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मुसलिम और मोदी: कट्टरवाद बनाम उदारवाद

कद और पद के साथ जिम्मेदारियां तो बढ़ती ही हैं, शख्स का चिंतन भी बदलता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने केरल के कोझीकोड में भाजपा की नैशनल काउंसलिग की मीटिंग में जब मुसलिम बिरादरी को ले कर अपनी नई सोच सामने रखी तो उन की पार्टी के ही कट्टरवादी नेताओं और दूसरे संगठनों में कसमसाहट दिखने लगी. दरअसल, नरेंद्र मोदी अपनी कट्टवादी ‘गुजरात छवि’ को बदल कर उदारवादी छवि पेश करना चाहते है. लेकिन यह दिखावा भर है, यह हर कोई जानता है क्योंकि नरेंद्र मोदी का रिकौर्ड कुछ और कहता है. वे चुनाव जीतने से पहले विषवमन करते रहे हैं.

जब भारत व पाकिस्तान के बीच संबंधों में युद्ध की तनातनी दिखने लगी. पूरे विश्व की नजरें इन दोनों देशों पर लगी थीं. पाकिस्तान अपनी सड़कों पर जेट फाइटर उड़ा कर युद्ध की चुनौती दे रहा था. उस समय नरेंद्र मोदी मुसलिमों के विकास और उन की शिक्षा की बात कर के कौन सी नई विचारधारा को पेश कर रहे हैं. यह उन के दिल की बात नहीं है, यह बहाना है.  

आज भारत में हर तरफ से इस बात का दबाव बढ़ रहा था कि पठानकोट व उरी के हमलों के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए.भारत में सभी लोग इस बात से बेहद खफा थे कि पाकिस्तान ने अपने आतंकी संगठनों का सहारा ले कर उरी में भारतीय सेना के जवानों को सोते समय मारा. इस के पहले विपक्ष में रहते हुए खुद नरेंद्र मोदी ने कड़ी कार्यवाही की वकालत तब की कांग्रेस सरकार से कर चुके थे. वर्तमान के गरम माहौल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने स्वभाव के उलट संयम से काम लेते हुए पाकिस्तान से युद्ध के बजाय दूसरे दबाव बनाने की बात शुरू तो की पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से ले कर सिंधु जल समझौता और समझौता ऐक्सप्रैस को ले कर समीक्षा करनी शुरू कर दी. यह कोई समन्वयवादी नीति नहीं है.

यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान की बदहाली के मुद्दे को उठा कर वहां की जनता से आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की उम्मीद जताई. अपने इस कदम से नरेंद्र मोदी ने केवल देश के अंदर लोगों को चौंकाया है कि कल का कट्टरपंथी आज शांतिप्रिय क्यों बन रहा है.  

इस का कारण देश की राजनीतिक पैंतरेबाजी है. भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवाद की जब बात करती है तो उस का धार्मिक एजेंडा साफ झलकने लगता है. वह राष्ट्र को कट्टर पौराणिकवादी मानती है. यही कारण है कि केवल मुसलिम ही नहीं, दलित भी, जो पुराणों के दमन के शिकार रहे हैं, इस एजेंडे के साथ खुद को जोड़ नहीं पाते हैं. लगता यही है कि राष्ट्रवाद की आड़ में कट्टरवादी तत्त्व ही धर्म का सहारा ले कर अपनी बात को सामने रखने की कोशिश में लगे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए रुख से भाजपा का धार्मिक एजेंडा हाशिए पर चला गया, ऐसा कहीं से सिद्ध नहीं होता.

नरेंद्र मोदी अगर अपने संगठनों के दबाव में आए बिना इसी तरह से अपनी छवि को बदलते रहे तो अपनी मुसलिम विरोधी छवि से छुटकारा पाने में तो सफल हो जाएंगे पर वे भाजपा की मुख्यधारा को तितरबितर कर देंगे. गोमांस और गोरक्षा के नाम पर पिछले कुछ समय से देश में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटीं जो भारत की सर्वधर्म छवि पर धब्बा थीं पर नरेंद्र मोदी इन पर आमतौर पर चुप रहे या देर से बोले, वह भी तब, जब नुकसान हो चुका था. 

गोरक्षा से पहले राष्ट्रवाद और तिरंगा यात्रा के तहत भाजपा ने अपने संकीर्ण एजेंडे को लागू करने का प्रयास किया था. इन मुद्दों को तीखा बनाने के लिए जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय में घटी घटनाओं को पूरे देश ने देखा था. शुरुआत में भाजपा और उस से जुडे़ संगठनों को लगा कि इन मुददों से वे अपने छोटे वोटबैंक को खुश रख सकेंगे. वे यह न भूलें कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में न केवल भाजपा बल्कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार कमजोर हुई है. लोकसभा चुनावों के बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों के पैमाने पर यह बात परखी जा सकती है.

आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने हैं. भाजपा को अपनी गिरती लोकप्रियता से डर लग रहा है. इन राज्यों में भाजपा को चुनावी प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है. ऐसे में भाजपा को अपनी नीतियों में बदलाव की जरूरत महसूस हो रही है पर असल में कितना बदलाव आएगा, इस में संदेह है. 

मोदी का मुसलिम प्रेम 

छुआछूत के मुददे पर दलित अलगथलग पड़ते थे तो राष्ट्रवाद के नाम पर मुसलिम. अब भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझ आ रहा है कि बिना दलितों और मुसलिमों को साथ लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा. अब वे दलितों और मुसलिमों को ले कर नई सोच बना रहे हैं. परेशानी की बात यह है कि उन की बात खुद उन की पार्टी और उस से जुडे़ संगठनों को समझ में आएगी भी कि नहीं.

पाकिस्तान के साथ गरम माहौल के बीच केरल के कोझीकोड में मोदी ने कहा, ‘‘मुसलिमों को अपना समझें. उन को वोटबैंक का माल नहीं समझा जाना चाहिए.’’ यह कहना तो असंभव है पर गलीगली फैले भगवाई दुपट्टा ओढ़े कार्यकर्ताओं को समझाना असंभव है. यह समाज हारना, गुलामी सहना स्वीकार करता है पर अपने धार्मिक, सामाजिक नियमों को नहीं बदलता. नरेंद्र मोदी नई सोच के मसीहा तो हैं नहीं. 

प्रधानमंत्री मोदी ने जनसंघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय के कथन को सामने रखते कहा, ‘‘मुसलमानों को न पुरस्कृत किया जाए और न फटकारा जाए, बल्कि उन्हें अपने पांव पर खड़ा कर के मजबूत बनाया जाए. उन्हें अपना समझा जाए, न कि वोटबैंक की वस्तु या फिर नफरत का सामान.’’

प्रधानमंत्री मोदी यहीं नहीं रुकते हैं, आगे कहते हैं, ‘‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने मुसलमानों को करीब आने और उन की तरक्की के लिए यह मंत्र 50 साल पहले दिया था. कुछ लोगों ने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा को समझने में गलती की. कुछ जानबूझ कर अब भी ऐसा कर रहे है.’’ मोदी केवल अपनी बात ही नहीं कर रहे, वे अपनी पार्टी भाजपा और जनसंघ को भी मुसलिमों का समर्थक बता रहे हैं.

यह सच है कि हर विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की बात करती है. परेशानी की बात यह है कि राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में फर्क होता है. भाजपा यदि ऐसा सोचेगी तो उस की पूछ जीरो हो जाएगी. ऊंची सवर्ण जातियां केवल अपना हित देखती हैं. न उन्हें देश की चिंता होती है, न समाज की. उन के लिए पूजापाठ और मंदिरमठ मुख्य हैं.

कट्टरता से निकलने की बेचैनी

असल में नरेंद्र मोदी का मुसलिम और दलित प्रेम केवल दिखावटी है. गोरक्षा के नाम पर पहले मुसलिमों और बाद में दलितों के साथ भेदभाव भरा व्यवहार किया गया. इस में राष्ट्रवादी कहे जाने वाले संगठनों का बहुत बड़ा हाथ था. गोमांस के नाम पर कई हिंसककांड हुए जिन में भाजपा नेतृत्व ने चुप्पी साध ली थी. जब ये मसले आगे बढे़ तो प्रधानमंत्री ने 80 फीसदी गोरक्षा संगठनों को फर्जी बता दिया और 20 प्रतिशत को जिम्मेदार ठहरा कर खुद को स्वयं दोषमुक्त कर डाला. दलितों के साथ मुसलिमों की बारी आई. पाकिस्तान के साथ तनावभरे माहौल में भाजपा पर नैतिक दबाव आने लगा. उस पर मुसलिम विरोध का पुराना लैवल लगा है. ऐसे में माहौल को हलका करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपना नया मुसलिम प्रेमराग छेड़ दिया है. भाजपा ही नहीं, नरेंद्र मोदी की राजनीति की धुरी सदा ही मुसलिमविरोधी रही है. गुजरात दंगों से बनी इस छवि को तोड़ कर मोदी अब अपनी नई छवि गढ़ना चाहते हैं पर अब देर हो चुकी है.

भाजपा की राजनीति का तो केंद्रबिंदु ही मुसलिम विरोध रहा है. देश में मंदिरमसजिद विवाद के पहले हिंदू व मुसलिम एकसाथ गंगाजमुनी सभ्यता के साथ रहते थे. अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद देश में सांप्रदायिक माहौल खराब हुआ.

मुंबई का बम विस्फोट ऐसी पहली बड़ी घटना थी जिस ने इस दूरी को आतंकवाद से जोड़ दिया. इस के बाद देश में होने वाली आतंकी घटनाएं

बढ़ने लगीं. देशविरोधी ताकतों को मजहबी दूरी बढ़ाने में मदद मिली. वे इस दूरी के बहाने देश को आतंकवाद के मुहाने पर ले आए. इस देश के अधिकांश मुसलमान इसी देश के दलित, अछूत, पिछड़े हैं जिन्होंने लालच में या गुस्से में इसलाम कुबूल किया है. वृहद भारत के 50 करोड़ मुसलमान मक्का व मदीना से नहीं आए हैं. उन के पुरखे यहीं गंगा, जमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और कावेरी के किनारों पर रहते थे.

बाधा बनेंगे फायरब्रांड नेता

भाजपा वोट के ध्रुवीकरण का आरोप कांग्रेस और दूसरे दलों पर लगाती है. सच यह है कि खुद भाजपा कांग्रेस और दूसरे दलों की तरह ही वोटबैंक की परिपाटी पर चलती रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में पाकिस्तान व भारत के संबंधों को प्रचार के रूप में प्रयोग किया गया और कांग्रेस पर पाकिस्तान समर्थक होने के आरोप लगे.

सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक के बाद एक इस बात का आभास होने लगा है कि देश की एकता और अख्ांडता के लिए दलित और मुसलिम भी बेहद जरूरी हैं. इन को साथ ले कर चले बिना देश का विकास संभव नहीं है. मुश्किल बात यह है कि यह सच प्रधानमंत्री तो समझ गए पर उन से जुडे़ सैकड़ों फायरब्रांड छुटभैए वक्ता यह बात समझें, तो बात बने.

भाजपा में कई नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए कट्टरता का सहारा ले कर घोर सांप्रदायिक बयान देते हैं ताकि उन को हिंदुत्व की धुरी माना जाए. ये लोग अपने बयानों से भारत व पाकिस्तान के बीच युद्व का माहौल बनाने का भी काम करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए रुख से ऐसे नेताओं में बेचैनी बढ़ेगी. भारत-पाक संबंधों पर नरेंद्र मोदी ने संयम से काम लिया है. पर यह कूटनीति है या कुछ न कर पाने की अक्षमता, कहा नहीं जा सकता. भड़काने का काम केवल पाकिस्तान नहीं कर रहा, भाजपा के कुछ नेता भी कर सकते हैं. ऐसे नेताओं पर काबू पाना होगा. भड़काऊ बयान अब लाभ के बजाय नुकसान भी देने लगे हैं. बिहार चुनाव में इस को देखा जा चुका है.   

आड़े आती गुजरात छवि

नरेंद्र मोदी की मुसलिम विरोधी छवि आज उन्हें अपनी छवि को उदारवादी बनाने की राह में सब से बड़ा रोड़ा महसूस हो रही है. गुजरात में ‘गोधरा कांड’ और ‘इशरत जहां एनकाउंटर’ के बाद से उन की छवि मुसलिम विरोधी बन गई. उस समय पूरे विश्व के मीडिया ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश किया. हालात यहां तक हो गए कि नरेंद्र मोदी को अमेरिका यात्रा के लिए वीजा का आवेदन करना विवादों में आ गया था. भारत में राजनीतिक लाभ के लिए कोई नरेंद्र मोदी की मुसलिम विरोधी छवि को अपने लिए लाभकारी समझता था तो कोई उन की इस छवि का लाभ लेने की फिक्र में था. खुद नरेंद्र मोदी अपनी मुसलिम विरोधी छवि को बनाने में ही खुश थे. चुनावी सभाओं में कई बार ऐसे मौके भी आए जब उन्होंने मंच पर ही मुसलिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया.

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने अपनी हिंदूवादी छवि को बनाए रखा. लोकसभा चुनाव में भारत और पाकिस्तान संबंधों में उस समय के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की आलोचना एक मुद्दा बन गई. उस समय प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी ने ‘एक के बदले 10 सिर काटने’ और ‘56 इंच का सीना’ होने वाले तमाम जुमले भी कहे थे. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने अपनी छवि को बदलने का प्रयास किया. उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंधों को मधुर बनाने के लिए वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. ये कदम पाकिस्तान के कट्टरपंथी लोगों को रास नहीं आ रहे थे. ऐसे में भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ने लगे और आज हालात युद्ध के मुहाने पर पहुंच गए. दरअसल, नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अपनी छवि को बदलते हुए सुलह और विकास की नीति को आगे बढ़ाया वह दोनों देशों में कट्टरवादी लोगों को रास नहीं आ रही.

मेरे पति को नौकरी से निकाल दिया गया. अब समस्या यह है कि उन्हें अपनी पोजीशन और योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल रहा.

सवाल

मैं 30 वर्षीय विवाहिता व किशोरवय बेटे की मां हूं. आजकल मैं अपनी एक पारिवारिक समस्या से बेहद परेशान हूं. मैं सरकारी स्कूल में अध्यापिका हूं, जबकि पति आजकल बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं. वे जिस प्राइवेट कंपनी में काम करते थे वहां से अचानक उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. कहा गया कि कंपनी आर्थिक मंदी से जूझ रही है. अब समस्या यह है कि उन्हें अपनी पोजीशन और योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल रहा. वे पहली कंपनी में जितनी तनख्वाह पाते थे उतनी ही तनख्वाह पर काम करना चाहते हैं. उन्हें खाली बैठे 2 महीने हो गए हैं.

मैं उन से कहती हूं कि तनख्वाह कुछ कम भी मिलती है तो कोई बात नहीं. नौकरी जौइन कर लें. पर वे मानते ही नहीं. कहते हैं लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और मैं पीछे जाऊं? उन्हें कैसे समझाऊं?

जवाब

आप अपने पति को इस बात के लिए राजी करें कि यदि उन्हें मनमाफिक काम मिलता है, कंपनी अच्छी है, तो तनख्वाह को ज्यादा तवज्जो नहीं देनी चाहिए.

मेहनत करेंगे तो आगे बढ़ने का अवसर भी मिलेगा. नौकरी करते हुए इस से बेहतर नौकरी के लिए प्रयास कर सकते हैं. पर निरंतर कुछ समय और खाली बैठे रहे तो जहां उन का आत्मविश्वास कम होगा, वहीं बेहतर नौकरी मिलना और दूभर हो जाएगा.

फेसबुक ने कंपनियों के लिए लॉन्च किया ‘वर्कप्लेस’

सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने अपने नए फीचर ‘वर्कप्लेस’ का कमर्शियल लॉन्च किया है. कंपनी इससे दुनिया की सभी कंपनियों को वर्कप्लेस में फेसबुक के इस्तेमाल का मेसेज देना चाहती है. ऑफिशल कम्यूनिकेशन में आमतौर पर ईमेल का इस्तेमाल होता है. फेसबुक इसे ‘वर्कप्लेस’ से बदलना चाहती है. भारत इस नए टूल का इस्तेमाल करने में दूसरे देशों से आगे है.

फेसबुक फॉर वर्क को कंपनी ने वर्कप्लेस का नाम दिया है. इसे कंपनी ने पायलट प्रॉजेक्ट के तहत 18 महीने पहले लॉन्च किया था. इस टूल का इस्तेमाल अभी स्टारबक्स से डेनॉन, भारत में गोदरेज से लेकर यस बैंक, सिंगापुर की गवर्नमेंट टेक्नोलॉजी एजेंसी और ऑटो रिक्शा एग्रीगेटर जुगनू, लॉजिस्टिक कंपनी डेलीवेरी में हो रहा है. फेसबुक ऐट वर्क के एशिया पैसिफिक हेड रमेश गोपालकृष्ण ने कहा, ‘फेसबुक यूज करने के लिए ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है. यह सिंपल है. भारत में पहले से ही 16 करोड़ लोग हमारे यूजर्स हैं. हम इसका फायदा उठाना चाहते हैं.’

फेसबुक ऐट वर्क को 1,000 से ज्यादा कंपनियों ने अपनाया है. वर्कप्लेस यूजर्स में भारत के बाद नॉर्वे, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का नंबर है. फेसबुक ने वर्कप्लेस को सोमवार से सभी कंपनियों के लिए खोल दिया. जो कंपनियां अब फेसबुक की इस सर्विस का इस्तेमाल करना चाहती हैं, उन्हें पहले 1,000 मंथली ऐक्टिव यूजर्स के लिए प्रति यूजर 3$, 1,001 से 10,000 मंथली यूजर्स के लिए प्रति यूजर 2$ और 10,000 से अधिक मंथली यूजर के लिए 1$ प्रति यूजर के हिसाब से पेमेंट करना होगा.

एंटरप्राइज सेगमेंट में फेसबुक की एंट्री देर से हुई है. ऑफिस स्पेस में दूसरी कंपनियां भी जोर-आजमाइश कर रही हैं. इनमें माइक्रोसॉफ्ट के यमर और फेसबुक के वॉट्सएप जैसे प्रॉडक्ट्स शामिल हैं. ये दोनों छोटी कंपनियों में पॉप्युलर हैं. फेसबुक ने एक बयान में कहा, ‘वर्कप्लेस का एक्सपीरियंस फेसबुक अकाउंट जैसा है. इसमें लाइव, रिऐक्शन, सर्च और ट्रेंडिंग पोस्ट जैसे फीचर्स हैं. आप इसके जरिए अपने ऑफिस मित्र के साथ दुनियाभर में कही भी रियल टाइम में चैट कर सकते हैं.’

कंपनी के मुताबिक एंप्लॉयी के फेसबुक अकाउंट से वर्कप्लेस बिल्कुल अलग है. वर्कप्लेस में खुद का चैट ऐप ‘वर्कचैट’ है. यह मोबाइल डिवाइस और डेस्कटॉप दोनों के लिए अवेलेबल है. स्टरलाइट पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड एक महीने से ‘फेसबुक एट वर्क’ का इस्तेमाल कर रही है. कंपनी के मुताबिक इससे उसके इंटरनल कम्यूनिकेशन में सुधार हुआ है. इस समय कंपनी के 97 पर्सेंट एंप्लॉयीज इस प्लैटफॉर्म पर एक्टिव हैं.

इस तरह आसानी से करें डाटा रिकवर

स्मार्टफोन आज हर कोई इस्तेमाल करता है. लोग अपने कॉन्टैक्ट्स, एसएमएस, ईमेल, फोटो-वीडियो, जरूरी डॉक्यूमेंट्स समेत तमाम महत्वपूर्ण चीजें इसमें सेव करके रखते हैं. ऐसे में अगर आपके स्मार्टफोन की स्क्रीन टूट जाए तो क्या करते हैं आप? फोन से जरुरी डाटा रिकवर करना बेहद मुश्किल हो जाता है. ये मुश्किल तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब फोन टच स्क्रीन हो. हर किसी ने कभी न कभी इस परेशानी का सामना जरुर किया होगा. इसी के चलते हम आपके लिए लाएं हैं कुछ टिप्स जिसके जरिए फोन टूटने पर भी डाटा सुरक्षित किया जा सकता है.

स्क्रीन टूट जाने पर डाटा कैसे करें रिकवर

अगर आपके फोन की स्क्रीन टूटी है लेकिन डिस्पले सही है तो ये तरीका अपनाया जा सकता है. इस परेशानी से निजात पाने के लिए आपको यूएसबी ओटीजी (ऑन द गो) और माउस की जरुरत होगी. इसके लिए आपको गूगल पर जाकर ये पता करना होगा कि आपका फोन ओटीजी को सपोर्ट करता है या नहीं. अगर आपका फोन ओटीजी सपोर्ट करता है तो इसमें ओटीजी केबल लगाएं और फिर केबल के दूसरे पोर्ट में माउस की यूएसबी लीड कनेक्ट करें. माउज कनेक्ट होते ही आप फोन का पैटर्न लॉक या पासवर्ड खोल पाने में सक्षम होंगे. जैसे ही आपका फोन अनलॉक हो जाए आप फोन को पीसी से कनेक्ट करें और सारा डाटा कॉपी कर लें.

स्क्रीन ही बंद हो जाए तो कैसे करें डाटा रिकवर

इसके लिए आपको वीएनसी प्रोग्राम की जरूरत पड़ सकती है. बाजार में ऐसे कई प्रोग्राम मौजूद हैं. प्रोग्राम डाउनलोड करने से पहले ये सुनिश्चित करें कि वो सेफ और फ्री है. यह वीएनसी प्रोग्राम आपके स्मार्टफोन के एंड्रायड इंटरफेस को पीसी में भेज देते हैं ताकि आप इसे पीसी से कंट्रोल कर पाएं. ध्यान रहे कि इस प्रोसेस से पहले आपको अपने पीसी और एंड्रायड डिवाइस में प्रोग्राम को डाउनलोड करना होगा.

एयरड्रॉयड से कैसे करें फाइल रिकवर

एयरड्रॉयड नाम का सॉफ्टवेयर आपके स्मार्टफोन को कंप्यूटर से कनेक्ट कर देता है. आप इसे वेब इंटरफेस या कंप्यूटर एप्लीकेशन के जरिए यूज कर सकते हैं. इसे केवल आपको अपने पीसी और एंड्रायड डिवाइस पर इंस्टॉल करना होगा. अकाउंट के जरिए आप दोनों डिवाइस से कनेक्ट हो जाएंगे जिसके बाद आपको फाइल ट्रांसफर, बैकअप या एप अनइंस्टॉलिंग जैसे कई आइकन दिखाई देंगे. यहां से आप डाटा ट्रांसफर कर सकते हैं.

कुरसी बड़ी या रिश्ता

उत्तर प्रदेश में सास बहू की सी लड़ाई बेटे, पिता, चाचा में हो रही है. अखिलेश यादव सरकार अपनी तरह चलाना चाहते हैं, पिता और चाचा यानी ससिया चाची और सास मिल कर अपने रंग दिखा रहे हैं. भारतीय पारिवारिक परंपरा का यह उदाहरण न पहला है न अंतिम. पौराणिक ग्रंथ भी इन से भरे हैं, लोक कथाएं इन से भरी हैं और अदालतों के फैसले इन से भरे हैं.

निकटता जहां प्रेम व भरोसा पैदा करती है, वहीं असहजता भी पैदा करती है. अनजानों से लेनदेन बकाया नहीं रहता. अपनों से खाता कभी बंद नहीं होता और बैक डेटेड ऐंट्रियां होती रहती हैं और अखिलेश, मुलायम व शिवपाल इसी चक्कर में हैं और वह भी तब जब 2017 के चुनाव सिर पर हों. जिसे लगता है कि उसे उतना लाभ नहीं हो रहा है जितना वह उठा सकता है, वह विद्रोह का झंडा सास या बहू की तरह उठा लेता है.

कहने को तो हम नारे लगाते रहते हैं कि सास मांजी होती है, बहू बेटी होती है पर इन के बीच एक अदृश्य दीवार मोटी होती है और पैतरेबाजी हर समय चलती रहती है. इस से परिवार टूटते हैं, मातापिता यानी सासससुर भी नुकसान में रहते हैं और नातीपोते भी. पर यह प्रकृति का नियम है और इस पर गम नहीं करना चाहिए.

उत्तर प्रदेश में जो हुआ वह इंदिरा गांधी के घर में हो चुका है. वह जयललिता के साथ हुआ,

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के साथ हुआ, शिवसेना के बाल ठाकरे परिवार के साथ हुआ. इसलिए न यह अनूठा है और न चिंता की बात. राज्य की सरकार चलती रहेगी, रसोई में खाना पकता रहेगा बस बरतन जरा जोर से पटके जाएंगे.

मनुष्य को साथ रहने के गुण मिले हैं पर ये गुण हमारे जीन्स में इतने गहरे नहीं गए हैं कि सभी मानव एकसाथ एकजैसा सोचने लगें. ऐसा होता तो न सदियों से युद्ध होते, न करोड़ों मारे जाते और न ही तलाक होते. मनुष्य अपने हितों के कारण साथी ढूंढ़ता है और जब बात हितअहित की सीमा तक पहुंच जाए तो अलग होना ही एक तरीका बचता है.

अखिलेश को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ सकती है और हो सकता है 2017 के चुनावों में कोई पक्ष जा कर भाजपा या मायावती से जा मिले. ऐसा होता है तो समाजवादी दल चाहे समाप्तप्राय हो जाए पर दूसरों की थाली में हलवापूरी बिना मेहनत के आ जाएगी. यह मामला थोड़ा चौंकाने वाला है पर अजीब नहीं और इसीलिए 2-4 महीनों बाद उस की लकीरें भी रेत की जमीन पर न रहेंगी.

 

श्री राजपूतः जहां लड़की को पढ़ाया नहीं जाता

भारत में लड़कियों को लेकर जिस तरह से बदलाव आ रहा है, उसकी जीती जागती मिसाल हैं अभिनेत्री श्री राजपूत. तीन सौ से अधिक विज्ञापन फिल्में, कई नाटकों में अभिनय, ‘‘लाइफ ओके’’ चैनल के सीरियल ‘‘रिश्तों के सौदागार बाजीगर’’ में नैना नामक  उस नारी का चरित्र निभा चुकी जो कि शादीशुदा होते हुए पर पुरुष से  संबंध रखती है तथा दो हिंदी फिल्मों में पुलिस अफसर के किरदार निभा रही अभिनेत्री श्री राजपूत को देखकर यह नहीं सोच सकते कि वह ऐसे सामाजिक परिवेश से हैं, जहासं लड़कियों को पढ़ाया तक नहीं जाता. जी हां! यह कटु सत्य है.

एक दकियानूसी परिवार में जन्मी व पली बढ़ी श्री राजपूत ने खुद इस बात को कबूल करते हुए ‘‘सरिता’’ पत्रिका को बताया-‘‘मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ है, जहां लड़की को पढ़ाया नहीं जाता. मगर मेरे माता पिता मुंबई मे रह रहे थे, इसलिए उन्होंने मुझे स्कूल भेजा और मेंने इकोनामिक्स आर्ट की पढ़ाई की. फिर मैंने किसी तरह माता पिता को मनाकर छह माह के लिए ट्रेनिंग व नया अनुभव की बात कहकर एचडीएफसी बैंक में नौकरी करनी शुरू की. नौकरी करते करते मैं ‘‘कर्मकला नाट्य ग्रुप’’ से जुड़ गयी. उसके बाद मैं पार्ट टाइम नौकरी करती थी और बाद में नाटक में रिहर्सल करती थी. जब भ्रूण हत्या पर सामाजिक संदेश देने वाले नाटक ‘‘एक नन्ही चीख’’ का मंचन हो रहा थे, तो मैं वह नाटक देखने के लिए अपने माता पिता को ले गयी. मेरा नाटक देखकर वह खुश हुए और उन्हें पहली बार पता चला कि मैं नाटक में अभिनय कर रही हूं. फिर मुझे नाटकों में काम करने की इजाजत मिल गयी. मेंने कई नाटकों में अभिनय किया. उसके बाद मुझे पहला सीरियल ‘‘रिश्तों का सौदागर बाजीगर’’ मिला, तो मैंने घर में बिना बताए इसकी शूटिंग की. जब पहला एपीसोड प्रसारित हुआ, तो रिश्तेदारों ने हंगामा मचा दिया. लेकिन मेरे पिताजी के दोस्तों ने उनसे मेरी इतनी तारीफ की, कि मेरे घर का माहौल ठंडा हो गया. अब तो मुझे माता पिता का पूरा समर्थन मिल रहा है.’’

श्री राजपूत आगे कहती हैं-‘‘अब मेरी दो फिल्में ‘‘गन्स आफ गुजरात’’ और ‘‘मिस खिलाड़ी – परफैक्ट मर्डर’’ प्रदर्शन के लिए तैयार हैं. जिसमें से फिल्म ‘‘मिस खिलाड़ी – परफैक्ट मर्डर’’14 अक्टूबर को प्रदर्शित होगी. इस फिल्म में मैंने सोनल नामक उस पुलिस अफसर का किरदार निभाया है, जो कि हत्यारे की तलाश करती है. इसके अलावा इन दिनों मैं रोमांटिक कामेडी फिल्म ‘‘इश्क दा खूंटा’’ की शूटिंग कर रही हूं.’’ स्व.स्मिता पाटिल को अपना आदर्श मानने वाली श्री राजपूत की तमन्ना अक्षय कुमार के साथ फिल्म करने की है.

भारत में लड़कियों के प्रति सोच कैसे बदलेगी? इस सवाल पर श्री राजपूत कहती हैं- ‘‘सारी जिम्मेदारी पुरुषों पर डालकर हम नारियां अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेती हैं, यह गलत है. हर लड़की को अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने घर में शांतिपूर्ण तरीके से लड़ाई लड़नी पड़ेगी. हर लड़की को चाहिए कि वह अपने माता पिता को समझाए कि दुनिया कितनी बदल रही है. मैंने यही किया और मुझे सफलता मिली. हर लड़की को यह बात याद रखनी होगी कि हर माता पिता अपनी लड़की का भला ही चाहते हैं.’’ 

भारत की पहली ‘थ्रीसम’ फिल्म का हीरो डीएसपी का बेटा

निजी जिंदगी में समाज के हर वर्ग को आदर्शवाद, शालीनता व न्याय का पाठ पढ़ा रहे इंदौर के पुलिस अफसर अशोक रंगशाही के बेटे अक्षय रंगशाही अपने अभिनय करियर की शुरुआत अनुज शर्मा निर्देशित ‘थ्रीसम’ पर आधारित पहली अति बोल्ड और अति सेक्सी फिल्म ‘‘इश्क जुनूनःद हीट इज आन’’ से कर रहे हैं. इस फिल्म में अक्षय रंगशाही और राजवीर दो हीरो तथा दिव्या सिंह हीरोईन हैं.

जी हां! फिल्म ‘‘इश्क जुनूनःद हीट इज आन’’ की कहानी दो गहरे दोस्त वीर (अक्षय रंगशाही) और राज (राजवीर) की है, जो कि बचपन से ही एक दूसरे की हर छोटी बड़ी बात के राजदार हैं. दोनों अपनी जिंदगी की हर बात एक दूसरे न सिर्फ बताते हैं, बल्कि खुशी और दुःख के मौके पर भी एक ही रहते हैं. इनकी दोस्ती को कोई तोड़ नहीं पाता. जबकि उत्तर भारत के एक छोटे शहर की मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की पाखी (दिव्या सिंह) अपने आसमानी सपनों को पूरा करने और एकदम स्वतंत्र जिंदगी जीने की चाह के साथ मुंबई शहर में पहुंचती है, उसे लोडेड यानी कि करोड़पति प्रेमी की तलाश है. पाखी की दोस्ती राज से होती है, पर एक दिन राज के कालेज के समारोह में वीर की मुलाकात राज की प्रेमिका पाखी से होती है और वह उसे दिल दे बैठता है. पाखी, राज व वीर दोनों की प्रेमिका बनी रहने का प्रयास करती है, पर एक दिन तूफान आता ही है.

फिल्म ‘‘इश्क जुनूनःद हीट इज आन’’ में अक्षय रंगशाही ने दिव्या सिंह के साथ कई अति सेक्सी व बोल्ड सीन किए हैं. जब हमने अक्षय रंगशाही से पूछा कि आपके पिता पुलिस में डीएसपी हैं. ऐसे में अभिनय करियर की शुरुआत इस तरह की सेक्सी फिल्म से करना कितना सही है?

इस पर अक्षय रंगशाही ने कहा- ‘‘निजी जिंदगी को परदे की जिंदगी के साथ मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए. यदि में निजी जिंदगी में इस तरह की कोई हरकत करता, तो मेरे पिता की वर्दी पर आंच आती. पर मैंने तो एक फिल्म में अभिनय करते समय एक किरदार को पटकथा के अनुरूप निभाने का ही काम किया है. मुझे अनुज शर्मा ने एक सशक्त कथानक वाली फिल्म में अभिनय करने का मौका दिया, तो मैं इंकार न कर सका. वैसे आज कई कलाकार बहुत बड़े नेता व सांसद हैं. उन्होंने अतीत में फिल्मों में जो कुछ किया, क्या उसे गलत कहा जाएगा? ऐसा नही होता. अभिनय को निजी जिंदगी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. निजी जिंदगी में मैं बहुत ही शर्मीले स्वभाव का एक नेकदिल व शरीफ लड़का हूं. मैं उम्मीद करता हूं कि 11 नवंबर को इस फिल्म के प्रदर्शित होने पर लोग मेरे अभिनय की तारीफ करेंगे.’’

अक्षय रंगशाही कहते हैं-‘‘वास्तव में यह हमारी फिल्म उस कटु सत्य का चित्रण करती है, जो आज समाज में नजर आ रहा है. हमारी युवा पीढ़ी पर पाश्चात्य सभ्यता, बाजारवाद व संस्कृति इस कदर हावी होती जा रही है कि अब उनके लिए जीवन मूल्य, संस्कार वगैरह कोई मायने नहीं रखते. यह फिल्म इस बारे में बात करती है कि नई आंधी के चलते अब जीवन की सही दिशा क्या होनी चाहिए?’’

सत्ता परिवर्तन की फिराक में पीटीआई

अब जब 30 अक्तूबर में कुछ ही दिन ही शेष बचे हैं, तो पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) इस्लामाबाद बंद की तैयारियों में जोरशोर से जुट गई है. पार्टी पनामा पेपर मामले में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से इस्तीफा देने की मांग कर रही है. पार्टी की कोशिश इस बार उस विपक्ष को भी अपने साथ जोड़ने की है, जो पहले कभी साथ नहीं आया, लेकिन साफ है कि साथ न मिलने की स्थिति में भी पीटीआई अकेले दम पर ही इस अभियान को सफल बनाएगी.

दरअसल, पीटीआई सत्ता परिवर्तन चाहती है, तो उसके लिए अभी की अपेक्षा बड़े फलक पर जाकर अन्य दलों का समर्थन हासिल करना जरूरी है. पार्टी इसके प्रयास भी कर रही है, ठीक उसी तरह, जैसे उसने डॉक्टर ताहिर कादरी के नेतृत्व वाली पकिस्तान अवामी तहरीक का साथ लिया था. हालांकि बाकी मोर्चों पर उसे दिक्कत आ सकती है.

अंतर्विरोधों से घिरी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व के बारे में भ्रम की स्थिति भी एक मुद्दा है, क्योंकि वहां यही साफ नहीं है कि नेतृत्व आसिफ अली जरदारी के हाथ में है या बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी के हाथ. अनबन तब और उभर आती है, जब सीनियर जरदारी अक्सर विदेश में दिखाई पड़ते हैं और पीपीपी का बैनर लेकर खालीपन को भरना छोटे जरदारी की मजबूरी दिखती है. पीटीआई की नजर उन चर्चाओं पर भी है कि पीपीपी मौका लगते ही सत्तारूढ़ पार्टी से गठजोड़ कर सकती है.

ऐसे में, पीटीआई इस फिराक में है कि किसी तरह सीनियर जरदारी को अलग किया जा सके, तो पीपीपी और पीटीआई का गठजोड़ कोई नया गुल खिला सकता है. फिलहाल नजरें 30 तारीख की सफलता पर टिकी हैं. तय है कि सरकार किसी भी हालत में पीटीआई को अपनी ताकत दिखाने में कामयाब नहीं होने देना चाहेगी. लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि पीटीआई ने लाहौर रैली में जबर्दस्त ताकत दिखाई थी और इस्लामाबाद में भी वह लाहौर जैसी भारी भीड़ जुटाकर ताकत दिखाने में कामयाब हो सकती है. अगर कहीं उसे मुख्यधारा की किसी पार्टी का समर्थन मिल गया, फिर तो यह बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी. इंतजार करें 30 अक्तूबर का.

पेरिस समझौते पर जापान का सुस्त रवैया

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती वाले पेरिस समझौते को मंजूरी देने में शिंजो अबे प्रशासन को अब और ज्यादा वक्त नहीं गंवाना चाहिए. अब लगभग पक्का हो चुका है कि यह अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौता अगले महीने की शुरुआत में 60 से अधिक देशों की मंजूरी के साथ लागू हो जाएगा. अगर इस समझौते के प्रभावी होने के पहले जापान ने इसे अपनी मंजूरी नहीं दी, तो इसे लागू करने के बारे में जो शुरुआती कानून बनेंगे, उस प्रक्रिया में जापान भाग नहीं ले पाएगा.

दुनिया के पांचवें सबसे बड़े उत्सर्जक देश जापान का इस समझौते के बारे में ऐसा सुस्त रवैया काफी अफसोसनाक है, क्योंकि यह समझौता भागीदार देशों से अपेक्षा करता है कि वे समझौते के वक्त की अपनी प्रतिबद्धता से आगे बढ़कर कुछ खास करेंगे. पिछले साल दिसंबर में पेरिस में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में इस ऐतिहासिक करार को स्वीकार किया गया था. इसमें यह लक्ष्य तय किया गया था कि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को औद्योगिक युग से पहले के तापमान के स्तर से दो डिग्री सेल्सियस के भीतर रखा जाए.

साल 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के उलट, जिसने सिर्फ विकसित देशों पर उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य थोपा था, पेरिस समझौते में विकसित और विकासशील, दोनों प्रकार के देशों ने स्वैच्छिक रूप से अपने कटौती लक्ष्य तय किए. लेकिन समस्या यह है कि देशों द्वारा प्रस्तावित स्वैच्छिक योजना घोषित लक्ष्य को हासिल करने के लिहाज से आधी-अधूरी है. भारत ने, जो कि कुल वैश्विक उत्सर्जन का लगभग चार प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस छोड़ता है, यह एलान किया है कि उसने पेरिस समझौते को मंजूरी देने की प्रक्रिया पूरी कर ली है. भारत ऐसा करने वाला 62वां देश है.

यूरोपीय संघ इसे मंजूरी देने के संकेत दे चुका है. दुनिया के दो सबसे बड़े ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जक देश- चीन और अमेरिका पहले ही इस करार को अपनी मंजूरी दे चुके हैं. पेरिस समझौते के लक्ष्य को पाने के लिए सामाजिक और आर्थिक ढांचे में काफी बड़ा परिवर्तन करना पड़ेगा, लेकिन जापान में अभी इस संदर्भ में कोई गंभीर चर्चा होती हुई नहीं दिख रही.

कबड्डी वर्ल्ड कप: भारत ने बांग्लादेश को रौंदा

भारत ने द एरेना बाय ट्रांसस्टेडिया में एकतरफा मुकाबले में बांग्लादेश को हराकर खुद को कबड्डी वर्ल्ड कप-2016 के सेमीफाइनल की दौड़ में बनाए रखा है.

दक्षिण कोरिया के हाथों पहला मैच हारने के बाद भारत ने अपने दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया को हराया था लेकिन बांग्लादेश के साथ होने वाले इस मुकाबले को लेकर उस पर अपेक्षाओं का जबरदस्त दबाव था. इसका कारण यह था कि यह मैच हारने की सूरत में भारत सेमीफाइनल की दौड़ से लगभग बाहर हो जाता.

भारतीय खिलाड़ियों ने हालांकि इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया और अपने समर्थन में एरेना में जुटे करीब 20 हजार प्रशंसकों की हौसलाअफजाई के बीच बांग्लादेश को 57-20 से हराया. यह ग्रुप-ए में भारत की दूसरी जीत है. इस जीत ने उसे तालिका में पहले स्थान पर पहुंचा दिया है.

भारत के लिए शुरुआत से ही मेहमान टीम पर जबरदस्त दबाव कायम दिया था और इस दबाव को उसने अंत तक कायम रखा और एकतरफा अंदाज में मैच अपने नाम किया. हाफ टाइम तक भारत ने 27-10 की बढ़त हासिल की थी.

उस समय तक सबसे अधिक छह अंक प्रदीप नरवाल ने बनाए थे जबकि अजय ठाकुर को पांच अंक मिले थे. मंजीत चिल्लर तथा कप्तान अनुप कुमार ने तीन-तीन अंक बनाए थे. सुरजीत और संदीप नरवाल को दो-दो अंक मिले थे.

हाफ टाइम तक प्रदीप ने सात रेड में से छह अंक और अजय ने पांच में से पांच अंक बनाए थे. पहले हाफ में दो बोनस अनूप और एक अजय ने बनाया था.

पहले हाफ में भारत ने जहां 14 रेड अंक जुटाए वहीं मेहमान टीम पांच अंक जुटा सकी. इसी तरह भारत को 8 टैकल अंक मिले जबकि मेहमान टीम पांच अंक बना सकी. भारत को चार आल आउट अंक मिले लेकिन इस विभाग में बांग्लादेश का खाता नहीं खुल सका.

दूसरे हाफ में भी भारत ने बांग्लादेश पर अपना दबदबा बनाए रखा और 30 अंक बनाए. इस दौरान मेहमान टीम 10 अंक ही बना सकी. भारतीय टीम ने मैच में रेड से 28, टैकल से 20 और ऑल आउट से 8 अंक अपने खाते में डाले. उसे एक अतिरिक्त अंक भी मिला.

वहीं बांग्लादेश ने मैच में रेड से 12, टैकल से सात अंक जोड़े. उसे एक भी ऑल आउट अंक हासिल नहीं हुआ. उसे एक अतिरिक्त अंक भी मिला.

जीत के बाद भारतीय कप्तान अनूप कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं है कि बांग्लादेश की टीम अच्छी नहीं थी, लेकिन इस मैच में हमारी तैयारी अच्छी थी. हम जानते थे कि हमारे ऊपर दबाव है इसलिए हम पूरी तैयारी से आए थे. भारत को अपने अगले मैच में 15 अक्टूबर को अर्जेंटीना से भिड़ना है.

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