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क्या रंग लाएगा शर्मिला इरोम का संघर्ष?

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में अफस्पा को ले कर जो फैसला सुनाया, उस से शर्मिला इरोम चानू की लंबी लड़ाई और उन का संघर्ष एक हद तक सफल हुआ. अफस्पा और सेना के अत्याचारों के खिलाफ पिछले 16 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने भूख हड़ताल कर के चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 1958 (अफस्पा) के तहत सेना की मनमानी और ऐक्ट के बेजा इस्तेमाल पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की. मणिपुर में सुरक्षा और चौकसी बनाए रखने के लिए सेना को अफस्पा के तहत विशेषाधिकार दिए गए हैं. लेकिन समयसमय पर राज्य में शक के आधार पर किसी को भी उठा लेना और पूछताछ के बहाने बलात्कार व बेरहमी से पिटाई को ले कर असंतोष लंबे समय से पनपता रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 2 दशकों में 1,528 फर्जी एनकाउंटर के मामलों की जांच के लिए स्वतंत्र समिति बनाने को भी कहा है. यह कभी बनेगी और रिपोर्ट देगी, इस का भरोसा नहीं है.

सेना की ज्यादतियों को ले कर मणिपुर मानवाधिकार संगठन और सेना के ‘व्याभिचार’ के खिलाफ सुरेश कुमार सिंह द्वारा दायर किए गए मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार के अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी रिपोर्ट तलब की है. अदालत को सरकार यह भी बताए कि प्रभावित परिवार को हर्जाना दिया गया है या नहीं, दिया गया है तो कितना दिया गया है. साथ में, यह भी कि हर्जाना दिए जाने के बाद सरकार की ओर से और क्या कदम उठाए गए हैं. उधर, वादीपक्ष को सेना पर लगाए गए आरोप के तमाम सुबूतों को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया है.

अफस्पा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनता रहा है. लगभग डेढ़ दशक से नाक में राइल्स ट्यूब लगाए शर्मिला इरोम की तसवीर से दुनिया वाकिफ है. मणिपुर की एक और तसवीर दुनिया ने देखी है, जो 12 साल पुरानी बात है. मणिपुर के विख्यात कांगला फोर्ट के सामने ‘इंडियन आर्मी रेप अस’ लिखे एक सफेद बैनर के पीछे मणिपुर की मांबहनों को बगैर कपड़े दुनिया ने देखा है. मणिपुर में अफस्पा के खिलाफ यह विरोध प्रदर्शन लंबे समय से चला आ रहा है. 1958 में उत्तरपूर्व भारत में अफस्पा लागू किया गया. मणिपुर समेत असम, त्रिपुरा, नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश में यह जारी किया गया था, जो आज भी जारी है.

क्या है अफस्पा कानून

यह कानून 1958 में बनाया गया था. अफस्पा कानून में सशस्त्र बल को विशेष अधिकार दिया गया है. इस कानून के प्रभाव वाले क्षेत्र में सैन्य बल किसी व्यक्ति की बिना वारंट तलाशी या फिर गिरफ्तार कर सकता है. सेना किसी के भी घर में घुस सकती है. कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सेना फायरिंग भी कर सकती है और फायरिंग करने वाले के खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं होती. भले ही इस फायरिंग से किसी निर्दोष व्यक्ति की जान ही क्यों न चली जाए.

मणिपुर के मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पिछले 58 सालों में सेना के जवानों ने सुरक्षा के नाम पर केवल शक के बिना पर हजारों बेकुसूर लोगों की हत्या की है. राज्य की महिलाओं का बेरहमी से बलात्कार कर उन की हत्या कर दी गई है. अब तक बलात्कार की शिकार बहुत सारी महिलाओं ने आत्महत्या कर ली है. आत्महत्या करने वाली महिलाओं में शर्मिला की करीबी दोस्त भी हैं. पहली बार सेना पर ज्यादती का आरोप 2 नवंबर, 2000 में लगा. मणिपुर की इंफाल की घाटी में एक छोटा सा गांव है मालोम. असम राइफल्स के जवानों ने गांव के बस स्टौपेज में खड़े बेकुसूर लोगों को शक के आधार पर गोलियों से भून डाला. यह घटना मालोम गांव नरसंहार के रूप में जानी जाती है. इन 10 लोगों में 62 साल की एक महिला के साथ 18 साल का नौजवान शामिल था. 18 साल के सिनाम चंद्रमणि को 1988 में बहादुर बच्चे का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल था. इस घटना की खबर जब अगले दिन अखबार में प्रकाशित हुई तो पूरे मणिपुर में जैसे आग लग गई.

अगले दिन बृहस्पतिवार था. अखबार में प्रकाशित इस नरसंहार की तसवीर देख 28 साल की शर्मिला इरोम चानू का दिल दहल गया. नरसंहार के विरोध के तौर पर असम राइफल्स को वापस बुलाने और अफस्पा को हटाने की मांग को ले कर वे आमरण अनशन पर वह बैठ गईं. तब धारा 309 के तहत आत्महत्या करना एक अपराध था. हिरासत में शर्मिला की हालत बिगड़ती चली गई. तब पुलिस ने अस्पताल में भरती कराया. तब से शर्मिला की नाक में राइल्स ट्यूब लगी, जो 2014 में धारा 309 के निरस्त होने के बाद ही खुली. 10 जुलाई, 2014 को इंफाल के बामोन कंपू गांव की 32 वर्षीय थंगजाम मनोरमा को असम राइफल्स के जवानों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की सहयोगी होने के शक पर उठा लिया. अगले दिन गोलियों से छलनी उस का शव घर से 4 किलोमीटर दूरी पर मिला. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में उस के साथ गैंगरेप की बात कही गई थी. मनोरमा की स्कर्ट में कई लोगों के वीर्य भी पाए गए थे. बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में जो कुछ हुआ, उस से मनोरमा की मां और उस का भाई, शर्मिला और उस का परिवार खुश हैं. दरअसल, इन सभी राज्यों में गैर हिंदू रहते हैं. ईसाई बैपिस्ट मिशनरियों के आने के पहले वे कभी बर्मी तो कभी तिब्बती राजाओं के अधीन रहते थे. वरना आमतौर पर बिलकुल स्वतंत्र कबीले में, जिन की अपनी लिखत गाथा न थी. इन का काम जंगलों से चलता था और कभीकभार असम के क्षेत्रों में लेनदेन के लिए आते थे. जिस तरह हिंदू राजा कभी दलितों, शूद्रों को अपना न बना पाए, आज के शासक भी इन्हें पुश्तैनी शत्रु ही मान रहे हैं और पूरे उत्तरपूर्व में हो रहे विद्रोह के पीछे यही वजह है.

तुम्हारे लिए

स्वप्न सौसौ सजाए तुम्हारे लिए

दीप घर में जलाए तुम्हारे लिए

गुफ्तगू फूलकलियों से की हर पहर

दो अधर खिलखिलाए तुम्हारे लिए

दर्द भी, प्रीत भी, प्यास भी, आस भी

साथ ले कर आए हैं तुम्हारे लिए

चांदतारे मुझे देख हंसते हैं अब

नाज सब के उठाए तुम्हारे लिए

आ गई मांगने की जो बारी मेरी

जिंदगी मांग लाए तुम्हारे लिए

आंसुओं से लिखी, खुशबुओं में ढली

नज्म, शायर सुनाए तुम्हारे लिए

है यही आरजू, है यही जुस्तजू

हर कोई मुसकराए तुम्हारे लिए.

       – डा. घमंडीलाल अग्रवाल

 

 

बच्चों के मुख से

घर में रंगरोगन हो रहा था. शाम को सभी मजदूर बैठक का रंगरोगन पूरा कर के जाने की तैयारी में थे. हम लोग सोफे पर बैठ बातचीत कर रहे थे कि मेरे 3 वर्षीय पोते सक्षम ने दीवार पर चित्रकारी कर के गंदा कर दिया. मैं ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘यह क्या सक्षम, आज ही तो नया रंग हुआ है और आप ने दीवार गंदी कर दी?’’ वह डर कर मुझे देखते हुए वहां से चला गया. दूसरे दिन दूसरे कमरे का कलर हुआ और शाम को उस ने फिर दूसरे कमरे की दीवार पर कलर लगा कर गंदा कर दिया. मैं ने उसे फिर डांटा, ‘‘सक्षम, आप ने कल हौल की दीवार खराब की थी, आज कमरे की. आप को कल समझाया था न?’’

उस ने बड़ी मासूमियत से कहा, ‘‘आप कल बाहर के कमरे के लिए डांट चुके थे न, आज फिर उस के लिए क्यों डांट रहे हो?’’ और हम सब उस की बात सुन हंस पड़े.  

हंसा मेहता, इंदौर (म.प्र.)

*

घर के हम सभी लोग टीवी देख रहे थे. मेरे भाई के 2 बच्चे हैं, बेटी सनना बड़ी है और बेटा स्नेहिल छोटा, 4 साल का है. दोनों बहुत शैतान हैं. एक दिन हम टीवी देखने में व्यस्त थे. दोनों बच्चे खेलकूद रहे थे. खेलते हुए अचानक सनना का पैर फिसला और वह नीचे गिर गई और जोरजोर से रोने लगी. हम सब उठे और सनना को चुप कराने की कोशिश करते रहे पर ज्यादा दर्द होने की वजह से वह चुप नहीं हो रही थी. हम सब परेशान हो रहे थे. तभी न जाने स्नेहिल को क्या सूझी, वह हमारे पास आया और पास आ कर नीचे गिर गया. हम सब फिर घबरा गए परंतु स्नेहिल तुरंत खड़ा हो कर सनना के पास जा कर बोला, ‘‘देख, मैं नीचे गिरा पर मुझे कुछ हुआ.’’ यह देख कर हम सब जोरजोर से हंसने लगे. सनना, जो चुप नहीं हो रही थी, वह भी हंसने लगी. स्नेहिल की यह मासूम सी हरकत देख कर हम ने उसे गले से लगा लिया.

विक्रम ढींगरा, मुंबई (महा.)

*

मेरा 4 वर्षीय भतीजा बहुत शरारती है. उस के स्कूल में वार्षिकोत्सव होना था. उस में फैंसी ड्रैस प्रतियोगिता होनी थी. उसे केतली बन कर कुछ पंक्तियां बोलनी थीं. वह घर पर केतली बन कर प्रैक्टिस कर रहा था.उसे थोड़ी देर में भूख लग आई. वह बोला, ‘‘अरे भई, केतली में कुछ गरमागरम दूधचाय डालो, तभी तो भाप निकलेगी.’’ उस की इस युक्ति पर हम सभी एकसाथ हंस पड़े.

मनोरमा अग्रवाल, बांदा (उ.प्र.)

दो महीने में तीसरी बार महंगा हुआ सब्सिडी वाला एलपीजी

सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर का दाम 2 रुपये बढ़ा दिया गया. जुलाई से रसोई गैस सिलेंडर कीमतों में यह तीसरी बार बढ़त की गई है. वहीं विमान ईंधन यानी एटीएफ कीमतों में 3.8 फीसदी कमी की गई है.

दिल्ली में अब सब्सिडी वाले 14.2 किलोग्राम के रसाई गैस सिलेंडर का दाम 425.06 रुपये होगा, जो अभी तक 423.09 रुपये है. जुलाई से यह सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में तीसरी बढ़ोतरी है. उस समय सरकार ने हर महीने सब्सिडी में कुछ कमी करने का फैसला किया था.

इससे पहले 16 अगस्त को एलपीजी का दाम 1.93 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाया गया था. इससे पहले जुलाई में इसकी कीमतों में 1.98 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी. सरकार ने हाल में डीजल की तरह एलपीजी व मिट्टी के तेल पर सब्सिडी में कमी लाने का फैसला किया है.

पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने नवंबर, 2014 को डीजल कीमतों को नियंत्रण मुक्त किया था और सब्सिडी में कमी के लिए इसकी कीमतों में हर महीने 50 पैसे लीटर की बढ़ोतरी का फैसला किया था.

एलपीजी कीमतों में हर महीने करीब 2 रुपये वृद्धि का मकसद भी सब्सिडी को कम करना है. केरोसिन के मामले में सरकार ने पेट्रोलियम कंपनियों को इसकी कीमतों में हर महीने 25 पैसे लीटर की वृद्धि करने की अनुमति दी है. यह वृद्धि 10 महीने तक की जानी है. केरोसिन कीमतों में तीसरी वृद्धि की गई.

मुंबई में अब एक लीटर केरोसिन का दाम 15.93 रुपये लीटर होगा. दिल्ली को केरोसिनमुक्त राज्य घोषित किया जा चुका है और यहां सब्सिडी वाली पीडीएस केरोसिन की बिक्री नहीं की जाती. इसी के साथ पेट्रोलियम कंपनियों ने बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर का दाम 20.5 रुपये घटा दिया है.

उपभोक्ता अपना 12 सिलिडरों का कोटा खत्म होने के बाद बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर खरीदते हैं. बिना सब्सिडी वाले एलपीजी का दाम दिल्ली में अब 466.50 रुपये होगा, जो अभी तक 487 रुपये प्रति सिलेंडर है. इससे पहले एक अगस्त को इसके दाम 50.5 रुपये घटाए गए थे.

इसी तरह विमान ईंधन एटीएफ का दाम 3.8 फीसदी घटा दिया गया है. यह एटीएफ कीमतों में लगातार दूसरी कटौती है. दिल्ली में एटीएफ का दाम 1,795.5 रुपये प्रति किलोलीटर घटाकर 45,411.18 रुपये कर दिया गया है.

एक अगस्त को विमान ईंधन के दाम 4.2 फीसदी घटाए गए थे. गैर सब्सिडी वाले मिट्टी के तेल का दाम बढ़ाकर 51.07 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है, जो अभी तक 48.41 रुपये प्रति लीटर था.

रियो ओलिंपिक में भारत

पिछले कई महीनों से भारतीय मीडिया में यह चर्चा होती रही है कि रियो ओलिंपिक में भारतीय दल किसी भी दक्षिण एशियाई देश के मुकाबले सब से बड़ा दल है. इस से उम्मीद बढ़ गई थी कि इस बार बीजिंग और लंदन ओलिंपिक से भी ज्यादा मैडल भारत की झोली में आएंगे पर खिलाडि़यों के खराब प्रदर्शन से उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा था लेकिन पिछले 11 दिनों से पदकों से खाली भारत की उम्मीद एक पल के लिए तब झूम उठी जब हरियाणा के रोहतक की साक्षी मलिक ने अंतिम राउंड में अपनी प्रतिद्वंद्वी किर्गिस्तान की पहलवान आइसुलू ताइने अबेकोवा को हरा कर कांस्य पदक हासिल कर लिया. यह देश के लिए गर्व की बात है पर साक्षी जहां पलीबढ़ीं यानी हरियाणा में, वहां पुरुष आबादी के मुकाबले महिला आबादी का अनुपात बेहद खराब है. यह समाज के लिए एक संदेश भी है. साक्षी के मातापिता बधाई के हकदार हैं कि घोर पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्र में वे अपनी बेटी को पहलवानी के क्षेत्र में उतारने के लिए हर कदम पर उस के साथ खड़े रहे.

दूसरी तरफ देश की एक और बेटी हैदराबाद की बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधू ने सेमीफाइनल में जापान की नोजोमी ओकुहारा को हरा कर भारत का पदक पक्का कर दिया. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में भारत अभी बहुत पीछे है. रियो में ज्यादातर भारतीय खिलाडि़यों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है. सवाल है कि खिलाडि़यों के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार कौन है? जाहिर है खेल संघ और सरकारी तंत्र. खिलाडि़यों को न तो बेहतर कोचिंग मुहैया कराई जाती है और न ही बेहतर ट्रेनिंग की व्यवस्था की जाती है. पश्चिमी देशों के मुकाबले ओलिंपिक में हमारे खिलाड़ी हमेशा फिसड्डी साबित हुए हैं. यदि एकाध मैडल जीत लिया तो लगता है मानो पूरी दुनिया जीत ली. खेल संघ और खेल मंत्रालय 1-2 मैडल में ही बड़ीबड़ी हांकना शुरू कर देते हैं.

ओलिंपिक जैसे खेलों में भारतीय खिलाडि़यों को विदेशी खिलाडि़यों से सीखने की जरूरत है. संसाधनों की कमी व प्रतिभाओं की उपेक्षा के साथसाथ राजनीतिक दखलंदाजी से उबरना होगा. खिलाडि़यों को आधुनिक तकनीकें मुहैया करा कर योग्य खिलाड़ी बनाना होगा. उन के खानपान से ले कर स्वास्थ्य तक का खयाल रखना होगा. लेकिन ऐसा होता कहां है. यहां तो डोपिंग विवाद, हौकी में कप्तानी को ले कर विवाद, टैनिस में आपसी अहम का विवाद, खेल गांव में खराब सुविधाओं का विवाद, बौक्ंिसग में खेल महासंघ के गठन नहीं होने का विवाद और न जाने कितने विवाद. खेल से पहले ही इतने विवाद हो जाते हैं कि कोई भी खिलाड़ी मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाता है. इस से ऊपर उठना होगा, तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है.

चीनी खिलाड़ी और माहवारी टैबू

जब बड़े खेल के आयोजन होते हैं और वे भी रियो ओलिंपिक  जैसे खेल हों तो खिलाडि़यों पर तनाव वैसे भी हावी रहता है पर महिला खिलाडि़यों को तब और तनाव झेलना पड़ता है जब वे माहवारी से गुजर रही होती हैं. लेकिन चीन की 20 वर्षीया तैराकी चैंपियन फू युआनहुई ने माहवारी के बारे में जब खुल कर बात की तो सोशल मीडिया में रातोंरात सनसनी फैल गई. वह इस प्रतियोगिता में चौथे नंबर पर रही. खेल से ठीक 1 दिन पहले ही उसे माहवारी आई थी और वह थकान महसूस कर रही थी, इसलिए ठीक से तैर नहीं पाई. सोशल साइट्स पर कई समर्थकों ने फू के बारे में लिखा कि माहवारी के दौरान तैराकी करना वाकई कठिन है लेकिन इस के लिए फू प्रशंसा के काबिल है.

इस के बाद महिला खिलाडि़यों के माहवारी की वजह से प्रदर्शन पर पड़ने वाले असर पर चर्चा शुरू हो गई. दरअसल, महिलाएं अपने पीरियड्स के बारे में ज्यादा बात नहीं करतीं और जब कोई पुरुष कोच हो तो उस के सामने तो कतई नहीं. चाहे वह देश हो या विदेश, इस बात में वे झिझक महसूस करती हैं. इस बारे में लंबेचौड़े रिसर्च भी नहीं हुए हैं. पीरियड्स के दौरान वैसे भी महिलाएं कुछ चिड़चिड़ी रहती हैं, इस से उन में मानसिक तौर पर असर होना लाजिमी है. जहां तक टैंपन लगाने की बात है तो चीन में महज 2 प्रतिशत महिलाएं ही इस का इस्तेमाल करती हैं जबकि अमेरिका में 42 प्रतिशत महिलाएं इस का इस्तेमाल करती हैं. टैंपन के बारे में माना जाता है कि टैंपन लगाने से महिलाओं की वर्जिनिटी समाप्त हो जाती है. लेकिन जानकारों का मानना है कि ऐसा कुछ भी नहीं है.

फू युआन भले ही 400 मीटर टीम इवैंट में रियो में मैडल नहीं जीत पाई हों लेकिन 100 मीटर बैकस्ट्रौक में उन्होंने रजत पदक जीत लिया. लेकिन गोल्ड मैडल जीत कर भी लोग इतनी चर्चा में नहीं आते जितनी फू यूआनहुई पीरियड्स पर खुल कर बात कर के आ गईं और मीडिया में रातोंरात छा गईं.

बेहद जरुरी हैं विंडोज के ये कीबोर्ड शॉर्टकट

हर कमांड के लिए कीबोर्ड से माउस पर शिफ्ट होना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. ऐसा करने से टाइम भी ज्यादा खर्च होता है. कई बार हो सकता है कि आपका माउस काम ही न कर रहा हो, ऐसे में आपके पास दो ही विकल्प हैं. या तो आप जल्दी से दूसरा माउस ले आएं, या फिर अपने कीबोर्ड का इस्तेमाल हर कमांड के लिए करें.

कीबोर्ड शॉर्टकट्स ऐसे ही समय में आपका साथ दे सकते हैं. साथ ही यदि आप कंप्यूटर कीबोर्ड के मास्टर बनना चाहते हैं तो आपको कीबोर्ड शॉर्टकट्स भी मालूम होने चाहिए. आज हम आपके लिए विंडोज के ऐसे शॉर्टकट्स लाए हैं जो आपके बेहद काम आएंगे.

विंडोज की + A

कीबोर्ड में विंडोज की + A कमांड देने पर आपके कंप्यूटर में एक्शन सेंटर ओपन हो जाएगा.

विंडोज की + C

कीबोर्ड में विंडोज की + C कमांड देने पर आपके कंप्यूटर में कॉर्टाना का लिसनिंग मोड ओपन हो जाएगा.

विंडोज की + D

इससे आप कंप्यूटर डेस्कटॉप को ओपन कर कर सकते हैं और हाईड भी कर सकते हैं.

विंडोज की + E

कीबोर्ड में विंडोज की + E कमांड देने पर आपके कंप्यूटर में फाइल एक्स्प्लोरर ओपन हो जाएगा.

विंडोज की + G

यदि आपने कोई गेम ओपन किया है तो इस कमांड को देने पर आपका गेम बार ओपन हो जाएगा.

विंडोज की + I

कीबोर्ड में विंडोज की + I कमांड देने पर आपके कंप्यूटर की सेटिंग्स ओपन हो जाएंगी, जिन्हें आप चेंज कर सकते हैं.

विंडोज की + L

इस कमांड के साथ आप अपने पीसी को लॉक कर कर सकते हैं, साथ ही यदि आपको कंप्यूटर पर अकाउंट स्विच करने हों तो भी आप इस कमांड का प्रयोग कर सकते हैं.

विंडोज की + M

कीबोर्ड में विंडोज की + M कमांड देने पर आपके कंप्यूटर पर ओपन हुई सभी विंडोज मिनीमाइज हो जाएंगी.

विंडोज की + ctrl + D

इस कमांड से आप एक अन्य डेस्कटॉप ओपन कर सकते हैं, जिसे कहते हैं वर्चुअल डेस्कटॉप.

विंडोज की + ctrl + F4

इस कमांड से आप अपना करंट वर्चुअल डेस्कटॉप बंद कर सकते हैं.

बारिश न थमती

काश बारिश न थमती

मैं जीभर रो लेती

पानी संग पानी बनते आंसू

बेतरतीब धो लेती

यूं तो अब बरसात कम

होती है मेरे द्वारे

पहले जैसे जो आती

मैं जीभर रो लेती

कुछ बांझ से बीज पड़े थे

मेरी रसोई के कोने में

क्या मालूम वो भी खिल जाते

आंगन में उन को बो लेती

तेरी खुशबू से महका करती

आज भी मेरी चूनर धानी

कोई पहचान न पाता

चुपके से उस को धो लेती

मैं रोती, बादल रोता और

रोती तेरी यादें सारी

फिर रुक कर थक कर चुप हो कर

चैन से शायद सो लेती

काश ये बारिश न थमती

और मैं बेपरवाह रो लेती.

       – निहारिका श्री

 

व्हाट्सएेप कॉल के लिए सेट करें अलग-अलग रिंगटोन

व्हाट्सएेप  कॉल के लिए अलग-अलग रिंगटोन सेट की जा सकती है. कंपनी ने व्हाट्सएेप यूजर के लिए कस्टम नोटिफिकेशन का विकल्प भी दिया है. इसके जरिए अलग-अलग व्यक्तियों के लिए नोटिफिकेशन और कॉल का साउंड बदला जा सकता है. कस्टम नोटिफिकेशन का इस्तेमाल करने के लिए व्हाट्सएेप पर किसी भी व्यक्ति के नंबर पर क्लिक करें और चैट बार खुलने के बाद ऊपर दिए गए नाम पर क्लिक करें. इसमें नीचे की तरफ कस्टम नोटिफिकेशन के विकल्प पर टैप करके अलग से रिंगटोन सेट की जा सकती है. यहां हर व्यक्ति के लिए अलग- अलग रिंगटोन सेट कर सकते हैं.

नोटिफिकेशन लाइट का रंग भी बदलें

व्हाट्सएेप पर कस्टम नोटिफिकेशन के जरिए अलग-अलग लोगों के लिए नोटिफिकेशन लाइट का रंग भी बदला जा सकता है. उदाहरण के लिए अगर कोई खास दोस्त मैसेज भेजेगा तो उसकी नोटिफिकेशन लाइट का रंग लाल कर सकते हैं. अन्य व्यक्तियों के नोटिफिकेशन लाइट के रंग भी अलग किए जा सकते हैं. यहां नोटिफिकेशन लाइट के लिए हरे, नीले, लाल , पीले समेत सात रंगों में से कोई भी रंग चुना जा सकता है. अगर आप चाहते हैं कि नोटिफिकेशन आने पर लाइट न जले तो यह भी संभव है. इसके लिए सबसे पहले उस व्यक्ति के नाम पर क्लिक करें जिसके लिए नोटिफिकेशन लाइट का रंग बदला चाहते हैं. यहां फोटो के नीचे कस्टम नोटिफिकेशन का विकल्प आएगा. इसे क्लिक करने के बाद ‘यूज कस्टम नोटिफिकेशन’ पर क्लिक कर दें. अगर आप चाहते हैं कि किसी व्यक्ति की चैट फोन की होम स्क्रीन पर पॉप-अप के रूप में दिखाई दे तो कस्टम नोटिफिकेशन में जाकर यह सुविधा भी चालू की जा सकती है.

व्हाट्सएेप अनइंस्टॉल किए बिना नंबर बदलें

मैसेजिंग एप व्हाट्सएेप पर बिना एप अनइंस्टॉल किए नंबर बदला जा सकता है. नंबर बदलने के बाद व्हाट्सएेप ग्रुप में इसकी जानकारी पहुंच जाती है. व्हाट्सएेप पर नंबर स्विच करने के लिए स्क्रीन के ऊपर दिए गए तीन बिंदुओं पर टैप करें. यहां सेटिंग > अकाउंट > चेंज माय नंबर के विकल्प पर टैप करें. इसके बाद यहां पुराना नंबर सबमिट करें और इसके बाद नीचे वाले बॉक्स में नया नंबर जोड़ें. नए नंबर पर वेरिफिकेशन कोड आएगा. इसे सबमिट करने के बाद नया नंबर व्हाट्सएेप प्रोफाइल से जुड़ जाएगा.

होस्टल में लड़कियों की दबंगई

भोपाल में दूरदराज के इलाकों से जो छात्र पढ़ने के लिए आते हैं उन के सामने पहली परेशानी रहने की होती है. दलित और आदिवासी छात्रों का सब से बड़ा सहारा सरकारी होस्टल होते हैं जिन में फीस न के बराबर होती है. वैसे, इन्हें रहने के लिए शहर में कोई किराए का मकान नहीं देता क्योंकि ये छोटी जाति के होते हैं. आज से 5 साल पहले ऐसी ही एक आदिवासी छात्रा सृष्टि उइके पढ़ने के लिए छिंदवाड़ा से भोपाल आई थी तो तब के कलैक्टर निशांत वरवड़े की सिफारिश पर शहर के बीचोंबीच प्रोफैसर कालोनी के कमला नेहरू गर्ल्स होस्टल में उसे दाखिला मिल गया था. सृष्टि पौलिटैक्निक की पढ़ाई पूरी करने के बाद भोपाल के ही एमएलबी गर्ल्स कालेज से बीए की पढ़ाई कर रही थी. होस्टल में आ कर उस पर क्या गुजरी, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले उस पर क्याकुछ नहीं गुजरी थी. कम उम्र में ही मांबाप के चल बसने से सृष्टि की तो मानो दुनिया ही उजड़ गई थी. कुछ साल उस के मामा ने उसे पालापोसा और पढ़ाया. बाद में यह जिम्मेदारी मौसी ने उठा ली. सृष्टि को खेलनेकूदने की उम्र में अंदाजा हो गया था कि अगर दुनिया में खुद को साबित करना है और अपने पांवों पर खड़े होना है, तो खूब पढ़ना पढ़ेगा. उस ने मन लगा कर पढ़ाई की और पास भी होती गई. पर जैसे ही कमला नेहरू गर्ल्स होस्टल में वह आई तो उसे लगा मानो किसी बदतर जगह में आ गई हो. होस्टल का माहौल होस्टल जैसा नहीं था. उसे घुटन महसूस होने लगी थी. अकेली सृष्टि ही नहीं, बल्कि दूसरी कई लड़कियों की भी हालत ऐसी ही थी. पर इन की मजबूरी यह थी के ये पैसों की कमी के चलते बाहर कहीं किराए का मकान नहीं ले सकती थीं. दूसरे, आदिवासी जान कर ही लोग इन्हें मकान किराए पर देने के नाम पर नाकभौं सिकोड़ने लगते थे. इन्हें अपनी सुरक्षा का भी डर था. अकेली लड़की देख लोग तरहतरह से तंग करने से बाज नहीं आते.

होस्टल में जुल्म की इंतहा

शुरुआत में सृष्टि होस्टल के माहौल को समझने और उस में ढलने की कोशिश करती रही पर जल्द ही उसे यह समझ आ गया कि होस्टल कहने को तो सरकारी है पर यहां राज सीनियर लड़कियों का चलता है. आदिम जाति कल्याण महकमा और होस्टल वार्डन कहने भर की बातें हैं, होस्टल तो चलाती हैं वे लड़कियां जो सालों से यहां नाजायज तरीके से रह रही हैं और पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद भी उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं कि ‘अब जाओ यहां से.’ होस्टल में दाखिला लेने के कुछ दिनों बाद ही 2 सीनियर्स प्रीति और सीमा शाक्य ने सृष्टि की जम कर लातघूंसों से पिटाई कर डाली. सृष्टि का गुनाह इतना भर था कि उस ने इन दोनों का खाना बनाने से इनकार कर दिया था. हिंदी फिल्मों में जेल में बंद पुराना खूंखार कैदी खुद काम नहीं करता, उस के चमचे उस का सारा काम करते हैं. उस के पैर दबाते हैं, सिर की मालिश करते हैं, खाने की थाली लगा कर लाते हैं और जब उसे शौच के लिए जाना होता है तो बाथरूम खाली करवा देते हैं.

गुलामी का यही नजारा इस होस्टल में था. जूनियर लड़कियां, जो वाकई पढ़ाई को संजीदगी से लेती थीं, इन सीनियर्स के कपड़े धोती थीं, खाना बनाती थीं और झाड़ूपोंछा व सफाई समेत कई ऐसे दूसरे काम करने को मजूबर थीं जो उन का जमीर गवारा नहीं करता था. इस पर भी जुल्म की इंतहा यह कि ये अगर काम करने से मना करें तो पिटाई दोगुनी कर दी जाती थी. सृष्टि पर तो एक दफा कट्टा तक तान दिया गया था.

जब उजागर हुई रंगदारी

सीमा और प्रीति की रंगदारी के बाबत सृष्टि होस्टल वार्डन अनस्तासिया टोपे सहित आदिम जाति कल्याण महकमे और दूसरे आला अफसरों को सौ से भी ज्यादा बार शिकायतें कर चुकी थी पर किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की. थकहार कर उस ने पुलिस थाने में भी शिकायत की लेकिन पुलिस ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली. सृष्टि ने इन दोनों की रंगदारी के सामने घुटने न टेकते हुए जून के पहले हफ्ते में राज्य महिला आयोग में शिकायत की. आयोग की अध्यक्ष लता वानखेड़े ने मामले की संजीदगी को समझते हुए होस्टल का निरीक्षण किया तो कई चौंका देने वाली बातें सामने आईं कि सरकारी होस्टल किस तरह ज्यादती के शिकार हैं और इन में सीनियर लड़कियां सालों से गैरकानूनी तरीके से रह रही हैं, जूनियर छात्राओं के साथ दादागीरी करती हैं सो अलग. होस्टल वार्डन से पूछा गया तो उन्होंने भी अपनी बेबसी बयान कर दी कि सीमा और प्रीति उन पर भी रंगदारी करती थीं. कोई अनहोनी न हो, इसलिए वे खामोशी से बरदाश्त करती रहीं.

जाहिर है इस जवाब में दम नहीं था. उस ने हल्ला मचते देख गिरगिट की तरह रंग बदला. इन सीनियर लड़कियों को होस्टल से निकालने की बात की गई तो भी उन्होंने अपनी रंगदारी नहीं छोड़ी. उलटे, सीमा और प्रीति यह कह कर भभका डालती रहीं कि वे लेडी डौन हैं, उन के पापा ने उन्हें इस खिताब से नवाजा है. उन का यह भी कहना था, ‘हम दोस्तों के लिए दोस्त और दुश्मनों के लिए दुश्मन हैं.’ कुछ दिनों पहले ही सीमा पर शराब पी कर हुड़दंग मचाने का भी इलजाम लगा था. लेकिन इलजाम साबित नहीं हुआ था तो वह लड़कियों को और धमकाने लगी थी कि कोई उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. उस के संबंध ऊपर तक हैं.

धांधलियां और बदहालियां

जब हल्ला मचा और महिला आयोग व अनुसूचित जनजाति के अफसर सख्त हुए तो न केवल कमला नेहरू गर्ल्स होस्टल बल्कि दूसरे सरकारी होस्टल्स की बदहालियां भी उजागर हुईं कि हर होस्टल में जरूरत से ज्यादा छात्राएं रह रही हैं और अधिकतर नाजायज तरीके से रह रही हैं. होस्टल में बुनियादी जरूरतों का टोटा है, कई कमरों में पंखे नहीं हैं, खानेपीने के इंतजाम बदतर हैं और साफसफाई नहीं होती. जुलाई के पहले हफ्ते में जब जबरन नाजायज तरीके से रह रही छात्राओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया तो जातेजाते भी उन्होंने बहुत हंगामा खड़ा किया.एससी, एसटी के छात्रों के लिए बने होस्टल खस्ताहाल और जेल से क्यों हैं, इस सवाल पर गौर करें तो समझ आता है कि चूंकि ये दलित आदिवासी छात्रों के हैं, इसलिए इन पर कोई ध्यान नहीं देता, लाखों का बजट गोलमाल और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. दबेकुचले छात्र कहीं शिकायत नहीं कर पाते. उन्हें दाखिला भी मुश्किल से मिलता है, इसलिए हजारों छात्र इधरउधर महंगे किराए के मकानों में रह रहे हैं. उन के मांबाप बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए अपना पेट काट कर उन की पढ़ाई और रहने का खर्चा उठा रहे हैं.

इस तरह होस्टलों में भी इन तबकों के छात्र धर्म की तरह की ज्यादती के शिकार हैं. उन का कुसूर छोटी जाति का होना है. सीमा और प्रीति जैसी छात्राएं हर जगह हैं जो होस्टल में लंबे वक्त से रहती हैं, उन्हें अपनी जागीर समझती हैं. जुलाई के पहले हफ्ते  में ही जब छात्राओं का डर कुछ कम हुआ तो उन्होंने कई और चौंका देने वाली बातें बताईं. मसलन, कई सीनियर छात्राएं आधी रात के बाद लौटती हैं और बड़ीबड़ी गाडि़यां इन्हें लेने व छोड़ने आती हैं. जाहिर है उन का इशारा देहव्यापार या शोषण की तरफ था, जो रंगदारी से भी ज्यादा चिंता की बात है. विदिशा से आई एक दलित छात्रा की मानें तो, ‘रंगदारी करने वाली लड़कियों को अफसरों और नेताओं की सरपरस्ती मिली हुई है. ये शराब भी पीती हैं और दूसरे नशे भी करती हैं. उन से मिलने के लिए देर रात तक लड़के आते हैं जिस से हम छात्राओं की पढ़ाई में खलल पड़ता है. पर हम कुछ बोलें तो हमारी मारकुटाई की जाती है.’

सरकारी होस्टलों की हालत सुधरेगी, ऐसा लग नहीं रहा, क्योंकि इन्हें चलाने वाले लोग रसूखदार और पहुंच वाले हैं. वे चुनिंदा सीनियर लड़कियों को पटा कर रखते हैं और एवज में उन्हें छूट व सहूलियतें मुहैया कराते हैं. उन्हें देर रात तक घुमातेफिराते हैं, शौपिंग कराते हैं और जरूरत पड़ने पर पैसा भी देते हैं. इस सब से सीधी और पढ़ाकू लड़कियों का भविष्य बरबाद होता है.

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