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कनाडा में हिंदू मंदिरों पर हमला, भड़ास या फिर कोई साजिश

इतिहास में मामूली दिलचस्पी रखने वाला भी जानता है कि सिख धर्म मुगलों से हिंदुओं की हिफाजत के लिए बना था. ये सिख भी अधिकतर दलित हिंदू ही थे जिन्हें गुरुगोविंद सिंह ने हिम्मत और अन्याय से लड़ने का जज्बा दिया जिसे अमृत छकाना (पंच ककार धारण करना) कहा जाता है. लेकिन एक हकीकत कम ही सनातनी जानते हैं और जो जानते भी हैं तो वे उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि गुरुनानक का एक अहम मकसद तत्कालीन हिंदू समाज में फैली रूढ़ियों, भेदभाव, कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाना भी था. खालसा पंथ के संविधान में से तो जातपांत नाम का अनुच्छेद ही डिलीट कर दिया गया था.

कनाडा की ताजी सिखहिंदू हिंसा के मद्देनजर कनाडा में भी जो हिंदू भारत के सनातनियों की तर्ज पर ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का जुमला बुलंद कर रहे हैं उन्हें यह सबक इतिहास और सिख धर्म की स्थापना से ले ही लेना चाहिए कि एकता के लिए जरूरी यह है कि जातपांत, भेदभाव और छुआछूत फैलाने का निर्देश और आदेश देने वाले अप्रांसगिक हो चुके धर्मग्रंथों से वक्त रहते किनारा कर लिया जाए. नहीं तो कटते रहना हिंदुओं की नियति थी और आगे भी रहेगी और इस का जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि वे सवर्ण हिंदू ही होंगे जो रामायण, गीता और मनुस्मृति जैसे भेदभाव व नफरत फैलाते ग्रंथों को सीने से लगाए अवर्ण हिंदुओं को लतियाते और बहिष्कृत करते रहते हैं (हालांकि किसी भी दौर में ये ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथ प्रासंगिक नहीं थे). गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी और गुरुनानक जैसे चिंतकों ने बिना इन्हें नष्ट किए या जलाए बगैर अलग संप्रदाय खड़े करने में बेहतरी समझी जो आज क्रमश बौद्ध, जैन और सिख धर्म के नाम से जाने व पहचाने जाते हैं. अब यह और बात है कि इन धर्मों के अनुयायी भी इन रोगों की चपेट में, आंशिक रूप से ही सही, आने लगे हैं.

नवंबर महीने की शुरुआत से ही कनाडा में हिंदूसिख तनातनी की खबरें आने लगी थीं जो आखिरकार हिंसा में तबदील हो गईं. खालिस्तान समर्थक सिखों ने 2 हिंदू मंदिरों पर धावा बोला और हिंसा भी की. पहली वारदात टोरंटो के ब्रेम्पटन स्थित हिंदू सभा मंदिर में हुई जहां खालिस्तानियों ने मंदिर के अंदर घुस कर मारपीट की.

हमलावर खालिस्तानियों की भीड़ में शामिल लोगों के हाथ में पीले खालिस्तानी झंडे थे. उपद्रव और शांति भंग के आरोप में पुलिस ने 3 लोगों को गिरफ्तार किया. कनाडा में हिंदू मंदिरों पर हमले की यह कोई पहली वारदात नहीं थी. इस के पहले भी ब्रिटिश कोलंबिया और ग्रेटर टोरंटो सहित दूसरी जगहों पर भी हिंदू मंदिरों पर हमले हो चुके थे. इन का इतिहास लंबा है और पुराना भी. 1984 के सिख दंगों के बाद से ही कनाडा के सिखों ने वहां के हिंदुओं को निशाने पर ले रखा है. वे आएदिन हिंदू मंदिरों पर हमले बोला करते हैं और ‘हिंदुओं भारत वापस जाओ’ का नारा भी लगाते रहते हैं.

कनाडा में सिखहिंदुओं की नफरत का खमियाजा अकसर मंदिरों पर गिरता है. ताजी वारदातों में एक अहम वारदात बीती जुलाई में देखने को आई थी जब एड्मोर्टन के बीएपीएस मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इकलौते कनाडाई हिंदू सांसद चंद्र आर्य को हिंदू आतंकवादी बताते मंदिर के भित्तिचित्रों के साथ तोड़फोड़ की गई थी.

अक्तूबर 2023 में तो ओंटारियों में एकसाथ 6 हिंदू मंदिरों में सेंध लगाई गई थी. इन मंदिरों में चितपूर्णी मंदिर, केलेनडन में रामेश्वर मंदिर, मिसीसागा में हिंदू हैरिटेज सैंटर, पिकरिंग में देवी मंदिर और अजाक्स का संकट मोचन मंदिर शामिल हैं. इस से पहले अगस्त 2023 में सरे में लक्ष्मीनारायण मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी और फ्रंट गेट व पिछली दीवार पर भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक पोस्टर चस्पां किए गए थे.

इसे भारतकनाडा विवाद से भी जोड़ कर देखने की कोशिश की गई जो अभी तक जारी है. इस की शुरुआत बीती 18 सितंबर को हुई थी. उस दिन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर निज्जर की हत्या का आरोप लगाते भारत के एक सीनियर डिप्लोमैट को बाहर का रास्ता दिखला दिया था.

गौरतलब है कि 18 जून, 2023 को खालिस्तानी समर्थक और वैंकूवर स्थित गुरुनानक सिख गुरुद्वारा के अध्यक्ष हरदीप सिंह निज्जर की गुरुद्वारे की पार्किंग में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. गौरतलब यह भी है कि निज्जर खालिस्तान टाइगर फोर्स के भी मुखिया थे.

इस के दूसरे दिन यानी 19 सितंबर को ही भारत सरकार ने कनाडा में रह रहे भारतीयों के लिए एक एडवायजरी जारी करते उन से यानी भारत विरोधी गतिविधियों से सतर्क रहने की अपील की थी. 21 सितंबर को और आक्रामक होते भारत ने कनाडा के लोगों के लिए वीजा सेवाएं सस्पैंड कर दीं. इस संबंध में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि हमारे डिप्लोमैट्स को लगातार धमकियां मिल रही हैं. 13 अक्तूबर को कनाडा सरकार ने भारत को एक चिट्ठी भेजी जिस में हाई कमिश्नर संजय वर्मा सहित दूसरे डिप्लोमैट्स को एक मामले में संदिग्ध करार दिया गया था. एवज में 14 अक्तूबर को ही भारत ने इन लोगों को वापस बुला लिया.

जाहिर है, बात बिगड़ चुकी थी और अभी तक सिखों या हिंदुओं का इस से घोषित तौर पर कोई सीधे लेनादेना नहीं था. लेकिन वक्त बीतते जस्टिस ट्रूडो इस मामले को ले कर भारत पर सख्त होते गए और उन्होंने निज्जर के कातिलों को कनाडा की संसद में भारत सरकार का एजेंट बता डाला जिस का भारत ने तुरंत खंडन किया. कनाडा ने यह आरोप भी लगाया कि भारतीय डिप्लोमैट्स अपने पद का बेजा इस्तेमाल करते हुए भारत सरकार के लिए जानकारियां जुटा रहे हैं जिन का इस्तेमाल दक्षिणएशियाई लोगों को निशाना बनाने में किया जाता है. जेल में बंद लौरेंस विश्नोई से भी कनाडा ने हिंसा के तार जोड़ते बयान दिए थे. निज्जर के हत्यारों के बारे में जांच में पता चला कि तीनों युवा आरोपी करण बराड़, करणप्रीत और कमलप्रीत पंजाब के रहने वाले हैं और खातेपीते परिवारों से हैं.

यह मसला सुलझ पाता, इस के पहले ही मंदिर पर हमलों ने तूल पकड़ लिया. इस के भी पहले एक सनसनीखेज बयान में कनाडा ने गृहमंत्री अमित शाह पर अमेरिकी मीडिया हाउस वाशिंगटन पोस्ट के हवाले से कनाडा में तोड़फोड़ का आरोप लगाया था. इस को भी बेतुका बताते भारत ने खंडन किया था. भारत का आरोप यह है कि कनाडा सरकार और ट्रूडो भारत विरोधी गतिविधियों को शह दे रहे हैं.

इधर, दीवाली के बाद कनाडाई हिंदुओं ने भी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. उन्होंने इस के लिए जय श्रीराम और हरहर महादेव के नारों का सहारा लिया. 5 नवंबर को ब्रेम्पटन शहर में हजारों हिंदुओं ने प्रदर्शन किया. इन के हाथ में तिरंगा और भगवा झंडों के अलावा कनाडा का राष्ट्रीय ध्वज भी था. इस मार्च का आयोजन ‘कोलिशन औफ हिंदूज इन नौर्थ अमेरिका’ ने किया था. इन प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को भी कोसा और हिंदू फोबिया पर भी सख्त कार्रवाई करने की मांग की. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रूडो को कूटनीतिक भाषा में हड़काने की रस्म पहले ही अदा कर थी तो विदेश मंत्री जयशंकर ने भी उन का अनुसरण किया.

5 नवंबर के प्रदर्शन में हिंदू भड़काऊ बातें करते नजर आए, मसलन यह कहना कि जो कोई भी हिंदुओं का विरोध करेगा तो उसे छोड़ेंगे नहीं बल्कि तोड़ेंगे. हिंदू सभा मंदिर विवाद में भी हिंदुओं ने भड़काऊ नारे लगाए थे जिन का मकसद सिखों को उकसाना और भड़काना ही था. 5 नवंबर को ही हिंदू सभा मंदिर के पंडित राजेंद्र प्रसाद को सिखों के खिलाफ हिंसक बयानबाजी करने के आरोप में हिंदू सभा मंदिर के अध्यक्ष मधुसूदन लामा ने निलंबित करते हुए बाहर का रास्ता दिखाने को मजबूर होना पड़ा था.

ब्रेम्पटन के मेयर पैट्रिक ब्राउन ने इस पुजारी की करतूत की निंदा सोशल मीडिया पर करते हुए यह भी लिखा था कि अधिकांश कनाडाई सिख और कनाडाई हिंदू सद्भाव में रहना चाहते हैं और हिंसा बरदाश्त नहीं करते हैं. पंडित राजेंद्र प्रसाद के निलंबन से साफ लगा था कि हिंदू सारा दोष सिखों के सिर मढ़ कर पाकसाफ दिखना चाहते हैं.

इधर, भारत में सिखों ने समझदारी का परिचय देते हुए कनाडा की हिंसा के विरोध में जगहजगह विरोध प्रदर्शन करते कनाडा सरकार पर खालिस्तानियों को संरक्षण देने के खिलाफ नारेबाजी की. भोपाल के रोशनपुरा चौराहे पर ऐसे ही एक प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे मध्य प्रदेश के प्रमुख भाजपाई सिख नेता और गुरुद्वारा सिख सभा के संरक्षक जसपाल अरोरा ने कनाडा सरकार को कोसते हुए यह भी कहा कि हिंदू सनातन धर्म का सब से मजबूत पंथ सिख पंथ है जिस के कुछ लोगों को भड़का कर उन्हें खालिस्तानी नाम दे कर उन के द्वारा कनाडा में एक तथाकथित आंदोलन चलाया जा रहा है.

जल्द ही इस मामले में राजनीति भी शामिल कर ली गई, जब भारतीय मीडिया ने यह कहना शुरू किया कि ट्रूडो के लिए सिख वोट अहम हैं क्योंकि अगले साल कनाडा में आम चुनाव हैं और ट्रूडो एक बार फिर इन्हीं के सहारे प्रधानमंत्री बन जाना चाहते हैं. कोई 4 करोड़ की आबादी वाले में कनाडा में लगभग 9 लाख सिख हैं हालांकि हिंदुओं की तादाद सिखों से थोड़ी ज्यादा है लेकिन वे वहां वोटर नहीं हैं. कनाडा की संसद में 15 सिख सांसद हैं और ट्रूडो मंत्रिमंडल में 4 सिख हैं. जबकि इकलौते हिंदू सांसद चंद्र आर्य हैं. सिखों से ज्यादा आबादी वाले हिंदुओं की संसद में तादाद कम क्यों है, इस का चिंतनमंथन कनाडा के हिंदुओं को करना चाहिए जो वहां भी जातिवाद के शिकार हैं. सिखों की कनाडा में छोटीमोटी कई राजनातिक पार्टियां हैं जिन में प्रमुख लिबरल पार्टी औफ कनाडा, कंजर्वेटिव पार्टी औफ कनाडा और एनडीपी यानी न्यू डैमोक्रेटिक पार्टी शामिल हैं.

इस समीकरण के मद्देनजर भारत के हिंदू नेता आरोप यह लगा रहे हैं कि खालिस्तानियों को खुश करने के लिए ट्रूडो सिखों को हिंदुओं पर हमलों की खुली छूट दे रहे हैं. हालांकि यह दलील देने वाले इस तथ्य को नजरअंदाज कर जाते हैं कि ट्रूडो सरकार में शामिल खालिस्तान समर्थक जगमीत सिंह की अगुआई वाली एनडीपी, जिस के 24 सांसद हैं, ने अपना समर्थन वापस ले लिया था जिस के चलते अल्पमत में आ गई ट्रूडो सरकार एक अक्तूबर के फ्लोरटैस्ट में जुगाड़तुगाड़ कर बहुमत साबित कर पाई थी. जगमीत सिंह से पहले एनडीपी के अध्यक्ष कनाडाई नेता ही हुआ करते थे.

विदेशी धरती पर लड़ रहे सिख और हिंदुओं का बैर और अलग खालिस्तान की मांग बहुत पुरानी है. भारत में जो हुआ उसे सब जानते हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या कैसे और क्यों हुई और कैसे राजीव गांधी ने इसे तात्कालिक तौर पर सुलझाया था.

आमतौर पर लोग यही मानते हैं कि खालिस्तान की मांग ने 80-90 के दशकों में जन्म लिया लेकिन हकीकत में यह 95 साल पुरानी मांग है. साल 1931 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने जब पूर्ण स्वराज की बात कही थी तब शिरोमणि अकाली दल के मास्टर तारासिंह ने सिखों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग की थी क्योंकि उन की चिंता वे ब्राह्मण थे जो गुरुद्वारों के पंडेपुजारी बन कर लूटखसोट तो मचा ही रहे थे, साथ ही, सिखों में भी हिंदुओं सरीखे अंधविश्वास फैला रहे थे. तारासिंह ने ही इन्हें गुरुद्वारों से खदेड़ा था. आजादी के बाद भी खालिस्तान की मांग कायम रही लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे हलके में ले कर टाल दिया था.

1955 में एक बार फिर अकाली दल ने भाषा के आधार पर राज्य के पुनर्गठन के लिए आंदोलन किया था. उस की मांग थी कि पंजाबी और गैरपंजाबी भाषी क्षेत्रों में विभाजित किया जाए. तब प्रमुख हिंदूवादी संगठनों आरएसएस और हिंदू महासभा ने गुरुमुखी भाषा में शिक्षा देने सहित इस का विरोध किया था. इस से उन्हें क्या हासिल हुआ, यह राम जाने.

1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब को 3 हिस्सों में बांट दिया था जिस के तहत हिमाचल प्रदेश और हरियाणा को नया राज्य बनाया गया और चंडीगढ़ को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था. तब भी अकाली दल इस मांग पर अड़ गया था कि रक्षा, विदेश, संचार और मुद्रा छोड़ कर दूसरे सारे अधिकार पंजाब को दे दिए जाएं. लेकिन इंदिरा गांधी ने इस मांग को खारिज कर दिया था. 80 के दशक में एक बार फिर पृथक खालिस्तान की मांग ने जोर पकड़ा जिसे दमदम अकाली दल के मुखिया जरनैल सिंह भिंडरांवाला ने एक आंदोलन की शक्ल दे दी. इस के बाद जो भी हुआ, अप्रिय ही हुआ और खालिस्तान की मांग हौरर फिल्मों के प्रेत की तरह हर कभी सिर उठाती रही.

इस पूरे दौर और खेल में एक बात आईने की तरह साफ है और आज भी होती रहती है कि हिंदू और सिख एकसाथ सहज ढंग से नहीं रह सकते और असहज ढंग से रहने का खमियाजा अब भारत के बाहर कनाडा में भी भुगत रहे हैं जिस का दोष राजनीति या किसी ट्रूडो को देना असल मुद्दे से ध्यान भटकाने जैसी बात है. लड़ाई चूंकि धार्मिक है, इसलिए राजनीति से नहीं सुलझने वाली. जो काम इंदिरा और राजीव गांधी जैसे धुरंधर प्रधानमंत्री नहीं कर पाए उसे नरेंद्र मोदी कर दिखाएंगे, इस में शक नहीं बल्कि यकीन है कि यह काम उन के बूते का भी नहीं. हां, बातें वे भी हजार करें, यह हर्ज और गौर करने वाली भी बात नहीं. यह बात महज 9 महीने पहले 20 फरवरी को ही एक और खालिस्तानी समर्थक ‘वारिस दे पंजाब’ के स्वयंभू मुखिया अमृतपाल सिंह ने कही भी थी जिसे खडूर साहब लोकसभा क्षेत्र की जनता ने भले ही जिता कर लोकसभा भेज दिया लेकिन वह इन दिनों असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद है.

तो फिर समस्या का हल क्या, क्या पृथक खालिस्तान की मांग मान लेनी चाहिए? इस का जवाब है, हरगिज नहीं. जरूरत इस बात की है कि हिंदू सिखों के प्रति अपना पूर्वाग्रह छोड़ें, हिंदू राष्ट्र की बेजा मांग छोड़ें, देश को धर्मनिरपेक्ष रहने दें और याद रखें कि कैसीकैसी कुर्बानियां सिख गुरुओं ने उस सनातन हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दी हैं जिस के मूलभूत सिद्धांतों, खासतौर से वर्ण व्यवस्था, से ही वे सहमत नहीं थे. जरूरत इस बात की भी है कि हिंदू भी कृतघ्नता छोड़ें और सिखों का मजाक बनाना व उड़ाना बंद करें, संक्षेप में याद दिला देना जरूरी है कि किसान आंदोलन के दौरान किसानों को खालिस्तानी कहा गया था. उन के आंदोलन को विदेशियों, खासतौर से पाकिस्तान, से फंडिंग होना बताया गया था.

छोटेबड़े सनातनी नेता किसान आंदोलन और सिखों को कोसते रहे लेकिन हद ऐक्ट्रैस कंगना रानौत ने कर दी जो हर कभी सिखों और किसानों को अपने बयानों के जरिए जलील करती रहती हैं. इन दिनों कंगना हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से भाजपाई सांसद हैं जो अमर्यादित आचरण को ही राजनीति समझती हैं. बडबोली कंगना ने कब, क्या कहा, इस पर एक नजर डालें तो समझ आता है कि सुंदर चेहरे वाली इस ऐक्ट्रैस का दिल कितना बदसूरत है.

नवंबर 2021 में पहली बार कंगना ने एक विवादित बयान दिया था कि किसान आंदोलन के जरिए देश को कमजोर किया जा रहा है. किसानों ने अपने हितों के लिए राष्ट्र की अनदेखी की है. दरअसल तब कंगना भाजपा में आने के लिए छटपटा रही थीं और भाजपा की ही जबान बोलती थीं. किसान आंदोलन में चूंकि पंजाब के किसान ज्यादा थे इसलिए उन का मतलब और इशारा सिखों की तरफ ही था.

इस के पहले फरवरी 2021 में कंगना किसान आंदोलन को आतंकवाद करार दे चुकी थीं. बकौल कंगना, ये किसान नहीं बल्कि आतंकवादी हैं जो भारत को विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं. यह वह वक्त था जब किसान आंदोलन के पक्ष में राष्ट्रीय के अलावा कई नामी अंतर्राष्ट्रीय हस्तियां भी बोल रही थीं. इन में मशहूर पौप स्टार रिहाना और ग्रेटा थानबर्ग के नाम उल्लेखनीय हैं. 2 फरवरी, 2021 को रिहाना ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि आखिर हम इस (किसान आंदोलन) के बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं. एवज में कंगना ने घटिया और पूर्वाग्रही बात कह डाली थी.

कंगना की सिख समुदाय से बैर, नफरत और भड़ास नवंबर 2021 में भी उजागर हुए थे जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर लिखा था कि खालिस्तानी आतंकवादी आज सरकार को परेशान कर रहे हैं लेकिन हमें एक महिला को नहीं भूलना चाहिए. एकमात्र महिला प्रधानमंत्री ने इन्हें अपनी जूतियों के नीचे कुचल दिया था चाहे उन्होंने देश को कितनी तकलीफें ही क्यों न दी हों. उन्होंने अपनी जान की कीमत पर इन्हें मच्छरों की तरह कुचल दिया. लेकिन देश के टुकड़े नहीं होने दिए. इस बयान से आहत सिखों ने देशभर में कंगना का विरोध किया था लेकिन उन के कान पर जूं नहीं रेंगी और ऐसे विवादित बयानों को वे शान की बात समझने लगी थीं.

सांसद बनने के बाद भी यह बड़बोली ऐक्ट्रैस सुधरी नहीं. 25 अगस्त, 2024 को एक बार फिर उन्होंने सोशल मीडिया पर यह कहते बवाल खड़ा कर दिया कि “किसान आंदोलन के जरिए भारत में बंगलादेश जैसी स्थिति पैदा करने की तैयारी थी, जो बंगलादेश में हुआ वह यहां होने में भी देर नहीं लगती अगर हमारा शीर्ष नेतृत्व सशक्त न होता. जहां किसान आंदोलन हुए वहां पर लाशें लटकी थीं, वहां रेप हो रहे थे. किसानों की बड़ी लंबी प्लानिंग थी, जैसे बंगलादेश में हुआ इस तरह का षड्यंत्र…आपको क्या लगता है, किसानों…चीन, अमेरिका इस तरह की विदेशी शक्तियां यहां काम कर रही हैं.”

इस पर भी बवाल मचा तो भाजपा ने इस से पल्ला झाड़ लिया कि, “यह पार्टी की राय नहीं है. नीतिगत विषयों पर बोलने को ले कर कंगना रानौत को न तो अनुमति है और न ही वे बयान देने के लिए अधिकृत हैं. कंगना को निर्देशित किया गया है कि वे भविष्य में इस तरह के कोई बयान न दें.”

इस निर्देश से कंगना ने यही सीखा कि उन्हें इस तरह के ही बयान देते रहने के लिए पार्टी ने अधिकृत किया है, सो, ठीक एक महीने बाद 24 सितंबर को उन्होंने फिर रट्टू तोते की तरह कहा कि तीनों विवादास्पद कृषि कानून फिर से लागू करने चाहिए और इस की मांग खुद किसानों को करनी चाहिए. अब तक लोग उन की किसानों और सिखों के प्रति सनक, कुंठा और भड़ास के आदी हो चुके थे, इसलिए किसी ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया.

अब हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सनातनी रंग में रंग चुकी कंगना कनाडा की हिंसा पर भी कुछ न कुछ ऐसा बोले जो उन्हें सुर्खियां दे. हालांकि, विवादित बयानों से ज्यादा सुर्खियां उन्हें इसी साल 6 जून को मिली थीं जब दिल्ली जाते वक्त चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर उन्हें सीआईएसएफ की एक महिला कांस्टेबल कुलविंदर कौर ने गाल पर तबीयत से थप्पड़ जड दिया था. कुलविंदर ने कुछ न छिपाते हुए बेबाकी से बता दिया था कि उस ने अभिनेत्री सांसद को थप्पड़ इसलिए मारा कि उस ने किसान आंदोलन को ले कर कमैंट किया था कि पंजाब की महिलाओं ने पैसों के लिए किसान आंदोलन में हिस्सा लिया था. इस आंदोलन में उस की मां भी शामिल थी जिन का अपमान उस से बरदाश्त न हुआ.

ऐसे माहौल में हिंदीभाषी इलाकों के सिख अगर मुसलमानों की तरह खुद को असुरक्षित, अलगथलग और उपेक्षित समझ रहे हैं तो इस की वजह बहुसंख्यक हिंदुओं का उन के प्रति वही नजरिया है जो मुसलमानों के प्रति है. इसी की प्रतिक्रिया में जगजीत सिंह भिंडरांवाला, जगमीत सिंह और अमृतपाल सिंह जैसे दर्जनों सैकड़ों नौजवान धार्मिक उन्माद का शिकार हो कर देश का माहौल बिगाड़ते हैं और इसी की भड़ास अब कनाडा में निकल रही है जहां हिंदू सिख आस्तीनें चढ़ाए आमनेसामने खड़े एकदूसरे का सिर फोड़ रहे हैं और कैथोलिक ईसाई तमाशा देख रहे हैं.

इधर सिखों को भी ध्यान रखना चाहिए कि खुदा न खास्ता खालिस्तान कभी बन भी गया तो चैन से वे भी नहीं रह पाएंगे. अफगानिस्तान के साथसाथ पाकिस्तान इस का बेहतर उदाहरण हैं जहां के फिरकापरस्त मुसलमान कठमुल्लाओं की कठपुतली बने आपस में लड़तेझगड़ते रहते हैं और हर कभी फांके करते रहते हैं. ऐसा सिर्फ कट्टरवाद की वजह से है जो विकास और तर्कों से कोई वास्ता नहीं रखता.

‘बटेंगे तो कटेंगे’ का नारा बुलंद करने वाले हिंदू किस हद तक जातिगत भेदभाव के शिकार हैं, यह उन के इस नारे देने की मजबूरी से ही पता चलता है. इसलिए नारा तो सब का यह होना चाहिए कि ‘जुड़ेंगे तो बढ़ेंगे, नहीं तो फिर पिछ्ड़ेंगे’. लेकिन सभी धर्मों के ठेकेदार और दुकानदार सभी को यह सोचने की मोहलत और मौका देंगे, ऐसा सोचने की कोई वजह नहीं.

पुरवई : मनोहर की कौन सी बात लोगों को चुभ गई

‘‘सुनिए, पुरवई का फोन है. आप से बात करेगी,’’ मैं बैठक में फोन ले कर पहुंच गईथी.

‘‘हां हां, लाओ फोन दो. हां, पुरू बेटी, कैसी हो तुम्हें एक मजेदार बात बतानी थी. कल खाना बनाने वाली बाई नहीं आईथी तो मैं ने वही चक्करदार जलेबी वाली रेसिपी ट्राई की. खूब मजेदार बनी. और बताओ, दीपक कैसा है हां, तुम्हारी मम्मा अब बिलकुल ठीक हैं. अच्छा, बाय.’’

‘‘बिटिया का फोन लगता है’’ आगंतुक ने उत्सुकता जताई.

‘‘जी…वह हमारी बहू है…बापबेटी का सा रिश्ता बन गया है ससुर और बहू के बीच. पिछले सप्ताह ये लखनऊ एक सेमीनार में गएथे. मेरे लिए तो बस एक साड़ी लाए और पुरवई के लिए कुरता, टौप्स, ब्रेसलेट और न जाने क्याक्या उठा लाए थे. मुझ बेचारी ने तो मन को समझाबुझा कर पूरी जिंदगी निकाल ली थी कि इन के कोई बहनबेटी नहीं है तो ये बेचारे लड़कियों की चीजें लाना क्या जानें और अब देखिए कि बहू के लिए…’’

‘‘आप को तो बहुत ईर्ष्या होती होगी  यह सब देख कर’’ अतिथि महिला ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘अब उस नारीसुलभ ईर्ष्या वाली उम्र ही नहीं रही. फिर अपनी ही बेटी सेक्या ईर्ष्या रखना अब तो मन को यह सोच कर बहुत सुकून मिलता है कि चलो वक्त रहते इन्होंने खुद को समय के मुताबिक ढाल लिया. वरना पहले तो मैं यही सोचसोच कर चिंता से मरी जाती थी कि ‘मैं’ के फोबिया में कैद इस इंसान का मेरे बाद क्या होगा’’

आगंतुक महिला मेरा चेहरा देखती ही रह गई थीं. पर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई. हां, मन जरूर कुछ महीने पहले की यादों मेंभटकने पर मजबूर हो गया था.  बेटा दीपक और बहू पुरवई सप्ताह भर का हनीमून मना कर लौटेथे और अगले दिन ही मुंबई अपने कार्यस्थल लौटने वाले थे. मैं बहू की विदाई की तैयारी कर रही थी कि तभी दीपक की कंपनी से फोन आ गया. उसे 4 दिनों के लिए प्रशिक्षण हेतु बेंगलुरु जाना था. ‘तो पुरवई को भी साथ ले जा’ मैं ने सुझाव रखा था.

‘मैं तो पूरे दिन प्रशिक्षण में व्यस्त रहूंगा. पुरू बोर हो जाएगी. पुरू, तुम अपने पापामम्मी के पास हो आओ. फिर सीधे मुंबई पहुंच जाना. मैं भी सीधा ही आऊंगा. अब और छुट्टी नहीं मिलेगी.’  ‘तुम रवाना हो, मैं अपना मैनेज कर लूंगी.’

दीपक चला गया. अब हम पुरवई के कार्यक्रम का इंतजार करने लगे. लेकिन यह जान कर हम दोनों ही चौंक पड़े कि पुरवई कहीं नहीं जा रहीथी. उस का 4 दिन बाद यहीं से मुंबई की फ्लाइट पकड़ने का कार्यक्रम था. ‘2 दिन तो आनेजाने में ही निकल जाएंगे. फिर इतने सालों से उन के साथ ही तो रह रही हूं. अब कुछ दिन आप के साथ रहूंगी. पूरा शहर भी देख लूंगी,’ बहू के मुंह से सुन कर मुझे अच्छा लगा था.

‘सुनिए, बहू जब तक यहां है, आप जरा शाम को जल्दी आ जाएं तो अच्छा लगेगा.’

‘इस में अच्छा लगने वाली क्या बात है मैं दोस्तों के संग मौजमस्ती करने या जुआ खेलने के लिए तो नहीं रुकता हूं. कालेज मेंढेर सारा काम होता है, इसलिए रुकता हूं.’

‘जानती हूं. पर अगर बहू शाम को शहर घूमने जाना चाहे तो’

‘कार घर पर ही है. उसे ड्राइविंग आती है. तुम दोनों जहां जाना चाहो चले जाना. चाबी पड़ोस में दे जाना.’

मनोहर भले ही मना कर गए थे लेकिन उन्हें शाम ठीक वक्त पर आया देख कर मेरा चेहरा खुशी से खिल उठा.  ‘चलिए, बहू को कहीं घुमा लाते हैं. कहां चलना चाहोगी बेटी’ मैं ने पुरवई से पूछा.

‘मुझे तो इस शहर का कोई आइडिया नहीं है मम्मा. बाहर निकलते हैं, फिर देख लेंगे.’

घर से कुछ दूर निकलते ही एक मेला सा लगा देख पुरवई उस के बारे में पूछ बैठी, ‘यहां चहलपहल कैसी है’

‘यह दीवाली मेला है,’ मैं ने बताया.

‘तो चलिए, वहीं चलते हैं. बरसों से मैं ने कोई मेला नहीं देखा.’

मेले में पहुंचते ही पुरवई बच्ची की तरह किलक उठी थी, ‘ममा, पापा, मुझे बलून पर निशाना लगाना है. उधर चलते हैं न’ हम दोनों का हाथ पकड़ कर वह हमें उधर घसीट ले गई थी. मैं तो अवाक् उसे देखती रह गईथी. उस का हमारे संग व्यवहार एकदम बेतकल्लुफ था. सरल था, मानो वह अपने मम्मीपापा के संग हो. मुझे तो अच्छा लग रहाथा. लेकिन मन ही मन मैं मनोहर से भय खा रही थी कि वे कहीं उस मासूम को झिड़क न दें. उन की सख्तमिजाज प्रोफैसर वाली छवि कालेज में ही नहीं घर पर भी बनी हुईथी.

पुरवई को देख कर लग रहा था मानो वह ऐसे किसी कठोर अनुशासन की छांव से कभी गुजरी ही न हो. या गुजरी भी हो तो अपने नाम के अनुरूप उसे एक झोंके से उड़ा देने की क्षमता रखती हो. बेहद स्वच्छंद और आधुनिक परिवेश में पलीबढ़ी खुशमिजाज उन्मुक्त पुरवई का अपने घर में आगमन मुझेठंडी हवा के झोंके सा एहसास करा रहा था. पलपल सिहरन का एहसास महसूस करते हुए भी मैं इस ठंडे उन्मुक्त एहसास कोभरपूर जी लेना चाह रही थी.

पुरवई की ‘वो लगा’ की पुकार के साथ उन्मुक्त हंसी गूंजी तो मैं एकबारगी फिर सिहर उठी थी. हड़बड़ा कर मैं ने मनोहर की ओर दृष्टि दौड़ाई तो चौंक उठी थी. वे हाथ में बंदूक थामे, एक आंख बंद कर गुब्बारों पर निशाने पर निशाना लगाए जा रहे थे और पुरवई उछलउछल कर ताली बजाते हुए उन का उत्साहवर्द्धन कर रही थी. फिर यह क्रम बदल गया. अब पुरवई निशाना साधने लगी और मनोहर ताली बजा कर उस का उत्साहवर्द्धन करने लगे. मुझे हैरत से निहारते देख वे बोल उठे, ‘अच्छा खेल रही है न पुरवई’

बस, उसीक्षण से मैं ने भी पुरवई को बहू कहना छोड़ दिया. रिश्तों की जिस मर्यादा को जबरन ढोए जा रही थी, उस बोझ को परे धकेल एकदम हलके हो जाने का एहसास हुआ. फिर तो हम ने जम कर मेले का लुत्फ उठाया. कभी चाट का दोना तो कभी फालूदा, कभी चकरी तो कभी झूला. ऐसा लग रहा था मानो एक नई ही दुनिया में आ गए हैं. बर्फ का गोला चाटते मनोहर को मैं ने टहोका मारा, ‘अभी आप को कोई स्टूडेंट या साथी प्राध्यापक देख ले तो’

मनोहर कुछ जवाब देते इस से पूर्व पुरवई बोल पड़ी, ‘तो हम कोई गलत काम थोड़े ही कर रहे हैं. वैसे भी इंसान को दूसरों के कहने की परवा कम ही करनी चाहिए. जो खुद को अच्छा लगे वही करना चाहिए. यहां तक कि मैं तो कभी अपने दिल और दिमाग में संघर्ष हो जाता है तो भी अपने दिल की बात को ज्यादा तवज्जुह देती हूं. छोटी सी तो जिंदगी मिली है हमें, उसे भी दूसरों के हिसाब से जीएंगे तो अपने मन की कब करेंगे’

हम दोनों उसे हैरानी से ताकते रह गए थे. कितनी सीधी सी फिलौसफी है एक सरस जिंदगी जीने की. और हम हैं कि अनेक दांवपेंचों में उसे उलझा कर एकदम नीरस बना डालते हैं. पहला दिन वाकई बड़ी मस्ती में गुजरा. दूसरे दिन हम ने उन की शादी की फिल्म देखने की सोची. 2 बार देख लेने के बावजूद हम दोनों का क्रेज कम नहीं हो रहा था. लेकिन पुरवई सुनते ही बिदक गई. ‘बोर हो गई मैं तो अपनी शादी की फिल्म देखतेदेखते… आज आप की शादी की फिल्म देखते हैं.’

‘हमारी शादी की पर बेटी, वह तो कैसेट में है जो इस में चलती नहीं है,’ मैं ने समस्या रखी.

‘लाइए, मुझे दीजिए,’ पुरवई कैसेट ले कर चली गई और कुछ ही देर में उस की सीडी बनवा कर ले आई. उस के बाद जितने मजे ले कर उस ने हमारी शादी की फिल्म देखी उतने मजे से तो अपनी शादी की फिल्म भी नहीं देखीथी. हर रस्म पर उस के मजेदार कमेंट हाजिर थे.

‘आप को भी ये सब पापड़ बेलने पड़े थे…ओह, हम कब बदलेंगे…वाऊ पापा, आप कितने स्लिम और हैंडसम थे… ममा, आप कितना शरमा रही थीं.’

सच कहूं तो फिल्म से ज्यादा हम ने उस की कमेंटरी को एंजौय किया, क्योंकि उस में कहीं कोई बनावटीपन नहीं था. ऐसा लग रहा था कमेंट उस की जबां से नहीं दिल से उछलउछल कर आ रहे थे. अगले दिन मूवी, फिर उस के अगले दिन बिग बाजार. वक्त कैसे गुजर रहा था, पता ही नहीं चल रहाथा.  अगले दिन पुरवई की फ्लाइट थी. दीपक मुंबई पहुंच चुका था. रात को बिस्तर पर लेटी तो आंखें बंद करने का मन नहीं हो रहा था,क्योंकि जागती आंखों से दिख रहा सपना ज्यादा हसीन लग रहा था. आंखें बंद कर लीं और यह सपना चला गया तो पास लेटे मनोहर भी शायद यही सोच रहे थे. तभी तो उन्होंने मेरी ओर करवट बदली और बोले, ‘कल पुरवई चली जाएगी. घर कितना सूना लगेगा 4 दिनों में ही उस ने घर में कैसी रौनक ला दी है मैं खुद अपने अंदर बहुत बदलाव महसूस कर रहा हूं्…जानती हो तनु, बचपन में  मैं ने घर में बाबूजी का कड़ा अनुशासन देखा है. जब वे जोर से बोलने लगते थे तो हम भाइयों के हाथपांव थरथराने  लगते थे.

‘बड़े हुए, शादी हुई, बच्चे हो जाने के बाद तक मेरे दिलोदिमाग पर उन का अनुशासन हावी रहा. जब उन का देहांत हुआ तो मुझे लगा अब मैं कैसे जीऊंगा क्योंकि मुझे हर काम उन से पूछ कर करने की आदत हो गईथी. मुझे पता ही नहीं चला इस दरम्यान कब उन का गुस्सा, उन की सख्ती मेरे अंदर समाविष्ट होते चले गए थे. मैं धीरेधीरे दूसरा बाबूजी बनता चला गया. जिस तरह मेरे बचपन के शौक निशानेबाजी, मूवी देखना आदि दम तोड़ते चले गए थे ठीक वैसे ही मैं ने दीपक के, तुम्हारे सब के शौक कुचलने का प्रयास किया. मुझे इस से एक अजीब आत्म- संतुष्टि सी मिलती थी. तुम चाहो तो इसे एक मानसिक बीमारी कह सकती हो. पर समस्या बीमारी की नहीं उस के समाधान की है.

‘पुरवई ने जितनी नरमाई से मेरे अंदर के सोए हुए शौक जगाए हैं और जितने प्यार से मेरे अंदर के तानाशाह को घुटने टेकने पर मजबूर किया है, मैं उस का एहसानमंद हो गया हूं. मैं ‘मैं’ के फोबिया से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस ले पा रहा हूं. सच तो यह है तनु, बंदिशें मैं ने सिर्फ दीपक और तुम पर ही नहीं लगाईथीं, खुद को भी वर्जनाओं की जंजीरों में जकड़ रखा था. पुरवई से भले ही यह सब अनजाने में हुआ हैक्योंकि उस ने मेरा पुराना रूप तो देखा ही नहीं है, लेकिन मैं अपने इस नए रूप से बेहद प्यार करने लगा हूं और तुम्हारी आंखों मेंभी यह प्यार स्पष्ट देख सकता हूं.’

‘मैं तो आप से हमेशा से ही प्यार करती आ रही हूं,’ मैं ने टोका.

‘वह रिश्तों की मर्यादा में बंधा प्यार था जो अकसर हर पतिपत्नी में देखने को मिल जाता है. लेकिन इन दिनों मैं तुम्हारी आंखों में जो प्यार देख रहा हूं, वह प्रेमीप्रेमिका वाला प्यार है, जिस का नशा अलग ही है.’

‘अच्छा, अब सो जाइए. सवेरे पुरवई को रवाना करना है.’

मैं ने मनोहर को तो सुला दिया लेकिन खुद सोने सेडरने लगी. जागती आंखों से देख रही इस सपने को तो मेरी आंखें कभी नजरों से ओझल नहीं होने देना चाहेंगी. शायद मेरी आंखों में अभी कुछ और सपने सजने बाकी थे.  पुरवई को विदा करने के चक्कर में मैं  हर काम जल्दीजल्दी निबटा रही थी. भागतेदौड़ते नहाने घुसी तो पांव फिसल गया और मैं चारोंखाने चित जमीन पर गिर गई. पांव में फ्रैक्चर हो गया था. मनोहर और पुरवई मुझे ले कर अस्पताल दौड़े. पांव में पक्का प्लास्टर चढ़ गया. पुरवई कीफ्लाइट का वक्त हो गया था. मगर  वह मुझे इस हाल में छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हो रही थी. उस ने दीपक को फोन कर के सब स्थिति बता दी. साथ ही अपनी टिकट भी कैंसल करवा दी. मुझे बहुत दुख हो रहा था.

‘मेरी वजह से सब चौपट हो गया. अब दोबारा टिकट बुक करानी होगी. दीपक अलग परेशान होगा. डाक्टर, दवा आदि पर भी कितना खर्च हो गया. सब मेरी जरा सी लापरवाही की वजह से…घर बैठे मुसीबत बुला ली मैं ने…’

‘आप अपनेआप को क्यों कोस रही हैं ममा यह तो शुक्र है जरा से प्लास्टर से ही आप ठीक हो जाएंगी. और कुछ हो जाता तो रही बात खर्चे की तो यदि ऐसे वक्त पर भी पैसा खर्च नहीं किया गया तो फिर वह किस काम का यदि आप के इलाज में कोई कमी रह जाती, जिस का फल आप को जिंदगी भर भुगतना पड़ता तो यह पैसा क्या काम आता हाथपांव सलामत हैं तो इतना पैसा तो हम चुटकियों में कमा लेंगे.’

उस की बातों से मेरा मन वाकई बहुत हल्का हो गया. पीढि़यों की सोच का टकराव मैं कदमकदम पर महसूस कर रही थी. नई पीढ़ी लोगों के कहने की परवा नहीं करती. अपने दिल की आवाज सुनना पसंद करती है. पैसा खर्च करते वक्त वह हम जैसा आगापीछा नहीं सोचती क्योंकि वह इतना कमाती है कि खर्च करना अपना हक समझती है.  घर की बागडोर दो जोड़ी अनाड़ी हाथों में आ गईथी. मनोहर कोघर के कामों का कोई खास अनुभव नहीं था. इमरजेंसी में परांठा, खिचड़ी आदि बना लेतेथे. उधर पुरवई भी पहले पढ़ाई और फिर नौकरी में लग जाने के कारण ज्यादा कुछ नहीं जानती थी. पर इधर 4 दिन मेरे साथ रसोई में लगने से दाल, शक्कर के डब्बे तो पता चले ही थे साथ ही सब्जी, पुलाव आदि में भी थोड़ेथोड़े हाथ चलने लग गए थे. वरना रसोई की उस की दुनिया भी मैगी, पास्ता और कौफी तक ही सीमित थी. मुझ से पूछपूछ कर दोनों ने 2 दिन पेट भरने लायक पका ही लिया था. तीसरे दिन खाना बनाने वाली बाई का इंतजाम हो गया तो सब ने राहत की सांस ली. लेकिन इन 2 दिनों में ही दोनों ने रसोई को अच्छीखासी प्रयोगशाला बना डालाथा. अब जबतब फोन पर उन प्रयोगों को याद कर हंसी से दोहरे होते रहते हैं.

तीसरे दिन दीपक भी आ गया था. 2 दिन और रुक कर वे दोनों चले गए थे. उन की विदाई का दृश्य याद कर के आंखें अब भी छलक उठती हैं. दीपक तो पहले पढ़ाई करते हुए और फिर नौकरी लग जाने पर अकसर आताजाता रहता है पर विदाई के दर्द की जो तीव्र लहर हम उस वक्त महसूस कर रहे थे, वह पिछले सब अनुभवों से जुदा थी. ऐसा लग रहा था बेटी विदा हो कर, बाबुल की दहलीज लांघ कर दूर देश जा रही है. पुरवई की जबां पर यह बात आ भी गई थी, ‘जुदाई के ऐसे मीठे से दर्द की कसक एक बार तब उठी थी जब कुछ दिन पूर्व मायके से विदा हुई थी. तब एहसास भी नहीं था कि इतने कम अंतराल में ऐसा मीठा दर्द दोबारा सहना पड़ जाएगा.’

पहली बार मुझे पीढि़यों की सोच टकराती नहीं, हाथ मिलाती महसूस हो रही थी. भावनाओं के धरातल पर आज भी युवा प्यार के बदले प्यार देना जानते हैं और विरह के क्षणों में उन का भी दिल भर आता है.पुरवई चली गई. अब ठंडी हवा का हर झोंका घर में उस की उपस्थिति का आभास करा जाता है.

भोर का तारा

लेखिका-सवि शर्मा

अरे, 7 बज गए. हड़बड़ा कर उठी. पता ही न चला, कब नींद में अलार्म बंद कर दिया. कुछ भी समय पर नहीं हो पा रहा. 7 बजे तो आंख खुली है. अभी मनु को नाश्ता, खाना, तैयार करना है और 9 बजे निकलना है. कैसे करेगी, खुद को भी तैयार होना है.

मां के देहावसान के बाद खूबसूरत से खिलते जीवन में जैसे अचानक कोई तूफ़ान आ गया हो.

यह आंख भी जाने क्यों नहीं खुलती. आधे समय तो नींद में ही अलार्म बंद कर देती है. रोज़ ही औफ़िस को देर हो जाती है. जब तक सासुमां ज़िंदा थीं तो कभी ऐसा हुआ ही नहीं कि उसे औफ़िस की देर हुई हो. हमेशा प्रोजैक्ट समयसीमा से पहले ही पूरा कर देती थी. औफिस के विवाहित साथी उस से कई बार पूछते थे, कैसे कर पाती हो पूरा, छोटे बच्चे और गृहस्थी के साथ.

उसे भी बोध कहां था कि इन सब उपलब्धियों के पीछे मां का परोक्षरूप में सहयोग है. बस, सब की बात सुन गर्व से मुसकरा देती थी. जल्दी से उठी. मनु को दूध दिया, “मेरा राजा बेटा, अपनेआप दूध पिएगा.” “मम्मा, इस में तो बादाम भी नहीं हैं, दादी तो रोज़ बादाम देती थीं.”

“कोई बात नहीं, आज पी लो, कल ज़रूर बना दूंगी.” रुद्री को मन में बुरा लगा, रोज़ सोचती है मनु को कल से दूध में बादाम पीस कर देगी पर वह कल आ ही नहीं पाता. जल्दी से अपने कपड़े ले नहाने घुस गई वह.“अरे, यह क्या किया मनु बेटा, सारा दूध गिरा दिया?” वह नहा कर निकली तो देखा सारा दूध फ़र्श पर बिखरा था.

”मां, गिलास हाथ से फिसल गया.”“कोई बात नहीं. जा, फटाफट नहा कर आ जा, तौलिया लपेट कर आना. मैं कमरे में ही कपड़े पहना दूंगी.” “नहीं मां, आप ही नहलाओ.” “बेटा, इतवार को नहलाऊंगी, आज समय नहीं है.” “दादी, आप क्यों चली गईं?” और मनु रोने लगा, “मां के पास तो मेरे लिए समय ही नहीं है.”

5 साल के अबोध बच्चे को क्या पता कि दादी वहां गईं जहां से कोई लौट कर नहीं आता. जैसेतैसे हवा की रफ़्तार से रुद्री ने नाश्ता, लंच तैयार किया. मनु को बिना नहलाए ही स्कूल के लिए तैयार कर दिया. अब तो अकसर ही यही होता है. कभी अपना नाश्ता छूटता है, कभी मनु का नहाना. एक गहन पीड़ा से आंखों में नमी तैर गई. रुद्री का दिल रोने को हो गया, उसे याद आने लगा.

सुबहसवेरे ही नल से पानी गिरने की आवाज़ कर्णभेदी सी लगती. ऐसा लगता जैसे स्वप्नों की झील में किसी ने बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो. रोज़ का यही क्रम. सुबह की नींद टूटने से कितना खीझती थी. जाने क्यों इस समय की नींद भी इतनी प्यारी लगती है, सौ सुख भी बलिहारी है. तब तो ऐसा महसूस होता था कि अभी सो ले, बाद में जो होगा देखा जाएगा. और सास भी थोड़ी देर बाद नहीं नहा सकतीं. सुबह ही नहाना जरूरी है.

शांति भंग हो गई थी रुद्री की, आंख खुली. अरे, अभी तो साढ़े चार ही बजे हैं. तकिया कान के ऊपर रख करवट बदल लेट गई. मन ही मन कुसमुसाई, ‘क्या दो पल की नींद भी सुकून की नहीं मिल सकती.’ अभी गहरी झपकी ही आई थी कि 5 साल के बेटे मनु के रोने की आवाज़ आई.

उसे थपकासुला, फिर नींद के इंतज़ार में आंखें मूंदी. पर नींद तो जैसे कह रही हो, जा, मैं नहीं आती. और अंगूठा दिखा इतराती जाने किस ख़्वाब के पीछे जा छिप गई.

एक वह समय था जब चाहे जितना भी सो लो, न शादी न घर का झंझट. और अब कभी मनु उठा देता, कभी सुबह ही सास की खटरपटर. और नींद मुझे चिढ़ा भाग जाती. ‘अरे रुद्री, क्या बात है बेटा, तुम थकी सी लग रही हो?’ एक दिन सास ने उस का उनींदी चेहरा देखा तो पूछा.

यह सुनते ही रुद्री के मुंह से अचानक निकल गया, ‘मां, इतनी सुबह आप उठती हो तो मेरी भी नींद खुल जाती है. रात में भी औफ़िस का काम करते देर हो जाती है. जल्दी नहीं सो पाती. नींद पूरी न होने से दिनभर थकान रहती है.’ अरे, मैं ने तो ध्यान ही नहीं दिया. बेचारी रुद्री सारे दिन काम करती है और फिर मेरे सुबह के क्रियाकलापों से उस की नींद पूरी नहीं हो पाती. उस की सास ने मन ही मन सोचा.

मां ने आगे पूरी सतर्कता से उस की नींद का ध्यान रखा. सासुमां ने अपने उठने का समय 4 बजे के बजाय 5 बजे कर दिया था. पानी भी रात को ही बालटियों में भर लेती थीं. रुद्री अब आराम से नींद पूरी कर उठती. कितनी संवेदनशील थीं मां, हर बात को कितनी जल्दी समझ जाती थीं. और एक मैं थी उन के इतने लाड़प्यार को बोझ समझती रही, जो जीवन की सब से बड़ी उपलब्धि थी.

वैसे, जब रुद्री फ़्री होती, सास के साथ घूमने जाती या उन की मनपसंद की पिक्चर देखती. इतना सब सोचने में ही 6 बज गए. नींद न आई. और त्यागना पड़ा बिस्तर का मोह. खुद को भी दफ़्तर के लिए तैयार होना है पति के साथ निकलना जो पड़ता है. दिन भी कैसे भागते हैं. कब सोमवार, फिर जब इतवार.

एक तसवीर यादों की फिर उभर आई. ‘अम्मा, आप क्या कर रही हो?’ मनु ने दादी को रसोई में काम करते देखा तो बोला. ‘अपने छोटे से मनु को खूब ताकतवर बनाने के लिए बादाम वाला दूध बना रही हूं.’ ‘मम्मा कहां हैं?’

‘मम्मा नहाने गई हैं.’ ‘आजा, जल्दी आजा मेरे पास, मैं गिनती गिनती हूं और आंख बंद करती हूं. जल्दी से यह दूध ख़त्म कर लो.’ ‘नहीं, मुझे नहीं पीना.’ ‘अच्छा, आ मैं तुझे चंदा मामा वाला गाना सुनाऊंगी.’ ‘सच, दादी,’ इतना कह कर मनु दादी की गोद में आ गया. रुद्री नहा कर निकली. मनु को सास की गोदी में दूध पीते देखा तो मन ही मन उन के प्यार को देख मन श्रद्धा से झुक गया. इस उम्र में भी अपने आशीर्वाद के हाथ से सम्बल देती रहती हैं.

कितना समर्पण था उन में. कितनी बार मनु को सास के पास छोड़ पार्टियों/शादियों में गई है वह. आज सोच सास के साथ चल रही थी रुद्री की. कितना अजीब है जीवन भी, जब कोई सामने होता है, हम उस की सार्थकता नहीं समझते. बाद में समझ आती है.

सास थी तो आराम से नाश्ता, लंच बना पैक करती, पति को भी देती. सास का मनपसंद नाश्ता बना कर रख देती. मनु की तो चिंता ही नहीं रहती थी. उस के लिए उस की दादी ही गरम बनाती हैं. ‘बाएं मां बाएं मनु.’ ‘अरे रुक जा रुद्री, ले ये फल रख लो, तुम दोनों खा लेना.’ ‘मां, आप भी न, हर बात पर ऐसे करती हो जैसे अभी भी हम छोटे बच्चे ही हैं,’ एक चिड़चिड़ाहट का भाव चेहरे पर तैर गया.

सोचने लगी, क्यों नहीं अब भी ये फ़्री छोड़तीं. अब हम कोई छोटे बच्चे तो हैं नहीं. पर दूसरे ही पल महसूस हुआ की वह खुद भी तो मां है, उसे अपने छोटे बच्चे के खानेपीने की चिंता रहती है. सास भी तो मां है. जल्दी से सास के हाथ से फल ले अपना व पति का लंचबौक्स संभाले दोनों को हाथ हिलाते रुद्री व उस का पति औफिस निकल गए.

रुद्री को मां के रहते मनु की कोई चिंता ही नहीं होती थी. सास की गोद में बच्चे को छोड़ कितनी निश्चिंत हो जाती है. क्या अगर मां न होतीं तो इतनी बेफ़िक्री से औफ़िस जा पाती? और प्रेम उन का केवल पोते के लिए ही नहीं, वे मेरी भी चिंता करतीं. औफ़िस से आ कर कुछ खाया या नहीं, सासुमां ही तो पूछती थीं. फ़ास्ट फ़ूड की जगह कितनी बार पौष्टिक खाना खुद ही बना देती थीं. रुद्री को आज उन का प्यारदुलार सब याद आ रहा है जो उस समय बोझ लगता था, बातें पुराने जमाने की लगती थीं.

अब कितनी बार कुछ और न बना पाने के कारण फ़ास्ट फ़ूड खा कर उस का पेट ख़राब हो जाता है. मां की आंखों में वात्सल्य का लहलहाता सागर याद आ रहा है. यादें लड़ियां सी पिरोती एक के बाद एक सामने आ रही हैं. ‘रुद्री, मनु ने उलटी कर दी, पेट में बहुत दर्द भी है,’ सास का फ़ोन था. ‘मां, फिर आप ने ज़्यादा खिलाया होगा. कितनी बार मना किया, थोड़ा खिलाया करो, पर आप मानती ही नहीं,’ झुंझला पड़ी रुद्री. ग़ुस्सा आने लगा मां पर. और फ़ोन काट दिया. फिर उस ने पति को फ़ोन कर मनु को दिखाने के लिए बोल दिया.

‘मां, अब मनु कैसा है?’ मनु के पापा ने घर चलने के पहले फ़ोन किया. ‘अब तो ठीक है.’ ‘कोई बात नहीं मां. आप परेशान न हों. अगर कोई दिक़्क़त हो, आप बता देना, हम आ जाएंगे,’ कह कर मनु के पापा निश्चिंत हो गए. ‘आप चले गए क्या मनु को दिखाने?’ रुद्री ने पति को फ़ोन किया, उस का औफ़िस दूर था. ‘नहीं, अब मनु ठीक है. मां से बात हो गई है.’‘ये मां भी न, हर छोटी बात पर परेशान हो जाती हैं, हमें भी करती हैं.’ ‘अरे रुद्री, ये बड़े लोग बहुत प्यार करते हैं, इसीलिए चिंता कुछ ज़्यादा ही करते हैं.’

‘ह्म्म्म्म्म्म…’ लापरवाही से कह रुद्री ने फ़ोन रख दिया. ‘आज तुम लोग औफ़िस से लेट हो गए, सब ठीक तो है न?’ घर में औफ़िस से घुसते ही सास ने कहा. आज रुद्री और उस का पति दोनों कुछ ज़्यादा ही लेट हो गए थे. ‘हां मां, हज़ार काम होते हैं, आप को हर बात कैसे बताएं,’ रुद्री ने रुखाई से जवाब दिया. ‘बेटा, और कोई बात नहीं, चिंता हो जाती है. तुम लोग, बस, फ़ोन कर दिया करो.’ ‘आप चिंता न किया करें, हम अपना ध्यान रख सकते हैं.’

लेकिन बाद में रुद्री ध्यान रखने लगी. वह सोचने लगी, बड़ों की चिंता करना स्वाभाविक है.कुछ समय बाद सास और रुद्री एकदूसरे की भावनाओं को समझने लगीं. एक खूबसूरत रिश्ता बन गया रुद्री और सास में. कितनी परिपक्व सोच थी मां की. वास्तव में सासुमां, हां, मां ही कहना ठीक होगा. इतना प्यारदुलार जो वे देती रहीं और तब जब वे जीवित थीं, मैं जीवन की आपाधापी में महसूस ही नहीं कर पाई. वटवृक्ष सी पूरी गृहस्थी संभाले थीं वे.

फ़िस में काम बहुत ज़्यादा था, थक गई थी. सास होतीं तो तबीयत पूछतीं, गरम दूध देतीं. हर पल ख़याल रखना, कैसे सुकून से घऔर की देखभाल, मनु का ध्यान सब रखती थीं. मनु भी खूब ख़ुश रहता था, कभी औफ़िस को भी लेट नहीं हुई. उन के रहते कितने प्रमोशन मिले. मां तो जैसे भोर का तारा थीं, जिन का प्रकाश घर में हमेशा दैदीप्यमान रहता था. घर प्यारदुलार से रोशन रहता था. आज आप की बहुत याद आ रही है मां, तब मैं आप के कुछ कहने पर चिढ़ जाती थी.

न जाने कब सास को याद करते रुद्री की आंख लग गई. सुबह आंख खुली. खिड़की से बाहर निगाह गई. देखा, एक भोर का तारा टिमटिमा कर जैसे कुछ कह रहा हो, बिलकुल उस की सास की तरह. ऐसे ही सुबह उठ जाती थीं. आज आप नहीं हो, तो आप का प्यारदुलार समझ आता है. आप तो आशीर्वाद हो मां… “अरे, तुम रो रही हो,” तभी पति की नींद भी अचानक खुल गई.

“देखो रुद्र, वह आसमान में भोर का तारा. वह हमारी मां ही हैं, कहते हैं अच्छे इंसान दुनिया से जा कर आसमान में तारे बन जाते हैं. देखो, कैसे झांक कर हमें आश्वस्त कर रही हैं मानो कह रही हों वे हमारे साथ ही हैं.” “आज मां बहुत याद आ रही हैं. उन के रहते जीवन कितना आसान था. अपनी छत्रछाया से सबकुछ संभाले हुए थीं. किंतु आज कितना मुश्किल हो रहा है,” रुद्री ने ऊपर आसमान में तारे को नम आंखों से देखा. उसे लगा, मां मुसकरा कर आशीर्वाद दे रही हैं.

अधूरा सा दिल : कैसा हो गया था करुणा का मिजाज

‘‘आप को ऐक्साइटमैंट नहीं हो रही है क्या, मम्मा? मुझे तो आजकल नींद नहीं आ रही है, आय एम सो सुपर ऐक्साइटेड,’’ आरुषि बेहद उत्साहित थी. करुणा के मन में भी हलचल थी. हां, हलचल ही सही शब्द है इस भावना हेतु, उत्साह नहीं. एक धुकुरपुकुर सी लगी थी उस के भीतर. एक साधारण मध्यवर्गीय गृहिणी, जिस ने सारी उम्र पति की एक आमदनी में अपनी गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने में गुजार दी हो, आज सपरिवार विदेशयात्रा पर जा रही थी.

पिछले 8 महीनों से बेटा आरव विदेश में पढ़ रहा था. जीमैट में अच्छे स्कोर लाने के फलस्वरूप उस का दाखिला स्विट्जरलैंड के ग्लायन इंस्टिट्यूट औफ हायर एजुकेशन में हो गया था. शुरू से ही आरव की इच्छा थी कि वह एक रैस्तरां खोले. स्वादिष्ठ और नएनए तरह के व्यंजन खाने का शौक सभी को होता है, आरव को तो खाना बनाने में भी आनंद आता था.

आरव जब पढ़ाई कर थक जाता और कुछ देर का ब्रेक लेता, तब रसोई में अपनी मां का हाथ बंटाने लगता, कहता, ‘खाना बनाना मेरे लिए स्ट्रैसबस्टर है, मम्मा.’ फिर आगे की योजना बनाने लगता, ‘आजकल स्टार्टअप का जमाना है. मैं अपना रैस्तरां खोलूंगा.’

ग्लायन एक ऐसा शिक्षा संस्थान है जो होटल मैनेजमैंट में एमबीए तथा एमएससी की दोहरी डिगरी देता है. साथ ही, दूसरे वर्ष में इंटर्नशिप या नौकरी दिलवा देता है. जीमैट के परिणाम आने के बाद पूरे परिवार को होटल मैनेजमैंट की अच्छी शिक्षा के लिए संस्थानों में ग्लायन ही सब से अच्छा लगा और आरव चला गया था दूर देश अपने भविष्यनिर्माण की नींव रखने.

अगले वर्ष आरव अपनी इंटर्नशिप में व्यस्त होने वाला था. सो, उस ने जिद कर पूरे परिवार से कहा कि एक बार सब आ कर यहां घूम जाओ, यह एक अलग ही दुनिया है. यहां का विकास देख आप लोग हैरान हो जाओगे. उस के कथन ने आरुषि को कुछ ज्यादा ही उत्साहित कर दिया था.

रात को भोजन करने के बाद चहलकदमी करने निकले करुणा और विरेश इसी विषय पर बात करने लगे, ‘‘ठीक कह रहा है आरव, मौका मिल रहा है तो घूम आते हैं सभी.’’

‘‘पर इतना खर्च? आप अकेले कमाने वाले, उस पर अभी आरव की पढ़ाई, आरुषि की पढ़ाई और फिर शादियां…’’ करुणा जोड़गुना कर रही थी.

‘‘रहने का इंतजाम आरव के कमरे में हो जाएगा और फिर अधिक दिनों के लिए नहीं जाएंगे. आनाजाना समेत एक हफ्ते का ट्रिप बना लेते हैं. तुम चिंता मत करो, सब हो जाएगा,’’ विरेश ने कहा.

आज सब स्विट्जरलैंड के लिए रवाना होने वाले थे. कम करतेकरते भी बहुत सारा सामान हो गया था. क्या करते, वहां गरम कपड़े पूरे चाहिए, दवा बिना डाक्टर के परचे के वहां खरीदना आसान नहीं. सो, वह रखना भी जरूरी है. फिर बेटे के लिए कुछ न कुछ बना कर ले जाने का मन है. जो भी ले जाने की इजाजत है, वही सब रखा था ताकि एयरपोर्ट पर कोई टोकाटाकी न हो और वे बिना किसी अड़चन के पहुंच जाएं.

हवाईजहाज में खिड़की वाली सीट आरुषि ने लपक ली. उस के पास वाली सीट पर बैठी करुणा अफगानिस्तान के सुदूर फैले रेतीले पहाड़मैदान देखती रही. कभी बादलों का झुरमुट आ जाता तो लगता रुई में से गुजर रहे हैं, कभी धरती के आखिर तक फैले विशाल समुद्र को देख उसे लगता, हां, वाकईर् पृथ्वी गोल है. विरेश अकसर झपकी ले रहे थे, किंतु आरुषि सीट के सामने लगी स्क्रीन पर पिक्चर देखने में मगन थी. घंटों का सफर तय कर आखिर वो अपनी मंजिल पर पहुंच गए. ग्रीन चैनल से पार होते हुए वे अपने बेटे से मिले जो उन के इंतजार में बाहर खड़ा था. पूरे 8 महीनों बाद पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था.

आरव का इंस्टिट्यूट कैंपस देख मन खुश हो गया. ग्लायन नामक गांव के बीच में इंस्टिट्यूट की शानदार इमारत पहाड़ की चोटी पर खड़ी थी. पहाड़ के नीचे बसा था मोंट्रियू शहर जहां सैलानी सालभर कुदरती छटा बटोरने आते रहते हैं. सच, यहां कुदरत की अदा जितनी मनमोहक थी, मौसम उतना ही सुहावना. वहीं फैली थी जिनीवा झील. उस का गहरा नीला पानी शांत बह रहा था. झील के उस पार स्विस तथा फ्रांसीसी एल्प्स के पहाड़ खड़े थे. घनी, हरी चादर ओढ़े ये पहाड़, बादलों के फीते अपनी चोटियों में बांधे हुए थे. इतना खूबसूरत नजारा देख मन एकबारगी धक सा कर गया.

हलकी धूप भी खिली हुई थी पर फिर भी विरेश, करुणा और आरुषि को ठंड लग रही थी. हालांकि यहां के निवासियों के लिए अभी पूरी सर्दी शुरू होने को थी. ‘‘आप को यहां ठंड लगेगी, दिन में 4-5 और रात में 5 डिगरी तक पारा जाने लगा है,’’ आरव ने बताया. फिर वह सब को कुछ खिलाने के लिए कैफेटेरिया ले गया. फ्रैश नाम के कैफेटेरिया में लंबी व सफेद मेजों पर बड़बड़े हरे व लाल कृत्रिम सेबों से सजावट की हुई थी. भोजन कर सब कमरे में आ गए. ‘‘वाह भैया, स्विट्जरलैंड की हौट चौकलेट खा व पेय पी कर मजा आ गया,’’ आरुषि चहक कर कहने लगी.

अगली सुबह सब घूमने निकल गए. आज कुछ समय मोंट्रियू में बिताया. साफसुथरीचौड़ी सड़कें, न गाडि़यों की भीड़ और न पोंपों का शोर. सड़क के दोनों ओर मकानों व होटलों की एकसार लाइन. कहीं छोटे फौआरे तो कहीं खूबसूरत नक्काशी किए हुए मकान, जगहजगह फोटो ख्ंिचवाते सब स्टेशन पहुंच गए.

‘‘स्विट्जरलैंड आए हो तो ट्रेन में बैठना तो बनता ही है,’’ हंसते हुए आरव सब को ट्रेन में इंटरलाकेन शहर ले जा रहा था. स्टेशन पहुंचते ही आरुषि पोज देने लगी, ‘‘भैया, वो ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ वाले टे्रन पोज में मेरी फोटो खींचो न.’’ ट्रेन के अंदर प्रवेश करने पर दरवाजे खुद ही बंद हो गए. अंदर बहुत सफाई थी, आरामदेह कुशनदार सीटें थीं, किंतु यात्री एक भी न था. केवल यही परिवार पूरे कोच में बैठा था. कारण पूछने पर आरव ने बताया, ‘‘यही तो इन विकसित देशों की बात है. पूरा विकास है, किंतु भोगने के लिए लोग कम हैं.’’

रास्तेभर सब यूरोप की अनोखी वादियों के नजारे देखते आए. एकसार कटी हरी घास पूरे दिमाग में ताजा रंग भर रही थी. वादियों में दूरदूर बसा एकएक  घर, और हर घर तक पहुंचती सड़क. अकसर घरों के बाहर लकडि़यों के मोटेमोटे लट्ठों का अंबार लगा था और घर वालों की आवाजाही के लिए ट्रकनुमा गाडि़यां खड़ी थीं. ऊंचेऊंचे पहाड़ों पर गायबकरियां और भेड़ें हरीघास चर रही थीं.

यहां की गाय और भेंड़ों की सेहत देखते ही बनती है. दूर से ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने पूरे पहाड़ पर सफेद रंग के गुब्बारे बिखरा दिए हों, पर पास आने पर मालूम होता है कि ये भेंड़ें हैं जो घास चरने में मगन हैं. रास्ते में कई सुरंगें भी आईं. उन की लंबाई देख सभी हैरान रह गए. कुछ सुरंगें तो 11 किलोमीटर तक लंबी थीं.

ढाई घंटे का रेलसफर तय कर सब इंटरलाकेन पहुंचे. स्टेशन पर उतरते ही देखा कि मुख्य चौक के एक बड़े चबूतरे पर स्विस झंडे के साथ भारतीय झंडा भी लहरा रहा है. सभी के चेहरे राष्ट्रप्रेम से खिल उठे. सड़क पर आगे बढ़े तो आरव ने बताया कि यहां पार्क में बौलीवुड के एक फिल्म निर्मातानिर्देशक यश चोपड़ा की एक मूर्ति है. यश चोपड़ा को यहां का ब्रैंड ऐंबैसेडर बनाया गया था. उन्होंने यहां कई फिल्मों की शूटिंग की जिस से यहां के पर्यटन को काफी फायदा हुआ.

सड़क पर खुलेआम सैक्स शौप्स भी थीं. दुकानों के बाहर नग्न बालाओं की तसवीरें लगी थीं. परिवार साथ होने के कारण किसी ने भी उन की ओर सीधी नजर नहीं डाली, मगर तिरछी नजरों से सभी ने उस तरफ देखा. अंदर क्या था, इस का केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है. दोनों संस्कृतियों में कितना फर्क है. भारतीय संस्कृति में तो खुल कर सैक्स की बात भी नहीं कर सकते, जबकि वहां खुलेआम सैक्स शौप्स मौजूद हैं.

दोपहर में सब ने हूटर्स पब में खाना खाने का कार्यक्रम बनाया. यह पब अपनी सुंदर वेट्रैस और उन के आकर्षक नारंगी परिधानों के लिए विश्वप्रसिद्ध है. सब ने अपनीअपनी पसंद बता दी किंतु करुणा कहने लगी, ‘‘मैं ने तो नाश्ता ही इतना भरपेट किया था कि खास भूख नहीं है.’’

अगले दिन सभी गृंडेलवाल्ड शहर को निकल गए. ऐल्प्स पर्वतों की बर्फीली चोटियों में बसा, कहीं पिघली बर्फ के पानी से बनी नीली पारदर्शी झीलें तो कहीं ऊंचे ऐल्पाइन के पेड़ों से ढके पहाड़ों का मनोरम दृश्य, स्विट्जरलैंड वाकई यूरोप का अनोखा देश है.

गृंडेलवाल्ड एक बेहद शांत शहर है. सड़क के दोनों ओर दुकानें, दुकानों में सुसज्जित चमड़े की भारीभरकम जैकेट, दस्ताने, मफलर व कैप आदि. एक दुकान में तो भालू का संरक्षित शव खड़ा था. शहर में कई स्थानों पर गाय की मूर्तियां लगी हैं. सभी ने जगहजगह फोटो खिंचवाईं. फिर एक छोटे से मैदान में स्कीइंग करते पितापुत्र की मूर्ति देखी. उस के नीचे लिखा था, ‘गृंडेलवाल्ड को सर्दियों के खेल की विश्व की राजधानी कहा जाता है.’

भारत लौटने से एक दिन पहले आरव ने कोऔपरेटिव डिपार्टमैंटल स्टोर ले जा कर सभी को शौपिंग करवाई. आरुषि ने अपने और अपने मित्रों के लिए काफी सामान खरीद लिया, मसलन अपने लिए मेकअप किट व स्कार्फ, दोस्तों के लिए चौकलेट, आदि. विरेश ने अपने लिए कुछ टीशर्ट्स और दफ्तर में बांटने के लिए यहां के खास टी बिस्कुट, मफिन आदि ले लिए. करुणा ने केवल गृहस्थी में काम आने वाली चीजें लीं, जैसे आरुषि को पसंद आने वाला हौट चौकलेट पाउडर का पैकेट, यहां की प्रसिद्ध चीज का डब्बा, बढि़या क्वालिटी का मेवा, घर में आनेजाने वालों के लिए चौकलेट के पैकेट इत्यादि.

‘‘तुम ने अपने लिए तो कुछ लिया ही नहीं, लिपस्टिक या ब्लश ले लो या फिर कोई परफ्यूम,’’ विरेश के कहने पर करुणा कहने लगी, ‘‘मेरे पास सबकुछ है. अब केवल नाम के लिए क्या लूं?’’

शौपिंग में जितना मजा आता है, उतनी थकावट भी होती है. सो, सब एक कैफे की ओर चल दिए. इस बार यहां के पिज्जा खाने का प्रोग्राम था. आरव और आरुषि ने अपनी पसंद के पिज्जा और्डर कर दिए. करुणा की फिर वही घिसीपिटी प्रतिक्रिया थी कि मुझे कुछ नहीं चाहिए. शायद उसे यह आभास था कि उस की छोटीछोटी बचतों से उस की गृहस्थी थोड़ी और मजबूत हो पाएगी.

अकसर गृहिणियों को अपनी इच्छा की कटौती कर के लगता है कि उन्होंने भी बिना कमाए अपनी गृहस्थी में योगदान दिया. करुणा भी इसी मानसिकता में उलझी अकसर अपनी फरमाइशों का गला घोंटती आई थी. परंतु इस बार उस की यह बात विरेश को अखर गई. आखिर सब छुट्टी मनाने आए थे, सभी अपनी इच्छापूर्ति करने में लगे थे, तो ऐसे में केवल करुणा खुद की लगाम क्यों खींच रही है?

‘‘करुणा, हम यहां इतनी दूर जिंदगी में पहली बार सपरिवार विदेश छुट्टी मनाने आए हैं. जैसे हम सब के लिए यह एक यादगार अनुभव होगा वैसे ही तुम्हारे लिए भी होना चाहिए. मैं समझता हूं कि तुम अपनी छोटीछोटी कटौतियों से हमारी गृहस्थी का खर्च कुछ कम करना चाहती हो. पर प्लीज, ऐसा त्याग मत करो. मैं चाहता हूं कि तुम्हारी जिंदगी भी उतनी ही खुशहाल, उतनी ही आनंदमयी हो जितनी हम सब की है. हमारी गृहस्थी को केवल तुम्हारे ही त्याग की जरूरत नहीं है. अकसर अपनी इच्छाओं का गला रेतती औरतें मिजाज में कड़वी हो जाती हैं. मेरी तमन्ना है कि तुम पूरे दिल से जिंदगी को जियो. मुझे एक खुशमिजाज पत्नी चाहिए, न कि चिकचिक करती बीवी,’’ विरेश की ये बातें सीधे करुणा के दिल में दर्ज हो गईं.

‘‘ठीक ही तो कह रहे हैं,’’ अनचाहे ही उस के दिमाग में अपने परिवार की वृद्धाओं की यादें घूमने लगीं. सच, कटौती ने उन्हें चिड़चिड़ा बना छोड़ा था. फिर जब संतानें पैसों को अपनी इच्छापूर्ति में लगातीं तब वे कसमसा उठतीं उन का जोड़ा हुआ पाईपाई पैसा ये फुजूलखर्ची में उड़ा रहे हैं. उस पर ज्यादती तो तब होती जब आगे वाली पीढि़यां पलट कर जवाब देतीं कि किस ने कहा था कटौती करने के लिए.

जिस काम में पूरा परिवार खुश हो रहा है, उस में बचत का पैबंद लगाना कहां उचित है? आज विरेश ने करुणा के दिल से कटौती और बेवजह के त्याग का भारी पत्थर सरका फेंका था.

लौटते समय भारतीय एयरपोर्ट पहुंच कर करुणा ने हौले से विरेश के कान में कहा, ‘‘सोच रही हूं ड्यूटीफ्री से एक पश्मीना शौल खरीद लूं अपने लिए.’’

‘‘ये हुई न बात,’’ विरेश के ठहाके पर आगे चल रहे दंपतियों का मुड़ कर देखना स्वाभाविक था.

आखिर पकड़ा गया गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई का भाई! सलमान के फैंस को मिली राहत

गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है. लौरेंस बिश्नोई इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है और इस सुर्खियों की शुरुआत उस समय हुई जब उसके कहने पर बिश्‍नोई गैंग ने मशहूर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसे वाला की हत्या की. लौरेंस पिछले कुछ समय से गुजराज की साबरमती जेल में बंद है और जेल के अंदर से ही वह अपने पूरे गैंग को औप्रेट करता है.

लौरेंस बिश्नोई की गैंग में लगभग 700 से भी ज्यादा शूटर्स हैं जिन्हें वे जब चाहे तब किसी को भी मारने का आदेश देकर कोई भी घटना को अंजाम दे सकता है. पिछले कुछ दिनों से लौरेंस बिश्नोई और भी ज्यादा सुर्खियों में है जब से उसने बौलीवुड मेगास्टार सलमान खान को जान से मारने की धमकी दी है. आपको बता दें कि एक्टर सलमान खान को धमकी देने के बाद से मुंबई ट्रैफिक पुलिस के पास लौरेंस के भाई होने का दावा कर रहे एक इंसान के लगातार धमकी भरे मैसेज आ रहे थे कि या तो सलमान खान 5 करोड़ रूपए दे या फिर बिश्नोई समाज के मंदिर में आकर काले हिरण का शिकार करने के लिए माफी मांगे.

इन सब के बीच सलमान खान और उनका पूरा परिवार काफी डरा हुआ दिखाई दे रहा था और यह डर तब और ज्यादा बढ़ा जब लौरेंस बिश्नोई ने सलमान खान के खास दोस्त और एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या करवाई थी. इस हत्या के बाद सलमान खान और उनका परिवार काफी ज्यादा घबरा गया था और इसी के चलते एक्टर ने ना सिर्फ अपनी सिक्योरिटी बढ़ाई बल्कि अपने लिए दुबई से स्पैशल 2 करोड़ की बुलेट प्रूफ गाड़ी भी इम्पोर्ट करवाई.

आपको जान कर खुशी होगी कि जो व्यक्ति मुंबई ट्रैफिक पुलिस को लगातार धमकी भरे मैसेज भेज रहा था उसे कर्नाटक से अरैस्ट किया जा चुका है और उसका नाम भीखाराम बताया जा रहा है. दरअसल, लौरेंस बिश्नोई के भाई होने का दावा कर रहे इस शख्स का लौरेंस और बिश्नोई समाज से दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. भीखाराम लोहे की जालियां बनाने का काम करता है और उसने यह सब सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए किया था.

यह शख्स राजस्थान के जालोर जिले के सांचौर कस्बे का रहने वाला है और वह कर्नाटक 1 महीने पहले ही काम करने आया था. इस खबर के बाद से सलमान खान के फैंस को काफी राहत मिली है लेकिन देखा जाए तो सलमान खान पर से खतरा अभी टला नहीं है.

मधु और प्रमिला के लिए इमरजैंसी का प्रतिकार प्रेम

बात 26 जून, 1975 की है. देश पर आपातकाल थोप दिया गया था. इंदिरा गांधी सुप्रीम लीडर थी. तमाम विरोधी दलों के नेता जेलों में बंद थे. इस इमरजैंसी का विरोध सोशलिस्ट लीडर मधु दंडवते और उन की पत्नी प्रमिला दंडवते ने भी किया था, जिस का अंजाम यह हुआ कि उन्हें आपातकाल खत्म होने तक जेल हुई. मधु को बेंगलुरु सेंट्रल जेल में और लगभग 900 किलोमीटर दूर प्रमिला को यरवदा सेंट्रल जेल में बंद किया गया.

सवाल यह कि इंसानों को कैद किया जा सकता है पर क्या प्रेम को किया जा सकता है? इस का जवाब इन दोनों के उन पत्र व्यवहार ने दिया जो न तो इन के बीच की दूरी की बाधा बनी या न निराशा का कारण. बल्कि इस मुश्किल समय में इन दोनों का प्रेम एक दूसरे के लिए और भी गहरा होता गया.

कैद के दौरान मधु और प्रमिला ने एकदूसरे को लगभग 200 लैटर्स लिखे. एक विचारधारा से आने वाले इस कपल ने इन लैटर्स में एकदूसरे से संगीत, पुस्तकों, कविता और फिलौसफी पर चर्चा की. यही नहीं उन्होंने इस सवाल से भी निपटने की कोशिश की कि क्या आजादी के बिना प्रेम संभव है?

एजुकेशनिष्ट ज्ञान प्रकाश ने ‘इमरजेंसी क्रौनिकल्स : इंदिरा गांधी एंड डैमोक्रेसीज टर्निंग प्वाइंट’ में मधु और प्रमिला के लैटर्स पर स्टडी की. उन्होंने अपने कन्क्लूजन में लिखा, “दोनों के बीच हुए लैटर्स कम्युनिकेशन से प्रेम के दर्द को बयां करते हैं और साथ ही साथ उन्होंने फ्रीडम को ले कर अपनी कमिटमैंट को प्रेम के इमोशनल बांड से दिखाने का काम किया. वे एकदूसरे से प्यार करते थे क्योंकि वे आजादी से प्यार करते थे. उन के प्रेम ने आजादी के अर्थ को भी मजबूत और विस्तार दिया.”

मधु और प्रमिला की शादी 1953 में हुई. इमरजैंसी के हालातों में भी वे टूटे नहीं बल्कि एकदूसरे के साथ रहने के लिए उत्साहित थे. जेल और सेपरेशन ने दोनों के प्रेम को और बढ़ा दिया. प्रमिला ने मधु को एक पत्र में लिखा, “क्या तुम ने जीवन में पहले कभी मुझे इतने नियमित रूप से लैटर लिखे हैं?” वह आगे कहती हैं, “मुझे याद है आप लंबे दौरों पर चले जाते थे और महीनों तक नहीं लिखते थे. जब कोई आप के बारे में पूछता था तो मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस होती थी. मेरे पास उन्हें बताने के लिए कुछ नहीं होता था. लेकिन अब हमें देखो… आप बिना किसी समस्या के मुझे हर सोमवार को लिखते हैं. आपातकाल को धन्यवाद.” यह वार्तालाप बताता है कि दोनों अपने प्रेम को इमरजैंसी में एंजोय कर रहे थे. वे अपने लैटर से जता गए कि इमरजैंसी का प्रतिकार प्रेम ही था.

जिस दौरान वे जेल में बंद थे उस दौरान उन का इकलौता बीटा उदय देश के प्रेस्टीजीयस इंस्टिट्यूट ‘नेशनल इंस्टिट्यूट ओफ डिज़ाइन’ में पढ़ रहा था. प्रमिला ने अपने पत्रों में अपने बेटे के लिए चिंता भी जताई . उन्होंने एक पत्र में लिखा, “हमारा अपने के लिए कुछ नहीं कर सकते. हम ने उन में अपने मूल्यों को विकसित करने का प्रयास किया लेकिन इस से पहले कि वह पूरी तरह से तैयार होता, इस से पहले कि उस के पंखों में ताकत आती, हम ने उसे छोड़ दिया, उसे खुद की देखभाल करने, अपना जीवन बनाने के लिए छोड़ दिया.” प्रमिला ने अपने एक पत्र में लिखा, “उस के मातापिता जीवित हैं मगर वह एक अनाथ कि तरह है.”

इमरजैंसी के इन मुश्किल पलों में जबजब कोई नाउम्मीदी और निराशा से भरता, दोनों में से कोई न कोई एकदूसरे को सहारा बन ही जाता. बेटे व जेल से निकलने के बाद नाउमीदी से भरी जिंदगी को ले कर प्रमिला की चिंताओं को ले कर मधु कहते हैं, “तुम्हारे आखिरी पत्र पर दुख की छाया थी. तुम ने कहा था कि ‘जब तक हम यहां से निकलेंगे तब तक हमारा घर और जीवन एक साथ पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे और आप नहीं जानते कि आप के पास यह सब दोबारा करने की ताकत और दृढ़ता है या नहीं.’ तुम्हारी टिप्पणी मुझे बेहद निराशाजनक लगी. हम ने हमेशा अपने जीवन को एक साथ अपनी पीठ पर ढोया है. जब तक हमारी रीढ़ अपनी जगह पर है, कौन संभवतः हमारे जीवन को एक साथ छू सकता है?”

यह प्रेम का जरुरी पहलु है कि आप बुरे समय में एक साथ खड़े रहते हैं. डिजिटल एरा में ‘प्रेम क्या है’ यह आज के युवा कितना बेहतर जानतेसमझते हैं यह पता नहीं, मगर एक बात पक्की है कि वे मधु और प्रमिला दंडवते की तरह अपनी भावनाओं को एक्सप्रैस करने के लिए एसी कमरों में चार शब्द नहीं लिख सकते.

व्हाट्सऐप पर घंटों चैटिंग करने वाले युवा कपल्स मुमकिन है कि ‘प्रेम क्या है’ के जवाब में शारीरिक वासना और स्टेटस पाने का जरिया ही प्रेम बताए, पर डिजिटल एरा से पहले इस सवाल के कईयों सुंदर जवाब दिए जा चुके हैं.

हालांकि प्रेम की कोई सीमित परिभाषा नहीं, कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती, इस के बावजूद तमाम प्रेम गाथाओं से एक मुक्कमल जवाब आखिरकार यही समझ आता है कि प्रेम इंसान को बेहतर बनाती है. लालच, डर, नफरत से आजाद करती है, त्याग और साहस सिखाती है.

फिर भी सवाल आता है कि आजादी के बिना प्रेम क्या है? क्या कोई पहरा प्रेम को रोक सकती है? इसे फ्रीडम फाइटर रहे मधु दंडवते और प्रमिला के 18 महीने लंबे चले उस टाइम पीरियड से समझा जा सकता है जिन्होंने बाताया कि इंसान भले जंजीरों में बंधा हो मगर प्रेम को जंजीरों में नहीं बांधा जा सकता.

मैं चाहता हूं कि मेरी होने वाली पत्नी मेरी भाभी की तरह हो.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं 27 साल का युवक हूं और नीमच का रहने वाला हूं. मेरे घर वाले चाहते हैं कि मेरी शादी जल्द से जल्द हो जाए, क्योंकि मेरे बड़े भाई के बाद अब मैं ही हूं जिस की शादी के लिए सब ऐक्साइटिड हैं. मेरे बड़े भाई की पत्नी यानी मेरी भाभी बहुत ही गुणवान हैं. वे दिखने में बहुत ही ज्यादा खूबसूरत हैं, पढ़ीलिखी भी हैं. वे हर बात को सोचसमझ कर बोलती हैं, बड़ों की इज्जत करना भी जानती हैं और मेरे भाई से काफी प्यार करती हैं. इस से ज्यादा और एक मर्द को क्या ही चाहिए होता है अपनी पत्नी में? इसी वजह से मैं भी चाहता हूं कि मेरी होने वाली पत्नी मेरी भाभी की ही तरह हो. लेकिन मेरे लिए अभी तक जितने भी रिश्ते आए हैं, उन में से कोई भी लड़की मेरी भाभी की तरह नहीं थी. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

मैं आप की फीलिंग्स अच्छे से समझ सकता हूं. हर इंसान को लगता है कि उन की पत्नी में सारे गुण होने चाहिए और आप की सोच गलत नहीं है, लेकिन आप को एक बात समझनी चाहिए कि हर लड़की अपनेआप में अलग होती है. हर इंसान में कुछ अच्छा तो कुछ बुरा होता ही है. हो सकता है आप की भाभी में भी कुछ ऐसा हो जो आप को न पता हो और आप को सिर्फ उन की अच्छाई के बारे में ही पता हो.

हर लड़की अपने आप में स्पैशल होती है तो अगर आप इसी सोच के साथ किसी लड़की से मिलेंगे कि वह आप की भाभी की तरह होनी चाहिए, तो आप को कोई भी लड़की पसंद नहीं आएगी,क्योंकि उस समय आप के मन में तुलना के भाव चल रहे होंगे. आप जिस भी लड़की से मिलें उस से यह सोच कर मिलें कि वह आप के साथ किस तरह से रहेगी. क्या आप उसे वही प्यार दे पाओगे जो वह चाहती है? और तो और आप उस लड़की के साथ अपनी फीलिंग्स भी शेयर कर सकते हैं.

आप उस लड़की को बता सकते हैं कि आप अपनी होने वाली पत्नी से क्या ऐक्सपैक्ट कर रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ आप भी उस लड़की से पूछें कि उसे अपने पति के रूप में कैसा लड़का चाहिए. ऐसी बातें करने से आप दोनों को एकदूसरे के विचार पता चल जाएंगे और फिर आप असानी से तय कर पाएंगे कि आप उस लड़की के साथ जिंदगी बिता पाएंगे या नही.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

तिमोथी : क्या थी तिमोथी की कहानी

लेखक- डा. आरएस खरे

कार से उतर कर जैसे ही घर में कदम रखा तो ‘टिकटौक, टिकटौक टिकटौक’ की आवाजें सुनाई दीं. अपना औफिस बैग सोफे पर रखते हुए मैं ने कमरे में झांक कर देखा तो तिमोथी घोड़ा बनी हुई थी और उस की पीठ पर रुद्राक्ष घुड़सवार.

रुद्राक्ष मेरा बेटा. है तो अभी 5 साल का, पर बेहद शरारती. तिमोथी को न तो कोई काम करने देता है और  न ही अपने पास से हटने देता है.

किंडर गार्डन से दोपहर 2 बजे आ कर शाम 5 बजे जब तक मैं औफिस से नहीं आ जाती, तिमोथी के साथ मस्ती करते रहना उस का रोज का शगल बन गया है. कभी उसे घोड़ा बनाता है, तो कभी हाथी और कभी ऊंट बना कर उस पर सवारी करता है.

आज तो हद ही कर दी उस ने. तिमोथी, जो मेरे घर पर पहुंचते ही मेरे लिए कौफी बनाने किचन में भाग कर जाती थी, उसे वह उठने ही नहीं दे रहा था, “नो, शी इज माय हौर्स, आई विल नौट एलाऊ टू मूव हर.”

बड़ी मुश्किल से माना वह, जब तिमोथी ने प्यार से समझाया कि वह मम्मा के लिए कौफी बनाने यों गई और यों वापस आई, 2 मिनट में.

“नो, नौट टू मिनट, वन मिनट ओनली,” रुद्राक्ष चीखते हुए बोला.

“ओके बाबा,” कहती हुई  तिमोथी तेजी से किचन की ओर भागी, कौफी बनाने.

3 महीने पहले दिलीप और मैं जब कंपनी की ओर से डेपुटेशन पर सिंगापुर आए थे, तब उस समय हमारी सब से बड़ी चिंता यही थी कि रुद्राक्ष सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक तो किंडर गार्डन में रहेगा, पर उस के बाद हम लोगों के औफिस से शाम को घर आने तक कोई विश्वास योग्य ‘आया’ मिल पाएगी या नहीं? एक और कठिनाई यह भी थी कि रुद्राक्ष या तो अंगरेजी बोलता था या हम लोगों की मातृभाषा ‘तमिल’. इसलिए ऐसी  आया चाहिए थी, जो उस की बोली समझ सके.

सिंगापुर पहुंचते ही हम लोगों ने ऐसी एजेंसियां खोजनी शुरू कीं, जो घरेलू नौकरानियां और आया जरूरत के अनुरूप चयन कर उपलब्ध कराती थीं.

दिलीप के साथ जब मैं ने ऐसी ही एक एजेंसी से संपर्क किया, तो उन्होंने एक कंसल्टेंट को हम लोगों के पास भिजवाया. कंसल्टेंट ने आ कर हमारे अपार्टमेंट का मुआयना किया और फिर हमारी जरूरतों संबंधी अनेक प्रश्न पूछे. संतुष्ट हो जाने पर उस ने 2-3 दिन का समय मांगा और इंतजार करने का अनुरोध किया.

2 दिन बाद ही वह एक ‘आया’ को अपने साथ ले कर आया. फिर परिचय कराते हुए वह बोला, “यह तिमोथी है. फिलिस्तीनी कैथोलिक ईसाई. पिछले माह तक ये आप के जैसे ही दक्षिण भारतीय सरनन सर के यहां घरेलू काम और बच्चे की देखभाल करती थी. उन के चेन्नई चले जाने से इस को नया काम चाहिए  था. ये दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाने में भी निपुण  है. मेरे खयाल से आप को जिस तरह की ‘आया’ की जरूरत है, तिमोथी उस के लिए पूरी तरह उपयुक्त होगी.”

तकरीबन 55 से 60 साल की उम्र के मध्य की सौम्य सी दिखने वाली इस महिला में मुझे प्रथम दृष्टि में ही आकर्षण के साथसाथ ममत्व की झलक दिखी. उस ने कुछ समय में ही रुद्राक्ष को गोद में ले कर अंगरेजी में बात की, तो रुद्राक्ष थोड़ी ही देर में उस से इतना घुलमिल गया,  जैसे उसे पहले से जानता हो.

दिलीप से मैं ने तमिल में खुसरफुसर कर उन की राय ली तो वे संतुष्ट लगे. हम लोगों की सहमति होने पर कंसल्टेंट ने एक कौंट्रेक्ट फार्म भरा और तिमोथी को दिए जाने वाले वेतन और अवकाश संबंधी नियमों को हमें समझाया.

अगले ही दिन तिमोथी ने हमारे आवास के साथ बने सर्वेंट क्वार्टर में शिफ्ट कर लिया और घर के सारे काम संभाल लिए.

मैं जल्दी ही समझ गई कि उसे ज्यादा कुछ समझाने की जरूरत नहीं है. उसे दक्षिण भारतीय परिवार की सभी परंपराओं व रुचियों का ज्ञान है. संभवतः सरनन सर के यहां काम करतेकरते वह तमिल परिवारों की सभी विशेषताएं जान चुकी थी. शंका दूर करने के लिए  एक दिन मैं ने पूछ ही लिया,  तो उस ने बताया कि उस के देश फिलीपींस में मेड सर्वेंट और आया के काम के प्रशिक्षण के लिए अनेक ट्रेनिंग सेंटर खुले हुए हैं. ऐसे ही एक प्रशिक्षण केंद्र में उस ने भी प्रशिक्षण लिया था. फिर सरनन मैडम ने उसे धीरेधीरे सबकुछ सिखा दिया. अब उसे भारतीय त्योहार और रीतिरिवाज बहुत अच्छे लगते हैं.

तिमोथी की वाणी में तो मधुरता थी ही, उस के हाथों में भी हुनर था. वह इतना स्वादिष्ठ भोजन बनाती थी कि हम लोगों की डाइट में वृद्धि हो चली थी.

दिलीप तो तिमाथी के बनाए सांभर के दीवाने थे. वे अकसर कहते कि जैसा मां सांभर बनाती थी, वैसा ही तिमोथी भी बनाती है.

तिमोथी को खाली बैठना अच्छा नहीं लगता. वह कोई काम न भी हो तो भी काम निकाल कर करने बैठ जाती. उसे काम करते देख मुझे अपनी मां की याद आ जाती. वे भी ऐसे ही दिनरात काम में जुटी रहती हैं. मैं ने मां को आज तक आराम करते देखा ही नहीं.

तिमोथी वे सब काम भी करती जो ‘कौंट्रेक्ट’ में नहीं थे. ऐसा लगता जैसे व्यस्त रह कर वह कोई अपना ‘गम’ भुलाने की कोशिश करती रहती है. अधिकांश समय उस का चेहरा भावशून्य रहता. रुद्राक्ष के साथ खेलते हुए जरूर उस के चेहरे पर मुसकान रहती,  अन्यथा बाकी समय तो उस का चेहरा सपाट दिखता जैसे शून्‍य में कुछ खोज रही हो.

कई बार मैं ने जानने की कोशिश की, पर हर बार वह टाल जाती. तिमोथी से हम लोगों की बातचीत अंगरेजी में होती. वह अंगरेजी समझ तो अच्छी तरह से लेती थी,  पर बोलने में कहींकहीं अटकती थी.

प्रत्येक रविवार सुबह वह बिना नागा चर्च जाती और जब लौटती तो कुछ घंटों के लिए अपनेआप को कमरे में बंद कर लेती. जब वह बाहर निकलती तो उस की आंखों में हलकी सी लाली के साथ सूजन दिखती.

ऐसे ही एक रविवार को उस के चर्च से वापस आ जाने पर मैं ने उस की खिड़की से छुप कर देखा तो मैं अवाक रह गई.

तिमोथी फ्रेम में मढ़ी हुई एक तसवीर को सीने से लगाए सुबकसुबक कर रो रही थी. काफी देर तक तो मैं सोचती रही, पर जब मुझ से नहीं रहा गया तो मैं दरवाजे को धकेलते हुए  अंदर चली गई. मैं ने जैसे ही उसे चुप कराने के लिए गले लगाया, तो वह बिलखबिलख कर रो पड़ी.

काफी देर तक रो लेने के बाद मैं ने उसे पानी का गिलास देते हुए कहा, “तिमोथी, तुम मेरी मां जैसी हो. क्या कोई मां अपनी पीड़ा अपनी बेटी से साझा नहीं करेगी? दुख व्यक्त कर देने से दिल हलका हो जाता है.

फिर तिमोथी ने जो बताया,   वह बड़ा ही हृदयविदारक था-

‘तिमोथी का भरापूरा खुशहाल परिवार था. पति वर्गिस लून शहर के सिविल अस्पताल में डाक्टर थे. बेटा मार्कोस ने इंजीनियरिंग की डिगरी के बाद एमबीए ज्वाइन किया था. बहू सिल्विया, जिस का विवाह एक वर्ष पूर्व ही हुआ था,  पोते कार्लोस को हाल ही में जन्म दिया था.

‘फिलीपींस में भूकंप तो अकसर आते ही रहते थे, पर 15 अक्टूबर, 2013 को जो भूकंप आया, उस ने अनेक शहर उजाड़ दिए. सब से ज्यादा उस के लून शहर में विनाश हुआ. पूरा शहर ही ध्वस्त हो गया और हजारों लोग मारे गए. अस्पताल भवन के धराशाई होने से सैकड़ों मरीजों के साथसाथ उस के पति डाक्टर वर्गिस भी मलबे में दब गए थे, जिन्हें जीवित नहीं निकाला जा सका. तिमोथी का मकान भी ढह गया था, पर वे लोग जीवित बच गए थे.

‘मार्कोस ने जब अपने पिता की क्षतविक्षत लाश देखी, तभी से विक्षिप्‍त सा हो गया है. उस के उपचार पर पिछले 4-5 सालों में तिमोथी ने अपना सबकुछ लगा दिया.

‘डाक्‍टर अभी भी कहते हैं कि मार्कोस ठीक हो जाएगा, थोड़ा समय और लगेगा.

‘सिल्विया को यद्यपि चर्च में नौकरी मिल गई है, पर बेटे के महंगे उपचार के लिए  यह पर्याप्त नहीं होने से तिमोथी को आया की नौकरी करनी पड़ रही है.

‘लून की बहुत सी भूकंप प्रभावित महिलाएं सिंगापुर में घरेलू नौकरानी का काम कर रही हैं. यहां सिंगापुर में वेतन अच्छा मिलता है और साथ में एक माह का सवैतनिक अवकाश भी.

‘तिमोथी साल में एक बार एक माह के लिए लून जाती है. पोता कार्लोस दादी को छोड़ता ही नहीं. जब रोते हुए पोते को छोड़ कर वापस सिंगापुर तिमोथी आती है, तो कई दिनों तक वह बेचैन रहती है.

‘एक बार मार्कोस स्वस्थ हो जाए, तब वह रूखासूखा खा कर गुजारा कर लेगी,  पर पोते को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी, कभी नहीं.’

तिमोथी की दुखभरी व्यथा सुन कर पवित्रा को जोर से रोना आया और वह तिमोथी से लिपट कर देर तक सिसकती रही.

तिमोथी ने बेटी की तरह उसे भींच कर सीने से लगा लिया. वहां अब सिर्फ दो प्रेम भरी आत्माएं थीं- मां और बेटी के रूप में. न कोई मालकिन, न कोई आया. न कोई भारतीय, न फिलीपिनी, न ही कोई हिंदू, न कोई ईसाई.

मन आंगन की चंपा

सुभद्रा वैधव्य के दिन झेल रही थी. पति ने उसके लिए सिवाय अपने, किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी. यही था उसके सामने एक बड़ा शून्य! यही था उसकी आँखों का पानी जो चारों प्रहर उमड़ता घुमड़ता रहता. वह जिस घर में रहती है, वह दुमंजिला है. उसने निचले हिस्से सुभद्रा ने किराए पर दे दिए हैं. बाजार में दो दुकानें भी हैं उनमें एक किराए  पर है तो दूसरी बन्द पड़ी है. गुजारे भर से अधिक मिल जाता है, बाकी वह बैंक में जमा कर आती है. जमा पूँजी की न जाने कब जरूरत आन पड़े, किसे पता? वह पति की कमी और खालीपन से घिरी होकर भी जिंदगी से हारना नहीं चाहती.

कहने भर को रिश्तेदारी थी लेकिन न अपनत्व था और न ही सम्पर्क. माँबाप  स्वर्ग सिधार गए थे. पति के बड़े भाई थे जो कनाडा बस गए. न कभी आए और न कभी उनकी खबर ही मिली. एक ननद थी अनीता, सालों तक गर्मियों के दिनों में आती बच्चों के झुंड के साथ. छुट्टियाँ बिताती फिर पूरे साल अपने में ही मस्त रहती. कभी कुशलक्षेम पूछने की ज़हमत न उठाती. जिन दिनों उसका परिवार आता, उन दिनों सुभद्रा को लगता जैसे उसकी बगिया में असमय बसंत आ गया हो. सुभद्रा अपनी पीड़ा को भूल जाती. उसे लगता, धीरे-धीरे ही सही उसकी छोटी सी दुनियाँ में अभी भी आशाओं की कोंपले खिल रही हैं. अनीता, उसका पति निर्मल और तीनों बच्चे घर में होते तो सुभद्रा के शरीर में अनोखी ताकत आ जाती. सुबह से रात तक वह जी जान से सबकी खिदमत में जुटी रहती. बच्चों की धमाचौकड़ी में वह भूल जाती कि अब वह बूढ़ी हो रही है. कब सुबह हुई और कब शाम, पता ही नहीं चलता!

इन सबके पार्श्व में प्रेम ही तो था जिसके कोने में कहीं आशाओं के दीप टिमटिमाया करते हैं! जब बच्चों के स्कूल खुलने को होते, तब सुभद्रा के चेहरे पर उदासी की रेखाएँ उभरने लगती. छुट्टियाँ समाप्त होती और सबके प्रस्थान करते ही, फिर वही घटाटोप सन्नाटा, वही पीड़ और एकाकीपन उसे घेर कर बैठ जाते. मानो कहते हों, सुभद्रा तुम्हारे लिए हम हैं और तुम हमारे लिए! उम्र  बेल की तरह बढ़ती रही और सुभद्रा ६५ वर्ष पार कर गई. अनीता का आना-जाना भी बंद हो गया. कभी-कभी उसे अपने इस समर्पित भाव पर क्षोभ होता, कभी हंसी आती. फिर सोचती ननद के प्रति उसका कर्तव्य है. उसे रिश्ते निभाने हैं लेकिन सीमा निर्धारित उसे ही करनी है. एक हाथ से ही कहाँ ताली बजती है! प्रेम जीवन का आधार है. यदि प्रेम ही एकांकी रह जाय या उसकी अवहेलना होती रहे तब अवसाद जन्म लेता है, बिखराव आता है और उद्विग्नता भी. यही हो रहा था उसके साथ.

यदाकदा कस्बे की हमउम्र महिलाएं घर पर मिलने आ जाती. जी हल्का हो जाता. मिल बैठकर अपने-अपने दुख दर्द बांटने का इससे अच्छा उपाय उसे कोई दूसरा नहीं लगा. सुभद्रा बहुत मिलनसार थी. कस्बे में उसे भरपूर सम्मान मिलता. सभी से प्रेम से मिलती. असहाय मिल जाते तो उनकी मदद करने से नहीं चूकती. हिसाब-किताब में भी सुलझी हुई थी वह. उसकी सबसे अधिक पटती थी लीला से. वह कस्बे के संपन्न व्यवसायी की पत्नी थी. लीला थी बहुत ही व्यवहार कुशल , सुभाषणी और सुभद्रा की शुभचिंतक. बरसों की मित्रता थी और एक दूजे के सुखदुख की सहचर. उसने सुभद्रा को कई बार बंद पड़ी दुकान खोलने का सुझाव दिया. सुभद्रा टालती रही. क्या करेगी वह इस बुढ़ापे में! पैसा है, इज्जत है, हितैषी हैं और कितना चाहिए उसे? कई दिनों के बाद एक दिन लीला अचानक घर पर आ गई.

सुभद्रा का चेहरा घने बादलों के बीच से निकलते सूरज की तरह चमचमाने लगा. वह खुशी से बोल पड़ी, ”गनीमत है आज तुझे मेरी याद आ ही गई! देख, सुभद्रा अभी जिंदा है मरी नहीं.” “बहुत व्यस्त रही इस बीच, पोता पोती के साथ. बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया था.” “अरे मैं तो मजाक में कह गई. बैठ पानी लाती हूँ, थक गई होगी.” सुभद्रा बोली तो लीला मुस्करा दी. “मेरा कहा बुरा तो नहीं लगा, अपना मानती हूँ इसीलिए कह गई. ” “नहीं रे, तू मेरी सहेली ही नहीं बहिन भी है, तू डाँटेगी भी तो सुन लूंगी,” लीला हँस दी. “तभी तो तू मेरे दिल में कुंडली डाले बैठी है.” सुभद्रा उठने का उपक्रम करती हुई बोली. लीला जोरों से खिलखिलाने लगी फिर थोड़ी देर बाद गम्भीर हो गई,” कुछ फैसला किया तूने दुकान खोलने का?” “समझ में नहीं आ रहा, एक औरत जात के लिए इस उम्र में इतनी जिम्मेदारी वाला काम! फिर चले न चले.” आजकल औरतें मर्दों से कम हैं क्या? देख, दुख पीछे देखता है लेकिन आशा हमेशा आगे देखती है. समय निकाल कर दुकान में बैठना शुरू कर   वह तो सब ठीक है लेकिन भागदौड़ नहीं हो पाएगी! पहले जैसी ताकत कहाँ है अब!

“कोशिश करेगी तो सब हो सकता है. दुकान के लिए रेडीमेड गारमेंट्स मैं मंगवा दिया करूंगी   अच्छा जैसी तेरी इच्छा,  सुभद्रा ने सहमति में सिर हिलाया.   सच कह रही है ना? चलना-फिरना करोगी तो उल्टा फायदा ही होगा,   लीला ने समझाया. बातें करते करते सुभद्रा चाय भी बना लाई. लीला कुछ घण्टे उस के पास बैठ कर अपने घर चली गई. लीला का मन रखने के लिए उसने दुकान की साफ सफाई करवा दी. कुछ ही दिनों में लीला ने अपने पति से कहकर लुधियाना से होजरी का सामान मंगवा लिया. अब पुराने रैक, काउंटर इत्यादि रंग रोगन के बाद खिल उठे थे, रेडीमेड कपड़ों और रंग बिरंगी ऊनी स्वेटरों से दुकान सज गई. धीरे धीरे खरीददार भी आने लगे. उसे यह सब देख कर अच्छा लगने लगा. इस बहाने इसका आसपास के लोगों से मेल मिलाप भी बढ़ गया और मन को आनंद की जो अनुभूति मिली सो अलग. दिन ढलते लगता तो वह हिसाब किताब निपटा कर घर आ जाती. लोग उम्र के बढ़ते ही हौसला छोड़ने लगते हैं और वह हौसला जोड़ने में लग गई. लीला का सम्बल ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी. कुछ वर्ष फिर शांति से कट गए. कस्बे के लोगों की नजर में सुभद्रा का कद और बढ़ गया. कस्बे के लोग उसके अपने ही तो थे, सुखदुख के सहचर. कस्बे के लोगों में उसे अपना परिवार सा दिखाई देता. किसी की दादी, किसी की बुआ, तो किसी की चाची, कितने सारे रिस्ते बन गए थे उसके! हाँ, एक ननद ही थी जो रिस्ता निभाने में कंजूस निकली. एक दिन अचानक निर्मल सीधे दुकान पर आ धमका. उन दिनों तबीयत ठीक नहीं थी सुभद्रा की. ननदोई की सेवा करने की क्षमता भी नहीं थी. सुभद्रा ने विवश स्वर में कहा,   अनीता को साथ लाते तो तुम्हारे खाने पीने का ख्याल रखती. दुकान खुली रखना भी मेरी मजबूरी है   आना तो चाहती थी लेकिन बच्चों के एग्जाम हैं. वैसे मैं शाम तक लौट जाऊँगा   ऐसा भी क्या काम आ गया अचानक,   सुभद्रा उसे कुरेदने लगी. एकबारगी वह झिझका, फिर धीरे से बोला,   मदद चाहिए थी इसीलिए आपके पास आया हूँ   कैसी मदद, मैं कुछ समझी नहीं ?   सुभद्रा ने निर्मल की ओर देखा. उसकी आँखों की झिझक ने उसके अंदर का भेद कुछ हद तक उजागर कर दिया.

दो लाख रुपयों की जरूरत आ पड़ी है. अनीता ने जिद्द की कि आप से मिल जाएंगे कुछ समय के लिए सुभद्रा के होंठों पर फीकी मुस्कराहट आकर टिक गई. दुनियां में लोग स्वार्थ  के लिए अपना सम्मान और प्रेम तक को ताख में रख देते हैं. सच्चा प्रेम होता उसके दुख को भी समझते, उसकी तकलीफ़ पूछते सुभद्रा का मन खट्टा हो गया लेकिन प्रेम अपनी जगह कायम था, ननदोई है आखिर. अनिता जैसी भी है, अपनी है. उसने उम्मीद से ही मेरे पास भेजा है. न दूँ तो अपनी ही नजर में गिर जाऊँगी! सुभद्रा थोड़ी पढ़ीलिखी थी. उसने २ लाख के चेक में हस्ताक्षर कर के निर्मल को पकड़ा दिए. शाम तक वह खुशी खुशी लौट गया. सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि एक वह दिन गुसलखाने से बाहर निकलते समय फिसल गई. जांघ की हड्डी फ्रैक्चर हो गई. गनीमत थी कि गिरने की आवाज निचली मंजिल में किराएदार को सुनाई दे गई. इतवार भी था किरायेदार की छुट्टी थी. वह तेजी से ऊपरी मंज़िल में गया. दरवाजे खुले थे. उसने आसपास के लोगों की मदद से सुभद्रा को अस्पताल पहुँचाया. कई दिन अस्पताल में गुजारने के बाद वह अस्पताल से लौटी. घर में कैद हो गई थी वह. दर्द इस कदर कि उसका बाहर निकलना तो दूर वॉकर के सहारे घर के भीतर ही चल पाना कठिन होता. अनीता को भी अपना हाल बताया लेकिन कोई नहीं आया.

एक दो दिन फोन पर हालचाल पूछे थे बस! एक दिन लीला आई, दोपहर का खाना लिए. सुभद्रा बिस्तर से उठना चाहती थी लेकिन उससे उठा नहीं गया.   लेटी रहो, ज्यादा हिलो डुलो मत. खाना लेकर आई हूँ,   लीला बोली.   क्यों कष्ट किया. पड़ोसी दे जाते हैं, बहुत ध्यान रखते हैं मेरा   याद है आज तेरा जन्मदिन है. मीठा भी है, तुझे गुलाबजामुन पसन्द हैं ना?     तुझे कैसे पता?   वह आश्चर्यचकित होकर बोली.   तूने ही तो बताया था कि मैं बसंतपंचमी के दिन हुई थी सुभद्रा हँसने लगी,   जन्मदिन किसे याद है और क्या करना है याद कर के!     क्यों? अपने लिए कुछ नहीं लेकिन उस दिन माँ बाप के लिए कितना बड़ा दिन रहा होगा!     हम्म….    वह ख्यालों की दुनियाँ में चली गई. लीला कुछ सोचते हुए बोल पड़ी,   सुभद्रा तेरी ननद नहीं आई तुझे देखने?   उसने निराशा से गर्दन हिलाई,   फोन किया था उसे. कम से कम अपने पति को ही भेज देती तो थोड़ी मदद मिलती. खैर, जो बीत गया सो बीत गया इसी बहाने अपने पराए का भेद मिल गया,   सुभद्रा ने दुखी होकर लम्बी निःश्वास छोड़ी और चुप हो गई.   छोड़ इन सब बातों को, चल पहले तुझे खिला देती हूँ सुभद्रा तो भीतर ही भीतर विषाद से भर चुकी थी.

लीला ने क्या कहा उसके कानों के पास से निकल गए.   क्यों नहीं किसी जरूरतमंद लड़की को रख लेती अपने पास. उसका भी भला होता और तुझे भी दो रोटियाँ मिल जातीं. कौन जाने कब किसी तरह की जरूरत आन पड़े   हाँ बहुत बार सोचा इस बारे में,   वह भोजन शुरू करते हुए वह बोली,  एक लड़की है मेरे गाँव में   तो बुला क्यों नहीं लेती उसे?     ठीक ही कह रही है तू   सोच मत बुला ले जल्दी. कितनी उमर की होगी?   होगी कोई ३०-३२ की, शादीशुदा. लड़की बहुत भोली और संस्कारी है. एक बेटा भी है ८ साल का. बेचारी की किस्मत देखो, इतने पर भी उसका पति उसे छोड़कर किसी दूसरी के साथ भाग गया   ओह! बहुत बुरा हुआ उसके साथ. तू कहे तो मैं किसी को गाँव भेज दूँ?     ना रे, वही आ जाती है घर पर. जब से मेरा यह हाल हुआ है कई बार आ चुकी है. कभी दूध तो कभी सब्जी दे जाती है. खाना भी पका कर खिला जाती है. गरीब है लेकिन दिल की बहुत अमीर है   तभी तो कहा है कि जिसकी नाक है उसके पास नथ नहीं है और जिसके पास नहीं है उसके पास नथ है तभी एक सांवली सी युवती बच्चे के साथ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई.   देख, जिसे सच्चे दिल से याद करो वह मिल जाता है. यही है वह जिसकी मैं बात कर रही थी. चंपा नाम है इसका,   फिर उसकी तरफ देखकर सुभद्रा बोली,   आ बेटी भीतर आ, बाहर क्यों खड़ी है?

बुआ, आज गाय ने दूध तो नहीं दिया लेकिन बथुआ का साग बना कर लाई हूँ   कोई बात नहीं. अभी मैं खा कर ही बैठी हूँ शाम के लिए रोटी बना कर रख देती हूँ,   अंदर आकर चम्पा ने कहा और फिर बेटे के सिर पर हाथ रखकर बोली,   चंदू तू बाहर जाकर खेल   अरे रहने दे उसे. इधर आ तुझसे काम की बात करनी है सुभद्रा ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया और अपनी इच्छा उसे कह दी. फिर आशा से उसकी ओर देखकर बोली,  अब बता क्या कहती है?     आप मेरी बुआ जैसी है और माँ जैसी भी. गाँव में मेरा कौन है. चंदू के सहारे दिन काट रही हूँ   स्कूल में भर्ती करवा देंगे यहाँ, खुश रहेगा उसकी चिंता मत कर   आप हैं तो मुझे किस बात की चिंता बुआ? आपको देख देख कर माँ की कमी भी पूरी करती रहूंगी मैं थोड़ी देर बाद लीला उठी,   अब मैं चलती हूँ फिर आऊंगी. तू इससे बातें कर. बहुत समझदार और प्यारी लड़की है चंपा की गाँव में इकलौती गाय थी, दूध भी कम ही देती थी. खेती के नाम पर एक छोटा टुकड़ा सब्जी उगाने के लिए, और कुछ नहीं. रोजी रोटी के लिए दूसरों के खेतों में काम मिल जाता था उसे, यही आय का मुख्य साधन भी था. पेट भरने में उसे स्वर्ग नर्क याद आ जाते. जवान थी इसलिए थक कर भी चेहरे पर शिकन नहीं आने देती. आज उसकी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी, कस्बे में रहेगी तो चंदू की पढ़ाई भी हो जाएगी और पेट भी भरेगा. उसने हाँ करने में देरी नहीं की. एक दिन वह जरूरत का सामान लिए बेटे सहित सुभद्रा के पास आ गई. एक बड़ा सा कमरा उसे मिल गया. गाँव के मकान में ताला लटका सो लटका, उधर गाय भी विदा कर आई. कस्बा आकर उसने अपनी दिनचर्या बदल दी. सुभद्रा के कपड़े धोना.

नहाने की व्यवस्था, बिस्तर लगाना, खाना पीना, समय पर दवाई देना और रोज शरीर में तेल मालिश करना. यह काम गाँव के जीवन से कहीं आसान था उसके लिए. यहाँ असुरक्षा का भाव भी नहीं सालता था उसे. सुभद्रा उसके हाथ में जरूरत पड़ने पर पैसे धर देती. चंपा हिचकती तो कहती,   बेटी, जितना तू कर रही है उतना शायद सगी बेटी भी न करे. किसके लिए रखूं यह सब. बाजार जा कपडे खरीद ले अपने और चंदू के लिए उसका बेटा कस्बे की स्कूल में जाने लगा था. वह यहाँ आकर बहुत खुश था, हमउम्र बच्चों के साथ उसका मन रम गया. अब चंपा को उसकी फीस और किताबों की चिंता नहीं थी. सुभद्रा छोटी बड़ी सभी बातों का ध्यान रखती. चंपा भी गाँव से बेहत्तर जिंदगी जी रही थी यहाँ. यही स्थिति सुभद्रा की भी थी. घर में रौनक आ गई. घीरे धीरे चंपा की सेवा सुश्रुषा ने उसे उठने बैठने लायक बना दिया. फिर तो सुभद्रा ने छोटे-मोटे काम अपने हाथों  में ले लिए. कुछ साल हंसी खुशी बीत गए. सुभद्रा को अब जीवन जीने का आधार मिल गया. सुभद्रा लाठी के सहारे फिर से दुकान में जाने लगी, कभी ग्राहक कम होते तो जल्दी ही घर आ जाती. खाने पीने की उसे फिक्र नहीं थी, चम्पा चुटकियों में खाना बना कर परोस देती. सुभद्रा को घर भरापूरा लगने लगा और चंपा को लगता कि वह अपने मायके में आ गई है. बेटे की शिक्षा और जीवन यापन दोनों भली भांति चल निकले.

समय एक समान कभी नहीं रहता. उसमें भी समुद्र की तरह उतार चढ़ाव आते रहते हैं. सुख दुख दोनों अलग अलग हैं. कभी एक अपने पैर जमा देता है तो कभी दूसरा. सुभद्रा ७० साल पारकर गई. पहले से भी अशक्त होती जा रही थी सो दुकान की तरफ जाना बंद हो गया. इस बीच कुछ हमउम्र सहेलियां भी दुनियाँ छोड़ गई जिससे वह बहुत आहत हुई. सुभद्रा बिस्तर में बैठे बैठे किताबों के पन्ने पलटती, चन्दू के साथ मन लगाती और कभी अपनी सहेलियों से फोन पर बातें कर समय बिताती. कभी मन किया तो स्वभाववश अनीता को भी फोन लगा कर उसकी कुशलता पूछ लेती. उस साल सर्दी का प्रकोप बढ़ गया था. रह रह कर बादल छा जाते थे. कभी बादल मूसलाधार बरस भी जाते. दिसम्बर आते आते सामने की पहाड़ियों पर बर्फ की सुफेद चादर चढ़ने लगी थी. इस साल तकरीबन सात-आठ साल बाद ऐसी बर्फ़ देखने को मिली. रजाई से बाहर हाथ पैर निकालते ही पैर सुन्न पड़ जाते. ऐसी कड़ाकेदार सर्दियों में जरा सी लापरवाही बुजुर्गों के लिए बेहद कष्टकारी होते हैं. सांस की तकलीफ बढ़ जाती, कफ़ से छातियाँ जकड़ जाती हैं. सुभद्रा को भी कफ की शिकायत होने लगी थी. खाँसी भी उठती. छाती में दर्द भी महसूस होता. मुहल्ले में कल ही एक वृद्ध स्वास के रोगी चल बसे थे. सुभद्रा को पता चला तो वह भी अंदर से डर गई. चंपा भाँप गई. वह दैनिक कार्यों से निपट कर सुभद्रा को अधिक समय देने लगी.

बुआ इतना क्यों सोच रही हो. खाने पीने और दवाई में लापरवाही से ही खतरा बढ़ता है, आप तो ऐसा नहीं करती   वो तो ठीक है पर मेरी तीन सहेलियाँ भी तो चली गई इस साल,   सुभद्रा चिंतित स्वर में बोली.   अरे बुआ तुम भी ना, सबका अपना अपना समय होता है. आपके साथ मैं हूँ ना…कुछ नहीं होने दूंगी,   सुभद्रा की हथेलियों को सहलाते हुए चंपा ने कहा,   आप पीठ से तकिया लगा लो मैं खाना परोसती हूँ   पहले  बच्चे को जिमा. अपने साथ उस पर भी ध्यान दिया कर   चिंता न करो बुआ. साथ साथ परोसती हूँ सुभद्रा उदास होकर बड़बड़ाई,    अच्छा सोचूंगी तो अच्छा ही होगा… लीला की भी चिंता खाये जा रही है, हर बार यही कहती है कि आऊंगी लेकिन अब तक आई नहीं. उसकी जरूर कोई मजबूरी होगी सुभद्रा की तबीयत खराब होने लगी थी. छाती में बलगल जमा हो गया था. खांसी और दर्द भी बढ़ रहा था. ठंड से जांघों में ऐंठन और दर्द इतना हो गया कि वह गुसलखाने तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. चम्पा मेडीकल की दुकान से टॉयलेट पाट ले आई. सुभद्रा को जब जरूरत होती वह सामने खड़ी हो जाती. साफ सफाई का ध्यान देती, स्पंज करती और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर को घर पर बुला देती. सुभद्रा ने अनीता को फोन किया और अपनी बीमारी के विषय में बताया. इस आशा से कि शायद इन दुर्दिनों में मदद ही कर दे. अनिता ने स्वास्थ लाभ हेतु कई नुस्खे ही बता डाले. 'भाभी सोते समय हल्दी वाला दूध पीना शुरू कर दो भाभी. ज्यादा ऐलोपैथिक दवाएं मत खाना, छाती में जकड़न होगी. ठंडी चीजे लेना भी बंद कर दो.' सुभद्रा सुनती रही फिर खांसते हुए धीमी आवाज में बोली,   कुछ दिनों के लिए आ जाती तो?     कैसे आऊं भाभी? घर में पेंटिंग का काम लगा हुआ है. ठीक हो जाओगी. शहद और सीतोपलादी चूर्ण लेती रहो और हाँ, पानी गर्म ही पीना   अच्छा निर्मल को ही भेज दे कुछ दिन के लिए   ओहो भाभी. तुम हमारी परेशानी नहीं समझ पाओगी. ये तो मुम्बई गए हैं काम से.

पूरे महीने भर का टूर है उसने उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा था. अनीता के बच्चे अब छोटे नहीं रह गए हैं,उसने सोचा और खांसते हुए रुक रुक कर बोली,  बेटा बेटी घर संभाल लेंगे कुछ दिन, फिर चली जाना?     बच्चों पर क्या भरोसा करना भाभी, घर पर टिकें तब न. रोज का टँटा रहता है कि हम बिजी हैं  अनीता ने चतुराई से अपना पल्ला झाड़ दिया. सुभद्रा ने भी दुनियाँ देखी थी सो झूठ सच भाँप गई. काम चल रहा है और घर में मर्द नहीं है! कितना सफेद झूठ है यह. उसने फोन बंद कर दिया और खांस खांस कर दोहरी हो गई. सुभद्रा के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा था. अनीता के प्रति उसकी उम्मीद किसी सूखे दरख्त की तरह टूट गई. अब उसे फोन करना ही व्यर्थ लगा. जयपुर से आना अनिता के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी. पहले भी कई बार अकेले आई है वह. इधर सुभद्रा की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती ही गई. कमजोरी भी बढ़ती जा रही थी. पड़ोसियों की मदद से चंपा ने उसे कस्बे के एक निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया. अनीता को इसकी न जाने कहाँ से भनक लगी, वह अपने पति के साथ अस्पताल आ धमकी. दोनों हड़बड़ी में थे अस्पताल के काउंटर से पता चला कि सुभद्रा आसीयू में है.

आसीयू के बाहर पहुँचकर वहीं दोनों बेंच पर बैठ गए. तभी अंदर से विजिटिंग डॉक्टर निकाला तो अनीता उसे घेर कर खड़ी हो गई.   डॉक्टर, आईसीयू में मेरी भाभी हैं सुभद्रा, वे अब कैसी हैं?   फिलहाल हालत क्रिटिकल है, चेस्ट में काफी इंफेक्शन है   कोई उम्मीद डॉक्टर?     ओल्ड एज है इसलिए अभी कुछ कह नहीं सकते,   डॉक्टर कहते हुए आगे बढ़ा तो अनीता उसके पीछे पीछे चलती हुई पुनः बोली,   मिल सकती हूँ उनसे?     शाम पांच बजे के बाद. ओनली वन परशन एट ए टाइम निर्मल बैंच में बैठा था. बीच की चेयर खाली थी. अनीता उसके पास जा कर बैठ गई.   क्या कहा  डॉक्टर ने?     कंडीशन क्रिटिकल है,   अनीता ने फीके स्वर में कहा और समय देखने लगी,  अभी चार ही बज रहे हैं…अभी और एक घण्टा इंतजार करना पड़ेगा!     मैं तुम्हें कब से कह रहा था अकेली चली जाओ लेकिन तुम्हारे भेजे में बात ही नहीं आती,   निर्मल ऊंचे स्वर में बोल रहा था,   बिना वसीयत लिखे चली गई तो जायजाद हाथ से चली जायेगी. तुम्हारा भाई भी दावा कर सकता है. प्रोपर्टी कौन आसानी से छोड़ता है?

तुम्ही चले जाते. मैं तो शर्म के मारे नहीं जा पाई. दो लाख लेकर आज तक तुमने नहीं लौटाए. दस साल बीत गए, अरे लाखों की जायजाद के सामने दो लाख क्या थे,   अनीता गुस्से से बिफ़र गई.   अब बस भी करो आसपास लोग बैठे हैं. अंदर जा कर वसीयत की बात कर लेना. यही आखरी मौका है उस समय लीला भी वहीं थी जो जैसे तैसे अपने पोते को लेकर अस्पताल आई थी. उसके कानों में दोनों के वार्तालाप पडे तो वह समझ गई कि यही अनीता है. उसे दोनों पर क्रोध आने लगा. कैसे लोग हैं! बीमार औरत को देखने आए हैं या स्वार्थ  के लिए! उसे घृणा हो गई उनकी सोच से. लीला चुप न रह सकी,   क्या तुम सुभद्रा की ननद हो?   अनीता हड़बड़ा कर बोल पड़ी,   हां जी, लेकिन मैंने आपको पहचाना नहीं.   मैं उसकी बहन की तरह ही हूँ. कुछ माह पहले सुभद्रा ने अपनी वसीयत अपने गावँ की अनाथ लड़की के नाम कर दी है   क्या!   दोनों के मुंह से एक साथ निकला. अनिता का मुँह उतर गया और झल्लाहट में बोली,   भाभी कम से कम एक बार तो सलाह ले लेती   रजिस्ट्री भी हो गई है लेकिन जब तक जिंदा है सुभद्रा का ही हक रहेगा दोनों आवाक रह गए. उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया था.   मेरे भाई की सम्पत्ति को कोई कैसे दान कर सकता है?     पति के बाद संपत्ति में पत्नी और बच्चों का हक होता है.

अब वह क्या करे  यह उसकी इच्छा है. सामने बैठी हुई लड़की को देख रहे हो, सुभद्रा के लिए दिन-रात एक कर दिया है उसने   नौकरानी और ननद में फर्क होता है   तुम नहीं समझ पाओगी. जिसे नौकरानी कहती हो वह बड़ी स्वाभिमानी है. उसने जितनी सेवा की है उसके आगे सुभद्रा की संपति का कोई मोल नहीं है   छोड़िये मैं आपसे बहस नहीं करना चाहती. चलो यहाँ से निर्मल, यहाँ दम घुटने लगा है,   वह बोलते बोलते बैंच से उठ खड़ी हुई.   माफ़ करना तुम्हें बुरा लगा, जो सच था मैंने कह दिया,   लीला ने कहा किंतु अनीता ने मुहँ फेर लिया. लीला ने चंपा पर निगाह डाली. उसकी रो-रो कर आँखें सूज गई थी. उसके सर की छत भरभरा रही थी और वह असहाय दुपट्टे से आँसूं पोंछते जा रही थी. शाम पांच बजे के बाद बारी-बारी से सुभद्रा को देखने गए. सांस लेने के उपकरण लगे होने से ठीक से बात नहीं कर पाई लेकिन इशारे में वह अपनी भावनाएं दर्शाती रही. अनीता को जो कहना था कहा लेकिन सुभद्रा के मुखमण्डल पर किसी तरह के भाव नहीं थे. चम्पा जब अन्दर गई तो उसे देखकर सुभद्रा की निश्तेज आँखों में चमक आ कर ठहर गई. वह हाथ बढ़ाकर चंपा के आंसूओं से भीगे चेहरे को थपथपाने लगी.

सुभद्रा कुछ देर के लिए सब कुछ भूल गई फिर उसे घर जाने का इशारा करने लगी. तभी वार्ड ब्वॉय आया और उस से बाहर जाने का आग्रह करने लगा. चंपा को लीला बाहर ही मिल गई और उसे अपने साथ ले गई. चंपा दुपट्टे से आंखे पोंछती हुई अनिच्छा से पीछे पीछे चल दी. उधर अनीता निराशा और उद्वेग के वशीभूत पति के साथ उसी दिन लौट गई. अगली सुबह सुभद्रा की हालत में सुधार होने लगा और शाम तक उसके चेहरे से आक्सीजन मास्क हटा दिया. दो दिन और आईसीयू में रहने के बाद सुभद्रा को सामान्य वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया. चंपा रोज की तरह अस्पताल आ चुकी थी. उसकी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी. उत्साह से उसने नर्स का आधा कार्य खुद ही संभाल लिया. दोपहर को कुछ देर के लिए घर जाती और चंदू को भोजन करवाकर तुरन्त अस्पताल आ जाती. सुभद्रा की कुशल लेने वालों का तांता लग गया. कस्बे का कोई शख्स ऐसा न था जो न आया हो. अब जाकर उसे लगा कि सब कुछ होकर भी वह स्वयं को असहाय क्यों मानती रही! वह अकेली नहीं थी, उसकी सोच ही अकेली चल रही थी.

कुछ हफ्तों में सुभद्रा ठीक होकर घर आ गई. चंपा की सेवा सुश्रुषा ने उसे फिर से नया जीवन दे दिया था. अब वह काफी अच्छा महसूस करने लगी थी. चंपा ने उसकी सेहत के लिए जी जान लगा दिया था. यह सब देखकर सुभद्रा का उसके प्रति अनुराग पहले से कहीं अधिक ठाठे मारने लगा. उस ने चम्पा को अपने पास बिठाया और स्नेह से सिर सहलाते हुए बोल पड़ी,   तूने बेटी और बेटे दोनों की कमी पूरी कर दी   मैंने क्या किया बुआ. माँ को खोया तो उसे आपके रूप में पा लिया. कितनी भाग्यशाली हूँ मैं   हाँ माँ ही हूँ बेटी…माँ ही हूँ,   कहते कहते सुभद्रा सिसकने लगी.   क्यों रो रही हो बुआ? मेरे लिए आपने जो किया दूसरा कभी नहीं कर पायेगा. आखिर कौन किसी पर आँख मूंद कर विश्वास करता है. मुझे रुपया-पैसा का मोह नहीं, मुझे तो आपके चरणों में थोड़ी सी जगह की इच्छा है   माँ के लिए अपने बच्चों की जगह हृदय में होती है पगली. मैंने कोई पुण्य किया होगा जो  तू मुझे मिली सुभद्रा स्नेह से उसे देर तक निहारती रही फिर डबडबाई आँखों को आँचल से पोंछती हुई बोली,  मैं निपूती नहीं हूँ, मेरे मन आँगन की चंपा है तू और फिर अपने अंक से लगाकर उसका माथा चूम लिया!

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