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पाकिस्तान, तानाशाह और लोकतंत्र

पाकिस्तान के पहले तानाशाह अयूब खां की एक बात काफी चर्चित हुई थी कि गरम आबोहवा के कारण हमारा देश लोकतंत्र के मुफीद नहीं है. अब हालिया इतिहास के तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने फरमाया है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र बिल्कुल बेअसर रहा है और उसकी नाकामियों को दुरुस्त करने के लिए फौज को तमाम जरूरी कदम उठाने चाहिए.

मुशर्रफ का बयान उतना बेतुका नहीं है, जितना कि अयूब का जुमला हंसने लायक, मगर अहम बात यह है कि इन दोनों तानाशाहों के बयान एक ही सोच से प्रेरित हैं. दरअसल, लोकतंत्र में तानाशाहों के लिए कोई जगह नहीं होती, यही वजह है कि इन तानाशाहों ने सबसे पहले लोकतंत्र का गला घोटा. लेकिन उन्हें लोकतंत्र की जुबानी हिमायत के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि जनता उनकी इस बदगुमानी से इत्तफाक नहीं रखती.

जनरल अयूब की ‘बेसिक डेमोक्रेसीज स्कीम’ हो या जिया उल हक के बगैर पार्टियों वाले चुनाव या फिर मुशर्रफ का लगातार यह कहते रहना कि सही मायने में वही पाकिस्तान में लोकतंत्र ला रहे हैं, ये उनकी मजबूरियों की देन थे. कहने की जरूरत नहीं कि मुशर्रफ की निगाह में असली लोकतंत्र वही था, जो उन्हें हुकूमत में बनाए रखता. लेकिन जब देश के लोगों को वाकई तय करने का मौका मिला और उन्होंने उनका बोरिया-बिस्तर बंधवा दिया, तब उनके लिए लोकतंत्र (चाहे वह असली हो या कुछ और) की कोई उपयोगिता नहीं रही. उनका हालिया बयान यही दिखाता है.

तानाशाह लोकतंत्र के प्रति अपने तिरस्कार को छिपाने की अक्सर कोशिश करते हैं, मगर वे इसमें कामयाब नहीं हो पाते, क्योंकि लोग उनके ख्यालों से सहमत नहीं होते. आखिरकार छात्रों, कामगारों और किसानों की साझा मुहिम ने ही अयूब को तख्त से बेदखल किया, जबकि जिया को अहिंसक जन-आंदोलन से जूझना पड़ा था, इसी तरह साल 2007 में जब मुशर्रफ ने दोबारा तख्तापलट की कोशिश की, तो उनको भी सिविल सोसायटी की नाराजगी का सामना करना पड़ा था. दरअसल, ये तानाशाह इसलिए लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हैं, क्योंकि कुछ सत्ता-लोलुप राजनेताओं की उनसे मिलीभगत रही है.

दोराहे पर खड़ा श्रीलंका

इस्लामाबाद सार्क शिखर सम्मेलन से अलग रहने की भारत की घोषणा के बाद जिस तरह श्रीलंका उसके साथ खड़ा हुआ, उस पर श्रीलंका के राजनीतिक दलों व संगठनों के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं हुई हैं. श्रीलंका का यह कदम स्वाभाविक ही था. जाहिर सी बात है कि उसके इस रुख पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ.

भारत एक ऐसा देश है, जिसकी दोस्ती छोड़ने के बारे में श्रीलंका कभी सोचना भी नहीं चाहेगा, क्योंकि भारत की दोस्ती छोड़ने का मतलब है श्रीलंका पर सांस्कृतिक ही नहीं, आर्थिक तौर पर भी खासा बुरा असर. 1985 में सार्क की स्थापना दक्षिण एशियाई देशों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास व सहयोग की भावना से हुई थी. मकसद तो इन देशों के बीच आपसी सौहार्द को बढ़ाना और एक-दूसरे की समस्याओं को समझना व सुलझाना था, लेकिन सच तो यही है कि आज तक यह मकसद हासिल नहीं हुआ. दरअसल, सार्क की दो बड़ी शक्तियां भारत और पाकिस्तान इस बिंदु पर हमेशा पीछे रहे और इसका कारण कश्मीर की समस्या रही.

इस बार का सार्क सम्मेलन तो कई सवालों में घिर गया. श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने हाल ही में अनायास ही नहीं कहा था कि सार्क का भविष्य अब बदरंग दिखने लगा है. उनका मानना है कि सार्क जैसे मंच का भविष्य तब तक अंधकारमय है, जब तक कि इसमें शामिल देश विभिन्न मुद्दों पर एकमत नहीं होते. उनका मानना है कि यदि यही गति कायम रहती है, तो श्रीलंका किसी और विकल्प की ओर देखने को बाध्य होगा.

श्रीलंका इस वक्त दोराहे पर है कि उस भारत के साथ जाए, जो हमेशा उसके लिए बड़े भाई की भूमिका में रहा है. या फिर एक वाइल्ड कार्ड खेलकर पाकिस्तान के साथ जाने की सोचे. तीसरा रास्ता तटस्थ रहने का है, जो वह चाहेगा नहीं. लेकिन यह भी सच है कि देर-सबेर उसे एक पक्ष तो पकड़ना ही होगा. सार्क का बहिष्कार इस दिशा में पहला कदम है. प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति एम सिरीसेना को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा. विक्रमसिंघे तो विकल्प की बात कह भी चुके हैं.

IND vs NZ: भारतीय वनडे टीम का ऐलान, रैना की वापसी

न्यूजीलैंड के खिलाफ 16 अक्टूबर से शुरू हो रही 5 वनडे मैचों की सीरीज के पहले तीन मैचों के लिए भारतीय टीम का ऐलान कर दिया गया है. सेलेक्टर्स ने इस वनडे सीरीज़ के लिए 15 सदस्यों के नाम का ऐलान किया है. एम.एस. के प्रसाद की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने कीवी टीम के खिलाफ होने वाली इस सीरीज के लिए युवा खिलाड़ियों को मौका दिया है.

चयनकर्ताओं ने पहले तीन मैचों के लिए चुनी गई टीम में अश्विन, जडेजा और शमी को आराम दिया है, तो वहीं सुरेश रैना और हार्दिक पांड्या की वनडे टीम में वापसी हुई है. इसके अलावा शिखर धवन की जगह मनीष पांडे को मौका दिया गया है क्योंकि शिखर धवन चोटिल हैं.

शिखर धवन के अलावा चोटिल के.एल राहुल और भुवनेश्वर कुमार को भी इस टीम में जगह नहीं दी गई है. इसके साथ ही चिकनगुनिया से उबर रहे इशांत शर्मा को भी इस टीम का हिस्सा नहीं बनाया गया है.

सुरेश रैना की लगभग साल भर बाद टीम इंडिया में वापसी हुई है. रैना ने अक्टूबर, 2015 में आखिरी वनडे खेला था. इसके बाद उन्हें दिसंबर-जनवरी में ऑस्ट्रेलिया दौरे, फिर जून, 2016 में जिम्बाब्वे दौरे के लिए वनडे टीम में शामिल नहीं किया गया था. इसके बाद उन्हें वेस्टइंडीज के खिलाफ अगस्त में अमेरिका में खेली गई दो मैचों की टी-20 सीरीज के लिए भी नहीं चुना गया था.

वनडे टीम

महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), रोहित शर्मा, विराट कोहली, अजिंक्य रहाणे, सुरेश रैना, मनीष पांडे, हार्दिक पांड्या, अक्षर पटेल, जयंत यादव, अमित मिश्रा, जसप्रीत बुमराह, धवल कुलकर्णी, उमेश यादव, मनदीप सिंह और केदार जाधव.

भारत-न्यूजीलैंड वनडे सीरीज के पांच मैच का शेड्यूल

पहला वनडे मैच- 16 अक्टूबर, धर्मशाला

दूसरा वनडे मैच- 20 अक्टूबर, दिल्ली

तीसरे वनडे मैच- 23 अक्टूबर, मोहाली

चौथा वनडे मैच- 26 अक्टूबर, रांची

पांचवा वनडे मैच- 29 अक्टूबर, विशाखापट्टनम

‘डायन’ के शोर में दबी सिसकियां

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के जिलिंग गांव में दुर्गामणि बास्के व उर्मिला हांसदा नामक 2 बूढ़ी आदिवासी औरतों पर ‘डायन’ बता कर जुल्म ढाए गए. ओझा और जानगुरु के कहने पर इन दोनों औरतों की लातघूंसों व झाड़ू से जम कर पिटाई की गई. इतना ही नहीं, इन को मुरगे का खून पिलाया गया और बिना कपड़ों के पूरे गांव में नचाया गया. आदिवासी प्रभावित शाशंगडी महल्ले के दिहाड़ी मजदूर बंकिम चंद्र टुडू की बड़ी बेटी चंचला टुडू जिलिंग हाईस्कूल में छठी क्लास की छात्रा थी. वह कई दिनों से बीमार थी. इलाज के लिए उसे स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया.

वहां जांच करने के बाद चंचला को पुरुलिया के सदर अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उस का सीटी स्कैन और ऐक्सरे किया गया. फिर भी उस की बीमारी का पता नहीं चला. उसे घर लाया गया, पर 2-3 दिन बाद वह फिर बीमार पड़ गई. चंचला के घर वालों ने सोचा कि कहीं चंचला पर किसी ‘डायन’ की बुरी नजर तो नहीं पड़ी है. इस की जांचपड़ताल के लिए स्थानीय ओझा व झारखंड के गाड़ोवाल गांव के जानगुरु बानेश्वर महतो को बुलाया गया. ओझा और जानगुरु ने चंचला की झाड़फूंक की और गांव वालों से कहा कि वह ‘डायन’ की बुरी नजर का शिकार बन गई थी, लेकिन अब झाड़फूंक के बाद ठीक है. साथ ही, यह भी कहा गया कि दुर्गामणि और उर्मिला ही ‘डायन’ हैं. इन ‘डायनों’ ने चंचला को अपनी शिष्या बनाने के लिए उस के कान में ‘डायन विद्या’ का मंत्र पढ़ दिया था, जिस से वह बीमार हो गई.

जानगुरु के आदेश पर गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत में फैसला लिया गया कि इन बूढ़ी औरतों को ‘डायन विद्या’ छोड़नी होगी. इस के बाद दुर्गामणि व उर्मिला को चंचला के घर लाया गया, जहां उन की लातघूंसों और झाड़ू से जम कर पिटाई की गई. उस के बाद 2 मुरगों को ला कर चंचला की खाट के नीचे रखा गया. इन बूढ़ी औरतों के हाथों मुरगों की पूजा कराई गई और बलि चढ़ा कर उन का खून पिलाया गया, साथ ही, बिना कपड़ों के पूरे गांव में नचाया गया. खबर पा कर पुलिस इन दोनों औरतों को बचाने गई, तो गांव वालों ने पुलिस को गांव में घुसने नहीं दिया. बाद में पुलिस बल ने गांव वालों के हाथों से दुर्गामणि और उर्मिला को बचाया.

डायन और डायन विद्या

पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड  के आदिवासी समाज में ‘डायन’ का अंधविश्वास फैला हुआ है. संथाली समाज में यह विश्वास है कि उम्र ढलने के साथ जिंदगी में नाकामी या बेइज्जती के चलते लोभ या फिर ईर्ष्या में पड़ कर औरतें ‘डायन विद्या’ में दीक्षा लेती हैं. कुछ आदिवासी समुदायों में ‘डायन’ की बेटी पर भी ‘डायन’ होने का शक किया जाता है.

पाखंडियों का चक्रव्यूह

आदिवासी व संथाली समाज में जहां एक ओर ‘डायन’ अपनी ‘डायन विद्या’ की मदद से समाज में काला जादू का मायाजाल फैलाती है, वहीं दूसरी ओर ओझा, सोखा, जानगुरु और मांझी इन पर तंत्रमंत्र का इस्तेमाल कर के समाज का कल्याण करते हैं. ओझा आमतौर पर हर गांव में रहते हैं. वे झाड़फूंक कर लोगों की बीमारी ठीक करते हैं, जबकि गांव में किसी ‘डायन’ का पता लगाने के लिए भी इन की मदद ली जाती है. आमतौर पर मार्च से जून महीनों में आदिवासी प्रभावित इलाकों में ‘डायन’ के शक में औरतों पर जोरजुल्म करने या उन की हत्या कर देने की वारदातें सब से ज्यादा होती हैं. इन महीनों में खेती में कामकाज नहीं के बराबर रहता है. ध्यान दें, जिस साल बरसात कम होती है या अच्छी फसल नहीं होती है, उस साल जमीन मालिक, आदिवासी या हिस्सेदार किसानों के पास पैसे की कमी होती है. इस कमी को दूर करने के लिए एक साजिश रची जाती है.

गरीब परिवार या लाचार विधवा की जायदाद, जमीन, घर वगैरह हड़पने या पारिवारिक दुश्मनी या महल्ले में पुराने झगड़े या गांव में किसी आदमी या जानवर की बीमारी से हुई मौत को वजह बना कर एक साजिश रची जाती है. उस साजिश के मुताबिक, किसी औरत को ‘डायन’ बता कर पहले उस की अफवाह फैलाई जाती है. उस अफवाह को सच साबित करने के लिए एक सालिसी सभा बुलाई जाती है, जहां गांव के मुखिया की मौजूदगी में जानगुरु या ओझा एक शाल के पत्ते में सिंदूर व सरसों का तेल ले कर तंत्रमंत्र के जरीए यह पता लगाते हैं कि आरोपी औरत ‘डायन’ है या नहीं.

आरोप साबित होने के बाद ‘डायन’ पर मोटी रकम का जुर्माना लगाया जाता है. जुर्माना देने में नाकाम औरत पर जुल्म ढाए जाते हैं. कभीकभार उस की हत्या भी कर दी जाती है.

डायन प्रथा व आंदोलन

‘डायन’ जैसे अंधविश्वासों को मिटाने के लिए एक स्वयंसेवी संस्था ‘भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति’ कई सालों से लगातार आंदोलन कर रही है. इस के महासचिव प्रबीर घोष ने कहा कि सरकार ने कानून व्यवस्था को मजबूत और अंधविश्वासों को दूर करने के काम में लापरवाही की है, इसलिए ओझा, जानगुरु जैसे पाखंडी किसी बेगुनाह औरत को ‘डायन’ बता कर उस पर जानलेवा जोरजुल्म करने की हिम्मत कर रहे हैं. पश्चिम मिदनापुर के सालबनी इलाके में ‘डायन’ के नाम पर तकरीबन 40 साला एक आदिवासी औरत को बिना कपड़ों के पूरे गांव में घुमाया गया. उसे बेरहमी से मारापीटा गया. उस के बाद गांव के कुछ लोगों ने उसे और उस के पूरे परिवार को गांव से खदेड़ दिया.

इस पर गांव वालों का कहना था कि वह औरत ‘डायन’ है. उस के श्राप से ही एक रिश्तेदार को कैंसर हो गया. इस घटना में पीडि़ता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की.

डायन हत्या और कानून

13 अगस्त, 2015 को असम विधानसभा ने ‘डायन हत्या निवारक कानून’ पास किया था. इस कानून में प्रावधान है कि कोई भी किसी औरत को ‘डायन’ बताता है, तो उसे 3 से 5 साल की सख्त सजा होगी और 50 हजार से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना देना होगा  ‘डायन’ बता कर जुल्म करने वाले को भी 5 से 10 साल की सजा और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना होगा. अगर ऐसे किसी काम में किसी समूह को कुसूरवार पाया जाता है, तो उस समूह में शामिल हर शख्स को 5 हजार से 30 हजार रुपए तक का जुर्माना देना होगा. ‘डायन’ बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा. उत्तराखंड में देहरादून की एक गैरसरकारी संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल 2 सौ से ज्यादा औरतों को ‘डायन’ बता कर उन की हत्या कर दी जाती है.

इस हत्याकांड के मामले में झारखंड सब से आगे है, जहां 50 से 60 औरतों की ‘डायन’ बता कर हत्या कर दी जाती है. आंध्र प्रदेश दूसरे नंबर पर है, जहां तकरीबन ऐसी 30 हत्याएं की जाती हैं. रूरल लिटिगेशन ऐंड ऐनटाइटिलमैंट सैंटर के मुताबिक, इस के बाद हरियाणा और ओडिशा का नाम आता है. इन राज्यों में 25 से 30 और 24 से 28 औरतों की हत्या हुई. पिछले 15 सालों में देशभर में 25 सौ औरतों की ‘डायन’ के नाम पर बलि चढ़ा दी गई. असम में पिछले 5 सालों में 70 औरतों की ‘डायन’ बता कर हत्या कर दी गई थी. जांच करने पर पता चला है कि इन में से ज्यादातर मामलों की जद में जमीन और जायदाद का झगड़ा था. झारखंड में 5 औरतों को ‘डायन’ बता कर मार डाला गया था. पिछले 10 सालों में वहां इस तरह अब तक 12 सौ औरतों को ‘डायन’ बता कर मारा जा चुका है.

जब मां से झूठ बोलना पड़े

कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते. एक झूठ छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं और इसी के साथ जानेअनजाने गलत रास्ते पर चलने की शुरुआत हो जाती है. वैसे भी अगर रिश्तों में झूठ बोलना आप की आदत बन चुकी है, तो यकीन मानिए आप एक ‘डैड ऐंड’ की ओर बढ़ रहे हैं. कई बार झूठ बोलना आप की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यह भी याद रखिए कि कुछ झूठ रिश्तों को दीमक की तरह चाट जाते हैं, क्योंकि विश्वास के बिना किसी भी रिश्ते का वजूद मुमकिन नहीं है, खासकर जब रिश्ता मां का हो. छोटा सा झूठ बरसों की मेहनत और प्यार से तैयार किए रिश्तों के घरौंदे को तारतार कर सकता है.

आज के दौर में टीनएजर्स अपनी मां से बहुत झूठ बोलते हैं. इन में से अधिकतर झूठ छोटीछोटी बातों को ले कर ही बोला जाता है, जिन्हें टाला भी जा सकता है. जैसे वे कहां हैं? कब तक घर लौटेंगे? कालेज के लैक्चर का बहाना बना कर पार्टी करना आदि. यह और बात है कि इन के पीछे उन के पास कई बहाने भी होते हैं. लंदन साइंस म्यूजियम के एक शोध में पाया गया है कि लड़के औसतन एक दिन में 3 झूठ बोलते हैं. लड़कों द्वारा बोले गए कुछ आम झूठ हैं. मैं रास्ते में हूं. मैं ट्रैफिक में फंसा हूं. मेरी बाइक पंक्चर हो गई है. सौरी मैं आप की कौल नहीं उठा पाया.

झूठ बोलने के कारण

–       झूठ बोलने का एक कारण आकर्षण का केंद्र बनना है.

–       अनावश्यक झगड़ों से बचने के लिए भी किशोर झूठ बोलते हैं. ऐसा आमतौर पर देखा जाता है, जहां सच बोलना अधिक हानिकारक लगता है. यह स्कूलकालेज में एक सहयोगी के साथ समय बिताने से ले कर या कुछ अप्रत्याशित रूप से घटे हुए अपराध को छिपाना तक हो सकता है.

–       टीनएजर्स खुद को ग्लैमरस दिखाने के लिए भी झूठ बोलते हैं. ऐसे मामलों में लड़कियां या तो आकर्षण का केंद्र बनने के लिए झूठ बोलती हैं या फिर लड़कों में रुचि निर्माण के लिए.

–       अकसर अपने कमजोर पक्ष को छिपाने के लिए भी झूठ बोला जाता है.

–       कई बार रिश्तों को बचाने के लिए भी झूठ बोलना पड़ता है.

–       भावनाओं को ठेस न पहुंचे इसलिए भी झूठ बोला जाता है.

–       आप का प्यार है, झूठ बोलने का सब से बड़ा कारण.

–       अगर मां बहुत ज्यादा चिंता करने वाली या फिर पजैसिव नेचर की हों, तो भी झूठ बोला जाता है.

किन बातों पर झूठ बोलते हैं किशोर

अपने अफेयर और गर्लफ्रैंड के बारे में : अपनी गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड के बारे में अकसर किशोर अपनी मां से झूठ बोलते हैं. उसे घर लाने पर उसे बैस्ट फ्रैंड कह कर मिलवाते हैं और मां के पूछने पर कि कहीं कोई और चक्कर तो नहीं है, साफ मुकर जाते हैं.

अपने खराब मार्क्स के लिए :  ऐग्जाम में जब मार्क्स कम आते हैं तो मां को सच बता कर उन की नाराजगी कोई मोल नहीं लेना चाहता, क्योंकि इस के बाद मां के लंबे लैक्चर को झेलना पड़ता है.

सिगरेट या शराब पीने पर :  लड़का हो या लड़की सिगरेट या शराब पीने की बात हर कोई अपनी मां से छिपाता है और अगर कभी स्कूल बैग में मां के हाथ सिगरेट का पैकेट लग जाता है तो उसे मेरा नहीं दोस्त का है, कहने में एक मिनट की भी देर नहीं लगती.

गाड़ी ठोंकने के बाद :  गाड़ी पापा की हो या अपनी खुद की, गलती सामने वाले की हो या अपनी, लेकिन अपने मुंह से वे कभी इस बात का इकरार नहीं करेंगे कि गलती मेरी थी बल्कि उलटा झूठ भी इस अंदाज से बोलेंगे कि डांट नहीं मां का लाड़ उन पर बरस जाए. जैसे कि मां मेरा ऐक्सिडैंट हो गया था. मैं तो बस बालबाल बच गया आज. बस, फिर क्या है, गाड़ी की टूटफूट भूल कर मां लड़के की बलाइयां उतारने लग जाती हैं.

झगड़ा या मारपीट के बारे में : अगर स्कूल में किसी से झगड़ा हो जाए और चोट आ जाए तो मां को झूठ बोलने का सब से आसान तरीका है कि बाइक से गिर गया था. सच बोलने पर शायद हफ्ते भर तो कालेज की छुट्टी तय समझो और साथ में पापा को बौडीगार्ड बना दिया जाएगा सो अलग इसलिए झूठ बोलना ज्यादा सेफ लगता है.

ग्रुप स्टडी कह कर नाइट आउट के लिए जाना : यह झूठ लड़का हो या लड़की हर कोई बोलता है, क्योंकि पूरी रात घर से बाहर रहने का इस से सही बहाना मिल ही नहीं सकता.

स्कूल कालेज बंक बता कर नहीं करते : यह तो सब को पता है कि स्कूल बंक करना भी कोई मम्मी को बता कर करने वाला काम है. हां, वह बात अलग है कि अगर स्कूल टाइम में बाहर घूमते देख कर किसी ने मां से चुगली कर दी तो उन का ब्रेनवाश करने के लिए हजार बहाने बनाने पड़ेंगे.

मैं ने नहीं तोड़ा : जब भी कोई कीमती सामान टूट जाता है तब किशोर कितने भी सच्चे हों, लेकिन यह कभी नहीं कहेंगे कि यह मैं ने तोड़ा है. एक बार मेड का नाम ले कर ट्राई जरूर करेंगे कि उसी ने तोड़ा होगा.

मजबूरी में झूठ बोलना पड़े, तो क्या करें

–       अगर मजबूरी में झूठ बोलना पड़े, तो उचित समय देख कर सच भी अवश्य बता दें. अपनी पूरी बात समझाते हुए कहें कि यह बात आप ने किस वजह से कही थी. अगर आप सच बोलेंगे तो यकीन मानिए आप के द्वारा झूठ बोली गई बात को मां दिल से निकाल देंगी और माफ भी कर देंगी.

–       परिवार के किसी अन्य सदस्य को विश्वास में ले कर ही मां से झूठ बोलें ताकि जब सच सामने आए तो वे आप का साथ दे सकें.

–       अगर झूठ किसी की भलाई के लिए बोला जा रहा हो और बोलना अति आवश्यक हो, तभी बोलें.

–       यह भी याद रखें कि झूठ आमतौर पर एक मुसीबत, दर्द और इतना ही नहीं, आप की मां के दिल को चोट भी पहुंचा सकता है.

–       एक बार झूठ के पकड़े जाने पर मां को दोबारा आप पर विश्वास करने में समय लगेगा इसलिए उतावले न हों, अपने और उन के रिश्ते को थोड़ा समय दें.

सौ बातों की एक बात हमेशा याद रखें कि मां चाहे कैसी भी बात हो अगर किसी बात के लिए मना कर रही हैं, तो कहीं न कहीं उस में आप की भलाई छिपी होगी. इसलिए उसे छिपा कर या झूठ बोल कर कोई काम करने से उन का नहीं बल्कि आप का ही नुकसान है.                           

झूठ और माफी

कलर्स चैनल पर आने वाले सीरियल ‘चक्रवती अशोक सम्राट’ में काम करने वाली प्रिनल का कहना है कि मैं अपनी मां से कभी कुछ नहीं छिपाती, लेकिन एक बार मैं ने झूठ बोला था. तब मैं 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी. हम सब दोस्तों ने वाटर पार्क जाने का प्लान बनाया और मैं ने भी इस के लिए मां से झूठ बोला था. मैं ने मां से कहा था कि स्कूल में आज ऐग्जाम है इसलिए जल्दी जाना है. फिर जब लौटने में देर हो गई तो मैं बहुत डर गई. घर पहुंचते ही मैं मां से लिपट गई और उन से माफी मांगी और कहा कि आगे से मैं कभी ऐसा नहीं करूंगी.             

अधूरा सैक्स

रेमिका को खुश रखने की युवा हर संभव कोशिश करते हैं, लेकिन जब सैक्स संबंधी समस्या हो तो उसे भी दूर करना होगा. डा. चंद्रकिशोर कुंदरा के मुताबिक, ‘‘युवा प्रेमियों को लगता है कि सैक्स का अधूरा ज्ञान उन्हें मंझधार में ले जा सकता है. सैक्स संबंधों के दौरान सैक्स क्षमता का बहुत महत्त्व है. सहवास करने की क्षमता ही व्यक्ति को पूर्ण पुरुष के रूप में स्थापित करती है.’’

डा. कुंदरा के मुताबिक सैक्स की क्रिया को 4 भागों में बांटा जा सकता है : (1) सैक्स इच्छा (2) स्खलनकाल (3) संतुष्टि (4) शारीरिक उत्तेजना में कमी.

कई ऐसे कारण हैं जिन पर हम खुल कर चर्चा नहीं करते न ही उन्हें दूर करने का उपाय खोजते हैं. नतीजतन, सैक्स लाइफ का मजा काफूर हो जाता है. ऐसी  कई समस्याएं हैं जिन्हें दूर कर हम वैवाहिक जिंदगी जी सकते हैं.

झिझक 

सहवास की पूर्ण जानकारी न होना, सैक्स के बारे में झिझक, संबंध बनाने से पहले ही घबराना, यौन दुर्बलता से सैक्स इच्छा की कमी, मानसिकरूप से खुद को सैक्स के प्रति तैयार न कर पाना, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, मोबाइल सैक्स आदि समस्याओं से युवावर्ग पीडि़त है. सैक्स में मंझधार में न रहें, समस्याओं को समझें व इन्हें दूर करें और सैक्स का भरपूर आनंद उठाएं.

सैक्स इच्छा में मानसिक कारणों को दूर करें

आज की भागदौड़भरी जिंदगी में धनपदयश पाने की उलझन में फंसे युवा एक खास मुकाम तक पहुंचने के चक्कर में सहवास के बारे में अंत में सोचते हैं. वे इस तनाव से ऐसे ग्रस्त हो गए हैं कि उन का वैवाहिक जीवन इस से प्रभावित हुआ है.

सैक्स में डरें नहीं

डर यौनसुख को सब से ज्यादा प्रभावित करता है. इस की वजह से शीघ्र स्खलित होना, कोई देख लेगा, कमरे के बाहर आवाज सुनाई देने का डर, पार्टनर द्वारा उपहास, गर्भ ठहरने का खतरा आदि युवाओं की यौनक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं. युवावस्था में यौन इच्छा चरम पर होती है इसलिए सैक्स संबंध जल्दीजल्दी बना लेते हैं, लेकिन धीरेधीरे समय में ठहराव कम हो जाता है, क्योंकि विवाह से पहले प्रेमिका से संबंध बनाना उसे अपराधबोध लगता है और वह शीघ्र स्खलित हो जाता है. इन सभी बातों को नजरअंदाज करते हुए सैक्स संबंध बनाएं.

मोबाइल सैक्स

इंटरनैट के परिवेश में आज का युवा मोबाइल पर सैक्सी फिल्में देखता है और खुद को भी सैक्स में लिप्त कर लेता है. यही कारण है कि वह वास्तविक जीवन में सैक्स का भरपूर आनंद नहीं उठा पाता.

स्वयं पर विश्वास करें

कुछ युवा स्वस्थ होते हुए भी सैक्स के प्रति आत्मविश्वासी नहीं होते. सहवास के दौरान वे धैर्य खो बैठते हैं. ऐसे युवाओं में कोई कुंठा छिपी होती है, जो उन्हें पूर्ण सैक्स करने से रोकती है. खुद पर विश्वास रखें, अन्यथा किसी अच्छे सैक्सोलौजिस्ट एवं मनोचिकित्सक को दिखाएं.

यौनांग पर चोट

किसी ऐक्सिडैंट या अत्यंत तेजी से शारीरिक संबंध बनाते हुए या कष्टप्रद आसनों से यौनांग को चोट पहुंचती है. इस से युवती का सैक्स से मन हटने लगता है. अत: यौनांग पर चोट न पहुंचे, ऐसा प्रयास करें.

शारीरिक कारण

आज युवाओं का सैक्स में सफल न हो पाना दवाओं का दुष्प्रभाव है. बीटा रिसेप्टार्स, प्रोपेनोलोल, मिथाइल डोपा, सिमेटिडिन आदि दवाएं सैक्स इच्छा में कमी लाती हैं. खुद को बीमारी से दूर रखने का प्रयास करें. यौनांग में कसावट होने (फिमोसिस) के फलस्वरूप दर्द, जलन होना, तनाव व स्खलन के कारण सहवास में कमी आ जाती है. अत: शल्यक्रिया द्वारा इसे दूर किया जा सकता है.

गुप्तांग में तनाव न आना

सहवास के दौरान तनाव न आना और यदि  तनाव आता भी है तो कम समय के लिए आता है. युवावस्था में ऐसा होने के कई कारण हैं, जैसे मातापिता का व्यवहार व मानसिक तनाव सैक्स क्रिया में असफलता की मुख्य वजह है.

सीमेन की मात्रा कम होना

कई बार स्खलन का समय सामान्य होता है, लेकिन सीमेन काफी कम मात्रा में निकलने से सैक्स के दौरान पूर्णआनंद नहीं आता. युवा यदि इस समस्या से पीडि़त हों तो चरमोत्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते. ऐसे में सैक्सोलौजिस्ट से मिलें. मानसिक रूप से खुद को तैयार कर के सहवास करें, समस्या अवश्य दूर होगी.

इजाक्युलेशन

जब युवा अपने पार्टनर को संतुष्ट किए बिना ही स्खलित हो जाते हैं तो इसे इजाक्यूलेशन कहा जाता है. सैक्सुअल संबंधों के दौरान ऐसा होने से वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आती है.

प्रीमैच्योर इजाक्युलेशन

युवाओं में सैक्स में और्गेज्म की अनुभूति इजाक्युलेशन से पूरी होती है. सहवास शुरू करने के 30 सैकंड से 1 मिनट पहले स्खलित होने पर उसे प्रीमैच्योर इजाक्युलेशन कहते हैं. गुप्तांग की कठोरता खत्म हो जाती है और इस वजह से पार्टनर की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है. यह वास्तव में समस्या नहीं बल्कि चिंता, संतुष्ट न कर पाने का डर, मानसिक अशांति, मानसिक तनाव, डायबिटीज या यूरोलौजिकल डिसऔर्डर के कारण होता है. इस के लिए ऐंटीडिप्रैंसेट दवाओं का सेवन डाक्टर की सलाह ले कर करें.

ड्राइ इजाक्युलेशन

इस में पुरुषों की ब्लैडर मसल्स ठीक से काम नहीं करतीं, जिस कारण सीमेन बाहर नहीं निकल पाता. इस से फर्टिलिटी प्रभावित होती है, लेकिन आर्गेज्म या सैक्स संतुष्टि पर कोई असर नहीं पड़ता.

पौष्टिक आहार व पर्याप्त नींद लें

संतुलित व पर्याप्त पौष्टिक भोजन के अभाव में शरीर परिपुष्ट नहीं हो पाता. ऐसे में सीमेन का पतलापन और इजाक्युलेशन जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है. पर्याप्त नींद और भोजन से शरीर में सैक्स हारमोन का स्तर काफी बढ़ जाता है, जो सफल सहवास के लिए जरूरी है.

तनाव से दूर रहें

तनाव के दौरान कभी भी सैक्स संबंध न बनाएं. तनाव सैक्स प्रक्रिया को पूरी तरह प्रभावित करता है और इंसान को कई बीमारियों से ग्रसित कर देता है. मुंबई की मशहूर मनोचिकित्सक डा. यदुवीर पावसकर का मानना है कि युवाओं के एक बहुत बडे़ वर्ग, जिसे तनाव ने अपने घेरे में ले लिया है, को सैक्स से अरुचि होने लगी है. इस का मुख्य कारण भागदौड़ भरी दिनचर्या है.

फोरप्ले को समझें

शारीरिक संबंध बनाने से पहले पूर्ण शारीरिक स्पर्श, मुखस्पर्श, नख, दंत क्रीड़ा करने के बाद ही सहवास शुरू करें. सैक्स प्रक्रिया का पहला चरण फोरप्ले है. बिना फोरप्ले युवकों को उतनी समस्या नहीं आती लेकिन ज्यादा नोचनेखसोटने से युवती को पीड़ा हो सकती है. उस का सहवास से मन हट सकता है. इसलिए शारीरिक संबंध बनाते समय पार्टनर की भावनाओं की भी कद्र करें और अगर उसे इस दौरान दर्द हो रहा है तो अपने ऐक्शंस पर थोड़ा कंट्रोल करें.

सैक्स ऐंजौय करने के कुछ उपाय

–       पूरी नींद लें.

–       पौष्टिक आहार लें.

–       नियमित व्यायाम करें.

–       शराब या तंबाकू का सेवन न करें.

–       नियमित रूप से हैल्थ चैकअप करवाएं.

–       साल में 1-2 बार किसी हिल स्टेशन पर जाएं.

–       शारीरिक संबंध तभी बनाएं जब पार्टनर भी तैयार हो.

जमीन और कानून

सुप्रीम कोर्ट ने इस बार पश्चिम बंगाल में गरीबों और मजदूरों की हमदर्द मानी जाने वाली वामपंथी मार्क्सवादी पार्टी के सिंगुर में टाटा कंपनी के लिए हजारों एकड़ जमीन जबरन हथियाए जाने को गलत ठहराते हुए न केवल जमीन वापस दिलवा दी है, बल्कि यह भी कह दिया है कि जो मुआवजा दिया गया था, वह लौटाया नहीं जाएगा. उसे किसानों को हुए नुकसान की भरपाई समझा जाएगा. अमीरों के लिए गाड़ियां बनाने के लिए टाटा ने वामपंथी सरकार को पटा लिया था कि गरीब पैदल फटे जूते पहनने वाले किसानों की जमीन छीन ली जाए, उन के घर उजाड़ दिए जाएं. उन के कामधंधे बंद कर दिए जाएं, ताकि फर्राटे से दौड़ने वाली गाडि़यां बन सकें. टाटा को एक तरह से जमींदारी दे दी गई थी. ऐसा ही हरियाणा में मारुति के कारखाने के लिए किया गया है. अब टाटा यही नरेंद्र मोदी के गुजरात में कर रहे हैं.

यह ठीक है कि कारखाने लगने चाहिए, पर जैसे कारखानों के लिए मशीनें बनाई जाती हैं, जमीन किसानों से खरीदी जा सकती हैं. अगर चक टेढ़ेमेढ़े हैं, तो क्या हुआ? अगर देश के कारीगर 4 फुट, 11 इंच के होंगे, तो क्या कानून बना कर उन्हें 5 फुट, 9 इंच का कर दोगे? भूखेनंगे किसानों को जबरन मुआवजा दे कर जमीन अगर लेनी है, तो सड़कों के लिए लो, नहरों के लिए लो, अस्पतालों के लिए लो, अदालतों के लिए लो. कारखानों या अमीरों के घरों के लिए क्यों? इसलिए कि वे कमजोर हैं, सरकार अपनी पुलिस फौज इस्तेमाल कर सकती है? एक जमाना था, जब जमीन की कीमत नहीं थी. तब का कानून ठीकठाक था. पर आज वह कानून बेकार हो गया है. सरकार तय करे कि किस किसान को जमीन कितने में मिले, कौन सी मिले और वह कहां जाए, यह नाइंसाफी ही नहीं, क्रूरता भी है. यह जिंदा लोगों को मार डालना है. उद्योग पनपें, पर जिंदा लाशों पर नहीं. उद्योग मरों को जिंदा करें, वे खुशहाली लाएं, न कि घर से निकल जाने का फरमान हों.

2013 का सोनिया गांधी का कानून बहुत अच्छा है इस मुकाबले में और कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी के मनसूबों पर पानी फेर दिया, जब उन में बदलाव न होने दिया. 1947 से 2014 तक वैसे कांग्रेसियों ने लाखों एकड़ जमीन जबरन छीनी है. यह तो सोनिया गांधी का सिरफिरापन कहा जाएगा कि उन्होंने 4-5 साल की मशक्कत के बाद 2013 का कानून बनवा दिया और अब केवल सरकारी कामों के लिए जमीन ली जा सकती है.

ऐसा ही कानून शहरी स्लमों के लिए होना चाहिए. माना कि ये स्लम शहर पर धब्बा हैं, पर अगर शहर अच्छे मकान कामगारों को मुहैया नहीं करा सकता, तो उसे स्लमों को सहना पड़ेगा और उन में रहने वालों को हक देने होंगे. सारे हक अमीर गाडि़यों वाले शहरियों के नहीं हो सकते, जो सांसदों को फुसला सकें और अदालतों में मोटी फीस पाने वाले वकील खड़ा कर सकें.

क्रिकेट वर्ल्ड कप की राह चला फुटबॉल

आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप की तर्ज पर ही फुटबॉल में भी बदलाव करने और इसके वर्ल्ड कप में अधिक टीमों के शामिल किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है.

फुटबॉल की विश्व नियामक संस्था फीफा के नवनियुक्त अध्यक्ष जियानी इनफैंटिनो ने कहा है कि वर्ल्ड कप में 32 टीमों को बढ़ाकर 48 टीमों को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है. इनफैंटिनों के अनुसार, 2026 से 48 टीमों वाले फुटबॉल विश्व कप के आयोजन की शुरुआत की जा सकती है.

इनफैंटिनो ने कहा, ‘फीफा पूरी दुनिया में फुटबॉल का विस्तार करना चाहता है और विश्व कप इसका सबसे बड़ा टूर्नामेंट है. यह सिर्फ एक प्रतिस्पर्धा नहीं है बल्कि एक सामाजिक कार्यक्रम की तरह है.’

सूत्रों के मुताबिक, इस बड़े आकार के फुटबॉल विश्व कप की मौजूदा प्रस्तावना के अनुसार 16 टीमों को सीधे-सीधे ग्रुप राउंड में प्रवेश दिया जाए, जबकि 16 और टीमों का चुनाव 32 टीमों के बीच सिंगल इलिमिनेशन राउंड के मुकाबले के जरिए हो. यह सिंगल इलिमिनेशन राउंड के मुकाबले भी वर्ल्ड कप मेजबान देश में ही कराए जाएं.

इनफैंटिनो ने कहा, ‘इस तरह वर्ल्ड कप तो 32 देशों का ही रहेगा, लेकिन मेजबान देश का दौरा कुल 48 टीमें करेंगी.’

उल्लेखनीय है कि फीफा अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के दौरान भी इनफैंटिनो ने इसे अपना अहम मुद्दा बना रखा था, हालांकि तब इनफैंटिनो ने इसे बढ़ाकर 40 देशों का करने का ही सुझाव दिया था.

हिम्मत

अंधेरा होते ही बबली का पति काम कर के अपने घर आ गया था. बबली भी एक कबाड़ी के गोदाम पर गंदगी के ढेर से बेकार चीजों की छंटाई का काम करती थी. उसे 2 सौ रुपए रोजाना मिलते थे. पति पत्नी दोनों बड़ी लगन से मेहनतमजदूरी करते थे, तभी घर का खर्च चल पाता था. कबाड़ी के गोदाम पर बबली जैसी 4-5 औरतें काम करती थीं. सभी औरतें झोंपड़पट्टी इलाके की थीं. उन के पति भी किसी चौधरी के खेतों में काम करते थे. सुबह 6 बजे जाते थे और शाम को 6 बजे थकेहारे लौटते थे. घर आते ही उन में इतनी ताकत नहीं होती थी कि अपनी झोंपड़ी से थोड़ी दूर पैदल जा कर नहर में नहा आएं.

बबली का पति मेवालाल तो रोजाना की इस कड़ी मेहनत से सूख कर कांटा हो गया था. उस के बदन का रंग काला पड़ गया था. गरमी के चलते कई दिनों से नल में पानी नहीं आ रहा था. अगर पानी आ भी जाता था, तो गरीब बस्ती से पहले दबंग लोगों की कालोनी थी, जहां हर घर में बिजली की मोटर लगी थी. जब बड़े घरों में बिजली की मोटरें चलेंगी, तो गरीबों के नल में पानी आना कतई मुमकिन नहीं. ऐसे हालात में गरीब बस्ती वालों का एकमात्र सहारा बस्ती से थोड़ी दूर बहती गंदे पानी की नहर थी. अंधेरा होने पर बस्ती की जवान बहू बेटियों की इज्जत पर कितनी बार हमले हो चुके थे. गरीब लोग दबंगों के ऐसे हमले सहने को मजबूर थे.

मेवालाल सारा दिन मेहनत मजदूरी करने की वजह से प्यास से मरा जा रहा था. उसे नहाना भी था. घर में पानी की एक बूंद नहीं थी. उस ने बबली को नहर से पानी लाने को कहा. बबली भी थकी हुई थी. उस ने तुनक कर जवाब दिया, ‘‘इतनी दूर से पानी कैसे लाऊंगी? मैं भी थकी हुई हूं. तुम नहर पर जा कर नहा आओ. देर भी हो गई है. अंधेरा फैला हुआ है.’’

‘‘सारा दिन काम करतेकरते पूरे जिस्म से जान निकली जा रही है. अगर मैं मर गया, तो तुम विधवा हो जाओगी. चलता हूं तो चक्कर आते हैं. कहीं नहर में गिर गया तो…

‘‘मेरी नखरे वाली बिल्लो, जा पानी ले आ. अभी तो 3 बेटियां ब्याहनी हैं. अकेले ही तीनों को कैसे ठिकाने लगाओगी?’’ मेवालाल ने बबली की चिरौरी की, तो वह मान गई.

‘‘हां हां, मैं ही मिट्टी की बनी हूं. मुझ पर ही जवानी चढ़ी जा रही है. सारा दिन मैं भी तो मेहनत करती हूं,’’ बबली ने भी अपनी हालत बयान करते हुए थकेहारे लहजे में कहा, तो मेवालाल खामोश रहा. भारी थकावट के चलते उस का बदन दर्द के मारे दुखा जा रहा था. उस की उम्र अभी 35 साल से ज्यादा नहीं थी, मगर कमजोरी के चलते कितनी बीमारियों ने उस के बदन में घर बना लिया था. थकीहारी बबली ने दुखी मन से बड़ा बरतन उठाया और पानी लेने चली गई. रास्ता कच्चा और ऊबड़खाबड़ था. अंधेरे के चलते बबली ठोकर खाती नहर की तरफ बढ़ रही थी, तभी उस के कानों में एक मर्दाना आवाज आई. उस के सामने इलाके का दबंग आदमी रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था. वह शायद शराब के नशे में चूर था. वह पहले भी इसी रास्ते पर बबली से जोरजबरदस्ती कर चुका था. बसअड्डे पर उस की मोटर मेकैनिक की दुकान थी.

उस दबंग की 2 बार शादी हुई थी. दोनों ही बार उस की शराब पीने की आदत के चलते घरवालियां भाग चुकी थीं. अब वह दूसरों की घरवालियों पर तिरछी नजर रखता था. बबली कबाड़ के गोदाम पर काम करती थी. गोदाम का मालिक पाला राम उस का दोस्त था. इसी दोस्ती के चलते वह दबंग बबली पर अपना हक समझने लगा था. ‘‘अरे, इस अंधेरी रात में इतनी दूर से पानी ले कर आओगी. इस तरह तो तेरी जवानी का कचरा हो जाएगा. मेरी रानी, तू अगर रात को मेरे पास आ जाया करे, तो मैं तेरी झोंपड़ी के सामने ही पानी का ट्यूबवैल लगवा दूंगा. बोल, रोज रात को मेरे कमरे पर आया करेगी?’’ सामने रास्ता रोक कर उस मोटर मेकैनिक ने रोमांटिक होते हुए पूछा.

‘‘मुझे अपने घरवाले के लिए नहाने का पानी ले जाना है. मैं सारा दिन काम कर के थकीहारी लौटी हूं. कहीं दूसरी गंदी नाली में मुंह मार,’’ दहाड़ते हुए बबली ने कहा.

‘‘अरे, क्यों उस मरे हुए आदमी के लिए अपनी मस्त जवानी बरबाद कर रही है? उसे छोड़ कर मेरे साथ आ जा. मैं तुझे रानी बना कर रखूंगा,’’ कहते हुए हवस से भरे उस मोटर मेकैनिक ने थकीहारी बबली को गोद में उठा कर साथ ही के खाली प्लाट में जमीन पर गिरा दिया और उस की साड़ी उतारने पर आमादा हो गया. सारे दिन की थकीहारी बबली अपनेआप को बचा नहीं पा रही थी. मोटर मेकैनिक अपनी मनमानी कर के माना. बबली अपनी आबरू गंवा बैठी. जातेजाते वह दबंग 5 सौ रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘ऐसे ही मजे देती रहेगी, तो तुझे मालामाल कर दूंगा.’’

‘‘मैं थूकती हूं तेरे रुपयों पर. आज तो तू ने अपनी मनमरजी कर ली, दोबारा ऐसी कोशिश मत करना. अगर कोशिश की, तो बहुत बुरा अंजाम होगा,’’ बबली ने उसे चेतावनी दी. उस ने अपने कपड़े पहने और रोतीसिसकती पानी लाने नहर पर चली गई. घर जा कर बबली ने पति को सारी बात बताई और यह भी कहा कि मोटर मेकैनिक की बेहूदा हरकत पर उसे सबक सिखाना बहुत जरूरी हो गया है. अगली सुबह मेवालाल बबली के साथ बस्ती के नजदीक पुलिस थाने पहुंचा. पहले पहल तो थानेदार ने उन की शिकायत सुनी ही नहीं, उलटे बबली पर ही देह धंधा करने का आरोप लगा दिया. जब बबली ने बड़े साहब के पास जाने की धमकी दी, तब थानेदार ने एक पुलिस वाला भेज कर मोटर मेकैनिक को थाने बुला लिया. थानेदार ने जब मोटर मेकैनिक को बबली के साथ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करने की धमकी दी, तो वह थानेदार के साथ मुंशी के केबिन में घुस गया.

पता नहीं, मुंशी के केबिन में उन के बीच क्या कानाफूसी हुई. थोड़ी देर में थानेदार केबिन से मोटर मेकैनिक के साथ बाहर निकला और उस के साथ बबली को धमकाते हुए फिर कभी ऐसी गलती न करने की चेतावनी देते हुए थाने से निकाल दिया. बबली ज्वालामुखी की तरह दहक उठी थी. वह तो मोटर मेकैनिक से बदला लेना चाहती थी. तब उस ने अपनी बस्ती की तमाम सयानी औरतों के सामने अपना दर्द रखा. साथ ही, यह गुहार भी लगाई कि अगर ऐसे दबंगों पर शिकंजा न कसा गया, तो ये किसी की भी बहनबेटी पर जबरन हाथ डाल सकते हैं. सब औरतों ने बबली को भरोसा दिलाया कि अगर अब फिर कभी मोटर मेकैनिक ऐसी हरकत करेगा, तो वह बस्ती की दबंग औरत फुलवा को फोन कर के जगह बता दे.

बबली ने एक पुराना मोबाइल फोन खरीदा. उस ने सोच लिया था कि अगर मोटर मेकैनिक दोबारा ऐसा करता है, तो उस का अंजाम बहुत बुरा होगा. अब वह रोजाना नहर पर रात के अंधेरे में पानी लेने जाती थी. एक दिन शाम ढलने के बाद वह पानी लेने गई, तभी मोटर मेकैनिक फिर मिल गया.

‘‘क्यों रानी, मेरी शिकायत पुलिस में कर के देख ली? क्या हुआ… कुछ भी नहीं. थानेदार भी मेरा चेला है. मेरे दबदबे से तो उस की हवा निकलती है. मेरी रातें रंगीन कर दे मेरी रानी. मैं तुझे महारानी बना दूंगा,’’ शराब के नशे में झूमते हुए मोटर मेकैनिक ने बबली के उभारों पर हाथ रखा.

‘‘यहां रास्ते में कोई आ जाएगा. मैं नदी पर जा रही हूं. तुम आगेआगे वहीं पहुंचो. नहाधो कर वहीं पर मजे लूटेंगे,’’ मन ही मन सुलगते हुए बबली शहद घुली आवाज में बोली. बबली की यह बात सुन कर मोटर मेकैनिक खुशी के मारे झूम उठा. वह तेजतेज चलते हुए आगे बढ़ने लगा. बबली ने अपनी बस्ती की फुलवा को फोन कर दिया. वह धीरेधीरे चलते हुए नहर के किनारे पहुंची. मोटर मेकैनिक बेसब्री के आलम में जल्दीजल्दी बबली की साड़ी खोलने लगा.

बबली ने झिड़क कर उसे रोक दिया, ‘‘रुको… मैं नहा तो लूं. बदन की थकावट उतर जाएगी, तो मस्ती मारने का मजा भी खूब आएगा,’’ बबली ने रोकना चाहा, तो मोटर मेकैनिक रुका नहीं. उस ने बबली को अपनी बांहों में कस कर जमीन पर गिरा दिया. मोटर मेकैनिक उस पर झपटने ही वाला था कि तभी एकसाथ कई आवाजें सुन कर वह चौंक उठा. बस्ती की कितनी औरतें हाथों में जूतेचप्पलें ले कर आई थीं. जवान लड़के भी पूरी तैयारी के साथ वहां पहुंच गए थे. सब के हाथों में टौर्च भी थी.

‘‘बदमाश, तू दूसरों की बहन बेटियों को अपनी जागीर समझता है. बहुत जोश भरा है तेरे अंदर? अभी तेरा इलाज करते हैं,’’ बस्ती की फुलवा गुस्से के मारे दहाड़ उठी थी. इस के बाद तो रात के अंधेरे में सब उस मोटर मेकैनिक पर बरस पड़े.

मोटर मेकैनिक की हालत खराब हो गई थी. उसे कोई बचाने वाला नहीं था. सब उसे पकड़ कर घसीटते हुए बस्ती में ले आए.

‘‘यह ले, इस कागज पर दस्तखत कर दे, वरना तेरी हालत और भी बुरी हो जाएगी,’’ फुलवा ने एक सादा कागज उस के सामने रखते हुए कहा.

‘‘यह क्या है?’’ बुरी तरह घायल मोटर मेकैनिक ने बड़ी मुश्किल से पूछा. उस की आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था. अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करते ही वह जमीन पर चीखते हुए गिर पड़ा था. ‘‘अगर फिर कभी दोबारा तुम ने किसी भी बहनबेटी की तरफ बुरी नजर से देखा, तो तेरा अंगअंग काट दिया जाएगा. इस सजा की जिम्मेदारी सिर्फ तेरी होगी. किसी दूसरे को आरोपी नहीं माना जाएगा, इसलिए तेरे दस्तखत कराना जरूरी है.

‘‘हम इस कागज की एक कौपी थाने में और एक कौपी कचहरी में जमा कराएंगे,’’ फुलवा ने सारी बात समझाई, तो उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. जबान मानो तालू से चिपक गई थी.

‘‘अरे, मोटर मेकैनिक बाबा, अभी दस्तखत कर दो, वरना गुस्से में आई ये औरतें तेरा आज ही अंग भंग कर देंगी. अगर तुम इन औरतों से बच गए, तो हम तुझे अभी नहर में फेंक देंगे. बस्ती में हमारी मांबहनें रहती हैं. जल्दी दस्तखत कर,’’ वहां जमा हुए लड़कों में से एक ने कहा. मोटर मेकैनिक ने कांपते हाथों से कागज पर अपने दस्तखत करने में ही भलाई समझी. दस्तखत करते ही वह बेहोश हो गया. बबली ने साथ आई औरतों का शुक्रिया अदा किया. उस ने महसूस किया कि हिम्मत और सूझबूझ से बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाई जा सकती है.

आलोचक सच्चे हितैषी: अभिषेक बच्चन

स्टार पुत्र अभिषेक बच्चन का 16 वर्ष का अभिनय कैरियर हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रहा है, जबकि वे जे पी दत्ता और मणिरत्नम जैसे दिग्गज फिल्मकारों के साथ काम कर चुके हैं. उन के कैरियर की हालत यह है कि वे जिस मल्टीस्टारर फिल्म का हिस्सा बनते हैं, वह फिल्म जरूर हिट हो जाती है मगर जब भी वे सोलो हीरो वाली फिल्म करते हैं, उन्हें असफलता ही हाथ लगती है.

आप अपना अब तक का कैरियर किस तरह देखते हैं?

हर इंसान की तरह मेरे कैरियर में भी उतारचढ़ाव आते रहे. मैं ने हमेशा हर फिल्म में कुछ अलग करने का प्रयास किया. अलग तरह का किरदार चुनने की कोशिश की. मैं हमेशा अपने ऊपर फिट बैठने वाले चरित्रों की तलाश में रहता हूं. मेरी कोशिश रही है कि फिल्म दर फिल्म मेरी अभिनय प्रतिभा में निखार आए.

सच कहूं तो अभी तक मुझे ऐसे किरदार नहीं मिले, जिन के साथ मैं पूरा न्याय कर सकूं. मैं निरंतर खुद को एक कलाकार के तौर पर खोजता आ रहा हूं. यह प्रक्रिया सतत जारी रहेगी. मैं आज भी सीख रहा हूं. वैसे मुझे किसी भी फिल्म में काम करने का मलाल नहीं है. मैं वह फिल्म नहीं करता, जो मुझे कथानक व पटकथा के स्तर पर पसंद न आए. मैं ने अपनी अब तक की हर फिल्म में काम करते हुए ऐंजौय किया.

आप की फिल्म ‘औल इज वेल’ बौक्स औफिस पर नहीं चली, क्या कमी रह गई थी?

पहली बात तो फिल्म के बनने में काफी देर हो गई. हम इस फिल्म को 6 माह में बना कर रिलीज कर देना चाहते थे, लेकिन फिल्म के निर्माण में 3 साल लग गए. दूसरी बात ईमानदारी से कहूं तो इस फिल्म के लिए मेरा चयन शायद गलत हुआ था. मुझे प्रतिक्रिया मिली कि आप के सामने जो विलेन थे, जिन की वजह से आप भाग रहे थे, वे ऐसे थे, जिन्हें देख कर लगता नहीं था कि आप इन से डरते हों. मुझे भी यह समस्या समझ में आई. मैं शारीरिक रूप से इतना बड़ा हूं कि जो मेरे सामने कलाकार थे, हालांकि वे बहुत अच्छे कलाकार हैं, मो. जिशान अयूब, वे पहली बार मुझे धमकी देते हैं तो लगता है कि एक थप्पड़ मारो, ठीक हो जाएगा. ऐसे इंसान से डर कर रोड ट्रिप पर जाना व भागना गलत लगता है. यदि मैं इस फिल्म में न होता तो शायद यह फिल्म चल जाती.

आप ने कहीं कहा है कि फिल्म का पहला ट्रायल देख कर हर कलाकार समझ जाता है कि फिल्म चलेगी या नहीं. उस के बाद भी आप प्रमोशन में फिल्म की वाहवाही करते हैं?

मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं ने सिर्फ डबिंग के समय अनएडिटेड वर्जन के कुछ अंश देखे थे, जिन से फिल्म को ले कर कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता था, पर जब हम पहली बार पूरी फिल्म देखते हैं, तो उस के चलने या न चलने का एहसास हो जाता है. आखिर हम भी दर्शक की हैसियत से ही फिल्म देखते हैं, लेकिन जब हम ने फिल्म में काम किया है, तो हमें अंत तक उस के साथ रहना होता है. मेरा मानना है कि एक बार यदि फिल्म करने की हामी भर दी, तो फिर उसे बीच में नहीं छोड़ना चाहिए.

मीडिया को ले कर आप की क्या सोच है?

मीडिया चाहे भारतीय हो या विदेशी, सब जगह वह अपना काम सही ढंग से कर रहा है. मेरी समझ में यह नहीं आता कि हम क्यों सोचते हैं कि कलाकार और मीडिया के बीच काफी तनाव है? मीडिया तो मीडिया है. मेरे नानाजी भी पत्रकार थे. लोग फिल्म आलोचकों को ले कर कई तरह की बातें करते हैं. कुछ कलाकार तो शिकायत करते हैं कि फलां आलोचक ने बहुत बुराई लिख दी.

मेरी राय में कोई भी आलोचक निजी दुश्मनी नहीं रखता. मेरा मानना है कि यह आलोचक भी हमारे दर्शक हैं. मुझे लगता है कि यह फिल्म आलोचक हम कलाकारों को सलाह देने का काम करते हैं. वे हमें मुफ्त में सलाह देते हैं, ‘भाई, तुम अपने अभिनय में, अपने किरदार में यह बदलाव करो.’ तो फिर वह गलत कैसे हो गया. हम लोग क्यों खामखां रक्षात्मक हो जाते हैं. फिल्म आलोचक कभी यह नहीं कहता कि कलाकार को क्या करना चाहिए.

जब मेरे कैरियर की शुरुआत हुई थी, तब जो भी आलोचक मेरे अभिनय की कमियां गिनाते थे, तो उन पर निशान लगा कर मैं अपने कमरे की दीवार पर चिपका लेता था. मेरी कोशिश होती थी कि जो दीवार पर चिपकाया है, वह कमी फिल्म दर फिल्म दूर होती जाए. इस का अर्थ यह था कि मैं अपने अभिनय में सुधार कर रहा हूं. मेरे विचार से आलोचक आप के सब से बड़े हितैषी होते हैं.

सोशल मीडिया पर भी आप व आप के परिवार के बारे में काफी कुछ लिखा जाता रहा है?

देखिए, मेरा मानना है कि मैं पब्लिक फिगर हूं. मैं पब्लिक के लिए काम करता हूं, तो यह जरूरी नहीं कि पब्लिक सिर्फ अच्छी बात ही कहेगी. उन का हक है कि वे अपने मन की हर बात सोशल मीडिया पर लिखें. मेरा सोशल मीडिया अकाउंट निजी नहीं है, हर किसी को उस पर अपनी बात लिखने का हक है.

क्या आप एडल्ट कौमेडी वाली फिल्में करना चाहेंगे?

सिनेमा तो सिनेमा है. हर इंसान को अपनी पसंद का सिनेमा देखने का हक है. कोई जबरन आप को फिल्म नहीं दिखा सकता. पर जहां तक मेरा अपना सवाल है, तो मैं ऐसी फिल्में नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि मुझे ये समझ में नहीं आतीं.

निजी जिंदगी में आप कबड्डी के खेल से जुड़ कर ‘प्रो कबड्डी’ की एक टीम के मालिक हैं. ऐसे में किसी खेल पर फिल्म बनाने के बारे में नहीं सोचा?

मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं, जो  किसी खेल से संबंधित हों लेकिन किसी इंसान के बारे में न हों. यह मानवीय कहानी होनी चाहिए. आप फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ देखें तो यह फिल्म मिल्खा सिंह की दौड़ की कहानी नहीं है. किसी भी खेल पर फिल्म बनाई जा सकती है, बशर्ते उस खेल से जुड़ी कोई मानवीय कहानी मिल जाए.

कुछ कलाकारों का मानना है कि बौलीवुड में लोग अपने लाभ के लिए रिश्ते बनाते या बिगाड़ते हैं. आप की इस पर क्या राय है?

मैं इस से सहमत नहीं हूं. मेरे लिए रिश्ते बहुत माने रखते हैं. रिश्तों को लाभ के लिए बनाना या बिगाड़ना मेरी फितरत नहीं है, पर दूसरे ऐसा नहीं करते होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता. हर प्रोफैशन में लोग उन्हीं से रिश्ते बनाते हैं, जो उन के काम आते हैं.

लोग सिनेमा में बदलाव की बातें कर रहे हैं, लेकिन हमारे यहां हीरो प्रधान सिनेमा अब भी है?

ऐसा न कहें, ‘क्वीन’, ‘तनु वैड्स मनु’, ‘एनएच 10’, ‘नीरजा’ सहित कई फिल्में नारी प्रधान भी हैं. मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं. जो फिल्में निर्माता को बौक्स औफिस पर कमा कर देंगी, निर्माता उसी तरह की फिल्में ज्यादा बनाना चाहेगा, लेकिन 2-3 नारी प्रधान फिल्मों की सफलता से लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. अब कई तरह की फिल्में बन रही हैं.

क्या हौलीवुड फिल्में बौलीवुड के लिए खतरे की घंटी हैं?

मैं ऐसा नहीं मानता. हौलीवुड की साल में 1 या 2 फिल्में आएंगी और सफलता बटोर लेंगी. हमारे और उन के कल्चर में बहुत  अंतर है. इसी के चलते भारतीय फिल्में विदेशों में बहुत ज्यादा नहीं चलतीं. हमारा कल्चर एकदम अलग है. फिल्म ‘हाउसफुल 3’ अपनी कौमेडी और गानों की वजह से दर्शकों को पसंद आई जबकि हौलीवुड में लोगों को यह फिल्म समझ में ही नहीं आएगी. ‘जंगल बुक’ फिल्म सफल हुई, पर ‘जंगल बुक’ का आधार भारत ही है. हौलीवुड की वही फिल्में भारत में सफल होंगी, जिन का कुछ न कुछ भारतीय दर्शकों के साथ जुड़ाव होगा. इस वजह से हमें सतर्क रहने की भी जरूरत है. हमें अच्छी फिल्में बनानी पड़ेंगी. वे हमें चुनौती दे रहे हैं, तो हम भी उन्हें चुनौती दे रहे हैं. हमारी कई तमिल फिल्में अमेरिका में तहलका मचा रही हैं.

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