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उन्नत खेती करने वालों को मिला ‘फार्म एन फूड अवार्ड’

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के बांसी में 25 जून को किसान सम्मान समारोह का आयोजन किया गया, जिस में उन्नत खेती करने वाले किसानों को ‘फार्म एन फूड अवार्ड’ से सम्मानित किया गया. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला परियोजना निदेशक प्रदीप पांडेय व विशिष्ठ अतिथि उप कृषि निदेशक डा. राजीव कुमार थे. समारोह के मुख्य अतिथि प्रदीप पांडेय ने कहा कि जिले में किसानों के प्रति ऐसा कार्यक्रम सुखद अनुभूति पैदा कर रहा?है. आने वाले समय में इस तरह के आयोजन समयसमय पर होते रहने चाहिए. इन से किसानों में नया जोश और नई क्रांति का संचार होगा.

विशिष्ठ अतिथि डा. राजीव कुमार ने कहा कि किसान देश की सवा अरब आबादी के पेट भरने का जिम्मा अपने कंधे पर ले कर चल रहे?हैं. ऐसे में उन का सम्मान करना बहुत जरूरी है. उन्होंने कृषि से संबंधित अनेक जानकारियां?भी किसानों को दीं. कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डा. एसके तोमर, डा. एके पांडेय, एसके मिश्रा और कार्यक्रम संयोजक मंगेश दुबे के अलावा पूर्व विधायक ईश्वर चंद्र शुक्ला, श्रीधर मिश्र, मृत्युंजय मिश्र व सचिंद्र शुक्ला आदि भी मौजूद थे.

दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन समूह की नामीगिरामी कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ एक लंबे अरसे से किसानों के हितों के लिए काम कर रही है. इस पत्रिका के जरीए देश के मशूहर कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेती की नई से नई जानकारियां मुहैया कराते रहते हैं. अपने जानकारी भरे लेखों के जरीए कृषि वैज्ञानिक किसानों की कदमकदम पर मदद करते हैं. इस के अलावा वे किसानों के तमाम सवालों के जवाब भी ‘फार्म एन फूड’ के जरीए देते हैं. पत्रिका द्वारा किसानों को दिए जाने वाले अवार्ड काफी मशहूर हो रहे हैं.

मोहम्मद कैफ बने छत्तीसगढ़ रणजी टीम के कप्तान

टीम इंडिया के पूर्व आलराउंडर क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को छत्तीसगढ़ की पहली रणजी टीम का कप्तान और मेंटर बनाया गया हैं. वैसे 36 साल के कैफ को कप्तान बनाने का फैसला चौंकाने वाला है क्योंकि वे लगभग 10 साल से भारतीय इंटरनेशनल टीम से बाहर हैं.

टीम का बॉलिंग कोच जयपुर के पी. कृष्णकुमार को बनाया गया है. वर्ष 2002 में लॉर्ड्स में खेली गई नेटवेस्ट ट्रॉफी में भारत-इंग्लैंड के उस मैच को कौन भूल सकता है जिसमें कैफ और युवराज की जोड़ी ने भारत को 6 विकेट से जीत दिलाई थी.

कैफ ने पूर्व कप्तान गांगुली के कप्तानी की तारीफ की. उन्होंने कहा कि गांगुली की कप्तानी के दौरान ही उनके साथी युवराज सिंह, वीरेन्द्र सहवाग, हरभजन सिंह जैसी प्रतिभाएं निकलीं. कैफ का कहना है कि उनका प्यार, पैशन सबकुछ क्रिकेट है और आज वे जो कुछ भी हैं, क्रिकेट की वजह से ही हैं. नेटवेस्ट ट्रॉफी उनके जीवन का टर्निंग वॉइंट साबित रही है.

कैफ ने बताया कि इससे पहले वे दो साल तक आंध्र रणजी टीम से खेल चुके हैं तथा उनका पूरा उद्देश्य यंग टैलेंट को बाहर निकालना है. उन्हें पूरा यकीन है कि अब छत्तीसगढ़ रणजी टीम से भी प्रतिभाएं बाहर निकलेंगी और भारतीय टीम में जगह बनाएंगी.

मोहम्मद कैफ रणजी में 10 हजार रन भी बना चुके हैं. छत्तीसगढ़ स्टेट क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बलदेव सिंह भाटिया ने बताया कि कैफ के साथ ही संघ ने सुलक्षण कुलकर्णी को टीम का कोच बनाया है.

भाटिया ने कहा कि नियम के अनुसार संघ बाहर के तीन खिलाडिय़ों को रख सकता है, उन्होंने मोहम्मद कैफ का ही चुनाव किया. उन्होंने कहा कि संघ यह चाहता था कि ऐसे खिलाड़ी लाएं, जो यहां की रणजी टीम को निखारने के साथ ही छत्तीसगढ़ को अपना समझे और कैफ का चयन इसलिए किया गया है.

कैफ का अब तक क्रिकेट कॅरियर

वर्ष 2000 मे टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण, कुल 13 मैच ही खेले

2002 में इंग्लैंड के खिलाफ पहला अंतरराष्ट्रीय वन डे मैच खेला

2006 में मो. कैफ की कप्तानी में उत्तरप्रदेश रणजी चैम्पियन बना

कुल 125 वनडे मैच खेलकर 2753 रन बनाए हैं

प्रथम श्रेणी के मैचों में 1974 रन बना चुके है

2014-15 में आंध्रप्रदेश टीम की जिम्मेदारी संभाली

जैविक खेती से करें उम्दा उत्पादन ज्यादा कमाई का बढि़या साधन

फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए अंगरेजी खाद व कीड़ेमार दवाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. इन्हें इस्तेमाल करना आसान है,लेकिन महंगी होने व जरूरत से ज्यादा, बारबार डालने से किसानों की जेब कटती है, नकली निकलने पर ये बेअसर रहती हैं. इस के अलावा जानकारी की कमी से भी किसान इन्हें जल्दीजल्दी  व ज्यादा डालते हैं.

देखादेखी व बगैर सोचेसमझे अंगरेजी खाद व कीड़ेमार दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से हवा, पानी व मिट्टी की हालत दिनोंदिन खराब हो रही है. इन का जहरीला असर फसल में आने से नित नई बीमारियां बढ़ रही हैं. इस कारण से भी जानवर व इनसान ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं. लिहाजा इस बारे में सोचना व इस समस्या को सुलझाना बहुत जरूरी है.

रसायनों के बढ़ते जहरीले असर से समूची आबोहवा को बचाने के लिए दुनिया भर में जैविक खेती जैसे कारगर तरीके अपनाए जा रहे हैं. हालांकि बहुत से किसान अंगरेजी खाद व कीड़ेमार दवाओं का इस्तेमाल जरूरी मानते हैं, जबकि इन के बगैर खेती करना मुश्किल नहीं है.

सरकारी कोशिशें

पहाड़ी इलाकों में आज भी अंगरेजी खाद व कीड़ेमार दवाओं का इस्तेमाल बहुत कम होता है. गौरतलब है कि बीते साल 2015 में सिक्किम सरकार ने अंगरेजी खाद व कीटनाशकों पर रोक लगा कर एक आरगेनिक मिशन चलाया था, जो पूरी तरह से सफल रहा. नतीजतन जैविक खेती में सिक्किम आज पूरे देश में एक उदाहरण है. इस के अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड राज्य भी जैविक खेती में आगे हैं. सरकार पूरे देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने पर खास जोर दे रही है, लेकिन किसानों के अपनाए बिना यह काम मुमकिन नहीं है. केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी साल 2015 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010-11 में सिर्फ 4 लाख 42 हजार हेक्टेयर रकबा जैविक खेती के तहत था.

साल 2011-12 में बढ़ कर यह 5 लाख 55 हजार हेक्टेयर हो गया था, लेकिन साल 2012-13 में घट कर 5 लाख 4 हजार हेक्टेयर व साल 2013-14 में फिर से बढ़ कर 7 लाख 23 हजार हेक्टेयर हो गया था. यह देश में मौजूद खेती के कुल रकबे का सिर्फ 0.6 फीसदी है, जो कि काफी कम है. लिहाजा इसे बढ़ाना होगा. बीते 15 सालों से केंद्र सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए अलग से एक नेशनल प्रोजेक्ट चला रखा है. साल 2004-05 में राष्ट्रीय बागबानी मिशन ने इसे अपनाया. साल 2010-11 में देश के 7 राज्यों में जैविक खेती को बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपए दिए गए. साल 2012-13 में केंद्र सरकार ने 1 हजार करोड़ रुपए जैविक खेती के लिए रखे थे, जो काफी नहीं हैं. जैविक खेती के प्रचारप्रसार, जागरूता व ट्रेनिंग वगैरह को बढ़ावा देने के लिए साल 2004 से गाजियाबाद में जैविक खेती पर एक नेशनल  सेंटर चल रहा है. बेंगलूरू, भुवनेश्वर, पंचकुला, इंफाल, जबलपुर व नागपुर में उस के 6 रीजनल सेंटर हैं. इन में जैविक खेती को बढ़ाने, जैव तकनीक निकालने, उन्हें किसानों तक पहुंचाने, जैव उर्वरकों की जांचपरख करने जैसे काम होते हैं, लेकिन असलियत यह है कि ज्यादातर

काम सिर्फ कागजों पर दौड़ते हैं. ज्यादातर किसानों को जैविक खेती की स्कीमों की जानकारी नहीं है खेती व बागबानी महकमों के निकम्मे मुलाजिम भी किसानों को जैविक खेती की जानकारी नहीं देते. लिहाजा इतने सारे सरकारी तामझाम का कोई फायदा नजर नहीं आता. साल 2015 से 2018 तक 14 फसलें कवर करते हुए जैविक खेती वाली 50-50 एकड़ जमीन वाले 10 हजार समूह बनाने का मकसद तय किया गया है. ज्यादातर किसानों में शिक्षा व रुचि की कमी है. खासकर छोटी जोत वाले, गरीब किसानों को जैविक खेती का असल मतलब, मकसद, तौरतरीकों व इस से होने वाले फायदों की जानकारी ही नहीं है. ऊपर से बाजार में जैव उर्वरक व जैव कीटनाशियों के नाम पर कबाड़ भी खूब धड़ल्ले बिक रहा है. इस से नुकसान किसानों का व फायदा उसे बनाने व बेचने वालों का होता है.

क्या है जैविक खेती

जैविक कचरे की मदद से जमीन की उपजाऊ ताकत व उपज बढ़ाना जैविक खेती का मकसद है. इस में एक तय समय में सब से पहले किसी खेत को रासायनिक असर से छुटकारा दिला कर उस के कुदरती रूप में बदला जाता है. इस के बाद जैविक काम उपज के कई हिस्सों में पूरे किए जाते हैं. कुल मिला कर जैविक खेती में रसायनों का इस्तेमाल किए बगैर सारा जोर खेती के कुदरती तौरतरीकों पर ही दिया जाता है. खेत की तैयारी, बीज शोधन, बोआई, जमाव बढ़ाने, कीड़े मारने, खरपतवार के सफाए में रसायनों व अंगरेजी खादों का इस्तेमाल कम से कम व आखिरी दौर में बिलकुल नहीं किया जाता. हरी खाद, गोबर की खाद व कंपोस्ट खाद को डाल कर ऐसा फसलचक्र अपनाया जाता है, जिस में जमीन को उपजाऊ बनाने वाली दलहनी फसलें भी शामिल रहती हैं.

रासायनिक उर्वरकों की जगह इफको व कृभको जैसे कारखानों में बने जैव उर्वकर डालें. अपने देश में अब इन की कमी नहीं है. करीब 5 लाख 50 हजार छोटेबड़े निर्माता हैं, जो जैव उर्वरकों का उत्पादन कर रहे हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2011-12 में 40325 मीट्रिक टन, साल 2012-13 में 46837 मीट्रिक टन व साल 2013-14 में 65528 मीट्रिक टन जैव उर्वरकों का उत्पादन भारत में हुआ था, जिस के अभी और बढ़ने की उम्मीद है. जैविक खेती में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटपतंगों की रोकथाम भी सुरक्षित तरीकों से की जाती है. उदाहरण के तौर पर लाइट व फैरोमेन ट्रैप, नजदीकी मुख्य फसल से कीड़े खींचने वाली ट्रैप क्राप, ट्राइकोडर्मा कार्ड, ट्राइकोगामा, ब्यूवेरिया बेसियाना फफूंद वगैरह कारगर बायोएजेंट्स के इस्तेमाल व कीड़े खाने वाले पक्षी और परजीवियों वगैरह को बचा, बढ़ा कर फसलों की हिफाजत की जाती है और उपज को सुरक्षित रखा जाता है. इस के अलावा खेत में खरपतवारों का सफाया भी रासायनिक दवाओं से न कर के मशीनों व औजारों के जरीए निराईगुड़ाई वगैरह से ही किया जाता है. रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल किए बिना खेती करने से प्रति हेक्टेयर उपज की लागत व मेहनत थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन उपज बेचते वक्त उन की भरपाई हो जाती है.

आरगैनिक फूड्स से कमाई

आम जनता की औसत आमदनी बढ़ने से खानपान व रहनसहन के तौरतरीके बदले हैं. सेहत के लिए जागरूकता बढ़ी है. अब लोग आरगेनिक फूड प्रोडक्ट्स को पसंद करते हैं. इस वजह से शहरी बाजारों, बड़ेबड़े मौल्स, होटलों व डिपार्टमेंटल स्टोरों वगैरह में अलग से बिकने वाले आरगैनिक फल, सब्जी, मसाले, दालें व अनाज आदि की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसी वजह से खेती व डेरी वगैरह के आरगैनिक उत्पादों की कीमत बाजार में आम उपज के मुकाबले ज्यादा मिलती है. लिहाजा किसानों को बाजार के बदलते रुख को पहचान कर समय के अनुसार खेती के तरीकों में बदलाव करना चाहिए. किसान जैविक खेती के जरीए पैदा उम्दा उपज बेच कर अपनी आमदनी में आसानी से इजाफा कर सकते हैं.

प्रचारप्रसार व ट्रेनिंग जरूरी

केंद्र व राज्यों की सरकारों को देश के सभी इलाकों में जैविक खेती के बारे में प्रचारप्रसार कराना चाहिए. ताकि इस में किसानों की दिलचस्पी जागे, जागरूकता व हिस्सेदारी बढ़े. खासकर गांव के इलाकों में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों व सहकारी संस्थाओं वगैरह की मदद इस काम में ली जा सकती है. इस के अलावा जैविक उत्पादों का आसान प्रमाणीकरण और उन की बिक्री का सही इंतजाम किया जाना भी बहुत जरूरी है. हालांकि पिछले दिनों भारतीय कृषि कौशल विकास परिषद, एएससीआई संस्था का गठन किया गया है, लेकिन उस के नतीजे भी सब को साफ दिखाई देने चाहिए. किसानों को जैविक खेती करने की तकनीक समझाने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें आसानी से ट्रेनिंग, पैसा व छूट आदि दूसरी सुविधाएं दी जाएं. हुनर बढ़ाने के मकसद से चल रही प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में खेती से जुड़े 15 कामों की ट्रेनिंग में जैविक खेती भी शामिल है. किसान कौशल विकास के नजदीकी सेंटर पर जा कर जैविक खेती का हुनर सीख सकते हैं. बीएससी (कृषि) पास या डिप्लोमाधारकों को 2 महीने की खास ट्रेनिंग, खेती से जुड़े कामधंधे के लिए कर्ज व उस पर 44 फीसदी तक की छूट दी जा रही है. इस की जानकारी राष्ट्रीय कृषि प्रबंधन संस्थान, हैदराबाद के फोन नंबर 040-24016709 से कर सकते हैं.

क्या करें किसान

दरअसल, 60 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद से पैदावार तो बेशक बढ़ी, लेकिन रासायनिक उर्वरकों व जहरीले कीटनाशकों के कुप्रभाव आज भी खतरा साबित हो रहे हैं. किसानों के कुदरती दोस्त केंचुए आदि बहुत से जीव खेतों से खत्म हो रहे हैं, जिस से मिट्टी का भुरभुरापन खत्म होता जा रहा है. जमीन की ऊपरी परत कड़ी व खारी हो जाने से पैदावार घटी है. फल, सब्जी व मसालों के स्वाद व अनाज के गुण भी अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं. खेती के माहिरों का कहना है कि गरमी में गहरी जुताई जरूर करें, ताकि कीड़े, उन के अंडे व खरपतवार आदि खुदबखुद खत्म हो जाएं और कीटनाशकों की जरूरत ही न पड़े.

वैज्ञानिकों व होशियार किसानों ने पौधों से तैयार कीड़ेमार व घासफूस नाशक अर्क, जैवकीटनाशी और बदबूदार कीटनाशक वगैरह खोजे हैं. मटका खाद, गोमूत्र, नीम पत्ती, निंबौली, मट्ठा, लहसुन व करंज की खली जैसे सभी कारगर नुस्खों को इकट्ठा कर के परखने के बाद सरकार को ऐसी जानकारी छपवा कर कृषि विज्ञान केंद्रों वगैरह के जरीए किसानों तक पहुंचानी चाहिए, ताकि किसान उन्हें खुद बना कर इस्तेमाल कर सकें. अपने इलाके की आबोहवा के अनुसार रोग व कीट प्रतिरोधी किस्में चुनें. फसल की बिजाई हमेशा सही समय से करें. खेती में सुधार व बदलाव करना बेहद जरूरी है. खेत साफ रखें. रोगी व कीड़ों के असर वाले पौधे तुरंत हटा कर नष्ट कर दें. जानवरों के मलमूत्र व सड़ेगले कार्बनिक पदार्थों के लिहाज से मुरगी, मछली व पशु पालना जैविक खेती में मददगार साबित होता है.

जैविक खेती के फायदे

जमीन को उपजाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि रसायनों का इस्तेमाल कम से कम या बिल्कुल भी न हो. उन की जगह किसान नाडेप खाद, चीनी मिलों से हासिल सड़ी हुई प्रेसमड, नीम, सरसों, नारियल व मूंगफली की खली या वर्मी कंपोस्ट खाद डाल कर जैविक खेती करें, ताकि खेतों की मिट्टी में पानी को ज्यादा वक्त तक बनाए रखने की कूवत भी बनी रहे. साथ ही साथ इस से जल, जंगल व जमीन सुरक्षित रह सकेंगे. उपज की क्वालिटी अच्छी होगी, जिस से किसानों की कमाई बढ़ेगी. जैविक खेती करने वाले किसान यदि अपने उत्पादों का रजिस्ट्रेशन कृषि एवं प्रसंस्कृत उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, एपीडा, नई दिल्ली में करा लें तो उन्हें खुद अपनी उपज को अच्छी कीमत पर बड़े व अमीर देशों को सीधे भेजने का मौका मिल सकता है. अब वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में जैविक खेती व आरगैनिक फूड्स का बोलबाला होगा और किसानों को उन की उपज की वाजिब कीमत मिलेगी. बशर्ते किसान जैविक खेती करने की पहल करें. जैविक खेती के बारे में सलाहमशविरा या ज्यादा जानकारी इस पते पर ली जा सकती है.

निदेशक, राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र, सेक्टर 19, हापुड़ रोड, कमला नेहरू नगर, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश. फोन नंबर : 0120-2764906, 2764212.

जैविक खेती को बढ़ावा

केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी साल 2015 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक चलाए जा रहे 8 मिशनों में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, एनएमएसए सब से अहम है. इस के तहत जैविक खेती को खास बढ़ावा देने के लिए नीचे लिखे कामों के लिए राज्य सरकारों के जरीए पैसे से मदद की जाती है. लिहाजा जरूरत आगे आ कर इन से भरपूर फायदा उठाने की है.

सब्जीमंडी या खेती के कचरे से कंपोस्ट बनाने, नई तकनीक से तरल जैव उर्वरक या जैव कीटनाशी बनाने की यूनिट लगाने, तैयार जैव उर्वरक या जैव कीटनाशी की जांच करने वाली लैब लगाने, मौजूदा लैब्स को मजबूत करने, खेतों में जैविक सामान बढ़ाने, सामूहिक रूप से जैविक खेती करने, आनलाइन भागीदारी गारंटी सिस्टम चलाने, जैविक गांव अपनाने, ट्रेनिंग देने, प्रदर्शन करने, जैविक पैकेजों के विकास पर खोजबीन करने और जैविक खेती के लिए  रिसर्च व ट्रेनिंग संस्थान चलाने के लिए पैसे से मदद मुहैया कराई जाती है.

प्रमाणीकरण

जैविक खेती में उत्पादों का प्रमाणीकरण कराना सब से अहम कड़ी है. सारी मेहनत का दारोमदार इसी पर टिका रहता है. सर्टीफिकेशन ही असल पहचान है, जिस से पता चलता है कि कौन सा उत्पाद वाकई आरगैनिक है. लिहाजा जैविक खेती करने वाले किसानों को इस के मानकों व नियमों वगैरह की जानकारी होना जरूरी है. भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय जैविक उत्पाद कार्यक्रम एनपीओपी के तहत वाणिज्य विभाग द्वारा आरगैनिक इंडिया के नाम से बनाई नियमावली में सारे मानक व नियम आदि दिए गए हैं.

यह नियमावली और जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण करने वाली 24 संस्थाओं की सूची राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र, एनसीओएफ, गाजियाबाद की वैबसाइट ठ्ठष्शद्घ.स्रड्डष्ठ्ठद्गह्ल.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ से डाउनलोड की जा सकती है. इस के अतिरिक्त पिछले दिनों सरकार ने भागीदारी गारंटी योजना पीजीएस चालू की है. इस के तहत जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण पीजीएस ग्रीन व पीजीएस आरगैनिक के रूप में किया जाता है. इस नई स्कीम की जानकारी भी राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र की साइट से ली जा सकती है. 

 

बांग्लादेश को रोशन करेगा भारत

पावर सरपल्स होने के बाद भारत बांग्लादेश के साथ मिलकर पावर ट्रांसमिशन की क्षमता दोगुनी करने को लेकर काम कर रहा है. दोनों देश तीसरी ग्रिड को बनाने के लिए भी तैयार हैं जिससे दोनों देशों में बढ़ती पावर जनरेशन का फायदा उठाया जा सके.

सूत्रों के अनुसार भारत और बांग्लादेश बहरामपुर-बेहरामारा लाइन की क्षमता को दोगुना कर 1 हजार मेगावॉट करने को लेकर काम कर रहे हैं. इसके साथ ही त्रिपुरा-कोमिला लाइन की क्षमता को बढ़ाकर 200 मेगावॉट किया जाएगा. अभी तक इन दो लाइनों के द्वारा ही दोनों देशों के बीच पावर ट्रांसमिशन होता है. अब तीसरी लाइन असम से बिहार होते हुए बांग्लादेश पहुंचेगी. अभी यह प्रॉजेक्ट शुरुआती चरण में है जिसकी क्षमता 2000 मेगावॉट होगी.

नई लाइन उत्तर-पूर्वी राज्यों में पनबिजली परियोजनाओं को नई गति देगी. इनमें से कई परियोजनाएं बांग्लादेश के साथ मिलकर बनेंगी. एशियाई डिवेलपमेंट बैंक के अनुसार इस तरह के प्रॉजेक्ट और लाइन्स क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधनों के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं. बांग्लादेश के अलावा भारत नेपाल को पावर का निर्यात करता है और भूटान से पावर का आयात करता है. भारत में इस साल पावर जनरेशन पिछले साल की तुलना मे 9 प्रतिशत बढ़ा है.

पशुओं की कुछ आम परेशानियां खास इलाज

समयसमय पर पशुओं को कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो जाती हैं, जिन को ले कर पशुपालक हर वक्त पशु विशेषज्ञ तक नहीं पहुंच पाते. इसलिए वे पुराने घरेलू तरीकों से इलाज करते?हैं. इन से कभी पशुओं को फायदा होता है, कभी नहीं भी होता. पशुओं की इन्हीं आम समस्याओं को ले कर कई कंपनियां पशुओं के लिए गुणकारी उत्पाद बनाती रहती है, जिन्हें इस्तेमाल कर के पशुपालक अपने पशुओं की अच्छी देखभाल कर सकते हैं. पशुओं को अकसर होने वाली तकलीफों के इलाज के लिए मेनकाइंड फार्म कंपनी ने अपने कुछ उत्पाद पेश किए हैं. जिन के बारे में पशुपालकों को जानना चाहिए.

पेट व चमड़ी में होने वाले कीड़ों के लिए

* क्या आप का पशु अधिक दानाचारा खाने के बाद भी कम दूध देता है?

* क्या पशु के गोबर में बुलबुले दिखते हैं

* क्या गोबर पतला, चिकना व बदबूदार है

* क्या पशु की खाल सूखी, खुरदरी व चमक रहित हो गई है

इन सभी परेशानियों का कारण?है पेट, आंत व त्वचा पर पाए जाने वाले कीड़े. इन के इलाज के लिए अपने पशु को फेंडीकाइंड प्लस दें, जो गोली के रूप में आती?है. बड़े पशु को 1 गोली व?छोटे पशु को आधी गोली देनी होती है.

फेंडीकाइंड प्लस के फायदे :

यह दवा सभी तरह के कीड़ों से छुटकारा दिलाती है. यह गाभिन पशुओं के लिए भी सुरक्षित है. कंपनी कहती?है कि हर 3 से 4 महीने पर फेंडीकाइंड खिलाओ और पेट व चमड़ी के कीड़ों से नजात पाओ.

दुधारू पशुओं के लिए

दुधारू पशुओं में कैल्शियम और फास्फोरस की कमी एक आम समस्या होती?है. यही कैल्शियम और फास्फोरस अन्य पोषक तत्त्वों व पानी के साथ मिल कर पशुओं में दूध बनाते हैं. दूध की जितनी ज्यादा मात्रा पशु के शरीर से निकलेगी, उतना ज्यादा कैल्शियम और फास्फोरस शरीर से बाहर निकलेगा. अच्छा खानपान होने के बावजूद पशु के शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस की कमी हो जाती?है, इसलिए दुधारू पशुओं को कैल्शियम सप्लीमेंट समयसमय पर देते रहना चाहिए.

कैल्सिमस्ट डी एस के फायदे

* यह दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन के कारण होने वाली कैल्शियम और फास्फोरस की कमी को पूरा करता?है.

* यह हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक है.

* इस में मौजूद विटामिन डी 3 पशु के शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस की मात्रा को बढ़ाता?है.

* इस में मौजूद विटामिन बी 12 दूध बढ़ाने में सहायक है और पशु को ताकत देता है.

इस्तेमाल : बड़े पशुओं को 100 मिलीलीटर और छोटे पशुओं को 20-50 मिलीलीटर रोजाना देने से उन का विकास अच्छा होता है. ज्यादा दूध देने वाले मवेशियों के लिए यह उत्तम कैल्शियम सप्लीमेंट है.

पशु बांझपन

पशुओं में दूध उत्पादन में कमी और बांझपन की समस्या की वजह असंतुलित आहार और दानेचारे में विटामिनों और मिनरल की कमी है. टोटाविट स्ट्रांग मिश्रण इस समस्या का एक आधुनिक और प्रभावशाली हल है.

टोटाविट स्ट्रांग के फायदे

* टोटाविट स्ट्रांग 12 चिलेटेड मिनरलों, 5 विटामिनों व ऐसे अनेक जरूरी तत्त्वों की पूर्ति करता है, जो दूध में फैट की मात्रा में बढ़ोतरी करते हैं.

* टोटाविट स्टांग देने से पशु सही समय पर हीट में आता है और इस से प्रजनन कूवत बढ़ती है.

* टोटाविट स्टांग से पशु की पाचन कूवत और बच्चा पैदा करने की ताकत बढ़ती है.

* यह पशु की रोग प्रतिरोधक कूवत भी बढ़ाता है.

* यह केले के स्वाद में उपलब्ध है.

अधिक जानकारी के लिए फार्मा कंपनी की वेबसाइट 222.द्वड्डठ्ठद्मद्बठ्ठस्रश्चद्धड्डह्म्द्वड्ड.ष्शद्व पर भी विजिट कर सकते हैं.

चीन की बराबरी करने में बरसों लगेंगे : राजन

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि रुपये की मौजूदा स्थिति काफी ठीक-ठाक है और इसके अवमूल्यन के किसी भी प्रयास से मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ सकता है. इससे अवमूल्यन का लाभ भी गायब हो सकता है. उन्होंने कहा कि भारत को चीन के प्रति व्यक्ति जीडीपी के स्तर को प्राप्त करने के लिए अभी काफी सफर तय करना होगा जिसके लिए देश को लगातार कई और वर्षों तक मजबूत वृद्धि की जरूरत होगी. राजन राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान में परिचर्चा में भाग ले रहे थे.

वैश्विक नरमी से निपटने के लिए रूपये के अवमूल्यन की संभावना के बारे में एक सवाल पर राजन ने कहा, रूपये के मूल्य का मुद्दा काफी जटिल है. कुछ लोग मानते हैं कि निर्यात बढ़ाने के लिए रूपये का अवमूल्यन होना चाहिए. अवमूल्यन के कड़ाई के साथ कई तरीके होते हैं, लेकिन इनमें से बहुत से तरीकों के लिए वित्तीय प्रणाली में उल्लेखनीय कार्रवाई की जरूरत है, जिनका इस्तेमाल हमारे पड़ोसी देशों ने लंबे समय तक किया है. उन्होने कहा कि इसके कई विपरीत प्रभाव भी हैं. यदि आपको आयात के लिए अधिक भुगतान करना पड़ेगा तो देश में मुद्रास्फीति बढ़ जाएगी. आपको तेल के लिए अधिक भुगतान करना पड़ेगा, जिसका मुद्रास्फीतिक असर होगा. गवर्नर ने कहा, इससे आपको अवमूल्यन से मिलने वाला लाभ समाप्त हो जाएगा. मेरा मानना है कि आज रुपये का मूल्य ठीक है. मुझे नहीं लगता कि किसी समस्या के हल के लिए हम एक तरह या दूसरी तरफ चलने पर जोर देना चाहिए.

गवर्नर ने इसके साथ ही कहा कि कोई भी वृद्धि पर्यावरण की कीमत पर नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा, क्या जीडीपी के आंकड़े ही यह कहने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि हम विकसित हो चुके हैं? निश्चित रुप से नहीं. वित्तीय समावेश के लिए बैंकों के महाजनों से हाथ मिलाने के सवाल पर राजन ने कहा कि वह इस विचार से असहमत नहीं हैं, लेकिन वसूली जैसे कई मुद्दों पर विचार करने की जरुरत है. देश की सहकारी बैंकिंग प्रणाली की स्थिति के बारे में राजन ने कहा कि यह प्रणाली अपनी उत्साह गंवा चुकी है. उन्होंने कहा कि सहकारी बैंकिंग प्रणाली देश की वित्तीय प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है. मैं इस बात पर जोर दूंगा कि इसका देश के उन हिस्सों में पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है जहां वित्तीय संस्थान नहीं पहुंच सके हैं.

ज्यादा पैदावार के लिए जल निकासी प्रौद्योगिकी

शुरू से ही जमीन से पानी निकालने के तरीके अपनाए जा रहे हैं. एक फ्रैंच इंजीनियर, हैनरी डार्सी ने साल 1856 में जल निकासी के तरीकों पर परीक्षण किया था. उस के बाद जल निकासी के बहुत से तरीके खोजे गए और भूमि से जल निकासी का इंजीनियरिंग विज्ञान के?रूप में विकास हुआ, जो अब आधुनिक खेती की जमीन से जल निकासी प्रणाली का डिजाइन तैयार करने का खास जरीया बन गया?है. हालांकि इन सिद्धांतों की मदद से अभी भी जमीन से जल निकासी समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकल सका है.

भूमि जल निकासी क्यों?: पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी में मौजूद फालतू पानी और लवण पौधों के लिए नुकसानदायक होते है. खराब जल निकासी वाली मिट्टी में फसल की उपज में भारी कमी हो सकती है. बहुत देर तक पानी भरा रहने पर जल क्षेत्र में आक्सीजन की कमी हो जाने के कारण पौधे मर जाते हैं. जल निकासी पौधों की सही बढ़वार के लिए जरूरी है. जड़ क्षेत्र में हवा, पानी व लवण की सही मात्रा तय करने के लिए खराब जल निकासी वाले खेतों से बाहरी तरीकों से जल निकासी जरूरी है.

भूमि जल निकासी प्रौद्योगिकी : मोटे तौर पर 2 प्रकार की जल निकासी प्रणालियां प्रचलित?हैं. सतही जल निकासी व उपसतही जल निकासी. सतही जल निकासी में मानसूनी वर्षा के दौरान समतल और निचले खेतों की सतह पर पाए जाने वाले ज्यादा पानी को निकाला जाता है. उप सतही जल निकासी में उथले जल तल वाले इलाकों में पानी के तल और लवणता को सही किया जाता है. भारत में लगभग 150 लाख हेक्टेयर खेती की भूमि पानी के भराव और लवणता से प्रभावित है, जिस के कारण फसल उत्पादन को?भारी नुकसान होता?है.

सतही जल निकासी : सतही जल निकासी नेटवर्क का एक सिलसिलेवार क्रम?है, जो सब से ऊंचाई पर बनी मुख्य नाली से खेतों के न्यूनतम स्तर पर बनी नाली तक फैला होता?है. मध्यवर्ती स्तर पर संचयन नालियां और उप मुख्य नालियां होती हैं. खेतों की नालियों के आकार की उथली नालियां होती हैं, जो कि लगभग 15-20 सेंटीमीटर गहरी होती?हैं, जिन्हें खेत के मुख्य ढलान के आरपार लगभग 100 मीटर के अंतराल पर बनाया जाता?है. संचयन नालियां 40 सेंटीमीटर औसत गहराई की होती हैं, जिन की तली की चौड़ाई कम से कम 20 सेंटीमीटर होती है. इन्हें खेतों के चारों ओर इस तरह बनाया जाता है कि इन में खेतों की नालियों से निकलने वाला पानी आसानी से आता रहे. इन का डिजाइन जल निकासी वाले इलाकों के मुताबिक तैयार किया जाता?है. खेतों की नालियों का निकास ऐसा होना चाहिए जिन से बह कर आने वाला पानी धीरे से निकासी नाली में चला जाए.

खेतों में इस तरह के बांध बनाए जाते हैं, जो नाली में पानी के ज्यादा बहाव को रोक सकें, जिन से मिट्टी का कटाव न हो और नाली में गाद या तलछट न जमा हो. सही जल निकासी के लिए खेतों की सतह को समतल होना चाहिए. उपमुख्य और मुख्य नालियों की डिजाइन इस प्रकार से तैयार की जाती है कि उन से बह कर आने वाला सारा पानी नीचे की नालियों में जमा हो सके. चूंकि ऊंचाई की नालियां ऊपरी बहाव से निचले बहाव की ओर बढ़ती हैं, इसलिए उन नालियों के पास शुरू में थोड़ा छोटा भाग होता है और उस में निचले बहाव की ओर सही तरीके से इजाफा होता है.

सतही नालियों के निर्माण की लागत का अंदाजा उन में शामिल जमीन पर किए जाने वाले कामों की लागत के अनुसार लगाया जाता?है. पुलिया या?पाइप आदि की लागत नालियों की खुदाई पर लगने वाली लागत के अलावा होती है.

उपसतही जल निकासी : उपसतही जल निकासी के लिए मिनरल फिल्टर डिजाइन और छोटे पैमाने की जल निकासी के लिए मृत्तिका टाइल वाली नालियों का डिजाइन तैयार करना जरूरी है. फिल्टर इस्तेमाल में कमखर्ची के लिहाज से उपसतही जल निकासी प्रणाली को लगाने की

2 तकनीकें हैं. मृत्तिका टाइलों के जोड़ों के?ऊपर चुने हुए स्थानों पर फिल्टर को स्थापित करना और फिल्टर को प्लास्टिक शीट से कवर करना ताकि उपसतही जल की नालियों में सीधे बहाव को रोका जा सके. कोई भी व्यक्ति नालियों में?टाइलें लगा सके, इस के लिए नालियां चौड़ी व गहरी होनी चाहिए. जहां भी फिल्टर को लगाना हो, वहां इस के लिए स्टील  स्लाइडिंग खुला बक्सा और स्टील की चलायमान सेपरेटर प्लेट का इस्तेमाल होता?है. नाली को पाटने से पहले मिनरल फिल्टर के ऊपर प्लास्टिक की एक शीट डाल दी जाती है ताकि टाइलों में मिट्टी न घुसे.

मृत्तिका टाइल वाली जल निकासी नाली की डिजाइन व उस का इस्तेमाल : उपसतही जल निकासी के लिए मृत्तिका टाइल की नालियां सब से सस्ता तरीका है. मिट्टी की अच्छी तरह से पकाई हुई टाइलें मजबूत होती?हैं और लंबे समय तक चलती हैं. ये छोटे पैमाने पर हाथ से बनाई जाने वाली उपसतही जल निकासी प्रणाली के लिए कुम्हार से बनवाई जाती हैं. 10-15 सेंटीमीटर व्यास की मृत्तिका टाइलों का इस्तेमाल किया जाता है. टाइलों में मिट्टी को जाने से रोकने के लिए उन में बने?छेदों से उन में जाने वाले जल बहाव को बढ़ाया जा सकता है.

 

] डा. प्रभा शंकर तिवारी, डा. एस के सिंह*, डा. हंसराज सिंह

(कृषि विज्ञान केंद्र, गाजियाबाद* भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान केंद्र,?झांसी)

 

काला धन छुपाने वाले हो जायें सावधान

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने कालाधन छुपाने वालों को आगाह करते हुए कहा कि उसने बड़ी राशि के लेन-देन से जुड़ी नौ लाख जानकारियों का डेटाबेस बनाया है. बोर्ड इस जानकारी का मिलान इस समय चल रही एकमुश्त कालाधन अनुपालन सुविधा योजना की घोषणाओं के साथ करेगा.

सीबीडीटी के चेयरमैन अतुलेश जिंदल ने कहा कि इस तरह की अघोषित संपत्ति व नकदी रखने वालों को आगे आना चाहिए और आय घोषणा योजना (आईडीएस) का लाभ उठाते हुए इसकी घोषणा करनी चाहिए. यह योजना 30 सितंबर तक खुली है. उन्होंने कहा, 'एक विस्तृत ब्यौरा तैयार किया गया और हमने बड़ी राशि के लेनदेन व संभावित अघोषित आय के मामलों से जुड़ी सूचनाओं के नौ लाख आंकड़ों का डेटाबेस तैयार किया है. इस डेटाबेस की प्राथमिकता तय की गई है. अन्य प्रवर्तन उपायों के साथ कर चोरी रोकने के लिए यह भी एक उपाय है. हम करदाताओं को पत्र जारी करेंगे और उन्हें बताएंगे कि हमारे पास सूचना है.'

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, 'हम निश्चित रुप से उन्हें पाक साफ होने का अवसर देना चाहेंगे. लोगों को इस सुविधा का फायदा उठाना चाहिए. हम यह कहना चाहते हैं कि हमारे पास यह डेटाबेस है और हम उन्हें इससे अवगत कराएंगे. आईडीएस का इस्तेमाल करने या नहीं करने का विकल्प उनके पास होगा.'

BCCI में मंत्रियों और सरकारी अफसरों की ‘नो एंट्री’

लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों के खिलाफ दायर बीसीसीआई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुना दिया है. जस्टिस लोढ़ा कमेटी की ओर से बीसीसीआई में सुधारों को लेकर जो सिफारिशें की गई हैं उनमें से कई बीसीसीआई को मंजूर नहीं थीं. जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए ये निर्देश

किसी पद के लिए आयु सीमा 70 साल होगी.

मंत्री और सरकारी अधिकारी बीसीसीआई की गवर्निंग काउंसिल से नहीं जुड़ेंगे.

गवर्निंग काउंसिल में CAG का एक सदस्य शामिल होगा.

राज्यों में एक से ज्यादा क्रिकेट एसोसिएशन होने पर सभी को एक-एक बार वोट करने का मौका दिया जाएगा, यानी रोटेशन प्रक्रिया लागू होगी.

सट्टेबाजी पर संसद को कानून बनाने के लिए कहा गया. साथ ही यह भी तय करने के लिए कहा गया कि बीसीसीआई कैसे आरटीआई के दायरे में आए.

विज्ञापन पॉलिसी का निर्णय बीसीसीआई खुद करे.

सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी की सिफारिश ‘टू प्लेयर्स एसोसिएशन’ को स्वीकार किया है.

लोढ़ा कमेटी पुराने और नए प्रावधानों पर गौर करने के बाद 6 महीने में रिपोर्ट फाइल करेगी.

सुप्रीम कोर्ट में इन मुद्दों को लेकर थी बहस

बीसीसीआई ने वन स्टेट, वन वोट पॉलिसी का विरोध किया है. इसके पीछे वजह बताई गई है कि समय के साथ अलग-अलग राज्यों में कई एसोसिएशन बन गए हैं, अगर एक वोट का नियम लागू किया जाएगा तो बाकी एसोसिएशन के साथ अन्याय होगा.

बोर्ड ने लोकपाल की नियुक्ति का भी विरोध किया है. बोर्ड का कहना है कि लोकपाल को वोटिंग की शक्ति दिया जाना आईसीसी के नियमों का उल्लंघन होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई से राज्य क्रिकेट एसोसिएशन को दिए जाने वाले पैसे के पीछे के मापदंडों की जानकारी मांगी. कोर्ट ने कहा कि यह अनियंत्रित और राजनीतिक रूप से प्रेरित है.

बोर्ड ने विज्ञापन पॉलिसी को लेकर लोढ़ा समिति की सिफारिशों का विरोध किया है और कहा कि इन पर फिर विचार किया जाए.

कोर्ट ने सवाल किया कि बोर्ड क्यों चाहता है कि इसमें मंत्रियों को शामिल किया जाए और आयु सीमा की बाध्यता क्यों नहीं मानने को तैयार?

बीसीसीआई और आईपीएल के लिए अलग-अलग गवर्निंग काउंसिल के गठन का भी विरोध.

बीसीसीआई सुप्रीम कोर्ट के फैसला का सम्मान करता है: राजीव शुक्ला

बीसीसीआई के वरिष्ठ अधिकारी और इंडियन प्रीमियर लीग (आीपीएल) के चेयरमैन राजीव शुक्ला ने कहा कि बीसीसीआई सुधारों पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसला का सम्मान करता है और लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने पर काम करेगा.

लोढ़ा समिति ने हालांकि बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के तहत लाने का फैसला संसद पर छोड़ दिया है. शुक्ला ने कहा, “हम सर्वोच्च अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं. हम इस पर विचार करेंगे कि लोढ़ा समिति की सिफारिशों को किस तरह लागू किया जा सकता है.”

पूर्व खिलाड़ी बिशन सिंह बेदी और कीर्ति आजाद ने भी सर्वोच्च अदालत के फैसले के प्रति समर्थन जाहिर किया. बेदी ने सोमवार को ट्वीट किया, “हम सभी को सुप्रीम कोर्ट का फैसला शिष्टता और सहजता के साथ स्वकार कर लेना चाहिए. आखिरकार किसी व्यक्ति विशेष या राजनेता से बढ़कर यह भारतीय क्रिकेट के हित के लिए है.”

आजाद ने ट्वीट किया, “मेरी बात सही साबित हुई, सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया. अब डीडीसीए और बीसीसीआई के खिलाफ मेरे अगले कदम का इंतजार कीजिए.”

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बीसीसीआई में मौजूद कुछ शीर्ष अधिकारियों को पद छोड़ना पड़ सकता है. बोर्ड अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भी इसमें शामिल हैं. अनुराग हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ (एचपीसीए) के भी अध्यक्ष हैं.

अदालत के फैसले से प्रभावित होने वाले अन्य सदस्यों में बोर्ड सचिव अजय शिरके, कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी और संयुक्त सचिव अमिताभ चौधरी. तीनों अधिकारियों को अपने-अपने राज्य क्रिकेट संघों का पद छोड़ना पड़ सकता है.

बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार और एन. श्रीनिवासन को भी भविष्य में अध्यक्ष पद हासिल करने का सपना त्यागना पड़ेगा, क्योंकि दोनों ही 70 की आयु पार कर चुके हैं.

VIDEO: दुनिया के सबसे एडल्ट सवाल का जवाब देगा Sex Chat With Pappu and Papa

उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता, उसको सुन कर हर कोई ऐसे डर जाता है, जैसे कोई भूत का नाम सुन लिया. ऐसा क्या है इसमें, जो कोई इसके बारे में बात नहीं करना चाहता?

हां, हम उस बेचारे हीनभावना के शिकार सेक्स की बात कर रहे हैं. ऐसा क्या है इस चीज़ के बारे में बात करने में या इसका नाम लेने में जो लोग अच्छे-खासे आदमी को गलत समझ लेते हैं? खुद इसके बारे में बात नहीं करते, जो बात करता भी है, उसे गलत समझ लेते हैं!

बिना सिर पैर की एडल्ट मूवी देख लेंगे, लेकिन सेक्स एजूकेशन के बारे में बात नहीं करेंगे! भैय्या, इतनी नाइंसाफी मत करो इस मामूली सी चीज़ के साथ और इसे हव्वा बनाना बंद करो.

यही संदेश लेकर आई है Y-Films की नई पेशकश Sex Chat With Pappu & Papa. ये डिजिटल फिल्म इन सभी चीज़ों के बारे में बात करती है, जिनको परिवार में A-Rated मान कर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है. खासकर मां-बाप और बच्चों के बीच इस तरह की कोई बात नहीं होती. इसी गैप को भरने की कोशिश है Sex Chat With Pappu and Pappa, जिसे थोड़ा गंभीर न कर, लाइट और मनोरंजक तरीके से बताया जाएगा.

ये कहानी है वात्सा परिवार की, जिसका एक 7 साल का सदस्य है पप्पू. पप्पू के दिमाग में जो भी "ऊल-जुलूल" सवाल आते हैं, वो अपने पापा आनंद से पूछ डालता है. जवाब देने में क्या कॉमेडी होती है, ये है Sex Chat With Pappu & Papa.

इसे डायरेक्ट किया है आशीष पाटिल ने और सचिन पिलगांवकर, आनंद तिवारी, संजीदा शेख़, कबीर साजिद, अल्का अमीन बने हैं वात्सा परिवार के मेंबर.

नीचे दिए गए लिंक पर आप भी देखिए इस फिल्म का जबरदस्त ट्रेलर…

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