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अभिषेक बच्चन ने नहीं सुना फिल्म ‘मुबारका’ का नाम

इन दिनों बौलीवुड में कलाकारों की अदला बदली की खबरें काफी गर्म हैं. इन्ही खबरों के बीच यह खबर भी चर्चा में है कि फिल्म ‘‘शौकीन’’ फेम निर्माता मुराद खेतानी की मिलाप झवेरी के निर्देशन में बनने वाली फिल्म ‘‘मुबारका’’ में अब अभिषेक बच्चन की जगह अर्जुन कपूर आ गए हैं. इतना ही नहीं अब फिल्म ‘‘मुबारका’’ का निर्देशन अनीस बज़मी करेंगे.

मगर जब हमने इस बारे में अभिषेक बच्चन से बात की, तो अभिषेक बच्चन ने कहा-‘‘यह ‘मुबारका’ है क्या? मैंने तो अब तक फिल्म ‘मुबारका’ का नाम ही नहीं सुना? मुझसे अब तक ‘मुबारका’ को लेकर किसी ने कोई बात नहीं की है. इसलिए इस फिल्म को करने या न करने वाली बात कहां से आ गयी? सच यह है कि मैं पिछले डेढ़ माह से स्लिप डिस्क की वजह से बिस्तर पर था. अब कुछ आराम मिला है, तो मैं फिल्म ‘हाउसफुल 3’ के प्रमोशन में लगा हुआ हूं. इस बीच नई फिल्म के संदर्भ में मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई है.’’

मानसिक रोगियों के प्रति सक्रिय हुआ दीपिका का फाउंडेशन

पिछले वर्ष जब दीपिका पादुकोण ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि वह कुछ समय के लिए डिप्रेशन में चली गयी थीं और किस तरह अपने परिवार व डाक्टरों की मदद से वह डिप्रेशन से उबर पायी. तब लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ था.

मगर दीपिका पादुकोण का मानना रहा है कि कोई भी इंसान कई वजहों से डिप्रेशन का शिकार हो सकता है. इसी के साथ डिप्रेशन के शिकार मरीजों की मदद के लिए दीपिका पादुकोण ने एक एनजीओ किस्म का फाउंडेशन ‘‘द लाइव लव लॉफ फांउडेशन’’ की शुरूआत की थी. लगभग एक साल बाद दीपिका पादुकोण का यह फांउडेशन सक्रिय हो गया है.

अब दीपिका पादुकोण का ‘‘द लाइव लव लॉफ फाउंडेशन’’ आम चिकित्सकों में मानसिक चिकित्सा के प्रति भारत भर में जागरूकता लाने के मकसद से एक कार्यक्रम ‘‘मोर देन जस्ट सैड’’ लेकर आया है. यह कार्यक्रम उन चिकित्सकों की मदद करेगा, जो कि डिप्रेशन या मानसिक बीमारी से ग्रस्त मरीजों का ईलाज कर रहे हैं.

इस कार्यक्रम की चर्चा करते हुए दीपिका पादुकोण कहती हैं-‘‘हम यह मानकर चल रहे हैं कि हम यह जो कार्यक्रम लेकर आए हैं, वह कार्यक्रम मरीजों का ईलाज करने की दिशा में पहली मदद करेगा कि डाक्टर, मरीज की बीमारी को सही ढंग से समझ पाएगा. हमारा यह कार्यक्रम डाक्टरों को मरीज की बीमारी को समझने व उनका सही ईलाज करने में मददगार साबित होगा. डिप्रेशन, तनाव और चिंता सहित मानसिक बीमारी से जूझ रहे मरीजों को हमारा यह कार्यक्रम इस तरह की बीमारी का सामना करने के लिए प्रेरणा देगा.’’

अगर क्रिकेट खेलना हैं, तो ज़िम्बाब्वे जाना ही पड़ेगा धोनी को

भारतीय वन-डे और टी-20 टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी शायद इस बार ज़िम्बाब्वे ज़रूर जाएंगे, क्योंकि अगर वह इस दौरे पर नहीं गए, तो सारा साल घर पर बैठने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे…

दरअसल, एमएस धोनी का ज़िम्बाब्वे जाना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि टीम इंडिया को इस साल सिर्फ ही पांच वन-डे मैच और खेलने हैं, तथा ज़िम्बाब्वे दौरे के बाद कोई टी-20 मैच तो होगा ही नहीं… सो, सूत्र बताते हैं कि धोनी ज़िम्बाब्वे दौरे पर ज़रूर जाएंगे, और बोर्ड से आराम की गुज़ारिश नहीं करेंगे…

टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद खिलाड़ियों के पास दौरे चुनने का विकल्प बहुत कम रह जाता है, सो, पिछली बार वर्ष 2015 में जब भारतीय टीम ज़िम्बाब्वे गई थी तो बोर्ड के विकल्प देने पर धोनी ने आराम किया था, और उस वक्त टीम की कप्तानी अजिंक्य रहाणे को दे दी गई थी…

बोर्ड इस साल भी सीनियर खिलाड़ियों को आराम देने के बारे में सोच रहा है…बोर्ड इस साल भी उन सीनियर खिलाड़ियों को ज़िम्बाब्वे दौरे पर आराम देने के बारे में सोच रहा है, जो तीनों फॉरमैट में खेलते हैं, इसलिएए, दिसंबर, 2014 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके धोनी का ज़िम्बाब्वे जाना इसलिए भी ज़रूरी है…

इस वक्त पूरी तरह फिट धोनी के लिए ज़िम्बाब्वे न जाने की कोई वजह फिलहाल नज़र नहीं आती, और अगर वह गए, तो यह 2005 के बाद उनका पहला ज़िम्बाब्वे दौरा होगा.

‘डॉन को पकड़ना नामुमकिन है, पर विराट उसे भी पकड़ सकते हैं’

वीरेंद्र सहवाग अपने क्रिकेट करियर के दौरान बिंदास अंदाज के लिए जाने जाते रहे हैं. कई बार उनके साथी खिलाड़ियों ने भी इसका खुलासा किया है कि मुश्किल मैच में भी वह बिना किसी दबाव के अपने पसंदीदा गाने गुनगुनाते हुए बैटिंग करते थे. क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी वह क्रिकेट कमेंटेटर के रूप में या सोशल मीडिया पर अपनी बिंदास राय देते रहते हैं.

खासतौर से विराट कोहली की प्रशंसा तो करते ही रहते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने विराट कोहली के प्रदर्शन से प्रभावित होकर अलग ही अंदाज में सैल्यूट किया है, वह भी सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के एक फिल्मी किरदार से लिेंक करते हुए. उन्होंने यह भी कहा है कि कोहली की तुलना सचिन तेंदुलकर से करना उचित नहीं है.

रन चेस करने की क्षमता का किया बखान

आईपीएल टीम किंग्स इलेवन पंजाब के मेंटर सहवाग ने बुधवार को किंग्स इलेवन पंजाब और रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के बीच चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले मैच से पहले विराट कोहली के बल्ले से दनादन निकल रन को देखते हुए एक ट्वीट किया. बैटिंग के समय कभी भी आउट होते हुए नहीं दिखने वाले कोहली की रन चेस करने की क्षमताओं का बखान करते हुए कह दिया कि केवल वही 'डॉन' को पकड़ सकते हैं.

'डॉन' शब्द पढ़ते ही आपके मन में दो नाम गूंज होंगे- अमिताभ बच्चन और उनकी फिल्म 'डॉन'. ऐसे में भला आप इस फिल्म में अमिताभ के फेमस डायलॉग 'डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुकिन हैं' को कैसे भूल सकते हैं.

सहवाग की मानें तो, विराट जिस तरह से रन चेस करते हैं, उससे तो वह डॉन को भी पकड़ सकते हैं. उनके ट्वीट पर नजर डालिए, 'डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, पर @imVkohli जैसे चेस करते हैं, डॉन को भी पकड़ सकते हैं…'

भारत-पाक के बीच गोलीबारी जैसे हैं विराट के स्ट्रोक्स

सहवाग इससे पहले भी विराट कोहली के खेल को देखकर प्रशंसा कर चुके हैं. आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले मैच से पहले उन्होंने कोहली के स्ट्रोक्स की तुलना गोलियों की उस बौछार से की थी, जो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर लगभग हर दिन होती है.

फॉर्म ऑफ लाइफ

कोहली आईपीएल 2016 में अपने करियर के श्रेष्ठ फॉर्म में दिख रहे हैं. किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ 18 मई को खेले गए मैच में उन्होंने 113 रन की तूफानी पारी खेलकर आईपीएल में 4000 रन पूरा करने वाले पहले बैट्समैन बन गए. उन्होंने सुरेश रैना को पीछे छोड़ा था, जिनके नाम उस दिन 3985 रन थे. हालांकि अब रैना ने भी 4000 रन पूरे कर लिए हैं. आईपीएल में कोहली नाम जहां 4002 रन हैं, वहीं रैना के नाम 4038 रन हैं.

इस सीजन में जड़े 4 शतक

कोहली ने आईपीएल के इस सीजन में ही 4 शतक लगा दिए हैं, जबकि इससे पहले तक उनके नाम कोई भी शतक नहीं था. किसी भी टी-20 टूर्नामेंट के एक सीजन में यह किसी भी बैट्समैन का बेस्ट प्रदर्शन है. उनसे पहले 2015 में माइकल क्लिंगर ने नेटवेस्ट ब्लास्ट टी-20 लीग में 3 शतक लगाए थे. अब आईपीएल इतिहास में केवल क्रिस गेल ही ऐसे बल्लेबाज हैं, जिन्होंने सबसे अधिक 5 शतक लगाए हैं.

रनचेस रिकॉर्ड

कोहली ने टी-20 इंटरनेशनल में 22 मैचों की 19 पारियों में रन चेस करते हुए 918 रन बनाए हैं और उनका स्ट्राइक रेट 132.65 और औसत 91.80 रहा है, जबकि वनडे में 95 मैचों की 91 पारियों में लक्ष्य का पीछा करते हुए उनके नाम 4408 रन दर्ज हैं, जिनमें उनका औसत 61.22 और स्ट्राइक रेट 92.39 है.

इन 6 रोमांचक बातों से रिकॉर्ड बुक में दर्ज हो गया ये मैच

आईपीएल-9 में शुक्रवार को दिल्ली डेयरडेविल्स और सनराइजर्स हैदराबाद दोनों ने अपना-अपना 13वां मैच खेला. इस मैच में दिल्ली ने जीत दर्ज करके प्लेऑफ के लिए अपनी उम्मीदें बरकरार रखी हैं. जानें दिल्ली-हैदराबाद मैच की छह रोमांचक बातें…

1. 83 नाबाद : हैदराबाद के खिलाफ खेली गई करुण नायर की ये पारी आईपीएल में उनकी सबसे बड़ी पारी है. इस सीज़न उन्होंने तीन अर्धशतक बनाए हैं और तीनों ही मैच में टीम को जीत मिली है.

2. इस मामले में दिल्ली खास : हैदराबाद को दोनों मैच में हराने वाली दिल्ली डेयरडेविल्स इकलौती टीम है. दिल्ली ने हैदराबाद को उसी के घर में 7 विकेट से और फिर रायपुर में 6 विकेट से हराया.

3. इस सीजन 33 बदलाव : दिल्ली डेयरडेविल्स ने अभी तक 13 मैचों में 33 बदलाव अपनी टीम में किए हैं. राहुल द्रविड़ और ज़हीर खान की कोच और कप्तान की जोड़ी ने पूरे लीग में अभी तक कभी भी किसी दो लगातार मैच में वही टीम नहीं खिलाई है. इतने बदलाव अभी तक किसी और टीम ने नहीं किए हैं.

4. सबसे ज्यादा 13 रनआउट : हैदराबाद के खिलाफ़ दिल्ली को पहले दो विकेट शानदार रनआउट के ज़रिए मिले. दिल्ली की टीम ने अभी तक विरोधी टीम के 13 खिलाड़ियों को रनआउट किया है, जो लीग में किसी भी टीम से ज़्यादा है. वहीं दिल्ली की सिर्फ़ 7 खिलाड़ी खुद रन-आउट हुए हैं.

5. पूरी टीम पर भारी डेविड वॉर्नर : डेविड वॉर्नर का शानदार फ़ॉर्म यहां भी बरकार रहा. उन्होंने 73 रनों की पारी खेली, उनका यह 7वां अर्धशतक था. 13 मैच में पूरी हैदराबाद की टीम ने सिर्फ़ 5 अर्धशतक बनाए हैं. यानी अकेले वॉर्नर अपनी पूरी टीम से आगे हैं.

6. 6.0 रन की औसत : इस मैच में मुस्ताफ़िज़ुर रहमान का इकॉनमी रेट रहा. वो तमाम गेंदबाज़ जिन्होंने इस टूर्नामेंट में 40 ओवर से ज़्यादा गेंदबाज़ी की है, उनमें वे सबसे ज़्यादा किफ़ायती रहे हैं.

घूंघट छोड़ पढ़ने जा रही बहुएं

इसे बदलाव की बयार का ही नतीजा कहा जा सकता है कि जहां बेटियों को पहले पढ़ाने से परहेज किया जाता था, आज उन्हीं गांवों में बेटियों के साथ बहुएं भी स्कूलकालेज जा रही हैं. राजस्थान राज्य में कोथून, बडली, महाचंदपुरा, बृजलालपुरा, गोपालपुरा, सांवलिया, खेड़ा लदाणा, टूमली का वास जैसे दर्जनों गांवों व ढाणियों की बहुओं ने अब घूंघट को छोड़ कर कलम थाम ली है. अकेले जयपुर जिले के कोथून गांव की ही बात करें, तो यहां 30 से ज्यादा बहुएं पढ़ाई के लिए स्कूलकालेज जा रही हैं. इन में से तकरीबन आधा दर्जन बहुएं तो गांव के ही राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पढ़ रही हैं, वहीं बाकी बहुएं चाकसू कसबे के निजी कालेज व स्कूलों में पढ़ने के लिए जा रही हैं.

ससुराल में रह कर पढ़ाई करने वाली बहुओं ने बताया कि उन का पढ़ाई में शुरुआत से ही मन था, लेकिन मायके के गांवों में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल नहीं होने व घर वालों ने आगे की पढ़ाई करने की इजाजत नहीं देने की वजह से वे आगे की पढ़ाई नहीं कर सकीं. शादी के बाद जब वे अपनी ससुराल आईं, तो उन्होंने सासससुर से पढ़ने की इच्छा जताई. शुरुआत में नानुकर के बाद आखिरकार वे मान गए. इस गांव में बहुओं को स्कूल भेजने की पहली शुरुआत सरपंच रह चुके श्योनारायण चौधरी के घर से हुई. उन्होंने अपने परिवार की एक बहू रीना का गांव के ही सरकारी स्कूल में दाखिला कराया.

शादी के बाद बहू रीना स्कूल जाती थी. साल 2011 में गौने के बाद जब बहू घर आई, तो उस ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई. इस पर उन्होंने उस का दाखिला गांव के ही एक सरकारी स्कूल में करा दिया. इस के बाद उन के गांव समेत आसपास के गांवों व ढाणियों के लोग भी अपनी बहुओं को स्कूल भेजने लगे. स्कूल जाने वाली बहुओं सावित्री, टीना, मंजू, संतोष वगैरह ने बताया कि वे भी शहरी लड़कियों की तरह पढ़लिख कर अपने परिवार का हाथ बंटाना चाहती हैं, जो तालीम से ही मुमकिन हो सकता है. गांव की कई बहुएं तो पढ़लिख कर पुलिस और सरकारी टीचर की नौकरी भी कर रही हैं. इस काम में उन के पति व मां भी उन का साथ दे रहे हैं.

पढ़ाई में अव्वल लाडो

एक लड़की पढ़ेगी, तो दो घर रोशन होंगे. इसे सरकारी व गैरसरकारी संगठनों की पहल का रंग कहें या लोगों की सोच में आया बदलाव, लड़कियों को तालीम दिलाने के मामले बढ़ रहे हैं. इसी पहल का ही नतीजा है, जो कई गांवों के सरकारी व निजी स्कूलों में लड़कों के बजाय लड़कियां ज्यादा पढ़ने आ रही हैं. तालीम से जुड़े माहिर अफसर भी मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में लड़कों की बनिस्बत लड़कियों का दाखिला ज्यादा है. स्कूलों में लड़केलड़कियों का यह आंकड़ा 30:70 का है यानी लड़कों के बजाय लड़कियां सरकारी स्कूलों में ज्यादा दाखिल हैं. एक जमाने में गांवों में अपढ़ता के अंधकार के चलते बालिकाओं को घर से बाहर जाने के लिए उन के मांबाप परहेज करते थे, वहीं आज तालीम के प्रति सोच में आए बदलाव के चलते गांवों के लोगों में भी शहरों की तर्ज पर लड़कियों को स्कूल भेजने की दिलचस्पी बढ़ी है.

लड़कियों ने भी परिवार वालों के भरोसे का मान रखा है और पढ़ाई में टौपर बन रही हैं. पिछले सालों के शिक्षा विभाग के माध्यमिक व उच्च माध्यमिक बोर्ड के नतीजों में भी लड़कियां हमेशा आगे रही हैं. इसी तरह पहली से 9वीं व 11वीं जमात में भी लड़कियां पढ़ाई में अव्वल मानी जा रही हैं. एक समय में स्कूल मे पढ़ने वाली लड़कियों के लिए दूरदराज में स्कूल होने से कई किलोमीटर तक का सफर पैदल तय करना, स्कूलों में शौचालय की कमी व जरूरी सहूलियतें नहीं होने से लड़कियां पढ़ाई करते समय बीच में ही स्कूल छोड़ देती थीं. वहीं अब शिक्षा का अधिकार अधिनियम के साथ ही हर गांव व पंचायत हैडर्क्वाटर पर स्कूल खुलने से सरकारी व निजी स्कूलों में लड़कियों का दाखिला बढ़ रहा है.

इतना ही नहीं, गंवई व कसबाई लड़कियां अब खेलों में भी जिला, राज्य व नैशनल लैवल पर अपना दबदबा जमा रही हैं. ये लड़कियां तालीम के साथ ही खेल में भी अव्वल आ रही हैं. जयपुर जिले की चाकसू तहसील के एक शिक्षा अधिकारी रमेशचंद शर्मा बताते हैं कि इलाके में 2-3 सालों से लड़कियों की तालीम के प्रति लोगों में जबरदस्त जागरूकता आई है. चाकसू बीईईओ क्षेत्र के ज्यादातर स्कूलों में छात्रों के बजाय छात्राओं का नामांकन ज्यादा है. चाकसू बीईईओ क्षेत्र के स्कूलों में लड़कों का दाखिला जहां 30 फीसदी है, वहीं लड़कियों का दाखिला दोगुना यानी 70 फीसदी है.

शादी की खिलाफत

बाल विवाह यानी बचपन में होने वाली शादी को रोकने के लिए भले ही सरकारी कानून नकारा साबित हो रहा हो, लेकिन लड़कियां पढ़ाई की खातिर बचपन की शादी के खिलाफ माहौल तैयार कर रही हैं. वहीं कुछ लड़कियां शादी करने की खिलाफत कर रही हैं और हर मजबूरी बरदाश्त कर पढ़ाई को जारी रखने की कोशिश कर रही हैं. कई लड़कियां तो बुराइयों और रीतिरिवाजों को तोड़ कर बचपन में शादी की खिलाफत कर अपनी पढ़ाई कर रही हैं. बडली गांव की रहने वाली 15 साल की अनीता कहती है, ‘‘जब मैं 7वीं जमात में पढ़ रही थी, तब घर वालों ने शादी कर देने की बात कही. मैं ने मना कर दिया, लेकिन घर वाले नहीं मान रहे थे. यह बात मैं ने अपने स्कूल में बताई, तो स्कूल की प्रिंसिपल ने घर वालों को पुलिस व कानून का डर दिखाया, तब जा कर घर वाले राजी हुए.’’ टोंक जिले के पीपलू गांव की रहने वाली मौसम की शादी तब तय कर दी गई, जब वह 8वीं जमात में थी.

मौसम ने जब इस बात की खिलाफत की तो आसानी से बात नहीं बनी, लेकिन मौसम ने भी हिम्मत नहीं हारी और खिलाफत जारी रखी. स्कूल के टीचरों के समझाने से आखिर घर वाले राजी हो  गए. अब मौसम 11वीं जमात में पढ़ रही है. 22 साल की सीमा के मांबाप की मौत एक हादसे में तब हो गई थी, जब वह महज 4 साल की थी. सीमा के पालनेपोसने की जिम्मेदारी उस के चाचाचाची पर थी. ये लोग चाहते थे कि उस की शादी जल्दी हो जाए. चाचाचाची ने सीमा पर बड़ा दबाव बनाया, लेकिन वह शादी करने को तैयार नहीं हुई. उस ने चाचाचाची से अलग रह कर पढ़ाई करने का मन बनाया और आगे पढ़ती रही. 11वीं जमात में पहुंच कर सीमा ने गांव के दूसरे छोटे बच्चों को भी पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से उसे अपने खर्च के लिए पैसे भी मिलने लगे.

पढ़ाई जारी रख कर एसटीसी का इम्तिहान पास किया, जिस से अब वह सरकारी टीचर है और खुद के गांव के ही स्कूल में पढ़ाती है. अब उस के चाचाचाची भी चाहते हैं कि वह उन के पास ही रहे और पढ़ाई पूरी करने के बाद ही शादी करे.

मददगार बनीं सरपंच

जयपुर जिले की चाकसू तहसील की ग्राम पंचायत टूमली का वास की सरपंच संतोष कंवर लड़कियों को तालीम का हक दिलाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं. वे न केवल रोजाना स्कूल जा कर मुफ्त में क्लास लेती हैं, बल्कि घरघर जा कर लड़कियों के परिवार वालों को अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए बढ़ावा देती हैं. लड़कियों का पढ़ाई के प्रति उत्साह बढ़ाने के लिए वे उन्हें कौपी, किताब, रबड़, पैंसिल वगैरह भी मुहैया कराती हैं. इतना ही नहीं, सरपंच संतोष कंवर स्कूल में सब से ज्यादा हाजिर रहने वाली लड़कियों को सार्वजनिक मंच पर इनाम भी देती हैं, ताकि सब लड़कियों की पढ़ाई व हमेशा स्कूल में हाजिर रहने की ललक बढ़े.

संतोष कंवर कहती हैं, ‘‘गांव में रहने वाली लड़कियों व उन के परिवार वालों में तेजी से जागरूकता बढ़ी है. जरूरत है इन को सही राह दिखाने की. पढ़ाईलिखाई के मामले में लड़कियों के साथसाथ उन के घर वालों को भी समझाना पड़ता है.’’ लड़कियों की पढ़ाईलिखाई व तरक्की की राह में रोड़ा अटकाने के लिए सामाजिक व धार्मिक बुराइयों को जिम्मेदार मानते हुए संतोष कंवर कहती हैं, ‘‘लड़कियों को तालीम दे कर ही आगे बढ़ाया जा सकता है. इस के लिए सब से पहले सामाजिक व धार्मिक बुराइयों की खिलाफत करना जरूरी है. इन बुराइयों का जाल तोड़ने से ही लड़कियों को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.’’ वाकई जहां औरतें समझदार हैं, खासतौर से उन गांवों में तरक्की हो रही है. वहां सामाजिक व धार्मिक बुराइयों व परंपराओं को दरकिनार करते हुए लड़कियों के न केवल बाल विवाह रुक रहे हैं, बल्कि ऐसे गांवों की लड़कियां पढ़ाईलिखाई के मामले में भी काफी आगे बढ़ रही हैं.

अब साकिब सलीम भी बने लेखक और निर्माता

‘‘यशराज फिल्मस’’ निर्मित कुछ सीरियलों के अलावा ‘‘मुझसे फ्रेंडशिप करोगे’’, ‘‘मेरे डैड की मारूती’’, ‘‘हवा हव्वाई’’, ‘‘बॉबे टॉकीज’’ जैसी फिल्मों व लघु फिल्म ‘‘कोई देख लेगा’’ में अभिनय कर चुके साकिब सलीम भी अब लेखन व निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने जा रहे हैं. मगर वह फीचर फिल्म की बजाय लघु फिल्मों से निर्माण क्षेत्र में उतरने जा रहे हैं.

इस बात को स्वीकार करते हुए साकिब सलीम कहते हैं-‘‘यह सच है कि मैं फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतर रहा हूं. मैं अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी शुरू कर रहा हूं. पर फिलहाल फीचर फिल्मों का निर्माण करने की बजाय मैं लघु फिल्मों का निर्माण करने वाला हूं. इस लघु फिल्म को मैने खुद ही लिखा है. इस लघु फिल्म को किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, उस आधार पर मैं भविष्य की योजना बनाउंगा.’’

जाति से बाहर शादी

मोहब्बत जिंदगी का एक खूबसूरत अहसास है और यह कभी भी जाति, धर्म, रंग या उम्र देख कर नहीं किया जाता. पर क्या आप जानते हैं कि आज भी हमारे देश में इंटरकास्ट लव मैरिजेज करने वालों की संख्या महज 5% ही है. 95% लोग अपनी जाति के दायरे में रह कर ही शादी करते हैं. नेशनल काउंसिल औफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च और यूनिवर्सिटी औफ मैरीलैंड की एक हालिया स्टडी से पता चलता है कि भारत में 95% शादियां अपनी जाति के अंदर होती हैं. यह स्टडी 2011-12 में इंडियन ह्यूमन डिवलपमैंट सर्वे द्वारा कराए गए सर्वे पर आधारित है. सर्वे में 33 राज्यों व केंद्रशासित क्षेत्रों के शहरी तथा ग्रामीण इलाकों में स्थित 41,554 घरों को शामिल किया गया था. जब इन घरों की महिलाओं से पूछा गया कि क्या आप की इंटरकास्ट मैरिज हुई थी, तो सिर्फ 5% ने ही हां में जवाब दिया. शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण इलाकों की तुलना में स्थिति थोड़ी बेहतर है.

अपनी जाति में शादी करने वालों में मध्यप्रदेश के लोगों की संख्या सब से ज्यादा 99% रही जबकि हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह 98% था. भारत में यद्यपि कानूनी तौर पर अपनी जाति से बाहर शादी को मान्यता प्राप्त है. इंटरकास्ट मैरिज पर 50 साल पहले ही कानून पास किया जा चुका है. फिर भी लोग ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाते.

इस की मुख्य वजह है कि ऐसा करने पर अपने ही समुदाय द्वारा इन का जीना हराम कर दिया जाता है. इस सोमवार, झारखंड की काजल नामक लड़की के घरवालों के साथ महज इस वजह से मारपीट की गई, क्योंकि काजल ने सुबोध कुमार नामक दूसरी जाति के लड़के से लवमैरिज की थी. इस बात को 2 वर्ष हो चुके हैं. शादी के वक्त दोनों बालिग थे और इस रिश्ते को उन के परिवार वालों की स्वीकृति भी मिली हुई थी. फिर भी उन के समुदाय के दूसरे लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही थी.

गांव के कुछ दबंग व्यक्तियों द्वारा उन्हें धमकियां दी जाती थीं. दंडस्वरूप उन्होंने रुपयों की भी मांग रखी. गत 16 मई को उन का आक्रोश इतना उबला कि 4-5 लोग लाठियां ले कर काजल के पिता एस. प्रजापति के घर पहुंच गए. काजल के मांबाप और दोनों भाइयों को बंधक बनाया और जम कर पिटाई की. घटना के बाद घायलावस्था में पूरा परिवार रोताबिलखता थाने पहुंचा.

दिल की आवाज सुनने का यह हश्र सिर्फ काजल का ही नहीं हुआ है, ऐसे हजारों लाखों युवक युवतियां हैं, जिन्हें अपनी जाति से बाहर शादी करने की सजा भुगतनी पड़ती है. उन के साथ र्दुव्यवहार व हिंसा होती है. उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से इतना प्रताडि़त किया जाता है कि कई दफा थक कर वे स्वयं ही जान दे देते हैं और यह सब करने वाले सामान्यता उन के परिवार के लोग नहीं वरन उन की जाति और गांव के लोग ही होते हैं. कई दफा प्यार करने वाले ऐसे युवकयुवतियां औनर किलिंग का शिकार भी बनते हैं. भले ही हम आधुनिक होने का कितना भी दंभ भर लें मगर सच तो यह है कि हमारी सोच वर्षों पुरानी मान्यताओं व धार्मिक रूढि़वादी परंपराओं के दलदल में फंसी हुई है. हम दिखाने को भले ही कितने भी प्रगतिशील बन जाएं मगर जब बात शादी की आती है तो जाति व्यवस्था के नाम पर युवापीढ़ी के साथ अन्याय करने से नहीं चूकते.

जरा सोचिए, भारत में करीब 3000 जातियां और 25000 उपजातियां हैं. शादी के वक्त न सिर्फ जाति वरन उपजाति का भी खयाल रखना पड़ता है. इस के बाद जाहिर है, हर इंसान की अपनी खास पसंद होती है. उसे विशेष भाषा, लुक्स, आर्थिक स्थिति, प्रोफेशन, उम्र, सामाजिक पृष्ठभूमि वगैरा भी देखना होता है. जाहिर है, इन सब के बीच चुनाव करना बहुत कठिन हो जाता है. विकल्प सिमट जाते हैं. नतीजा यह निकलता है कि मांग और पूर्ति का सिद्धांत काम करने लगता है और विवाह के बाजार में लड़कों की कीमत आसमान छूने लगती है. यहीं से दूसरी सामाजिक बुराइयां भी पैदा होने लगती हैं.

पहली बुराई जो पैदा होती है, वो है दहेज प्रथा. दहेज के नाम पर महंगे, घरेलू सामान, गहने, कपड़े, गाडि़यां आदि की व्यवस्था कर पाना सब के लिए आसान नहीं होता. नतीजा यह होता है कि शादी का खौफ उस के जन्म के साथ ही सताने लगता है. बहुत से लोगों को शादी के लिए उधार/लोन लेना पड़ता है तो कुछ रिश्वत ले कर भी लड़के वालों की मांग पूरी करते हैं. जो सुरसा के मुंह की भांति बढ़ती ही जाती है. अपनी जाति में दहेज दे कर शादी करने के बावजूद भारी संख्या में बेकसूर लड़कियां मारी जाती हैं. वर्ष 2012-14 के बीच की स्थिति देखें तो, करीब 25,000 महिलाएं दहेज प्रथा की वजह से मारी गईं या फिर इनलौज द्वारा किए गए अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करनी पड़ी.

नेशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के डाटा के मुताबिक देश में वर्ष 2012, 2013 एंड 2014 में क्रमशः 9038, 10,709 और 10050 केसेज डाउरी प्रोहिबिशन एक्ट 1961 के अंतर्गत रजिर्स्ड हुए. नतीजा यह होता है कि लोग बेटी को जन्म देने से भी हिचकने लगते हैं और कन्या भू्रण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयां पैदा होती हैं. इस के विपरीत यदि अपनी ही जाति में शादी करने का सामाजिक दबाव न हो तो संभवतः युवकयुवतियां ज्यादा बेहतर ढंग से अपने जीवन साथी का चुनाव कर सकेंगे. बेमेल शादियां कम होंगी. दहेज जैसी प्रथाओं का तांडव घटेगा और अलगअलग संस्कृतियों के मेल से एक ज्यादा खूबसूरत समाज की रचना संभव हो सकेगी.

जब भक्तों को मिली अनचाही मौत

कुछ समय पहले सोशल साइट पर एक वीडियो वायरल हो रहा था, जिस में एक शादी समारोह में वर पक्ष वाले बंदूक चला कर अपनी खुशियां जाहिर कर रहे थे. तकरीबन 7-8 बंदूकधारी एक के बाद एक हवा में फायर कर रहे थे. लड़के का पिता भी वहां मौजूद था. तभी एक बंदूकधारी की बंदूक गोली भरने के बाद एकदम चल पड़ी. चूंकि बंदूक की नाल आसमान की ओर नहीं थी, इसलिए गोली सीधी दूल्हे के पिता को जा लगी और उस ने वहीं दम तोड़ दिया.

इस घटना से शादी का माहौल गमगीन हो गया, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठा कि हम अपनी खुशी जाहिर करने के लिए जानलेवा धमाकों पर इतने ज्यादा निर्भर क्यों हैं? किसी तीजत्योहार पर भी हम अकसर देखते हैं कि लोग आतिशबाजी या बमपटाखों से अपने खुश होने का इजहार करते हैं. बंदूक की गोली तो एकाध को अपना शिकार बनाती है, लेकिन अगर कहीं आतिशबाजी के भंडार में चिनगारी लग जाए, तो वह आसपास के इलाके को अपनी चपेट में ले लेती है. शनिवार, 9 अप्रैल, 2016 को केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से तकरीबन 70 किलोमीटर दूर कोल्लम के एक मंदिर में भी ऐसा ही कुछ हुआ, जो दर्द की दास्तान बन गया.

उस दिन कोल्लम के ऐतिहासिक पुत्तिंगल देवी मंदिर में नए साल के मौके पर उत्सव मनाया जा रहा था. तब मंदिर के अहाते में तकरीबन 10 हजार लोग मौजूद थे. आधी रात को 2 गुटों में आतिशबाजी का मुकाबला शुरू हो गया, वह भी प्रशासन की इजाजत के बगैर. रात के तकरीबन साढ़े 3 बजे पटाखे के गोदाम ‘कंबपुरा’ में आतिशबाजी से आग लग गई. इस के बाद वहां बड़ा जबरदस्त धमाका हुआ और देखते ही देखते आग ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया. वह धमाका इतना तेज था कि तकरीबन एक किलोमीटर तक उस की आवाज सुनी गई. नतीजतन, मंदिर के अहाते में देखते ही देखते लोग लाशों में तबदील हो गए. चारों ओर भगदड़ का माहौल बन गया और बिजली की सप्लाई भी ठप पड़ गई. इस अफरातफरी में 100 से ज्यादा लोग मारे गए और कई घायल भी हुए.

कोल्लम के कलक्टर ए. शाइनामोल ने बताया कि मंदिर मैनेजमैंट द्वारा आतिशबाजी प्रतियोगिता कराने की इजाजत को ठुकरा दिया गया था, इस के बाद भी यह प्रतियोगिता कराई गई. दरअसल, कोल्लम जिले में बने सौ साल पुराने पुत्तिंगल मंदिर के बारे में लोगों का यह मानना है कि इस इलाके में देवी का निवास है, इसलिए नवरात्र के दौरान भक्तों की भीड़ मंदिर में जुटती है. यह मंदिर अपनी आतिशबाजी के लिए मशहूर है. हर नवरात्र को यहां आतिशबाजी प्रतियोगिता होती है, जिसे देखने के लिए हजारों लोग पहुंचते हैं. नए साल के मौके पर यह भीड़ बढ़ जाती है. याद रहे कि 14 अप्रैल को मलयालम नववर्ष शुरू होता है.

मंदिर में बदइंतजामी

इस मंदिर में ही पटाखे रखने का गोदाम बनाया हुआ था. पटाखे मंदिर के स्टोररूम में रखे हुए थे. हैरत की बात तो यह है कि व्यापारी सुरेंद्रन और उस के बेटे उमेश ने लाइसैंस से 10 गुना ज्यादा पटाखे वहां रखे हुए थे. उन के पास 15 किलो पटाखों का लाइसैंस था, जबकि 150 किलो से ज्यादा पटाखे वहां जमा किए गए थे. कोढ़ पर खाज यह कि मंदिर में किसी तरह की आग से बचने का कोई इंतजाम नहीं था. न वहां फायर ब्रिगेड वाले थे और न ही कोई एंबुलैंस थी. धमाका होते ही मची भगदड़ ने रहीसही कसर पूरी कर दी.

इस पूरे मामले में वहां की पुलिस भी शक के दायरे में है. सवाल है कि इतने सारे पटाखे मंदिर के अहाते में कैसे पहुंचे? जब आतिशबाजी की प्रतियोगिता हो रही थी, तब पुलिस वहां मौजूद थी. ऐसी गैरकानूनी आतिशबाजी प्रतियोगिता को रोका क्यों नहीं गया? कुछ लोगों की लापरवाही और मनोरंजन की वजह से इतने सारे लोग मारे गए, इस की जवाबदेही किस की होगी? ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे हादसों के प्रति गंभीर नहीं है, लेकिन राज्य कोई ठोस कदम उठाने को तैयार ही नहीं होते हैं. कई राज्यों में धर्म के नाम पर बड़ेबड़े आयोजन होते हैं, लेकिन वहां लोगों की जान बचाने के पुख्ता इंतजाम नहीं किए जाते हैं.

अक्तूबर, 2013 में मध्य प्रदेश के रतनगढ़ में बने मंदिर में मची भगदड़ में 115 लोग मारे गए थे. वकील विनीत ढंढा ने तब सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. इस में उन्होंने आपदा प्रबंधन के इंतजाम किए जाने की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 19 नवंबर, 2013 को केंद्र समेत सभी राज्यों को नोटिस जारी किया था, लेकिन कहीं से भी कोई संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं आया. इन्हीं लापरवाहियों का नतीजा है कि धार्मिक आयोजनों में बेकुसूर, निहत्थे और मासूम लोग मारे जाते हैं. दुख की बात तो यह है कि बड़े से बड़ा हादसा होने के बाद भी कोई सबक नहीं सीखा जाता. पीडि़तों के जख्मों पर मरहम रखने के लिए सरकारी वादे तो कर दिए जाते हैं, लेकिन उन वादों को पूरा होने में कितना समय लगता है, इस पर कोई ध्यान नहीं देता.

बिना ग्लीसरीन सेट पर क्यों रो पड़ीं सनी लियोनी

पॉर्न स्टार के रूप में पहचान रखने वाली मॉडल व अभिनेत्री सनी लियोनी अब तक लगभग हर फिल्म में बोल्ड सेक्स सीन या अपनी सेंसुआलिटी के साथ ही नजर आती रही हैं. मगर बहुत जल्द दर्शक उन्हें राजीव चौधरी की फिल्म ‘‘बेइमान लव’’ में इमोशनल दृश्यों में भी देख सकेंगे. इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं, जहां सनी लियोनी रोते हुए नजर आएंगी. मजेदार बात यह है कि इनमें से कई दृश्यों की शूटिंग के दौरान सनी लियोनी ने ऑखों में बिना ग्लीसरीन लगाए रोने के दृश्य देकर पूरी यूनिट को चौंका दिया.

जब फिल्म के निर्देशक राजीव चौधरी ने सनी लियोनी से पूछा कि वह इस तरह बिना ग्लीसरीन का उपयोग किए रोने के सीन कैसे कर पाईं, तो सनी लियोनी ने कहा- ‘‘मैं फिल्म के सीन में इस कदर खो गयी थी कि मुझे अपनी निजी जिंदगी के माता पिता का खोना याद आ गया और मैं रो पड़ी.’’ 

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