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अपराधी नहीं हैं बिल्डर

बिल्डरों के खिलाफ माहौल बहुत तेजी से खराब होता जा रहा है. नया कानून बनाया गया है जो न केवल बिल्डरों को शरीफ रखने के बहाने उन पर सैकड़ों टन कागजों का बोझ डाल देगा, बल्कि अदालतें तो बिल्डरों को तरहतरह की सजाएं देने भी लगी हैं. इस में शक नहीं कि बिल्डर जो कहते हैं, करते नहीं हैं और साधारण घर खरीदार के पास न लड़ने का समय होता है, न पैसा. ऐसे में उसे बिल्डरों की नाजायज बातें भी माननी पड़ती हैं. भवन निर्माण व्यवसाय की जड़ में बिल्डरों का लालच तो है ही पर उस से ज्यादा खलनायकी सरकारी विभाग दिखाते हैं जो छिपे रहते हैं. यह व्यवसाय भी दूसरे व्यवसायों की तरह प्रतियोगिता से भरा है और बिल्डर नाम व पैसा कमाने के साथ अपना काम चालू रखना चाहता है. वह चाहता यही है कि उस की एक बिल्डिंग पूरी हो तो वह दूसरी, तीसरी शुरू करे और ज्यादा मुनाफा कमाए.

कठिनाइयां यहां जमीन खरीद से ले कर कंपलीशन सर्टिफिकेट तक की हैं जो सरकारी हाथों में हैं जिन्हें असल उपभोक्ता की कोई फिक्र नहीं होती. नया कानून और अदालतें सरकारी नियमों को ब्रह्मवाक्य मान कर उन के पालन पर जोर देती हैं. अगर सब तरह के टेढ़ेसीधे कानून लागू करना ही देश के लिए उपयोगी व व्यावहारिक होता तो देश इस तरह अस्तव्यस्त नहीं लगता. आज कहीं कोई निर्माण देख लें. सरकारी ही देख लें. कैसे बनते हैं सरकारी दफ्तर, देखिए. सरकारी पुल देखिए. सरकारी रिहायशी मकान देखिए. सरकारी स्टेडियम देखिए. इन में से कौन सा सही है? कौन सा बजट में बना है? कौन सा समय पर बना है? कौन सा नियमों का पालन कर रहा है? अगर कोई मानकों पर नहीं उतर रहा तो साफ है कि इस देश में किसी की मंशा, सरकार की भी, सही काम करने की है ही नहीं, न सही कानून बनाने की है, न सही सेवा देने की.

फिर बिल्डरों को ही महाखलनायक क्यों बनाया जाए? जो लाखों लोग बिल्डरों के मकानों में रह रहे हैं और जिन्होंने 20 सालों में अपनी संपत्ति का मूल्य 5-7 से 20-25 गुना होते देखा है, वे भी बिल्डरों को कोसते हैं जबकि उन का पैसा बिल्डरों की वजह से ही फलाफूला. वहां वे अपने बुद्धि को श्रेय देते हैं कि उन्होंने सही समय पर सही बिल्डर चुना पर उसे धन्यवाद के दो शब्द नहीं देते. क्रिकेट खिलाड़ी महेंद्र सिंह धौनी को नीचा देखना पड़ा जब उस के स्पौंसर आम्रपाली समूह की पोल खुली पर आम्रपाली के बिल्डरों को दूसरों से क्या परेशानियां हैं, उस की फेहरिस्त क्या किसी ने उस से मांगी?

बिल्डर दूध के धुले नहीं हैं. हर बिल्डर बेईमानी कर रहा है पर फिर भी वे मकान तो मुहैया करा ही रहे हैं. दूध वाले पानी मिलाते हैं पर दूध वालों पर पुलिस का पहरा बैठाने से क्या काम चलेगा? उस गाय को उतना न मारो कि वह शक्तिमान घोड़ा बन जाए जिस पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक गणेश जोशी ने डंडे बरसाए, मानो वह कोई दलित हो और मर गया. बिल्डरों को अपराधी न मानें, उन्हें सिर्फ कालिख लगे व्यवसायी मानें जो हर चीज में डंडी मारते हैं पर सेवा तो आखिरकार दे ही देते हैं.

गुजरात में पटेल पेच

गुजरात में पटेल आंदोलन को कुचलने के लिए मुख्यमंत्री आनंदीबाई पटेल की सरकार उसी तरह का अलोकतांत्रिक कदम उठा रही है जिस तरह का खालिस्तान आंदोलन के समय इंदिरा गांधी की सरकार ने उठाया था. आनंदीबाई पटेल को आपातकाल की तरह के कदम उठाने में कोई हिचक नहीं हो रही है क्योंकि उन्हें डर है कि अगर यह आंदोलन पनप गया तो गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की गद्दी हिल सकती है. आनंदीबाई और नरेंद्र मोदी ने हार्दिक पटेल को जेल में डाल दिया है. अक्तूबर से जेल में बंद हार्दिक पटेल को विभिन्न अदालतों से छूट नहीं मिल रही. चूंकि पटेल जाति के लोग अभी तक हरियाणा के जाटों, आंध्र प्रदेश के कापुओं और राजस्थान के गुर्जरों की तरह मरनेमारने को तैयार नहीं है, इसलिए पटेल आंदोलन को काबू में करना सरकार के लिए आसान हो रहा है. शायद यह महात्मा गांधी की विरासत है कि गुजरात के पटेल भी आमतौर पर शांतिप्रिय हैं.

पर इस का अर्थ यह नहीं कि सरकार इंटरनैट और मोबाइल सेवाएं बंद कर के सूचना के आदानप्रदान पर कर्फ्यू लगा सकती है. आंदोलनकारी एकदूसरे को भड़का न सकें. इस के लिए सरकार के पास इंटरनैट या मोबाइल को बंद करने का अगर कानूनी हक है तो भी उसे असंवैधानिक माना जाना चाहिए. किसी भी सरकार को चाहे वह कश्मीर की हो, गुजरात की हो या हरियाणा की, दंगों को भड़कने से रोकने के लिए प्रैस, टैलीविजन, इंटरनैट, मोबाइल आदि को बंद करने का हक नहीं है. संवाद के ये तरीके मानव के अब मौलिक अधिकार हैं और एक तरह से संविधान से भी ऊपर हैं. किसी भी सरकार, चाहे तानाशाही क्यों न हो, को इन अधिकारों को छीनने का हक नहीं है. इन अधिकारों को छीनना असल में मानसिक हत्या के रूप में माना जाना चाहिए. यह एक तरह का नरसंहार है जो अंतर्राष्ट्रीय अपराध है और भारत भी इंटरनैशनल कोर्ट औफ क्रिमिनल जस्टिस का सदस्य है. ऐसे में गुजरात सरकार के खिलाफ इस तरह के अपराध का मुकदमा चलना चाहिए.

आज का विश्व नागरिक केवल देश के स्थानीय कानूनों से बंधा नहीं रह सकता. कोई सरकार ऐसे कानून नहीं बना सकती जो उस के अपने नागरिकों के जीने के पूर्ण अधिकार छीने. इंटरनैट और मोबाइल सेवाएं केवल आनंद लेने के लिए नहीं हैं, जीनेमरने के माध्यम भी हैं. लोगों ने हजारों मील जा कर काम करना शुरू कर दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि वे तो एक तरह से इंटरनैट और मोबाइल के जरिए 2 तल्ले के मकान में केवल ऊपरनीचे रह रहे हैं. सत्ता हाथ से निकलते दिखेगी तो भाजपा सरकारें क्याक्या कर सकती हैं, गुजरात में क्या इस बात का ट्रेलर दिखाया जा रहा है?

कानून का अड़ंगा

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का कहना है कि संविधान की भावना व आत्मा के विरुद्ध आज भी देश के दंड विधान में 295ए जैसा प्रावधान होना अनुचित है जिस के नाम पर धर्म को थोपने का अधिकार मिला हुआ है. इस धारा का उपयोग आजकल दूसरे धर्मों के लोगों को एकदूसरे के प्रति कटु बात कहने को रोकने के लिए तो किया ही जाता है, अपने धर्म में सुधार की बात न करने के लिए भी कर लिया जाता है. यह प्रावधान किसी भी थाने में शिकायत करने से हरकत में आ जाता है और हमारी अधसड़ी पुलिस समाज सुधार के वक्तव्यों व लेखन की जांच करने के बहाने वक्ता या लेखक को बंद कर के उस से चोरडकैतों व हत्यारों की तरह की पूछताछ करने लगती है.

ज्यादा अफसोस की बात यह है कि हिंदू व मुसलिम दोनों ही धर्मों के कट्टरवादी दुकानदार अपने धर्मों की खामियों को छिपाने के लिए इस प्रावधान का जम कर उपयोग करते हैं और जब भी दुरुपयोग होता है, आमतौर पर राजनीतिबाज मुंह फेर लेते हैं ताकि वोटबैंक वाले इस मामले में दखल न देना पड़े. वक्ता या लेखक को खुद पुलिस और अदालतों से निबटना होता है. यदि न्यायाधीश उदार हुए तो बात दूसरी, लेकिन यहां तो सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे न्यायाधीश बैठे हैं जो 295ए को ईशनिंदा वाला कानून मानते हैं. हाल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दिए गए कई बयानों पर दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त बी एस बस्सी ने खुलेआम कह दिया कि ये बयान व नारे ईशनिंदक हैं और अपने ही धर्म वालों की भावनाओं को आहत करते हैं. जबकि यह कानून ज्यादा से ज्यादा विधर्मियों के लिए है.

असल में यह कानून हिंदू और मुसलिम दोनों के लिए बहुत काम का है क्योंकि धर्मों ही नहीं, धर्मगुरुओं की पोल खोलने से रोकने में इस का जम कर उपयोग किया जाता है. देश में असहिष्णुता कानूनों से लागू की जाती है. सलमान रुशदी की ‘द सैटेनिक वर्सेस’ को मुसलिम नेताओं के कहने पर, इस प्रावधान के हवाले से, ईशनिंदक कहा गया था. देश में जाति को ले कर जो हंगामा मचा हुआ है उसे जानने के लिए, परखने के लिए, समझने के लिए हिंदू धर्मग्रंथों को खंगालना जरूरी है, हिंदू रीतिरिवाजों को जांचना जरूरी है. पर इस प्रावधान के कारण यह नहीं हो पा रहा है. नतीजतन, 295ए से संरक्षित जमीन पर जातिवाद के जहरीले पौधे उग ही नहीं रहे, बुरी तरह फैल भी रहे हैं.

अमर्त्य सेन को व्यावहारिक कठिनाइयों का कितना पता है, मालूम नहीं पर उन्होंने कम से कम चेताया तो है. वरना हमारे अधिकांश लेखकसंपादक स्वधर्म आलोचना को सामाजिक, नैतिक व आपराधिक मानते हैं क्योंकि आलोचना दरअसल उस भ्रमजाल को तोड़ती है जिस में जीने के हम आदी हो चुके हैं.

हमारे यहां कोई तानाशाही नहीं है: आनंद एल राय

बॉलीवुड में अक्सर निर्देशकों की शिकायत होती है कि उन्हें निर्माता के असहनीय दबाव में काम करना पड़ता है. और यदि फिल्म का निर्माता चर्चित निर्देशक हो तो बेचारा निर्देशक  कुछ ज्यादा ही असहाय सा हो जाता है.‘तनु वेड्स मनु’, ‘रांझणा’’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ जैसी सफलतम फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय की गिनती एक बेहतरीन रचनात्मक व सुलझे हुए इंसान के रूप में की जाती है. इन दिनों वह बतौर निर्माता व क्रिएटिव डायरेक्टर फिल्म ‘मनमर्जियां’ का निर्माण कर रहे हैं. जिसका निर्देशन समीर शर्मा कर रहे हैं.

इस फिल्म में आयुष्मान खुराना के साथ भूमि पेडणेकर की जोड़ी है. ऐसे में सवाल उठता है कि उनकी तरफ से सामने वाले निर्देशक पर कितना दबाव होता है? और जब यही सवाल हमने आनंद एल राय से किया, तो आनंद एल राय ने कहा-‘‘जैसा कि मैंने अभी कहा कि निर्देशक के तौर पर मैं कभी किसी का दबाव सहन नहीं करता. उसी तरह निर्माता के तौर पर मैं किसी भी निर्देशक पर दबाव नहीं बनाता. मैं यहां पर एक ऐसा प्लेटफार्म तैयार करना चाहता हूं, जहां एक निर्देशक का अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस हो और निर्देशक बिना दबाव के काम करते रहें. हमारे यहां कोई तनाशाही नही है. मेरी सोच यह है कि हम आपस में बैठकर चाय पीते हुए किसी सही व सटीक हल पर पहुंच जाएंगे. मेरा सपना है कि निर्देशक के तौर पर आप अपनी पसंद की फिल्में बनाएं.’’

यानी कि आनंद एल राय का दावा है कि उनकी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ‘‘एलो कलर्स प्रोडक्शन’’ में तानाशाही वाला रवैया नही है. मगर फिल्म ‘मनमर्जियां’ को लेकर कई तरह की खबरें फैली हुई हैं. चर्चा है कि फिल्म का पहला शिड्यूल खत्म होने के बाद आंनद एल राय के कहने पर इसे रीशूट किया गया. पर फिल्म जिस तरह से बनी है, उससे आनंद एल राय संतुष्ट नहीं हैं. इसलिए उन्होंने ‘मनमर्जिया’ के निर्देशक समीर शर्मा को हटा दिया है.

जब हमने यह बात आनंद एल राय के समक्ष रखी, तो आनंद एल राय ने बड़े शांत स्वभाव व विनम्रता के साथ कहा-‘‘आपने बहुत सटीक सवाल किया है. मैं पूरी घटना बता देता हूं. इस फिल्म का निर्देशन समीर शर्मा कर रहे थे, जो कि मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे. वह आज भी मेरे अच्छे दोस्त हैं. मैं आज भी उन्हें एक अच्छा निर्देशक मानता हूं. वह मेरे पास एक कथा लेकर आए. तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए. सब कुछ तय हो गया. कलाकार भी तय हो गए. जब फिल्म का पहला शिड्यूल पूरा हुआ, तो मुझे अहसास हुआ कि फिल्म जिस तरह से बननी चाहिए थी, उस तरह से नहीं बनी है.”

वे आगे कहते हैं कि, “हमने इस मसले पर आपस में बैठकर बातचीत की. उसके बाद फिर दो चार दिन शूटिंग हुई. पर हमें अहसास हुआ कि बात बन नहीं रही है. कई बार ऐसा होता है कि कहानी, निर्देशक, कलाकार सभी बहुत अच्छे होते हैं, पर कहीं न कहीं लगता है कि कहानी सिमट नहीं रही है. मतलब सब कुछ सही होते हुए भी जो ‘सुर’ मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है.‘मनमर्जियां’ के साथ भी वही स्थिति बनी हुई है. मैंने सोचा कि इस फिल्म के साथ जुड़े सभी लोग अच्छे हैं. कहानी भी अच्छी है. पर यह फिल्म जिस ढंग से बन रही है, वैसे बन गयी, तो यह, वह फिल्म नहीं होगी, जो हम बनाना चाहते हैं. अतः हम लोगों ने शूटिंग रोक कर इस स्थिति पर विचार विमर्श करने के लिए समय लिया. एक दिन समीर शर्मा ने मुझसे कहा कि अब इस फिल्म को आगे मैं अपने हिसाब से निर्देशित करूं. और वह दूसरी फिल्म पर काम करना चाहते हैं. समीर शर्मा आपसी सहमति से खुद को इस फिल्म से अलग कर दूसरी फिल्म पर काम करने जा रहे हैं. यह सारा निर्णय दो रचनात्मक लोगों की आपसी बातचीत का रहा. कहीं कोई विवाद या तानाशाही का मसला नही है.’’

तो इस अनुभव के साथ यह बात उभरती है कि क्या हर कहानी हर निर्देशक के लिए उपयुक्त नहीं होती है? इस सवाल पर आंनद एल राय ने कहा-‘‘बिल्कुल यही बात सामने आती है. कई बार ऐसा हुआ है कि मैं कहानी सुनता हूं, मुझे कहानी बहुत पसंद आती है. पर मुझे खुद लगता है कि इस कहानी पर काम नहीं कर पाउंगा. पर मैं उस फिल्म को देखना जरूर चाहूंगा. मैंने फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ देखी और बहुत इंज्वॉय किया. पर यदि यह फिल्म मुझे बनाने को दी जाती, तो इस अंदाज में न बना पाता, जिस अंदाज में संजय लीला भंसाली ने बनायी है. मैं यदि इसे बनाता तो वह किस तरह की फिल्म बनती कह नहीं सकता. कई बार हमने देखा है कि बहुत अच्छी पटकथा पर बनी फिल्म भी अच्छी बनकर नहीं निकलती है. तो हमें सतर्क रहने की जरूरत है. मेरी राय में फिल्म सफल या असफल नहीं होती. बल्कि फिल्म एक इंसान के वीजन से निकलनी चाहिए. फिल्म किसी भी एक इंसान के वीजन से ना निकली हो, तो वह तकलीफ ही देती है.’’

महिलाएं अपना आसमान खुद तलाश लेंगी

स्वतंत्रता के इन 69 वर्षों के दौरान भारतीय नारी ने अपने स्तर पर हर क्षेत्र में सफलता हासिल की है. यों तो शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अशिक्षा का स्तर ज्यादा है और अगर शिक्षित नारी की शिक्षित पुरुष से तुलना की जाए तो वह उन से कहीं आगे है. मगर हालिया नतीजे बताते हैं कि महिलाएं अब शिक्षा के प्रति जागरुक है. अक्सर हम पत्रपत्रिकाओं और अखबारों में पढ़ते रहते हैं कि हाईस्कूल परीक्षा परिणाम में छात्राओं ने बाजी मारी, आईआईटी परीक्षा परिणाम में छात्र सर्वप्रथम, आईएएस टौपर बनी दिल्ली की छात्रा आदि से मिलता रहा है.

दरअसल पढ़ाई में दिनोंदिन सफलता के कीर्तिमान बना रही महिलाओं को यह मुकाम उन की मेहनत और लगन से प्राप्त हो रहा है. अभी हाल ही में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा 2015 के परिणाम के नतीजे घोषित हो गए हैं. इन नतीजों में कुल 1078 कैंडीडैट्स पास हुए हैं. पर यहां भी एक महिला ने टौप कर के जता दिया कि आज की महिला वास्तव में जागरूक हो चुकी है.

महिलाओं की उपलब्धियां सिविल सेवा परीक्षा में

भोपाल में जन्मी और दिल्ली में रहने वाली टीना ढाबी ने सिविल सेवा परीक्षा में पूरे देश में पहला स्थान प्राप्त कर महिलाओं का सिर ऊंचा कर दिया है. सब से बड़ी बात टीना ने पहले ही अटेंप्ट में यह परीक्षा क्लीयर कर ली. इस अटेंप्ट के पीछे उन की जो तपस्या है वह उन की 9 सालों की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है. सिर्फ 22 साल की उम्र में टौप कर के अब टीना ढाबी लड़कियों के लिए रौल मौडल बन गई हैं.

महिलाओं की उपलब्धियां

वाराणसी की अर्तिका शुक्ला ने 25 साल की उम्र में सिविल सेवा परीक्षा में सफलतापूर्वक चौथा स्थान प्राप्त किया है. अर्तिका अपनी प्रेरणा का स्रोत स्वर्गीय राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को मानती हैं. उन का मानना है कि वह गरीबों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अथक प्रयास करेंगी.

वहीं 29 वर्षीय झांसी की एसपी सिटी आईपीएस गरिमा सिंह का भी चयन हुआ उन की 55वीं रैंक है. इस से पहले वह राजधानी लखनऊ में ट्रेनिंग के दौरान अलीगंज क्षेत्र की सीओ के पद पर तैनात थी. आईपीएस जौब के दौरान ही उन्होंने आईएएस की परीक्षा पास की. गरिमा का मानना है कि टाइम मैनेजमैंट सब से इंपौटेंट है अपनी कैपिसिटी डेवलैप करें, धैर्य रखें और योजनाबद्ध तरीके से पढ़ाई करें.

रायबरेली निवासी वत्सला गुप्ता ने अपने तीसरे प्रयास में 173 रैंक प्राप्त किया है. वत्सला को अपने 3 साल की मेहनत के बाद औल इंडिया रैंक में 173वां स्थान प्राप्त किया है. इन का मानना है कि सफलता के लिए सब से जरूरी है हार्डवर्क और अपने कैरियर में पैशन बनाए रखना, पढ़ाई को बोझ नहीं समझा.

हौसलों की उड़ान

इतिहास गवाह है कि महिलाएं हर वो काम कर सकने में सक्षम हैं जो पुरुष कर सकते हैं महिलाओं के कदमकदम पर मानव समाज की समृद्ध में योगदान दिया है. सदियों से ही समाज में महिलाएं कई क्षेत्रों में आगे आई हैं और आज निश्चय ही आधुनिक समाज के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाने वाली महिलाओं की तादात बढ़ रही है. एक अबला भी छिव से निकल कर एक सबला के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो चुकी है प्रगति का कोई ही शिखर बचा होगा, जहां आज की नारी न पहुंची हो. महिलाएं अपने प्रयास और प्रयत्न में पीछे नहीं हैं.

छोटे शहर की लड़की (अंतिम भाग) : क्या पूजा विनोद को मना पाई

Hindi Kahani: पूर्व कथा :

शर्मीले विनोद और निर्भीक व तेजतर्रार पूजा की दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदलती चली गई. वे दोनों रोज खेतों में घूमतेफिरते, साथ समय बिताते. लेकिन परीक्षा परिणाम घोषित होते ही विनोद को उस के पिता ने आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने का आदेश दे दिया. यह सुन कर पूजा बहुत उदास हो गई और विनोद को दिल्ली न जाने के लिए मनाती रही.

अब आगे…

विनोद दिल्ली चला गया. समय का पहिया दूसरी तरफ घूम गया. पूजा को विनोद से बिछुड़ने पर बहुत दुख हुआ, परंतु वह कर भी क्या सकती थी. उस ने विनोद से वचन लिया था कि वह नियमित रूप से उसे फोन करता रहेगा. कुछ दिन तक उस ने यह वादा निभाया भी, परंतु धीरेधीरे उस के फोन करने में अंतराल आता गया. इस का कारण उस ने बताया था दिन में कालेज अटैंड करना, शाम को कोचिंग क्लास और फिर रात में पढ़ाई… ऐसे में उसे वक्त ही नहीं मिलता. यूपीएससी की परीक्षा पास करना कोई आसान काम नहीं था. रातदिन की मेहनत से ही इस में सफलता प्राप्त हो सकती थी. प्यार के चक्कर में वह अपने लक्ष्य से भटक सकता था. पूजा ने कहा था, ‘‘प्यार मनुष्य को अपना लक्ष्य प्राप्त करने की ताकत देता है, उसे भटकाता नहीं है.’’

‘‘मैं मानता हूं, परंतु केवल प्यार के बारे में सोच कर किसी परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती. इस के लिए आंखें फोड़नी पड़ती हैं.’’

‘‘तुम मुझ से दूर जाने के लिए बहाना तो नहीं बना रहे?’’ उस के मन में शंका के बादल उमड़ आए. ‘‘नहीं, परंतु तुम मेरी तैयारी में बाधा न उत्पन्न करो, यह तुम्हारा मुझ पर एहसान होगा,’’ उस ने सख्त स्वर में कहा था. पूजा का दिल विनोद की बात से बैठने लगा था. पूजा समझती थी कि उस से दूर जाने के बाद विनोद उस के दिल से भी दूर हो गया था. दिल्ली जा कर किसी और लड़की के चक्कर में पड़ गया होगा, इसीलिए उस की उपेक्षा कर रहा था और उस से संबंध तोड़ने के लिए इस तरह के बहाने बना रहा था. ऐसी स्थिति में हर लड़की अपने प्रेमी के बारे में इसी तरह की सोच रखती है. इस में पूजा का कोई दोष नहीं था.

वह रोज दीप्ति के पास आती, उस के साथ विनोद की बातें करती और अपने मन को सांत्वना देने का प्रयास करती कि एक दिन जब विनोद लौट कर आएगा तो इतने दिनों की दूरियों का सारा हिसाब चुकता कर लेगी. उसे इतना प्यार करेगी कि वह दोबारा दिल्ली जाने का नाम नहीं लेगा. ‘‘क्या वह रोज घर में फोन करता है?’’ उस ने दीप्ति से पूछा था.

‘‘नहीं, रोज नहीं करता. हम ही फोन कर के उस का हालचाल पूछ लेते हैं,’’ दीप्ति ने सहज भाव से बताया. ‘‘मुझे भी फोन नहीं करता. कहीं वह किसी और को प्यार तो नहीं करने लगा?’’

‘‘क्या पता?’’ दीप्ति ने मुंह बिचका कर कहा. पूजा दीप्ति का मुंह ताकती ही रह गई. दीप्ति को अभी किसी से प्यार नहीं हुआ था न, इसलिए वह पूजा के दिल का दर्द नहीं समझ पा रही थी. दीप्ति पूजा के मन को समझती थी, परंतु उस के हाथ में था भी क्या? वह नहीं जानती थी कि किस तरह से पूजा के मन को तसल्ली दे. इस बारे में उस की भैया से कोई बात नहीं होती थी. उस से जब भी बात होती थी, मम्मीपापा पास में होते थे. फिर भी एक दिन चोरी से उस ने पूजा की विनोद से बात कराई थी. उस ने बात तो की, परंतु बाद में कह दिया कि फोन कर के उसे डिस्टर्ब मत किया करे, पढ़ाई का हर्ज होता है और पूजा मन मसोस कर रह गई.

विनोद दीवाली में घर आया था, परंतु पूजा से एकांत में मुलाकात नहीं हो सकी. दीप्ति ने भैया से कहा, ‘‘भैया, एक बार पूजा से मिल तो लो.’’ उस ने दीप्ति को अर्थपूर्ण निगाहों से देखते हुए कहा, ‘‘मिल लूंगा, परंतु तुम उस के लिए परेशान न हो,’’ और बात आईगई हो गई.

फिर वह होली पर घर आया और उसी प्रकार पूजा से बिना मिले ही चला गया. पूजा उस के घर आती थी, परंतु दोनों एकांत में नहीं मिल पाते थे. विनोद कोई न कोई बहाना बना कर उस से दूर रहता था. पूजा ने उसे घेरने की कोशिश की तो उस ने निरपेक्ष भाव से कहा, ‘‘पूजा, मैं जब गरमी की छुट्टियों में आऊंगा तो तुम से रोज मिला करूंगा. अभी मुझे अकेला छोड़ दो.’’ उस ने मान लिया.

गरमी की छुट्टियों में मिलते ही पूजा ने पहला सवाल किया, ‘‘तुम बदल गए हो?’’ ‘‘नहीं तो…’’ उस ने बात को टालने वाले अंदाज में कहा.

‘‘नहीं, क्या… मैं देख नहीं रही? तुम अब पहले जैसे भोले नहीं रहे. इधर मैं तुम्हारे प्यार में संजीदा हो गईर् हूं. अपनी सारी चंचलता मैं ने खो दी, परंतु तुम दिल्ली जा कर मुखर ही नहीं चंचल भी हो गए हो. यह तुम्हारे हावभाव से ही दिख रहा है.’’ ‘‘आदमी समय के अनुसार बदल जाता है. इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं है.’’

‘‘मुझे आश्चर्य नहीं है, परंतु आश्चर्य तब होगा, जब तुम मेरे प्यार को भुला दोगे. यह भी भुला दोगे कि मैं ने तुम्हें प्यार करना सिखाया था वरना कोई लड़की तुम्हें घास न डालती और अगर तुम कोशिश भी करते तो भी कोई लड़की तुम्हारे फंदे में नहीं फंसती,’’ उस ने कुछ चिढ़ कर कहा. ‘‘तुम छोटे शहर की लड़कियों की यही गंदी सोच है. इस के आगे तुम कुछ सोच ही नहीं सकती. सभी लड़कों को तुम बुद्धू और भोंदू समझती हो. तुम सोचती हो कि लड़कों से प्यार कर के तुम उन के ऊपर एहसान कर रही हो, क्योंकि लड़के इस लायक ही नहीं होते कि वे किसी लड़की को प्यार कर सकें या कोई लड़की उन के ऊपर अपना प्यार लुटा सके. तुम्हें अपने रूप पर घमंड जो होता है.’’

पूजा विनोद की बातों से आहत हो गई, ‘‘मैं ऐसा नहीं सोचती, परंतु तुम से सच कहती हूं. एक दिन इसी बात को ले कर मेरी सहेलियों से शर्त लगी थी.’’ ‘‘क्या शर्त लगी थी?’’ उस ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘महल्ले की सारी लड़कियां तुम्हें भोंदू और बुद्धू कहती थीं. वे तुम्हें ले कर मजाक करती रहती थीं कि यह मिट्टी का माधो कभी किसी लड़की को प्यार नहीं कर सकेगा. पहली बात तो यह कि कोई लड़की ही तुम्हें प्यार नहीं करेगी और किसी का मन तुम पर आ भी गया तो भी तुम लड़की को अपने प्यार में बांध नहीं पाओगे.’’ ‘‘तो फिर.’’

‘‘मैं ने इस चुनौती को स्वीकार किया था, क्योंकि मैं मन ही मन तुम्हें प्यार करने लगी थी. मुझे तुम्हारी सादगी और भोलापन पसंद था. अन्य लड़कों की तरह तुम में कोई छिछोरापन नहीं था और तुम उन की तरह लड़कियों के पीछे नहीं भागतेफिरते थे, इसलिए मैं ने तय किया कि मैं तुम्हारा प्यार पा कर रहूंगी. मैं ने उन से कहा था कि विनोद एक दिन मेरे प्यार में पागल हो जाएगा, परंतु अब मुझे ऐसा नहीं लगता. जब तक तुम दिल्ली नहीं गए थे, मुझे लगता था कि तुम भी मुझ से प्यार करने लगे हो और सहेलियों से मैं ने बड़े फख्र से कहा था कि मैं ने तुम्हारा प्यार हासिल कर लिया है. परंतु लगता है, मैं अपनी शर्त हार गई हूं,’’ उस की आवाज भीग गई थी. विनोद हतप्रभ रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि वह पूजा से क्या कहे, उसे किस प्रकार सांत्वना दे और कैसे बताए कि वह उसे प्यार करता है, क्योंकि इस बारे में उसे स्वयं पर संदेह था. जबलपुर में रहते हुए विनोद पूजा को डरतेडरते प्यार करता था, जैसे कोई पूजा से जबरदस्ती प्यार करने के लिए कह रहा था. दिल्ली में एक साल रहने के बाद वह आजाद पंछी की तरह हो गया था और पूजा की गिरफ्त से उसे छुटकारा मिल गया था.

वह एक किताबी कीड़ा था और किताबों में ही उस का मन लगता था. लड़कियां उसे लुभाती थीं और वह उन्हें पसंद भी करता था. चोर निगाहों से उन की सुंदरता की प्रशंसा भी करता था, परंतु खुल कर किसी लड़की को पटाने का साहस उस के पास नहीं था. यही कारण था कि जबलपुर में भी पूजा ने ही पहल की थी और चूंकि उस के जीवन में आने वाली वह पहली लड़की थी, वह भी डरतेडरते उसे प्यार करने लगा था, परंतु एक बार दूर जाते ही उस के मन से पूजा का प्यार फूटे गुब्बारे की तरह हवा हो गया था.

फिर भी उन दोनों का मिलना जारी रहा. गरमी की लंबी छुट्टियां थीं. उस की एक साल की कोचिंग समाप्त हो गई थी, परंतु एमए का फाइनल ईयर था. उस ने यूपीएससी की सिविल सर्विसेज का फार्म भी भर रखा था, जिस की प्रारंभिक परीक्षा जुलाई में ही होनी थी. एमए की क्लासेज भी जुलाई में प्रारंभ होनी थीं, अत: उन दोनों के पास मिलने के लिए गरमी के ढेर सारे लंबेलंबे दिन थे और सोचने के लिए ढेरों छोटीछोटी रातें. कहना बड़ा मुश्किल था कि विनोद के मन में क्या था, परंतु पूजा को डर लगने लगा था. बरसात आने में अभी देर थी, परंतु उन के घरों के पीछे खेतों में किसानों ने मकई बो दी थी. उन के पौधे अब काफी बड़े हो गए थे. उन में भुट्टे भी आने लगे थे, परंतु उन के पकने में अभी देर थी. खेतों के बीच की कच्ची सड़क पर घूमना पूजा को अच्छा लगता था. वह जिद कर के विनोद को उधर ले जाती थी. खेतों के बीच का वह पेड़ जिस के नीचे बैठ कर वे दोनों चोरी से भुट्टे तोड़ कर खाते थे, उन के मिलन के प्रारंभिक दिनों का गवाह था. वह अपनी जगह पर निश्चल खड़ा था. वे लड़कियां भी जो उन्हें प्यार से भुट्टे भून कर खाने के लिए देती थीं, अपनेअपने खेतों की रखवाली के लिए आने लगी थीं और उन दोनों को देख कर मंदमंद मुसकराती थीं.

अभी भुट्टे पके नहीं थे और पूजा को लगने लगा था कि अभी उन के प्यार में भी परिपक्वता नहीं आई. सुस्ताने के लिए वे पेड़ की छाया तले बैठे तो पूजा ने कहा, ‘‘तुम्हारे सपने बड़े हो गए हैं.’’ ‘‘फिलहाल तो मेरा एक ही सपना है, आईएएस बनना और जब तक यह सपना पूरा नहीं हो जाता, मेरे लिए बाकी सभी सपने बहुत छोटे हैं.’’

‘‘आसमान से भी ऊंचे सपने व्यक्ति देख सकता है, परंतु न तो वह आसमान में उड़ सकता है, न आसमान में घर बना कर रहना उस के लिए संभव है. तो क्या तुम इस छोटे शहर से अलग हो गए?’’ ‘‘नहीं, परंतु यहां मेरे सपनों के लिए कोई जगह नहीं है,’’ उस ने साफ किया.

‘‘क्या प्यार के लिए भी नहीं…’’ ‘‘प्यार तो समय और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है.’’

‘‘तुम बहुत कठोर हो.’’ ‘‘हो सकता है.’’

‘‘पहले तो ऐसे नहीं थे.’’ ‘‘पहले मैं छोटे शहर में रहता था और यहां की लड़कियां मुझे डराती थीं.’’

‘‘तो तुम ने डर कर मुझ से प्यार किया था? लेकिन अब तुम बड़े शहर में रहते हो. वहां की लड़कियां तो छोटे शहर की लड़कियों से भी अधिक तेज होती हैं. क्या वहां की लड़कियों से तुम्हें डर नहीं लगता?’’ ‘‘लड़कियों से मुझे डर नहीं लगता, बस उन के प्यार से डर लगता है.’’

‘‘तो तुम मुझे प्यार नहीं करते?’’ ‘‘शायद… मुझे संदेह है,’’ उस ने पूजा की भावनाओं की परवा न करते हुए स्पष्ट रूप से कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझे छोड़ दोगे?’’ वह लगभग रोंआसी हो गई थी. ‘‘मुझे मेरा सपना पूरा करने दो. उस के बाद ही मैं कुछ कह पाऊंगा. अभी मेरे और मेरे सपनों के बीच में और कुछ नहीं है.’’

‘‘पूजा का दिल टूट गया. उसे लगा कि सबकुछ समाप्त हो गया है.’’ छुट्टियां भी एक दिन समाप्त होनी थीं. पूजा हताश और निराश हो गई थी. उस ने विनोद के घर आना बंद कर दिया था. उस से फोन पर भी बात नहीं करती थी और

न उस से बाहर मिलने के लिए जिद करती थी.

दिल्ली जाने से एक दिन पहले विनोद ने पूजा को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’ ‘‘कुछ नहीं… मेरे पास करने के लिए है भी क्या?’’

‘‘तो फिर वहीं आ जाओ. जहां हम मिलते हैं.’’ ‘‘क्या जरूरी है, मेरा मन नहीं कर रहा है,’’ उस ने उपेक्षा जाहिर की.

‘‘बहुत जरूरी है, नहीं आओगी तो जीवनभर पछताओगी.’’ ‘पता नहीं क्या बात है‘, सोच कर पूजा मिलने के लिए आ गई. वह उदास थी, अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए वह उसे देखने लगी. विनोद मुसकरा रहा था. पूजा को उस की मुसकराहट का भेद समझ में नहीं आया. विनोद ने बेझिझक उस के कंधों पर हाथ रख दिया और उसे लगभग अपनी तरफ खींचता हुआ बोला, ‘‘तुम बहुत दुखी हो.’’

वह कुछ नहीं बोली. उस ने अपना एक हाथ उस के सिर के पीछे रख उस का सिर अपने सीने पर दबा लिया और उस के बालों को सहलाते हुए बोला, ‘‘स्वाभाविक है, मेरी तरफ से तुम्हारा मन उचट गया हो, परंतु मैं भी क्या करता? एक डरपोक लड़के को तुम ने प्यार किया. मैं तुम्हारे लायक नहीं था. मैं एक किताबी कीड़ा था और समझता था इन्हीं में मेरा जीवन है. जीवन में सपने देखने के सिवा मैं ने और कुछ नहीं किया. जब तुम ने मुझे प्यार किया तो मैं इतना डर गया था कि समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं. तुम्हारे प्यार में पड़ कर कहीं मेरे सपने चकनाचूर न हो जाएं. इसी असमंजस में दिन गुजर रहे थे. दिल्ली गया तो लगा कि मेरा सपना मेरी पकड़ से बहुत दूर नहीं है, परंतु तुम्हारी यादें बीच में बाधा उत्पन्न कर रही थीं,’’ वह चुप हो कर अपनी सांसों को संयत करने लगा. पूजा ने अपना सिर उठा कर उस के चेहरे की तरफ देखा. ‘‘परंतु इन छुट्टियों में मेरे प्रति तुम्हारी दीवानगी और प्यार ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. मैं नहीं समझता कि जीवन में बिना प्यार के कोई भी सपना पूरा हो सकता है. मैं अपने चाहे जितने सपने पूरे कर लूं, वे सभी अधूरे रहेंगे, अगर मेरे जीवन में किसी का प्यार नहीं है. तुम्हारा अपने प्रति अटूट प्यार देख कर मेरा आत्मबल और विश्वास दोगुना हो गया है. मुझे लगता है कि तुम्हारा प्यार पा कर मैं अपना सपना जल्दी ही पूरा कर लूंगा. इस में ज्यादा दिन नहीं लगेंगे.’’

अब पूजा उस से अलग हो कर उस की तरफ तीखी नजरों से देखने लगी थी. विनोद की आंखों में प्रेम का गहरा समुद्र हिलोरें मार रहा था. पूजा का हृदय अनायास धड़क उठा, बिलकुल उसी तरह जिस प्रकार पहली बार विनोद के लिए धड़का था. ‘‘मैं ने तुम्हें बहुत सताया है,’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

उस का सिर नीचे झुक गया. वह सुबकने लगी. ‘‘आशा है, तुम मेरी बात का मतलब समझ गई होगी. मैं अधिक कुछ नहीं कह सकता. बस, एक बात पूछना चाहता हूं, क्या मेरा सपना पूरा होने तक तुम मेरा इंतजार कर सकती हो?’’

पूजा ने अपना मुंह उस के सीने में छिपा लिया और उस की पीठ पर अपनी बांहें कसती हुई बोली, ‘‘आज तुम ने मुझे पूरी तरह से जीत लिया. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. मैं छोटे शहर की लड़की हूं और सच्चे मन से तुम्हें प्यार करती हूं, तुम अपना सपना पूरा कर के आओ, फिर हम दोनों घर वालों की सहमति से विवाह कर के अपना घर बसा लेंगे.’’ विनोद ने भी उसे अपनी बांहों में कस लिया, ‘‘ऐसा मत कहो कि तुम छोटे शहर की लड़की हो. तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है.’’

‘‘तुम ने एक दिन कहा था कि छोटे शहर की लड़कियों की सोच ऐसी ही होती है. यह तुम्हारी बात का जवाब था.’’ ‘‘लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल छोटे शहर की लड़कियां ही सच्चा प्यार करती हैं. बड़े शहर की लड़कियां भी अपने प्रेमियों का इंतजार करती हैं. प्रेम सच्चा हो, तो सब कुछ संभव है. हां, जीवन का बड़ा सपना केवल बड़े शहरों में ही पूरा होता है, परंतु प्यार का सपना तो कहीं भी, किसी भी जगह पूरा हो सकता है.’’

‘‘सचमुच… आज मैं इस बात को समझ गई हूं. तुम ने मेरे सारे भ्रम दूर कर दिए.’’ ‘‘और मेरे मन से भी सारी दुविधाएं दूर हो गई हैं. मुझे पूरी आशा है कि मेरे दोनों सपने… आईएएस बनने का और तुम से शादी करने का… जल्दी ही पूरे हो जाएंगे. फिर तुम्हें ज्यादा दिन तक विरह के आंसू नहीं बहाने होंगे.’’

…और उन के मन में हजारों दीपक जल कर मुसकराने लगे, जिन का प्रकाश चारों तरफ फैल गया. Hindi Kahani

प्रो कबड्डी लीग नीलामी, मालामाल हुए ये खिलाड़ी

प्रो कबड्डी लीग (PKL) के आगामी चौथे सीजन के लिए आयोजित खिलाड़ियों की नीलामी में डिफेंडर मोहित छिल्लर के लिए सबसे बड़ी बोली लगी. नॉर्थ ईस्ट रेलवे में क्लर्क के पद पर काम करने वाले इस प्लेयर के लिए बंगलुरु बुल्स ने 53 लाख रुपये खर्च कर दिए. 2014 में मोहित की कमाई की यह नौ गुना कीमत है. उन्हें दूसरे सीजन की चैंपियन यू मुंबा से खरीदा गया. छिल्लर को 2014 में पहले सीजन के लिए हुई नीलामी में 5.75 लाख रुपये में खरीदा गया था.

आठ टीमों की नीलामी में प्रत्येक को पिछले तीन सत्र से जुड़े प्लयेर्स में से केवल दो को बरकरार रखने की अनुमति थी. राजधानी से 30 किमी दूर निजामपुर गांव के छिल्लर ने कहा, 'मैं बहुत खुश हूं. मुझे इतनी कीमत मिलने की उम्मीद नहीं थी. मैंने सोचा था कि मैं 35 से 40 लाख के बीच में बिकूंगा.'

तीसरे सीजन की चैंपियन पटना पायरेट्स के संदीप नारवाल को 45.5 लाख रुपये में खरीदा, जबकि यू मुंबा ने ग्रुप-ए खिलाड़ियों की बोली के दौरान जीवा कुमार को 40 लाख रुपये में खरीदकर सभी को चौंका दिया. जीवा की बेस प्राइस 12 लाख रुपये थी.

नीलामी में पाकिस्तानी प्लेयर मोहम्मद रिजवान की भी बोली लगी. उन्हें तेलगु टाइटंस ने खरीदा. प्रो कबड्डी लीग के चौथे सीजन का आयोजन 25 जून से 31 जुलाई तक होगा, जिसके पहले दौर के मैच पुणे में जबकि दो सेमीफाइनल और फाइनल हैदराबाद में होंगे.

ग्रुप ए से अन्य नीलामी

पुणेरी पल्टन के जसमेर सिंह गुल्ला को 35.5 लाख रुपये में तेलुगू टाइटंस ने खरीदा. जयपुर पिंक पैंथर्स के कुलदीप सिंह को 30.4 लाख में पटना पाइरेट्स ने खरीदा. यू मुंबा के सुरेंद्र नाडा 30 लाख में बंगलुरु बुल्स की टीम में गए. धर्मराज चेरालाथान को 29 लाख में पटना पाइरेट्स ने तेलुगू टाइटंस से खरीदा.

यू मुंबा ने राकेश कुमार को 26 लाख में अपने पास बरकरार रखा. बंगाल वॉरियर्स के बाजीराव होडागे को पटना पाइरेट्स ने 20 लाख में अपने साथ जोड़ा. पुणेरी पल्टन ने अजय ठाकुर को 19 लाख रुपये में बरकरार रखा.

किसने ठोका सनी लियोनी पर मानहानि का मुकदमा?

टीवी शो ‘बिग बॉस’ सीजन 5 की प्रतिभागी और मॉडल पूजा मिश्रा ने फिल्म स्टार सनी लियोन पर मानहानि का दावा किया है. पूजा ने सनी लियोन के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर 100 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है.

सनी ने पूजा के खिलाफ दिया इंटरव्यू

पूजा ने अपनी याचिका में दलील दी है कि वह टीवी शो ‘बिग बॉस’ सीजन 5 की एक लोकप्रिय प्रतिभागी थीं और सनी उस शो में काफी बाद में शामिल हुईं. उन्होंने आरोप लगाया कि सनी ने मीडिया के एक हिस्से को उसके खिलाफ इंटरव्यू दिया. पूजा के मुताबिक, इससे लोगों की नजर में उनकी इमेज खराब हुई है. इस वजह से उन्हें अपना फिक्स डिपोजिट तोड़ना पड़ा और अपनी सेविंग के पैसे निकालने पड़े, जिससे उन्हें 70 लाख रुपये तक नुकसान हुआ.

जून में हो सकती है याचिका पर सुनवाई

याचिकाकर्ता ने सनी लियोनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि) के तहत मुकदमा दर्ज कराया है. इस मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट में गर्मी की छुट्टियों के बाद जून में सुनवाई हो सकती है.

 

क्या आप भी स्मार्टफोन गर्म हो जाने से परेशान हैं?

स्मार्टफोन गर्म हो जाने की समस्या से निजात पाने के लिए आपको ज्यादा कुछ नहीं बस थोड़ी सी सावधानी बरतनी होगी. साथ ही कुछ बातें भी ध्यान रखनी होंगी जो आपको फोन के गर्म होने पर बिलकुल नहीं करनी चाहिए.

ढे़र सारी एप्स का इस्तेमाल

यदि आप अपने स्मार्टफोन में एक साथ कई सारी एप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह गलती आपके फोन की नहीं, आपकी है. क्योंकि हो सकता है आपका फोन ज्यादा लोड नहीं ले पाता हो, और इसीलिए फोन जल्दी गर्म हो जाता हो.

वाई फाई ऑफ कर दें

यदि आप अपने फोन में वाई-फाई का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो ऑफ कर दें. इससे भी कई स्मार्टफोन जल्दी गर्म हो जाते हैं.

भारी कवर्स

फोन की प्रोटेक्शन के लिए हमें केस या कवर का यूज करना. लेकिन ध्यान रहे कि आपका फोन कवर ज्यादा भारी न हो.

बैटरी का रखें ध्यान

स्मार्टफोन की पावर होती है उसकी बैटरी. जब बैटरी पुरानी हो जाती है तो अक्सर जल्दी गर्म होने लगती हैं. तो आप अपनी फोन की बैटरी को बदल कर ओवरहीटिंग की समस्या से बच सकते हैं.

चार्जिंग के समय फोन यूज

हम में से कई लोगों की आदत होती है कि वे 24 घंटे फोन पर लगे रहते हैं. यहां तक कि चार्जिंग के दौरान भी. लेकिन ऐसा करने से फोन ओवर हीट हो सकता है.

हैवी गेम्स

यदि आप अपने फोन में हैवी गेम्स रखते हैं, तो भी फोन जल्दी गर्म हो सकता है.

अगर आप हैं चैट के शौकीन तो आजमाएं ये एप

क्या आप अपने दोस्तों से घंटो चैट करते हैं, इनमें कुछ मैसेज ऐसे भी होते होंगे जो आप अपने पैरेंट्स को नहीं दिखाना चाहते होंगे और चैट के बाद मैसेज और पिक्स डिलीट करते होंगे. लेकिन अगर आपको ऐसी एप्लीकेशन मिले जिसमें चैट के बाद सारे मैसेज खुद-ब-खुद डिलीट हो जाएं तो कैसा रहेगा. जी हां! ये मुमकिन है स्नैपचैट के जरिए.

इस मोबाइल एप्लीकेशन की शुरुआत 2011 में हुई थी. स्नैपचैट के संस्थापक इवान स्पीगल हैं. आंकड़े बताते हैं कि स्नैपचैट ने वीडियो देखने के मामले में फेसबुक को पीछे छोड़ दिया है. आइए जानते हैं इससे जुड़े फैक्ट्स के बारे में:

1.यह ऐप 25 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए है. इस मोबाइल एप्लीकेशन में वीडियो चैट और एक दूसरे से फोटो भेजकर चैट कर सकते हैं. मजेदार बात यह है कि ये चैट कुछ पलों के बाद खुद-ब खुद डिलीट हो जाएगी. 

2. स्नैपचैट रियल टाइम नेचर इसे और भी खास बनाता है. रियल टाइम स्टोरीज, स्नैपचैट स्टोरी रियल टाइम में अपडेटेड होती हैं और अपनी लाइव तस्वीरों के जरिए यूजर्स दुनिया को दिखा सकता है कि वो उस क्षण कैसा महसूस कर रहा है.

3. स्नैपचैट के लाइव स्टोरीज फीचर के जरिए आप किसी बड़े सेमिनार पार्टी, पैनल सेशन को कवर कर सकते हैं. इस ऐप के जरिए आप एक सेशन को अटेंड कर दूसरे सेशन को किसी और के जरिए लाइव स्नैपचैट पर देख सकते हैं.

4. स्नैपचैट पर अब हर रोज 10 अरब वीडियो देखे जा रहे हैं. पिछले सात महीने में स्नैपचैट पर वीडियो देखने का आंकड़ा दोगुने से भी अधिक हो गया है.

5. स्नैपचैट के कंटेट को आप कम से कम समय के लिए देख पाते हैं इसका मतलब हुआ कि आप किसी भी विषय पर ज्यादा से ज्यादा जानकारी पा सकते हैं. इस तरह आप ट्वीट के स्क्रॉलिंग की आदत से बच सकते हैं.

6. वीडियो शेयरिंग वेबसाइट यू-ट्यूब की तरह ही स्नैपचैट ने भी एक सेकेंड से ज्यादा समय तक चलने वाले वीडियो को व्यू की श्रेणी में डाल दिया है. 

7. स्नैपचैट के लेटेस्ट वर्जन में एक रीप्ले का ऑप्शन होता है. जिससे आप पुरानी तस्वीरों को देख सकते हैं लेकिन यह सुविधा तस्वीरें देखने के बाद कुछ ही घंटे के लिए ही उपलब्ध होती हैं. उस समय-सीमा के बाद ये खुद-ब खुद डिलीट हो जाती हैं.

8. इस मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए आप टेस्क्ट और विडियो चैट भी कर सकते हैं.

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