरूकता के बाद भी अब जहां चलन मौडर्न नामों का हो गया है वही अब अपने पेशे से जुड़े दिनों में से भी लोग नाम निकलवाने लगे हैं. इस की जीतीजागती मिसाल मुन्नालाल झा है, जो मध्यप्रदेश से जुड़े होने के साथसाथ समाजसेवा भी करते हैं. उन्होंने अपने जीवन में शुरू से ही संघर्ष किया है तभी तो उन्होंने अपने जीवन से मिले तजुरबे को देखकर अपने बच्चों का नाम क्रांति, आंदोलन, संघर्ष, भूख, हड़ताल और नेता रखा.

कहानी कुछ ऐसी है जब मुन्नालाल की शादी नहीं हुई थी तब उन्होंने अपने लहार कस्बे, किसे वे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते और वहां की समस्याएं देखकर उन की आंखों से आंसू निकल जाते थे के लिए अनशन किया और लोगों में भी इस के प्रति जागरूकता पैदा की कि सिर्फ सहने से नहीं बल्कि समस्या का समाधान निकालने से निकलता है इसलिए तुम भी आगे आओ. भले ही कोई आगे आया या नहीं आया लेकिन फिर भी उन्होंने अपना अनशन जारी रखा.

कहते है न कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती. मुन्नालाल की मेहनत भी रंग लाई और उन्होंने अपनी इसी मेहनत में सफलता पाकर समाजसेवा की राह पकड़ ली समाजसेवा के रास्ते में भी कई अड़चनें थीं लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बढ़ चले आगे की राह पर. जैसेजैसे समय बीतता गया समस्याएं भी बढ़ती गईं लेकिन हार मानना तो जैसे मुन्नालाल ने सीखा ही नहीं था ओर यही हिम्मत और जज्बा वे अपने बच्चों में भी पैदा करना चाहते थे तभी तो जब उन के घर पहला पु़त्र जन्मा तो उस का नाम क्रांति रखा, 2 साल बाद जन्मे बेटे का नाम आंदोलन, तीसरे का संघर्ष, चैथे का हड़ताल और पांचवें का नेता. और साथ ही बेटों को भी यही शिक्षा दी कि जिस तरह तुम्हारे नाम अनोखे है उसी तरह काम भी ऐसे करना कि दुनिया तुम्हें याद करें.

अगर कभी लोगों को हक दिलवाने के लिए विरोध, आंदोलन, हड़ताल करनी पड़े और जाहिर सी बात है कि इस के लिए संघर्ष जो करना ही पड़ेगा तो कभी पीछे मत रहना बल्कि आगे बढ़ना. अगर कोई आगे आने को तैयार न हो जो खुद नेता की तरह सब की ढाल बन कर खड़े रहना. तुम्हारी हिम्मत देखकर लोग खुद तुम्हारा हाथ थामेंगे. लेकिन कभी भी अपने नामों के अर्थ को शर्मशार न करना.
नामों का इफैक्ट
जिस तरह मुन्नालाल ने अपने बच्चों का अनोखा नाम रखा ठीक उसी तरह आज अधिकांश लोग अपने बच्चों के नाम वैज्ञानिकों, साहित्याकारों, नेताओं आदि के नामों पर रखना पसंद करते हैं ताकि उन का बच्चा भी उस जैसा बने यानी उन का मानना है कि नामों का पर्सनैलिटी पर सीधा असर पड़ता है. भले ही लोगों की ऐसी धारणा है लेकिन हमेशा ऐसा हो जरूरी नहीं. अगर किसी ने अपने बच्चे का नाम होशियार सिंह रखा है जो जरूरी नहीं कि वो होशियार ही हो.
होशियार बनने के लिए आप को मन लगाकर पढ़ाई करनी होगी. इसलिए कोशिश करें कि अपने नाम के अर्थ को सार्थक बनाने की.

‘मनम’ का रीमेक बना सकते हैं संजय लीला भंसाली

बॉलीवुड फिल्मों में हिंदी रीमेक बनाने का चलन बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है. ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी सफल फिल्म बनाने वाले फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने भी अब साउथ की फिल्म ‘मनम’ का रीमेक बनाने की इच्छा जताई है.

गौरतलब है कि इससे पहले भी पोकरी(वांटेड), दृश्यम, अलाईपायुथेय (साथिया), थेवार मगन (विरासत), मोमन्टो (गजनी), मर्यादा रामन्ना (सन ऑफ सरदार) जैसी साउथ की फिल्मों का रीमेक बॉलीवुड में बनाया जा चुका हैं.  

हिंदी सिनेजगत को 'ब्लैक', 'गुजारिश' व 'बाजीराव मस्तानी' जैसी फिल्में दे चुके फिल्मकार संजय लीला भंसाली जल्द ही तेलुगू की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'मनम' का हिंदी रीमेक बना सकते हैं. इस फिल्म में अक्कीनेनी कुनबे की तीन पीढ़ियों के सितारों ने काम किया है.

'मनम' के निर्देशक विक्रम कुमार ने बताया, हाल ही में जब मैं मुंबई में शूटिंग कर रहा था, तो फिल्म के हिंदी रीमेक के संबंध में उनसे मुलाकात की थी. हम हालांकि फिलहाल किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं, लेकिन उनकी अपने प्रोडक्शन हाउस के तहत फिल्म का रीमेक बनाने में दिलचस्पी है.’

तेलुगू फिल्म 'मनम' में दक्षिण भारत के दिग्गज दिवंगत अभिनेता अक्कीनेनी नागेश्वर राव, उनके बेटे नागार्जुन और उनके पोते नागा चैतन्य और अखिल हैं. 'मनन' को दर्शकों व समीक्षकों दोनों से जबर्दस्त सराहना मिली थी, जो पुनर्जन्म की कहानी है.

 

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