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शूजीत से अनबन से जॉन अब्राहम का इंकार

इन दिनों बौलीवुड में खबरें गर्म हैं कि जॉन अब्राहम के लिए ‘‘विक्की डोनर’’ और ‘‘मद्रास कैफे’’ जैसी फिल्मों का सृजन करने वाले फिल्मकार शूजीत सरकार के साथ उनकी अनबन हो गयी है. जब से यह खबर बौलीवुड में फैली है, तब से लोग काफी आश्चर्य भी व्यक्त कर रहे हैं. पर इस तरह की खबरे फैलने की वजहें भी हैं. सर्वविदित है कि बतौर निर्देषक शूजीत सरकार की पहली फिल्म ‘‘यहॉं’’ 2005 में रिलीज हुई थी. उसके बाद उन्होने अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘‘श् बाइट’’ बनाने का असफल प्रयास किया. पर जब फिल्म ‘यहॉ’ के रिलीज होने के पूरे सात साल बाद 2012 में जॉन अब्राहम व शूजीत सरकार एक साथ आए, तो शूजीत सरकार ने जॉन अब्राहम के लिए सफलतम फिल्म ‘‘विक्की डोनर’’ निर्देशित की.

इसके बाद जॉन अब्राहम ने शूजीत सरकार के साथ मिलकर 2013 में फिल्म ‘‘मद्रास कैफे’’ का निर्माण किया, जिसका निर्देशन शूजीत सरकार ने ही किया था. इस फिल्म को काफी सराहा गया. इस फिल्म के बाद उम्मीद थी कि जॉन अब्राहम और शूजीत सरकार की जोड़ी कई बेहतरीन फिल्में लेकर आएगी. मगर अफसोस उसके बाद जॉन अब्राहम ने निशिकांत कामत के साथ हाथ मिलाया तो वहीं शूजीत सरकार ने अमिताभ बच्चन के साथ हाथ मिलाकर सफलतम फिल्म ‘‘पीकू’’ बना डाली.

इतना ही नहीं अब शूजीत सरकार और अमिताभ बच्चन मिलकर फिल्म ‘‘पिंक’’ का निर्माण कर रहे हैं. जिसकी शूटिंग हाल ही में दिल्ली में संपन्न हुई. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ तापसी पन्नू भी अभिनय कर रही हैं. तो क्या वास्तव में शूजीत सरकार और जॉन अब्राहम के रास्ते अलग हो गए हैं.

इस पर सफाई देते हुए जॉन अब्राहम ने कहा-‘‘शूजीत सरकार के साथ हमारे संबंधों में कोई फर्क नहीं आया है. मैं और शूजीत बेहद रोचक विषय पर काम कर रहे हैं, जिसके निर्माण की घोषणा हम बहुत जल्द करने वाले हैं. शूजीत सरकार मेरे बहुत करीब हैं. वह मेरे लिए परिवार जैसे हैं. मैं हमेशा उनसे कहता रहता हॅूं कि हमें एक साथ फिल्में बनाते रहना चाहिए. खैर ‘मद्रास कैफे’ से भी ज्यादा विस्फोटक और खास होगी हम दोनों की अगली फिल्म.’’

उन्होंने सच कहा था

पिछले 2-3 महीनों से श्रीमतीजी को न जाने व्हाट्सऐप का क्या शौक लगा है कि रातरात भर बैठ कर मैसेज भेजती रहती हैं. कभी अचानक नींद खुले तो देख कर डर जाएं कि वे हंस रही हैं. उस रात भी हम देख कर घबरा कर पूछ बैठे, ‘‘क्यों क्या बात है?’’

‘‘एक जोक आया है, गु्रप में शामिल हूं न तो फोटो और मैसेज आते रहते हैं. सुनाऊं?’’ श्रीमतीजी ने रात को 2 बजे उत्साहित स्वर में पूछा.

हम ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘सुना दो.’’

वे सुनाने लगीं. जब खत्म हो गया तो हम ने उत्साह बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बहुत बढि़या है.’’

‘‘एक प्रेरक कथा भी आई है. उसे भी सुनाऊं?’’ और फिर हमारी मरजी जाने बिना शुरू हो गईं. अचानक हमारी नींद खुली. श्रीमतीजी हमें झकझोर रही थीं. हम घबरा गए. पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘कहानी कैसी लगी?’’

‘‘कौन सी?’’

‘‘जो मैं सुना रही थी.’’

‘‘सौरी डियर हमें नींद आ गई थी.’’

‘‘मैं कब से पढ़पढ़ कर सुना रही थी,’’ कुछ नाराजगी भरे स्वर में श्रीमतीजी ने कहा.

‘‘डियर रात के 2 बजे इनसान सोएगा नहीं तो सुबह काम कैसे करेगा?’’ हम ने अपनी आंखें मलते हुए कहा.

‘‘तुम्हें अपनी श्रीमतीजी के द्वारा सुनाई जा रही कहानी की बिलकुल चिंता नहीं है,’’ वे कैकेई की तरह क्रोध धारण कर के बोलीं.

‘‘अच्छा, सुना दो,’’ कह कर हम उठ बैठे और वे बिना सिरपैर की कथा का मोबाइल पर देखदेख कर वाचन करने लगीं. 3 बजे तक हम जागे और सुबह कार्यालय लेट पहुंचे. हमें यह देख कर आश्चर्य हो रहा था कि जो श्रीमतीजी 2 माह पहले तक हम से बातचीत करती थीं. हमारे कार्यालय से लौट आने पर नाश्ते की, चाय की बातें करती थीं वे अचानक इतनी कैसे बदल गईं? हमेशा वे अपने मोबाइल पर बैठ कर न जाने किसकिस को मैसेज करती रहती थीं. नैट और मोबाइल का जो भी चार्ज लगता वह हमारी जेब से जा रहा था. अब तो नाश्ता भी हमें खुद निकालना पड़ता था. भोजन में वह पहले जैसा स्वाद नहीं रहा था. लगता था खानापूर्ति के लिए भोजन पका दिया गया है. हम अपना माथा ठोंकने के अलावा और कर ही क्या सकते थे?

हम ने जब अपनी सासूमां से यह बात शेयर की तो उन्होंने कहा, ‘‘बेबी को डांटना नहीं, बात कर के देख लें.’’ सासूमां के लिए हमारी प्रौढ श्रीमतीजी अभी तक बेबी ही थीं. खैर, हम ने विचार किया कि हम इस विषय पर चर्चा जरूर करेंगे. एक छुट्टी के दिन हम ने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘यह आप दिन भर इस स्मार्ट फोन में क्याक्या करती रहती हैं? आंखें खराब हो जाएंगी.’’

‘‘नहीं होंगी… एक काम करो न… आप भी यह ले लो और हमारे ग्रुप में शामिल हो जाओ… सच में हमारे दोस्तों का एक बहुत शानदार ग्रुप है. हम खूब मजे करते हैं. खूब बातें करते हैं… क्या आविष्कार बनाया गया है यह मोबाइल का… यह व्हाट्सऐप का?’’ श्रीमतीजी अपने में मगन कहे जा रही थीं. हम उन की बातें सुन कर अपना माथा ठोंकने के अलावा क्या करते. हम जब औफिस से लौटते तो वे हमें अपने आभासी मित्रों (जाहिर है महिला मित्रों) की ढेर सी बातें बतातीं. हम उन से कहते, ‘‘इस आभासी दुनिया में सब झूठे हैं.’’ लेकिन वे मानने को तैयार नहीं थीं. हमारा वैवाहिक जीवन पूरी तरह से बरबादी की ओर अग्रसर था. आखिर हम करें तो क्या करें? हमें कोई उपाय दूरदूर तक दिखाई नहीं दे रहा था.

शनिवार की रात को जब हम बिस्तर पर पहुंचे तो श्रीमतीजी ने बहुत प्रेम से हम से कहा, ‘‘जानते हो…?’’

‘‘क्या?’’

‘‘इस व्हाट्सऐप से बहुत अच्छे लोगों से मुलाकात, बातचीत, दोस्ती हो जाती है.’’

‘‘अच्छा?’’ हम ने कोई रुचि नहीं ली.

‘‘बहुत अमीर और बहुत पहुंच वाली महिलाओं से बातचीत हो जाती है,’’ श्रीमतीजी कहे जा रही थीं. हम चुप थे.

‘‘मैं ने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मेरे संसार में इतने सारे ग्रुपों में डेढ़ हजार दोस्तों की लिस्ट होगी.’’ ‘‘जिस के इतने दोस्त हों उस का कोई भी दोस्त नहीं होता. दोस्त तो मात्र जीवन में 1 या 2 ही होते हैं, समझीं?’’ हम ने चिढ़े स्वर में कहा.

‘‘आप तो जलते हो.’’

‘‘हम क्यों जलने लगे?’’

‘‘मेरे सब फ्रैंड अच्छे परिवारों से हैं और अमीर हैं.’’

‘‘तो हम क्या करें?’’ हम चिढ़ गए थे.

‘‘मैं तो एक विशेष बात आप को बता रही थी.’’

‘‘कैसी विशेष बात?’’ हमारे कान खड़े हो गए थे.

‘‘मेरी 2-3 सहेलियां कल मुझ से मिलने आ रही हैं. वे सब बहुत अमीर हैं.’’

‘‘तो हम क्या करें?’’

‘‘प्लीज, कल आप बाजार से शानदार नाश्ता ले आना. कुछ मैं बना लूंगी… जानते हो हम पहली बार मिलेंगी… वाह कितने रोमांचक होंगे वे क्षण जब एकदम अपरिचित सहेलियों से भेंट होगी.’’

‘‘वे कहां रहती हैं?’’

‘‘यहीं भोपाल की ही हैं.’’

‘‘अच्छा, तो कल उन की पार्टी है.’’

‘‘पार्टी ही समझ लो. वे 3 आ रही हैं, फिर मैं भी उन से मिलने जाऊंगी. जीवन एकदूसरे से मिलने, एकदूसरे के विचारों को जानने का ही तो नाम है,’’ श्रीमतीजी ने किसी चिंतक की तरह कहा.

‘‘प्लीज, हमें सो जाने दो. जानती हो न महीने के आखिरी दिन चल रहे हैं और आप को पार्टी देने की सूझ रही है.’’

‘‘आप चिंता न करो. जो भी खर्च होगा मैं पेमैंट कर दूंगी.’’

‘‘हम पेमैंट करें चाहे आप, लेकिन खर्च तो अपना ही होगा न डियर? इस आभासी दुनिया से बाहर आओ… इस में कुछ नहीं रखा है,’’ हम ने कुछ चिढ़ते हुए कहा.

‘‘लेकिन वे सब तो कल आ रही हैं?’’

‘‘आने दो, हम ताला लगा कर घूमने चले जाएंगे.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. यह तो अपने वचन से पलट जाना हुआ. मैं कदापि ऐसा नहीं कर सकती,’’ श्रीमतीजी ने हम से दोटूक शब्दों में कहा.

‘‘फिर बताओ क्या करना है?’’

‘‘उन के लिए शानदार नाश्ते की व्यवस्था कर दो.’’

‘‘एक बार सोच लो, जिस आभासी दुनिया (फेसबुक) से आप मिली नहीं, जानती नहीं उसे क्यों और किसलिए निमंत्रण दे रहीं?’’ हम ने झल्लाते हुए कहा.

‘‘प्लीज, इस बार देखते हैं, अगर यह अनुभव खराब रहा तो मैं हमेशा के लिए व्हाट्सऐप से दूर हो जाऊंगी,’’ श्रीमतीजी ने हमें आश्वस्त करते हुए कहा. श्रीमती सुबह जल्दी उठ गईं. ड्राइंगरूम ठीक किया, नाश्ता तैयार किया. फिर हमें उठा कर कहने लगीं, ‘‘उन का 10 बजे तक आना होगा. आप बाजार जा कर सामान ले आओ,’’ और फिर सामान की एक लंबी लिस्ट हमें थमा दी. हम विचार करने लगे कि यह नाश्ते की लिस्ट है या पूरे महीने के राशन की है? जो फल हम ने कभी खाए नहीं, जिन मिठाइयों के नाम हम ने सुने नहीं थे वे सब उस लिस्ट में मौजूद थीं. कुछ नोट हमारे हाथ पर रख दिए. हम अपना पुराना स्कूटर ले कर बाजार निकल गए. आटोरिकशा में सारा सामान रख कर हम घर आ गए. श्रीमतीजी खुशी से हम से लिपट गईं. ऐसा लगा जैसे आम के फलदार वृक्ष पर नागफनी की बेल फैल गई हो. हम ने स्वयं को बचा कर दूर किया और अपने कमरे में जा पहुंचे.

श्रीमतीजी किचन में सामान को सजाने लगी थीं. हमारे जीवन का यह प्रथम अनुभव था जहां जान न पहचान और सलाम की प्रक्रिया हो रही थी. हम उन की व्यग्रता को देख रहे थे. थोड़ी देर बाद उन के मोबाइल पर संदेश आया, ‘‘मकान खोज रहे हैं… मिल नहीं रहा है.’’ इधर से श्रीमतीजी ने पूरा दिमाग लगा कर भारत का नक्शा उन्हें बताते हुए कहा, ‘‘मैं घिस्सू हलवाई की दुकान पर इन्हें लेने भेज रही हूं.’’ घिस्सू हलवाई महल्ले का प्रसिद्ध हलवाई था. श्रीमतीजी ने हम पर नजर डाली. हम बिना कुछ कहे अपने स्कूटर की तरफ चल दिए. श्रीमतीजी उन्हें मोबाइल पर फोन कर के हमारे रंगरूप के विषय में, कपड़ों के विषय में विस्तार से जानकारी दे रही थीं ताकि उन्हें हमें पहचानने में कोई दिक्कत न हो. हम स्कूटर ले कर घिस्सू हलवाई की दुकान पर खड़े हो गए. तभी एक काली महंगी कार आ कर रुकी और उस में बैठे ड्राइवर ने हमें देख कर पूछा, ‘‘आप ही चपड़गज्जूजी हैं?’’

‘‘जी हां, हम ही हैं.’’ हम ने घबराए स्वर में कहा.

‘‘आप के घर जाना है.’’

‘‘जी, हम लेने ही तो आए हैं,’’ हम ने कहा. अंदर कौन है, नहीं जान पाया, क्योंकि गाड़ी के अंदर कांच के ऊपर परदे चढ़े थे. अब हम घिसेपिटे स्कूटर पर आगेआगे चल रहे थे और वे महंगी कार में हमारे पीछेपीछे. कुछ ही देर बाद हम ने स्कूटर रोक दिया, क्योंकि आगे गली में तो कार जा नहीं सकती थी. हम ने कहा, ‘‘यहां से पैदल चलना होगा,’’ और फिर हम ने अपना स्कूटर एक दीवार से सटा कर खड़ा कर दिया. तभी कार का दरवाजा खुला. 3 हट्टीकट्टी, गहनों से लदीफंदी, महंगे कपड़ों में, फिल्मी अंदाज में मेकअप किए उतरीं. हमारा दिल तो धकधक, तक धिनाधिन होने लगा था. हमें पहली बार अपनी श्रीमतीजी पर गर्व हो आया कि वाह क्या अमीरों से दोस्ती की है. हम किसी पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते, कूंकूं मुसकराते चल रहे थे. महल्ले की खिड़कियां खुल रही थीं. सब बहुत आश्चर्य से देख रहे थे कि इन छछूंदरों के घर ये अमीर क्या करने आए हैं…? हम उन्हें अपने गरीबखाने पर लाए. श्रीमतीजी दरवाजे पर ही मिल गईं. हम ने अनुभव किया कि वे उतनी खुश नहीं थीं जितनी होनी चाहिए थीं. फिर भी मुसकरा कर अंदर ड्राइंगरूम में लाईं. पंखा चालू किया. तीनों इधरउधर देख रही थीं कि क्या एसी नहीं है?

सच तो यही है कि लोगों की अमीरी देख कर ही स्वयं की गरीबी का एहसास होता है. श्रीमतीजी ने तत्काल उन्हें पानी पीने को दिया. श्रीमतीजी का व्यवहार कुछ ऐसा था कि आभासी दुनिया वाली तुरंत चली जाएं. शायद इसलिए भी कि श्रीमतीजी को अपनी निर्धनता का कटु एहसास हो रहा होगा. कुल जमा चंद बातचीत के बाद नाश्ता कर वे जाने को उठ गईं. विदाई के समय तो हमारा सामना होना जरूरी था. हम देख रहे थे कि श्रीमतीजी अत्यधिक बेचैन हैं. क्यों, यह हम नहीं जान पाए थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये जल्दी चली जाएं. हम भी बागड़ बिल्ले की तरह उपस्थित हो कर विदाई बेला में खड़े रहना चाहते थे.

‘‘अच्छा जीजाजी चलते हैं,’’ एक मोटी सी फटी आवाज कानों में आई.

‘‘जीजी,’’ हम ने घबराए स्वर में कहा. हम उन्हें छोड़ने जा रहे थे तो दूसरी ने कहा, ‘‘बस भी कीजिए… हम चली जाएंगी,’’ उस की आवाज भी कुछ विचित्र सी थी.

वे चली गईं तो श्रीमतीजी ने माथे का पसीना पोंछा. अचानक हमें बात समझ में आई और फिर हम जोर से हंस पड़े, ‘‘हा…हा…हा…’’

‘‘बस भी करो,’’ श्रीमतीजी नाराजगी भरे स्वर में बोलीं.

‘‘तो ये थीं आप की किन्नर सहेलियां,’’ कह हम फिर जोर से हंसने लगे.

 ‘‘उन्होंने मुझ से यह बात छिपा रखी थी,’’ श्रीमतीजी ने सफाई दी.

‘तो ऐसी सहेलियां होती हैं तुम्हारी आभासी दुनिया की,’’ हम ने कहा और फिर पेट पकड़ कर हंसने लगे. अब श्रीमतीजी को बहुत क्रोध आ गया. वे जोर से नाराजगी भरे स्वर में कहने लगीं, ‘‘क्यों किन्नर इनसान नहीं हैं? इन की इच्छा दोस्ती करने की, सहेली बनाने की, हम जैसे सामान्यों से बात करने की, सामान्य व्यक्तियों के घरों में आनेजाने की इच्छा नहीं होती है? हम इन्हें हंसने वाली चीज समझ कर कब तक इन का मजाक उड़ाते रहेंगे? हमें इन की प्रौब्लम समझनी होगी, इन्हें भी प्लेटफार्म देना होगा जहां ये इज्जत के साथ, सामान्य व्यक्तियों की तरह रह सकें.’’ श्रीमतीजी की ये बातें सुन हमारी हंसी गायब हो गई और हम यह सोचने को मजबूर हो गए कि जो कहा गया है वह सत्य है और इस पर हम सब को सोचने कीजरूरत है न कि हंसने की. श्रीमतीजी की इस परिपक्व सोच पर हमें उन पर गर्व हो आया. उन्होंने शतप्रतिशत सच कहा था.

क्या दीपिका ने दांव पर लगाया अपना करियर..?

एक तरफ दीपिका पादुकोण हौलीवुड में ट्रिपल एक्स सीरीज की फिल्म ‘‘द रिटर्न आफ जेंडार केज’’ में अभिनय कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही हैं. तो दूसरी तरफ बौलीवुड में खबरे गर्म हैं कि दीपिका पादुकोण ने अपने बौलीवुड के करियर को दॉंव पर लगा रखा है. वास्तव में जब से दीपिका पादुकोण ने हौलीवुड में ट्रिपल एक्स सीरीज की फिल्म की शूटिंग शुरू की है, तब से उनकी गैर मौजूदगी के चलते बौलीवुड की कई फिल्में उनके हाथ से निकल गयी. सूत्रों की माने तो दीपिका पादुकोण अब रणवीर सिंह के साथ कोई भी नई फिल्म नहीं करना चाहती, जिसके चलते वह पहले ही संजय लीला भंसाली की उस पीरियड फिल्म का आफर ठुकरा चुकी हैं, जिसमें रणवीर सिंह हैं.

बौलीवुड के जानकारों का दावा है कि आनंद एल राय अपनी नई फिल्म में शाहरुख खान के साथ दीपिका पादुकोण को लेना चाह रहे थे, पर दीपिका की अनुपस्थिति के चलते इस फिल्म से उनका पत्ता कट गया. सूत्रों के अनुसार कबीर खान भी सलमान के साथ भारत चीन संबंधों वाली अपनी नई फिल्म में दीपिका पादुकोण के नाम पर विचार कर रहे थे. बौलीवुड में चर्चाएं भी होने लगी थीं कि आखिर पहली बार सलमान खान व दीपिका पादुकोण की जोड़ी सिनेमा के परदे पर नजर आएगी, मगर अब सूत्रों के अनुसार कबीर खान ने अपनी इस फिल्म में दीपिका की बजाय किसी चीनी अदाकारा को लेना चाहते है.

इसके अलावा सही समय पर संपर्क न हो पाने की वजह से फिल्मकार राज कुमार संतोषी की फिल्म से भी दीपिका पादुकोण की छुट्टी हो चुकी हैं. यानी कि एक हौलीवुड फिल्म के चक्कर में दीपिका पादुकोण के हाथ से चार पॉच बौलीवुड फिल्में निकल गयीं. खैर,किसी भी कलाकार के करियर में फिल्मों का आना जाना तो लगा ही रहता है. मगर सूत्रों की माने तो आज की तारीख में दीपिका पादुकोण के पास एक भी हिंदी फिल्म नहीं है.

बौलीवुड के बिचौलियों के बीच चर्चाएं हो रही हैं कि क्या अब दीपिका को हौलीवुड फिल्म की शूटिंग पूरी करने के बाद बौलीवुड में नए सिरे से शुरूआत करनी होगी? तो वहीं दीपिका पादुकोण के नजदीक सूत्र का दावा है कि दीपिका पादुकोण के पास अभी भी संजय लीला भंसाली की फिल्म को स्वीकार करने का रास्ता खुला हुआ है….बहरहाल, बौलीवुड में हर किसी की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि दीपिका पादुकोण का अगला कदम क्या होगा..

कंगना ने इरफान को लेकर ये क्या कह डाला…

कुछ दिन पहले फिल्म ‘‘मदारी’’ के प्रमोशन के दौरान इरफान खान ने कंगना के साथ काम करने के सवाल पर कहा था कि वह तभी कंगना के साथ फिल्म करेंगे, जब उस फिल्म में कंगना ‘हीरो’ और वह ‘हीरोईन’ होंगे. मगर कंगना रानौट ने बिना शर्त इरफान के साथ काम करने की ख्वाहिश जताने के साथ इरफान खान के बयान पर बड़ी विनम्रता के साथ ऐसा करारा जवाब दिया है कि इरफान खान के पास कहने को कुछ बचा ही नही है.

जी हॉ! कंगना ने एयरपोर्ट पर कुछ पत्रकारों से बात करते हुए इरफान के बयान पर कहा-‘‘वह हमेशसा मुझे चिढ़ाते हैं. उन्होने एक बार मुझसे कहा था कि,‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती’. उनके इस कथन का मतलब मैं आज तक नहीं समझ पायी. लेकिन मैं इरफान सर के साथ काम करना चाहती हूं, फिर चाहे मुझे जो भी किरदार निभाने के लिए दिया जाए.’’

आखिर लूलिया वेंटूर ने तोड़ी चुप्पी

पिछले कुछ दिनों से सलमान खान और रोमानियन अभिनेत्री से 27 दिसंबर को होने वाली शादी की खबर को लेकर काफी हंगामा मचा हुआ है. एक प्रेस कॉफ्रेंस में सलमान खान ने मीडिया से कह दिया कि वह अपनी शादी की खबर मीडिया की बजाय ट्विटर पर देंगे. पर दूसरे ही दिन एक अंग्रेजी अखबार से बात करते हुए सलमान खान ने अपनी तरफ से शादी की खबर का अंत करने का प्रयास किया.

उधर लूलिया वेंटूर को लेकर कई तरह की खबरें गर्म रही हैं. कहा जाता रहा है कि लूलिया वेंटूर शादीशुदा हैं, पर इससे सलमान खान को कोई एतराज नहीं है. इधर विवाद उठ रहे थे, हंगामा मचा हुआ था. पर लूलिया वेंटूर चुप थी. पर सलमान खान द्वारा एक अंग्रेजी अखबार से शादी को लेकर लंबी बात किए जाने के बाद अब तक चुप रही लूलिया वेंटूर ने भी चुप्पी तोड़ दी.

लूलिया ने शादी के मसले पर उठ रहे सारे विवादों का जवाब देने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट ‘इंस्टाग्राम’ को चुना. लूलिया वेंटूर ने सोशल नेटवर्किंग साइट ‘इंस्टाग्राम’ पर लिखा है-‘‘प्यारे दोस्तों, मुझे नहीं लगता कि किसी भी अफवाह पर सफाई दी जानी चाहिए. लेकिन अब मुझे लगता है कि मैं स्पष्ट रूप से बता दूं कि अब तक मेरी किसी से भी शादी नहीं हुई है. और मुझे अपनी शादी की पोशाक पहनने की भी कोई जल्दी नहीं है. ईश्वर का आशीवार्द हम सबके साथ रहे..’’

मजेदार बात यह है कि लूलिया वेंटूर ने अपने शादीशुदा न होने की सफाई देने के साथ ही शादी को लेकर गर्म खबर पर सफाई दे डाली. पर उन्होने कहीं भी सलमान खान का जिक नहीं किया..अब इसे क्या माना जाए…!!

वाशिंग मशीन में कपड़े धोने के टिप्स

क्या आप जानती हैं कि कपड़ों की सही धुलाई के साथसाथ उन की क्वालिटी को भी कैसे बरकरार रखा जा सकता है? अगर नहीं तो परेशान न हों. हम आप को बता रहे हैं कि कपड़ों की सही धुलाई कैसे करें:

– कपड़ों को धोने से पहले उन्हें अलग अलग करें जैसे ज्यादा गंदे कपड़ों को अलग धोएं तो कम गंदे कपड़ों को अलग. इसी तरह ऊनी और सूती कपड़ों को भी अलग कर लें. कमीजों, पैंटों, नए सूती कुरतों आदि को अलग धोएं तो चादरों, तौलियों और नाइट सूटों को अलग से धोएं. सभी कपड़ों को एकसाथ मशीन में भर देना उचित नहीं है.

– मशीन में कपड़ों को डालने का भी एक तरीका होता है जैसेकि बड़े कपड़े सब से पहले फिर उन से छोटे और फिर उन से छोटे. कपड़ों की तह को खोल कर डालें. अगर कपड़ों को यों ही मशीन में भर देंगी तो वे आपस में उलझ जाएंगे और फिर जिस समय मशीन स्पंज करती है, तो उन के फटने और मशीन में एरर आ कर रुक जाने की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है.

– कोई भी नया कपड़ा डालने से पहले चैक कर लें कि उस का रंग तो नहीं निकल रहा, क्योंकि अगर रंग निकलने वाला कपड़ा हुआ तो मशीन में डाले गए सारे कपड़े खराब हो जाएंगे.

– डिटर्जैंट पाउडर या साबुन का इस्तेमाल कपड़ों के हिसाब से करें. ज्यादा डिटर्जैंट के इस्तेमाल से ऊनी और सिल्क के कपड़ों को नुकसान पहुंच सकता है.

– हर मशीन की डिटर्जैंट लेने की अपनी क्षमता होती है, इसलिए अगर मशीन में 1 ढक्कन डिटर्जैंट डालने के लिए लिखा है, तो उतना ही डालें.

– कई मशीनों की बुकलेट में लिखा होता है कि नौर्मल डिटर्जैंट के साथ आधा ढक्कन मशीन का डिटर्जैंट भी डालें, जो अलग से खरीदना होता है. लेकिन कई बार महिलाएं सोचती हैं कि इसे खरीदने की क्या जरूरत है. मगर यह सोच ठीक नहीं है, क्योंकि उस डिटर्जैंट की वजह से ही तो कपड़े ज्यादा साफ होते हैं.

– डिटर्जैंट चुनते वक्त पहले यह तय कर लें कि पाउडर का इस्तेमाल करना है या लिक्विड डिटर्जैंट का. लिक्विड डिटर्जैंट अपेक्षाकृत ज्यादा महंगा होता है पर इस बात को भी ध्यान में रखें कि अगर आप कपड़े धोने के लिए ठंडे पानी का इस्तेमाल करती हैं तो पाउडर पानी में आसानी से नहीं घुलेगा. बेहद मुलायम कपड़ों को धोने के लिए लिक्विड डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें.

– डिटर्जैंट का इस्तेमाल करते समय फैब्रिक का भी ध्यान रखें. सिल्क या ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए मुलायम डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें. बच्चों के कपड़ों की धुलाई के लिए बेहद मुलायम डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें, क्योंकि बच्चों की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है. सफेद कपड़ों की धुलाई के लिए ब्लीच फौर्मूला वाले डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें तो रंगीन कपड़ों की धुलाई के लिए ऐसे डिटर्जैंट का इस्तेमाल करें जिस से कि कपड़ों में चमक आ जाए.

– वाशिंग मशीन में कपड़े धोते वक्त सब से पहले डिटर्जैंट डालें और फिर कपड़े, क्योंकि कपड़ों के ऊपर डिटर्जैंट डालने से न सिर्फ कपड़ों में डिटर्जैंट के चिपके रहने की आशंका रहती है, बल्कि कपड़ों का रंग भी उड़ जाता है.

– कपड़ों को वाशिंग मशीन में डालने से पहले उन पर लगे दागधब्बों को हाथ से छुड़ा लें. दरअसल, वाशिंग मशीन में दाग लगे कपड़ों को सीधा डालने से निशान और गहरे हो जाते हैं.

– अगर मशीन सेमीऔटोमैटिक है तो कपड़े धुल जाने के बाद अलार्म बजेगा. तब आप को कपड़ों में पानी निकालने के लिए ड्रायर में कपड़े भरने होंगे. इस में 5-10 मिनट लगेंगे. उस के बाद कपड़े सूखने डाल दें.

– कपड़े धोने के बाद वाशिंग मशीन का डिटर्जैंट बौक्स भी साफ करना जरूरी है. उस में बचा वाशिंग पाउडर जरूर निकाल लें और अच्छी तरह साफ करें. यदि संभव हो, तो पूरे बौक्स को बाहर निकाल लें और किसी पुराने टूथब्रश से साफ कर लें.

– वाशिंग मशीन के अंदर का ड्रम भी साफ करती रहें ताकि मशीन साफ रहे. उस में कई सारे छोटेछोटे छिद्र होते हैं, जिन में कीटाणु जमा हो जाते हैं. बेहतर है हर महीने खाली मशीन चला दें. इस के लिए डिशवाशर टैबलेट और गरम पानी का इस्तेमाल करें.

डबल मीनिंग कॉमेडी पसंद नहीं: कविता कौशिक

15 साल से टीवी जगत की ‘क्वीन’ बनी अभिनेत्री कविता कौशिक ने 20 साल पहले निगेटिव भूमिका निभाकर अपने करियर की शुरुआत की थी. लेकिन उन्होंने धारावाहिक ‘एफआईआर’ में चंद्रमुखी चौटाला बन अधिक प्रसिद्धी पाई. नकारात्मक भूमिका से उन्हें अवार्ड, खूब पैसा, गाड़ी मकान सब मिला. टीवी पर उनका खूब नाम भी था, वह एक साथ तीन–तीन शो किया करती थी, जिसमें ‘कुटुंब’, ‘कहानी घर घर की’ ,’कुमकुम’ आदि सभी एकता कपूर की धारावाहिकों में काम करती रही, पर एक मलाल उनके अंदर था, कि उन्होंने पिता के पुलिस ऑफिसर बनने के सपना को पूरा नहीं किया. स्वभाव से बोल्ड कविता को तब बहुत अच्छा लगा जब उन्हें लीक से हटकर ‘एफआईआर’ में पुलिस ऑफिसर बन कॉमेडी करने का मौका मिला. दर्शको ने उनके काम की प्रशंसा की.

वह कहती हैं कि मेरे पिता आर्मी ऑफिसर थे, उनकी इच्छा थी कि मैं पुलिस ऑफिसर बन वर्दी पहनू. मैं उनकी इकलौती संतान हूँ. जब मुझे चंद्रमुखी चौटाला निभाने का अवसर मिला, तो मैं खुश हुई और उन्हें कहा कि अब आप मुझे टीवी पर वर्दी में देखिये और उन्हें ख़ुशी भी मिली कि मैं बहुत अच्छा काम कर रही हूँ.

हालाँकि यह अभिनय कठिन था ,क्योंकि इससे पहले मैंने कभी कॉमेडी नहीं की थी पर धीरे- धीरे सब ठीक हुआ और अब मैं फिर से एक कॉमेडी धारावाहिक कर रही हूँ. ’डॉ.भानुमती ओन ड्यूटी’ सब टीवी पर प्रसारित होने वाला यह कॉमेडी शो है, इसमें मेरा चरित्र बड़ा ही ग्रेसफुल है. मैं आर्मी की डॉक्टर हूँ, कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ, हमेशा सबकी मदद करना चाहती हूँ. चंद्रमुखी बदतमीज़ थी, कभी कभी किसी को डांट या मार भी देती थी, पर ये किरदार एकदम अलग है.

कोई चरित्र आपको कितना प्रभावित करता है? पूछे जाने पर कविता हंसती हुई कहती है कि बहुत प्रभावित करता है, मैं आज रास्ते मैं कोई गलत बात नहीं देख सकती और हो भी क्यों न? जब आप किसी भूमिका को सालों से निभाते हैं तो आपको उसमें जीना पड़ता है, तभी आप उसे कर सकते हैं. मैंने चंद्रमुखी चौटाला की भूमिका करीब नौ सालों तक निभाई थी. सिर्फ मैं ही नहीं मेरे चरित्र से कई महिलाएं भी प्रेरित हुई हैं. कई बार वे मुझसे मिलकर कहती हैं कि आप को देखकर हमने पुलिस में ज्वाइन किया है, हम आगे बढ़कर किसी की मदद करने में हिचकिचाते नहीं. ये बाते सुनकर ख़ुशी होती है और पिता की बातें याद आती है.

आजकल के धारावाहिकों में भूत प्रेत, बिच्छू, सांप बन जाना, चुड़ैल, दो बहनों में ईर्ष्या, सास का बहू को ताना देना, बहू को मार  देना, आदि की भरमार है, इस प्रकार की धारावाहिक कविता को पसंद नहीं, वह कहती हैं रियल लाइफ में कोई भी काम प्यार से ही होता है. पॉवर का इस्तमाल करने से नफरत का रास्ता तैयार होता है. आजकल लोगो में आक्रोश बहुत है, लोग कुंठित हैं, ऐसे में ऐसी धारावाहिके सही नहीं हैं. प्रोग्रेसिव धारावाहिक दिखाई जानी  चाहिए, रिग्रेस्सिव नहीं, क्योंकि टीवी समाज का आइना है. मुझे तो बिग बॉस का शो भी पसंद नहीं जिसमें लोगो के आचरण को गलत तरीके से दिखाया जाता है. टीवी घर पर सब साथ मिलकर देखते है जिसमें माता पिता भाई बहन बच्चे सब होते है. प्राइम टाइम में कुछ अच्छी चीजे दिखाई जानी चाहिए.

कॉमेडी ,कविता पसंद करती हैं पर दोहरी अर्थ वाले कॉमेडी पसंद नहीं करती. वह बताती है कि ‘चीप वल्गर कॉमेडी’ से हँसाना आसान होता है. टीनएजर्स और कुछ लोगो को पसंद आती है. नॉटी कॉमेडी मुझे पसंद है वही अगर वल्गरिटी में बदल जाये तो पसंद नहीं. कॉमेडी लिखना और करना आसान नहीं होता. कॉमेडी देखने से दिल खुश होना चाहिए. किसी का मजाक उड़ाना तब तक ठीक है जब तक कि उसे बुरा न लगे, किसी को बेईज्ज़त कर कॉमेडी, जो उसे आहत करें मुझे कतई पसंद नहीं. कॉमेडी में प्रतिभा की जरुरत होती है.

कविता कौशिक फिल्मो में आने की इच्छा रखती है, पर उसे वैसी भूमिका नहीं मिलती. अगर मिले तो अवश्य करेगी. वह अपने जीवन साथी के बारे में कहती है कि समय बदल गया है, रिश्तों में कमिटमेंट कम हो गया है, तकनीक जितनी जल्दी किसी रिश्ते को पास लाती है, उतनी ही जल्दी उससे दूर भी हो जाती है. मेरा काम, माता पिता, दोस्त, पर्सनल लाइफ सब बैलेंस हैं. मैं इससे खुश हूँ .डरती हूँ कि कोई मेरा गलत कदम इसे ख़राब न कर दे.

खाली समय में कविता खाना बनाती हैं, उन्हें कुकिंग, घूमना और गाना गाने का शौक है. उन्हें फैशन भी पसंद है. जब भी समय मिलता है, शौपिंग करती हैं. जीवन में खुश रहने का मंत्र वह अपने आप से संतुष्ट रहने को बताती हैं.

एयर होस्टेस बन कर भरें आकाश में उड़ान

अगर आप ऐसे क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहते हैं, जिस में ग्लैमर के साथसाथ पैसा भी हो और दुनियाभर की मुफ्त हवाई सैर भी कर सकें, तो आप एयर होस्टेस या फ्लाइट स्टीवर्ड के रूप में किसी विमान सेवा का सदस्य बन सकते हैं. एयर होस्टेस का काम हवाईजहाज में यात्रियों की सहायता तथा मार्गदर्शन करना है. एयर होस्टेस का बात करने का ढंग अत्यंत सलीकेदार होना जरूरी है. उस में बिना किसी हिचकिचाहट के निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए. कई बार विमान में खराबी आने के चलते कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में यात्रियों में साहस जगाने का विश्वास उस में होना चाहिए. उस का व्यक्तित्व आकर्षक होना चाहिए.

कार्य प्रकृति : एयर होस्टेस अथवा फ्लाइट स्टीवर्ड दोनों का एक ही तरह का काम होता है. केबिन क्रू के पुरुष को फ्लाइट स्टीवर्ड तथा महिला को एयर होस्टेस कहते हैं. एयर होस्टेस का काम यात्रियों को सीट बैल्ट बांधनेखोलने संबंधी निर्देश देने के अलावा, सुरक्षा संबंधी जानकारी प्रदान कराना, समयसमय पर नाश्ताखाना और पेय पदार्थ परोसना है. इस के अलावा वह यात्रियों की शिकायत भी सुनती हैं.

योग्यता : एयर होस्टेस के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए योग्यता 12वीं है, लेकिन डोमैस्टिक तथा इंटरनैशनल एयरलाइंस ग्रैजुएट उम्मीदवार को प्राथमिकता देती हैं. इस के अलावा यदि किसी उम्मीदवार के पास होटल मैनेजमैंट अथवा पर्यटन मैनेजमैंट में डिप्लोमा या डिग्री हो तो उस के सलैक्शन की संभावना बढ़ जाती है. साथ ही धाराप्रवाह अंगरेजी बेहद जरूरी है. गौरतलब है कि इंटरनैशनल एयरलाइंस के लिए किसी विदेशी भाषा जैसे जरमन, फ्रैंच, स्पैनिश की जानकारी होना भी जरूरी है.

फिजिकल योग्यता : एयर होस्टेस का कद 157 सेंटीमीटर तथा फ्लाइट स्टीवर्ड का कद 170 सेंटीमीटर से कम नहीं होना चाहिए. वजन कद के अनुपात में हो. सरकारी एयरलाइंस में एयर होस्टेस की सेवानिवृत्ति की उम्र 58 वर्ष तथा फ्लाइट स्टीवर्ड की उम्र 60 वर्ष निर्धारित है.

चयन प्रक्रिया : एयर होस्टेस की परीक्षा के मुख्य रूप से 3 चरण होते हैं. सब से पहले प्रिलिमिनरी इंटरव्यू लिया जाता है, जिस में पर्सनैलिटी को परखा जाता है. उस के बाद फिजिकल फिटनैस को परखा जाता है, जिस में लंबाई, वजन आदि की जांच की जाती है. तीसरे चरण में ग्रुप डिस्कशन, जिस में स्पीकिंग स्किल तथा कौन्फिडैंस को परखा जाता है, तब जा कर सलैक्शन होता है.

ट्रेनिंग के तौरतरीके : चयनित उम्मीदवारों को 3 से 4 महीने की ट्रेनिंग दी जाती है. इस के तहत प्राथमिक उपचार, कस्टमर सर्विस, इमरजैंसी लैंडिंग आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है. इस के अलावा एक विदेशी भाषा, टिकटिंग व टूरिज्म, पर्सनैलिटी डैवलपमैंट एवं पब्लिक रिलेशंस व कम्युनिकेशन आदि की जानकारी दी जाती है.

नौकरी के अवसर : नईनई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइंस कंपनियों के आने से पर्यटन के साथसाथ विमान सेवाओं में कुशल केबिन क्रू व एयर होस्टेस की मांग बढ़ी है. किसी एक एयर होस्टेस के सीनियर फ्लाइट अटैंडेंट बनने और फिर प्रमुख अटैंडेंट बनने के पूरे अवसर होते हैं. भरती के लिए विज्ञापन सभी प्रमुख समाचारपत्रों (ज्यादातर अंगरेजी के अखबारों) में प्रकाशित होते रहते हैं. ताजा भरती विज्ञापनों को आप गूगल से खोज सकते हैं या एयरलाइंस की वैबसाइट खोल कर खुद जानकारी हासिल कर सकते हैं. गौरतलब है कि सालभर में एक बार एयर होस्टेस/फ्लाइट स्टीवर्ड को दुनियाभर की मुफ्त सैर की सुविधा मिलती है. इस के अलावा नियमित रूप से दूसरे देशों में जाने का अवसर प्राप्त होता है. इस दौरान अच्छे फाइव स्टार होटल्स में ठहरने और खानेपीने की सुविधा मिलती है.

पानी का संकट जिंदगी पर भारी

पूरे देश में पानी का संकट  गहरा गया है, जो चिंता की बात है. महाराष्ट्र के लातूर जिले में जल संकट को दूर करने के लिए ट्रेन के जरीए पानी पहुंचाने की हालत से पानी के संकट को समझा जा सकता है. केवल लातूर ही नहीं, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और बिहार के बहुत से जिलों में पानी का संकट सिर चढ़ कर बोल रहा है. महाराष्ट्र के जल संकट को देखते हुए क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग के कई मैचों की जगह बदलने की मांग उठी और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा. अदालत ने कहा कि मैच के दौरान लाखों लिटर पानी की बरबादी होती है. इस वजह से जिन शहरों में पानी का संकट है, वहां आईपीएल के मैच नहीं होंगे.

यह सच है कि आईपीएल मैचों के रुकने से जल संकट दूर नहीं होगा, पर इस फैसले से लोगों का ध्यान जल संकट की तरफ जाएगा और धीरेधीरे वे यह समझने में कामयाब होंगे कि पूरे देश में भी जल संकट आ सकता है. इस जल संकट को दूर करने के लिए अपनेअपने लैवल पर अलगअलग तरह के प्रयोग हो रहे हैं. महाराष्ट्र के पुणे में गरमी के दिनों में जल संकट से निबटने के लिए दफ्तर, होटल, रैस्टोरैंट में आने वालों को आधा गिलास पानी ही पीने के लिए दिया जाता है, जिस से पानी की बरबादी को रोका जा सके. पुणे नगरनिगम द्वारा इस तरह के आदेश जारी किए गए हैं.

जानलेवा होती गरमी

राजस्थान और महाराष्ट्र के कुछ गांव ऐसे हैं, जहां पानी लाने के लिए 25 से 30 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. इन गांवों में लड़कों की शादियां इसलिए नहीं होतीं, क्योंकि शादी के बाद औरतों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. भारत में जल संकट केवल पीने के पानी को ले कर ही नहीं है, बल्कि फसलों की सिंचाई के लिए भी पानी नहीं है. जिन जगहों पर पानी है, वहां जमीन के नीचे बोरिंग कर के पानी को बाहर निकाला जाता है. इस से बहुत सारा पानी बरबाद होता है. हमारे देश में प्यास लगने पर कुआं खोदने की कहावत पुरानी है. पानी की कमी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है.  गरमी शुरू होते ही पानी की चिंता होने लगती है और कमज्यादा बरसात होते ही पानी की चिंता से पल्ला झाड़ लिया जाता है. गरमियों की शुरुआत में ही इस साल पारा 45 डिगरी के ऊपर पहुंच गया था. अप्रैल महीने में ही गरमी से 150 लोग अपनी जान गंवा चुके थे.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के आधार पर डाटा एनालिसिस्ट संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पिछले 23 सालों में लू से मरने वालों की तादाद में तिगुना इजाफा हो चुका है. इन की तादाद 612 से बढ़ कर 2,422 तक पहुंच गई है.

पानी की बढ़ती कीमत

इस समय बोतलबंद पानी की सब से कम कीमत 15 रुपए प्रति लिटर है. बोतलबंद पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. गांवों में जहां पहले बोरिंग से पानी हासिल करने के लिए 30 से 40 फुट नीचे बोरिंग हो जाती थी, अब वहां भी 120 से 150 और कहींकहीं तो 200 से 250 फुट तक की गहराई में जाना पड़ता है. पूरे देश में पानी का संकट गहराता जा रहा है. भारत में दूसरे देशों के मुकाबले बरसात ठीकठाक होती है. परेशानी की बात यह है कि बरसात का ज्यादातर पानी बरबाद हो जाता है. हमारे देश में पानी जमा करने के अच्छे इंतजाम नहीं हैं. इस के प्रति लोगों में जागरूकता भी नहीं है. आम भारतीय नागरिक यह सोचता ही नहीं है कि वह पानी की बरबादी तो नहीं कर रहा है.

देवता की बरबादी

वैसे तो समाज के ज्यादातर लोग पानी को ‘जल देवता’ की संज्ञा देते हैं. इस के बाद भी पानी की बरबादी करने में पीछे नहीं रहते हैं. यह बात सच है कि पानी की हमारी दैनिक जिंदगी में बहुत अहमियत है. सुबह शौचालय से ले कर नहाने, बरतन और कपड़े धोने, बागबानी, साफसफाई में इस का इस्तेमाल होता है. घर, दफ्तर, होटल, अस्पताल, उद्योग हर जगह पानी का इस्तेमाल होता है. यहां जिस तरह से हम पानी का इस्तेमाल करते हैं, उस में बचत कर सकते हैं. कई जगहों पर इस्तेमाल किए गए पानी को फिर से इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

शहरों में शौचालय में कमोड सिस्टम चलता है. इस में पानी की सब से ज्यादा बरबादी होती है. विदेशों में आबोहवा के लिए काम करने वाली तमाम संस्थाएं अब इस तरह की मांग कर रही हैं कि शौच और पेशाब करने के लिए हाईवे के किनारे खुली जगह में छूट दी जाए. सही बात यह है कि पानी के इस्तेमाल में अगर सावधानी बरतने की परंपरा शुरू हो जाए, तो पानी की बचत की आदत पड़ सकती है. जरूरत इस बात की है कि केवल गरमी में ही नहीं, हर मौसम और हर दिन पानी की बचत और इस को बचाने की ओर ध्यान देने की जरूरत है. सरकार और वैज्ञानिकों को ऐसे उपाय करने होंगे कि लोग कामयाबी से पानी को बचा सकें और उस को महफूज रख सकें.

हमारे देश के नेता, नौकरशाह और वैज्ञानिक विदेशों का दौरा कर देखते हैं कि वहां पर किस तरह से पानी की बचत की जा रही है. इस के बाद भी देश में अमल नहीं हो रहा है. गांवों में पानी की बहुत ज्यादा बरबादी फसलों की सिंचाई में होती है. सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई की प्रणाली को बढ़ावा दिया जाए, तो पानी की बरबादी को रोका जा सकता है. गांव में तालाब, पोखर और नहरों का इस्तेमाल कम होने लगा है. इस के बजाय भूगर्भ के जल का दोहन बढ़ गया है. जरूरत है कि गांव में भी जल संरक्षण और उस की बचत पर ध्यान दिया जाए.

जलाशयों में घटता पानी

पिछले 2-3 सालों में बरसात के आंकड़ों को देखें, तो औसत से कम बरसात हुई है. इस से देश के तमाम जलाशयों में 10 साल के मुकाबले सब से कम पानी इस समय बचा है. आंकड़े बताते हैं कि जलाशयों में 23 फीसदी पानी कम हो गया है. पूरे देश को 4 हिस्सों में बांट कर देखने से परेशानी समझ में आ सकती है. उत्तर भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के जलाशयों में 4.25 अरब घनमीटर पानी मुहैया है. यहां तकरीबन 12 अरब घनमीटर पानी को रखने की कूवत है. पहले 38 फीसदी पानी इन जलाशयों में था, अब केवल 24 फीसदी पानी यहां बचा है. पश्चिम भारत के गुजरात और महाराष्ट्र के जलाशयों में 5.52 अरब घनमीटर पानी मुहैया है. यहां संरक्षण कूवत का केवल 20 फीसदी पानी ही बचा है. पानी के लगातार घटने से

यहां के जलाशयों की हालत को सब से खराब माना जा रहा है. मध्य भारत के उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जलाशयों में 13.27 अरब घनमीटर पानी मुहैया है, जो पूरी कूवत का केवल 13 फीसदी पानी मुहैया है.

पूर्वी भारत के झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के जलाशयों में भी पानी कम है. यहां 6.81 अरब घनमीटर ही पानी है, जो पूरी कूवत का केवल 36 फीसदी है. दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के जलाशयों में 8.08 अरब घनमीटर ही पानी मुहैया है, जो कूवत का महज 16 फीसदी है. इन जलाशयों में पिछले 10 सालों का औसत जल संरक्षण देखें, तो उत्तर भारत के जलाशयों में 38 फीसदी, पश्चिम भारत में 38 फीसदी, मध्य भारत में

41 फीसदी, पूर्वी भारत में 48 फीसदी और दक्षिण भारत में 27 फीसदी ही पानी जमा किया जा सका है. जरूरत इस बात की है कि देश के जलाशयों में कूवत के मुताबिक पानी जमा हो. पानी के कम होने से बिजली बनने की कूवत पर असर पड़ता है. पानी की कमी से गरमी बढ़ती है और तमाम तरह की बीमारियां भी पनपने लगती हैं.

पीने के पानी की कमी

बिहार के गया जिले में तमाम गांव के रहने वाले लोग नदी से ही पीने के लिए पानी लाते हैं. सुबहशाम इसी पानी से खाना बनाने का काम होता है. पानी से होने वाली परेशानी को दूर करने के लिए गया के सोनाडीहा गांव के लोग नदी में गड्ढा खोदते हैं. इन में ज्यादातर दलित बिरादरी के लोग होते हैं. शहरी इलाकों में पानी की सप्लाई होती है, तो वहां के हालात थोड़े बेहतर हैं. गांवों में पानी की सप्लाई नहीं है. ऐसे में यहां के लोग नल और नदी के पानी से ही अपनी जरूरतें पूरी करते हैं.

गया के लोगों को नदी से पानी मिल भी रहा है. देश के तमाम हिस्से ऐसे हैं, जहां की नदियां गरमियों में पूरी तरह से सूख जाती हैं. नदियों के पानी में प्रदूषण ज्यादा होता है, जिस से यह पानी अब पीने लायक भी नहीं बचा है. अगर बिहार की बात करें, तो पटना, नालंदा, गया, औरंगाबाद में 2 फुट नीचे और नवादा, रोहतास, लखीसराय, भागलपुर में पानी का लैवल एक फुट नीचे चला गया है. यह लैवल अभी और नीचे चला जाएगा. यहां पीने का पानी कम होता जा रहा है, जिस की वजह से लोग 2 सौ रुपए में पानी का जार खरीदने को मजबूर हैं. एक जार में 15 से 20 लिटर पानी मिलता है. शहरों में बहुत सारे इंतजाम होने के बाद भी 60 फीसदी लोगों को ही पानी मुहैया कराया जा रहा है. बिहार के जैसे ही हालात दूसरे प्रदेशों के हैं. उत्तर प्रदेश के जिलों में पानी का लैवल 30 से 40 फीसदी तक कम हो गया है. इस की वजह से पानी 70 से 250 फुट तक नीचे पहुंच गया है. यहां कम गहराई में हुए नल और पंप की बोरिंग में अब पानी नहीं आ रहा है.

उत्तर प्रदेश के भदोही, बरेली, लखनऊ, हाथरस, पीलीभीत, बदायूं, शाहजहांपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, सोनभद्र जैसे तमाम जिले पानी की परेशानी से जूझ रहे हैं. शहरी इलाकों में तो पीने के पानी का इंतजाम हो भी जाता है, पर गांवों में यह नहीं मिल रहा है. यहां पानी के लिए लोग इधर से उधर भागते हैं. साफ पानी न मिलने से लोगों व पशुओं में तमाम तरह की बीमारियां होने लगी हैं. उत्तर प्रदेश से लगे मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड में ऐसी ही परेशानी देखने को मिल रही है. सरकार द्वारा पानी की सुविधा के लिए लगाए गए हैंडपंप खराब हो चले हैं. उन से पानी नहीं निकल रहा है.

बरसात की उम्मीद

पानी के संकट से निबटने में बरसात से उम्मीद की जा रही है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 30 सालों में 23 बार मानसून सामान्य रहा है. परेशानी की बात यह है कि सामान्य बारिश में भी ऐसे तमाम जिले रहे हैं, जहां सूखा रहा है. पहले बरसात का पानी तालाबों में जमा हो जाता था, पर अब तालाबों को बंद कर उस की जमीन पर तमाम तरह के कब्जे हो गए हैं. कम या ज्यादा बरसात का सीधा असर फसलों की पैदावार पर पड़ता है, जिस से महंगाई बढ़ती है. दालों की कीमत में तेजी की अहम वजह दालों की पैदावार का कम होना ही है. ज्यादा फायदा पाने के लिए किसान अब दालों की जगह सब्जियों की खेती  करने लगे हैं, जिस से साल 2004 से सब्जी की पैदावार में कमी नहीं आई है. मानसून के कम या ज्यादा होने का सब से कम असर फलों पर पड़ता है. सब्जी और फल रखरखाव की कमी में खराब होते हैं.

यह माना जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसून में बदलाव हो रहा है. यह आने वाले दिनों में भी जारीरह सकता है. ऐसे में इस बात की जरूरत है कि पानी के जमा करने पर ध्यान दिया जाए. पानी की बचत के साथसाथ इस के जमा करने की भी बहुत जरूरत है. शहरों और गांवों में अंधाधुंध पानी की बरबादी पर रोक  लगाने की जरूरत है

क्या कहते हैं जानकार

पानी की बरबादी को रोकने के लिए नैशनल लैवल पर उपाय किए जाने चाहिए. पानी किसी भी तरह पैसे से कम कीमती नहीं है. पानी की कीमत जैसेजैसे बढ़ रही है, उस से यह डर है कि कहीं भविष्य में यह पानी सैकड़ों रुपए प्रति लिटर तक न पहुंच जाए. जरूरत है कि तालाबों के पाटने को रोका जाए, ज्यादा से ज्यादा पेड़पौधे लगाए जाएं और पेड़ों के कटने को रोका जाए. शहरी इलाकों में पानी की खूब बरबादी होती है. पानी की टंकी भर जाने के बाद भी वह बरबाद होता रहता है. हमें अपनी सोच बदल कर पानी बचाने की बड़ी मुहिम चलानी चाहिए.

– राजन सुमन, संचालक, ‘उर्मिला सुमन द फाउंडेशन.

जल को जमा करने के लिए नदियों के कुदरती माहौल को बनाए रखने की जरूरत है. तरक्की और खूबसूरती के नाम पर नदियों से खिलवाड़ होने से जल संकट पैदा हो रहा है. पहले नदियों के किनारे बस्तियां इसलिए बसती थीं कि उस से पानी की

सप्लाई होती रहती थी. अब तमाम फैक्टरियां नदियों के किनारे लग गई हैं, जिस से नदियों का पानी पीने लायक नहीं रह गया है. नदियों से मिलने वाली बालू और रेत के लालच में नदियों से हम खिलवाड़ कर रहे हैं, यह गलत बात है. नदियां पानी का सब से अच्छा जरीया होती हैं. इन के कुदरती रूप को बचा कर पानी को जमा करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, साफ पानी की कमी को भी दूर किया जा सकता है.

– राजेश राय, पर्यावरणविद.

निकम्मापन ही जिम्मेदार

हिंदी फिल्म ‘पीपली लाइव’ का नत्था याद है? वही कामचोर नशेड़ी किसान जो कहीं सुन लेता है कि अगर खुदकुशी कर लो तो सरकार मारे गए किसान के परिवार को मुआवजा देती है. नत्था का ऐसा ऐलान करना पूरी फिल्म में एक बवाल सा पैदा कर देता है. सरकार को चुनाव में नुकसान होता दिखता है, तो विपक्षी दल इसे मुद्दा बना कर वोटरों को अपनी ओर करना चाहता है. मीडिया भी टीआरपी बढ़ाने के लिए तिल का ताड़ बना देता है. इसी सिलसिले में सरकार का एक नुमाइंदा नत्था के घर जाता है और लाल बहादुर शास्त्री योजना के तहत एक हैंडपंप उस के घर पर रखवा देता है, जिसे वह सीधा ‘लाल बहादुर’ से संबोधित करता है. नत्था के परिवार को यह तसल्ली होती है कि अगर घर पर हैंडपंप लग जाएगा, तो कम से कम उन की पानी की समस्या तो दूर होगी, लेकिन जब वह सरकारी मुलाजिम उस हैंडपंप को लगाने के पैसे नहीं देता है, तो मामला वही ढाक के तीन पात बन कर रह जाता है.

उस ‘लाल बहादुर’ माफ कीजिए हैंडपंप की अहमियत तब थी, जब उस से पानी निकलता, लेकिन ऐसा हो न सका. हमारे देश में ऐसे सूखे हैंडपंपों की कमी नहीं है, जो सरकारी जमीन पर गड़े हैं, लेकिन जब उन से पानी खींचने की कोशिश करो तो धूल भरी हवा ही बाहर निकलती है. हद तो तब हो जाती है, जब गांवदेहात के ज्यादातर लोगों पर भी निकम्मेपन की धूल जमा दिखती है. फिल्म ‘पीपली लाइव’ को ही लीजिए. फिल्मकार ने जिन 2 भाइयों को हीरो बना कर सरकार, नेताओं, मीडिया के गठजोड़ की पोल खोलनी चाही, वे काम क्या करते थे? फिल्म में कहीं नहीं बताया गया कि गांव वाले भी अपनी बदहाली के बराबरी के जिम्मेदार थे. फिल्म ‘पीपली लाइव’ में ही नत्था की मां एक ढीली सी खाट पर पड़ी रहती है. उस के 2-2 बेटे थे, लेकिन मजाल है कि वे उस की खाट को कस दें. कितनी देर लगती है इतना सा काम करने में?

यही बात हमारे देश में पानी की समस्या पर भी लागू होती है. गांवदेहात में तालाब सूखते ही लोग उस में भराव कर के गैरकानूनी तौर पर कब्जे कर लेते हैं. ज्यादातर कुओं का पानी पीने लायक नहीं रहा है. जहां है भी, वहां भी कितने गांव वाले उस की नियमित सफाई करते हैं? जिन गांवों में, खासकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब के गांवों में पानी मुहैया है, वहां हर घर में लोगों ने सबमर्सिबल लगवा लिए हैं. इस से पानी की बरबादी नहीं होगी तो और क्या होगा. आज भी गांवदेहात में तकरीबन हर घर के आगे 10-12 लोग सारा दिन ताश खेलते दिख जाएंगे. अपने आसपास के नलकूपों, तालाबों, बावडि़यों की उन्हें कोई चिंता नहीं होती है, लेकिन जब बारिश नहीं होती है, तब यज्ञहवन के नाम पर वे पानी की बरबादी जरूर कर देंगे. शहरों में भी कमोबेश यही हालात हैं. जिन घरों में सुबहशाम पानी आता है, वहां भी लोग अपनी कारों को धोने के लिए बेहिसाब पानी खर्च करते हैं. जल संकट से अनजान ऐसे लोग अपने अहम के चलते आने वाली पीढ़ी को संकट में डाल रहे हैं. उन के लिए रहीम का यही दोहा याद आता है:

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून.

पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून.

– सुनील शर्मा

अभिषेक बच्चन ने नहीं सुना फिल्म ‘मुबारका’ का नाम

इन दिनों बौलीवुड में कलाकारों की अदला बदली की खबरें काफी गर्म हैं. इन्ही खबरों के बीच यह खबर भी चर्चा में है कि फिल्म ‘‘शौकीन’’ फेम निर्माता मुराद खेतानी की मिलाप झवेरी के निर्देशन में बनने वाली फिल्म ‘‘मुबारका’’ में अब अभिषेक बच्चन की जगह अर्जुन कपूर आ गए हैं. इतना ही नहीं अब फिल्म ‘‘मुबारका’’ का निर्देशन अनीस बज़मी करेंगे.

मगर जब हमने इस बारे में अभिषेक बच्चन से बात की, तो अभिषेक बच्चन ने कहा-‘‘यह ‘मुबारका’ है क्या? मैंने तो अब तक फिल्म ‘मुबारका’ का नाम ही नहीं सुना? मुझसे अब तक ‘मुबारका’ को लेकर किसी ने कोई बात नहीं की है. इसलिए इस फिल्म को करने या न करने वाली बात कहां से आ गयी? सच यह है कि मैं पिछले डेढ़ माह से स्लिप डिस्क की वजह से बिस्तर पर था. अब कुछ आराम मिला है, तो मैं फिल्म ‘हाउसफुल 3’ के प्रमोशन में लगा हुआ हूं. इस बीच नई फिल्म के संदर्भ में मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई है.’’

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