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नोटबंदी से बैंकों के असल बिजनेस पर पड़ी मार

500 और 1,000 रूपये के पुराने नोट वापस लिए जाने के बाद जो हालात बने हैं, उसका बैंकों पर भी बुरा असर पड़ रहा है. बैंकों पर परेशान ग्राहकों को रिलीफ पहुंचाने का जबरदस्त दबाव है. उनके सारे एंप्लॉयीज नोट एक्सचेंज, नकदी देने और डिपॉजिट लेने में लगे हुए हैं क्योंकि बैंकों की ब्रांच के आगे कस्टमर्स की लंबी लाइन लग रही है. इससे बैंकों के लोन देने के मेन बिजनेस पर बुरा असर पड़ा है. कॉरपोरेट लोन को छोड़ दें तो होम, कार, बाइक और कंज्यूमर गुड्स लोन का काम रूक गया है.

इससे बैंकों की लोन रिकवरी भी प्रभावित हो रही है, जिसकी मार वे बर्दाश्त नहीं कर सकते. हाल के क्वॉर्टर्स में बैंकों को बढ़ते बैड लोन की वजह से प्रोविजनिंग बढ़ानी पड़ी है. सूत्रों का कहना है कि बैंकों के परफॉर्मेंस पर इसका कितना असर होगा, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

यह इस पर निर्भर करेगा कि हालात सामान्य होने में कितना समय लगता है. उन्होंने बताया कि अलग-अलग काम में लगे बैंक एंप्लॉयीज को सभी ब्रांच में तैनात किया गया है ताकि वे लोगों की परेशानियां दूर कर सकें.

AUSvsSA: चित हुए कंगारू, गंवाई सीरीज

पर्थ टेस्ट के बाद होबार्ट टेस्ट में भी ऑस्ट्रेलियाई टीम को दक्षिण अफ़्रीका के खिलाफ करारी हार का सामना करना पड़ा है. होबार्ट टेस्ट के चौथे दिन ऑस्ट्रेलिया के पास 8 विकेट थे और वो प्रोटियाज की पहली पारी के स्कोर से 120 रन पीछे थे, लेकिन होबार्ट में हर सुबह तेज गेंदबाजों के लिए कुछ होता है और वही चौथे दिन की सुबह भी देखने को मिला.

ऑस्ट्रेलिया ने अपने बाकी बचे 8 विकेट महज 40 रनों पर गंवा दिए और दक्षिण अफ़्रीका को पारी और 80 रनों से जीत हासिल हुई. गौर करने वाली बात ये है कि इस टेस्ट का दूसरा दिन पूरी तरह से बारिश की भेंट चढ़ गया था. मतलब महज 2 दिन से थौड़ा ज्यादा दिन के खेल में ही ये टेस्ट मैच खत्म हो गया.

पहले दिन ऑस्ट्रेलिया को होबार्ट की पिच पर दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाजी करने के लिए आमंत्रित किया, जिसके बाद पूरी टीम महज 85 रनों पर सिमट गई. किसी भी टेस्ट की पहली पारी में ये ऑस्ट्रेलिया की सबसे खराब शुरुआत रही. सिर्फ 17 रनों के अंदर ऑस्ट्रेलिया की आधी टीम पैवेलियन में थी. घर पर पिछले 32 साल में ये ऑस्ट्रेलिया का सबसे खराब प्रदर्शन रहा.

इसके बाद दक्षिण अफ्रीका ने अपने 5 विकेट 132 रन पर गंवा दिए थे, लेकिन फिर क्विंटन डि कॉक के शतक की बदौलत प्रोटियाज ने 340 का स्कोर बनाया और 241 रनों की बढ़त हासिल की.

दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया ने तीसरे दिन बेहतर बल्लेबाजी की और दिन का खेल खत्म होने तक 2 विकेट के नुकसान पर 121 रन बनाए, लेकिन चौथे दिन की सुबह काइल एबॉट और कगीसो रबाडा की गेंदबाजी का कंगारू बल्लेबाजों के सामने कोई जवाब नहीं था.

रबाडा ने 4 और एबॉट ने 6 विकेट झटके और प्रोटियाज को पारी और 80 रनों से जीत दिला दी. इस जीत के साथ ही 3 टेस्ट मैचों की सीरीज में दक्षिण अफ्रीका ने 2-0 की बढ़त हासिल कर सीरीज अपने नाम कर ली है. एबॉट को मैच में 9 विकेट हासिल करने के लिए मैन ऑफ द मैच चुना गया.

ब्रिक्स का मिसयूज

देश की सरकार ने इस बार गोआ में हुए ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन व साउथ अफ्रीका के पहले अंगरेजी अक्षरों से बने ब्रिक्स सम्मेलन में अपनी खासी किरकिरी करा डाली. यह बात दूसरी है कि भारतीय अखबार नरेंद्र मोदी के बारे में खरीखरी कहने में हिचकिचाते रहे पर सच यही है कि आर्थिक मुद्दों के लिए बने इस 10 साल पुराने गठजोड़ को आतंकवाद विरोधी मंच बनाने की नरेंद्र मोदी की कोशिश मनचाही सफल नहीं हुई.

वर्ष 2000 के बाद जो उन्नति पिछड़े देशों ने की और लगने लगा कि ये देश पश्चिमी देशों को पछाड़ देंगे तो इन देशों ने ब्रिक्स बना कर विश्व की आधी जनसंख्या को वजन देने की कोशिश की ताकि अमेरिका, इंगलैंड, जरमनी, फ्रांस, कोरिया, जापान आदि का दबदबा कम किया जा सके. उन दिनों इन देशों में सस्ते मजदूर मिलने शुरू हुए थे और विदेशी यानी पश्चिमी देशों की कंपनियों ने यहां कारखाने या कौल सैंटर खोलने शुरू किए थे. भारत को सौफ्टवेयर केंद्र माना जाने लगा था. रूस, ब्राजील तेल के खजाने के अहंकार में थे. चीन दुनिया का सब से बड़ा उत्पादक देश बन गया था.

पर 2016 तक पासा पलट गया. अमेरिका ने शेल गैस का उत्पादन कर के तेल के दाम आधे करा दिए. चीन के माल की मांग कम हो गई. भारत के सौफ्टवेयर विशेषज्ञ एक स्तर से ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाए. इन देशों में आंतरिक विवाद भी बढ़ गए और जो चमक 10 साल पहले थी वह फीकी होने लगी. इन दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं का यह क्लब अब वह रूप खो चुका है.

गोआ में भारत ने आतंकवाद के मसले को बारबार उठा कर इस गठजोड़ के मूल स्वरूप को और खराब कर दिया. भारतीय अखबारों ने नरेंद्र मोदी के साथ इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों की तसवीरें तो खूब प्रकाशित कीं और आतंकवाद के बारे में समाचार भी प्रकाशित किए पर मूल समस्या यानी आर्थिक ठहराव व गरीबी को छुआ ही नहीं. भारत बारबार पाकिस्तान को कठघरे में डालने की कोशिश करता रहा पर सफल नहीं हुआ.

दरअसल, चीन और रूस दोनों को भारत से ज्यादा पाकिस्तान की जरूरत है. चीन और रूस दोनों उत्तरी कोरिया को मिलने वाली पाकिस्तानी आणविक तकनीक के कारण उसे नाराज नहीं करना चाहते. चीन पाकिस्तान से हो कर अरब सागर तक मार्ग बना रहा है ताकि उस के माल को जहाजों से लंबा रास्ता न काटना पड़े. पाकिस्तान की सरकारें बदलती रहती हैं पर उन की विदेश नीति में भारतविरोध और चीनप्रेम बरकरार रहता है.

सम्मेलन के दौरान चीन की राजधानी बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय ने प्रैस से साफ कह दिया कि चीन के साथ पाकिस्तान के हर मौसम के संबंध हैं. रूस आजकल पाकिस्तान की थलसेना के साथ संयुक्त अभ्यास कर रहा है और वह अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी पकड़ के कारण पाकिस्तान को खुलेआम आतंकवादी देश घोषित करने को तैयार नहीं है.

नरेंद्र मोदी की घरेलू नीतियों का कोई विशेष असर जनमानस पर नहीं पड़ा है और इसीलिए भारतीय जनता पार्टी अब उड़ी के बाद पाकिस्तान की आड़ उसी तरह लेना चाह रही है जैसे पहले इंदिरा गांधी विदेशी हाथ का नाम लिया करती थीं. अपनी घरेलू नीतियों का हल गोआ के ब्रिक्स सम्मेलन में ढूंढ़ना सही नहीं था. आतंकवाद का चेहरा पाकिस्तान है पर दुनिया भारत के कहने या उस के इशारे पर नहीं चलने वाली. भारत-पाक संबंध दरअसल कश्मीर के कारण खराब हैं और इस मामले में भारत हमदर्दी पैदा नहीं कर पाया है, न पहले और न अब.

नास्तिकों से घबरा जाती हैं धर्मसत्ता

धर्म के व्यापार की होलसेल नगरी वृंदावन में महज 500 नास्तिकों के जमावड़े की खबर से राजनीतिक व धार्मिक सत्ता में खलबली मच गई. संवैधानिक अधिकारों के मुकाबले ढोंगी धार्मिक सत्ता एक बार फिर कामयाब हो गई. धर्म के दुकानदारों के दबाव और उन की गुंडागर्दी की ताकत के आगे प्रशासन द्वारा एक नास्तिक सम्मेलन को रद्द करवा दिया गया. हमेशा की तरह भगवाधारियों की भीड़ आयोजन स्थल पर हिंसा और तोड़फोड़ पर उतारू हो गई. आयोजकों के खिलाफ नारेबाजी हुई, पुतले फूंके गए और पत्थरबाजी कर तोड़फोड़ की गई.

कार्यक्रम रद्द होने के बावजूद देशदुनिया के नास्तिकों का संदेश सब तक पहुंच ही गया कि आस्था किस कदर बहस और तार्किकता से डरती है. वृंदावन के परिक्रमा मार्ग स्थित श्री बिंदु सेवा संस्थान के मुखिया स्वामी बालेंदु ने 14 व 15 अक्तूबर को

2 दिवसीय नास्तिकों का सम्मेलन बुलाया था. सम्मेलन में 18 राज्यों से लोग वृंदावन पहुंचने लगे थे. इन में ज्यादातर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली के लेखक, पत्रकार, कलाकार, प्रोफैसर, डाक्टर, इंजीनियर, विद्यार्थी और कौर्पोरेट्स भी शामिल थे. कार्यक्रम से 2 दिन पहले प्राइम न्यूज चैनल पर ‘आस्तिक बनाम नास्तिक’ नाम के एक कार्यक्रम में स्वामी बालेंदु और धर्माचार्यों के बीच जबरदस्त बहस हुई. पर तर्क के आगे धर्माचार्य टिक नहीं पाए और बहस के दौरान झूठा शोरशराबा करते रहे. स्वामी बालेंदु का बोलना बंद करवाने की कोशिश में जुटे रहे.

अगले दिन कार्यक्रम की पूर्व संध्या पर आयोजनकर्ताओं ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर आयोजन की जानकारी दी. नास्तिक सम्मेलन की बात जब मीडिया में फैली तो विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, धर्म रक्षा संघ व स्थानीय धार्मिक संगठनों के नेता मथुरा जिला प्रशासन को ज्ञापन देने पहुंच गए. मांग की गई कि यह कार्यक्रम न होने दिया जाए.

इस दौरान आयोजन में आने वाले लोगों के ठहरने, खानेपीने और विचारविमर्श की पूरी तैयारियां हो चुकी थीं. कई लोग आयोजन स्थल पर पहुंच चुके थे. और 14 अक्तूबर से बसों व ट्रेनों से लोग पहुंच रहे थे. पर अचानक खबर आई कि आयोजन स्थल पर कथित संतों, बाबाओं और धार्मिक संगठनों के लोगों की भीड़ इकट्ठी है जो आयोजकों को धमका रही है और मारपीट पर उतारू है. आने वालों को रोक रही है. गेस्टहाउसों, धर्मशालाओं में पहले से आरक्षित कराए गए कमरों में जाने से उन्हें रोका जाने लगा है. भीड़ पत्थर फेंकने लगी है, तोड़फोड़ कर आग लगाने पर आमादा थी.

प्रशासन ने आयोजन की स्वीकृति के बावजूद आयोजकों का साथ नहीं दिया बल्कि इलाके में धारा 144 लागू कर आयोजन की सुरक्षा करने से हाथ खड़े कर दिए. धार्मिक धंधों के मठाधीशों के साथ मिल कर प्रशासन ने कार्यक्रम को ला ऐंड और्डर की समस्या बता कर रद्द करवा दिया.

धार्मिक संगठनों ने दावा किया कि वृंदावन में ऐसा कोई आयोजन नहीं होने दिया जाएगा. अगर करना है तो कहीं बाहर किया जाए.

इस प्रतिनिधि को स्वामी बालेंदु ने बताया, ‘‘प्रशासन की मंजूरी के बावजूद हमें कार्यक्रम नहीं करने दिया गया. आश्रम में पत्थर फेंके गए. शीशे तोड़े गए. सम्मेलन में आए लोगों से मारपीट की गई और पुलिस सब चुपचाप देखती रही. बुलडोजर घुमाए गए. 500 लोगों के एक जगह जुटने से धर्म की चूलें हिल गईं. इस से साबित होता है कि धर्म कितना कमजोर है.’’

बालेंदु आगे कहते हैं, ‘‘पहले मैं भी आस्तिक था और प्रवचन करता था. पर बाद में नास्तिक हो गया. मेरी धर्म और ईश्वर से कोई सीधी लड़ाई नहीं है. मेरी लड़ाई गरीबी और शोषण से है. धर्म के नाम पर गरीबों का शोषण किया जा रहा है.

वे कहते हैं, ‘‘वे अपनी मुहिम जारी रखेंगे. सम्मेलन का उद्देश्य समान विचारों वाले साथियों से मिल कर धर्म, ईश्वर, नास्तिकता, गरीबी, शोषण और फर्जी बाबाओं पर चर्चा करना था. गरीब व आम आदमी रोटी, रोजगार के लिए तरस रहा है जबकि धर्म के धंधेबाजों की तिजोरियां भर रही हैं.

‘‘नास्तिक होना गुनाह नहीं है. भारत का संविधान मुझे भी उतने ही अधिकार देता है जितने एक आस्तिक को देता है. हम उन के प्रवचन और यज्ञ को नहीं रोकते तो उन्हें हमारे नास्तिक होने से क्या समस्या है. मेरा मानना है कि समाज में ईश्वर और धर्म अंधविश्वास फैलाने का कारण हैं. लोग इन से दूर रहेंगे तो बेहतर समाज बनाया जा सकता है.’’

कार्यक्रम में शामिल होने वृंदावन पहुंचे हिमांशु कुमार का कहना था कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियों पर लिखा था, ‘नास्तिकों को गिरफ्तार करो’, ‘नास्तिकों का नाश हो’.

ताज्जुब की बात थी कि भगवान के बिचौलियों को कार्यक्रम रद्द करवाने के लिए प्रशासन का सहारा लेना पड़ा. उन के पास तो अलौकिक शक्तियों का भंडार होना चाहिए, चमत्कार होना चाहिए. वे भगवान से प्रार्थना करते, हवनयज्ञ, तंत्रमंत्र फूंकते और नहीं तो, तमाम नास्तिकों को श्राप दे देते भस्म होने का. लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया.

डा. नवीन रमण बताते हैं, ‘‘धार्मिक गुंडों की नगरी में हम ने सीधेसीधे गुंडागर्दी का आलम देखा. पुलिस के जरिए गुंडागर्दी को अंजाम पहुंचाया गया. पुलिस वाले माथे पर टीका लगा कर सीधे धमकी दे रहे थे और खानपान स्थल ‘अम्माजी’ रैस्टोरैंट को बंद करवाने की फिराक में थे. धार्मिक गुंडे नास्तिकों को जान से मारने की धमकी दे रहे थे.’’

असल में वृंदावन में नास्तिक सम्मेलन से धर्म का बाजार खराब होने का डर धर्म की कमाई खाने वालों में था. इसलिए वे सम्मेलन को रद्द करवाने में जुटे रहे.

मथुरा, वृंदावन, बनारस, प्रयाग, नासिक, तिरुपति, शिरडी, बदरीनाथ, केदारनाथ, ऋषिकेश जैसे धर्मस्थलों में धर्मांधों की भीड़ बढ़ रही है तो इस का मतलब है धर्म की मार्केटिंग जोरदार ढंग से की जा रही है. धर्म के धंधेबाज चालाकी, होशियारी से अपना धंधा चमकाने में कामयाब हो रहे हैं. इसलिए कि यहां चमत्कार, लोभ, लालच, सुखसमृद्धि, शांति, भय और मनोरंजन का भरपूर दिखावा मौजूद है. यह बात अलग है कि श्रद्धालुओं को मिलता कुछ नहीं है, वे लुटे जा रहे हैं. हां, धर्म के धंधेबाजों के खजाने जरूर भर रहे हैं.

वृंदावन के सम्मेलन में नास्तिकों का जो उत्साह देखा गया, क्या वह यूरोप के पुनर्जागरण आंदोलन की तरह नास्तिक धारा को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है? क्या धर्म, धर्म के पाखंडों और ढोंगियों से जनता उकता रही है? अगर सचमुच ऐसा हो रहा है तो लोग प्रगतिशीलता, जागरूकता की ओर बढ़ रहे हैं और आने वाले समय में भारत के धर्मस्थल वीरान नजर आने लगेंगे. यूरोप के चर्च बंद हो गए, नीलाम हो गए. भारत में निधर्मी ही देश के धर्मस्थलों की लूट बंद करवा सकते हैं.    

धर्म के नाम पर मुरझा गई एक कली

आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद के पान बाजार इलाके में स्थिति जैन भवन में ज्वैलर लक्ष्मी समदारिया ने 1 अक्तूबर को एक शानदार दावत का आयोजन किया था. जैन समुदाय के 700 से ज्यादा सदस्य दावत में शामिल हुए. दावत में परोसे गए ताजे फल, चाट, शाकाहारी व्यंजन और 20 से ज्यादा तरह की मिठाइयों की सभी ने बहुत प्रशंसा की. लक्ष्मीचंद ने इस अवसर के लिए स्थानीय हिंदी समाचारपत्र मिलाप में पूरे पेज का विज्ञापन भी दिया था जिस में उन्होंने गर्व से बताया था कि उन की 13 वर्षीया बेटी आराधना अपने उपवास (तिविहर उपवास) का 68वां दिन पूरा कर रही थी. इस दौरान सूर्योदय से ले कर सूर्यास्त तक आराधना ने केवल पानी पिया था. यह उस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिस के लिए उस से मिलने जैन समुदाय के लोग बड़ी संख्या में आए. उन सब ने उस की शोभायात्रा में हिस्सा भी लिया जिस में उसे रथ पर बिठा कर घर से जैन भवन लाया गया था.

3 अक्तूबर को समदारिया परिवार ने अपने घर पर पारणा प्रथा का आयोजन किया, जिस में आराधना ने अपना उपवास मूंगदाल के पानी से खत्म किया. बाद में दिन में उस ने गुड़ का पानी और लौंग का पानी पिया. आराधना ने कुछ तरल पदार्थ ही लिए. लक्ष्मीचंद के अनुसार, वह बिलकुल ठीक थी. उस ने अपने पिता, अपनी मां मनीषा और अपनी छोटी बहन दर्शिनी के साथ टीवी देखा. 11:40 बजे के आसपास वह अचानक बेचैनी महसूस करने लगी और पसीने में तर होती गई. सब उसे ले कर आई एम एस हौस्पिटल भागे पर डाक्टर उसे बचा नहीं सके. डाक्टरों ने उसे हार्टफेल के कारण ‘ब्रौट डैड’ घोषित कर दिया.

एक ऐसा समुदाय जो तपस्या और उपवास की ताकत में विश्वास रखता है, उस के अनुसार, ‘आराधना ने बहुत ऊंचाइयों को छू लिया था. उस की मृत्यु पर शोक नहीं मनाना चाहिए.’ लक्ष्मीचंद ने एक समाचारपत्र को बताया, ‘‘उस की मृत्यु का उस के उपवास से कुछ लेनादेना नहीं है. जो हुआ वह बहुत तकलीफदेह था पर यह उस के तप के कारण नहीं हुआ क्योंकि उस की मृत्यु तो उपवास खत्म करने के बाद हुई.’’

आराधना की मृत्यु की खबर जातिसमुदाय के अंदर ही रह जाती पर किसी अज्ञात व्यक्ति ने अच्युत राव को फोन कर दिया जो चाइल्ड राइट्स ऐक्टिविस्ट हैं और बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए स्टेट कमीशन के सदस्य भी हैं. उन्होंने फौरन हैदराबाद के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखा जिस में कहा गया कि आराधना की मृत्यु धार्मिक रीतिरिवाजों के नाम पर एक भोली, निर्दोष बालिका की हत्या है.

मामले की जांचपड़ताल अब पुलिस कर रही है जिस ने इंडियन पीनल कोड की धारा 304 और नाबालिग जस्टिस ऐक्ट की धारा 75 के अंतर्गत उस के मातापिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है. आराधना की मृत्यु और उस के बाद जो भी घटनाएं हुई हैं, उन से जैन समाज में कई सवाल खड़े हो गए. जैन धर्म के कुछ अनुयायियों के अनुसार, समाजसेवी, मीडिया, राजनीतिक दलों और दूसरे धर्मों का यह उन के धर्म और उस के सालों पुराने रिवाजों पर हमला है.

हैदराबाद में लगभग 20 हजार जैन, समदारिया परिवार के समर्थन में खड़े हो गए हैं. समदारिया परिवार पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उस ने अपने ज्वैलरी कारोबार में उन्नति, लाभ के लिए आराधना से उपवास करवाया था. पर जैन धर्म के अनुयायियों से पूछने पर उन्होंने यही कहा, ‘‘अगर मैं आप को पैसा दूं तो क्या आप उपवास करेंगे? उपवास रखना आसान नहीं है. इस के लिए किसी से जबरदस्ती नहीं की जा सकती. यह इंसान की इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करता है.’’

जो आराधना को जानते थे, उन का यही कहना है कि वह काफी धार्मिक प्रवृत्ति की थी. श्वेतांबर जैन होने के नाते पंच प्रतिकमन के सारे अध्याय उस ने पढ़े थे और वह अकसर लोगों को सुनाती भी थी. हैदराबाद के सैंट फ्रैंसिस स्कूल की छात्रा आराधना ने अन्य बच्चों की तरह कभी डाक्टर, इंजीनियर बनने की इच्छा प्रकट नहीं की थी.

समुदाय के एक सदस्य ने बताया, ‘‘16 साल की होने पर वह दीक्षा लेना चाहती थी और यह इच्छा वह अपने परिवार को बता चुकी थी. उस के दादा मानिकचंद ने उसे आगे पढ़ने के लिए कहा था और उसे यह सब 20 साल की उम्र होने के बाद सोचने की सलाह दी थी. लक्ष्मीचंद और मनीषा भी सारे सांसारिक सुखों को छोड़ कर दीक्षा लेने के लिए ‘संयम’ के पथ पर चल रहे थे.’’

आराधना ने 5 साल की उम्र से ही 1 या 2 दिनों का उपवास रखना शुरू कर दिया था. 8 साल की उम्र में उस ने प्रयूषण पर्व के लिए 8 दिन के उपवास रखे. 12 साल की उम्र में भोजन के बिना उस ने 34 दिनों तक उपवास रखे क्योंकि उस के गुरु ने दीक्षा के 34 साल पूरे किए थे. इस साल उस ने जैन धर्म में 68 अक्षर वाले सब से महत्त्वपूर्ण मंत्र ‘नवकार मंत्र’ के लिए 68 दिनों का उपवास रखने का निश्चय किया. लक्ष्मीकांत का कहना है कि आराधना ने इस उपवास के बारे में सबकुछ अच्छी तरह जानते हुए ही यह फैसला किया था. हम ने कभी कुछ नहीं कहा था.

आराधना रोज साध्वीजी भव्यानंद महाराज से मिलने जाती थी जो उसे पचखन  देती थीं, जो उपवास आगे जारी रखने की स्वीकृति होती थी. साध्वीजी ने एक समाचारपत्र को बताया, ‘‘हम व्रत रख रहे व्यक्ति से उस के हालचाल पूछते हैं. उस के बाद ही व्रत आगे रखने के लिए पचखन देते हैं. आराधना ने पूरे 68 दिन अनुमति ली. उस की आगे बढ़ने की इच्छा थी. इस में कुछ भी गलत नहीं लग रहा था.’’

शुरू के 41 दिन वह अपना बैग ले कर स्कूल भी गई. 2 मंजिले स्कूल की सीढि़यां भी वह चढ़तीउतरती रही. आराधना का परिवार ओल्ड भायगुडा में मामीडाला बिल्डिंग में किराए पर रहता है. वहां से एक किलोमीटर दूर पौट मार्केट में अरिहंत ज्वैलर्स के नाम से उस के पिता की दुकान है. इस समय परिवार का यह बिजनैस आरोपों के घेरे में है.

साध्वीजी ने सवाल किया, ‘‘यह बिलकुल गलत है कि आराधना ने कारोबार के लिए उपवास किया. उन के पिता के पास पर्याप्त धन है, पैसे के लिए कौन उपवास रखता है?’’ लक्ष्मीचंद द्वारा दी गई दावत की ओर भी उन्होंने इशारा किया. जैन समायक सदस्यों के अनुसार, लक्ष्मीचंद ने शोभायात्रा में 8 लाख रुपए से ज्यादा खर्र्च किए थे.

एक सदस्य ने बताया कि मनीषा ने 2 साल पहले औरंगाबाद में एक मंदिर में अपने कीमती आभूषण दान कर दिए थे. पौट मार्केट के ही एक अन्य ज्वैलरी शौप के मालिक का कहना है, ‘‘यदि उन्हें पैसे की जरूरत थी तो वे खर्च करने या दान देने के बजाय अपना पैसा बचा कर रखते. 30 जैन दुकानदारों ने पुलिस को दिए अपने साइन किए हुए पत्र में लिखा है कि आराधना का परिवार समृद्घ है और यह सब कारोबार सुधारने के लिए नहीं हुआ.

आराधना के परिवार के एक कारोबारी, पारिवारिक मित्र दिनेश जैन कहते हैं, ‘‘इस साल देशभर में लगभग 26 हजार जैन ने 3 दिनों का उपवास रखा जिन में से 15 साल की कम आयु के कम से कम 150 बच्चे थे. कौन सा धर्म उपवास नहीं रखता? मुहर्रम के समय 5 साल से छोटे बच्चे खुद को चोट पहुंचाते हैं, पुलिस क्या करती है? वह सब क्या है?’’

बेतुका तर्क

एक अन्य व्यक्ति का कहना है कि जन्माष्टमी के समय जब छोटे बच्चे मटकी फोड़ने के लिए जुगत लगा कर ऊपर चढ़ते हुए घायल होते हैं या मर जाते हैं, उन के मातापिता को पुलिस क्या गिरफ्तार करती है?’’ बड़ौदा से जैन आचार्य विजय रत्नसुंदर सुरीश्वरजी कहते हैं, ‘‘जिन के बच्चे गुटका, सिगरेट या शराब पीने से कैंसर से मर जाते हैं, क्या पुलिस उन के मातापिता के खिलाफ केस दर्र्ज करती है?’’ सूरत से एक अन्य भिक्षु विमल सागरसुरीश्वरजी कहते हैं, ‘‘जो लोग जैन धर्म को नहीं समझते या इस के विरुद्ध हैं, उन्होंने ही इस मामले को उछाल दिया है. जोरजबरदस्ती से किसी को भूखा नहीं रख सकते.’’ मालूम हो कि जैन समाज के लोग संथारा (जिस में मोक्ष पाने के लिए आखिरी सांस तक भोजन और पानी का त्याग कर दिया जाता है) पर राजस्थान कोर्ट के बैन के खिलाफ पहले से ही लड़ रहे हैं.

अच्युत राव, जो अब आराधना के मातापिता के खिलाफ केस की पूरी जांचपड़ताल करवा रहे हैं, कहते हैं, ‘‘कैसे एक छोटी बच्ची ने भूखी रह कर अपनी जान दे दी. उस के मातापिता के चेहरे पर दुख की छाया भी नजर नहीं आई मुझे. जैनधर्म अहिंसा सिखाता है. बिना खाए एक बच्ची को मरने देना अहिंसा है. यह अपने फायदे के लिए मातापिता द्वारा सोची हत्या ही है. जब आराधना ने 41वें दिन से स्कूल जाना बंद कर दिया तब उसे किसी डाक्टर के पास क्यों नहीं ले जाया गया था? उसे खाना क्यों नहीं दिया गया? उस ने बाहर जाना बंद कर दिया था, इस का मतलब यही है कि वह कमजोर हो रही थी. लक्ष्मीचंद की बहनें डाक्टर हैं, उन में से किसी ने उपवास बंद करने के लिए क्यों नहीं कहा?’’

जहां जैन समाज आराधना के परिवार को सुरक्षित रखने के लिए एकजुट है, वहीं उन्हें गिरफ्तार करवाने के लिए भी दबाव डाला जा रहा है. इस केस को देख रहे इंस्पैक्टर एम मारिहा का कहना है, ‘‘यह बहुत नाजुक विषय है. इस से धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं. ऐसे केस में तुरंत गिरफ्तारी मुश्किल है. हम पूरे केस की अच्छी तरह छानबीन कर के लोक आयुक्त को रिपोर्ट सौंपेंगे.’’

जैन समाज का कहना है कि आराधना की मृत्यु का उपवास से कोई संबंध नहीं है जबकि मुंबई के एक सीनियर फिजीशियन ने स्पष्ट किया कि क्या हुआ होगा, ‘शरीर को ताकत लिवर में जमा शुगर और कार्बोहाइड्रेट्स व मसल्स में जमा फैट व प्रोटीन से मिलती है. व्रत के दौरान शरीर पहले से ही जमा चीजों से ताकत लेता रहता है जिस से धीरेधीरे लिवर और मसल्स कमजोर होने शुरू हो जाते हैं. आराधना को इलैक्ट्रोलाइट इंबैलेंस और रिनेल फेल्योर हो गया होगा. जब किडनी काम करना बंद कर देती है, शरीर में पोटैशियम का स्तर हाई हो जाता है जिस से अचानक मृत्यु हो सकती है. लेकिन जैसे सभी डेंगू मरीजों की मृत्यु नहीं होती, ऐसे ही हर उपवास रखने वाले का जीवन खतरे में हो, यह जरूरी नहीं. यह व्यक्तिव्यक्ति पर निर्भर करता है.’’

धार्मिक उन्माद

औल इंडिया पीस ऐंड सौलिडेरिटी और्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय सचिव, जो आराधना की मृत्यु के विरोध में कैंडल लाइट प्रोटैस्ट का हिस्सा भी थे, कहते हैं, ‘‘क्या बच्चे यह फैसला कर सकते हैं कि उन के लिए क्या अच्छा है? जब हम 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वोट करने की अनुमति नहीं देते तो 13 साल की बच्ची को इतना कठिन व्रत रखने की अनुमति कैसे दे सकते हैं? यह, बस, धार्मिक उन्माद है और कुछ नहीं.’’

अब इस मामले का परिणाम जो भी हो, एक बच्ची खेलने, कूदने, पढ़ने, जीने की उम्र में यह दुनिया छोड़ कर जा चुकी है. धर्म कोई भी हो, अगर अब भी ऐसी आस्थाओं का सिलसिला न रुका तो पता नहीं, कितनी मासूम जिंदगियां धर्म के नाम पर बलि चढ़ती रहेंगी. एकदूसरे पर दोषारोपण, तर्ककुतर्क का सिलसिला न रुका तो समझ लो कि देश का भविष्य खतरे में है. इन आस्थओं से तो आज तक देश का जरा सा भी न भला हुआ है, न आगे होने की संभावना ही है.

सब से खराब दौर को झेलती वायुसेना

कबाड़ में तबदील हो चुके वैमानिक जखीरे को ढो रही देश की वायुसेना इस समय अपने सब से खराब दौर से गुजर रही है. 8वीं पीढ़ी के अत्याधुनिक विमानों की बाट जोह रही सेना को एक बार फिर पुराने या सैन्य शब्दावली के मुताबिक कबाड़ राफेल विमान को झेलना पड़ेगा जो कि 15 साल पुराना यानी तीसरी पीढ़ी का है क्योंकि तमाम उत्साहजनक व मनभावनी बातों के आश्वासनों के बावजूद हमारे हुक्मरानों ने एक बार फिर रक्षा क्षेत्र के लिए दुनिया का सब से महंगा मगर विवादास्पद और वायुसेना के लिए बिलकुल अनुपयुक्त सौदा कर लिया है.

फ्रांस के राफेल विमान का निर्माण वर्ष 2001 में किया गया था और भारत द्वारा मय तकनीक व स्वदेशीकरण के इस की खरीद को पहली मंजूरी वर्ष 2012 में दी गई थी. इस के तहत 126 में से मात्र 18 विमान वर्ष 2015 तक भारत को मिलने थे. वर्ष 2015 तो गया और 2016 भी खत्म होने को है. एक और नया वर्ष भी करीब है और अभी तक सौदा परवान ही चढ़ पाया है. यानी सीधेसीधे 10 साल पुराने इस विमान के मुकाबले संसार में इस से भी ज्यादा उन्नत व अत्याधुनिक तकनीक से लैस सस्ते 19 विमान बिक्री के लिए उपलब्ध हैं.

सैन्य दुनिया में इस तरह के विमान को भी कबाड़ का नाम दिया जाता है. इतना ही नहीं, हमारे हुक्मरानों को इस कबाड़ के एवज में वर्ष 2012 के मुकाबले 13 गुनी राशि (करीब 59,000 करोड़ रुपए) चुकानी होगी और वह भी बगैर मुख्य तकनीक, स्वदेशीकरण व कलपुर्जे प्राप्त किए. इस के बदले में उसे केवल 36 विमान प्राप्त होंगे. इस के साथ ही, सामान्य कलपुर्जों समेत अन्य सहायक प्रणालियों के लिए रिलायंस समूह से औफसैट करार किया गया है जबकि भारत सरकार का रक्षा व अनुसंधान विभाग इस के लिए पूर्णतया उपयुक्त और सक्षम था.

जब देश का रक्षा अनुसंधान विभाग राफेल से भी ज्यादा उन्नत व सस्ते 5वीं पीढ़ी के विमान विकसित व परीक्षण कर सेना को सौंपने के कगार पर पहुंच चुका था और सेना ने परीक्षण कर हरी झंडी दे दी थी तब अचानक ही फ्रांस से इस बेतुके सौदे को अंतिम रूप देना किसी भी दृष्टि से गले नहीं उतरता. इस से यह सिद्घ होता है कि हुक्मरानों की कथनी और करनी में जमीनआसमान का अंतर है. जिस समय यह सौदा परवान चढ़ाया जा रहा था उस से काफी पहले ही वायुसेना रक्षा एवं अनुसंधान विभाग को 300 से भी ज्यादा विमान सप्लाई करने का और्डर दे चुका था. बहरहाल, अब वह परियोजना और और्डर खारिज कर दिए गए हैं.

हथियार कंपनियों का कबाड़

हम ने शायद समझ लिया है कि युद्घ में हथियारों से ज्यादा हमारे 33 करोड़ देवीदेवता काम आएंगे. गजनवी ने जब सोमनाथ मंदिर पर हमला किया था तब की सोच आज भी कायम है. तब हमारे कर्णधार कुछ करने के बजाय भगवान के चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहे. बाहरी लोगों की सेनाएं लूटपाट कर, लोगों को मार कर चली गईं.

हकीकत में इस समय हमारी वायुसेना अपने सब से खराब दौर से गुजर रही है क्योंकि रूसी मिग व मिराज विमानों का बेड़ा सालों पहले ही एक्सपायर हो कर कबाड़ में बदल चुका है और पिछले 3 दशकों से कोई नई खरीद नहीं हुई है. लिहाजा, टोही, फाइटर, लड़ाकू व मिसाइल रोधी विमानों की संख्या लगभग न के बराबर है और जानकारों व सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल हमारी वायुसेना किसी भी मामूली बाहरी आक्रमण को झेलने में भी सक्षम नहीं है. कुछ का तो यह भी कहना है कि 1965 की लड़ाई में पाकिस्तान ने जिस प्रकार हमारे लगभग 40 विमानों को नष्ट कर बढ़त हासिल कर ली थी, हालात आज उस से भी ज्यादा बदतर हैं. बेहतर होता कि तत्काल जरूरत के हिसाब से कुछ तैयार व सुलभ अत्याधिक विमान अमेरिका व इसराईल से खरीद लिए जाते. अब तो बस साल दर साल बजट बढ़ाने की परंपरा जरूर नियम से निभाई जा रही है और अन्य पड़ोसी देशों से बराबरी व आधुनिकीकरण के नाम पर उन्नत देशों की दिवालिया होती कंपनियों का कबाड़ खरीद लिया जाता है.

और तो और, हमारे वीर जांबाजों को जूते, मोजे, बुलैटप्रूफ जैकेट, कपड़े आदि भी पर्याप्त मात्रा में मयस्सर नहीं हैं. तीसरी पीढ़ी के करीब डेढ़ दशक पुराने इस विमान की जगह अमेरिका व इसराईल में 7वीं पीढ़ी के अधिक उन्नत विमान काम में लिए जा रहे हैं और जब तक यह राफेल विमान भारत को प्राप्त होगा तब तक इसराईल 9वीं पीढ़ी के विमान का प्रयोग कर रहा होगा.

संसदीय समिति के अलावा वायुसेना के तमाम विशेषज्ञ व पूर्व उच्चधिकारियों की नकारात्मक रिपोर्टों व विरोध के बावजूद तत्कालीन मनमोहन सरकार की ही तरह वर्तमान मोदी सरकार भी इस सौदे के प्रति बेहद उत्सुक व गंभीर रही है. यह आश्चर्यजनक व समझ के बाहर की बात है कि सेना की खरीद व देश की सुरक्षा के प्रति सभी राजनेताओं व सरकारों का रवैया सौ फीसदी एकजैसा ही रहता है. अपने देश में कम से कम रक्षा एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जिस के समस्त मामलों पर देश के सभी राजनेता व दल एकमत रहते हैं.

पिछले डेढ़ दशक के दौरान रक्षा क्षेत्र की वैश्विक सोच में भारी परिवर्तन आया है. बुनियादी ढांचे को विकसित करने के अलावा अधिकांश देशों ने इस में भी पेशेवराना रुख अख्तियार कर लिया है. ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी, अमेरिका, इसराईल जैसे देशों ने खासी तरक्की की है पर चीन इन सब से काफी आगे निकल चुका है. सीमा से लगे तमाम क्षेत्रों में तैनात हमारे सैनिकों के पास जीवन की आवश्यक बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है. सर्दी में सीमाओं के कुछ खास स्थानों पर जब तापमान शून्य से कईर् डिगरी नीचे पहुंच जाता है तो भारतीय सैनिक आंतों व पेट के एक घातक रोग के चलते असहाय हो जाते हैं पर उन्हीं परिस्थितियों में घुसपैठिए व शत्रु के सैनिक आराम से अपना काम करते रहते हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो अलगअलग परिस्थितियों के तहत हमारी सेनाओं, जमीनी तोपखाना, हवाई रक्षातंत्र, इंजीनियर, लौजिस्टिक्स, खुफिया तंत्र की स्थिति गंभीर रूप से चिंताजनक है. आंधीतूफान, अत्यंत खराब मौसम व घुप अंधेरे में काम करने वाले रडार, टोही और निगरानी करने वाले विमानों व ध्वनिमापक यंत्रों की कमी है.

सेना के पास इसराईल की तरह बेहद तेज, छोटी, विस्फोटकरोधी लेसर रडारयुक्त टोही व मारक विमान भी नहीं हैं, जिन से हमारे सैनिक दुश्मन से हर परिस्थिति में आमनेसामने टक्कर ले सकें. हमारे सैन्य अधिकारी इन सभी हालात व कमजोरियों से भलीभांति वाकिफ हैं पर भत्तों, सुविधाओं, पैंशन व सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले अति महत्त्वपूर्ण राजनीतिक सरकारी पदों का लालच सब पर भारी पड़ जाता है.

श्रीलंकाई सरकार जब लिट्टे समस्या से जूझ रही थी तो उस ने तमाम विशेष लड़ाइयों, खास कर गुरिल्ला युद्घ, का प्रशिक्षण लेने व संबंधित विशेष उपकरण खरीदने के लिए इसराईल की सेवाएं ली थीं. नतीजा सामने है. इसराईल को विशेषज्ञ होने के अलावा इस क्षेत्र को पूर्ण पेशेवर बनाने का भी श्रेय हासिल है.

विदेशी मुल्कों पर निर्भरता

चीन ने वैश्विक महाशक्तियों से अत्यंत महंगी युद्घ सामग्री खरीदने के बजाय अपने सस्ते स्वदेशी विकल्प पर ज्यादा जोर दिया है. इस ने साइबर क्षमताओं के अलावा सैटेलाइट आधारित युद्घक क्षमताओं का विकास किया है, जिस से प्रतिद्वंद्वी के मुख्य सिस्टम को जरूरत पड़ने पर नाकाम किया जा सके.

सोमालिया के जल दस्युओं की छोटीछोटी नौकाएं बड़ेबड़े, मजबूत व उच्च क्षमतायुक्त महंगे बेड़ों पर भारी पड़ जाती है. चीन ने इसी तर्ज पर छोटी, सस्ती व टिकाऊ नौकाओं का ऐसा बेड़ा तैयार कर लिया है जो प्रतिद्वंद्वी के मजबूत से मजबूत बेड़े में भी सेंध लगा सके. यह स्वदेशी व सक्रिय तकनीक अधिक प्रभावी और व्यावहारिक है क्योंकि हमेशा महंगे आयातित हथियार ही कामयाबी की गारंटी नहीं होते.

चीन का स्वदेशी रक्षा उत्पादन तंत्र, उस की सेना को जल्दी व अत्यंत सस्ते दाम पर हथियार व अन्य युद्घ सामग्री मुहैया कराता है. रूस के अलावा जरमनी व इसराईल के विशेषज्ञ वैज्ञानिक मोटीमोटी पगारों पर चीन के इस तंत्र से जुड़े हुए हैं. चीन ने पिछले 2 दशकों में रक्षा क्षेत्र में विदेशी खरीद बहुत कम की है. पर इस खरीद में भी उस की एक खास शर्त होती है. संबंधित उपकरण की समस्त तकनीक, गारंटी व अपने सैनिकों को उपकरण से संबंधित प्रशिक्षण निर्यातक देश को देना होता है. भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है. कोई तंत्र या नीति न होने से सबकुछ विदेशी मुल्कों पर निर्भर है.

राफेल विमान के सौदे का विश्लेषण करें तो तकनीक व प्रशिक्षण से ले कर कलपुर्जे तक हर मामले में भारतीय वायुसेना को विदेशी वैंडर पर निर्भर रहना होगा जबकि ऐसा वैश्विक चलन में अब नहीं है. गोपनीयता व देश की सुरक्षा के नाम पर रक्षा क्षेत्र को तरक्की की हर किरण से महरूम रखना, अब बीते जमाने की बात हो गई है. खजाने का बोझ हलका करने व रक्षातंत्र को नए सिरे से स्थापित करने के लिए भारत को कड़ी मशक्कत करनी होगी. इस के लिए पड़ोसियों से शिक्षा ली जा सकती है जो आज हम से कई दशक आगे हैं.

ऐंटरटेनमैंट का नया माध्यम ‘वैब सीरीज’

आजकल आप को अधिकांश युवा इयरफोन लगा कर फोन पर कई तरह के वीडियो देखते हुए जरूर दिखते होंगे, आप को लगता होगा कि वे कोई फिल्म देख रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि वे फिल्म नहीं बल्कि वैब सीरीज देख रहे होते हैं. जी हां आज वैब सीरीज ऐंटरटेनमैंट के एक नए माध्यम के रूप में सामने आया है, जिस में न तो सास बहू का ड्रामा होता है और न ही ब्रेक का झंझट.

आप ने अभी तक कोई वैब सीरीज नहीं देखी, आप को वैब सीरीज के बारे में नहीं पता? कोई बात नहीं, हम आप को बता रहे हैं वैब सीरीज के बारे में ताकि आप भी इस के ऐंटरटेनमैंट से अछूते न रहे.

क्या है वैब सीरीज

वैब सीरीज स्क्रिप्टेड वीडियो की एक सीरीज है जो अलगअलग विषयों पर आधारित होती है. आज के समय में इसे वैब टेलीविजन कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इस में एक कहानी को 4-6 ऐपिसोड में दिखाया जाता है और ये ऐपिसोड भी 15-45 मिनट के होते हैं, जिस की वजह से उबाऊ नहीं लगते.

क्या है वैब सीरीज में खास

वैब सीरीज की सब से बड़ी ताकत है बोल्ड कौंटैंट. इस में ऐसे विषयों का चुनाव किया जा रहा है जो सामाजिक समस्याएं या हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े होते हैं. दरअसल आज टीवी चैनलों पर यूथ औडियंस से संबंधित कौंटैंट की कमी है. यहां या तो सास बहू वाले टीवी सीरियल हैं या तो फिर डांस गाने वाले रियलिटी शो. इसी वजह से यूथ इंटरनैट की तरफ बढ़ रहे हैं. यहां उन्हें उन की पसंद के विषय मिलने के साथसाथ इन से जुड़ने का मौका भी मिल रहा है. वैब सीरीज की खास बात यह है कि इस में हर ऐपिसोड एक समय अंतराल के बाद आता है जिस से दर्शकों के बीच उत्सुकता बनी रहती है कि आगे क्या होगा.

क्यों बढ़ रही है मांग

यूट्यूब से मिलते रेवेन्यू ऐड प्लेसमैंट और विभिन्न ब्रांड्स के साथ टाईअप से आते धन के अलावा 3 जी और 4जी का आगमन और स्मार्टफोन के इस्तेमाल ने ऐंटरटेनमैंट का नया माध्यम खोल दिया है. इस में सिर्फ वन वे कम्यूनिकेशन नहीं होता कि आप ने कुछ बना डाल दिया और दर्शकों ने देख लिया बल्कि इस में दर्शक लाइफ, शेयर व कमैंट के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हैं कि वे क्या देखना चाहते हैं और क्या नहीं. उन्हें कौन सी चीजें खराब लगी और वे किन चीजों में सुधार चाहते हैं.

यूजर्स के लिए कैसे हैं फायदेमंद

सीरीज 15-45 मिनट की होती हैं जिस में सीमित या यूं कहा जाए कि न के बराबर ऐड होते हैं जिन्हें फारवर्ड या स्किप करना आसान होता है. इन वैब सीरीज का सब से बड़ा फायदा यह है कि आप इसे कहीं भी कभी भी, जहां चाहें वहां देख सकते हैं. आप को एक तय समय पर देखने की जरूरत नहीं है. आप इसे औनलाइन और औफलाइन दोनों प्रकार से देख सकते हैं. अगर आप के पास इंटरनैट की सुविधा नहीं है तो भी आप बिना किसी टैंशन के आसानी से देख सकते हैं. आप सोच रहे होंगे भला कैसे, तो कुछ इस तरह से कि आप अपने दोस्तों से अपने फोन, टैबलेट व लैपटौप में ले कर देख सकते हैं.

इस के अलावा इन वैब सीरीज को यूट्यूब इन के औफिसियल वैब चैनल और इन के ऐप में भी देखा जा सकता है. ऐप में देखने पर यह फायदा होता है कि ऐप से आप को नोटिफिकेशन आते रहता है कि कब नया सीजन शुरू होगा और कौन सा ऐपिसोड आ गया है.

सैंसरबोर्ड का पंगा नहीं

वैब सीरीज में बौराई हुई सैंसरशिप से नहीं जूझना पड़ता, न ही सैंसर बोर्ड से पास होने का इंतजार करना पड़ता है. इस में न केवल कैंची से बचा जाता है बल्कि अपनी क्रिएटिविटी दिखाने की पूरी आजादी मिलती है.

बौलीवुड सितारे भी नहीं हैं अछूते

ऐसा नहीं है कि इस में केवल वैसे कलाकार काम कर रहे हैं जिन्हें बौलीवुड में बे्रक नहीं मिल रहा है बल्कि इस में कई बौलीवुड स्टार भी काम कर चुके हैं, जिस में कल्की कोचलिन, स्वरा भास्कर, करणवीर मेहरा, परिणिति चोपड़ा, कुणाल कपूर, भूमि पेडनेकर, ऋचा चड्डा, रिया चक्रवर्ती, अली फजल जैसे कलाकार शामिल हैं. अब तो फिल्मों के डायरेक्टर भी वैब में आ रहे हैं. अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ को भी वैब सीरीज में तब्दील कर अंतराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया जा रहा है, जिसे खुद कश्यप ने आठ हिस्सों की एक वैब सीरीज का फैलाव दिया है. खबर आ रही है कि टेलीविजन क्वीन एकता कपूर भी एक वैब सीरीज ले कर आ रही हैं जिस में एयरलिफ्ट स्टार निमृत कौर होंगी. साथ ही बाजीराव मस्तानी का निर्माण करने वाला स्टूडियो इरोंस नाउ एक साथ तकरीबन छह वैब सीरीज पर काम कर रहा है. यही नहीं देश के सब से बडे़ फिल्म निर्माता में से एक यशराज फिल्म्स अपनी एक निर्माण शाखा ‘वाय फिल्मस’ के माध्यम से भी वैब सीरीज बना रही है.

ये फेमस वैब सीरीज नहीं देखी तो क्या देखा

परमानैंट रूममेट्स (Permanent Roomates)

पिचर्स (Pitchers)

बैंग बाजा बारात (Bang Baaja Baraat)

मैंस वर्ल्ड (Mens World)

अलिशा (Alisha)

बेक्ड (Baked)

बैड इंडियन (Bad Indian)

टैक कंवरसेशन विद डैड (Tech Conversation with Dad)

औन एयर विद एआईबी (On AIR with AIB)

सैक्स चैट विद पप्पू ऐंड पापा (Sex Chat with Pappu and Papa)

ट्रिपलिंग (Tripling)

औफिशियल चुकियागिरि (Official Chukiyagiri)

टैलेंट दिखाने का बैस्ट मंच

कम बजट और पौपुलर एक्टर नहीं होने के बावजूद वैब सीरीज को काफी लोकप्रियता मिल रही है और इन में काम करने वाले कलाकारों को भी नेम व फेम मिल रहा है. परमानैंट रूममेट्स से प्रसिद्ध हुए सुमित व्यास को आज वैब सीरीज का किंग कहा जाए तो गलत नहीं होगा. वैसे तो सुमित राइटर हैं लेकिन वैब सीरीज के माध्यम से इन्होंने अपनी अभिनय की कला को भी दिखाया है. वैब सीरीज उन लोगों के लिए एक बेहतर मंच प्रदान कर रहा है जिन के पास आइडिया है, लेखन की कला है. आप भी आसानी से अपना वैब सीरीज शुरू कर सकते हैं, बस आप के पास एक अलग व नया आइडिया होना चाहिए.

अनन्या बिड़ला बनी गायक

उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला की बेटी अनन्या बिड़ला अपनी सत्रह वर्ष की उम्र से ही कुछ नया करने का प्रयास करती रही हैं. सत्रह वर्ष की उम्र में 17 फरवरी 2012 में ‘‘स्वतंत्र माइक्रो फायनेंस’’ की स्थापना कर सबसे कम उम्र की महिला बिजनेस ओमन बन जाने वाली अनन्या बिड़ला के कदम तब से रूके नहीं हैं. अनन्या बिड़ला की कंपनी देहातों में कार्यरत महिला उद्यमियों को आर्थिक मदद देने का काम करती है. वैसे इस कंपनी को आदित्य बिड़ला ग्रुप ही धनराशि मुहैया करता है. उसके बाद 2015 मे अनन्या बिड़ला ने लक्जरी कंपनी ‘‘कुरोक्राट डाट काम’’ की शुरुआत की, जो कि आन लाइन लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट की कंपनी है. इसके तहत हाथ से बुने हुए कपड़े आन लाइन पूरे विश्व में बेचे जाते हैं और अब वह अपना पहला सिंगल गाना लेकर आयी हैं.

जी हां!  22 वर्ष की उम्र में अनन्या बिड़ला ने बारह नवंबर को मुंबई के एक पांच सितारा होटल में लाइव परफार्मेंस देते हुए अपने अंतरराष्ट्रीय सिंगल गाने ‘‘लिविन द लाइफ’’ को रिलीज किया. यह गाना इंटरनेट से पूरे विश्व के श्रोता डाउनलोड कर सकते हैं. इसी के साथ उन्हे संगीत कंपनी ‘’यूनिवर्सल म्यूजिक ग्रुप’’ ने अनुबंधित किया है. इस तरह अब अनन्या बिड़ला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने संगीत करियर की शुरुआत की है. इस सिंगल गाने के निर्माता व लेखक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जिम बियांज हैं. इस गाने को पेनसीलवैनिया के स्टूडियो में रिकार्ड किया गया.

इस गाने को रिलीज करने के बाद अनन्या बिड़ला ने कहा-‘‘मैने ‘लिविन द लाइफ’ को रिलीज करने के बाद अपने सपने को पूरा किया है. मुझे सदैव संगीत से प्यार रहा है. संगीत बनाने में मुझे आनंद की अनुभूति होती है. यह गाना खुद की तलाश है कि आप क्या हैं? मेरी राय में अपनी तलाश कर ही खुशियां पायी जा सकती हैं. मैं इस गाने के माध्यम से दूसरों तक प्यार फैलाना चाहती हूं.’’

अनन्या का मानना है कि वह बचपन से ही संगीत की शौकीन रही हैं. वह ए आर रहमान सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगीतकारों व गायकों से प्रभावित हैं.

कहानी-2 में पहली बार साथ दिखेंगे विद्या और अर्जुन

लेखक-निर्देशक सुजॉय घोष की फिल्म ‘कहानी २-दुर्गा रानी सिंह’ में मुख्य किरदारों में विद्या बालन और अर्जुन रामपाल नजर आने वाले हैं. अर्जुन और विद्या पिछले कई सालों से बॉलीवुड में काम कर रहें हैं, लेकिन यह पहली बार होगा, की यह दोनों प्रतिभावान एक्टर्स एक साथ एक फिल्म में नजर आयेंगें.

विद्या बालन ने २००५ में फिल्म परिणीता से बॉलीवुड में डेब्यु किया, तो अर्जुन रामपाल २००१ से फिल्मों में काम कर रहें हैं. लेकिन पिछले दस सालों में सिर्फ अवॉर्ड फंक्शन या फिर फिल्मी पार्टियों में ही मिले यह दो सितारें अब पहली बार एक साथ आयें हैं.

फिल्म से जुडे सूत्रों के अनुसार, विद्या बालन और अर्जुन रामपाल में कई सारी समानताएं हैं. यह दोनों राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त एक्टर्स हैं. यहीं नहीं, इन दोनों ने अपनें करियर की शुरुआत में मॉडलिंग, एड फिल्म्स की हैं. दोनों की एक्टिंग पारी की शुरुआत टेलिविजन से हुई और फिर दोनों ने बॉलीवुड में भी अपना अलग मकाम हासिल किया.

फिल्म से जुडे सूत्र बतातें हैं कि इन्हीं समानताओं की वजह से अर्जुन रामपाल और विद्या बालन में अच्छी दोस्ती होने में मदद हुई. इतना ही नहीं, दोनों को वर्ल्ड सिनेमा में काफी रुचि हैं, इसीलिए दोनों अक्सर सिनेमा के बारे में घंटों बातें करतें थे. एक साथ सीन करते वक्त एक-दूसरे के साथ का उनका समन्वय कमाल का था.

विद्या बालन और अर्जुन रामपाल के अभिनय से सजी, कुशल कांतिलाल गाडा, सुजॉय घोष, धवल जयंतीलाल गाडा और अक्षय जयंतीलाल गाडा के निर्माण में बनी, सुजॉय घोष द्वारा निर्देशित ‘कहानी-२ दुर्गा रानी सिंह’ २ दिसंबर को रिलीज हो रही है.

दीपिका ने अपनी गलती की सजा किसे दी?

कई वर्ष पहले हमने अंग्रेजी में एक सूक्ति पढ़ी थी. रूल नंबर वनः- बास इज आलवेज राइट. रूल नंबर 2 -इफ बास इज राग, देन सी द रूल नंबर वन. (हिंदी में अर्थ हुआ…नियम नंबर एकः बास हमेशा सही होता है. नियम नंबर दोः यदि बास गलत है, तो देखें नियम नंबर वन.). अब बास(दीपिका पादुकोण) द्वारा अपनी स्टाइलिश शलीना नथानी की छुट्टी की खबरों ने सभी को वही अंग्रेजी वाली सूक्ति याद दिला दी है.

वास्तव में पिछले रविवार को नीदरलैंड में संपन्न एमटीवी के संगीत अवार्ड समारोह में दीपिका पादुकोण जो पोशाक पहनकर रेड कारपेट पर चली थी, उसकी वजह से उन्हे ‘बौलीवुड ब्लंडर’ की संज्ञा पाने के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना झेलनी पड़ी. दीपिका पादुकोण के अति नजदीकी सूत्रों की माने तो इस आलोचना के बाद दीपिका पादुकोण ने अपनी या अपनी पीआर की गलतियों पर गौर करने की बजाय सीधी कारवाही करते हुए अपनी कई वर्ष पुरानी स्टाइलिश शलीना नथानी की छुट्टी कर दी.

बौलीवुड के सूत्र इसे दीपिका पादुकोण के अहंकार की संज्ञा दे रहे हैं. बौलीवुड के सूत्रों का मानना है कि क्या दीपका पादुकोण ने जब यह पोशाक पहनी थी, तब उन्हें समझ में नहीं आया था कि वह क्या पहन रही हैं. जबकि स्टाइलिश की डिजाइन की गयी पोशाक को पहनकर दीपिका ने कई बार देखा होगा कि वह उस पर फिट बैठती है या नहीं..हर इंसान कपडे़ पहनते ही इस बात का अहसास कर लेता है कि वह पोशाक उसके उपर सही लग रही है या नहीं. दीपिका पादुकोण भले खूबसूरत हों मगर हरे रंग का ब्रालेट और स्कर्ट का काम्बों उनके फिगर को बेहतर नहीं दिखा रहा था. यह बात एक अनाड़ी भी उन्हे बता सकता था. पर अपनी इस गलती को समझने की बजाय दीपिका ने दूसरे को बलि का बकरा बना दिया.

इतना ही नही बौलीवुड से जुड़े लोगों की राय में जब आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े मुकाम को छूने जा रही हों, तो एक समझदार इंसान उस मुकाम तक पहुंचने से पहले उसका हौव्वा खड़ा कर सबकी निगाहे इस तरह से अपनी तरफ नहीं खींचता कि लोग उसकी गलती तलाशने के लिए तैयार हो जाएं. जिन्हे उस मुकाम तक पहुंचने का शक होता है, वही उसे प्रचारित कर दूसरे तरह के लाभ उठाने का प्रयास करते हैं. पर दीपिका पादुकोण व उनकी पीआर टीम ने यहीं गलती कर दी.

जबकि बौलीवुड के कुछ बिचौलियों की राय में दीपिका पादुकोण में धैर्य नाम की चीज ही नहीं है. वह अंदर से खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी हैं. इसलिए भी उनसे जाने अनजाने गलतियां हो रही हैं. बालीवुड के इन बिचौलिए की माने तो यदि दीपिका पादुकोण ने संयम बरता होता और नीदरलैंड में संपन्न यूरोपीयन एमटीवी अवार्ड समाराह में रेड कारपेट पर चलने के बाद इसे प्रचारित कराती तो यह नौबत न आती और उन्हे फायदा होता..मगर दीपिका पादुकोण ने उलटी शुरुआत की. उलटी शुरुआत का नतीजा हमेशा नुकसान देता है. पर यह बात कौन समझाएगा..

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