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ओम पुरी की मौत का गहराता राज

ओम पुरी की मौत के चार दिन बाद भी उनकी मौत का रहस्य सुलझने की बजाय उलझता ही जा रहा है. पोस्टमार्टम खत्म होने के बाद ओम पुरी के सिर पर जखम के निशान के आधार पर पहले तो पुलिस ने कहा कि उन्हे इसमें बहुत ज्यादा जटिलता नजर नहीं आ रही है, मगर जिस तरह से तेजी से कई घटनाक्रम बदले, उससे पुलिस चुप भले हो, मगर सूत्र बता रहे हैं कि पुलिस विभाग की भी नींद हराम हो गयी है.

सोमवार की शाम पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासे हुए हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार उनके सिर पर चोट के निशान, कालर बोन व लेफ्ट आर्म पर हेअर लाइन फ्रैक्चर था. मुंबई की ओशिवारा पुलिस के सूत्रों के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सिर पर डेढ़ इंच गहरा व चार सेंटीमीटर चौड़ा जखम था. कई जगह खून जमा हुआ था. कालर बोन व लेफ्ट आर्म पर हेअर लाइन फ्रैक्चर था. परिणामतः अब पुलिस महकमे को ओम पुरी की मौत के पीछे कोई बहुत गहरी साजिश नजर आ रही है.

शक की सुईयां फिल्म ‘‘रामभजन जिंदाबाद’’ के निर्माता खालिद किदवई पर भी उठ रही हैं. पुलिस पिछले चार दिन में खालिद किदवई से कई बार पूछताछ कर चुकी है. वास्तव में गुरुवार, पांच जनवरी को देर रात तक खालिद किदवई ही ओम पुरी के साथ थे.

वास्तव में फिल्म निर्माता खालिद किदवई ने ओम पुरी को उनके घर रात 10.46 पर छोड़ा था और उनकी मौत रात 1.30 से 3 बजे के बीच हुई है. ओम पुरी का मोबाइल भी गायब है. इससे यह नही पता चल रहा है कि ओम पुरी ने उसके बाद किसी से बात की थी या नहीं? सूत्र कह रहे हैं कि इमारत के सीसीटीवी फुटेज में खालिद किदवई की कद काठी का इंसान रात में अंदर जाते देखा गया, पर बाहर निकलते नहीं दिखा. पुलिस की तरफ से अभी तक सीसीटीवी फुटेज को लेकर सिर्फ यह कहा जा रहा है कि पुलिस ने इमारत के अंदर आने जाने वालों का रिकार्ड रजिस्टर व सीसीटीवी फुटेज जब्त किए हैं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अलावा ओम पुरी की मौत की तारीख, उनकी असीम धन दौलत व दूसरी पत्नी नंदिता पुरी से चल रहे तलाक के मुकदमे के अलावा जिस तरह से ओम पुरी की मौत के बाद आनन फानन में नंदिता पुरी ने ओमपुरी के सभी बैंक खातों को फ्रीज करवाया है, जिस तरह से नंदिता पुरी ने ओम पुरी के फ्लैट, आफिस व बंगले पर अपना ताला लगाया है, उससे भी कई तरह के शक शुबह गर्म हो गए हैं.

ओम पुरी के कई करीबियों से मिली जानकारी के अनुसार ओम पुरी के मुंबई में तीन बैंको में खाते हैं, जिन्हे उनकी मौत के बाद उनकी दूसरी पत्नी नंदिता पुरी, जिनसे तलाक का मुकदमा चल रहा है, ने फ्रीज करवाया है. ओम पुरी के पास मुंबई में आधा दर्जन फ्लैट, आफिस, खंडाला व कर्जत में बंगले के अलावा राजस्थान के झालावाड़ में बहुत बड़ा घर है.

ओम पुरी ने सबसे पहले अन्नू कपूर की बहन सीमा कपूर के साथ प्रेम विवाह किया था. मगर यह शादी एक साल भी नहीं टिक पायी थी. ओम पुरी ने 1993 में नंदिता पुरी के संग दूसरी शादी कर ली थी. जिनसे उनका बेटा ईशान है. 2009 में नंदिता पुरी ने अपने पति ओम पुरी पर ‘‘अनलाइकली हीरोःओम पुरी’’ नामक एक बायोग्राफी वाली किताब लिखी थी. जिसे नंदिता ने बिना ओम पुरी को पढ़ाए ही बाजार में डाल दिया था और तब पता चला कि इस बायोग्राफी वाली किताब में ओम पुरी की चारित्रिक हत्या की गयी है. इसमें ओम पुरी के अवैध संबंधों के बारे में भी लिखा गया है. इसी के चलते ओम पुरी व नंदिता पुरी के बीच दरार पैदा हुई और तभी से  दोनों ने अलग अलग रहना शुरू किया.

2013 में नंदिता पुरी ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए ओम पुरी से तलाक के साथ साथ उन पर घरेलू हिंसा के आरोप भी लगाए थे. तब से नंदिता पुरी बेटे ईशान के साथ ओम पुरी से अलग ओम पुरी के ही लोखंडवाला वाले फ्लैट में रहती आ रही हैं. सूत्रों का दावा है कि ओम पुरी, नंदिता पूरी को हर माह तीन लाख रूपए खर्च के लिए दे रहे थे. इनके बीच तलाक के मुकदमे की सुनवाई 16 जनवरी को होनी है. माना जा रहा था कि 16 जनवरी को इनका तलाक होना तय था और ओम पुरी हमेशा के लिए नंदिता पुरी से स्वतंत्र हो जाएंगे.

एक सूत्र के अनुसार नंदिता पुरी से अलग होने के बाद ओम पुरी की नजदीकियां पहली पत्नी सीमा कपूर के साथ बढ़ गयी थी. कुछ सूत्र तो यह भी दावा कर रहे हैं कि ओम पुरी ने नंदिता पुरी से तलाक होने के बाद सीमा कपूर से शादी करने का मन बना लिया था. उन्होंने इस बारे में नंदिता से साफ साफ बात कर ली थी. हमेशा के लिए अलग होने के लिए ओम पुरी, नंदिता को आठ करोड़ रूपए देने के लिए मान गए थे. मगर तलाक की सुनावाई से महज 10 दिन पहले ओम पुरी की मौत और उसके बाद जिस तरह से नंदिता पुरी ने आनन फानन ने ओम पुरी के बैंक खातों को फ्रीज करवाया है, जिस तरह से नंदिता पुरी ने ओम पुरी के फ्लैटों पर अपना ताला लगवाया है, वह बात किसी की समझ में नहीं आ रही है.

ओम पुरी की अस्थियों को नासिक में विसर्जन करके वापस लौटते समय नंदिता पुरी खंडाला के ओम पुरी के बंगले में भी गयी और वहां अपना ताला लगाकर आयीं. इस वजह से अब लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर नंदिता को यह सब करने की जल्दी क्या है?

सूत्र बताते हैं कि नंदिता पुरी ने ओम पुरी के सेक्रेटरी और उनके ड्रायवर मिश्रा पर शक जाहिर किया है. जबकि ड्रायवर मिश्रा पिछले 25 वर्षों से ओम पुरी के साथ काम कर रहे हैं. उनकी मासिक तनख्वाह 16 हजार है. ओम पुरी ने ड्रायवर को सुबह सात बजे घर पर बुलाया था, क्योंकि उन्हें अमरीकन एंबेसी जाना था. जब ड्रायवर शुक्रवार की सुबह ओम पुरी के घर पहुंचा और ओम पुरी ने दरवाजा नहीं खोला, तो ड्रायवर ने पड़ोसियों से इस बारे में पूछा. फिर पुलिस को फोन किया गया. पुलिस की मौजूदगी में ही घर का दरवाजा खोला गया. पर नंदिता पुरी ने जिस तरह से ओम पुरी के बैंक खाते फ्रीज करवाए हैं, उससे ड्रायवर की तनख्वाह का चेक बाउंस हो गया है.

उधर पुलिस ने नंदिता पुरी को पूछताछ के लिए बुलाया था, पर वह अब तक गयी नहीं. बहानाबाजी करती रही हैं. नंदिता ने पुलिस से कहा है कि वह ओम पुरी का चौथा सम्पन्न होने के बाद पुलिस स्टेशन आएंगी. अब देखना है कि मंगलवार 10 जनवरी को पुलिस स्टेशन पहुंचकर नंदिता पुरी क्या बयान देती हैं?

अब पुलिस इन सारे पहलुओं पर जांच कर रही है. उसकी जांच बहुत कुछ नंदिता पुरी के बयान के अलावा ओम पुरी की विसरा जांच रिपोर्ट पर निर्भर करती है. सूत्र मानते हैं कि पुलिस हर हाल में नंदिता पूरी से यह सवाल कर सकती है कि उन्हे ओम पुरी के मकान व बंगले पर अपना ताला लगाने और बैंक खाते फ्रीज करवाने की इतनी जल्दी क्यों मची है? बहरहाल, ओम पुरी की मौत का रहस्य गहराता जा रहा है. अब पुलिस की जांच किस करवट बैठती है, उस पर सभी की निगाहें हैं.

मार्च में आ रही हैं ये चार सिक्वअल फिल्में

2016 में ‘तुम बिन 2’, ‘रॉक ऑन 2’, ‘कहानी 2’ सहित लगभग सभी सिक्वअल फिल्मों का बाक्स आफिस पर बहुत बुरा असर हुआ. पर सिक्वअल फिल्मों का निर्माण लगातार जारी है. 2017 में भी कई सिक्वअल फिल्में आनी हैं. जिनमें से ‘सरकार 3’, ‘कमांडो 2’, ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ और ‘नाम शबाना’ सहित चार सिक्वअल फिल्में तो मार्च माह में सिनेमा घर में पहुंचने वाली हैं.

कमांडो 2

3 मार्च 2017 को विपुल अमृत लाल शाह द्वारा ‘सनसाइन पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित व देवेन भोजानी निर्देशित फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ प्रदर्शित होगी. यह 2013 की सफल फिल्म ‘‘कमांडो’’ की सिक्वअल है. एक्शन प्रधान इस फिल्म में मुख्य भूमिका विद्युत जामवाल की है. मजेदार बात यह है कि देवेन भोजानी की पहचान हास्य अभिनेता के रूप में है. पर पहली बार वह एक एक्शन प्रधान फिल्म निर्देशित कर रहे हैं. इसमें अदा शर्मा, फ्रेडी दारूवाला, ठाकुर अनूप सिंह, ईशा गुप्ता व आदिल हुसेन की भी अहम भूमिकाएं हैं.

बद्रीनाथ की दुल्हनिया

2014 में प्रदर्शित ‘‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’’ में एक बार फिर आलिया भट्ट और वरूण धवन की जोड़ी नजर आएगी. 10 मार्च को प्रदर्शित होने वाली यह एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है. जो कि ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ का सिक्वअल है. फिल्म के अन्य कलाकार हैं- गौहर खान, गौरव पांडे, अनमोल जैन, श्वेता बसु प्रसाद, गिरीश कनार्ड और अनुपम खेर. मगर गत वर्ष सिक्वअल फिल्मों को जो हश्र हुआ, उससे घबरकार वरूण धवन इसे सिक्वअल फिल्म नही मानते हैं. 

सरकार 3

17 मार्च 2017 को प्रदर्शित होने वाली राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘‘सरकार 3’’ उनकी पिछली फिल्मों ‘सरकार’ का सिक्वल है. राजनीतिक अपराध पर आधारित रोमांचक फिल्म में अमिताभ बच्चन, जैकी श्राफ, मनोज बाजपेयी, रोनित राय, यामी गौतम, पराग त्यागी, रोहिणी हट्टंगड़ी और अमित साध अभिनय कर रहे हैं. इसका निर्माण अलुम्बरा एंटरटेनमेंट और वेव सिनेमा कर रहा है. जबकि इस फिल्म को ‘इरोज इंटरनेशनल’ प्रस्तुत कर रहा है.

नाम शबाना

शीतल भाटिया व नीरज पांडे निर्मित और लेखक व निर्देशक शिवम नायर की एक्शन प्रधान रोमांचक फिल्म ‘‘नाम शबाना’’ 31 मार्च 2017 को रिलीज होगी. यह 2015 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘बेबी’’ का प्रिक्वअल है. फिल्म में तापसी पन्नू, मनोज बाजपेयी, पृथ्वीराज सुकुमारन, अक्षय कुमार, एली अवराम व अनुपम खेर की मुख्य भूमिकाएं हैं.

किट्टी पार्टी को दें नया लुक

किट्टी पार्टी का नाम आते ही जेहन में गृहिणियों की गोष्ठी का चित्रांकन हो उठता है. हंसीठिठोली, गपशप, चुगलियां करती, बनीसंवरी, खानेपीने की सामग्री के अंबार के साथ अपने घर की साजसज्जा व क्रौकरी का दिखावा करती गृहिणियां. लेकिन अब किट्टी पार्टियों की रूपरेखा भी बदल रही है. अब हर किट्टी पार्टी एकजैसी नहीं होती, बल्कि भिन्नभिन्न समूह भिन्नभिन्न तरीकों से अपनी किट्टी आयोजित करते हैं, तो फिर देर किस बात की है? नववर्ष में आप भी बदल डालिए अपनी किट्टी का रंगरूप और उसे दे डालिए नया लुक.

हर बार नया अंदाज

बैंगलुरु की शोभा सोसाइटी की महिलाओं ने किट्टी का थीम रखा ‘टपोरी’ और सभी महिलाएं टपोरीनुमा तैयार हो कर आईं. किसी ने गले में रूमाल बांधा तो किसी ने गाल पर मस्सा बनाया.

मुंबई के शारदा हाउसिंग कौंप्लैक्स की महिलाओं ने अपनी किट्टी का थीम रखा ‘मुगल’. सभी महिलाएं कामदार अनारकली सूट पहन कर आईं. मेजबान ने मुगल जमाने की तरह ही अपनी बैठक को सजाया और शेरशायरी का माहौल बनाया.

पुणे की एक किट्टी की सदस्याओं ने यह निर्णय लिया कि वे हर बार अलग राज्य की भांति तैयार होंगी और उस राज्य की खास बातें एकदूसरे से बांटेंगी जैसे उस राज्य का इतिहास, वहां का खास भोजन, वहां के खास दर्शनीय स्थल, वहां का नृत्य इत्यादि और जो कोई महिला उस राज्य में घूमने गई हो, वह वहां खींची गई तसवीरें भी सब को दिखाएगी.

और भी कईर् आकर्षक थीम हो सकती हैं. मसलन, रैट्रो लुक अर्थात पुराने समय की हीरोइनों की तरह तैयार हो कर आना या फिर डिस्को लुक, जिस में आप अपने माथे पर सुनहरी डोरी बांध, चमचमाते कपड़े पहन ठुमक सकती हैं या फिर आने वाले त्योहारों को ध्यान में रखते हुए कोई लुक. अब हमारे समाज में विदेशी त्योहार भी उसी धूम से बनाए जाने लगे हैं जैसेकि वैलेंटाइनडे या हैलोवीन. वैलेंटाइनडे के दौरान लाल रंग का ड्रैसकोड, गुब्बारे या फिर दिल के आकार की सजावट की जा सकती है. ऐसे ही हैलोवीन जब मनाएं तब हर कोई डरावनी शक्ल बना कर आए. किट्टी की सभी सदस्याओं की राय लीजिए और हर बार अलग अंदाज में किट्टी पार्टी करिए.

किट्टी के बहाने खोजिए नए वेन्यू

अधिकतर किट्टी पार्टी का समय दोपहर या तीसरे पहर का होता है. सदस्याएं भी कई होती हैं. सभी महिलाएं संग मिल कर हर बार नईर् जगह जा सकती हैं. इस बहाने आप अपने शहर की नई जगह या नए रेस्तरां जा पाएंगी. इस तरह जीवन में मेलमिलाप के साथ नई जगह घूमने का आनंद भी जुड़ जाएगा.

नीता की किट्टी कभी आधुनिक सोच के चलते रेस्तरां चल देती है तो कभी शुद्ध शाकाहारी भोजन करने आंध्रा भवन. जिस की किट्टी पार्टी आयोजित करने की बारी होती है, उस की इच्छानुसार ही जगह और थीम को निश्चित किया जाता है.

मास्टर शैफ या दिलदार मेजबान

किसी महिला को खाना बनाने और नित नए ढंग से सजा कर खिलाने में आनंद आता है, तो किसी को बनाबनाया मिल जाए तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहता. नई दिल्ली की शेफाली स्वयं को मास्टर शैफ कहलाना पसंद करती है और उस की सहेलियां खुशीखुशी उसे यह पदवी देती हैं. शेफाली अपनी बारी आने पर किट्टी पार्टी अपने घर में ही रखती है और विभिन्न पकवान बना कर सब का दिल जीत लेती है. दूसरी तरफ उसी की किट्टी की मानसी है, जिसे खाना बनाने के नाम से भी चिढ़ होती है.

‘‘सारा दिन घर में सब के लिए इतना खाना बनाती हूं कि किट्टी की मेरी बारी आते ही मुझे बाहर जाने का बहाना दिखाई देने लगता है,’’ मानसी कहती हैं.

मानसी अपनी सभी सहेलियों को किसी न किसी रेस्तरां ले जा कर मनचाहे व्यंजन खिला कर लाती है. बड़ी उम्र की महिलाएं भी सुविधा के कारण किसी रेस्तरां जाना पसंद करती हैं.

नए खेलों से करें मनोरंजन

किट्टी में अंत्याक्षरी, तंबोला या हाउजी जैसे खेलों से मन भर गया हो तो अन्य नए खेलों को भी अवसर दीजिए. सभी सदस्याओं को अपने सब से फैशनपरस्त परिधान पहन कर आने को बोलिए और एक रैंपवाक रखिए या फिर यदि किसी के पास कैरिओके का सामान है तो कैरिओके का लुत्फ उठाएं. बच्चों के खेल जैसे लूडो, सांपसीढ़ी या फिर ऊनो में भी बहुत आनंद आता है. जी भर कर हंसिए और 4 घंटों में तरोताजा हो जाइए.

अपनी किट्टी को बनाएं साहित्य को बढ़ावा देने का मंच

आजकल पढ़ने की आदत कहीं पीछे छूटती जा रही है. साहित्य को बढ़ावा देने हेतु किट्टी पार्टी में कवितापाठ का कार्यक्रम रखा जा सकता है. सभी सदस्याएं अपनी मनपसंद कविता लिख कर या याद कर आएं और सब के बीच सुनाएं. इस के अलावा किट्टी में सदस्याओं को कहिए की अपनी पसंदीदा किताब की समीक्षा सब को सुनाएं. आप देखेंगी कि आप के बीच ही मार्मिक कविता लिखने वाली लेखिका छिपी है और पढ़ने की शौकीन पाठिकाएं भी हैं. पढ़ने से न केवल हमारा ज्ञान बढ़ता है अपितु हम अधिक संवेदनशील भी बनते हैं, हमारी अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता बढ़ती है, रूढिवादी विचारधारा से निकल पाने में सक्षम होते हैं. नित नए विषयों पर चर्चा करने से हमारे मानसिक परिप्रेक्ष्य की वृद्धि होती है.

केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, प्रेरणा प्रोत्साहन भी

अकसर देखा जाता है कि महिलाओं को आपसी प्रतिस्पर्धा और जलन से जोड़ा जाता है. किंतु आजकल की महिलाएं एकदूसरे की मदद करना चाहती हैं, जिस किसी में आत्मविश्वास की कमी हो, उसे ऊपर उठाना चाहती हैं. अपनी सखी का मेकओवर कर के उसे भी स्मार्ट बनाना चाहती हैं. किट्टी पार्टी में मिल कर महिलाएं एकदूसरे को प्रोत्साहित करती हैं, कुछ नया करने हेतु प्रेरणा देती हैं.

दिल्ली की सुमेधा बताती हैं कि उन का वजन बढ़ने पर उन की किट्टी की स्मिता ने उन्हें अपने साथ सुबह व शाम सैर पर ले जाना शुरू किया. इसी तरह लेखन की शौकीन प्रिया का अपनी कविताएं सुनाने का पहला मंच अपनी किट्टी से ही मिला. ऐसे ही जयपुर स्थित पद्मा ने अपनी किट्टी पार्टी की सहेलियों के साथ अपने शरीर को फिट बनाने के लिए जूंबा करना शुरू किया ताकि अपनी पसंद की पोशाकें पहन सकें. 

बाल विवाह में बिहार नंबर वन

11 साल की लड़की रिंकी रोतेबिलखते अपने मांबाप से कहती है, ‘‘हम को घर से मत निकालो… बाबूजी, रहम करो. अम्मां, तुम कुछ करो न… तुम कुछ क्यों नहीं बोलती हो…’’ पर उस के आंसुओं से किसी का भी दिल नहीं पिघलता.

रिंकी के तमाम रिश्तेदार और गांव वाले चुपचाप खड़े तमाशा देख रहे थे. परिवार के एक बुजुर्ग ने उलटा रिंकी को फटकारते हुए कहा, ‘‘ब्याह नहीं करेगी तो क्या जिंदगीभर बाप के घर बैठ कर रोटी तोड़ेगी? रोनेधाने से कुछ नहीं होगा. ब्याह कर और बाप का बोझ हलका कर. अपने पति का घर संभाल.’’ पटना से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर मसौढ़ी ब्लौक के कटका गांव के मंदिर के पास 20 नवंबर, 2016 की रात मासूम रिंकी की चीखपुकार सुन कर अच्छेअच्छों का दिल पसीज गया, पर परंपरा की जंजीरों में जकड़े उस के मांबाप और रिश्तेदार जबरन उस की शादी की रस्म अदा कराते रहे.

कुछ इसी तरह की कहानी बिहार के भोजपुर जिले के आरा की रहने वाली पूनम की भी है, जिस की शादी 12 साल की उम्र में कर दी गई थी. तब वह नहीं जानती थी कि शादी किस चिडि़या का नाम है? आज 22 साल की पूनम का यह हाल है कि उस के 4 बच्चे हो गए हैं और जिस्मानी रूप से वह इतनी कमजोर है कि ठीक से चलफिर भी नहीं पाती है. लड़कियों के खेलने और पढ़ने की उम्र में उन की शादी कर उन के मांबाप एक तो उन का बचपन छीन लेते हैं और जिस्मानी व मानसिक रूप से कच्ची होने के बाद भी बच्चे को जन्म देने की वजह से वे अपनी बेटी और उस के बच्चे की जान को खतरे में डाल देते हैं.

राष्ट्रीय परिवार सैंपल सर्वे के मुताबिक, देशभर में 22 से 24 साल तक की 47.4 फीसदी औरतें ऐसी हैं, जिन की शादी 18 साल से भी कम उम्र में कर दी गई. इस में 56 फीसदी औरतें गांवों की और 29 फीसदी शहरी इलाकों की हैं. देशभर में बाल विवाह के मामलों में बिहार नंबर वन पर है. बिहार में 69 फीसदी लड़कियों की 18 साल से भी कम उम्र में शादी कर मांबाप अपने ‘बोझ’ को हटा डालते हैं. वहीं राजस्थान में 57.6, उत्तर प्रदेश में 54.9, महाराष्ट्र में 40.4, मध्य प्रदेश में 53.8, छत्तीसगढ़ में 45.2, आंध्र प्रदेश में 54.8, पश्चिम बंगाल में 54.8, गुजरात में 35.4, असम में 38.6, ओडिशा में 37.5, तमिलनाडु में 23.3, गोवा में 12.1 फीसदी लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है.

कहने को तो बाल विवाह को रोकने और इसे बढ़ावा देने वालों पर कड़ी कार्यवाही के लिए ढेरों कानून बने हुए हैं, इस के बाद भी इस गलत परंपरा पर रोक नहीं लग पा रही है. बाल विवाह होने वाले देशों में भारत 11वें नंबर पर है. इस मामले में भारत बहुत ज्यादा पिछड़े अफ्रीकी देशों इथियोपिया व लीबिया के साथ खड़ा है. भारत के तमाम राज्यों में बाल विवाह के मामले में बिहार सब से आगे है. यह हैरानी की बात है कि राज्य की 69 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है. बिहार के पश्चिम चंपारण, कैमूर, रोहतास, मधेपुरा, गया, नवादा, जमुई, समस्तीपुर और वैशाली जिले में कानून और उस के रखवालों को ठेंगा दिखाते हुए सब से ज्यादा बाल विवाह हो रहे हैं.

पश्चिम चंपारण में 80 फीसदी लड़कियों की शादी पढ़ने और खेलने की उम्र में कर दी जाती है. नवादा में 73 फीसदी, रोहतास और कैमूर में 70 फीसदी, मधेपुरा में 66 फीसदी व वैशाली में 61.6 फीसदी लड़कियों को 18 साल से कम उम्र में ही ब्याह दिया जाता है. पटना जिले में 40 फीसदी लड़कियां बाल विवाह की शिकार बनती हैं. राज्य की समाज कल्याण मंत्री कुमारी मंजू वर्मा कहती हैं कि औरतों के पढ़नेलिखने और जागरूक होने से ही बाल विवाह पर रोक लग सकती है. इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए कानून से ज्यादा समाज की मदद की जरूरत है. यह सही है कि समाज में बड़ी तादाद में बाल विवाह हो रहे हैं, लेकिन समय पर सूचना न मिलने से कानून कुसूरवारों पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाता है. गांवों में होने वाले बाल विवाह को रोकने और उस पर नजर रखने के लिए सरपंचों को जिम्मेदारी दी गई है.

लड़कियों में जागरूकता के बगैर बाल विवाह पर रोक लगा पाना मुमकिन नहीं है. खुद को बाल विवाह की शिकार होने से बचाने वाली कुछ लड़कियां इस की जीतीजागती मिसाल हैं.

नेहरू युवा केंद्र से जुड़ी कटिहार की आरती, नारी शक्ति फाउंडेशन की सदस्य गया की राधिका, नवादा की रूबी और प्रमिला ने बताया कि उन्होंने किस तरह से खुद को बाल विवाह से बचाया. राधिका बताती है कि जब उस के पिता ने 15 साल की उम्र में ही उस की शादी तय कर दी, तो उस ने महिला संगठनों को बता दिया. इस से उस की शादी रुक गई. प्रमिला बताती है कि वह पढ़ना चाहती थी, पर उस के मांबाप उस की शादी करने पर उतारू थे. उस ने यह बात अपने स्कूल के मास्टर को बताई. मास्टर ने उस के मांबाप को समझाया और कानूनी कार्यवाही करने की चेतावनी दी. उस के बाद ही उस के पिता ने उस की शादी की जिद छोड़ी.

डाक्टर किरण शरण बताती हैं कि कम उम्र में शादी होने से लड़कियों पर बोझ डाल कर उन के मांबाप अपनी बेटियों को मौत के मुंह में धकेल देते हैं. कम उम्र में मां बन जाने से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा होता है. यह लड़के व लड़कियों के मांबाप और समाज को समझना चाहिए.   

क्या कहता है बाल विवाह रोकने का कानून

बाल विवाह प्रतिरोध अधिनियम, 2006 की धारा-2(ए) के तहत 21 साल से कम उम्र के लड़कों और 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को नाबालिग माना गया है. इस कानून के तहत बाल विवाह को गैरकानूनी करार दिया गया है.

बाल विवाह की इजाजत देने, शादी तय करने, शादी करवाने या शादी समारोह में हिस्सा लेने वालों को सजा दिए जाने का नियम है. कानून की धारा-10 के मुताबिक, बाल विवाह कराने वाले को 2 साल तक साधारण कारावास या एक लाख रुपए का जुर्माना की सजा दी जा सकती है. धारा-11 (1) कहती है कि बाल विवाह को बढ़ावा देने या उस की इजाजत देने वालों को 2 साल तक का कठोर कारावास और एक लाख रुपए जुर्माने की सजा हो सकती है.

टीनएज लौंजरी चुनने से पहले

टीनएज में अकसर हम यह गलती करते हैं कि किसी भी ड्रैस के साथ कोई भी ब्रा पहन लेते हैं, सोचते हैं क्या फर्क पड़ता है. लेकिन आप को यह जानना बहुत जरूरी है कि कौन सी ड्रैस के साथ कौन सी ब्रा पहननी चाहिए. जरा सोचिए, अगर आप ने एक अच्छी सी महंगी ड्रैस पहनी है लेकिन आप ने उस के साथ अपनी पुरानी नौर्मल ब्रा पहन ली, जबकि उस ड्रैस के साथ आप को पैडेड ब्रा पहननी चाहिए थी, तो आप का लुक अट्रैक्टिव नहीं लगेगा और आप का मूड खराब हो जाएगा.

ऐसे में मांओं को चाहिए कि टीनएज गर्ल के लिए जब आप शौपिंग पर जाएं, तो उन के लिए अलगअलग वैराइटी व डिजाइंस की लौंजरी जरूर खरीदें ताकि लौंजरी फैशन में भी वे अपडेट रहें.

टीशर्ट ब्रा: टीशर्ट ब्रा में शेप देने के लिए हलका सा पैड लगा होता है. यह आरामदायक होने के साथसाथ क्लीन लुक देती है, खासकर तब जब आप ने फिटिंग की और पतली ड्रैस पहनी हो.

स्ट्रैपलैस ब्रा: जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि इस में स्ट्रैप नहीं होता. अगर आप स्ट्रैपलैस ड्रैस, टैंक टौप, हौल्टर नैक पहन रही हैं, तो इस ब्रा का चुनाव करें. स्ट्रैपलैस ब्रा खरीदते समय यह जरूर ध्यान रखें कि ब्रा के साइड और पीछे की पट्टी चौड़ी हो ताकि ब्रा सही जगह पर टिकी रहे और आप को अच्छी फिटिंग दे.

पुशअप ब्रा: टीनएज में लड़कियां सोचती हैं कि पुशअप ब्रा की उन्हें क्या जरूरत, लेकिन अगर आप चाहती हैं कि आप की फिगर अच्छी लगे, तो आप के पास यह ब्रा जरूर होनी चाहिए. इस ब्रा के अंदर जैलयुक्त कप लगा होता है, जो ब्रैस्ट को उभार प्रदान करता है. यह कई अलगअलग डिजाइंस, कलर, प्रिंट व लेस वर्क में आती है.

वायरलैस ब्रा: यह काफी आरामदायक होती है. अगर आप को अंडरवायर ब्रा में कंफर्ट फील नहीं होता, तो यह आप के लिए बैस्ट औप्शन है. यह टौप, ड्रैस, स्वैट शर्ट पर अच्छी लगती है.

पैडेड ब्रा: यह उन लड़कियों के लिए परफैक्ट है जिन की ब्रैस्ट छोटी है. वे इस से उभार पा सकती हैं. पैडेड ब्रा से आप लो कट ड्रैस में भी अपनी क्लीवेज उसी तरह से दिखा सकती हैं जैसेकि भारी ब्रैस्ट वाली लड़कियां दिखाती हैं.

मिनिमाइजर ब्रा: यह उन के लिए उपयोगी है जिन की बौडी थोड़ी कर्वी है और ब्रैस्ट थोड़े बड़े. यह ब्रा उन के कप साइज को थोड़ा कम कर के बेहतर लुक देती है.

रिमूवबल पैडिंग ब्रा: इस ब्रा में एक पौकेट होती है जिस में जरूरत पड़ने पर पैड डाला जाता है. यह उन के लिए परफैक्ट है, जो हर दिन पैडेड ब्रा नहीं पहनना चाहतीं, सिर्फ खास मौके पर ही पहनना चाहती हैं.

सिलिकौन पैडिंग: इस ब्रा को सीधे स्किन पर लगाया जाता है. यह स्किन जैसी नरम होती है. इसे लगाने पर आप को इस का एहसास भी नहीं होगा. इसे आप बैकलैस ड्रैस, सैंटर कट ड्रैस के साथ कैरी कर सकती हैं. अपने वार्डरोब में इसे जरूर शामिल करें.

फैब्रिक पर भी दें ध्यान: इस उम्र में  त्वचा काफी संवेदशील व कोमल होती है. कुछ लड़कियों को तुरंत सिंथैटिक फैब्रिक से ऐलर्जी होने लगती है, इसलिए कोशिश करें कि कौटन फैब्रिक से बने इनरवियर का चुनाव करें. फैब्रिक पर ध्यान देने के साथसाथ यह भी देखें कि ब्रा कितनी टिकाऊ और फैशनेबल है, क्योंकि जब तक आप अंदर से कौन्फिडैंट नहीं होंगी, बाहर से खूबसूरत नहीं लगेंगी. 

इन बातों का रखें ध्यान

 

– लौंजरी हमेशा ब्रैंडेड ही खरीदें, क्योंकि उन के पास प्रोफैशनल होते हैं जो सही ब्रा चुनने में मदद करते हैं.

 

– टीनएज में ब्रा खरीदते समय थोड़ी हिचकिचाहट होती है लेकिन आप ऐसा न करें, बल्कि न्यूड, व्हाइट, ब्लैक और पेस्टल कलर की ब्रा के अलावा भी अलगअलग कलर की ब्रा जरूर खरीदें.

धन दौलत से बढ़ कर रिश्ते नाते

भरतपुर, राजस्थान के ओमी पटवारी अपनी छोटी बहन से बहुत स्नेह करते थे. जब उन की बहन की शादी हुई, तो वे भरतपुर में ही एक किराए के मकान में रहने लगी थी. उस समय ओमी पटवारी की नौकरी धौलपुर में थी. जब उन्हें अपनी बहन के किराए के मकान में रहने का पता लगा, तो वे उसे अपने साथ ही मकान में रहने के लिए ले आए थे.

ऐसा करते समय उन्होंने सोचा था कि अपने घर में रखने से उन की गरीब बहन को किराए के रुपयों की बचत ही नहीं होगी, बल्कि उस के वहां रहने पर मां की देखभाल होती रहेगी, क्योंकि उन की मां का धौलपुर में रहने पर मन नहीं लगता था.

सालों तक बहन उन के मकान में रहते हुए उस मकान को हथियाना चाहती थी. उस ने मां को बहलाफुसला कर उन से अपने नाम गुपचुप तरीके से वसीयत करवा ली थी, क्योंकि वह मकान ओमी पटवारी ने अपनी मां के नाम पर खरीदा था.

एक दिन जब उन की मां की मौत हुई, तो उस ने मां का गुपचुप तरीके से अंतिम संस्कार भी कर दिया था. मां की मौत की सूचना उस ने अपने भाई को भी नहीं दी थी.

पड़ोस के लोगों ने जब बहन से उस के भाई ओमी पटवारी के बारे में पूछा, तो उस ने झूठमूठ ही कह दिया था कि उस ने तो उन्हें फोन पर सूचना दी थी, मगर उन्होंने आने से मना कर दिया था. ओमी पटवारी अपनी मां की मौत के समय जयपुर में थे.अपने बड़े भाई का मकान हथियाते समय उन की बहन ने सोचा था कि अब उसे अपने बड़े भाई से क्या मतलब है? उसे उन की अहमियत उस समय महसूस हुई, जब वह अपने बीमार बेटे को उपचार के लिए जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल ले कर आई थी.

महीनों तक उपचार के लिए जयपुर में रहते हुए परेशान हो कर वह दिनरात अपनी भूल पर पछतावा कर रोते हुए यही सोचती रहती थी कि अगर वह अपने भाई के मकान को हथियाने की भूल नहीं करती, तो उसे अपने भाई की बहुत मदद मिलती.

इसी तरह की भूल गांव के गरीब किसान रामलाल की दोनों बेटियों ने की थी. रामलाल ने वहां के सेठजी से कर्ज ले कर धूमधाम से अपनी दोनों बेटियों की शादियां की थीं.

जब रामलाल की मौत हुई, तो उन दोनों बेटियों ने उन की जमीन में अपना हिस्सा ले कर उसे बेच दिया था.

रामलाल का बेटा अपने हिस्से की जमीन बेच कर उस पैसे से उन की शादियों में लिए हुए कर्ज को चुका कर आजकल शहर के एक कारखाने में काम कर के अपनी गुजरबसर कर रहा है. उस की दोनों बहनें अपने भाई से रिश्ता खत्म करने की भूल पर पछतावा करते हुए आंसू बहाती रहती हैं.

इसी तरह से एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में तृतीय श्रेणी के शिक्षक श्यामलाल ने बड़े भाई से अपना रिश्ता खत्म करने की बहुत बड़ी भूल की थी.

जब वे बहुत छोटे थे, तभी उन के पिताजी की मौत हो गई थी. बड़े भाई ने अपने हिस्से की खेती की जमीन को बेच कर न सिर्फ श्यामलाल को पालापोसा था, बल्कि पढ़ालिखा कर राजकीय शिक्षक भी बनवाया था.

शादी के बाद श्यामलाल की बीवी ने सिखापढ़ा कर बड़े भाई से अलग करवा दिया था. बड़ा भाई शहर में जा कर अपनी बीवी के साथ मेहनतमजदूरी करने लगा था. उस ने अपने दोनों बेटों को खूब पढ़ायालिखाया था. वे दोनों बेटे अब पुलिस के बड़े अफसर हैं.

श्यामलाल की दोनों बेटियों के साथ उन के गांव के दबंग लोगों के बेटे हमेशा छेड़छाड़ करते रहते थे. एक दिन तो उन्होंने उन के साथ बलात्कार ही कर दिया था. जब बलात्कार करने वाले नौजवानों के पिताओं से उन की शिकायत की, तो उन्होंने उस शिक्षक और बेटे की इतनी पिटाई की कि वे उस समय अपने बड़े भाई से अलग होने की भूल पर पछतावे के आंसू बहा रहे थे. वे सोच रहे थे कि अगर अपनी बीवी के कहने में आ कर बड़े भाई से अलग हो कर रिश्ता खत्म नहीं करते, तो आज उन की यह हालत नहीं होती. बड़े भाई के दोनों पुलिस अफसर बेटे उन की मदद करते.

लिहाजा, हमें धनदौलत के लिए घर वालों और रिश्तेदारों से अपने रिश्ते खत्म नहीं करने चाहिए, क्योंकि पैसों से भी बढ़ कर होते हैं रिश्तेनाते, जो जरूरत के समय काम आते हैं.     

नाम में सब रखा है बंधु

इसी धरती के एक मशहूर नाटककार शेक्सपियरजी लिख गए हैं कि ‘नाम में क्या रखा है’. ऐसा लिख कर वे नामों के साथ कुश्ती लड़वा गए हैं. बताइए भई, नाम के लिए आदमी क्या नहीं करता? मरे को जिंदा और जिंदा को मरा हुआ बताने में नाम का बड़ा रोल होता है. नाम में क्या नहीं रखा प्यारे. नाम के लिए लोग बदनाम तक होने का मौका ढूंढ़ते हैं. बदनाम होते ही उन का नाम हो जाता है, जैसे अपने आसाराम बापू. ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’, यह मंत्र न जाने कितने नामशुदा बदनाम हो कर जपते रहते हैं. शेक्सपियरजी, नाम में ही सबकुछ रखा है.

मेरा एक दोस्त दो नंबर की ग्रेजुएशन डिगरी लिए बैठा है. एक बार नाटकों की बात चली, तो तपाक से ज्ञान बघारते हुए बोला, ‘यार, सैक्सपियर ने क्या नाटक लिखा है रोमियोजूलियट…’

मैं ने फौरन उन्हें टोका, ‘यार दो नंबरी, क्यों बेचारे सीधेसादे विदेशी नाटककार का नाम बदनाम करते हो? नाम तो सही लिया करो. सैक्सपियर नहीं, शेक्सपियर बोलो.’

अब बताइए दिवंगत शेक्सपियरजी, नाम में कुछ रखा है कि नहीं? मेरे एक दूसरे दोस्त जानेमाने व्यंग्यकार हैं. वे कारखाने में नौकरी करते हैं. अखबारों में भी वे अकसर व्यंग्य कौलम लिखते हैं. एक अंगरेजीदां ने उन्हें शुभ काम का आमंत्रण अशुभ उच्चारण में भेज दिया. दोस्त का नाम है सुरेश वैश्य. अंगरेजीदां मेजबान ने लिफाफे पर उन्हें संबोधित किया ‘सुरेश वैश्या’. अच्छेभले कारखाना कामगार का नाम कोठे से जोड़ दिया. वैश्य को भैंस भी लिखा होता, तो सहन होता.

व्यंग्यकार दोस्त खुद पर हुए व्यंग्य से बिफरे हुए मुझे लिफाफा दिखाने आए. मैं ने उन्हें समझाया. उन की आग को बुझाते हुए कहा, ‘यार, गलती मेजबान की नहीं, अंगरेजी भाषा का आविष्कार करने वाले की है. चूंकि ‘राम’ को अंगरेजी में ‘रामा’ लिखा जाता है, सो आप को बेचारे ने ‘वैश्या’ लिख भेजा. मेजबान के नेक इरादे में आप का पेशा बदलने का इरादा कतई शामिल नहीं होगा.’

तो देवियोसज्जनो, नाम में ही सबकुछ रखा है मानोजानो. आप मशहूर सैक्सपियर, माफ करें शेक्सपियर के झांसे में न आएं. मैं किस से कहूं? मैं खुद भी इस नाम के फेर का सताया हुआ हूं. आप चाहें तो पत्नी का सताया भी कह सकते हैं.

एक बार फोन पर अपने सुपरिचित, सुदूर बुकस्टौल वाले से पूछ रहा था, ‘बौस, सरिता, मुक्ता नहीं आईं क्या? आएं तो बता देना?’

फोन पर मेरी बातचीत सुन रही श्रीमतीजी हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू और बेलन एकसाथ ले कर प्रकट हुईं. वे दांत पीसते हुए गरजीं, ‘मैं रसोई में से सब सुन रही थी, बहरी नहीं हूं. तुम सूने कमरे में किन सौतनों से बतियाते रहते हो. मैं बूढ़ी हो गई हूं न? बुला लो उस सौत सरितामुक्ता को, रचाओ रासलीला.

‘शर्म नहीं आती तुम्हें 2 बच्चों के बाप हो कर भी, पराई संतानों की मांओं पर लार टपकाते हुए?’

अचानक आई मुसीबत को टालने की मैं ने कोशिश की. गुस्साई पत्नी को दूर से ही समझाया, ‘अरी मेरी सुंदरी सुनयना, मैं तुम्हारी सौतनों का नहीं, पत्रिकाओं का नाम ले रहा था. गैर की मांओं से नहीं बुकस्टौल वाले से बात कर रहा था. अपना गुस्सा शांत करो देवी, मेरी जान बख्शो. जाओ, दोबारा रसोई की ओर जाओ.’

नाम का यह फेर जो न करा दे, थोड़ा समझो. अपनी बंबई जिस का नाम मुंबई हो गया है नाम की मारी है. बंबई नगरिया का बखान अपने लंबे डौन अमिताभ ने ‘डौन’ नामक फिल्म में किया है. डौन के श्रीमुख (असलियत में किशोर कुमार के श्रीमुख) से आप ने बंबई नगरिया के नामों वाला गीत सुना ही होगा, ‘ई है बंबई नगरिया तू देख बबुआ…’

गीत में अमिताभजी महाराज कहते हैं, ‘कोई बंदर नहीं है, फिर भी नाम बांदरा, चर्च का गेट है चर्च है लापता, बिन धोबी का धोबी तालाब देखो…’

इस गीत से हमें बंबई या मुंबई नगरिया की काफीकुछ जानकारी हासिल होती है. जानकारी हासिल करने के लिए और भी कई सोर्स हैं जैसे अखबार, पत्रपत्रिकाएं. तमाम नामों का होनाखोना, सोना हमें इन्हीं से हराम होता है. नाम होता?है तो अखबार लेता है, वरना क्या लेगा. ‘इसे’ सम्मान, ‘उसे’ जूता, ‘मुझे’ अपमान, ‘तुझे’ जेल तो लिख नहीं देगा अखबार.

मान हो या अपमान, नाम तो जरूरी है. लेकिन साहब शेक्सपियर कहते थे, ‘नाम में क्या रखा है?’ अगर इस शीर्षक से लिखी हरि भटनागर की कहानी में भटनागरजी का नाम न छपा होता. लेखक आपत्ति जड़ता, ‘वाह जी, वाह, नाम गायब कर दिया मेरा. मैं कैसे साबित करूं कि ‘नाम में क्या रखा है’ कथा मेरी है या गैर की? अब रचना में दाम के साथ नाम हो तो ठीक वरना…’

संपादकजी कथाकार को लाख बहलाएं, ‘मान्यवर दाम लीजिए. नाम में क्या रखा है?’ तो कथाकार टेसू की तरह अड़ेगा ही, ‘वाह जी वाह, नाम ही में तो सबकुछ रखा है.

‘बताइए, आप की पत्रिका में आप की जगह संपादक में मेरा नाम छप जाए तो…? आसाराम बापू की जगह राष्ट्रपिता बापू छप जाए या राष्ट्रपिता बापू की जगह आसाराम बापू छप जाए तो…?’

नाम ही तो बदनाम होता है बंधु, चाहे वो संत का हो या संत के आश्रम का. यह और बात है कि घरवालियां अपने घर वालों का नाम नहीं लेतीं, ऐजी, ओजी, चुन्नू के पापा, मुन्नू के बापू’ जैसे शब्दों से काम चला लेती हैं. सोचती हैं कि नाम में क्या रखा है.

देवियो, आप अपना भ्रम दूर कर लें. पुलिस इसी नाम के फेर में कभीकभी शरीफ की जगह गैरशरीफ, सज्जन के बजाय दुर्जन के घर का दरवाजा खटखटाने लग जाती है. यह चूक उसे कभीकभी महंगी पड़ती है. गैरशरीफ या दुर्जन अदालत में मानहानि का केस दर्ज करा देता है. ‘नामहिं हाथी पाइए, नामहिं हाथी पांव’.

आदरणीय शेक्सपियरजी ने ‘नाम में क्या रखा है?’ जैसी बात कह कर भले ही लाखों छपास पीडि़तों को नाम के पीछे रोज पत्रिकाओं के दफ्तर की परिक्रमा से छुटकारा दिलाने की नाकाम कोशिश की हो, लेकिन छपास पीडि़त कैसे मान लें कि ‘नाम में क्या रखा है?’

उस की इस पीड़ा यानी ‘नाम की पीड़ा’ का उपचार तो पत्रपत्रिकाओं में आएदिन छपने वाले नाम से ही होता है. अगर एक दिन न छपे, तो ‘दैनिक छपास पीडि़त’ के पेट और पैरों में कुछ होने लगता है. उसे लगता है कि अखबार के दफ्तर की ओर अब दौड़े कि तब. उसे कबीर याद आने लगते हैं, ‘काल करे सो आज कर, आज कर सो अब…’     

सरकारी नौकरी का मोह

क्या नरेंद्र मोदी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाए कि उन्होंने स्वच्छता अभियान का इतना अधिक प्रचार किया कि उत्तर प्रदेश में नगर पालिकाओं के लिए सफाई कर्मचारियों की नौकरी के लिए एमबीए, एमए और बीए पास लड़के लड़कियों ने आवेदन कर डाले और प्रैक्टिकल के लिए वे गंदे पानी के सीवर में उतर गए.

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य की सभी नगर पालिकाओं को सफाई कर्मचारियों की भरती की अनुमति दी है और 20 हजार लोगों की भरती होनी है. इस के लिए 2 लाख आवेदन मिले हैं. यह मालूम करना तो मुश्किल है कि अभी ये 2 लाख अनुसूचित जनजातियों के हैं या नहीं पर इन में सैकड़ों अच्छेखासे पढ़ेलिखे हैं यानी पढ़ाईलिखाई के बाद बेकारी इतनी है और सरकारी नौकरी का मोह इतना है कि सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए भी हजारों मील चल कर लोग पहुंचे हैं, क्योंकि आवेदन करने वाले का उस शहर का वासी होना जरूरी नहीं है. सफाई कर्मचारी बनना बुरा नहीं है. बुरा है सफाई कर्मचारियों के साथ बरताव. नरेंद्र मोदी ने सजीधजी झाड़ू से कूड़ा इधर से उधर कर हल्ला तो कर दिया पर यह नौटंकी ज्यादा साबित हुआ, चरित्र परिवर्तन नहीं, क्योंकि कहीं से भी सूटेडबूटेड नरेंद्र मोदी, उन की पार्टी के हजारों नेताओं, अफसरों, दूसरे दलों या आम जनता ने सफाई को जीवन का अंग नहीं बनाया. सफाई करने वाला आज भी गंदा है. जाति से बाहर शादी की बातें तो बहुत होती हैं पर अछूत कन्याओं से शादी कहां हो रही है. जो बात 50 साल पहले की फिल्म में कही गई थी वह वहीं दफन हो गई.

स्कूलकालेजों में अनुसूचित जनजाति वालों को जगह मिली है पर ज्यादातर उन्हें अपने अबोध साथियों से भी एक अलगाव मिलता है, क्योंकि ऊंचीनीची जाति की भावना घरघर में कूट कर भरी है और बच्चों को भी कह दिया जाता है कि किसे दोस्त बनाएं, किसे नहीं. अगर सैकड़ों आवेदन एमए, एमबीए, बीए पास युवकयुवतियों के सफाई कर्मचारी के लिए आए हैं तो यह दर्शाता है कि देश में गरीबी, भुखमरी की क्या हालात है कि आरक्षण की सीढ़ी से पढ़ाई करने के बाद भी इन युवकों को पक्की संतोषजनक नौकरी नहीं मिल रही. ये कोई व्यवसाय नहीं कर पा रहे. ये समाज में घुल नहीं पा रहे. पढ़ाई और नरेंद्र मोदी के अभियान ने जाति की दीवारें तोड़ी नहीं मजबूत की हैं.

सफाई कर्मचारियों की जाति नहीं होनी चाहिए पर दुनिया भर में रंग, मूल देश, जाति, भाषा आदि के नाम पर सफाई का कार्य परंपरागत बना दिया जाता है और उस में एक स्तर से दूसरे स्तर पर उभरना कठिन हो जाता है. भारत तो जातिगत वर्णव्यवस्था में मीलों गहरा गढ़ा है जहां निचली जातियों को जरा सा भी उठने की कोशिश करने पर धकेल कर फिर नीचे फेंक दिया जाता है. उन के लिए एक ही क्षेत्र है, अलग रह कर सफाई करना और इसीलिए पढ़लिख कर भी उन्हें नीचा समझा जाने वाला काम अपनाना पड़ा है. पक्की सरकारी नौकरी एक मोह है पर जहां जाति का बिल्ला लगा हो वहां लालच है तो सिर्फ जिंदगी जीने का.

ड्रग्स से कम नहीं दूध की लत

एक दशक पहले, जब सरकार ने शाकाहारी और मांसाहारी खाद्यपदार्थों के लिए क्रमश: हरे और लाल रंग के डौट्स लगाने का प्रावधान किया, तब दूध उद्योग और सैकड़ों पढ़ेलिखे लोगों ने जोर डाला कि दूध एक शाकाहारी उत्पाद है (हालांकि इस का स्रोत पशु है), इसीलिए इस पर हरे रंग का डौट लगाया जाना चाहिए. हमें झुकना पड़ा.

वहीं ऐसे लोग जो विशुद्ध रूप से शाकाहारी हैं, अकसर वे भी मानते हैं कि चीज उन की कमजोरी है. कहते हैं चीज से किसी गंदे मोजे सी बदबू आती है, ऐसा क्यों? दरअसल, फैट सोडियम और कोलैस्ट्रौल होने के कारण चीज एक हाईकैलोरी दुग्ध उत्पाद है. एक आम चीज में 70 फीसदी फैट होता है और जिस तरह का फैट होता है, वह मुख्यतया सैचुरेटेड यानी खराब किस्म का फैट होता है. इस से दिल की बीमारी और डायबिटीज का खतरा होता है. पाश्चात्य डाइट में चीज सैचुरेटेड फैट का सब से बड़ा स्रोत है. अमेरिका में एकतिहाई वयस्क और 12.5 मिलियन बच्चे व किशोर मोटापे के शिकार हैं. हमारे यहां बड़े पैमाने में लोग शाकाहारी हैं और हमारी रुचि घर के सेहतमंद खाने में है. इसीलिए हमें इन से काफी दूर होना चाहिए था. लेकिन हम भी मोटापा ग्रस्त देशों की सूची में शामिल हो चुके हैं. दिल संबंधी बीमारियों, डायबिटीज और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कारण मोटापा ही है.

दूध में नशा

औसतन 12 इंच के चीज पिज्जा के एकचौथाई हिस्से में लगभग 6 ग्राम सैचुरेटेड फैट और 27 मिलीग्राम कोलैस्ट्रौल के साथ 13 ग्राम फैट होता है. एक आउंस चीज में 6 ग्राम सैचुरेटेड फैट समेत 9 ग्राम फैट होता है. आंशिक रूप से स्किम्ड दूध में फैट की मात्रा कम होती है. लेकिन हम दूध पीना और चीज/पनीर खाना जारी रखेंगे. बहुत सालों के बाद मैं ने जाना कि लोग आखिर दूध क्यों पीते हैं या चीज व पनीर क्यों खाते हैं. इसलिए नहीं कि यह उन के लिए जरूरी है या इसलिए कि कृष्ण पीते थे. लोग यह इसलिए लेते हैं, क्योंकि इस में नशे का पुट हुआ करता है.

पनीर के प्रति लोगों की कमजोरी होती है, इस का वैज्ञानिक कारण है. दूध हाजमे में सहायक होता है, क्योंकि इस में हलका का मादक तत्त्व होता है, जो कैसोमौर्फिन कहलाता है. 1981 में एली हाजुम और उन के सहयोगियों ने वैलकम रिसर्च लैबोरेटरी में पाया कि दूध में रासायनिक मौर्फिन होता है, जो एक तरह का मादक पदार्थ है. कैसिन सभी स्तनधारियों के दूध में पाया जाने वाला प्रमुख प्रोटीन है. कैसोमौर्फिन की एक खासीयत यह है कि इस का मादक या नशीला असर होता है. दूसरे शब्दों में यह दुनिया सब से पुराने किस्म के ज्ञात ड्रग्स में से एक है. इस किस्म के नशीले पदार्थों में अच्छा महसूस करने और में एक तरह की खुशी के एहसास और शांतचित बनाने की क्षमता के साथ नींद से भी बोझिल हो जाने का एहसास जगाने की क्षमता होती है. इस की लत भी लग जाती है. अगर एकाएक इस का सेवन बंद कर दिया तो इस से दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है और ‘विड्रौल सिंड्रोम’ का सामना करना पड़ता है. चीज, पनीर, आइसक्रीम, मिल्क चौकलेट जैसे गाढ़े दुग्ध उत्पादों में सघन मात्रा में नशीला पदार्थ होता है. (डेयरी फ्री वीगन चीज में भी कभीकभी कैसोमौर्फिन मिलाया जाता है) लगभग 10 लिटर दूध से एक किलोग्राम चीज मिलता है. जब दूध चीज में तब्दील होता है, तो इस में निहित पानी अलग कर लिया जाता है और जो बचता है वह सघन फैट यानी वसा होता है. इसी कारण चीज जैसे डेयरी प्रोडक्ट ऊंचे दर्जे के नशीले पदार्थ माने जाते हैं. जाहिर है इस में जितनी बड़ी मात्रा में नशीला पदार्थ कैसिन होता है, उतना ही वह मन में अच्छा अहसास जगाता है. इसीलिए रात में सोने से पहले बहुत से लोग दूध पीते हैं. जरा सोचिए, सुहागरात में नईनवेले जोड़े के लिए दूध का गिलास क्यों रखा जाता है. अब सवाल है कि स्तनधारियों के दूध में आखिर नशीलापन क्यों होता है? इस बारे में फिजिशियन कमेटी फौर रिसपौंसिबल मैडिसिन के संस्थापक और अध्यक्ष डा. नील बर्नाड कहते हैं, ‘‘हो सकता है कि यह मांबच्चे के बीच एक अनोखा संबंध स्थापित करने का एक उम्दा उपाय हो. मानसिक जुड़ाव हमेशा शारीरिक मजबूती प्रदान करता है. पसंद हो या न हो, मां का दूध नवजात के दिमाग में नशे की तरह काम करता है, जो मांबच्चे के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करता है. इसी कारण मां अपने बच्चे का पालनपोषण जीजान से करती है और नवजात बच्चे को मां की देखभाल की जरूरत भी होती है. हेरोइन या कोकीन की ही तरह कैसोमौर्फिन बहुत ही धीमी गति से आंतों में पहुंचता है और अतिसार को रोकने का काम करता है. दर्द निवारक दवाओं की तरह ही शायद चीज में निहित नशीला तत्त्व भी वयस्कों में कब्ज पैदा करता है.’’

क्या कहती है रिसर्च

बहुत सारे अध्ययनों और जनस्वास्थ्य को देखते हुए 2009 में द यूरोपियन फूड सैफ्टी एजेंसी ने वैज्ञानिक साहित्य की समीक्षा यह देखने के लिए की कि लत के लिए कैसोमौर्फिन आखिर किस हद तक जिम्मेदार होता है? साथ में यह भी कि कैसोमौर्फिन आंतों की दीवार को पार कर रक्तनालिकाओं से होते हुए दिमाग तक भी पहुंचता है या नहीं? क्या औटिज्म का कैसोमौर्फिन से कुछ लेनादेना है? अभी तक वे इन सवालों से जूझ रहे हैं, क्योंकि मानवदेह के लिए यह अच्छा है या नहीं, इस नतीजे तक वे अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं. बहरहाल, अभी तक हम यह जान गए हैं कि नशीले पदार्थ का और इस की मात्रा का हरेक इनसान पर अलगअलग असर होता है. साथ में सामान्य तौर पर यह स्वीकार भी किया जा चुका है कि किसी भी नशीले पदार्थ को हर रोज लेना हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं है, भले ही वह बहुत थोड़ी मात्रा में लिया जाए. फ्लोरिडा के वैज्ञानिक डा. रौबर्ट कैड ने ध्यान भटकाने वाले विकार के संभावित कारण के रूप में कैसोमौर्फिन की पहचान की है. डा. कैड ने सिजोफ्रेनिया और औटिज्म के मरीजों के रक्त और पेशाब में उच्च सघनता वाला बेटाकैसोमौर्फिन 7 नामक तत्त्व पाया है. नार्वे के डा. कार्ल रिचेट द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि  औटिस्टिक व्यवहार, सीलिएक बीमारी, मानसिक असंतुलन जैसे विकारों में दुग्ध उत्पाद का बहुत बड़ा हाथ होता है. अमेरिका के इलिनोइस के स्टेट विश्वविद्यालय के एक शोध पत्र के अनुसार, ‘‘कैसोमौर्फिन में ओपिओइड या नशाग्रस्त करने की क्षमता हाती है. ओपिओइड शब्द का इस्तेमाल मौर्फिन या अफीम जैसे नशीले पदार्थ के असर के लिए किया जाता है, जिस के असर से नशा होता है. यह सहनशक्ति की क्षमता को बढ़ा देता है, गहरी नींद सुला देता है, लेकिन अवसाद भी पैदा करता है.’’

नवजात पर असर

हाल ही में जर्नल औफ पैडियाटिक गैस्ट्रोइंट्रोलौजी ऐंड न्यूट्रिशन में ‘काउज मिल्कइंड्यूज्ड इंफैट एपनिया विद इंक्रिज्ड सेरम कंटैंट औफ बोवाइन बेटाकैसोमौर्फिन 5’ नाम से प्रकाशित एक केस स्टडी में कहा गया है कि इंफैंट एपनिया उस स्थिति को कहते हैं जब कोई नवजात सांस लेना बंद कर देता है. शोधकर्ता ने रिपोर्ट में कहा है कि एक स्तनपान करने वाले नवजात में बारबार एपनिया का दौरा पड़ने के मामले में पाया गया कि मां हमेशा गाय का ताजा दूध पीने के बाद नवजात को स्तनपान कराती थी. प्रयोगशाला में हुई जांच में बच्चे के खून में बहुत अधिक मात्रा में कैसोमौर्फिन पाया गया. इस के बाद शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस ओपिओइड स्थिति का कारण स्नायुतंत्र में श्वसन केंद्र में दबाव हो सकता है. यह स्थिति मिल्क ओपिओइड कहलाती है.

शोधपत्र आगे यह भी कहता है कि इस हालिया रिपोर्ट का मकसद शोधकर्ताओं का ध्यान इस ओर खींचना है कि संभवतया गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन के कारण नवजात शिशुओं में दैहिक प्रक्रिया के तौर पर एपनिया के लक्षण उभरते हैं. हम मानते हैं कि इस तरह की भावशून्य स्थिति कभीकभार ही देखने को मिलती है. हालांकि सही माने में नवजात शिशु के जीवन के लिए यह खतरा भी बन सकता है. जबकि एक बहुत ही सहज परहेजी उपाय डेयरीफ्री आहार, जोकि महंगा भी नहीं है, से इस स्थिति से बचा भी जा सकता है. हर 10 में से एक नवजात शिशु एपनिया का शिकार होता है और उसे बचाया नहीं जा सकता है. और वह सडन इंफैंट डैथ सिंड्रोम या (संक्षेप में एसआईडीएस) या नवजात शिशु की आकस्मिक मौत का मामला बन कर रह जाता है.

कैलिफोर्निया बेवर्ली हिल्स के इम्युनोसाइंस लैब के सीईओ और इम्युनोलौजिस्ट शोधकर्त्ता अरिस्टो वोजडानी का कहना है कि ग्लूटेन और डेयरी प्रोडक्ट बहुत सारे लोगों में किसी ड्रग की तरह काम करते हैं. जिस तरह हेरोइन या दर्द निवारक दवा की लत लग जाती है, उसी तरह ग्लूटेन या कैसिन से दूर जाने पर इन का तुरंत असर निर्लिप्तता के लक्षण विड्रौल सिमटम्स के रूप में सामने आता है. इस निर्लिप्तता में गुस्सा और अवसाद भी शामिल होता है. वैसे कैसिन जब शरीर के अंदर पेट में जा कर रासायनिक क्रिया करता है तो यह हिस्टामाइन रिलीज करता है. हिस्टामाइन वह पदार्थ है, जो ऐलर्जी समेत रक्तवाहिकाओं के फैलने और इन की दीवारों को झीना यानी पतला करने में बड़ी भूमिका अदा करता है. हिस्टामाइन का स्राव तब होता है, जब ऐलर्जी पैदा करने वाले किसी बाहरी तत्त्व (मसलन सर्दीजुकाम की दवा, जिस में ऐंटीहिस्टामाइन होता है) की मौजूदगी होती है. इसी कारण दुनिया की 70% आबादी को डेयरी प्रोडक्ट से ऐलर्जी है.

नवजात के लालनपालन का सुखद तरीका प्रकृति ने तय किया है. यही व्यवस्था दूध छुड़ाने में आड़े आती है. यही कारण है कि बहुत सारे वयस्क दूध की लत से अपना पीछा कभी नहीं छुड़ा पाते. क्या आप को भी इस की लत है?

हेडफोन खरीदने से पहले जरूर पढ़ लें ये खबर

बाजार में हेडफोंस के इतने ज्यादा विकल्प मौजूद हैं कि हम कई बार अच्छे बजट में भी कम गुणवत्ता वाले हेडफोंस खरीद लाते हैं. यहां हम आपको बता रहे हैं 2000 रुपये व उससे कम कीमत वाले हेडफोंस.

1. फीलिप्स SHB4405BK/00 (Philips SHB4405BK/00)

22000 Hz रिस्पॉन्स वाला यह हेडफोन आपको देता है क्रिस्टल क्लियर साउंड क्वॉलिटी. कॉल कंट्रोल्स व 9 घंटे प्लेटाइम जैसे फीचर्स इसे बनाते हैं अपनी रेंज में खास. इस हेडफोन की कीमत 2000 रुपये है.

2. मोटोरोला पल्स ब्लूटूथ वायरलेस (Motorola Pulse Bluetooth Wireless)

110 ग्राम वजनी यह हेडफोन 200 के रेंज में बेहतरीन रहा है. साउंड क्वॉलिटी के साथ-साथ लोग इसकी बैटरी लाइफ की भी प्रशंसा करते हैं. इसकी कीमत 1,999 रुपये है.

3. जेबरोनिक्स हैप्पी हेड (Zebronics Happy Head)

200 घंटे के स्टैंडबाई टाइम के साथ यह1,699 रुपये का हेडफोन भी अपनी रेंज में बेहतर है. इसका स्लीक डिजाइन इसे शानदार लुक देती है. साउंड क्वॉलिटी में यह अपनी रेंज के कई हेडफोंस को मात दे रहा है.

4. JBL T250SI ऑन ईयर डेडफोन (JBL T250SI On-Ear Headphone)

हेडफोंस की दुनिया में जाना-माना नाम जेबीएल एक बेहतरीन हेडफोन ऑफर कर रहा है. लाइट वेट, सेल्फ अजस्ट इयर कप्स इसे प्रयोग करने में आरामदायक बनाते हैं. बेहतरीन बेस के साथ इसकी साउंड क्वॉलिटी शानदार है. कीमत- 1,175

5. डेल बाईट कॉरेस्का (Dell Byte Corseca)

10 मीटर रेंज, ऑटो रिमोट कंट्रोल्स जैसे फीचर्स इसकी गुणवत्ता का प्रतीक हैं. अपनी रेंज में यह हेडफोन आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है. इसकी कीमत 1,199 रुपये है.

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