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‘मेंटल वार’ से कांग्रेस को मात दे रही भाजपा

केंद्र में सरकार बनाने के बाद से ही भाजपा कांग्रेस के खिलाफ ‘मेंटल वार’ का सहारा ले रही है. भाजपा के आक्रामक प्रचार अभियान का मुकाबला कांग्रेस नहीं कर पा रही है. 15 साल बाद असम से कांग्रेस क्या हारी, भाजपा ने ऐसा प्रचार करना शुरू कर दिया, जैसे कांग्रेस पूरे देश से खत्म हो गई है. कांग्रेस के संगठन में जंग लग चुका है. वह न तो भाजपा के ‘मेंटल वार‘ की कोई काट तलाश पा रही है और न ही उससे अपना बचाव कर पा रही है. भाजपा शासित राज्यों में घट रही परेशानियों को वह उजागर करने में असफल हो रही है.

कांग्रेस के नेता जमीनी कम और हवा हवाई ज्यादा है. वह अपने जनाधार से टूट चुके हैं. इसके बाद भी युवा नेताओं को संगठन में अधिकार नहीं देना चाहते. इसके विपरीत भाजपा के पास मजबूत संगठन है. वह अपनी हर लडाई को हिन्दुत्व से जोडकर व्यापक प्रचार अभियान चलाने में सफल हो जाती है. भाजपा सरकार की तमाम नीतियां जमीनी स्तर पर असफल हो रही हैं. कांग्रेस संगठन को इन पर चर्चा करनी चाहिये. कांग्रेस के पास ऐसी कोई रणनीति नहीं है, जिससे वह भाजपा के ‘मेंटल वार’ का मुकाबला कर सके.

देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा की लोकप्रियता कम हुई है. कांग्रेस की लोकप्रियता बढी भले ही न हो, पर पहले से कम भी नहीं हुई है. यह भाजपा के ‘मेंटल वार‘ का कमाल है कि भाजपा की बढ़त दिखाई दे रही है. भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को पूरी तरह से पप्पू साबित करने का काम किया है. जिससे लोगों को कांग्रेस से उम्मीद खत्म हो जाये.

कांग्रेस ने लोकसभा में भाजपा के हमले को जबाव दिया था पर उससे आगे वह लडाई जारी नहीं रख पाई. संसद जैसी घेराबंदी अगर कांग्रेस ने जनता के बीच पहुंच कर सड़को पर की होती, तो उसे इस ‘मेंटल वार’ से राहत मिल सकती थी. भाजपा यह बात समझती है कि वह दूसरे क्षेत्रीय दलों से जमीनी स्तर पर लड़ने मे जीत नहीं सकती, ऐसे में वह कांग्रेस की कमजोर नस पर ही एक के बाद एक वार कर रही है. राहुल को निशाने पर लेने के बाद सोनिया गांधी को कमजोर करने के लिये घोटाले का आरोप लगाया.

सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी बात को बार बार दोहराकर सच साबित करने की कोशिश बहुत हद तक सफल हो जाती है. अखबार और प्रचार के दूसरे माध्यम भी ‘मेंटल वार’ का हिस्सा बन जाते हैं. कांग्रेस के लिये जरूरी है कि वह अपने संगठन को मजबूत करे उसको जमीनी स्तर पर सक्रिय करे. जिससे भाजपा के ‘मेंटल वार’ के हर तीर का जबाव मजबूती से दिया जा सके.

जमीनी स्तर पर कांग्रेस की हालत में ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है कि वह देश से खत्म हो गई है. कांग्रेस को अपना खुद का आत्मविश्वास जगाकर भाजपा के ‘मेंटल वार’ का मुकाबला करने भर की जरूरत है. इस मुकाबले के लिये जरूरी है कि कांग्रेस खुद में आत्मविश्वास लाये. उसके नेताओं में नई चेतना जगे, जिससे वह जमीनी स्तर पर सच को न केवल समझा सके, बल्कि भाजपा पर जवाबी हमला भी कर सके.

चार साल बाद IIFA में परफॉर्म करेंगे सलमान खान

करीब चार साल बाद अभिनेता सलमान खान स्पेन के मेड्रिड में होने वाले 17वें ‘इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडेमी अवार्ड्स’ में परफॉर्म करने वाले हैं. इसके लिए वे काफी तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि उनके इस परफोर्मेंस से फिल्म फैटरनिटी और आयोजक बहुत खुश हैं.

इस बारे में सलमान का कहना है कि मैं ऋतिक रोशन और टाइगर श्राफ की तरह डांस नहीं कर सकता, पर कोशिश जारी है, दर्शक मुझसे काफी उम्मीद न रखें. इस अवार्ड कार्यक्रम में सलमान के अलावा टाइगर श्राफ, अनिल कपूर , शिल्पा शेट्टी कुंद्रा आदि कुछ न कुछ परफॉर्म करते हुए नज़र आएंगे. सुनने में आ रहा है कि सलमान एक बार फिर सूरज पंचोली को लेकर फिल्म बनाने वाले हैं. इसलिए दोनों आजकल साथ साथ दिखाई पड़ रहे हैं.

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं. वह शारीरिक संबंध बनाने को कह रहा है. क्या करना चाहिए.

सवाल

मैं 1 साल से एक लड़के से प्यार करती हूं. वह भी मुझे बेहद चाहता है. हमेशा मेरी इच्छाओं का सम्मान करता है. ऐसा कोई काम नहीं करता जो मुझे नागवार गुजरता हो. मगर अब कुछ दिनों से वह शारीरिक संबंध बनाने को कह रहा है पर साथ ही यह भी कहता है कि यदि तुम्हारी मरजी हो तो. मैं ने उस से कहा कि ऐसा करने से यदि मुझे गर्भ ठहर गया तो क्या होगा? इस पर उस का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं होगा. कृपया राय दें कि मुझे क्या करना चाहिए? जवाब

जवाब

दोस्ती में एकदूसरे की इच्छाओं को तवज्जो देना जरूरी होता है. तभी दोस्ती कायम रहती है. इस के अलावा आप का बौयफ्रैंड अभी आप का विश्वास जीतने के लिए भी ऐसा कर रहा है. जहां तक शारीरिक संबंधों को ले कर आप की आशंका है तो वह पूरी तरह सही है. यदि आप संबंध बनाती हैं तो गर्भ ठहर सकता है, इसलिए शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने से हर हाल में बचना चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

नासूर पर मरहम पट्टी

मतदाता के फैसले का हम सम्मान करते हैं, हार की समीक्षा की जायेगी, ये ऐसे शब्द हैं जिन्हे कांग्रेस हर हार के बाद दोहराती है. इसके बाद दूसरी पंक्ति के नेता अपने हिस्से के संवाद दोहराते हैं कि दरअसल कांग्रेस मे बड़ी सर्जरी की ज़रूरत तो है, पर शीर्ष में नहीं बल्कि निचले स्तर पर है. बचे खुचे आधा दर्जन दिग्गजों मे से एक कमलनाथ ने भी यही कहते एक तरह से आलाकमान यानि सोनिया-राहुल गांधी को क्लीन चिट दे दी है. इससे समझने वाले समझ गये हैं कि पांच राज्यों की दुर्दशा पर अब पूर्ण विराम लग गया है. वैसे भी चुनावी झांकी उठ गई है और मूर्ति विसर्जन भी हो चुका है. सियासी कुरुक्षेत्र मे अब धूल उड़ रही है जीतने वाले राजतिलक की तैयारियों मे जुट गये हैं और हारने वाले विश्लेषण के नाम पर मातम मना रहे रहे हैं.

कमलनाथ के कहने का मतलब बेहद साफ है कि चिंता की कोई बात नहीं, कुछ दिनों बाद चमत्कार होगा और कांग्रेस पहले की तरह राज़ करेगी. जो हो रहा है वह सब मिथ्या और भ्रम है, इसलिये जो कांग्रेसी बचे हैं उन्हे निराश होने की ज़रूरत नहीं. ये आकाशवाणियां ज़मीन से कांग्रेस करने की आदी हो चुकी है, जिसका सार इतना भर होता है कि सोनिया राहुल के वाबत कोई मुंह न खोले, क्योंकि उससे कोई फायदा नहीं होने वाला. वे तो शाश्वत हैं, फ़िर सर्जरी कहां होनी है और कौन करेगा, यह न तो अब कोई पूछने वाला और न कोई बताने वाला.

यही वह मानसिकता है जिसके चलते प्रतिबद्ध कांग्रेसी घर बैठ गये हैं और ममता-जयललिता जैसी मेहनती नेत्रीया कांग्रेस पर भारी पड़ने लगी हैं. जो कमल नाथ ने कहा वही अमित शाह ने दूसरे शब्दों मे कहा कि देश कांग्रेस मुक्त हो रहा है, भगवा युक्त होने का दावा तो हमने कभी नहीं किया, यानि उंगली नरेंद्र मोदी के उतरते जादू पर न उठाई जाये. असम जीतकर भाजपा को बहाने बनाने का हक है पर भरोसा खो चुकी कांग्रेस तो नासूर पर मरहम पट्टी की बात कर जख्म को ढक भर रही है, जो साल भर बाद फ़िर रिसेगा. तब कमलनाथ या दिग्विजय सरीखे नेता फ़िर कहेंगे, सर्जरी की ज़रूरत तो है पर निचले स्तर पर.

ये दूसरी पंक्ति के होनहार और आरामतलब नेता असल मे एक तीर से दो निशाने साधते हैं. पहला सोनिया राहुल को यह भरोसा दिलाना कि आप चिंता मत करो नीचे वालों को हम संभालल लेंगे, अब यह इने गिने लोग ही जानते हैं कि नीचे अब कुछ नहीं बचा है, दूसरे इन नेताओं को चिंता खुद को बनाये रखने की है क्योंकि काँग्रेस छोड़ ये कहीं जा नहीं सकते और न कांग्रेस डुबोने वाले इन होनहार नेताओं को कोई भाव देने वाला. इनसे बेहतर तो रीता बहुगुणा जोशी हैं जो अफवाहों में ही सही भाजपा खेमे मे जाने की सम्भावनाओं से इनकार नहीं करतीं और इन सब खुशामदियो से लाख गुना बेहतर और दूरदर्शी ममता बनर्जी थीं, जिन्होने अलग पार्टी बनाकर खुद का अस्तित्व बनाये रखा.

यह राजनातिक समीक्षकों का डर और पूर्वाग्रह ही कहा जायेगा कि वे कांग्रेस के खात्मे या उसके गैर ज़रूरी होने की बात नहीं कर पा रहे, क्योंकि उनका वजूद भी इसी मरहम पट्टी वाले इलाज से होकर जाता है. ये लोग कमलनाथ सरीखो की तरह बेहतर जानते हैं कि कांग्रेस ख़त्म तो हम भी ख़त्म, इसलिये मलहम वहां लगाने की बात करो, जहां जख्म है ही नहीं.

BCCI की विरासत को आगे ले जाएंगे ठाकुर: गांगुली

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और बंगाल क्रिकेट संघ (सीएबी) के अध्यक्ष सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के नवनियुक्त अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को बधाई देते हुए कहा कि बोर्ड के पूर्व सचिव को अपने पूर्ववर्ती अध्यक्षों की विरासत को आगे ले जाना है. हिमाचल प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लोकसभा सदस्य 41 वर्षीय ठाकुर को असम, बंगाल, त्रिपुरा, झारखंड सहित सभी पूर्वी क्षेत्रों के सदस्यों तथा राष्ट्रीय क्रिकेट क्लब के सदस्यों से समर्थन मिला.

ठाकुर को रविवार को विशेष आम बैठक (एसजीएम) में निर्विरोध रूप से 2014-17 की शेष अवधि के लिए बीसीसीआई का अध्यक्ष चुना गया. उन्होंने शनिवार को इस पद के लिए नामांकन दाखिल किया था. भाजपा के लोकसभा सदस्य अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के कार्यकारी बोर्ड और एशियाई क्रिकेट परिषद (एसीसी) में बीसीसीआई का प्रतिनिधित्व करेंगे.

गांगुली ने रविवार को संवाददाताओं को बताया, “निश्चित तौर पर उन्हें इस पद पर काम कर चुके पूर्ववर्तियों की विरासत को आगे लेकर जाना है . मैं आश्वस्त हूं कि वह सचिव की तरह ही वह इस पद पर भी उसी निष्ठा से काम करेंगे .”

पूर्व कप्तान ने कहा, “वह अपने काम को जानते हैं और वह इसे आगे लेकर जाएंगे.” शशांक के बीसीसीआई अध्यक्ष पद छोड़ने और फिर आईसीसी का पहला स्वतंत्र चैयरमैन बनने के बाद से ही बीसीसीआई सचिव ठाकुर के इस पद पर आसीन होने की अटकलें लगाई जा रही थीं.

मनोहर ने जगमोहन डालमिया का अचानक निधन होने के बाद इस पद का कार्यभार संभाला था. गांगुली ने कहा, “मेरा मानना है कि हर कार्य कई चुनौतियों के साथ आता है. मुझे नहीं लगता कि यह कांटों का ताज है, फिर चाहे आप बेहतरीन गेंदबाजी के खिलाफ बल्लेबाजी करें या बीसीसीआई के अध्यक्ष हों. हर काम के साथ चुनौतियां और उम्मीदें जुड़ी होती हैं और आपको उनके साथ काम करना होता है.”

महाराष्ट्र क्रिकेट संघ (एमसीए) के प्रमुख और बिजनेस टायकून अजय शिरके को बीसीसीआई का सचिव नियुक्त किया गया है. भारत के पूर्व कप्तान ने कहा, “मुझे लगता है कि शिरके और ठाकुर के साथ बीसीसीआई आगे बढ़ेगा. बोर्ड ने पिछले समय में काफी अच्छा काम किया और काफी अनुभवी हाथों में इसकी कमान रही है, जहां खिलाडियों और घरेलू खिलाड़ियों पर काफी ध्यान दिया जाता है.”

भारत-न्यूजीलैंड के रात-दिन के टेस्ट मैच के बारे में 42 वर्षीय गांगुली ने कहा, “यह टेस्ट मैच काफी जरूरी हैं. यह जल्द ही भारत में होने वाले हैं. मुझे नहीं लगता कि अब यह भारत से ज्यादा दूर हैं.”

गांगुली ने कहा, “मेरे लिए टेस्ट क्रिकेट इस खेल का सबसे अच्छा प्रारूप है. किसी भी खिलाड़ी के लिए यह एक बेहतरीन चुनौती है और दिन-रात के टेस्ट मैच इसके विकास का सबसे अच्छा तरीका है.”

किसान की कहानी, उन्हीं की जबानी

ग्राम मिलक रावली निवारी के 55 साल के किसान देवेंद्र सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद के कृषि वैज्ञानिकों से मधुमक्खी पालने के तरीकों के बारे में साल 2005 में जानकारी प्राप्त की और एक मधुमक्खी पालने का केंद्र शुरू किया. उस केद्र में पहले साल मधुमक्खी के 5 बक्से रखे. 1 बक्से की कीमत 2 हजार रुपए फ्रेम के साथ थी. उन्होंने सिर्फ 10 हजार रुपए में मधुमक्खी पालने का काम शुरू किया. इस काम से देवेंद्र सिंह को 15 हजार रुपए की कीमत का शहद प्राप्त हुआ और साल 2006 में उन्होंने 10 बक्से तैयार किए. उन 10 बक्सों से देवेंद्र सिंह ने 36 हजार रुपए का शहद बेचा. साल 2007 में उन्होंने 30 बक्से तैयार किए, जिन से उन को 72 हजार रुपए की आमदनी हुई थी.

मधुमक्खी पालने के काम से ज्यादा आमदनी देख कर उन की इस काम में रुचि बढ़ गई. साल 2008 में उन्होंने 60 बक्से तैयार किए, जिन से उन्हें 1 लाख, 36 हजार रुपए की अमादनी हुई थी. साल 2009 में उन्होंने 120 बक्से तैयार किए. उस से उन्हें 2 लाख 88 हजार रुपए की आमदनी हुई. देवेंद्र सिंह ने बताया कि साल 2009 में 2 लाख 88 हजार रुपए की आमदनी होने के बाद उन के मधुमक्खी के बक्से चोरी हो गए थे. केवल 10 बक्से बचे थे. साल 2010 में देवेंद्र सिंह को काफी नुकसान हुआ, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने मधुमक्खी पालने के काम को फिर से शुरू किया. आज देवेंद्र सिंह के पास 150 बक्से तैयार हैं, जिन से उन्हें करीब 3 लाख रुपए की आमदनी होती है. देवेंद्र सिंह ने दावा किया है कि इस काम में कम खर्च से ज्यादा आमदनी होती है. यह काम बेरोजगारों के लिए बहुत ही फायदेमंद है.

कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद के वैज्ञानिकों से देवेंद्र सिंह ने मधुमक्खी पालने के तरीके के साथ पशु पालने की जानकारी भी साल 2005 में ली थी. पशु पालने के तरीके की जानकारी के बाद देवेंद्र ने 1 गाय व 1 भैंस पालना शुरू किया. वैज्ञानिकों से मिली जानकारी व पशुओं के रखरखाव की जानकारी का इस्तेमाल कर के पशुओं के दूध के धंधे से उन्हें हर साल 65 हजार रुपए से ज्यादा की आमदनी हुई. देवेंद्र सिंह के बड़े बेटे गौरव इस काम में उन की मदद करते हैं.

देवेंद्र सिंह ने बताया कि उन के पास 1 हेक्टेयर जमीन है. उस जमीन में वे खरीफ व रबी की फसल में मक्का (हरा चारा), उड़द, गेहूं व गन्ने की खेती करते हैं. उन्होंने केंचुआ खाद तैयार करने का काम भी शुरू किया है.

देवेंद्र सिंह ने केंचुए पालने की जानकारी कृषि वैज्ञानिकों से साल 2008 में ली थी और अपने खेत में केंचुआ खाद तैयार करने का काम शुरू किया था. उन्होंने कुल 5 हजार रुपए के केंचुए खरीद कर इस काम को शुरू किया. इस काम से उन्होंने 25 हजार रुपए के केंचुए बेचे और 60 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस में घर के पशुओं के गोबर की खाद का इस्तेमाल किया गया था.

साल 2009 में देवेंद्र सिंह ने 75 हजार रुपए के केंचुए और 80 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची थी, जिस से उन्हें 67 हजार रुपए की कुल आमदनी हुई. साल 2010 में देवेंद्र सिंह ने 1 लाख 50 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख रुपए की केंचुआ खाद बेची थी, जिस में उन्हें 1 लाख 62 हजार रुपए की आमदनी हुई थी. साल 2011 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख रुपए के केंचुए और 2 लाख 30 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस से उन्हें 2 लाख 42 हजार रुपए का फायदा हुआ.

साल 2012 में उन्होंने 2 लाख 50 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख 50 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची थी, जिस से उन्हें 3 लाख 2 हजार रुपए की शुद्ध आमदनी हुई थी. साल 2013 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख 25 हजार रुपए के केंचुए और 1 लाख 80 हजार रुपए की केंचुआ खाद बेची थी, जिस से 2 लाख 97 हजार रुपए की कुल आमदनी हुई. साल 2014 में देवेंद्र सिंह ने 2 लाख 75 हजार रुपए के केंचुए और 2 लाख रुपए की केंचुआ खाद बेची, जिस से उन्हें 3 लाख 70 हजार रुपए का फायदा हुआ.

साल 2015 में देवेंद्र सिंह ने 1 लाख 25 हजार रुपए के केंचुए और 90 हजार रुपए की केंचुए खाद बेची, जिस से उन्हें 1 लाख 70 हजार रुपए की आमदनी हुई, जबकि उन के पास 500 क्विंटल केंचुआ खाद अभी बेचने के लिए रखी है.

देवेंद्र सिंह ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद उन के लिए एक वरदान साबित हुआ है, क्योंकि इस से पहले उन्हें जानकारी के लिए पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में जाना पड़ता था.

देवेंद्र सिंह का कहना है कि फसलों के लिए बीज के रखरखाव, मिट्टी की जांच, अच्छे बीज, पशुपालन, मुरगीपालन, बकरीपालन, सुअरपालन के बारे में जानकारी किसानसभा द्वारा दी जाती है. वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के उन की आमदनी दोगुनी हो गई है. उन का परिवार अब बहुत सुखी है.           

डा. प्रमोद मडके, डा. अनंत कुमार (कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद)

और इस तरह IPL में रिकार्ड बनाते जा रहे हैं कोहली

कप्तान विराट कोहली के एक और अर्धशतक के दम पर रॉयल चैंलजर्स बेंगलोर ने रविवार को दिल्ली डेयरडेविल्स को छह विकेट से हराया. जीत के साथ ही आरसीबी ने प्ले ऑफ के लिए क्वालीफाई भी कर लिया. ये आरसीबी की लगातार चौथी जीत थी, जिसके बाद वो अंक तालिका में दूसरे स्थान पर पहुंच गया.

करो या मरो के मुकाबले में दिल्ली के 139 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए आरसीबी ने सलामी बल्लेबाजी कोहली की 45 गेंद में छह चौकों की बदौलत 54 रन की नाबाद पारी से 18.1 ओवर में चार विकेट पर 139 रन बनाकर आसान जीत दर्ज की.

चलिए नजर डालते हैं इस मैच के मजेदार आकड़ों पर:

1. विराट कोहली आईपीएल सीजन में 900 से ज्यादा रन बनाने वाले पहले बल्लेबाज बने. कोहली को 1000 रन पूरे करने के लिए तीन मैचों में 81 रन चाहिए.

2. आईपीएल-9 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर ने 19 बार 50 रन की साझेदारी की है. इनमें से 16 बार कोहली साझेदारी का हिस्सा रहे हैं.

3. आखिरी चार मैचों में आरसीबी के स्पिन गेंदबाजों ने 16 विकेट झटके. जबकि पहले 10 मैचों में वो सिर्फ 15 विकेट ही ले पाए थे.

4. इस आईपीएल सीजन में अभी तक विराट कोहली 10 बार 50 से ऊपर रन बना चुके हैं. ऐसा करने वाले कोहली पहले बल्लेबाज हैं.

5. आईपीएल लीग टेबल में बेंगलोर दूसरे नम्बर पर आ गया है. आईपीएल के पिछले पांच सीजन में वही टीम चैंपियन बनी है जो ग्रुप स्टेज में दूसरे नम्बर पर थी.  

6. पहले भी आईपीएल नॉकआउट स्टेज में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर पांच बार जगह बना चुकी है.

7. दिल्ली डेयरडेविल्स का एक भी गेंदबाज आईपीएल टॉप-10 विकेट टेकर्स की लिस्ट में नहीं है.

8. क्विंटन डीकॉक टी-20 मैच में 18 बार अर्धशतक जड़ चुके हैं. इसके अलावा वो टी-20 में तीन शतक भी लगा चुके हैं.

9. आरसीबी के गेंदबाज युजवेंद्र चहल अभी तक आईपीएल-9 में 19 विकेट ले चुके हैं. बोलिंग चार्ट में चहल टॉप गेंदबाज हैं. जबकि वो दूसरे नम्बर के भुवनेश्वर कुमार से कम मैच खेले हैं.

10. दिल्ली डेयरडेविल्स ने आईपीएल-9 में 35 बदलाव किये. करुण नायर, संजू सैमसन और अमित मिश्रा सिर्फ ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने सभी 14 मैच खेले.

सोलर सिस्टम : ऊर्जा का नया भविष्य

यकीनन सोलर ऊर्जा यानी धूप से मिलने वाली ऊर्जा भविष्य की जरूरत है. सोलर ऊर्जा से चलने वाली मशीनों को ले कर नएनए प्रयोग हो रहे हैं. सोलर के साथ सब से खास बात यह है कि इस से ध्वनि प्रदूषण, बिजली बिल और पावर कट की खामियों से बचा जा सकता है. बिजली की कटौती, बिजली की बढ़ती कीमत, लो वोल्टेज की समस्या और जनरेटर के महंगे इस्तेमाल से सोलर ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है. घरेलू सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार ने 40 फीसदी छूट देने का काम भी शुरू किया है, जिस की वजह से सोलर वाटर पंप सिस्टम, सोलर पावर प्लांट, सोलर रूफटौफ इनवर्टर, सोलर वाटर हीटर की मांग बढ़ती जा रही है. किसानों के लिए सोलर सब्सिडी योजना सरकार चला रही है, जिस की वजह से किसानों को 75 फीसदी अनुदान मिल जाता है. किसानों के अलावा दूसरे लोगों के लिए भी सोलर सिस्टम लगाना सरल होता जा रहा है. जिस तरह से केंद्र और प्रदेश सरकारें सोलर सिस्टम को बढ़ावा दे रही हैं, उस के चलते बैंक भी अब सोलर सिस्टम को बढ़ावा दे रहे हैं.

पूरे देश में मिलने वाला वातावरण ऐसा होता है, जिस में सूर्य की किरणें खूब मिलती हैं. सूर्य की इन किरणों का सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत अच्छा इस्तेमाल किया जा सकता है. धीरेधीरे सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल पूरे देश में होने लगा है. अब इस का इस्तेमाल फैक्टरियों में भी होने लगा है. सोलर पावर प्लांट के इस्तेमाल से बिजली बनाने का काम तेजी से होने लगा है, जिस से बिजली के इस्तेमाल की दूसरी चीजों को चलाया जा सकता है. यह बिजली की जगह इस्तेमाल होने लगा है. नई पीढ़ी के लिए सोलर ऊर्जा का नया रास्ता बनता जा रहा है. इस से बिजली की महंगी दरों से ही नहीं उस पर निर्भर रहने से भी बचा जा सकता है. आज के समय में सोलर ऊर्जा के इस्तेमाल से कई चीजों को चलाया जा रहा है.

मोबाइल सिंचाई सोलर पैनल सिस्टम

बस्ती जिले के खड़का देवरी गांव के रहने वाले किसान आज्ञाराम वर्मा ने मोबाइल सोलर सिस्टम बना लिया है. सरकार द्वारा आज्ञाराम वर्मा को सिंचाई के लिए सोलर सिस्टम दिया गया था. आज्ञाराम वर्मा के पास अलगअलग जमीनें थीं. ऐसे में एक ही खेत में सोलर पैनल लगाने से काम नहीं चल रहा था. आज्ञाराम वर्मा ने इस के लिए अलग जुगाड़ तकनीक का सहारा लिया. उन्होंने सोलर पैनल को एक ट्राली पर फिट कर दिया. इस के बाद जिस खेत में सिंचाई की जरूरत होती थी, आज्ञाराम ट्रैक्टर के जरीए उसे खींच कर वहां ले जाते थे. पंपसेट के साथ जोड़ देने से एक ही सोलर पंप से कई खेतों की सिंचाई होने लगी. आज्ञाराम वर्मा प्रगतिशील किसान हैं. उन को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया. आज्ञाराम वर्मा कहते हैं, ‘मोबाइल सोलर पैनल के बनने से एक ही सोलर पैनल से कई पंपसेटों से पानी लिया जा सकता है.’

सोलर पावर प्लांट

उन क्षेत्रों में इस से बहुत लाभ होता है, जहां पर बिजली की आवाजाही बड़ी समस्या के रूप में सामने होती है. सोलर पावर प्लांट में सोलर ऊर्जा को बिजली की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सोलर ऊर्जा बैटरी में जमा हो जाती है. इस के बाद उस का इस्तेमाल कभी भी किया जा सकता है. सोलर से मिलने वाली एनर्जी में खर्च कम होता है. इस से बिजली से चलने वाले हर यंत्र को चलाया जा सकता है. सोलर पावर प्लांट 1 किलोवाट से ले कर 10 किलोवाट तक का हो सकता है. जितनी बिजली की जरूरत हो उतने किलोवाट का इस्तेमाल किया जा सकता है.

सोलर रूफटाप इनवर्टर

इस के द्वारा अपने घर की छत पर ही सोलर पैनल लगा कर घर के इनवर्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस से बिजली की खपत कम हो जाती है. सोलर पावर से बैटरी की बैकअप पावर बढ़ जाती है. अब कई सोलर लाइट सिस्टम भी आने लगे हैं, जिन में सोलर पैनल लगे होते हैं, जिस से रात को रोशनी मिलती है. अब सोलर पैनल की कीमत और रखरखाव सरल होने से इस की खपत बढ़ रही है. लाइट के लिए 500 रुपए की कीमत से ले कर ज्यादा कीमत के उपकरण आने लगे हैं. इन को दिन में सूर्य की रोशनी से चार्ज किया जाता है और रात में ये रोशनी देने का काम करते हैं. इन में लगने वाली बैटरी बिजली में लगने वाली बैटरी के मुकाबले ज्यादा चलती है, इसलिए भी इन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. आटोमैटिक सोलर स्ट्रीट लाइट सिस्टम में सूर्य की रोशनी खत्म होते ही स्ट्रीट लाइट जल जाती है. इस का इस्तेमाल घर, दुकान और खेत वगैरह कहीं भी हो सकता है.

सोलर वाटर हीटर

जाड़ों में गरम पानी के लिए अब बिजली या एलपीजी गैस से ज्यादा सस्ता सोलर वाटर हीटर आने लगा है. इस में हीटर को सोलर ऊर्जा से चलाया जाता है, जिस से पानी गरम मिलता है. होटलों, घरों व कारखानों में इस का इस्तेमाल बढ़ने लगा है. यह पानी को गरम करने का सब से सस्ता साधन हो गया है. जाड़ों में गरम पानी की जरूरत हर जगह पड़ती है. कपड़े व बरतन धोने के साथ ही साथ गरम पानी से नहाने के लिए भी इस का इस्तेमाल किया जाता है. सोलर ऊर्जा सिस्टम को लगाने के लिए एक बार पैसा लगाना पड़ता है, इस के बाद सालोंसाल मुफ्त में बिजली मिलती है. अब सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए तमाम तरह की योजनाएं चला रही है. केवल खेती के लिए ही नहीं, जीवन के दूसरे कामों के लिए भी सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है. बैंकों के द्वारा सोलर सिस्टम को लगवाने के लिए तमाम तरह की योजनाओं के जरीए लोन भी दिए जा रहे हैं.

सरकार जल्द ही इस सोलर पैनल के जरीए बिजली पैदा कर के उसे कुछ घरों तक पहुंचा कर पैसा कमाने की योजना भी तैयार कर रही है. दरअसल सोलर ऊर्जा आने वाले दिनों की जरूरत है. यह सब से सस्ती मिलने वाली ऊर्जा है. जरूरत इस बात की है कि सोलर सिस्टम को सस्ता किया जाए, जिस से यह गरीब लोगों तक पहुंच सके. पूरी दुनिया के देश सोलर एनर्जी पर काम कर रहे हैं. भारत में भी तेजी से में यह काम होने लगा है. खेतीकिसानी से ले कर दूसरे जरूरी काम इस के जरीए होने लगे हैं. यह केवल रोशनी की दिशा में ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी बहुत फायदेमंद है. इसे लगातार बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है. बिजली के बेहतर जरीए के रूप में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है. दिनोंदिन इस का इस्तेमाल और इस से मिलने वाली राहत बढ़ती जा रही है.

बुलेट ट्रेन से बुलेट सैर

अभी तक एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए देश में यातायात का प्रमुख साधन सामान्य ट्रेनें थीं, लेकिन अब सेमी हाईस्पीड और हाईस्पीड ट्रेनें चलाने की चर्चा चल रही है. सिर्फ इतना ही नहीं, अब हम बुलेट ट्रेन पर चढ़ने की तैयारी में भी जुट गए हैं. चीन, जापान, फ्रांस जैसे अनेक देशों में ऐसी ट्रेनें पहले से ही चल रही हैं, फिर हम क्यों पीछे रहें  आज अनेक देश अपने यहां हाईस्पीड ट्रेनें चला रहे हैं. अब वह दिन दूर नहीं जब हम बुलेट ट्रेन में बुलेट की तरह सैर करेंगे.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की 3 दिवसीय भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने हाईस्पीड रेलवे पर करार किया है, जिसे आमतौर पर बुलेट ट्रेन कहा जाता है. प्रधानमंत्री शिंजो अबे 11 दिसंबर, 2015 को भारत आए थे. दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने करीब 980 अरब रुपए लागत की रेल परियोजनाओं पर सहमति का ऐलान किया है. दरअसल, बुलेट ट्रेन शुरू करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रमुख चुनावी वादा रहा है. भारत की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई और अहमदाबाद के बीच दौड़ेगी. यह 505 किलोमीटर की दूरी 7 घंटे के बजाय 2 घंटे में पूरी करेगी. इस की अनुमानित लागत 98,805 करोड़ रुपए है. इस के निर्माण में करीब 7 साल लगेंगे. इस दौरान जापान रेल, ट्रेन और संचालन प्रणाली के सभी उपकरण उपलब्ध कराएगा. इस में एक तरफ का संभावित किराया करीब 2,800 रुपए होगा. मुंबईअहमदाबाद के बीच फिलहाल सर्वाधिक भाड़ा मुंबई शताब्दी ऐक्सप्रैस प्रथम श्रेणी का 1,920 रुपए और हवाई किराया करीब 1,720 रुपए प्रति व्यक्ति है. इस में हवाई यात्रा से मात्र 70 मिनट ज्यादा लगते हैं.

मुंबईअहमदाबाद रूट पर 162 किलोमीटर पुल तथा 27.01 किलोमीटर की 11 सुरंगें भी बनेंगी. इस लाइन पर कुल 12 स्टेशन होंगे, जिन में सूरत और वडोदरा में 2-2 मिनट का ठहराव होगा. इस योजना में डिजाइन और बोली की प्रक्रिया 2017 तक पूरी कर ली जाएगी. इस बुलेट ट्रेन का व्यावसायिक संचालन 2024 से शुरू हो जाएगा. अभी बेल्जियम, फ्रांस, जरमनी, इटली, नीदरलैंड, स्पेन, इंगलैंड, चीन, जापान, कोरिया और ताइवान में हाईस्पीड बुलेट ट्रेनें चल रही हैं. साथ ही ब्राजील, भारत, मोरक्को, रूस, सऊदी अरब समेत अमेरिका में हाईस्पीड लाइनों के निर्माण का काम चल रहा है. हाईस्पीड लाइनों के विकास और उस की तकनीक मुहैया कराने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल एबीबी के मुताबिक 2020 तक दुनिया में हाईस्पीड लाइनों का नैटवर्क 42 हजार किलोमीटर तक पहुंच जाएगा.

अभी दुनिया में हाईस्पीड ट्रेनों का संचालन विकास के दौर में है. इस के परिचालन में अलगअलग देशों में अलगअलग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस की सब से पुख्ता तकनीक मैग्नेटिक लेविटेशन होती है, लेकिन इस के लिए पूरा का पूरा ढांचा अलग से तैयार करना होता है. इस कारण ज्यादातर देशों में मौजूदा ढांचे को विकसित करते हुए उसी ट्रैक पर हाईस्पीड ट्रेनें चलाई जा रही हैं.

हाईस्पीड ट्रेन खास क्यों

सब से पहले तो हम हाईस्पीड ट्रेन के बारे में जान लें. 250 किलोमीटर प्रतिघंटे या उस से अधिक स्पीड से दौड़ने वाली ट्रेन को हाईस्पीड ट्रेन कहा जाता है. कई अर्थों में यह पारंपरिक ट्रेनों से अलग है. इस टे्रन का पूरा रैक सामान्य ट्रेनों से अलग होता है और इस में आधुनिक इंजन लगाए जाते हैं. इस के इंजन का आकार एयरोडायनैमिक टाइप का होता है, जो हवा को चीरते हुए तेजी से आगे बढ़ता है. यह ट्रेन खासतौर से बनाई गई हाईस्पीड लाइन पर चलाई जाती है. बेहतर पावर सप्लाई और गुणवत्तायुक्त ट्रैक के साथ इस रेलमार्ग के घुमावदार स्थानों को खास तरीके से डिजाइन किया जाता है. साथ ही इस में उन्नत सिगनल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. अधिकतर हाईस्पीड ट्रेनें स्टील के बने ट्रैक और स्टील के ही बने पहियों पर चलती हैं, जिन की स्पीड 200 किलोमीटर प्रतिघंटे से ज्यादा होती है. इन गाडि़यों का ठहराव कम होने के साथ इन्हें सुरक्षित सिगनल सिस्टम से चलाया जाता है.

जापानी बुलेट ट्रेन की तकनीक

–       जापानी बुलेट ट्रेन की तकनीक कुछ अलग है, बेहद तेज रफ्तार से ट्रेनों को चलाने के लिए इस का ढांचा मजबूत व सुव्यवस्थित बनाया जाता है. इस के लिए एयरोडायनैमिक ढांचा सर्वाधिक उपयुक्त है. इसलिए बुलेट ट्रेन का आगे का हिस्सा पूरी तरह से हवाईजहाज के आगे वाले हिस्से की तरह डिजाइन किया जाता है.

–       ट्रेन जब अधिक रफ्तार में होती है, तो पहिए वाइब्रेट करते हैं. यदि यह वाइब्रेशन कंपार्टमैंट में बैठे यात्रियों तक पहुंचता है, तो उन्हें झटका महसूस होता है. यात्रियों को झटकों से बचाने के लिए बोगियों को सपाट बनाया जाता है साथ ही एयरस्प्रिंग का इस्तेमाल भी किया जाता है, जो वायु के दाब से पहियों से पैदा हुए झटकों से बचाता है.

–       जापान में बुलेट ट्रेन के लिए अलग से पटरियां बिछाई गई हैं. इस रेल मार्ग पर ज्यादा घुमावदार मोड़ नहीं बनाए गए हैं. साथ ही समान लेवल पर कोई दूसरी रेल लाइन इसे क्रौस न करे, इस का भी खयाल रखा गया है, ताकि न तो इन ट्रेनों को कहीं रुकना पड़े और न ही किसी अन्य ट्रेन को पास देने का इंतजार करना पड़े.

–       सामान्य ट्रेनों के संचालन के समय उस का चालक सिगनल के मुताबिक ट्रैक पर ट्रेन को नियंत्रित रखता है, लेकिन बुलेट ट्रेन के चालक के लिए यह बेहद मुश्किल होता है कि वह 250 किलोमीटर प्रतिघंटे से ज्यादा की स्पीड पर ट्रेन चलाते समय सिगनल को समझ सके. इसलिए इन ट्रेनों में एक अलग तरह के स्पीड कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे एटीसी कहा जाता है. इस सिस्टम के तहत ट्रैक के माध्यम से स्पीड की सूचना लगातार चालक की सीट के पास जुड़े हुए सिगनल तक भेजी जाती है. एटीसी स्वत: टे्रन को निर्दिष्ट रफ्तार पर चलाता है. साथ ही यह सैंट्रलाइज्ड ट्रैफिक कंट्रोल पर भी निर्भर है, जो यह सुनिश्चित करता है कि 2 ट्रेनों के बीच पर्याप्त दूरी और समय का अंतराल है, ताकि उच्चगति वाली इन ट्रेनों का संचालन सुरक्षित तरीके से हो.

भारतीय बुलेट ट्रेन की खास बातें

–       यह बुलेट ट्रेन भारत के वित्तीय केंद्र मुंबई से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की राजधानी अहमदाबाद को जोड़ेगी. दोनों शहरों के बीच 505 किलोमीटर की दूरी है, जिसे अभी ट्रेन से तय करने में करीब 7 घंटे लगते हैं. बुलेट ट्रेन आने के बाद यह दूरी सिर्फ 2 घंटे की रह जाएगी.

–       इस परियोजना की अनुमानित लागत 98.805 करोड़ रुपए है, जिस में 2017 से 2023 के बीच 7 साल के निर्माणकाल के दौरान मूल्य और ब्याज वृद्धि भी शामिल है. इस दौरान पटरियों, ट्रेनों और संचालन प्रणाली तक सभी तरह के उपकरण जापान ही उपलब्ध कराएगा.

–       जापान इंटरनैशनल कौर्पोरेशन एजेंसी (जेआईसीए) और भारत के रेल मंत्रालय ने 2 साल पहले ही हाईस्पीड रेल बनाने और चलाने संबंधी पहलुओं का अध्ययन शुरू किया था. इस बुलेट ट्रेन का व्यावसायिक संचालन 2024 से शुरू हो जाएगा.

क्यों खास है जापान की बुलेट ट्रेन

कुछ खास तो जरूर है जापानी बुलेट ट्रेन में, जिस की वजह से पूरी दुनिया में इस की चर्चा होती है. सब से खास बात यह है कि यह ट्रेन अपने नाम की तरह ही बुलेट की गति से चलती है. 1 घंटे में यह रेलगाड़ी 200 से 250 किलोमीटर का सफर तय करती है. इस को भले ही भारत और दुनिया बुलेट ट्रेन कहती हो, लेकिन इस का असली नाम है शिन्कासेन. इस रेलगाड़ी की एक अन्य खासीयत यह है कि इस की सफाई भी बहुत तेज गति से ही होती है. इस गाड़ी की सफाई में 5 मिनट भी नहीं लगते हैं. यह रेलगाड़ी कभी लेट नहीं होती है. अगर विशेष परिस्थितियों में यह गाड़ी लेट भी हो जाती है तो यह अधिकतम 36 सैकंड ही लेट होती है. अगर इस की सफाई की बात करें तो इस के कर्मचारी इस रेलगाड़ी के टोक्यो पहुंचने से पहले ही इस में सवार हो जाते हैं और ट्रेन में आनेजाने वालों का अभिवादन करने के साथ ही उन्हें खुश करने के लिए अपने कपड़ों पर कोई न कोई फूल लगाते हैं.

अगर शिन्कासेन ट्रेन की बात करें तो टोक्यो स्टेशन पर दिन भर में करीब 210 बार बुलेट ट्रेन आतीजाती हैं. हर रेलगाड़ी का ठहराव करीब 12 मिनट होता है. यह पूरी तरह कंप्यूटरीकृत प्रणाली से नियंत्रित होता है. यूपीए-2 के शासनकाल में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जापान गए थे तो उन्होंने भी इस रेलगाड़ी का प्रस्तुतिकरण देखा था. अब भारत में भी बुलेट ट्रेन चलेगी. लेकिन देखना यह है कि क्या सुविधा और सफाई में शिन्कासेन का मुकाबला कर पाएगी भारतीय रेल.

प्रिंट मीडिया बनाम सोशल मीडिया

आज के तकनीकी युग में सोशल मीडिया ने अपनी खास पहचान बनाई है. गृहिणी हो या सैलिब्रटी, स्टूडैंट हो या टीचर हर कोई सोशल मीडिया पर व्यस्त है. वर्तमान दौर में इस का सब से बड़ा वाहक बन गया है स्मार्टफोन. तरहतरह के ऐप्स से लोडेड स्मार्टफोन से दुनियाभर के तमाम काम संपन्न होते हैं. इस के अलावा अब स्मार्टफोन समाचारों के प्रसार का भी सुलभ माध्यम बनता जा रहा है. कहीं भी कोई घटना घटी नहीं कि लोग अपना स्मार्टफोन निकाल कर तुरंत उस का वीडियो बना कर अपने फ्रैंड्स को भेज देते हैं. जो नहीं कर पाते वे मोबाइल से मैसेज या घटना का ब्योरा तो बता ही देते हैं और तुरंत ही एक से दूसरे फोन पर पहुंच यह वायरल भी हो जाता है.

सोशल मीडिया का सब से खास और हरहाथ सुलभ साधन स्मार्टफोन न्यूज का प्रमुख वाहक है, लेकिन क्या इस पर प्रसारित न्यूज वास्तव में न्यूज कही जा सकती है

संपादन का अभाव

सोशल मीडिया पर जितनी भी न्यूज प्रसारित की जाती हैं उन का कोई ओरछोर नहीं होता. वे या तो किसी व्यक्ति द्वारा मोबाइल से बना कर डाल दी जाती हैं या फिर व्यक्ति विशेष के अपने विचार होते हैं, जिन का किसी प्रकार से संपादन भी नहीं किया गया होता, न ही इन खबरों के मुख्य तथ्यों की कोई जांच होती है और न ही आंकड़ों का अध्ययन. बस, एक ने खबर बनाई और दूसरे के पास जस की तस फौरवर्ड कर दी. इस के विपरीत प्रिंट मीडिया में प्रसारित, किसी भी खबर का न केवल मूल्यांकन किया जाता है बल्कि उस के इर्दगिर्द के पहलुओं का भी ध्यान रखा जाता है. इस के बावजूद भाषा, आंकड़े, तथ्य जांच कर संपादित कर प्रकाशित किए जाते हैं. कहीं किसी तथ्य से देश व समाज में अराजकता तो नहीं फैल जाएगी या फिर किस तथ्य को छिपाना समाज व देशहित में रहेगा, यह भी देखा जाता है जबकि सोशल मीडिया इन सब चीजों से मुक्त है.

बेहूदा कमैंट्स का पुलिंदा

सोशल मीडिया पर प्रसारित हर खबर सिर्फ फौरवर्ड की हुई होती है. ज्यादातर तो पढ़ने और देखने के पहले ही बस, लाइक पर क्लिक कर देते हैं. कुछ ही पढ़ते व देखते हैं और उस पर कमैंट करते हैं, लेकिन ये कमैंट्स भी इतने बेहूदा होते हैं कि आप किसी के सामने पढ़ भी नहीं सकते. तिस पर उन्हें शेयर कर फौरवर्ड भी कर दिया जाता है, जो सब के पास स्क्रीन पर मिनटों में पहुंच जाते हैं, जैसे भ्रष्टाचार पर कोई खबर है तो लिख देंगे ‘गोली मारो सालों को’ या फिर गालीगलौज से लबरेज भाषा से उस का प्रचार करेंगे, जो बहुत भद्दा लगता है. इस के विपरीत प्रिंट मीडिया की किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पहले इस का गहनता से अध्ययन होता है व बेकार बातें खबर में से काट दी जाती हैं और सभ्य तरीके से उसे समाज के समाने परोसा जाता है.

अभद्र भाषा का प्रयोग

सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री में अभद्र भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता है, खासकर व्हाट्सऐप पर तो बेझिझक कुछ भी डाल दिया जाता है. पढ़नेसुनने वाला इस से खुश होगा या नहीं यह भी नहीं सोचा जाता. ऐसे में अगर किसी महिला या बच्चे के हाथ फोन पड़ जाए और वह उसे सुनपढ़ ले तो अनर्थ हो जाए. लेकिन प्रिंट मीडिया में प्रकाशित होने वाली सारी सामग्री का पहले तो संपादन होता है और फिर उस से अवांछित सामग्री हटा दी जाती है. सिर्फ एक व्यक्ति द्वारा सुनपढ़ कर फौरवर्ड करने के बजाय अनेक हाथों से निकलने के बाद यह सामग्री प्रकाशन के लिए जाती है. इसलिए उस में अभद्र भाषा होने की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती.

सीमित पाठक वर्ग

सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री का पाठक वर्ग बहुत सीमित होता है, क्योंकि अपने ग्रुप, दोस्त या रिलेटिव आदि ही हमारी फ्रैंडलिस्ट में होते हैं. जब कोई सामग्री प्रसारित की जाती है तो यही लोग उसे देखते व लाइक करते हैं्. प्रिंट मीडिया की खबरें पत्रपत्रिका में प्रिंट होने के बाद सार्वजनिक होती हैं. इन्हें कोई भी पढ़ सकता है व लाइब्रेरी, बुकस्टौल, पत्रपत्रिका विक्रेता आदि द्वारा हर जगह वितरित कर दी जाती हैं. बड़ेबड़े होटलों के रिसैप्शन, शोरूम, औफिस के रिसैप्शन, वेटिंग रूम, प्लेटफौर्म, बस, ट्रेन में सफर के दौरान लोग इन्हें पढ़ते व आगे कई हाथों तक पहुंचाते हैं, इस तरह जहां सोशल मीडिया का पाठक वर्ग सीमित है, वहीं प्रिंट मीडिया का वर्ग अनंत है.

छेड़छाड़ की गुंजाइश

पिछले दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए हंगामे में देशद्रोह के नाम पर कन्हैया की गिरफ्तारी और सुबूतों के अभाव में मिलने वाली बेल में अहम भूमिका उस वीडियो क्लिपिंग की थी जिस में बाद में पाया गया कि उस में छेड़छाड़ की गई थी. दरअसल, स्क्रीन पर डिजिटल न्यूज को तोड़मरोड़ दिया जाता है. कई औप्शंस द्वारा कंप्यूटर पर उस में बदलाव किए जा सकते हैं. लेकिन प्रिंट मीडिया में एक बार प्रकाशित होने के बाद छेड़छाड़ की आशंका नहीं रहती और वह जस की तस सब तक पहुंचती है. कोई गलती होने पर या फिर इस की आशंका होने पर सिर्फ बाद में भूल सुधार कर क्षमा मांगी जा सकती है. अंतत: कहा जा सकता है कि भले ही सोशल मीडिया ने कंप्यूटर, स्मार्टफोन की स्क्रीन के जरिए जनजन तक अपनी पैठ बना ली हो, लेकिन प्रिंट मीडिया के मुकाबले वह आज भी बौना साबित हो रहा है. सचाई, समझ, बुद्धिमत्तापूर्ण खबर आज भी प्रिंट मीडिया ही दे रहा है जो परिपक्वता की समझ व बुद्धिमत्ता का परिचायक है. अत: प्रिंट मीडिया आज भी श्रेष्ठ है.                       

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