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सैनिक पत्नियां : दहलीज से सरहद तक जद्दोजेहद

कहा जाता है कि शादी के समय अग्नि के सात फेरे लेने के साथ ही एक लड़की की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाती है, लेकिन सैनिकों की जीवनसंगिनी की अग्निपरीक्षा तो विवाहसूत्र में बंधने से पहले ही शुरू हो जाती है, क्योंकि उन्हें पहले से ही यह पता होता है कि शायद उन्हें अपनी आधी जिंदगी पति से दूर रह कर गुजारनी पड़े या न मालूम जिंदगी के किस मोड़ पर उन का हमसफर उन्हें तनहा छोड़ दे.

अंजना राजवंशी के पति भारतीय सेना में लैफ्टिनैंट कर्नल हैं. वे कहती हैं कि एक फौजी से शादी करने वाली लड़की पहले से ही ऐसे हालात से रूबरू होने के लिए तैयार रहती है. फिर भी शुरूशुरू में पति से दूर रहना पड़ता था. ऐसे में नए घरसंसार में रचनेबसने में जीवनसाथी के प्रेम और मदद की कमी कुछ हद तक खली.

वे आगे कहती हैं कि खासकर सिविल बैकग्राउंड से ब्याह कर आने वाली लड़कियों के लिए तो यह काफी मुश्किल भरा दौर होता है.

लेकिन अंजना दूर रह रहे अपने पति की गैरमौजूदगी में घर की जिम्मेदारी निभा कर देश के प्रति अपने फर्ज को बखूबी निभा रही हैं.

सैनिकों की पत्नियां घर से जुड़े तमाम काम और पारिवारिक जद्दोजेहद का बखूबी सामना करती हैं. घरपरिवार पर आने वाली मुसीबत से निबट कर वे दूर कहीं ड्यूटी दे रहे अपने पिया को बेफिक्र रखती हैं और उन्हें देश की हिफाजत करने का हौसला देती हैं.

पति का बनीं संबल

अनु माथुर एक सेना के अफसर की पत्नी हैं. वे कहती हैं कि चाहे बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना हो या खुद को डाक्टर को दिखाना हो, पति की गैरमौजूदगी में हर छोटीबड़ी जिम्मेदारी उन्हें ही निभानी होती है.

वे आगे बताती हैं कि उन का बेटा अर्जुन साढ़े 3 साल की उम्र में गंभीर रूप से घायल हो गया. ऐसे में पति से दिमागी संबल न मिल पाने के चलते वह दौर उन के लिए दोहरे इम्तिहान की तरह रहा.

एक और सेना के अफसर की पत्नी पूनम खंगारोत कहती हैं कि ऐसे उलट हालात को पौजिटिव रूप में लेना सीख लिया है. ऐसे हालात का अकेले मुकाबला करने से उन की फैसला लेने की ताकत और आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है.

दिलेरी से करती सामना

सरहद पर खतरे की जिंदगी गुजारने वाले सैनिकों के समान ही पत्नियों की जिंदगी भी खतरे से खाली नहीं होती. उन की घर की ड्यूटी सरहद की ड्यूटी के समान जोखिम भरी होती है, क्योंकि वे अपने पति की खैरखबर को ले कर चिंतित रहती हैं. लेकिन वे उन सब का सामना हिम्मत और दिलेरी से करती हैं.

रेखा शर्मा को ही लीजिए. उन के पति 12 साल से भारतीय सेना में सेवारत मेजर हैं. वे कहती हैं कि जब उन की फील्ड पोस्टिंग होती है, तो मानो कलेजा हर घड़ी मुट्ठी में रहता है. जब फोन पर बात नहीं हो पाती है, तो किसी अनहोनी के डर से दिल घबराने लगता है. कुछ इलाके ऐसे भी होते हैं, जहां से बातचीत करना मुश्किल होता है या इमर्जैंसी में वो टूट ही जाती हैं. ऐसे में बस टैलीविजन, अखबार पर ही नजर लगी रहती है.

एक सैनिक की पत्नी अनु बताती हैं कि लड़ाई न चलने पर भी माइंस बिछाना जैसी आर्मी ऐक्सरसाइजेज खतरे से खाली नहीं होतीं. फिर जब मईजून की झुलसाती गरमी में पति रेतीले टीलों या ठिठुरती ठंड में सियाचिन में मुस्तैद हों, तो दिल यों ही रो उठता है. ऐसे में वे खुद को संभालती हैं और अपना हौसला बनाए रखती हैं.

वतन के वास्ते

सैनिक की पत्नी अंजना राजवंशी कहती हैं कि यों तो वे काफी हिम्मत से काम लेती हैं, लेकिन जब उन की तबीयत ज्यादा खराब होती है, तो पति से दो मीठे बोल सुनने को तरस जाती हैं. तब लगता है कि काश, वे भी साथ होते. सुखदुख के मौकों पर दूसरे शादीशुदा जोड़ों को देख कर कभीकभी एक टीस सी उठती है.

मांबाप दोनों, फिर भी…

पूनम बताती हैं कि उन के सिजेरियन बच्चा होने पर भी वे अपने पति से 4 महीने बाद मिल सकी थीं.

अपनी शादीशुदा जिंदगी के इन 16 सालों में पूनम को पति की कमी अब सब से ज्यादा खलती है, जब उन का बेटा 10वीं जमात में पढ़ रहा है. उन का कहना है कि उम्र के इस नाजुक दौर में उसे पिता के साथ की सब से ज्यादा जरूरत है.

पूनम आगे कहती हैं कि हालांकि वे बच्चों को मातापिता दोनों का ही प्यार देने की कोशिश करती हैं, लेकिन जब पति साथ होते हैं, तो बच्चों के चेहरे पर खुशी पढ़ कर ऐसा लगता है कि काश, वक्त यहीं थम जाए.

ये हिम्मती औरतें बताती हैं कि ज्यादातर फील्ड पोस्टिंग पर रहने वाले पिताओं की तो उन के छोटे बच्चों के लिए पहचानना भी मुश्किल हो जाता है. लेकिन वे बच्चों को हौसला देती हैं. पिता की कमी वे उन्हें महसूस नहीं होने देतीं.

हौसलाअफजाई जरूरी

सरोज राणावत के पति भी भारतीय सेना में हैं. उन का मानना है कि फौजियों के लिए पौजिटिव नजरिया अपनाना बहुत जरूरी है. अगर वे घर की तरफ से बेफिक्र नहीं रहेंगे, तो देश के प्रति अपना फर्ज कैसे निभा पाएंगे.

एक फौजी की पत्नी के लिए हौसला और हिम्मत होना बहुत जरूरी है. ऐसे सैनिकों की दिलदार और जद्दोजेहद करने वाली पत्नियां अपने हालात को एक छोटी सी समस्या समझती हैं, क्योंकि उन्हें नाज है अपने जीवनसाथी पर, जो दूर कहीं रह कर वतन की हिफाजत में मुस्तैद हैं.   

पढ़ा लिखा मूर्ख

रमेश पढ़ा लिखा था और सुरेश अनपढ़. रमेश एक कारखाने में नौकरी करता था और सुरेश खेतीबारी. इतना फर्क होने पर भी वे दोनों गहरे दोस्त थे. उन के नातेरिश्तेदार भी उन की दोस्ती को मानते थे.

एक दिन रमेश ने सुरेश से कहा, ‘‘सुरेश, तुम मेरी ससुराल चले जाना और ससुराल वालों से कहना कि वे मेरी वाइफ को भेज दें या तुम उसे अपने साथ लेते आना. मुझे वहां जाने की फुरसत नहीं मिल रही है.’’

‘‘ठीक है, मैं चला जाऊंगा,’’ सुरेश ने हामी भर दी.

कुछ दिनों बाद रमेश ने सुरेश से कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें एक छोटा सा काम सौंपा था, तुम ने उसे भी नहीं किया. लगता है, तुम मेरी परेशानी को नहीं समझते.’’

‘‘ऐसा भी कहीं हो सकता है कि मैं तुम्हारी बात टाल दूं,’’ सुरेश बोला.

‘‘तो क्या तुम मेरी ससुराल गए थे?’’

‘‘हां, गया था.’’

‘‘फिर मेरी वाइफ को पहुंचाने के बारे में ससुराल वालों से नहीं कहा?’’

‘‘कहा ही नहीं, मैं उसे अपने साथ लाया हूं. मैं तो उसी दिन चला गया था और शाम को वापस भी आ गया था. मैं ने उसे अपने रास्ते में बजाया भी, बहुत मजा आया. तुम्हारी वाइफ तो बहुत मजेदार है.’’

‘‘सुरेश, जरा होश में रह कर बात कर, पागल तो नहीं हो गया है. किस की बात कर रहा है?’’ रमेश ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हारी वाइफ की बात कर रहा हूं. वह इतनी मीठी है कि जो उसे होंठों पर लगाता है, वह कुछ पलों के लिए तो पागल ही हो जाता है. दोस्त, मैं तो उसी दिन से उस के पीछे पागल हूं.’’

‘‘बेवकूफ, तू मेरी वाइफ के पीछे पागल है. इतने दिनों से तू उसे अपने घर में रखे हुए है. आज तेरी दोस्ती की पोल खुल गई. तू दोस्त नहीं दुश्मन है,’’ कहते हुए रमेश उस पर उबल पड़ा. ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इतनी छोटी सी बात पर तेरे दिमाग में इतना बड़ा तूफान क्यों उठ खड़ा हुआ है? तुम जिस चीज का हमेशा इस्तेमाल करते हो, अगर 5-6 दिन उस का इस्तेमाल तुम्हारे दोस्त ने कर लिया, तो उस से तुम्हारा क्या बनबिगड़ गया?’’

‘‘क्या बनबिगड़ गया है, मैं अभी बताता हूं,’’ कहते हुए रमेश ने उस के गालों पर तड़ातड़ तमाचे जड़ने शुरू कर दिए. ‘‘रमेश, क्यों बेकार में मुझे मारते हो? मैं तुम्हारी वाइफ अभी तुम्हारे हवाले किए देता हूं. वैसे, वह इस समय मेरे घर पर भी नहीं है.’’

‘‘घर पर नहीं है तो और कहां है?’’ रमेश चीखा.

‘‘पड़ोसी के पास.’’

‘‘पड़ोसी के पास… वहां कैसे पहुंची?’’ रमेश गुर्राया.

‘‘पड़ोसी मुझ से बोला, ‘तुम तो 5-6 दिनों से इस का लुत्फ उठा रहे हो, पड़ोसी होने के नाते मेरा भी इस पर कुछ हक है. मुझे भी 1-2 दिन इसे बजा लेने दो. मैं भी इस का स्वाद चख लूं.’ ‘‘उस के ऐसा कहने पर मुझ से इनकार करते नहीं बना और मैं ने तुम्हारी वाइफ उसे दे दी.’’

यह सुन रमेश का खून खौल उठा. वह सुरेश की मरम्मत करते हुए बोला, ‘‘नीच, तुम ने मेरी वाइफ को खिलौना बना दिया है. अगर मैं ने तुझे जेल में न सड़ाया, तो मैं अपने बाप की असली औलाद नहीं.’’

सुरेश आंसू पोंछते हुए बोला, ‘‘अगर तुम्हें अपनी वाइफ से इतनी मुहब्बत थी, तो फिर मुझे लाने के लिए ही क्यों भेजा था? चल, मैं थानेदार से सारी बातें साफसाफ कहूंगा.’’ थाने पहुंच कर रमेश ने सुरेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. थानेदार दोनों को साथ ले कर सुरेश के पड़ोसी के घर पहुंचा. उस ने सुरेश के पड़ोसी से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे यहां रमेश की वाइफ है?’’ ‘‘है, पर वह मैं ने सुरेश से ली थी.’’

‘‘तुम ने सुरेश से क्यों ली?’’

‘‘सुरेश को उसे बजातेबजाते 5-6 दिन हो गए थे. मैं ने सोचा कि मैं भी बजा कर देखूं, कैसी बजती है?’’

‘‘उसे यहां बुलाओ,’’ थानेदार ने हैरान हो कर कहा.

‘‘हुजूर, वह बुलाने की चीज नहीं है, वह वाइफ है, इनसान नहीं.’’

‘‘इनसान नहीं है…’’ सुन कर थानेदार चौंका, ‘‘क्या है, मुझे दिखाओ?’’ पड़ोसी ने अंदर से ला कर एक बांसुरी थानेदार को पकड़ा दी.

‘‘सुरेश, क्या तुम रमेश की ससुराल से इसी बांसुरी को लाए थे?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘हां, हुजूर.’’

‘‘रमेश तो कहता है कि सुरेश मेरी वाइफ को ले आया है.’’

‘‘हुजूर, यही तो है रमेश की वाइफ.’’

‘‘माजरा क्या है, मुझे साफसाफ बताओ?’’ थानेदार ने सुरेश से पूछा.

‘‘सर, रमेश ने मुझ से कहा था कि मेरी ससुराल से मेरी वाइफ को ले आओ. वाइफ क्या होती है, यह मैं नहीं जानता था और आज भी नहीं जानता हूं. मैं ने रमेश की ससुराल में जा कर उस की सास से कहा, ‘रमेश ने अपनी वाइफ लाने के लिए मुझे भेजा है.’

‘‘जवाब में उस की सास ने मुझ से पूछा, ‘वाइफ क्या होती है मुझे समझाओ. मैं नहीं जानती.’

‘‘मैं ने उस से कहा, ‘यह तो मैं भी नहीं जानता.’

‘‘तब उस ने अपनी लड़की से पूछा, ‘वाइफ किसे कहते हैं? तुम्हारे पति ने सुरेश के हाथ वाइफ को मंगाया है.’

‘‘वह बेचारी अनपढ़, देहाती लड़की ‘वाइफ’ को क्या जाने?

‘‘बहुत सोचविचार करने के बाद वह बोली, ‘मेरी अटैची में उन की बांसुरी रखी है. शायद वे बांसुरी को ही वाइफ कहते होंगे.’

‘‘फिर उस ने अटैची में से बांसुरी निकाल कर अपनी मां से कहा, ‘यही वाइफ है, इसे सुरेश को दे दो.’

‘‘उस की मां ने मुझे बांसुरी देते हुए कहा, ‘लो, यह है रमेश की वाइफ. जा कर उस दे देना.’

‘‘तब से मैं बांसुरी को ही वाइफ समझता रहा.’’

सुरेश का जवाब सुन कर थानेदार रमेश पर बिगड़ा, ‘‘गलती खुद करता है और इलजाम दूसरों के सिर लगाता है. अगर तू ने वाइफ की जगह पर बीवी या औरत बोला होता, तो यह सब नहीं होता.

‘‘तू ने इस बेचारे सुरेश को बेमतलब मारापीटा. इस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, मुझे यहां बुला कर परेशान किया…’’

‘‘दारोगाजी, इस पढ़ेलिखे मूर्ख को माफ कर दो. साथ ही, इस से कह दो कि बोलचाल में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल न करे, जिन्हें सुनने वाला न समझ सके,’’ सुरेश ने दारोगा से मिन्नत की.

सुरेश की बातें सुन कर रमेश शर्म से पानीपानी हो गया और अपनी गलती पर अफसोस करने लगा.

नोट पर लगेगा टैक्स

जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विस टैक्स की बात कर जनता को टैक्स से राहत देने की बात करने वाली केन्द्र सरकार अब नोट पर टैक्स लगाने की तैयारी में है. सरकार इस बहाने कैशलेश सिस्टम को बढ़ाने की बात कर रही है. अगर सरकार की मंशा केवल कैशलेश को बढ़ाना भर है तो उसे कैशलेस खरीददारी को हर तरह के टैक्स से मुक्त कर देना चाहिये. आज भी डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड से पेट्रोल लेने पर अलग से पैसा लिया जाता है. इसी तरह स्वाइप मशीन और रेलवे टिकट कार्ड से बुक कराने पर अलग से पैसा कट रहा है.

सरकार के तमाम दावों के बाद कैशलेस ट्रांजेक्शन करने पर अलग टैक्स देना पड़ रहा है. अगर कैशलेस को बढ़ावा देना है तो ऐसे ट्रांजेक्शन पर दूसरे टैक्स बंद किये जाये. सरकार इससे उलट अब कैशलेश को बढ़ावा देने के लिये नोट पर टैक्स लगाने का विचार कर रही है. सरकार का यह नियम बनाने जा रही है कि अगर आप दिन में एटीएम से 15 हजार से अधिक और बचत खाते से 50 हजार से अधिक का कैश पैसा निकालेंगे तो इस पर फीस लेगी. सरकार ने बड़ी होशियारी से इसे फीस का नाम नहीं दिया है. इसे रखरखाव शुल्क का नाम दिया जा रहा है.

वित्त मंत्री अरूण जेटली कहते हैं नकदी के बजाय डिजिटल लेनदेन अपनाने से छोटे कारोबारियों की देनदारी में 46 फीसदी तक की कमी आयेगी. इससे कारोबारियों को लाभ होगा. वित्त मंत्री ने कहा कि अगर बैंक के जरीये कारोबार का लेनदेन होता है तो 66 लाख रुपये तक के सालाना कारोबार करने वालों को धारा 80 सी के तहत देनदारी शन्यू होगी. डिजिटल को प्रमोशन देने वालों को इससे पहले भी 30 फीसदी लाभ देने की बात कही गई थी.

केन्द्र सरकार नोटबंदी और टैक्स सिस्टम को लेकर बारबार जिस तरह से बयान बदल रहे हैं जनता को भरोसा हट रहा है. विरोधी नेता खुलकर कहने लगे है कि यह सरकार की नादानी को दिखाता है. इससे साफ लगता है कि नोटबंदी का फैसला हडबडी और बिना तैयारी के किया गया. अब अपने फैसले को सही ठहराने के लिये रोजरोज नये कानून बन रहे हैं. पहले यह कहा गया कि नोटबंदी से आतंकवाद, भ्रष्टाचार और नकली नोट पर रोक लगेगी. अब सरकार इस बात को भूल नोटबंदी को कैशलेस से जोड रही है.

सही बात यह है कि सरकार की अनुभवहीनता साफ दिख रही है. नोटबंदी ने देश की प्रगति को पूरी तरह से प्रभावित किया है. मजदूर से लेकर कोराबारी तक सब परेशान हैं. इससे भ्रष्टाचार, नकली करेंसी और आंतकवाद नहीं रुका तो सरकार अब कैशलेस की बात करने लगी है. एक के बाद एक फैसले बदलने से कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि रिजर्व बैंक प्रधानमंत्री के सूट की तरह अपने कानून बदल रहा है.

‘हृदयांतर’ से मनीष पॉल करेंगें मराठी डेब्यु..!

मनीष पॉल अब मराठी सिनेमा में डेब्यु करने जा रहें हैं. प्रतिभाशाली अभिनेता और मशहूर टीवी होस्ट विक्रम फडनीस की फिल्म हृदयांतर में एक स्पेशल अपिअरन्स में दिखेंगें.

विक्रम फडनीस निर्देशित फिल्म हृदयांतर में मनिष खुद की ही भूमिका में नजर आने वालें हैं. विक्रम फडनीस प्रोडक्शन्स और यंग बैरी एन्टरटेन्मेट (प्रताप सरनाईक औऱ उनके बेटे पुर्वेश सरनाईक) के निर्माण में बन रहीं फिल्म हृदयांतर एक भावुक कहानी है. इस फिल्म में मुक्ता बर्वे और सुबोध भावे मुख्य भुमिका में हैं.

काफी समय से मनीष पॉल और विक्रम फड़नीस एक दूसरे के दोस्त रह चुके हैं. हाल ही में मनीष ने अपने दोस्त की इस फिल्म के लिए बच्चों के साथ शूटिंग की. मनीष का कहना हैं,“ विक्रम ने मुझे हृदयांतर की कहानी सुनायी. जो मुझे काफी पसंद आयी. उन्होंने मुझे पूछा की, क्या मैं फिल्म में गेस्ट अपिअरन्स करना चाहूंगा. तो मैंने तुरंत हा कह दिया. विक्रम बेहद प्रतिभाशाली हैं. और मैं काफी खुश हूं की, मैं उनकी पहली फिल्म का हिस्सा बन सका हूं. बच्चों के साथ शूटिंग करना एक रोचक अनुभव था.’’

मनीष को निर्देशित करने के अनुभव के बारे में बताते हुए विक्रम ने बताया, “खुद की ही भूमिका निभाते हुए मनीष आपको फिल्म में नजर आयेंगे. एक स्कूल के वार्षिक खेल दिवस पर एक सेलिब्रिटी मेहमान की तरह भूमिका निभाते हुए वह दिखायी देंगें. हमने उन्हे यह भूमिका निभाने के लिए इसलिए संपर्क किया, क्योंकि, हम जानते हैं कि मनीष युवा पीढ़ी में और खासकर, बच्चों में काफी लोकप्रिय हैं. खेल दिवस के लिए मुख्य अतिथि के रूप में मनीष के आने से सेट पर काफी उत्साह का माहौल रहा. बच्चे काफी खुश थे. और मनीष ने भी काफी शानदार काम किया हैं. इस फिल्म में मनीष का काम अच्छा रहा है. मराठी फिल्म के सेट पर आना मनीष के लिए भी एक अलग अनमुभव था. खेल दिवस की शूटिंग करते वक्त जरूरी रहीं उर्जा मनीष की मौजुदगी से फिल्म में दिखायी दे रहीं थी.“

शोर मचाने वाले ही ज्यादा एडल्ट फिल्में देखते हैं : सनी लियोनी

साल 2011 से बौलीवुड में कदम रखने वाली सनी लियोनी ने अपनी एक खास जगह बना ली है. उन्हें आज हर तरह की फिल्में और टीवी शो में काम करने का मौका मिल रहा है. आज उन का नाम हर फिल्मकार, डायरैक्टर जानता है. इस कामयाबी के पीछे उन का सैक्सी लुक है, जिस की मांग आजकल के फिल्मकारों को होती है. कनाडा के ओन्टारिओ में जनमी सनी लियोनी का असली नाम करनजीत कौर वोहरा है. उन के पिता चंडीगढ़ के पंजाबी सिख हैं और मां हिमाचल प्रदेश के सिरमौर की हैं. बचपन से ही सनी चुस्त थीं. हमेशा लड़कों के साथ हौकी खेलती थीं. उन्हें आइस स्कैटिंग करना पसंद था. जब करनजीत कौर 13 साल की थीं, तब उन के माता पिता अमेरिका के कैलीफोर्निया में जा कर बस गए थे. वहीं उन की पढ़ाई हुई. पहले उन की इच्छा थी कि वे नर्स बनें. डाक्टर के काम से भी ज्यादा वे नर्स के काम को अहम मानती थीं. इस के लिए उन्होंने नर्स का कोर्स भी किया.

कोर्स के दौरान वहां उन के साथ पढ़ रही किसी दोस्त के कहने पर मौडलिंग के लिए वे एक फोटोग्राफर से मिलीं. पोज दिया और एक मैगजीन के कवर पर आईं. यहीं से उन के पोर्न स्टार बनने की नींव पड़ गई. सनी लियोनी ने 21 साल की उम्र में पोर्न इंडस्ट्री में कदम रखा था. मैगजीन के कवर पेज पर उन की फोटो आने के बाद सनी के पास औफरों की भरमार लग गई थी. अमेरिका के सब से बड़े पोर्न प्रोडक्शन हाउस के साथ सनी लियोनी को 3 साल का एग्रीमेंट मिला. साथ ही, उन्हें पोर्न फिल्म इंडस्ट्री में भी ऐंट्री मिली. शुरूशुरू मे सनी लियोनी केवल समलैंगिक पोर्न फिल्में ही किया करती थीं, जिन में वे सिर्फ लड़कियों के साथ काम करती थीं. बाद में उन की पौपुलैरिटी को देख कर उन्हें मर्दों के साथ भी फिल्म करने के औफर मिलने लगे. सनी लियोनी भारत में ‘बिग बौस’ शो के जरीए आईं, जहां वे 49 दिन रहीं. वहीं पर महेश भट्ट ने उन्हें फिल्म ‘जिस्म 2’ का औफर दिया, जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया. यहीं से उन के बौलीवुड का सफर शुरू हुआ. इस के बाद ‘रागिनी एमएमएस 2’, ‘एक पहेली लीला’, ‘मस्तीजादे’, ‘वन नाइट स्टैंड’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया. उन्हें हिंदी बोलना और समझना अच्छी तरह आता है. वे नौजवानों की पसंदीदा हीरोइन हैं. इसलिए टैलीविजन शो ‘स्प्लिट्सविला 9’ शो होस्ट किया है. उन से मिल कर बात करना रोचक था. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

इस शो से जुड़ने की वजह? आप का सैक्सी लुक कितना सब को अपनी ओर खींचता है?

दरअसल, मुझे इस शो की थीम काफी पसंद आई और मैं अपने सैक्सी लुक पर कभी भी ज्यादा ध्यान नहीं देती. यह सही है कि सैक्सी लुक की वजह से ही मैं इस शो का हिस्सा बनी हूं. इस शो के सभी लड़के और लड़कियां गुड लुकिंग हैं. लड़के तो सारे सिक्स पैक ऐब्स वाले हैं. सब की अच्छी बौडी है. लड़कियां भी खूबसूरत हैं.

प्यार में जिस्मानी खिंचाव का होना कितना जरूरी होता है?

सब से पहले तो आप अपने साथी की पर्सनैलिटी को देखते हैं. उस की कदकाठी, चेहरा, बाल वगैरह सबकुछ. उस के बाद उस से प्यार होता है. अगर वही सही नहीं, तो खिंचाव कैसा और प्यार कैसा?

आप ने हिंदी कैसे सीखी, जबकि आप विदेश में पलीबढ़ी हैं?

मैं ने हिंदी सीखने के लिए एक टीचर रखा था. मेरे लिए हर कोई ट्यूटर है. मेरे स्टाफ से ले कर टीम के सारे लोग, जिन से मैं कुछ न कुछ हमेशा सीखती रहती हूं.

विदेश और भारत की फिल्म इंडस्ट्री में आप क्या फर्क पाती हैं?

दोनों में बहुत फर्क है. यहां मुझे ज्यादातर काम मेरे फिगर पर मिल रहा है, जबकि अमेरिका में मेरी पहचान अलग थी. मैं ने कभी सोचा नहीं था कि मुझे यहां इतना काम मिलेगा. मेरे लिए यहां काम करना अपने सपने को पूरा होने वाली बात साबित हुई है.

अब तक का सफर कैसा रहा?

5 साल के इस सफर में बहुत सारे उतारचढ़ाव आए. कुछ खराब आए, जिस से मैं ने बाहर निकलना सीखा और यह भी सीखा कि आगे कैसे बढ़ना है. लोगों ने मेरी पिछली जिंदगी के बारे में पूछा, पर मैं क्या कर सकती थी. मैं ने उस का जवाब दिया. मुझे जो काम मिला, मैं ने किया. उस समय मुझे वह ठीक लगा. अब नहीं लगता, इसलिए कुछ अलग करने की कोशिश चल रही है.

जब आप की एक अलग पहचान बन जाती है, तो आप की जिंदगी खुली किताब होती है. आप कुछ छिपा नहीं सकते.

यहां की संस्कृति से आप कैसे तालमेल बिठाती हैं?

मैं पंजाबी हूं. मुझे यहां के संस्कार पता हैं. यहां का खाना मैं बहुत पसंद करती हूं. काम के समय मैं कुछ भी खा लेती हूं. पर हर शुक्रवार और शनिवार को पिज्जा नाइट या इटालियन फूड का दिन होता है, जबकि ‘रविवार’ को सब्जी, दाल, रोटी, चावल सब खाती हूं.

अब तक का सब से अच्छा कौंप्लिमैंट क्या था?

जब फिल्म ‘बेईमान लव’ रिलीज हुई, इस में मैं ने वह भूमिका निभाई थी, जो पहले कभी नहीं की थी. लोगों ने मेरे काम को देखा और उन्हें लगा कि मैं भी कुछ ऐक्टिंग कर सकती हूं. इस से पहले भी कौंप्लिमैंट्स मिले थे, पर वे मेरी एडल्ट फिल्मों के लिए मिले थे. कोई भी ऐक्टिंग आसान नहीं होती.

एडल्ट फिल्मों से फैमिली फिल्मों में आने की अपनी इमेज को आप कैसे देखती हैं?

मैं ने कभी अपनी इमेज को बदलना नहीं चाहा. मुझे अपनी जिंदगी से प्यार है. मैं जो भी हूं, उस में खुश हूं. अभी मेरी सारी फिल्में सीरियस परफोर्मैंस वाली हैं, एडल्ट नहीं. अगर दर्शकों को वे फिल्में पसंद आएंगी, तो मैं और ज्यादा वैसी फिल्में करूंगी.

‘एडल्ट’ फिल्मों में धर्म का दखल कितना होता है? फिर चाहे वे फिल्में विदेशी हों या हमारे यहां की?

हर जगह सैंसरशिप है. यहां पर करोड़ों लोग हैं, इसलिए आवाज तेज होती है. अमेरिका में भी सैंसरशिप है. जो फिल्म ‘एडल्ट’ के लिए है, वह ‘एडल्ट’ फिल्म ही है. अगर ‘ए सर्टिफिकेट’ है, तो भारत हो या विदेश, बच्चों को नहीं देखनी चाहिए. विदेश में भी लोग हंगामा करते हैं और मैं इसे सही मानती हूं. अगर आप की उम्र 18 साल है, तो आप ‘एडल्ट’ फिल्म जरूर देखें, क्योंकि लाइफ की नैचुरल चीजों को भी जानना जरूरी है. लेकिन ये फिल्में समाज को गलत रास्ते पर ले जा रही हैं, इसे मैं नहीं मानती, क्योंकि शोर मचाने वाले लोग ही ऐसी फिल्में ज्यादा देखते हैं.

क्या आप की बौलीवुड में कोई दोस्त है?

मैं अभी कुछ ऐसे लोगों से मिली हूं, जिन से मैं पहले कभी नहीं मिली थी. उन में प्रियंका चोपड़ा खास हैं.

आप का सपना क्या है?

मैं अच्छा काम कर के सब का दिल जीतूं. मेरे दोस्त और मेरा परिवार सेहतमंद और सुरक्षित रहें. मेरी संजय लीला भंसाली के साथ काम करने की इच्छा है.

आगे की योजनाएं क्या हैं?

मेरी इच्छा है कि कुछ अच्छी फिल्में करूं. बच्चे की मां बनूं, क्योंकि मैं कुछ अलग अनुभव करना चाहती हूं.

क्या कोई कुछ मलाल रह गया है?

निजी तौर पर तो ऐसा कुछ भी नहीं है. मैं ने जो भी किया, अपनी मरजी से किया. मुझे लगा कि उस समय वही सही समय था. मुझे किसी ने यह नहीं कहा कि आप को यही करना है. मेरी जिंदगी बहुत अच्छी है और मैं इस से खुश हूं.

अभी आप को शाहरुख खान के साथ फिल्म ‘रईस’ में एक गाना करने का मौका मिला है. क्या इसे आप अपने कैरियर का अच्छा समय मानती हैं?

बिलकुल अच्छा समय मानती हूं, क्योंकि मैं न तो फिल्म इंडस्ट्री से थी और न ही कोई मेरा यहां है. ऐसे में जब मुझे शाहरुख खान का फोन आया, तो मैं चौंक गई और पूछा कि क्या वे सही में सनी लियोनी यानी मुझ को ही फोन लगा रहे हैं? मुझे यह जान कर अच्छा लगा कि मुझे उन के साथ काम करने का मौका मिला. अभी तो मैं अरबाज खान के साथ भी एक फिल्म कर रही हूं.          

शतरंज की सरताज: आकांक्षा हगवणे

3 अक्तूबर, 2016 की ढलती दोपहर, स्थान पश्चिमी साइबेरिया में इर्तिश नदी के किनारे बसा नगर खांती मांसीस्क का उग्रा टेनिस सेंटर, जहां कुछ ज्यादा ही चहलपहल थी, क्योंकि वहां 20 सितंबर से चली आ रही वर्ल्ड यूथ चेस चैंपियनशिप के फाइनल मुकाबले हो रहे थे. दुनिया के कोने कोने से आए शतरंज के 3,500 से भी अधिक दिग्गज इस में भाग ले रहे थे.

अंडर 16 वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप के ताज के प्रत्याशियों में एक थी भारत की आकांक्षा हगवणे, जो पुणे के एक सब्जी विक्रेता श्रीनाथ हगवणे की इकलौती बेटी है. 16 वर्षीय आकांक्षा के आमतौर पर शांत और गंभीर चेहरे पर उत्कंठा के भाव छिपाए नहीं छिप रहे थे. उस ने कुछ समय पहले ही पोलैंड की अलीत्स्या स्लिविका को अपने 11वें और अंतिम मुकाबले में मात दी थी.

इस मुकाबले में 8 अंक ले कर नीदरलैंड्स की एनामाया कजारियान के साथ बराबरी कर चुकी थी. मंजिल नजर तो आ रही थी, लेकिन जीत और उस के बीच कुछ फासला अभी शेष था. आकांक्षा जहां स्लिविका से जीतीं, वहीं कजारियान ईरान की मोबीना अलीनासाब से हार गई. अंतिम तालिका में आकांक्षा ने अलीनासाब तथा रूस की पोलीना शिवालोवा से आधा अंक अधिक अर्जित कर बाजी मारी.

आकांक्षा को इस चैंपियनशिप के आरंभ में 12वां स्थान प्राप्त हुआ था, लेकिन 11 मुकाबलों में 9 अंक अर्जित करने वाली आकांक्षा ने अपनी विजय यात्रा के दौरान रूस की गलीना क्रपीविना, बल्गारिया की वेरा, तुर्की की सायनेन गुंडोगन, नीदरलैंड्स की एनामाया कजारियान, पोलैंड की ओलिविया कियोलबासा, चीन की याओ लैन और पोर्तो रिको की डानिटजा मैकारिनी को परास्त कर दिया. 2 मुकाबले अनिर्णीत रहे और केवल एक में आकांक्षा पराजित हुई. लेकिन 7वें मुकाबले में शिवालेवा से मिली पराजय को उस ने अपने हौसले की राह का रोड़ा नहीं बनने दिया और अगले 4 खेलों में काफी सूझबूझ और धीरज के साथ विजय पताका लहराई.

आकांक्षा इस प्रतियोगिता में 14, 16 तथा 18 आयुवर्गों में भाग लेने वाले 18 भारतीयों में स्वर्ण पदक जीतने वाली अकेली भारतीय रही. अब तक कुल 2,300 अंक प्राप्त कर के वह इंटरनैशनल वूमन मास्टर की श्रेणी में पहुंच गई है और उस का लक्ष्य महिला ग्रैंडमास्टर बनना है.

आकांक्षा कहती है, ‘‘यह मेरा पहला विश्व खिताब है. मैं जीतने की उम्मीद के साथ इस चैंपियनशिप में नहीं उतरी थी. मैं तो बस, हर मुकाबले में अपनी सर्वोत्तम कोशिश करना चाहती थी, अपना पूरा जोर लगा देना चाहती थी. रूस में जीत हासिल करने के बाद आकांक्षा ने अपनी सफलता का श्रेय अपने प्रशिक्षक जयंत गोखले को दिया, जो पिछले 9 वर्ष से उन का मार्गदर्शन कर रहे हैं.’’

अगस्त से अक्तूबर 2016 के दौरान आकांक्षा ने इस विश्व खिताब के अतिरिक्त 2 और उल्लेखनीय सफलताएं भी हासिल कीं. श्रीलंका में आयोजित अंडर 16 कौमनवैल्थ चैंपियनशिप और कोलकाता में आयोजित अंडर 17 राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी न केवल उस का प्रदर्शन जबरदस्त रहा, बल्कि उस ने स्वर्ण पदक भी अपने नाम कर लिया. रूस में मिली विजय की बदौलत अगले वर्ष दक्षिण अमेरिका में होने वाली वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप के लिए अब उस का सीधा चयन हो गया है. निजी जीवन में आकांक्षा बहुत शर्मीले स्वभाव की है, लेकिन शतरंज की बिसात और मुहरों को सामने पा कर उस में कमाल का बदलाव देखने को मिलता है. न केवल उस का आत्मविश्वास बल्कि कुछ कर गुजरने का जनून भी अपने परवान पर पहुंच जाता है.

आकांक्षा का जन्म 22 अगस्त, 2000 को हुआ. 7 साल की उम्र से ही आकांक्षा में शतरंज के प्रति रुचि उत्पन्न हो गई थी. आकांक्षा बताती है, ‘‘एक बार गरमी की छुट्टियों में मैं अपने भाइयों, गौरव और हर्षद के साथ टाइम पास कर रही थी कि मेरे पिताजी ने शतरंज की अपनी पुरानी बिसात निकाली और हमें खेल सिखाने लगे, क्योंकि हम बहनभाई बहुत झगड़ते थे और पिताजी को शायद लगा हो कि शतरंज से हम अधिक केंद्रित, सहनशील तथा एकाग्र हो सकेंगे. बस, यहीं से मेरी शतरंज यात्रा आरंभ हुई.

‘‘बचपन में मेरा और भी कई खेलों से परिचय हुआ, लेकिन शतरंज से मेरा विशेष लगाव बना रहा. आज भी मेरे पिताजी मेरी प्रेरणा हैं. वे स्वयं राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज और रैफरी रह चुके हैं. उन्होंने मुझे सपने देखने तथा उन सपनों को साकार करने के लिए अथक प्रयत्न करने की प्रेरणा दी है. मेरे प्रशिक्षक जयंत गोखले ने भी मुझ में विश्वास दिखा कर मेरे जीवन को नई दिशा दी है. मुझे सदा ही मेरी मां, दादी तथा शिक्षकों से बहुत प्रोत्साहन मिला, जिस से मुझे आगे बढ़ने की शक्ति मिलती रही है.’’

आकांक्षा के पिताजी कहते हैं, ‘‘आकांक्षा में काफी कम उम्र से ही शतरंज को ले कर गहरी ललक थी. मैं ने पहले आकांक्षा को जोसेफ डिसूजा अकादमी में प्रवेश दिलवाया तथा वहां उस की तरक्की देख कर गोखले सर के मार्गदर्शन में सौंप दिया. तब से आकांक्षा अपनी आयुवर्ग में जिला स्तर की प्रत्येक प्रतियोगिता में विजयी रही है. 2013 में एक ही वर्ष में अंडर 13, 15 और 17 के आयुवर्गों में चैंपियन बनने की अद्भुत उपलब्धि भी उसी के नाम दर्ज है.’’

वर्ल्ड यूथ चेस चैंपियनशिप को याद करते हुए आकांक्षा के प्रशिक्षक जयंत गोखले कहते हैं, ‘‘आकांक्षा ने दबाव में न आ कर काफी धीरज, समझदारी तथा निश्चय के साथ अपने मुकाबले खेले और विजयी हुई. कुल साढ़े 5 घंटे तक चले अंतिम मुकाबले के लिए आकांक्षा ने पहले से ही काफी तैयारी की हुई थी. वास्तविक मुकाबला उसी तर्ज पर हुआ और समूचे अभ्यास का आकांक्षा को 90 चालों के लंबे अंतिम मैच में काफी फायदा हुआ. अगस्त और सितंबर में 2 बड़ी प्रतियोगिताएं जीतने की वजह से आकांक्षा का आत्मविश्वास पहले ही बुलंदी पर था.’’

आकांक्षा ने 2009 में पहली बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लिया था. उस वर्ष वह 9 वर्ष से कम आयुवर्ग में छठे स्थान पर रही, लेकिन 2012 में आयोजित स्कूल नैशनल गेम्स में उस ने स्वर्ण पदक जीता और राष्ट्रीय सबजूनियर वर्ग में द्वितीय स्थान पर रहीं.

2014 में एशियाई युवा शतरंज प्रतियोगिता में उन्होंने कांस्य पदक अर्जित कर पहली बार अंतर्राष्ट्रीय सफलता हासिल की. आकांक्षा का कहना है, ‘‘मैं ने इस प्रतियोगिता से बहुत कुछ सीखा. मुझे यह पता चला कि विदेशी प्रतिस्पर्धी अकसर किताबी नीतिनियमों के अनुसार नहीं खेलते, बल्कि अपनी अलग रणनीति स्वयं बनाते हैं, जिस से उन पर विजय पाना मुश्किल हो जाता है. इस के बाद मैं ने अपना खेल बेहतर करने पर अधिक करीब से ध्यान देना आरंभ किया और अधिक तैयारी करने लगी.’’

आकांक्षा आज भी प्रतिदिन 4 घंटे शतरंज का अभ्यास करती है. पढ़ाई के साथसाथ शतरंज के अभ्यास एवं क्षेत्रीय, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए समय निकालना अपनेआप में चुनौती से कम नहीं है, पर आकांक्षा यह काफी योजनाबद्ध तरीके से, सहजतापूर्वक कर लेती हैं. इसीलिए उन के शिक्षक और शतरंज के प्रशिक्षक उन से काफी प्रसन्न रहते हैं.

अपने आदर्श नौर्वे के विश्व शतरंज चैंपियन मैग्नस कार्ल्सन के बारे में आकांक्षा का मानना है, ‘‘वे कभी परिवर्तन से नहीं डरते. इसीलिए खेल में हमेशा नई चालें, नई रणनीतियां अपनाते रहते हैं. वे खेल को आसान बना देते हैं.’’

आकांक्षा कहती हैं, ‘‘आज तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है. हर दिन काबिल, हुनरमंद खिलाडि़यों का उदय हो रहा है. अंडर 13 का खिताब जीतने के बाद मुझ में आत्मविश्वास जगा. मैं ने जाना कि मेहनत से सबकुछ संभव है.’’               

व्हाट्स ऐप पर ‘सेंट’ मैसेज को करें ‘अनसेंट’

व्हाट्स ऐप मेसैंजर पर कभी-कभी हम गलत मैसेज भेज देते हैं. यूजर्स को कई बार इस परेशानी का सामना करना पड़ता है. व्हाट्स ऐप का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले लोगों को इस परेशानी का सामना करना पड़ता है. कई बार एक समय पर कई लोगों से चैट करते वक्त हम किसी और का मैसेज किसी और भेज देते हैं.

कई बार ऐसा भी होता है कि मैसेज भेजने के बाद एहसास होता है कि ये मैसेज गलत है या ये बात नहीं कहनी चाहिए थी. लेकिन एक बार मैसेज सेंड हो जाने पर हम कुछ नहीं कर पाते.

व्हाट्स ऐप अपने यूजर्स को नए अपडेटेड फीचर देता रहता है लेकिन अब तक कोई भी ऐसा फीचर ऐप की ओर से नहीं लाया गया जिसकी मदद से आप भेजे जा चुके मैसेज को 'अनसेंट' कर सकें. हम आपको आज ऐसी ही ट्रिक बता रहे हैं जिसकी मदद से आप सेंट मैसेज को अनसेंट कर सकते हैं.

अगर आप किसी को मैसेज भेज रहे हैं जो आप नहीं भेजना चाहते तो ऐसे में आप मैसेज के सेंड होते ही तुरंत अपना वाई-फाई या डेटा कनेक्शन बंद कर दीजिए. इस बात का खास ख्याल रखिए की आपको इस काम को तेजी से करना है.

जब तक मैसेज सेंड होने पर सिंगल टिक ना आया हो तब तक डेटा ऑफ करके आप गलत मैसेज भजेने से बच सकते हैं.

अगर आपको लगता है कि आप डेटा ऑफ करते वक्त चूक सकते हैं तो ऐसे में मैसेज सेंड होते वक्त मैसेज के कोने में बने क्लॉक साइन से इसे डिलीट कर करके मैसेज को अनसेंड कर सकते हैं.

 

कुछ ही महीने में मेरी शादी होने वाली है. मैं जानना चाहता हूं कि फोरप्ले क्या होता है.

सवाल

मैं 23 साल का हूं. कुछ ही महीने में मेरी शादी होने वाली है. मैं जानना चाहता हूं कि फोरप्ले क्या होता है?

जवाब

सेक्स करने से पहले बीवी को जोश में लाने की कोशिश ही फोरप्ले कहलाता है. इस के तहत बीवी के होंठों, उभारों व खास अंगों को चूमा जाता है. यही काम बीवी भी कर सकती है, पति को जोश में लाने के लिए. इस से बाद में सैक्स करने से और भी ज्यादा मजा आता है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

नई कंपनी खोलने में लगेंगे सिर्फ 4 दिन

सरकार ने भारत को कारोबार करने के लिहाज से दुनिया के 50 सबसे अच्छे देशों में शामिल कराने के लिए कुछ ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जहां कारोबार से जुड़े पेचीदा नियमों को खत्म करने और प्रोसेस को इतना आसान बनाने की जरूरत है कि चार दिन में बिजनेस शुरू किया जा सके. भारत 190 देशों वाले वर्ल्ड बैंक की ईज ऑफ डूइंग इंडेक्स में 130वें पायदान पर है. इसको देखते हुए फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली ने उन क्षेत्रों की पहचान के लिए सोमवार को मीटिंग बुलाई थी जहां काम करके देश में कारोबारी माहौल बेहतर बनाया जा सकता है.

अब मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स से जुड़े मामलों को एक ही जगह सुलझाया जाएगा. इसके अलावा पैन/टैन और एंप्लॉयी प्रॉविडेंट फंड/एंप्लॉयी इंश्योरेंस के रजिस्ट्रेशन के लिए एक ईबिजनेस पोर्टल बनाया जाएगा. आधिकारिक बयान के मुताबिक, मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स, सीबीडीटी, मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड एंप्लॉयमेंट बिजनेस शुरू करने के लिए प्रोसीजर की संख्या और दिनों को घटाकर 4 दिन करने पर काम करेंगे.

भारत में बिजनेस शुरू करने में कम से कम तीन हफ्ते का वक्त लगता है. श्रम सुविधा पोर्टल ऐसा पोर्टल होगा जहां रिटर्न, चालान फाइल किया जा सकेगा. साथ ही एंप्लॉयी प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन और एंप्लॉयी स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन को ऑनलाइन पेमेंट दिया जा सकेगा. डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू और मिनिस्ट्री ऑफ शिपिंग इस महीने के अंत तक डायरेक्ट डिलीवरी कंसाइनमेंट की संख्या 40% बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे.

भारत को टॉप 50 में लाने के लिए एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की लागत और समय दोनों को कम किया जाएगा. वर्ल्ड बैंक की हालिया ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में भारत को 130वां  रैंक मिला था. 

जीमेल से भी बेहतर हैं ये ईमेल सर्विसेज

वॉट्सऐप और फेसबुक मैसेंजर जैसे ऐप्स के पॉप्युलर होने के बावजूद ऑफिसियल या जरूरी बात कम्यूनिकेट करने के लिए अब भी ईमेल का इस्तेमाल किया जा रहा है. जीमेल दुनिया की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली सर्विस है. इसमें स्मार्ट सर्च, लेबल सपॉर्ट, हैंगाउट्स और ड्राइव जैसी कई सर्विसेज हैं.

मगर कुछ ईमेल प्रोवाइडर ऐसे भी हैं, जो जीमेल जैसे ही शानदार फीचर्स देते हैं. इनके कुछ फीचर्स तो जीमेल से भी बेहतर है.

आउटलुक डॉट कटम (Outlook.com)

अगर आप माइक्रोसॉफ्ट का ईकोसिस्टम इस्तेमाल करते हैं तो आपको आउटलुक इस्तेमाल करने में कोई दिक्कत नहीं होगी. यह वन ड्राइव और ऑफिस ऑनलाइन जैसे प्रॉडक्ट्स के साथ जुड़कर शानदार अनुभव देता है. इसमें स्वीप, पिन और बिल्ट-इन चैट जैसे कई फीचर्स हैं. इसमें अनलिमिटेड स्टोरेज भी मिलती है.

जोहो (Zoho)

जोहो में कई सारे ऐसे फीचर्स हैं, जो अन्य ईमेल सर्विसेज में नहीं हैं. इसके इंटरफेस में कहीं पर भी कोई ऐड नजर नहीं आता. फ्री अकाउंट में भी नहीं. इसका यूजर इंटरफेस सरल है और आप अपनी पसंद के हिसाब से कई सारे लेआउट चुन सकते हैं.

यह आईएमएपी (IMAP) और एक्सचेंज ऐक्टिवसिंक जैसे ईमेल प्रोटोकॉल्स को सपॉर्ट करता है. डॉक्युमेंट्स एडिट या क्रिएट करने के लिए इसमें अपना सूट (Suite) भी है. इसे भारत के श्रीधर वेंबू ने शुरू किया है. फ्री लेवल पर 5 जीबी का डॉक्युमेंट स्टोरेज स्पेस मिलता है, जिसे अपग्रेड किया जा सकता है.

यानडेक्स (Yandex)

शायद आपने इसका नाम पहले कभी न सुना हो, मगर यह रूस के सबसे बड़े सर्च इंजन यानडेक्स (andex) की मेल सर्विस है. इसमें 10 जीबी का फ्री ईमेल स्पेस मिलता है. कंपनी दावा करती है कि जैसे ही आपके अकाउंट में सिर्फ 200 MB की जगह बचती है, अपने आप 1 जीबी स्टोरेज बढ़ा दी जाती है. इसमें ग्रुप मेसेजिंग, लेबल, फाइल और ऐंटीवाइरस स्कैनिंग जैसे फीचर्स हैं.

मेल डॉट आरयू (Mail.ru)

यह भी रूस की पॉप्युलर ईमेल सर्विस है. रूस में इस कंपनी की बहुत सारी वेबसाइट्स हैं, जो काफई पॉप्युलर हैं. यह सर्विस सभी ईमेल फॉरमैट्स को सपॉर्ट करती है और उनके ईमेल पुल कर सकती है. 25 जीबी की फ्री क्लाउड स्टोरेज भी मिलती है.

प्रोटोन मेल (ProtonMail)

अगर आप सिक्यॉर ईमेल सर्विस चाहते हैं तो यह आपके लिए बेस्ट है. एमआईटी (MIT) और सीईआरएन (CERN) के रिसर्चर्स ने इसे तैयार किया है. यह एनक्रिप्टेड ईमेल सर्विस है, जिसे स्विट्जरलैंड में होस्ट किया गया है. यहां पर प्रिवेसी के बहुत सख्त कानून हैं. आईओएस (iOS) और ऐंड्रॉयड के लिए इसके ऐप्स भी हैं.

आई क्लाउड (iCloud)

अगर आप ऐपल डिवाइसेज इस्तेमाल करते हैं तो आई क्लाउड मेल (iCloudmail) आपके लिए अच्छा ऑप्शन है. यह ऐपल की कई सर्विसेज से जुड़ा रहता है. इसमें कोई ऐड भी नहीं है. थोड़ी सी मुश्किल आपको हो सकती है, क्योंकि इसमें अडवांस्ड फीचर्स कम हैं. साथ ही इसे वेब पर ऐक्सेस करने के लिए आपका आई क्लाउड (iCloud) अकाउंट किसी ऐप डिवाइस पर सेटअप होना चाहिए.

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