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उत्सव के रंग में जब चॉकलेट होगी खास

परिवार और उनके दोस्तों के मद्देनज़र मोंड़ेलिज़ इंडिया फूड्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपनी मजेदार और मस्ती भरे गुणों के साथ कैडबरी मर्वेल्स क्रिएशन्स को लौंच किया है. इसके दो फ्लेवर्स जेली पॉपी कैंडी और कुकी नट क्रंच उपलब्ध होंगे और यह देश के हर प्रान्त में मिलेंगे. इसे केवल देश में ही नहीं, विदेशों में भी उतारा जायेगा. यूथ और परिवार की पसंद को इसमें खास महत्व दिया गया है, इसलिए इस बार इसमें जेली, बीनीस, जेम्स और पोपिंग कैंडी जैसी आकर्षक वस्तुओं को शामिल किया गया है.

इसका आकर भी खास है, ताकि परिवार के सभी बड़े, बुजुर्ग, बच्चे  अपने इच्छानुसार तोड़ कर खा सकें. इस अवसर पर मोंड़ेलिज़ इंडिया के मार्केटिंग डायरेक्टर प्रशांत पेरेस बताते है कि भारतीय उपभोक्ता अब किसी भी नई चीज को परखना और उसे टेस्ट करना पसंद करते हैं. चाहे शहर हो या गाँव, चॉकलेट सभी खाते हैं. उत्सवी माहौल को देखते हुए इस चॉकलेट की अहमियत सबके लिए होगी.

 

 

हो जाए गजल सी

झील के तट पे, सांझ के वक्त सी

बाल खोले हो जाए, गजल सी

मदभरी चाल की हिरनी सी

गालों की लाली है कमाल सी

हर तरफ अंधेरों की तासीर में

भोर के उजाले में दिखे तब्बसुम सी

रूपसुधा हो बहती हो बयार सी

खिले हुए चेहरे की आंगन के धूप सी

ठहर गई हर तरफ सुधियों की रैन

मस्तमस्त सपनों के मोती जड़ी नींद सी

पलकों से झांकती लाजवंती चितवन से

कैसे संभाल पाऊं, सिमट रही चिडि़या सी

होंठों के मधुप्यालों में सोती रही प्यास

क्षणभरे उन्माद में श्वेत बदन के आस सी

कांप उठे तब भी, व्याकुल हो मन भी

वर्षा में भीग कर झीनेझीने आंचल सी.

 

                       – प्रमोद सिंघल

 

यूरोप की यात्रा पर क्यों जा रहे हैं इम्तियाज अली

बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली सात अगस्त से एक माह के लिए यूरोप की यात्रा पर जा रहे हैं. सूत्रों की माने तो इस बार यूरोप यात्रा के पीछे इम्तियाज अली का मकसद अपनी नई अनाम फिल्म के लिए लोकेशन की तलाश करना है. उनकी इस नई फिल्म में शाहरुख खान के साथ अनुष्का शर्मा होंगी. सूत्रों के अनुसार शाहरुख खान चाहते हैं कि इम्तियाज अली उनके साथ वाली पूरी फिल्म यूरोप में ही फिल्माएं.

सूत्रों का दावा है कि इम्तियाज अली ने शाहरुख खान की बातों को मान देते हुए अपनी इस फिल्म की नब्बे प्रतिशित शूटिंग यूरोप में ही करेंगे. यह एक प्रेम कहानी प्रधान फिल्म है. सूत्रों का मानना है कि शाहरुख खान को लगता है कि अनुष्का शर्मा के साथ उनकी रोमांटिक फिल्म ‘‘रब ने बना दी जोड़ी’’ हिट थी, इसलिए इस बार भी अनुष्का शर्मा के साथ उनकी यह रोमांटिक फिल्म हिट हो जाएगी. यानी कि शाहरुख खान अब अपने करियर को लेकर फंक फूंक कर कदम रख रहे हैं.

शाहरुख खान के अति नजदीकी सूत्रों के अनुसार अपनी पिछली फिल्म ‘‘दिलवाले’’ के समय शाहरुख खान ने जो गलतियां की थी, उनसे सबक सीखते हुए शाहरुख खान ने अपनी पूरी पीआर टीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. और अब वह एक स्थापित पी आर कंपनी के साथ रिश्ता जोड़ने जा रहे हैं. इतना ही नहीं शाहरुख खान ने अपनी होम प्रोडक्शन कंपनी ‘‘रेड चिल्ली’’ की मार्केटिंग टीम से भी कई लोगों की विदायी कर दी है. बौलीवुड से जुड़े लोग मान रहे हैं कि यदि शाहरुख खान अपनी गलतियों से सबक सीखकर कदम उठा रहे हैं, तो शायद आने वाला वक्त उनका साथ दे दे.

क्या कोई सलमान खान के साथ धोखाधड़ी कर सकता है?

बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि ‘‘यशराज फिल्मस’’ के कर्ताधर्ता आदित्य चोपड़ा इन दिनों अभिनेता सलमान खान के साथ धोखाधड़ी करने पर उतारू हैं. सूत्रों के अनुसार ‘यशराज फिल्मस’ ने अब तक फिल्म ‘‘धूम 3’’ में आमिर खान को तथा फिल्म ‘‘फैन’’ में शाहरुख खान को उनकी पारिश्रमिक राशि के अलावा  फिल्म के लाभ में हिस्सा देना तय किया था. सूत्रों के अनुसार जब आदित्य चोपड़ा ने फिल्म ‘‘सुल्तान’’ के लिए सलमान खान से संपर्क किया था, तो सलमान खान ने इस फिल्म में इसी शर्त पर काम करने के लिए हामी भरी थी कि आदित्य चोपड़ा उन्हे भी उनकी पारिश्रमिक राशि के अलावा फिल्म के लाभ मे उतना ही हिस्सा देंगे, जितना कि उन्होने ‘‘धूम 3’’ में आमिर खान को दिया था.

उस वक्त आदित्य चोपड़ा इस बात के लिए तैयार हो गए थे. पर अब फिल्म बाजार में चर्चाएं हो रही हैं कि आदित्य चोपड़ा अब सलमान खान को फिल्म ‘सुल्तान’ के लाभ मे हिस्सा नही देना चाहते, इसलिए जानबूझकर ‘‘यशराज फिल्मस’’ की तरफ से ‘सुल्तान’ के बाक्स आफिस कलेक्शन को कम करके बताया जा रहा है. यानी कि अब आदित्य चोपड़ा ने सलमान खान को धोखा देने का मन बना लिया है.

मगर बौलीवुड का एक तबका, जो कि फिल्म बाजार को अच्छी तरह से समझता है और जिनकी पैनी नजर ‘सुल्तान’ के बाक्स आफिस कलेक्शन पर बनी हुई है, वह इस चर्चा को महज ‘यशराज फिल्मस’ का गिमिक मान रहा है. इस तबके के अनुसार ‘‘यशराज फिल्मस’’ ने कल्पना की थी कि ‘सुल्तान’ बाक्स आफिस पर ‘धूम 3’ का रिकार्ड तोड़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. इसलिए ‘यशराज फिल्मस’ की ही तरफ से खबर फैलायी जा रही है कि सलमान को लाभ का हिस्सा न देने के लिए ‘सुल्तान’ के बाक्स अफिस के आंकड़े को कम करके बताया जा रहा है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सलमान खान को समझ नही है.

बहरहाल, इस मसले का असली सच तो सलमान खान व ‘यशराज फिल्मस’ ही बता सकते हैं.

हमारी बेडि़यां

मेरे एक रिश्तेदार बहुत अंधविश्वासी हैं. उन के बेटे का जन्मदिन था. सो, उन्होंने उस का तुलादान करवाने का फैसला किया. सर्दी के दिन थे और मौसम बहुत ठंडा था. उन्होंने बेटे को जगाया और तड़के ही तुलादान की रस्में अदा करने के लिए बेटे को ठंडे पानी से नहाने को कहा. ठंडे पानी से  नहाने के बाद बेटा ठंड की चपेट में आ गया. जिस के कारण उसे 10 दिन अस्पताल में दाखिल रहना पड़ा. अंधविश्वास के कारण एक पिता ने ठंड के मौसम में भी अपने बेटे को ठंडे पानी से नहाने को मजबूर किया. ऐसा अंधविश्वास देश में कब तक और रहेगा.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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मेरी छोटी बहन के पति का, शादी के कुछ ही समय बाद, अचानक देहांत हो गया. मांबाबूजी को इस से गहरा सदमा  लगा. हमेशा सजधज कर रहने वाली मेरी बहन हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार सादगी से रहने लगी. यह देख कर मुझे बहुत दुख होता था. सब से ज्यादा दुख उस समय होता था जब शादीब्याह में होने वाली रस्मों में उसे शामिल नहीं किया जाता था. इस बात को ले कर बड़ेबुजुर्गों से अकसर मेरी बहस हो जाया करती थी कि इस में उस का क्या दोष है. अब पुराने रीतिरिवाजों को छोड़ देना चाहिए, उसे भी हमारी तरह जीने का हक है. लेकिन कोई मेरी बात नहीं सुनता था. फिर मैं ने सोचा, शुरुआत मुझे ही करनी होगी. लोगों के विरोध के बावजूद मेरे बेटे की शादी में होने वाली रस्मों में मैं ने उसे ही आगे किया. इस से उस में आत्मविश्वास जागा. अब वह हमेशा सजीधजी रहती है तथा पति की जगह उसे अनुकंपा नियुक्ति भी मिल गई है.

ज्योति सराफ, भोपाल (म.प्र.)

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हरियाणा के एक पिछड़े गांव में मेरी ससुराल है. जब भी वहां जाती, कई बातों में अंधविश्वास नजर आता. मैं सोचती कि 2 दिन ही तो रुकना है, क्यों कुछ बोलें. वैसे भी हम ने लवमैरिज की थी. लंबी बीमारी के बाद जून के महीने में मेरे ससुरजी का देहांत हो गया. हम वहां गए. अगले दिन मेरी ननद ने बताया कि चौथे के बाद ही मुझे सिर धो कर नहाना है. एक तो गांव में बिजली कम ही रहती थी, ऊपर से घर रिश्तेदारों से खचाखच भरा हुआ. पसीने के कारण मेरी पीठ और सिर में घमोरियां निकल आईं. खुजली करकर के मैं परेशान हो गई. मैं ने बड़ी ननद से नहाने की इजाजत मांगी तो वे कहने लगीं, मेरे पिता की मृत्यु पर तुम इतनी सी बात भी नहीं निभा सकतीं. यही होता है लवमैरिज करने का नतीजा. सब चुप रहे, मेरी आंखें भर आईं. 

प्रीति गुप्ता, हरिद्वार (उ.खं.) 

टौक टू ए के

बातबात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसते रहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब मोदी की ‘मन की बात’ की तर्ज पर दिल्लीवासियों से रेडियो के जरिए बात करेंगे. शो का नाम है टौक टू ए के यानी अरविंद केजरीवाल. यानी नकल में उन्होंने मोदी को आदर्श मान लिया. जाहिर है ये बातें बड़ी दिलचस्प होंगी. सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के साथ अरविंद केजरीवाल का भी लोग मजाक बनाते हैं. मजाक बनाने वालों की राय यह है कि अगर घर में उन की स्लीपर भी खो जाएं तो वे इसे मोदी की साजिश बताने लगते हैं. अब रेडियो जौकी बन कर भी वे मोदी को कोसें तो किसी को हैरानी नहीं होगी.

सारथी या दलाल

कृष्ण को सीधेसीधे दलाल कहते तो कई विवादों से घिर जाते, इसलिए अमर सिंह ने पहले यह कहा कि आप चाहें तो मुझे दलाल या बिचौलिया कह सकते हैं, हालांकि मैं कृष्ण के पांवों की धूल भी नहीं, पर वे भी मध्यस्थ थे. कृष्ण का महाभारत में रियल रोल उजागर करने वाले अमर सिंह की हाल ही में सपा में वापसी हुई है और मुलायम सिंह ने उन्हें सम्मान देने के साथ राज्यसभा भेज दिया है.

द्वापर युग में क्षत्रियों ने एक यादव का सहारा लिया था, कलियुग में यादव क्षत्रिय का दामन थाम रहे हैं यानी गंगा उलटी बह रही है. कृष्ण ने पांडव और कौरवों के बीच कलह पैदा की थी तो अमर सिंह यादव कुनबे में कलह की वजह बने हुए हैं. कृष्ण को, एक तरह से खुद की तरह, सत्ता का दलाल कहने की हिम्मत पर बधाई के पात्र तो वे हैं जो एक चैनल को दिए इंटरव्यू में मायावती को अखिलेश यादव की बूआ भी बता गए.

 

श्रापनुमा भविष्यवाणी

जवाहरलाल नेहरू से ले कर कपिल सिब्बल और अरुण जेटली तक कई वकील कामयाब राजनेता साबित हुए पर रामजेठमलानी की कामयाबी वकालत तक ही सिमट कर रह गई क्योंकि वे किसी के भरोसेमंद नहीं रह पाए. सपा के सहारे राज्यसभा में पहुंचे जेठमलानी अब मुलायम सिंह की जीहुजूरी में जुट गए हैं. समाजवादी सिंधी सभा द्वारा लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में रामजेठमलानी नरेंद्र मोदी पर बरसते रहे कि उन्होंने अपने चुनावी वादे पूरे नहीं किए और भाजपा उत्तर प्रदेश में भी चुनाव हारेगी, तो तय करना मुश्किल हो गया कि वे दुर्वासा शैली में श्राप दे रहे हैं या भृगु की स्टाइल में भविष्यवाणी कर रहे हैं. यह भड़ास या कुंठा रंग लाएगी या नहीं, इस में अभी वक्त है पर अंतर यह है कि जेठमलानी नमकहलाली अधिनियम का हालफिलहाल निष्ठा से पालन कर रहे हैं.

शीला की महत्ता

उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित को सीएम प्रोजैक्ट करने का कांग्रेसी मंतव्य अगर कोई है तो वह इतना भर है कि वह बसपा से गठबंधन कर सकती है. उस की मंशा ब्राह्मण और दलित वोटों को साधना है जिन का जी भाजपा से उचट रहा है. न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देशभर के ब्राह्मण भाजपा से त्रस्त हो चुके हैं लेकिन वे विकल्पहीनता से गुजर रहे हैं. यही हालत दलितों की है जो भाजपाई झुनझुने से खुश तो हैं पर आश्वस्त नहीं. सोनिया गांधी नहीं चाहती थीं कि कांग्रेसी दुर्दशा का ठीकरा उन के या राहुल, प्रियंका के सिर फोड़ा जाए, लिहाजा उन्होंने एक ऐसा चेहरा आगे कर दिया जिस की वफादारी में उन्हें शक नहीं है.

गेंद अब मायावती के पाले में है कि वे कांग्रेस से तालमेल पसंद करेंगी या नहीं. बसपा तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर हालफिलहाल गिनी जा रही हैं. दोनों मिल कर पहले या दूसरे नंबर का सपना देखें, तो यह उन का लोकतांत्रिक हक है.

अलग पहचान बनाते भारतीय मूल के अमेरिकी

अमेरिका में भारतीय मूल के लगभग 30 लाख लोग हैं जो अमेरिकी जनसंख्या का लगभग 1 प्रतिशत से थोड़ा ही कम है. वैसे तो 1635 में जेमस्टोन वर्जिनिया में पहला ईस्ट इंडियन अमेरिका आया था पर पहला कन्फर्म्ड भारतीय 1790 में ब्रिटिश जहाज से मद्रास से व्यापार के सिलसिले में आया था. 1894 और 1900 के बीच सिखों का समूह कैलिफोर्निया प्रांत में आया जिस में पंजाब के किसान और श्रमिक थे. इन में से कुछ विभिन्न प्रांतों में स्थित लकड़ी की मिलों में काम करते थे. 1912 में कैलिफोर्निया के स्टौकटन में पहला गुरुद्वारा बना. 1913 में अखोय कुमार मजूमदार भारतीय मूल के पहले अमेरिकी नागरिक बने पर 1923 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, उन की नागरिकता रद्द कर दी गई थी क्योंकि वहां के संविधान के अनुसार ईस्ट इंडियन अमेरिका का नागरिक नहीं हो सकता था. 1946 में लूस केल्लर ऐक्ट पास होने के बाद अब कोई भी भारतीय अमेरिकी नागरिक हो सकता है.

वर्ष 2000 तक लगभग साढ़े 16 लाख भारतीय मूल के अमेरिकी लोग थे जो 2010 तक बढ़ कर साढ़े 28 लाख हो चुके थे. ऐसा अमेरिका में टैक्नोलौजी बूम के चलते हुआ. आईटी और कंप्यूटर के क्षेत्र में यहां भारतीयों की संख्या बढ़ने लगी थी. चीन के बाद भारतीय ही अमेरिका में सब से ज्यादा अप्रवासी यानी विदेशी मूल के लोग हैं. ज्यादातर लोग आईटी के क्षेत्र में हैं पर आजकल अन्य क्षेत्रों में भी भारतीयों ने यहां अपनी साख बना ली है.

शिक्षा और आय में आगे

आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय अन्य अप्रवासियों और यहां तक कि औसत अमेरिकन से भी आगे हैं. 71 प्रतिशत भारतीय स्नातक या उस से उच्च डिगरी रखते हैं जबकि राष्ट्रीय औसत केवल 28 प्रतिशत ही है. दूसरी ओर लगभग 40 प्रतिशत भारतीय स्नातकोत्तर डिगरी वाले हैं जो अमेरिका के राष्ट्रीय औसत का लगभग 5 गुना ज्यादा है. वहीं, भारतीयों की औसत वार्षिक आय लगभग 88 हजार अमेरिकी डौलर है जबकि राष्ट्रीय औसत आय 49 हजार डौलर ही है. यह मुकाम भारतीयों ने अपनी लगन और परिश्रम से प्राप्त किया है.

अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों में लगभग 51 प्रतिशत हिंदू हैं, बाकी अन्य धर्मों–ईसाई, इसलाम, सिख, जैन आदि धर्मों के लोग हैं. अपनेअपने धर्म को मानने की यहां छूट है. अमेरिकी समाज बहुत ही खुला है. यहां सभी एकदूसरे को बराबर की दृष्टि से देखते हैं. यहां साधारणतया कोई दंगाफसाद नहीं होता. इक्केदुक्के छिटपुट हिंसा के नस्लीय मामले मिल सकते हैं. दरअसल, किसी के पास फालतू समय ही नहीं है. यहां कर्म ही ध्येय है और श्रम की प्रतिष्ठा है.

अनुशासित भारतीय

अन्य अप्रवासियों की तुलना में भारतीयों ने अमेरिकी समाज में आसानी से समावेश कर अपनी जगह बना ली है. इस की एक वजह इन की अंगरेजी भाषा पर पकड़ भी है. यहां भारतीयों के अनेक रेस्टोरैंट और ग्रौसरी के स्टोर्स हैं. भारतीय भोजन अमेरिकी और अन्य देशों के नागरिक भी शौक से खाते हैं. यहां कोई त्योहार या उत्सव वीकडेज पर पड़ने पर उसे सप्ताहांत में छुट्टी के दिन ही सामूहिक रूप से मनाते हैं क्योंकि वीकडेज में वे अपने काम को सर्वोच्च महत्त्व देते हैं. उसी तरह जन्मदिन या शादी की एनीवर्सरी वीकडेज पर हुई तो उसे व्यक्तिगत तौर पर भले ही घर में मना लें, पार्टी तो सप्ताहांत में ही रखते हैं. मगर यहां भी भारतीय सभी पर्वत्योहार परंपरागत मनाते हैं पर किसी प्रकार का शोरशराबा वर्जित है. हम नियमों का उल्लंघन अपने देश में आराम से कर लेते हैं पर यहां ऐसा करने का साहस नहीं है. अपने यहां लाइन तोड़ने, शोर मचाने, सड़कों पर थूकने या कचरा फेंकने जैसे नियमों का उल्लंघन भले करते हों, पर यहां आते ही हम बिलकुल बदल जाते हैं और अनुशासित रहते हैं.

अमेरिका के अनेक प्रांतों में भारत के विभिन्न प्रांतों के लोग बसे हैं. सब अपनी परंपरानुसार पर्वत्योहार मनाते हैं और अन्य प्रांत के लोगों को भी आमंत्रित करते हैं. यहां भारतीयों के लिए रेडियो स्टेशन, टीवी चैनल और समाचारपत्र व सिनेमाहौल भी हैं जो बौलीवुड की हिंदी फिल्मों के अतिरिक्त अन्य भाषाओं की फिल्में भी दिखाते हैं.

लगभग आधे भारतीय तो अमेरिका के 4 प्रांतों– कैलिफोर्निया, न्यूयार्क, न्यूजर्सी और टैक्सास में बसे हैं. सब से ज्यादा भारतीय कैलिफोर्निया राज्य में हैं क्योंकि आईटी की सब से ज्यादा कंपनियां यहीं पर हैं. सैन फ्रांसिस्को का वह एरिया जो सिलिकौन वैली कहलाता है यहीं पर है, उस में भी 1995 से 2000 या उस के बाद आने वालों की संख्या सब से ज्यादा है.

अमेरिकी नागरिकता और कायदे

कुछ लोगों को कंपनी सीधे अस्थायी वर्क वीजा एच1बी पर बुलाती है. इस में अधिकतर युवा होते हैं, फिर ये अपनी पत्नी व बच्चों को आश्रित वीजा एच4 पर लाते हैं. अगर इन के बच्चे अमेरिका में पैदा हुए तो वे जन्म से अमेरिकी नागरिक होते हैं. फिर ज्यादा दिन रहने पर इन युवाओं को ग्रीन कार्ड मिल सकता है जिसे स्थायी नागरिक कहते हैं. और चंद वर्षों यानी लगभग 5 साल होतेहोते अमेरिकी नागरिकता के हकदार हो जाते हैं. दूसरा तरीका है स्नातक करने के बाद यहां विद्यार्थी वीजा एफ1 पर एमएस स्नाकोत्तर कर के यहां नौकरी में आते हैं और फिर ऊपर बताई गई विधि के अनुसार नागरिक तक बन सकते हैं. भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा यहां आईटी क्षेत्र में कार्यरत है. अमेरिका में प्रवेश के लिए उपरोक्त एच1बी  और एफ1 वीजा गेटपास है. जैसा कि पहले कहा गया है अमेरिका में सर्वाधिक शिक्षित भारतीय तो हैं ही, इन के बच्चे भी कुछ कम नहीं हैं. जहां भी भारतीय समुदाय है वहां के स्कूलों में भारतीय और चीनी बच्चों की संख्या ज्यादा है और वे पढ़ाई में भी आगे हैं. यहां राष्ट्रीय स्तर पर स्पैलिंग की प्रतिस्पर्धा में 1999 से अब तक 73 प्रतिशत विजेता भारतीय बच्चे रहे हैं. जहां भारत के विद्यालयों में सिर्फ पढ़ाई पर ही ध्यान दिया जाता है वहीं अमेरिका में बच्चों को पहली कक्षा से खेलकूद में प्रोत्साहित किया जाता है. यहां लगभग सभी बच्चे स्कूल के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों में भाग लेते हैं, जैसे तैराकी, चेस, पियानो, गिटार, आइस स्कैटिंग आदि जो सप्ताहांत में किए जाते हैं और फिर गरमी की छुट्टी में ये ऐक्टिविटीज और ज्यादा होती हैं. इस छुट्टी में बच्चे विशेष तैराकी और आइस स्कैटिंग की ट्रेनिंग लेते हैं. इन में भारतीय बच्चों की संख्या भी काफी होती है.

जानीमानी हस्तियां

अमेरिका में काफी तादाद में भारतीय उच्च पदों पर हैं और कुछ तो विश्व में भी अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा चुके हैं. विज्ञान के क्षेत्र में हरगोविंद खुराना, सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर को नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं. संगीत में जुबिन मेहता भारत का नाम रोशन कर चुके हैं. आईटी में विनोद खोसला, संजय मल्होत्रा, शांतनु नारायण, संजय झा, सत्या नडेला व सुंदर पिचई विश्वविख्यात हैं. अंतरिक्ष में कल्पना चावला और सुनीता विलियम, बैंकिंग में विक्रम पंडित, पेप्सी प्रमुख इंदिरा नुई को कौन नहीं जानता है. सुंदरता में नीना दाबुलुरी 2014 की मिस अमेरिका रह चुकी हैं. राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी भारतीयों की प्रतिभा को पहचानते हुए प्रीतिंदर भरारा को अटौर्नी जनरल और विवेक मूर्ति को सर्जन जनरल पद पर नियुक्त किया.

राजनीति में बौबी जिंदल अमेरिका के लूसिआना राज्य के 3 बार गवर्नर रह चुके हैं और 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के एक उम्मीदवार भी थे हालांकि नवंबर में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया था. वे अमेरिका के किसी प्रांत के भारतीय मूल के पहले गवर्नर हैं. अमेरिका के संविधान के अनुसार, जिस का जन्म अमेरिका में नहीं हुआ है वह राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकता है. अनेक अन्य प्रतिष्ठित भारतीय अमेरिका में सम्मानित पदों पर हैं.

अमेरिका में भारतीय परंपरा

जहां भारतीयों ने अपनी परंपरा व संस्कृति को अमेरिका में भी बरकरार रखा है वहीं वे अमेरिका के प्रमुख त्योहारों में भी खुलेदिल से भाग लेते हैं, जैसे हैलोवीन के मौके पर भारतीय बच्चे पड़ोस के अमेरिकी घरों में जा कर ‘ट्रिक या ट्रीट’ का आनंद लेते हैं और अगर छोटे बच्चे अकेले जाने योग्य नहीं, तो मातापिता उन्हें साथ ले कर जाते हैं. क्रिसमस के अवसर पर भारतीय भी अपने घरों में क्रिसमस ट्री को सजा कर रंगबिरंगे बल्बों से रोशनी करते हैं. अमेरिकी लोगों की तरह भारतीय भी मन लगा कर काम करते हैं. सप्ताह के प्रथम 5 दिन काम करते हैं, बाकी के 2 दिन अपनेअपने व्यक्तिगत कार्य और मनोरंजन के लिए रखते हैं. सप्ताहांत में वे गेम्स, सिनेमा या कहीं भ्रमण पर निकलते हैं. इस के अलावा शौपिंग, ग्रौसरी, कपड़ों की धुलाई, घर की सफाई व बागबानी आदि में व्यस्त रहते हैं.

यहां लेबर बहुत महंगी होती है, इसलिए ज्यादातर काम स्वयं करना पड़ता है. भारत की तरह महरी, धोबी, ड्राइवर आदि की सुविधा नहीं है. अमेरिकी लाइफ बहुत फास्ट है. वे समय नष्ट नहीं करना चाहते, यहां तक कि खाने में भी. यही कारण है कि यहां फास्टफूड काफी प्रचलित हैं और अधिकतर काम स्वचालित यंत्रों द्वारा किए जाते हैं. यहां धुले कपड़े खुले में नहीं सुखाने पड़ते हैं, ये मशीन में ही पूरी तरह सूख जाते हैं. भारतीय भी इस से अछूते नहीं हैं. यहां सभी देशों के लोग आ कर बस गए हैं. सो, उन देशों के व्यंजन भी उपलब्ध हैं. बीचबीच में भारतीय भी अवकाश के दिन इस का आनंद लेते हैं. समय की कीमत यहां सभी को पता है, इसलिए ज्यादा मिलनाजुलना नहीं होता. अगर कहीं जाना भी हुआ तो पहले से फोन पर समय लेते हैं और ठीक समय पर ही जाते हैं. लौंग वीकेंड यानी शनिवार व रविवार के आगेपीछे कोई अवकाश हुआ तो भारतीय भी इस का भरपूर आनंद लेना नहीं भूलते. पहले से ही योजना बना कहीं दूर घूमने निकल जाते हैं.

राष्ट्रभक्ति और कानून

ऐसा नहीं है कि भारतीयों को सफलता हाथ पर हाथ रखे मिली हो. इस के लिए उन्हें भरपूर परिश्रम करना पड़ा है. अपनों को सात समंदर पार छोड़ बिछुड़ने की मानसिक पीड़ा सताती है. फिर यहां के बिलकुल नए वातावरण में अपने को ढालने में समय लगता है. अपने देश में बोले जाने वाली अंगरेजी और अमेरिकी अंगरेजी के उच्चारण में बहुत अंतर है. यहां की जीवनशैली भिन्न है. भारत की तरह ‘चलता है’ कल्चर यहां सोच भी नहीं सकते हैं. आप किसी भी देश, धर्म या जाति के हों, सब के लिए एक ही कानून है. यहां के लोग राष्ट्रभक्त होते हैं. भारतीय चाहे किसी भी धर्म के हैं, उन्हें या उन के बच्चों को अवसर पड़ने पर राष्ट्रगान गाना होता है.

यहां के यातायात नियम हमारे यहां से भिन्न ही नहीं, विपरीत भी हैं और ड्राइव करते समय हौर्न नहीं बजाना है. यहां अपने टीचर या बौस, चाहे कितना भी सीनियर हो, को उस के फर्स्ट नेम से संबोधित करना होता है, सर या मैडम नहीं. राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कुछ वर्ष पहले ‘ओबामा केयर’ नियम बनाया था जिस के अंतर्गत यहां के बुजुर्ग स्थायी निवासियों को बहुत मामूली खर्च पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है. इस लिहाज से भारतीय मूल के लोग अपने मातापिता को यहां का स्थायी निवासी (ग्रीन कार्ड) कार्ड ले कर यहां उन का उचित इलाज करा सकते हैं, जो चाहें तो 4-5 साल में नागरिकता भी प्राप्त कर सकते हैं. इस तरह बुजुर्ग मातापिता अमेरिका में बसे अपने बच्चों के साथ अब आराम से रह सकते हैं. अमेरिका अभी भी भारतीय युवाओं का ड्रीम डैस्टिनैशन है.           

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