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नेताओं के बंगले

अब देश में जो इने गिने प्रतिबद्ध कांग्रेसी बचे हैं 88 वर्षीय मोतीलाल वोरा उनमें से एक हैं. वे लंबे समय से कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हैं और कोष न के होने के बाद भी उसे संभाल रहे हैं .

वोरा के पास राजनीति का पर्याप्त अनुभव है वे 2 बार मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री रहे कई दफा केंद्रीय मंत्री रहे और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी बनाए गए. मुद्दत से वोरा भोपाल नहीं आए थे और आए भी तो राज्य सरकार के नोटिस पर जो उन्हें भोपाल में आवंटित आवास खाली करने के लिए मिला था.

भोपाल के 74 बंगला में स्थित बी – 29 में अर्से से सन्नाटा था क्योकि यहाँ कोई रहता नहीं था हालांकि ऐसे आवासों की भोपाल या किसी भी शहर में कमी नहीं जो पूर्व मंत्रियों वगैरह को आवंटित हैं लेकिन खाली पड़े रहते हैं.

पर वोरा का मामला कुछ अलग था इसलिए राज्य सरकार को उनका बंगला खाली करवाने एक नया नियम बनाना पड़ा था कि अब पूर्व सीएम जिस राज्य के विधायक होंगे उन्हें उसी राज्य में इस तरह की सुविधाएं मिलेंगी गौरतलब है कि पूर्व मुख्य मंत्रियों को प्रोटोकाल के तहत केबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिलता है .

वोरा चूंकि मूलतः छतीसगढ़ के हैं इसलिए लगता ऐसा है कि यह नया नियम उन्हीं को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था जिसका पालन करते हुए उन्होंने नोटिस की मियाद के काफी पहले ही भोपाल से अपना डेरा डंगर समेट कर एक तरह से समझदारी का ही परिचय दिया और यह भी पूरी परिपक्वता से कहा कि बंगला खाली करने से उनका नाता मध्य प्रदेश से नहीं टूटने छूटने वाला.

तमाम बड़े शहर खासतौर से राज्यों की राजधानियां अब आवासों की कमी से जूझ रहीं हैं हर जगह नेता बड़े बंगलों पर अंगद के पाँव की तरह कब्जा जमाये बैठे हैं. मिसाल वोरा जी की ही लें तो यह बंगला 1981 से उनके पास था 1993 के बाद वे कभी-कभार ही भोपाल आए यानि इतने साल यह बंगला एक तरह से दुरुपयोग का शिकार ही रहा इधर राज्य सरकार की परेशानी यह थी कि उसके पास अपने मंत्रियों को देने आवासों का टोटा पड़ गया था.

वोरा के खाली करते ही यह बंगला एक राज्य मंत्री ललिता यादव को आवंटित कर दिया गया जो अभी विधायक निवास से अपना दफ्तर चला रहीं थीं. तुरंत और बगैर हील हुज्जत किए बंगला खाली कर देने से वोरा की सज्जनता ही प्रदर्शित होती है जिसकी उम्मीद अब हर उस नेता से की जानी चाहिए कि वह खुद सरकारी आवास खाली कर सज्जनता दिखाएं.

सरकार को भी चाहिए कि वह ऐसे बंगले खाली कराये जिन में कोई नहीं रहता यह जनता के पैसे की फिजूलखर्ची तो है ही साथ ही एक अच्छे खासे मकान का बेजा इस्तेमाल भी है. बात अकेले नेताओं की ही नहीं है सरकार कई राजनतिक दलों के कार्यालयों, कर्मचारी संगठनों और पत्रकारों को भी आवास देती है क्यों देती है यह समझ से परे बात नहीं कि ऐसा उपकृत करने के लिए किया जाता है उपकार की यह परंपरा जनहित में बंद होनी चाहिए.    

अब रितेश के साथ सलमान को निर्देशित करेंगे रवि जाधव

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार रवि जाधव की बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘बैंजो’ का बॉक्स ऑफिस पर अंततः क्या हश्र हेागा, यह तो वक्त ही बताएगा. मगर रवि जाधव ने अपनी फिल्म ‘बैंजो’ के थिएटर तक पहुंचने से पहले ही लंबा हाथ मार लिया था.

जी हां! रवि जाधव अब छत्रपति शिवाजी पर एक बायोपिक फिल्म बनाने जा रहे हैं. वह इस फिल्म को हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में बनाने वाले हैं. इस फिल्म में रवि जाधव, रितेश देशमुख के साथ सलमान खान को भी निर्देशित करने वाले हैं.

इस बात की पुष्टि करते हुए खुद रवि जाधव कहते हैं कि ‘यह सच है कि मैं छत्रपति शिवाजी महाराज पर हिंदी व मराठी दोनों भाषाओं में एक फिल्म बनाने की तैयारी कर रहा हूं. इस फिल्म में शीर्ष  भूमिका रितेश देशमुख निभाएंगे. मगर हमारी इस फिल्म में सलमान खान की भूमिका भी अहम होगी. सलमान खान हमारी फिल्म में कैमियो करते हुए नहीं नजर आएंगे.’

रवि जाधव आगे कहते हैं, ‘छत्रपति शिवाजी पर फिल्म बनाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. महाराष्ट्र के लोगों के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज, भगवान की तरह हैं. इसलिए हम इस फिल्म को हल्के में नहीं ले सकते. हम इस फिल्म को बहुत बड़े बजट के साथ अति भव्य स्तर पर बनाने वाले हैं.’

इमेज बदलना चाहते है आजम खां

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खां का नाम फायर ब्रांड वक्ता के रूप में जाना जाता है. यह बात अपनी जगह पूरी तरह से सही है कि आजम खां जैसे साफ-साफ और मीठा बोलने वाले लोग राजनीति में गिने चुने हैं. आजम खां बहुत ही मीठे तरह से अपनी बात पूरी शालीनता से करते है. परेशानी की बात यह है कि वह दूसरे तमाम नेताओं की तरह चिकनी-चुपड़ी बातें नहीं कर पाते और सवाल होगा तो आजम खां का जबाव भी आयेगा. मीठे अंदाज में कही कड़वी बात हर बार ब्रेकिंग न्यूज का हिस्सा बन जाती है. यही वजह है कि उनको फायर ब्रांड नेता भी कहा जाता है.

समाजवादी पार्टी में आजम खां को अमर सिंह विरोधी खेमें का माना जाता है. सपा में अमर सिंह के आने के बाद आजम खां ने तय किया है कि वह विवादों से दूर रहेंगे. सच्चाई यह है कि आजम खां के बयानों से दूसरे लाभ में उठाते हैं और आजम खां को नुकसान सहना पड़ता है. अब आजम खां ने तय किया है कि वह विवादों से खुद को दूर रखेंगे.

सपा में परिवार विवाद के समय जहां तमाम नेता अलग-अलग खेमे में नजर आये वहां आजम खां तटस्थ बने रहे और उनकी कोशिश रही कि परिवार का विवाद खत्म हो जाये. पार्टी में वह ऐसे नेताओं में शामिल थे जो दोनो गुट के बीच विवाद को खत्म करने में लगे रहे. आजम खां मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के ज्यादा करीब है. इसके बाद भी आजम खां शिवपाल यादव के बेहद करीब नजर आये. आजम की कोशिश रही कि मुलायम परिवार में दूरी नजर न आये.

अब आजम ने खुद को सुधार लिया है. वह चाहते हैं कि प्रदेश में समाजवाद पार्टी कि सरकार बने. ऐसे में वह खुद को गंभीर और विवादों से दूर रखने वाले नेताओं की श्रेणी में शामिल करना चाहते है. पिछले कुछ समय से आजम खां की छवि तुनकमिजाज नेता की बनी जिसका नुकसान उनको और सपा दोनों को हुआ. असल में आजम खां इमानदार नेता है. आज के दौर में अपने को फिट नहीं कर पाते ऐसे में उनका गुस्सा और चिड़चिड़ापन झलकने लगता है. विरोधी इसी बात का लाभ उठाकर उनको हाशिये पर ले जाने का प्रयास करते हैं. आजम अब इस बात को समझ चुके हैं. खुद को बड़बोलेपन से दूर रखकर नई शुरूआत करना चाहते हैं.

दिल साला सनकीः पैसे की बर्बादी

एक बहुत पुरानी कहावत है ‘पेड़ बबूल का बोओगो तो कांटे ही मिलेंगे’. इसी कहावत को चरितार्थ करती है फिल्म ‘दिल साला सनकी’. कथानक के स्तर पर यह फिल्म ऐसा कुछ नही पेश करती जिसके चलते इसे देखने के लिए गाढ़ी कमाई खर्च की जाए.

एक औरत को लेकर युद्ध होना, दो दोस्तों का दुश्मन बन जाना, महाभारत होना आम और घिसी पिटी कहानी है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि बचपन में एक बच्चे को किसे अपना आदर्श चुनना चाहिए, इसके जवाब की इस अति लचर पटकथा वाली फिल्म से की भी नहीं जानी चाहिए.

फिल्म की कहानी के केंद्र में बादल है. और शहर का गुंडा बच्चा भाई (जिम्मी शेरगिल) हैं. पांच वर्ष के बच्चा को एक छोटे शहर के गुंडे तिवारी दद्दा ने उठाकर अपने बेटे की तरह पाला और उसे अपनी तरह दबंग गुंडा ही बनाया. एक दिन ऐसा आता है, जब बच्चा, तिवारी दद्दा की हत्या कर खुद उस शहर का नामी गुंडा बच्चा भाई बन बैठता है. शहर की पुलिस भी उन्हीं के इशारे पर नाचती है.

शहर के एक नाई का आठ वर्षीय बेटा बादल, बच्चा भाई को अपना आदर्श मानता है. उसकी महत्वाकांक्षा बच्चा भाई की तरह गुंडा बनना है. बड़ा होकर बादल (योगेश कुमार), बच्चा की शरणागति स्वीकार कर उनके लिए काम करने लगता है. बहुत जल्द बादल, बच्चा भाई का अतिविष्वासी बन जाता है. शहर में आकर बसे मास्टर शर्मा (शक्ति कपूर) की बेटी मेघा (मदालसा शर्मा) को बादल दिल दे बैठता है. पर मेघा उसे नापसंद करती है. मास्टर शर्मा जी को भी यह रिश्ता पसंद नही.

मास्टर जी अपने मित्र व पत्रकार के साथ पुलिस स्टेशन जाते हैं. पुलिस इंस्पेक्टर उन्हें सलाह देता है कि वह बच्चा भाई के पास जाएं. बच्चा भाई उनकी मदद का आश्वासन देते हैं. मगर बच्चा भाई खुद ही पहली नजर में मेघा को दिल दे बठते हैं. मेघा को अपनी पत्नी बनाने के लिए बच्चा भाई खुद ही अपनी अति सुंदर पत्नी की हत्या कर डालते हैं. उधर अब बादल, बच्चा भाई के खिलाफ विद्रोह कर देता है.

पर बच्चा भाई एक तरफ बादल को अधमरा कर शहर से बाहर धमकी देकर छोड़ आते हैं कि जिंदा बच जाए, तो शहर वापस मत आना. दूसरी तरफ बच्चा भाई हर तरह का दबाव मास्टर शर्मा के परिवार पर बनाते है कि वह मेघा की शादी उनसे कर दे. शादी के कार्ड छप जाते हैं. शादी की तैयारी भी शुरू हो जाती हैं. अब बादल की पहली प्रेमिका भी उसकी मदद के लिए आ जाती है. अंततः बादल, बच्चा भाई और उसके गुंडों को मौत के घाट उतारकर अपने प्रेम मेघा को पा लेता है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी फिल्म की कहानी, पटकथा व निर्देशन है. निजी जिंदगी में पेशे से डॉक्टर और ब्लैक बेल्ट धारी फिल्म के नायक योगेश कुमार में उत्कृष्ट अभिनेता बनने के गुण नजर नही आते. एक्शन दृष्यों में भी वह कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाए. ज्यादातर दृष्यों में वह किसी न किसी कलाकार की नकल करते हुए ही नजर आए हैं. यही हालत मदालसा शर्मा की है. जिम्मी शेरगिल पर ‘साहेब बीबी और गैंगस्टर’ ही हावी है. उन्हें इसे भूलकर आगे बढ़ना होगा. बच्चा भाई की कवितामय पत्नी के छोटे किरदार में हृषिता भट्ट जरुर आकर्षित करती हैं.

एक घंटा 51 मिनट अवधि वाली फिल्म ‘दिल साला सनकी’ के निर्माता व निर्देशक सुशिकैलाश, रचनात्मक निर्देशक इसरार अहमद, कथा व पटकथा राजन अग्रवाल, नृत्य निर्देशक रिकी गुप्ता, एक्शन निशांत खान, कैमरामैन जगन चैवली और सेबिस्टियन एंथनी, गीतकार रवि चोपड़ा, संगीतकार प्रमोद पंत तथा योगेश कुमार, जिम्मी शेरगिल, मदालसा शर्मा, शक्ति कपूर, शगुफ्ता अली, गार्गी पटेल, संदीप विर्क, हृषिता भट्ट व अन्य कलाकार हैं.

लिबास खराब या नीयत खोटी

पिछले दिनों बिहार के सिवान की जदयू विधयक कविता देवी ने यह फरमान जारी कर दिया कि लड़कियों को सभ्यता और संस्कृति के हिसाब से ही कपड़े पहनने चाहिए. सिसवां कला पंचायत ने लड़कियों के छोटे कपड़े पहनने और मोबाइल फोन रखने पर पाबंदी लगा दी है. इतना ही नहीं पंचायत का आदेश नहीं मानने वाली लड़कियों के मां-बाप से जुर्मानो के तौर पर 5 हजार रूपए वसूलने का फरमान भी जारी किया गया है. विधायक अपने ऊल-जलूल फैसले को जायज ठहराते हुए कहा कि लड़कियों को खुद ही समझना चाहिए कि वे भड़काऊ कपड़े न पहनें. इससे लड़कों और मर्दो की नीयत खराब होती है.

कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने यह कह कर बवाल मचा दिया था कि औरतें अगर लक्ष्मण रेखा को लांघेंगी तो रावण सामने खड़ा मिलेगा, इसलिए उन्हें सीमाओं में ही रहना चाहिए. इसी तर्ज पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा था कि महिलाओं के खिलाफ अपराध ‘इंडिया’ में होते हैं, भारत में नहीं. शहरों में महिलाएं पश्चिमी जीवनशैली अपनाती हैं, जिससे उनके खिलाफ अपराध होते हैं.

पिछले साल पटना के फुलवारीशरीफ प्रखंड में इस्लामी दावा रिसर्च फाउंडेशन (आईडीआरएफ) ने मुस्लिम महिलाओं के बाल छोटे कराने और आई ब्रो बनवाने पर रोक लगाने के लिए फतवा जारी करने की मांग की थी. उलेमा का मानना है कि शरीयत कानून में औरतों को कंधे तक बाल रखने और सिर पर आंचल डालने का हुक्म है. ऐसा नहीं करने वाली औरतें दोजख के आग हकदार होती है.  सुंदर दिखने के लिए औरतों को आई ब्रो सेटिंग करना भी गुनाह माना गया है. फतवे की मांग करने वालों में फुलवारीशरीफ के जानेसार खालिद, सैयद इमाम, ऐरम परवीन, साइस्ता अंजुम आदि शामिल हैं.

मौलाना अहसानुल होदा का कहना है कि औरतों और लड़कियों को मर्दना भेस नहीं अपनाना चाहिए. शरीर को सुंदर बनाने के लिए औरतें कोई लेप भी नहीं लगा सकती हैं. इस्लामी दावा रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन शहनवाज आलम राजा कहते हैं कि आज हर एक उत्पाद के प्रचार में औरतों और लड़कियों की नुमाइश की जाती है. समाज में लड़कियों को लेकर काफी खुलापन आ गया है, यह सब महिलाओं के ही हित में नहीं है. विज्ञापनों में लड़कियों के फोटो के इस्तेमाल पर रोक लगाने की जरूरत है.

पटना से 40 किलोमीटर दूर पालीगंज प्रखंड के कल्याणपुर पैपरा पंचायत ने लड़कियों के जींस और स्कर्ट पहनने पर पाबंदी लगाने का फरमान जारी किया था. यही नहीं, इस फरमान का उल्लंघन करने वाली लड़की के गार्जियन से 5 हजार का जुर्माना वसूलने का ऐलान भी किया गया था. सरपंच रामकुमार सिंह ने बताते हैं कि पंचों ने बहुमत से यह फैसला पास किया है, इससे बलात्कार और छेड़खानी के मामलों में कमी आ सकती है.

दिल्ली में हुए गैंग रेप के बाद से ही लड़कियों और औरतों पर नकेल कसने के लिए सामज में अजीबो-गरीब फरमान जारी किए जाने लगे थे. महिलाओं के खिलाफ हो रहे हमलों के लिए सभी महिलाओं को ही जिम्मेदार बता रहे हैं. कोई लड़कियों के जींस-टौप को तो कोई मोबाइल फोन को ही लड़कियों का दुश्मन बता रहा है. कोई औरतों को परदे में रखने की वकालत कर रहा है तो कहीं छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों के गार्जियन से जुर्माना वसूली की सिपफारिश की जा रही है.

समाज सेविका और शिक्षाविद डाक्टर नीना कुमार कहती हैं कि सवाल यह नहीं है कि औरतें क्या पहनें और क्या न पहनें? सवाल यह है कि औरत पर्दे में और मर्दों के हिसाब से क्यों रहे? अगर औरत अपने तन को कपड़े से पूरी तरह से ढक कर रखती है तो क्या उससे जुड़े अपराध बंद हो जाएंगे? दरअसल मर्दों के बनाए समाज और नियमों को उनके नीयत और नजर में बदलाव और सुधार लाने की जरूरत है. अगर घर, सड़क और समाज में लड़की के आसपास रहने वाले लोगों की नजर में गंदगी नहीं रहेगी तो कोई भी लड़की हर तरफ से महफूज है. मर्द अपनी गलती को छुपाने के लिए औरतों के लिबास को भड़काऊ और छोटा बता कर मामले को दूसरी दिशा देने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

इसी साल 3 जनवरी को पटना के बिहटा प्रखंड के श्रीचंद्रपुर गांव में एक चाचा ने अपनी ही 16 साल की भतीजी के साथ बलात्कार करने की कोशिश की. लड़की शौच के लिए खेत की ओर जा रही थी तो पहले से घात लगा कर बैठा उसका चाचा दरिंदगी पर उतर आया. वह हल्ला मचाने लगी तो पफरार हो गया. यह वारदात वैसे लोगों को समझाने के लिए काफी है कि औरतों के खिलाफ होने वाले अपराध उनके पहनावे की वजह से नहीं, मर्दों की खराब नीयत की वजह से ही होते हैं.

5-6 साल की बच्ची के साथ भी रेप या मोलेश्टेशन की घटनायें आए दिन सुनने को मिलती हैं. क्या ऐसे मामलों के लिए क्या बच्ची के भड़काऊ पहनावे को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या इतने कम उम्र की बच्चियां भड़काऊ कपड़े पहन सकती हैं? साफ है कि खोट मर्दों की नीयत में है, न कि लड़कियों के पहनावे में. ऐसे मसलों पर बिहार के मुख्यमंत्री नतीश कुमार साफ तौर पर कहते रहे हैं कि औरतों और लड़कियों के पहनावे पर कोई नकेल कसने के बजाए लोगों को अपनी नीयत और नजर ठीक रखनी चाहिए. महिलाओं की ड्रेस पर टीका-टिप्पणी करने वालों को यह अधिकार किसने दे दिया है? महिलाएं क्या पहने और क्या नहीं पहने, इस बात को महिलाएं अच्छी तरह जानती हैं और यह उन पर ही छोड़ देनी चाहिए.

कितनी लंबी होगी ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’

लगभग दस वर्ष पहले तक हर फिल्म तीन घंटे की अवधि वाली हुआ करती थी. लेकिन पिछले तीन चार वर्षों से हर फिल्म दो से सवा दो घंटे की अवधि वाली ही बन रही है. हर फिल्म का इंटरवल एक या सवा घंटे में हो जाता है. जब कोई फिल्म ढाई घंटे की अवधि की हो जाती है. तो कहा जाता है कि फिल्म काफी लंबी हो गयी.

मगर तीस सितंबर को प्रदर्शित होने वाली फॉक्स स्टार स्टूडियो निर्मित और नीरज पांडे द्वारा निर्देशित फिल्म एम एम धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी की अवधि तीन घंटे और दस मिनट की है. सूत्रों की माने तो इस फिल्म का इंटरवल ही दो घंटे चालिस मिनट पर आएगा.

मशहूर क्रिकेटर एम एस धोनी की बायोपिक फिल्म एम एस धोनी द अनटोल्ड स्टोरी में सुशांत सिंह राजपूत ने महेंद्र सिंह धोनी का किरदार निभाया है और वह क्रिकेट के मैदान पर क्रिकेट खेलते नजर आएंगे.

अमिताभ ने अजय देवगन को झूठा साबित किया

लगता है इन दिनों अजय देवगन के सितारे भी गर्दिश में चल रहे हैं. अजय देवगन अपने निर्देशन मे बनी फिल्म ‘शिवाय’ को प्रचारित करने के मकसद से जो भी कदम उठाते हैं, वह उनके लिए ही गले की हड्डी बनता जा रहा है.

अजय देवगन ने सबसे पहले केआरके व मंगत पाठक के बीच हुई बातचीत का आडियो जारी किया जिसमें अंततः वही खुद ही शक के घेरे में आ गए और यह मसला गायब हो गया.

अब अजय देवगन ने फिल्म ‘शिवाय’ के गाने ‘दरखास्त..’ का वीडियो जारी किया. इस गाने में अजय देवगन फिल्म की हीरोईन इरिका के साथ चुंबन करते हुए नजर आते हैं. अजय देवगन ने मीडिया में प्रचारित कराया कि फिल्म की पटकथा की मांग के चलेत अजय देवगन ने अपना 25 साल पुराना संकल्प तोड़कर फिल्म ‘शिवाय’ में चुंबन दृष्य को अंजाम दिया है.

अजय देवगन की तरफ से प्रचारित कराया जा रहा कि उन्होंने 25 वर्ष पहले सलमान खान व कुछ दूसरे कलाकारों की तरह सिनेमा के परदे पर हीरोईन के संग चुंबन दृष्य खासकर ‘लिपलॉक किसिंग’ न करने की कसम खायी थी, जिसे उन्हें फिल्म की पटकथा की मांग को पूरा करने के लिए तोड़ना पड़ा.

इतना ही नहीं इस बात को प्रचारित करने के दो दिन के अंदर ही अजय देवगन की तरफ से यह भी प्रचारित कराया गया कि किसिंग सीन की बात सामने आने से उनकी पत्नी काजोल काफी नाराज हैं.

अब इस तरह के प्रचार से ‘शिवाय’ को कितना फायदा व कितना नुकसान होगा, यह तो फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही पता चलेगा. लेकिन बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अजय देवगन के इस झूठ की पोल खोल दी है.

अमिताभ बच्चन ने एक अंग्रेजी पत्रिका से कहा है कि अजय देवगन ने प्रकाश झा निर्देशित फिल्म ‘सत्याग्राह’ में भी किंसिंग सीन किया था. इतना ही नहीं इस अंग्रेजी पत्रिका ने अमिताभ बच्चन के इस बयान को ट्विटर पर भी डाल दिया है. अब बेचारे अजय देवगन बगलें झांक रहे हैं. इसका कोई जवाब उन्हें देते नहीं बन रहा हैं.

उधर बॉलीवुड में अजय देवगन को लेकर एक बार फिर कई चर्चाएं गर्म हो गयी हैं. तमाम लोगों की राय में अजय देवगन को इस तरह की गलत बयानबाजी कर अपनी फिल्म को प्रोमोट करने की गंदी हरकत से बचना चाहिए. तो वहीं बॉलीवुड के एक तबके की राय में अजय देवगन को आगे से सावधानी बरतते हुए प्रचार के हथकंडे अपनाने चाहिए.

मगर बॉलीवुड का दूसरा तबका बॉलीवुड की कार्यप्रणाली के मद्दे नजर अजय देवगन को शक का लाभ देते हुए निर्दोश बताते हुए सलाह दे रहा है कि अजय देवगन ने अपने जिस दोस्त या जिस सलाहकार या जिस फिल्म प्रचारक के कहने पर इस तरह का प्रचार का हथकंडा अपनाया,उनसे अजय देवगन को भविष्य में दूरी बनाकर रखनी चाहिए.

पर हमें अजय देवगन के अगले कदम का इंतजार है क्योंकि एक बहुत पुरानी कहावत है ‘‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’’.

बैंजो: नाम बड़े और दर्शन छोटे

‘नटरंग’, ‘बालक पालक’, ‘बाल गंधर्व’ और ‘टाइम पास’ जैसी फिल्मों के दर्शकों को इन फिल्मों के निर्देशक रवि जाधव निर्देशित पहली हिंदी फिल्म ‘बैंजो’ देखकर निराश होना स्वाभाविक है. क्योंकि ‘बैंजो’ पूर्ण रूपेण बॉलीवुड की मुंबईया मसाला फिल्म है. पहचान के संकट से गुजर रहे ‘बैंजो’ को यह फिल्म पहचान दिलाने में कामयाब नहीं होती है.

फिल्म की कहानी मुंबई की झोपड़पट्टी बस्ती में रहने वाले नंद किशोर उर्फ तैरात के बैंजों बैंड के इर्द-गिर्द घूमती है. तैरात के साथ तीन और लड़के ग्रीस, पेपर और वाजा रहते हैं. यह चारो गणेषोत्सव के दौरान संगीत बजाते हैं.

बैंजो बजाने में तैरात का कोई सानी नही है. तैरात ऐरोगेंट है और जब कोई उसके पास बैंजो बजाने का कार्यक्रम लेकर जाता है, तो वह मनमाने पैसे मांगता है. तैरात व उसके तीनों साथियों के लिए बैंजो बजाना अंशकालिक काम है.

पेपर (आदित्य कुमार) हर दिन सुबह लोगों के घरों में समाचार पत्र पहुंचाता है. वाजा (राम मेमन) पानी भरता है. जबकि ग्रीस (धर्मेश येलंडे) एक गैरज में काम करता है. तैरात स्थानीय नेता पाटिल के लिए पैसा वसूली व मारा मारी का काम करता है.

पाटिल और एक सिंधी भवन निर्माता गोडानी के बीच कलह है. गोडानी की नजर पाटिल के इलाके के एक खेल के मैदान पर है,जिसे पाटिल, बस्ती वालों के भले की बात सोचकर उसे नहीं देना चाहता.

तैरात व उसके साथ मुंबई के गणेषोत्सव के दौरान बैंजो बजाते हैं, जिसे माइकल रिकार्ड कर न्यूयार्क की अपनी दोस्त क्रिस्टिना उर्फ क्रिस (नरगिस फाखरी) के पास भेजता है. क्रिस्टिना को बैंजो की धुन भा जाती है. उसे लगता है कि न्यूयार्क की एक संगीत कंपनी द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता के लिए वह बैंजो की धुन पर दो गाने बनाकर देगी और इस बैंजो वादक को वह न्यूयार्क ले जाकर संगीत कंपनियों के साथ जोड़ेगी.

इसी मकसद से वह इनकी तलाश में मुंबई आती है. मुंबई में एक मित्र की माध्यम से क्रिस, तैरात के पास पहुंचती है. तैरात अपने दोस्तों के कहने पर क्रिस्टिीना को नहीं बताता कि वह बैंजो बजाता है. उधर क्रिस उसके साथ हर गंदी बस्ती में घूमती है, तस्वीरें खींचती है. तो वहीं वह माइकल के साथ उस बैंजो वादक की तलाश भी की करती रहती है.

कई बैंजो वादकों को बुलाकर वह परफॉर्म कराती है, पर उसे वह धुन नहीं मिलती,जिसे सुनने के बाद वह न्यूयार्क से मुंबई आयी है. वह वापस न्यूयार्क जाने का फैसला कर लेती है. क्रिस वापस जाने से पहले तैरात से मिलने जाती है, तो उसके कानों में वही बैंजो की धुन पड़ती है, जिसकी उसे तलाश है.

जब क्रिस उस जगह पहुंचती है, तो वह तैरात व उसके साथियों को बैंजो बजाते हुए पाती है. तैरात बताता है कि उसने अपने साथियों के कहने पर बैंजों बजाने की बात छिपायी थी, बैंजों बजाना गिरा हुआ काम माना जाता है. हम तो पेट के लिए पैसा कमाने के लिए बजा लेते हैं. उसके बाद क्रिस, तैरात व उसके साथियों के साथ मिलकर संगीत तैयार करती है. नायर से बात कर उसके क्लब में तीन मिनट का बैंजो का कार्यक्रम रखवाती है, जिससे तैरात व उसके साथी स्टार बन जाते हैं.

अब वह सोबो संगीत समारोह में हिस्सा लेना चाहती है. पर इसी बीच तैरात से जलन रखने वाले दूसरे बैंजो पथक के मुखिया (महेष शेट्टी) तथा पाटिल व गोडानी की दुश्मनी के चलते पाटिल के जन्मदिन पर पाटिल को गोली मारी जाती है. आरोप तैरात पर लगता है. तैरात व उसके साथियों की पुलिस पिटाई करती है. क्रिस व माइकल वकील की मदद लेकर इन्हे जमानत पर छुड़ाते हैं. पर इस घटनाक्रम के बाद तैरात के सभी साथी उसका साथ छोड़ देते हैं. क्रिस भी निराश होकर न्यूयार्क चली जाती है. माइकल बैंगलोर चला जाता है.

होश आने पर पाटिल अपने बयान में तैरात को निर्दोश बताता है. तैरात के पिता की मौत हो जाने पर वह अपने साथियों के साथ पिता की अंतिम यात्रा में बैंजो बजाता है. सब कुछ सामान्य हो जाता है. सोबो संगीत समारोह से पहले तैरात व उसके साथी तथा माइकल मिलते हैं.नायर के विरोध करने पर तैरात एक टेक में बैंजो वाद्ययंत्र सजाकर अपने साथियों के साथ सोबो संगीत समारोह के दरवाजे पर जाकर परफॉर्म करता है, सारे श्रोता व दर्शक उनकी तरफ हो जाते हैं. माइकल इसका वीडियो बनाकर क्रिस के पास भेजता है. अंततः क्रिस, तैरात व उसके साथियों को न्यूयार्क बुलाती है.

इंटरवल से पहले फिल्म खिसकती हुई चलती है. इंटरवल के बाद फिल्म गति पकड़ती है, लेकिन फिल्म के अंतिम पच्चीस मिनट में निर्देशक व पटकथा लेखक दोनों ही अपनी फिल्म पर अपनी कमांड छोड़ बैठते हैं. फिल्म को असल जिंदगी के करीब रखने के प्रयास में पूरी फिल्म एक खास क्षेत्रीयता तक सीमित रह जाती है.

इंटरवल से पहले रितेश देशमुख व नरगिस फाखरी पर सपने में रोमांस का गाना डालकर फिल्म को कमजोर कर दिया गया. राजनेता पाटिल का किरदार काफी बनावटी लगता है. फिल्म देखते समय लगता है कि निर्देशक रवि जाधव इस कश्मकश से गुजर रहे हैं कि वह इसे ‘गुड फील सिनेमा’ की रंगत दें या ‘फार्मुला प्रधान एक्शन फिल्म’ की रंगत दें.

जब आप संगीत के एक वाद्ययंत्र को उसकी पहचान दिलाने की बात कर रहें हैं, तो फिर राजनीति व अपराध को कहानी का हिस्सा बनाना मकसद से भटकाव का संकेत है. पर खेल के मैदान को हड़पने और पाटिल पर हमले के प्लॉट ने पूरी फिल्म को तहस नहस कर दिया. यदि कहानी बैंजो पथक, क्रिस के मकसद, क्रिस व तैरात के संबंधों तक सीमित होती, तो भी ठीक रहता. पर निर्देशक के तौर पर रवि जाधव इन चीजों को भी सही परिपेक्ष्य में पेश करने में बुरी तरह से असफल रहे हैं. फिल्म को डुबाने में इसकी लेखकीय टीम और एडीटर भी दोशी हैं. वैसे भी इस ढर्रे पर ‘रॉक ऑन’ और ‘एबीसीडी’ जैसी फिल्में बन चुकी हैं. 

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो रितेश देशमुख ज्यादातर दृष्यों में खुद को दोहराते हुए ही नजर आए हैं. वह तैरात के किरदार में फिट नजर नहीं आते हैं. रोमांस में वह बहुत बेकार नजर आते हैं. पर इसके लिए कुछ हद तक फिल्म के संवाद व संवाद लेखक भी दोशी हैं. नरगिस फाखरी एक बेहतरीन अदाकारा के रूप में उभरी हैं. अन्य कलाकारों ने भी अच्छी परफार्मेंस दी है.

संगीतकार विशाल शेखर की तारीफ की जानी चाहिए. एक दो गाने अच्छे बन पड़े हैं. गणपतिजी का गाना काफी सुंदर बना है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘बैंजो’ की निर्माता कृशिका लुल्ला, निर्देशक रवि जाधव, पटकथा लेखक कपिल सावंत, निखिल मेहरोत्रा, रवि जाधव, संगीतकार विशाल शेखर व रितेश देशमुख, नरगिस फाखरी, धर्मेश येलंडे, लुक केणी व अन्य कलाकार हैं.

अब ऑनलाइन कागजात सहेजना हुआ आसान

ऑनलाइन खरीदार कोई भी पर्सनल कागजात जैसे ड्राइविंग लाइसेंस, कॉलेज और स्कूल के सर्टिफिकेट और दूसरे डॉक्यूमेंट को अब डिजिटल रूप में ऑनलाइन स्टोर करना आसान हो जाएगा. जिसके पास आधार नंबर है और उससे कनेक्ट किया हुआ मोबाइल फोन है, उसके लिए ऑनलाइन कागजात स्टोरेज के लिए स्पेस मिलना बहुत आसान है.

डिजिलॉकर की मदद से पहले अपने कागजात को ऑनलाइन स्टोर कीजिये और जिससे भी ये शेयर करना है उसे ऑनलाइन लिंक भेज दीजिये. उसके बाद ये जानकारी सिर्फ उसे ही दिखाई देगी.

दुनिया के किसी भी कोने में भेजें डॉक्यूमेंट

डिजिलॉकर में किसी भी तरह के डॉक्यूमेंट स्टोर करके रखे जा सकते हैं. आम लोगों के लिए इससे कहीं भी अपनी पर्सनल जानकारी शेयर करना बहुत आसान हो गया है. देश के किसी भी कोने से ये जानकारी बस कुछ ही मिनट में भेजी जा सकती है.

गूगल प्ले स्टोर में इसकी रेटिंग तीन से भी कम है जिसका मतलब है इसको इस्तेमाल करने वाले इससे खुश नहीं हैं. ऐसा लगता है कि 15000 से भी कम बार डाउनलोड हुआ ये ऐप अभी लोगों की उम्मीद पर खरा नहीं उतरा है. लेकिन ये ऐप डाउनलोड करते समय सावधान रहें.

कई फर्जी डिजिलॉकर ऐप भी गूगल प्ले स्टोर में हैं और ध्यान रखें कि आप कहीं अपनी अहम जानकारी किसी गलत ऐप में तो नहीं डाल रहे हैं. जो ऐप भारत सरकार का बनाया हुआ है वही एकमात्र आधिकारिक ऐप है.

आप भी बन सकते हैं सचिन की फिल्म का हिस्सा

क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की फिल्म 'सचिनः ए बिलियन ड्रीम्स' में आप भी नजर आ सकते हैं. तेंदुलकर के फैन्स इस फिल्म का हिस्सा बन सकते हैं. तेंदुलकर ने सोशल मीडिया के जरिए इसकी जानकारी दी.

फिल्म के टीजर '200 नॉट आउट' को दर्शकों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिलने के बाद फैन्स के लिए अब 22 से 6 नवंबर तक ऑनलाइन प्रतियोगिता शुरू की जा रही है, जिसमें फैन्स सचिन के खेल और जिंदगी से जुड़ी बेहतरीन वीडियो भेज सकते हैं. चयन होने पर उस वीडियो को फिल्म में शामिल किया जा सकता है. ये वीडियो सचिन के जीवन के किसी भी लम्हे से संबंधित हो सकते हैं.

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