लोकतंत्र में नेता सर्वोच्च माना जाता है. नौकरशाही उसके फैसलों का क्रियान्वयन करती है. जब नेता जरूरत से अधिक नौकरशाही पर निर्भर हो जाता है, तो जनता की नजरों में उसकी छवि प्रभावित होती है. यह संकट तब और बढ़ जाता है जब एक अफसर सरकार के लिये हर काम की कुंजी बन जाता है. उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन को रिटायर होने के बाद 3 माह का सेवा विस्तार दिया गया. इसके बाद 30 जून को वह रिटायर हो रहे है.

पहले यह कहा गया कि आलोक रंजन को 3 माह का दूसरा सेवा विस्तार दिया जा सकता है. अंदरखाने इस बात का पार्टी, सरकार और नौकरशाही में विरोध बढ़ गया तो इस फैसले को टाल दिया गया. मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी कि अब मुख्य सचिव आलोक रंजन को दूसरा सेवा विस्तार नहीं दिया जायेगा.आलोक रंजन ने खुद भी इस बात से इंकार किया. उत्तर प्रदेश की सरकार ने आलोक रंजन को दूसरा सेवा विस्तार देने की जगह पर उनको सरकार में सलाहकार जैसी अहम भूमिका देने का फैसला किया है.

मुख्य सचिव आलोक रंजन सरकार के सबसे भरोसेमंद अफसरो में हैं. उत्तर प्रदेश सरकार के कई प्रोजेक्ट उनकी अगुवाई में चल रहे हैं. यह सही है कि नये अफसर के लिये इन कामों को संभालना मुश्किल काम होगा. इसके बाद भी किसी अफसर पर इतना निर्भर हो जाना प्रदेश सरकार के मुखिया में आत्मविश्वास की कमी को दिखाता है. नेता हमेशा जनता के नजदीक होता है जबकि अफसर जनता के लिये दूर की कौडी होता है. जनता हमेशा नेता को सबसे उपर देखना पंसद करती है.

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