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नौकरी चली जाने पर भी रहें टेंशन फ्री

कुछ दिनों पहले एचडीएफसी बैंक ने अपने 4500 कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया था. एचडीएफसी बैंक के अलावा कई बड़ी कंपनियां जैसे एस्सार स्टील ने भी कंपनी के ऋण और नुकसानों को कम करने के लिए एक साथ हजारों एम्प्लॉयज को ‘पिंक स्लिप’ दे दी था. इंसानों पर जिम्मेदारियां तो पहले से ही होती हैं और नौकरी चली जाने के बाद ये जिम्मेदारियां बोझ बन जाती हैं. नौकरी चले जाने के कई कारण होते हैं. कभी कभी तो ये कंपनी की गलती होती है तो कभी खुद कर्मचारी की. वजह कोई भी हो नौकरी छूट जाने से किसी भी इंसान की जीवनशैली पर भी काफी बुरा असर पड़ता है.

आमतौर पर लोग भविष्य को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं होते और आराम से अपनी लाइफ जीते हैं. पर जिन्दगी में और खासकर वित्तीय मामलों में गंभीर होना जरूरी है. चाहे छोटी उम्र में ही नौकरी क्यों न मिल जाए आने वाले कल के लिए बचत करना चाहिए ताकि कल को नौकरी न रहने पर भी आराम से कुछ दिन जीवनयापन किया जा सके.

अगर आप नौकरी जाने के बाद भी फाइनेंशियल परेशानियों से दूर रहना चाहते हैं तो इसके लिए आपको भविष्य के लिए पहले से तैयार रहना होगा. इन आसान से तरीकों से आप नौकरी चले जाने पर भी कुछ दिन आराम से गुजारा कर सकते हैं.

1. बनायें इमरजेंसी फंड

एक समय सभी के घरों में इमरजेंसी फंड होता ही था. घर में आप अलग अलग जगह पैसे रखते थे ताकि मुसीबत के वक्त वो पैसे काम आ सके. अब देश में कैश की किल्लत है और पुराने नोट भी बंद कर दिए गए हैं. पर आप बिना कैश के भी एक इमरजेंसी फंड तैयार कर सकते हैं. आप इमरजेंसी फंड के लिए एक अलग बैंक अकाउंट खुलवाकर उसमें पैसे रख सकते हैं. इसके अलावा आप पोस्ट ऑफिस में भी अपना अकाउंट खुलवा सकते हैं.

2. तेते पांव पसारिए जेते लंबी सौर

आपके पास जितनी चादर है उतने ही पैर पसारने की आदत डालिए. अगर आप अपने आमदनी के आधार पर ही जीवन व्यतीत करने की आदत डालेंगे तो आप कभी कर्ज में नहीं डूबेंगे. कर्ज को काल बनते ज्यादा वक्त नहीं लगता. कम पैसे में जीवनयापन करने की आदत डालने के लिए आप एक आसान तरीका अपना सकते हैं. अगर आप और आपका साथी दोनों ही सैलेरीड हैं तो एक इंसान की सैलेरी पर ही जीवनयापन करने की कोशिश करें. अगर आपका कोई लोन चुकाना बाकि है तो ऐसा करने से वह लोन भी चुक जाएगा और आपको कम पैसे में रहने की भी आदत हो जाएगी.

3. आय के साधन हों अधिक

एक से अधिक आय के साधन होने के मतलब यह नहीं कि आप गैर कानूनी काम काज करें. और इसका मतलब यह भी नहीं आप खुद को तकलीफ देकर दूसरी नौकरी करें. भले ही आपके पास अच्छी सैलेरी वाली फुल टाइम जॉब हो, पर अगर इनकम के दूसरे साधन हो तो ये भी बुरा नहीं है. आप अपनी हॉबी को अपने आय का साधन बना सकते हैं. अगर आपको लिखना पसंद है, तो आप घर पर बैठकर ही लेख लिख सकते हैं.

4. लॉन्ग टर्म निवेश हैं बेहतर उपाय

निवेश के रास्ते उतार चढ़ाव से भरे होते हैं. पर बिना रिस्क के निवेश नहीं किया जा सकता. हमेशा लॉन्ग टर्म में ही निवेश करें. जिससे आज नुकसान होने पर भी कल अच्छे रिटर्न मिलने के पूरे आसार होंगे. लॉन्ग टर्म निवेश से नौकरी चली जाने पर फायदा तो होगा ही, इससे आपका रिटायरमेंट भी सिक्योर हो जाएगा.

5. क्रेडिट स्कोर

मंदी के वक्त, बैंक और क्रेडिट कार्ड कंपनियां अच्छे क्रेडिट हिस्ट्री वालों को ही प्रीफ्रेंस देती है. इसलिए आपको अपना क्रेडिट स्कोर हाई रखना होगा और अपने सारे बिल और कर्जे समय से चुकाने होंगे.

मौत बना साध्वी का शौक

हरियाणा के जिला करनाल के ब्रास गांव  स्थित एक बड़ी इमारत के बीच बने उस हाल की भव्यता देखते ही बनती थी. उस में डिजाइन वाले महंगे कालीन बिछे थे तो दोनों तरफ आरामदायक सोफे और बीच में मेजें लगी थीं. नीचे बैठने के लिए भी गद्दे बिछे थे. उस हाल में कुछ खास था तो वह थी एक सिंहासननुमा रखी ऊंची कुरसी, जिस के सामने एक छोटी सी मेज थी, जिस पर पारदर्शी शीशा लगा था.

रोज की तरह 15 नवंबर, 2016 की भी रात करीब 9 बजे कई लोग सोफे पर बैठे थे. उसी बीच हथियारों से लैस कुछ युवक पिछले दरवाजे से हौल में दाखिल हुए. उन के पीछे एक महिला भी आई, जिस पर नजर पड़ते ही सभी लोग हाथ जोड़ कर उस के सम्मान में खड़े हो गए. महिला ऊपर से नीचे तक गेरुआ वस्त्र पहने थी और सिर पर वैसे ही रंग की पगड़ी भी बांधे थी. उस के गले में बेशकीमती सोने की मोटी चेन झूल रही थी. इस के अलावा हाथों में रत्नजडि़त सोने के कंगन और अंगुलियों में हीरेजडि़त अंगूठियां अपनी चमक बिखेर रही थीं.

महिला के माथे पर लाल तिलक लगा था और चेहरे पर गर्वपूर्ण मुसकान तैर रही थी. वह सधे कदमों से चलते हुए सिंहासननुमा कुरसी पर जा कर बैठ गई तो उस की चरणवंदना करने वालों की कतार लग गई. लोग झुकते तो वह उन के सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देती. बीचबीच में वह लोगों से बातें भी कर रही थी. करीब एक घंटे तक यही सिलसिला चलता रहा. लगभग रोज ही ऐसा नजारा उस हाल में होता था.

वह कोई मामूली शख्सियत नहीं थी. वह खुद को धर्मरक्षक बताती थी. अपने राष्ट्रवादी होने का गुणगान करती थी. लोग उसे अनोखी शक्तियों की वारिस और ज्योतिष विद्या की बाजीगर समझ कर पूजते थे.

कट्टरपंथी विचारधारा की उस महिला का नाम था साध्वी देवा ठाकुर. ब्रास गांव स्थित जिस इमारत में वह रहती थी, उसे लोग श्रीमाता बालासुंदरी देवाजी धाम के नाम से जानते थे. उसे डेरा भी कहा जाता था. साध्वी का इलाके में खासा रसूख था. तमाम लोग उस के मुरीद थे. उस के पास न धनदौलत की कमी थी और न ही शोहरत की. भगवा चोले में सोने के बेशकीमती आभूषणों से लद कर देवा जब चेलों के साथ शान से चलती थी तो उस का रुतबा देखते ही बनता था.

धर्म के नाम पर उस की तीखी बयानबाजियां सुर्खियां बन जाती थीं. उस रात कुछ और लोग उस से मिलने के लिए आए तो एक शख्स ने उन्हें रोक दिया, ‘‘माफ कीजिएगा, साध्वीजी से अब आप कल मिल सकते हैं. अभी वह कहीं और के लिए प्रस्थान करेंगी.’’

उसी बीच एक आदमी ने देवा के सामने जा कर कहा, ‘‘साध्वीजी, आप को समारोह में भी जाना है.’’

‘‘हां, चलते हैं.’’ कह कर देवा ने हाथ उठा कर सामूहिक आशीर्वाद दिया और हाल से बाहर आ गई. उस के बाहर आते ही कुछ और हथियारधारी वहां आ गए. यह सब देख कर कोई चौंका नहीं, क्योंकि यह रोज की बात थी. साध्वी को हथियारधारी चेलों को अपने साथ रखने का बहुत पहले से शौक था. हालांकि न उन की जान को खतरा था और न ही किसी से रंजिश. बावजूद इस के वह राइफल, बंदूक, पिस्टलधारी युवकों के घेरे में रहती थी.

इतना ही नहीं, देवा ने खुद भी एक पिस्तौल का लाइसैंस लिया हुआ था, जिसे वह कभी होलेस्टर के साथ गले में लटकाती थी तो कभी पर्स में रखती थी. सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर वह बेहद सक्रिय रहती थी और हथियारों के साथ के अलावा विभिन्न क्रियाकलापों के फोटो व वीडियो पोस्ट करती रहती थी.

हौल के बाहर एक लग्जरी फौर्च्युनर कार नंबर एचआर 54डी 0021 खड़ी थी, जो उसी के नाम से रजिस्टर्ड थी. देवा उस कार में सवार हो गई. कार ने फर्राटे भरे और कुछ देर बाद करनाल शहर के रेलवे स्टेशन के नजदीक बने सावित्री मैरिज लौन के बाहर जा कर रुकी.

देवा के पहुंचते ही वहां मौजूद लोग उस की आवभगत में जुट गए. कोई झुक कर पैर छू रहा था तो कोई हाथ जोड़ रहा था. देवा के चेहरे पर भी अनोखी मुसकान थी. दरअसल यह सैक्टर-6 निवासी विक्की मेहता का सगाई समारोह था. मेहता परिवार भी देवा का भक्त था, इसलिए विशेष आग्रह कर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित किया गया था.

लौन में अनेक लोग मौजूद थे. खानापीना चल रहा था, साथ ही एक मंच सजा हुआ था. मंच पर व उस के सामने डीजे की धुनों पर लोग नृत्य कर रहे थे. दरजनों लोग सामने पड़ी कुरसियों पर बैठ कर पार्टी का आनंद ले रहे थे. कई लोगों से मिलतेमिलाते देवा अपने चेलों के साथ मंच के सामने पहुंच कर रुक गई. इसी बीच उस का चेला डीजे का संचालन कर रहे युवक के पास पहुंच कर बोला, ‘‘यह सब बंद कर के हमारी पसंद का गाना बजा.’’

‘‘कौन सा सर?’’ युवक ने पूछा.

‘‘मितरां नू शौक गोलियां चलाउण दा…’’ उस ने बताया.

हथियारधारी के इतना कहते ही चंद सेकेंड बाद मनचाहा गाना बज गया. इस गाने पर देवा के चेले हथियार लहरा कर नाचने लगे. गाने के बोलों की तर्ज पर उन्होंने हवाई फायरिंग शुरू कर दी. इन में 2-3 लोग मंच पर चढ़ कर गोलियां चलाने लगे तो कुछ नीचे ही रहे. पलक झपकते ही गोलियों की तड़तड़ाहट से वातावरण गूंज उठा.

देवा को भी उन के एक चेले ने दोनाली बंदूक लोड कर के दी तो उस ने भी गोलियां दाग दीं. देवा ने अपनी पिस्तौल से भी कई फायर किए. यह खुशी थी या शान दिखाने की कुंठित मानसिकता, यह तो कोई नहीं जानता था, पर कानून की नजर में यह सब करना अपराध की श्रेणी में आता था. लेकिन कानून को ठेंगा दिखा कर वहां जम कर फायरिंग की जा रही थी.

देवा और उन के चेले इतने जोश में थे कि हथियारों को बारबार लोड कर के हवाई फायर कर रहे थे. अचानक पैदा हुए ऐसे माहौल से वहां मौजूद लोग सकते में आ गए. हर कोई फटी नजरों से नजारा देख रहा था. बच्चों में भी दहशत कायम हो गई. मंच पर व उस के सामने अब देवा व उस के चेलों का कब्जा था. दृश्य ऐसा फिल्मी हो गया था, जैसे डाकू हथियारों के साथ बेखौफ हो कर जश्न मना रहे हों. दरजनों राउंड फायर हो चुके थे.

इसी बीच एक बंदूक से फायर मिस होने पर बंदूक की नाल कुरसी पर बैठे लोगों की तरफ घूम गई. बंदूक की एक गोली सुखविंदर सिंह नामक व्यक्ति के कंधे पर जा लगी, दूसरी गोली ने 50 वर्षीय महिला सुनीता का सीना भेद दिया. गोली लगते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह नीचे गिर पड़ी.

इन के अलावा गोली के छर्रे लगने से अमरजीत सिंह, अनिल, विनोद व 11 वर्षीया बच्ची मनस्वी घायल हो गई. पलक झपकते ही वहां की खुशियां मातम में तब्दील हो गईं. किसी को भी ऐसी अप्रत्याशित घटना की उम्मीद नहीं थी. लोगों में चीखपुकार मच गई और अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया. वहां के माहौल व खतरे को भांप कर देवा हथियारों के शौक के चक्कर में मातम का आशीर्वाद दे कर चेलों के साथ रफूचक्कर हो गई.

आननफानन में सभी घायलों को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने सुनीता को मृत घोषित कर दिया. कइयों के अंधविश्वास को भी झटका लगा, क्योंकि ज्योतिष की जानकार जो देवा लोगों का भविष्य बताती थी, वह इतनी बड़ी घटना का आकलन आखिर कैसे नहीं कर सकी.

इस सनसनीखेज घटना की सूचना पुलिस को मिली तो वह हरकत में आ गई. कुछ ही देर में सिटी थानाप्रभारी मोहनलाल मय पुलिस बल के वहां पहुंच गए. वारदात बड़ी थी लिहाजा एसपी पंकज नैन भी मौकाएवारदात पर आ गए. पुलिस ने लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने देवा व उस के चेलों का कारनामा बयान कर दिया. कुछ लोगों ने देवा व उस के साथियों की गोलियां चलाते हुए बनाई गई वीडियो भी पुलिस को दे दी. पुलिस ने मुआयना किया तो कारतूस के दरजनों खोखे वहां से बरामद हुए. पुलिस ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने साध्वी व उस के साथियों के खिलाफ भादंवि की धारा-302 हत्या, 307 हत्या के प्रयास व आर्म्स एक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मामला गंभीर था. एसपी पंकज नैन ने देवा के खिलाफ सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए. उधर मृतका सुनीता के परिवार के लोगों में कोहराम मचा था. सुनीता सैक्टर-6 की रहने वाली थी और भावी दूल्हे विक्की की मौसी थी. घायलों का उपचार किया जा रहा था. पुलिस ने सुनीता के शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु कल्पना चावला मैडिकल कालेज भेज दिया.

देवा व उस के चेलों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया गया. अगली सुबह पुलिस बल आरोपी देवा के डेरे पर पहुंचा, लेकिन वह फरार हो चुकी थी. पुलिस ने वहां की तलाशी ली. डेरे की भव्यता देख कर पुलिस भी हैरान रह गई. देवा भले ही साध्वी थी, लेकिन डेरे में वे तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं थीं, जिन के आम आदमी सिर्फ ख्वाब देखता है.

पुलिस ने संभावित ठिकानों पर छापेमारी शुरू कर दी, साथ ही देवा का इतिहास खंगाला तो पता चला कि वह एक मामूली लड़की थी. एक मामूली लड़की किस तरह लोगों के लिए देखते ही देखते देवी बन गई.  दरअसल जिसे लोग साध्वी देवा ठाकुर के नाम से जानते थे. उस का बचपन का नाम ममता था.

कई सालों पहले प्रचारित होना शुरू हुआ कि ममता का व्यवहार आम बच्चों से अलग है. वह दूसरों के मन की बात जान लेती है और बैठेबैठे ध्यान मुद्रा में चली जाती है. बाद में कहा जाने लगा कि ममता के पास अपार शक्तियां हैं और उस का साक्षात्कार सीधे ईश्वर से होता है. यह चर्चाएं कुछ ऐसी फैलीं कि लोग उसे देवी मानने लगे.

लोग उस के पास अपनी समस्याएं ले कर आने लगे. इस के बाद ममता ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए और नाम भी बदल कर साध्वी देवा ठाकुर रख लिया. 11 जनवरी, 1998 को माला बालासुंदरी देवा धाम से डेरे का शिलान्यास कर के वहां पूजास्थल भी बना दिया गया. धीरेधीरे देवा के मुरीदों की संख्या बढ़ती गई.

देवा महत्त्वाकांक्षी थी. शाही अंदाज में जीना अच्छा लगता था. कमाई हुई तो उस ने डेरे को आलीशान तरीके से विस्तार दे दिया. देवा ने सन 2010 में देवा इंडिया फाउंडेशन नाम से एक संस्था रजिस्टर्ड करा ली और खुद उस की चेयरपरसन बन गई. डेरे पर आने वाले लोग खुल कर दान देते थे. ऐसे भक्तों के दान ने ही देवा को राजसी ठाठबाट वाली महिला बना दिया.

देवा को हथियारों से प्रेम था, इसलिए उस ने अपने साथ हथियारबंद लोग रखे. इस से रौब भी जमता था और शौक भी पूरा होता था. कुछ ही सालों में देवा ने अपनी अलग पहचान बना ली. देवा ने अपने प्रचार के लिए सोशल साइट्स को भी जरिया बनाया. हथियारों के लाइसैंस देने की वह पैरवी करती थी.

एक बार वह तब सुर्खियों में आई, जब उस ने बयान जारी कर के कहा कि देश को आधार कार्ड से ज्यादा जरूरत हथियारों के लाइसैंस की है. अगर सरकार देश के नागरिकों की हत्या आतंकवादियों के हाथों होने से नहीं रोक सकती तो सभी भारतीयों को हथियारों के लाइसैंस दे दिए जाएं, ताकि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें.

कुछ महीने पहले देवा ने एक जनसभा में यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि गैरहिंदुओं की जबरन नसबंदी की जाए, ताकि उन की आबादी को बढ़ने से रोका जा सके. इस मामले में जम्मूकश्मीर के श्रीनगर में एक याचिका के बाद अदालत ने देवा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे. इस सब के बीच फायरिंग से हुई मौत का मामला देवा पर भारी पड़ गया.

पुलिस उस की तलाश में जुटी रही. उस की तलाश में अन्य जनपदों के अलावा राजस्थान जा कर भी छापेमारी की गई, पर वह नहीं मिली. लोगों में देवा को ले कर गुस्सा था. एक संगठन के पदाधिकारी ललित भारद्वाज ने बयान जारी किया कि धर्म की आड़ में देवा को ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करनी चाहिए थी.

देवा की फायरिंग की वीडियो वायरल हो रही थी. पुलिस को इस वारदात से पहले की भी एक वीडियो मिली, जिस में पानीपत जिले में आयोजित एक समारोह में देवा व उस के चेलों ने जम कर फायरिंग की थी.

2 दिन बीत चुके थे, लेकिन देवा का कोई सुराग नहीं लग रहा था. घटना के बाद से ही उस के दोनों मोबाइल बंद थे. पुलिस उस तक पहुंच पाती कि इसी बीच 18 नवंबर को उस ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. इस दौरान देवा का हुलिया ही बदला हुआ था. न उस के बदन पर कोई आभूषण था और न ही भगवा वस्त्र. वह गुलाबी छींटदार सलवारसूट पहन कर आई थी.

पता चलते ही पुलिस वहां पहुंच गई और माननीय न्यायाधीश हरीश सब्बरवाल की अदालत में देवा को पेश कर के हथियारों की बरामदगी और उस के साथियों की गिरफ्तारी का हवाला दे कर रिमांड मांगा. अदालत ने उसे 5 दिनों के रिमांड पर पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस देवा का कस्टडी रिमांड ले कर बाहर निकली तो उस ने मीडिया के सामने कोरे झूठ का हास्यास्पद जाल फेंका कि वह निर्दोष है और उसे षडयंत्र के तहत फंसाया जा रहा है. वह इस बात को भी झुठला गई कि उस ने गोलियां चलाई थीं. देवा के चेहरे पर मायूसी का डेरा था. उस ने खुद को बीमार भी बताया.

इस दौरान अदालत के बाहर गहमागहमी का माहौल रहा. देवा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे साथ ले कर कई स्थानों पर दबिशें दीं. उस रात उसे महिला थाने की हवालात में रखा गया तो उसे नींद नहीं आई. रात में वह कई बार रोई. अगले दिन पुलिस उसे ले कर राजस्थान रवाना हो गई. वहां उस की निशानदेही पर न तो हथियार मिल सके और न उस के चेले. पुलिस खाली हाथ लौट आई.

23 नवंबर को पुलिस ने देवा के 3 आरोपी चेलों शुभम, देवेंद्र व मलकीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया. इन के कब्जे से फायरिंग में इस्तेमाल की गई 2 बंदूकें व 2 माउजरों के साथ 4 दरजन से अधिक कारतूस बरामद किए गए.

पुलिस ने नीलोखेड़ी से देवा की फौर्च्युनर कार भी बरामद कर ली. पुलिस ने चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस देवा के फरार अन्य 3 साथियों राजीव, बलजीत व महमल की सरगरमी से तलाश कर रही थी. देवा ने धर्म की आड़ में हथियारों का शौक रख कर उन के प्रदर्शन का जानलेवा खेल नहीं खेला होता तो शायद ऐसी नौबत कभी न आती.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक थी अनारकली

3 दिसंबर, 2016 को सुबह करीब साढ़े 10 बजे दक्षिणपूर्वी दिल्ली के अमर कालोनी थाने के ड्यूटी अफसर को पुलिस कंट्रोलरूम से सूचना मिली कि कैप्टन गौड़ मार्ग पर नाले के किनारे बैग में किसी की लाश पड़ी है. उस दिन थानाप्रभारी उदयवीर सिंह किसी काम से बाहर गए हुए थे. उन की गैरमौजूदगी में थाने का चार्ज इंसपेक्टर राजेश मौर्य संभाले हुए थे. बैग में लाश मिलने की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर राजेश मौर्य एसआई मनोज कुमार, हैडकांस्टेबल सुरेंद्र सिंह और महावीर सिंह को ले कर सूचना में बताए पते की तरफ निकल गए.

कैप्टन गौड़ मार्ग पर स्थित वह नाला थाने से करीब 2 किलोमीटर दूर था, इसलिए पुलिस टीम करीब 10 मिनट में ही वहां पहुंच गई. वहां पहले से काफी लोग खड़े थे. भीड़ को देख कर उधर से गुजरने वाले वाहन चालक भी वहां रुकरुक कर जा रहे थे. सभी लोग नाले के किनारे झाड़ी के पास पड़े उस काले रंग के ट्रैवल बैग को देख रहे थे. उस बैग का फ्लैप खुला हुआ था, जिस से उस में रखी लाश साफ दिखाई दे रही थी.

नोटबंदी के बाद जिस तरह आए दिन कूड़े के ढेर या अन्य जगहों पर करोड़ों रुपए मिलने के समाचार आ रहे हैं, उसी तरह इस बड़े बैग को भी नाले के किनारे किसी व्यक्ति ने देखा होगा तो पैसे मिलने की संभावना को देखते हुए उस ने इस बैग का फ्लैप खोल कर देखा होगा. लाश देख कर उस के होश फाख्ता हो गए होंगे. फिर वह बैग को ऐसे ही खुला छोड़ कर भाग गया होगा. लेकिन यह पता नहीं लग पा रहा था कि उस में रखी लाश किसी आदमी की है या किसी महिला की.

इंसपेक्टर राजेश मौर्य ने उस बैग का ऊपरी मुआयना कर के सूचना डीसीपी रोमिल बानिया, एसीपी सतीश केन, थानाप्रभारी उदयवीर सिंह के अलावा क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को दे दी. वहां मौजूद सभी लोग आपस में यही बातें कर रहे थे कि पता नहीं इस बैग में किस की लाश है. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के आने के बाद बैग से जब लाश निकाली गई तो सभी हैरान रह गए.

किसी महिला की लाश का वह कूल्हे से ऊपर का हिस्सा था. बाकी नीचे का हिस्सा वहां नहीं था. वह औरेंज कलर की नाइटी पहने हुए थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार करने की चोट थी. उस की कलाई पर कलावा बंधा था. इस के अलावा हाथ की एक अंगुली में अंगूठी थी और गले में पीले रंग का धागा पड़ा हुआ था. महिला की उम्र यही कोई 40-45 साल थी.

बैग से या उस महिला की लाश से कोई ऐसी चीज नहीं मिली जिस से उस की शिनाख्त हो सके. वहां जितने भी लोग खड़े थे, उन में से कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका. इस से यही अनुमान लगाया गया कि शायद यह किसी दूसरे इलाके की होगी. पुलिस ने मृतका का पेट के नीचे का हिस्सा आसपास की झाडि़यों में तलाशा पर वह वहां नहीं मिला.

उसी दौरान डीसीपी रोमिल बानिया, एडिशनल डीसीपी राजीव रंजन, एम. हर्षवर्धन, एसीपी सतीश केन आदि भी वहां पहुंच गए. उन्होंने भी लाश का मुआयना किया और इंसपेक्टर राजेश मौर्य को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. पुलिस ने जरूरी काररवाई करने के बाद लाश के आधे हिस्से को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की मोर्चरी में रखवा दिया.

पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर मृत महिला की शिनाख्त की काररवाई शुरू कर दी. पुलिस ने महिला की लाश के फोटो लगे 4 हजार पैंफ्लेट छपवा कर इलाके में सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए.

इतना ही नहीं, समस्त थानों में सूचना भेज कर यह भी पता लगाने की कोशिश की कि इस हुलिया से मिलतीजुलती कोई महिला लापता तो नहीं है. थानाप्रभारी उदयवीर सिंह जो बाहर गए हुए थे, लाश मिलने की खबर पा कर शाम तक थाने लौट आए. अगले दिन भी पुलिस टीम हर संभावित तरीकों से पता लगाने लगी कि आखिर यह महिला है कौन. पर कहीं से भी उस के बारे में कुछ भी पता नहीं लगा.

4 दिसंबर, 2016 को दोपहर 12 बजे पुलिस कंट्रोलरूम से थाना अमर कालोनी में सूचना मिली कि श्रीनिवासपुरी के क्यू ब्लौक में पास भगेल मंदिर के पास छोटे नाले में किसी महिला का पेट से नीचे का भाग पड़ा हुआ है. थानाप्रभारी उदयवीर सिंह और इंसपेक्टर राजेश मौर्य 15-20 मिनट में ही भगेल मंदिर के पास पहुंच गए.

क्योंकि एक दिन पहले उन्होंने जिस महिला की लाश बरामद की थी, उस का भी पेट से नीचे का हिस्सा गायब था. पुलिस जब भगेल मदिर के पास पहुंची तो वास्तव में वहां किसी महिला के पेट के नीचे का हिस्सा नाले में पड़ा हुआ था. उस के एक पैर पर मांस नहीं था. शायद उसे कुत्तों ने खा लिया होगा.

नाले के पास एक काले रंग का बैग पड़ा हुआ था. उस पर खून के निशान से लगा कि लाश का वह हिस्सा उसी बैग में रख कर लाया गया होगा. जिस जगह से पुलिस ने एक दिन पहले महिला का धड़ बरामद किया था, यह जगह वहां से कोई आधा किलोमीटर दूर थी. जरूरी काररवाई कर के उसे भी पुलिस ने एम्स की मोर्चरी में रखवा दिया.

पुलिस ने नाले के पास से महिला का जो धड़ बरामद किया था, यह हिस्सा उसी महिला का है या नहीं, यह बात डाक्टरी जांच के बाद ही पता लग सकती थी.

बहरहाल, अब पुलिस का पहला मकसद मृतका की शिनाख्त करवाना था. पुलिस के पास लाश के जो फोटो थे, उन्हीं के माध्यम से वह उस की शिनाख्त में जुट गई. बीट का हरेक पुलिसकर्मी अपनेअपने इलाके के लोगों को वह फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछने लगा. हैडकांस्टेबल सुरेंद्र भी इसी काम में लगे हुए थे. फोटो देख कर उन्हें अमर कालोनी क्षेत्र के ही एक व्यक्ति ने बताया कि यह महिला तो अन्नू की तरह लग रही है.

‘‘अन्नू…यह अन्नू कौन थी और कहां रहती थी?’’ हैडकांस्टेबल सुरेंद्र ने उस से पूछा.

‘‘सर, यह दशघरा गढ़ी गांव में ही कहीं रहती थी. पर मैं इस के एक रिश्तेदार प्रवीण को जानता हूं जो सपना सिनेमा के पास साउथ इंडियन व्यंजन की रेहड़ी लगाता है.’’ वह व्यक्ति बोला.

सुरेंद्र को यह सुन कर खुशी हुई कि शायद यहां से कुछ बात बन सकती है. वह उस व्यक्ति को ले कर थाना अमर कालोनी क्षेत्र में स्थित सपना सिनेमा के पास ले गए. प्रवीण वहीं मिल गया. हैडकांस्टेबल सुरेंद्र ने प्रवीण को महिला की लाश का फोटो दिखाया तो उस ने उसे पहचानते हुए कहा कि यह अनारकली उर्फ अन्नू हैं. रिश्ते में यह उस की मौसेरी सास (सास की छोटी बहन) हैं.

सुरेंद्र ने यह जानकारी थानाप्रभारी उदयवीर सिंह और इंसपेक्टर राजेश मौर्य को दी. दोनों पुलिस अधिकारी प्रवीण के पास ही पहुंच गए. पुलिस प्रवीण को ले कर दशघरा गढ़ी स्थित अनारकली के कमरे पर पहुंची. पर उस का कमरा बाहर से बंद मिला. करीब 45 कमरों वाला वह मकान श्रीराम नाम के एक शख्स का था. पुलिस ने श्रीराम को बुला कर बात की तो उस ने बताया कि अनारकली एक मद्रासन थी जो करीब 3 महीने पहले उस के यहां आई थी.

इस के साथ बलराम नाम का एक बंदा और रहता था. यह सन 2010 में भी इसी मकान में 6-7 महीने रह कर गई थी. उस समय भी बलराम इस के साथ रहता था. जिस कमरे में अनारकली रहती थी, उस के आसपास के कमरों में रहने वाले लोगों ने बताया कि यह 2 दिसंबर से दिखाई नहीं दे रही.

वहां खड़ेखड़े पुलिस को अनारकली के कमरे से बदबू आती महसूस हुई. पुलिस ने भगेल मंदिर के पास से महिला के पेट से नीचे वाला जो हिस्सा बरामद किया था, उस की अभी डाक्टरी रिपोर्ट नहीं आई थी इसलिए कहा नहीं जा सकता था कि वह उसी की लाश का हिस्सा है. थानाप्रभारी को लगा कि कहीं अनारकली की लाश का आधा भाग इस कमरे में तो नहीं रखा है, इसलिए उन्होंने मकान मालिक और अन्य लोगों के सामने कमरे का ताला तोड़ कर कमरे में खोजबीन की तो वहां सूखी हुई मछलियां मिलीं. वह बदबू उन्हीं से आ रही थी.

कमरे की जांच के दौरान दीवार पर खून के कुछ छींटे भी दिखे. वे छींटे मानव खून के थे या नहीं, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. लिहाजा उन्होंने फोरैंसिक विभाग को फोन कर दिया. डा. नरेश कुमार के नेतृत्व में एक फोरैंसिक टीम वहां आ गई. टीम को दीवार पर 6 जगह खून के छींटे मिले. इस के अलावा एलपीजी के छोटे सिलेंडर पर भी खून के छींटे मिले. कमरे में 3 चाकू मिले. फोरैंसिक टीम ने कमरे से सबूत इकट्ठे कर लिए.

अब तक की जांच में मृतका के साथ रहने वाले बलराम पर ही शक जा रहा था, क्योंकि वह गायब था. पुलिस टीम उसे ढूंढने में जुट गई. इस काम में पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया. प्रवीण ने पुलिस को बताया था कि मृतका अनारकली का एक बेटा भी है जो चेन्नै में रहता है. पुलिस ने प्रवीण से उस का, अनारकली और उस के बेटे का फोन नंबर ले लिया. तीनों के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.

इस के अलावा इन तीनों नंबरों के द्वारा जिन नंबरों से बात होती थी, उन की भी जांच की. इस जांच में अनारकली के फोन नंबर की लोकेशन उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की आ रही थी.

अनारकली के इस नंबर से जिनजिन नंबरों से संपर्क हुआ था, उन सब को जांच के दायरे में लिया गया. इन में से एक नंबर दिल्ली के संगम विहार इलाके का मिला. संगम विहार के जिस व्यक्ति का यह नंबर था, वह एक औटो ड्राइवर था. पुलिस उस तक पहुंच गई. उस से पूछताछ की गई तो वह पुलिस को बेकसूर लगा.

उधर पुलिस की बलराम को ढूंढने की कोशिश जारी थी. फिर 7 दिसंबर, 2016 को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर बलराम को दिल्ली के नेहरू प्लेस मैट्रो स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अनारकली उस के साथ 20 साल से लिवइन रिलेशन में रहती थी. पर उस ने हालात ऐसे खड़े कर दिए थे कि उसे उस की हत्या के लिए मजबूर होना पड़ा. बलराम ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, चौंकाने वाली निकली.

अनारकली उर्फ अन्नू मूलरूप से चेन्नै की रहने वाली थी. उस के मातापिता बेहद गरीब थे, इस वजह से वह नहीं पढ़ सकी. उस के मोहल्ले की कई लड़कियां दिल्ली में नौकरी या फिर दूसरे कामधंधे करती थीं. अनारकली जब करीब 16 साल की हुई तो उस के पिता ने उसे काम करने के लिए मोहल्ले की लड़कियों के साथ दिल्ली भेज दिया.

वह कोई पढ़ीलिखी तो थी नहीं, जिस से उस की कहीं नौकरी लग जाती. कुछ कोठियों में उसे झाड़ूपोंछा आदि का काम जरूर मिल गया. बाद में उसे और कोठियों में भी काम मिलते चले गए. कई जगह काम करने से उसे महीने की अच्छी कमाई होने लगी. उन पैसों में से वह कुछ पैसे अपने मांबाप के पास भेज देती थी.

दिल्ली में साल भर काम करने के बाद अनारकली काफी चालाक हो गई थी. अब वह पहले वाली सीधीसादी अन्नू नहीं रह गई थी. उसी दौरान 17 साल की अनारकली उर्फ अन्नू की मुलाकात दुरक्कन नाम के युवक से हुई जो दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. दुरक्कन 20-22 साल का युवक था. वह भी चेन्नै का रहने वाला था, इसलिए दोनों के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई जो बाद में प्यार में बदल गई. अपने कामधंधे से निपटने के बाद दोनों मिलतेमिलाते रहते थे.

अनारकली अपने मांबाप से भले ही सैकड़ों किलोमीटर दूर रह कर अपने प्रेमी के साथ मौजमस्ती कर रही थी, इस के बावजूद भी इस की जानकारी उस के घर वालों को हो गई थी. इस बारे में जब उन्होंने अनारकली से बात की तो उस ने साफसाफ बता दिया कि वह दुरक्कन से शादी करना चाहती है. घर वालों ने उस की बात मानते हुए दुरक्कन से उस की शादी कर दी. इस के बाद वह पति के साथ दिल्ली में रहने लगी.

अनारकली और उस का पति दोनों कमा रहे थे, इसलिए उन की घरगृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी. इसी दौरान वह एक बेटे की मां बन गई, जिस का नाम श्रीनिवासन रखा. प्यार से सभी उसे सनी कहते थे. शादी के 7-8 साल बाद दुरक्कन पत्नी को अकेला छोड़ कर कहीं चला गया. अनारकली ने अपने स्तर से जब पति के बारे में पता लगाया तो जानकारी मिली कि उस का किसी और लड़की से चक्कर चल रहा था. वह उस लड़की को ले कर चेन्नै भाग गया है. पति के इस विश्वासघात से अनारकली को बड़ा दुख हुआ.

वह दिल्ली में बेटे सनी के साथ अकेली थी. उस ने सनी को अपने मायके भेज दिया ताकि वह अपने नानानानी की देखरेख में पढ़ाई पूरी कर सके. अनारकली की उम्र उस समय करीब 24-25 साल थी. यह उम्र अकेले काटे से नहीं कटती. पति उसे धोखा दे कर चला गया था. उसी दौरान उस की मुलाकात बलराम नाम के व्यक्ति से हो गई.

बलराम प्लंबर था. वह मूलरूप से उड़ीसा के केंद्रपाड़ा जिले का रहने वाला था. वह शादीशुदा था, उस की पत्नी उड़ीसा में ही रहती थी. धीरेधीरे दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन्होंने साथसाथ रहने का फैसला कर लिया. वे दोनों दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना अमर कालोनी के गांव दशघरा गढ़ी में लिवइन रिलेशन में रहने लगे.

अनारकली ने घरों में काम करना बंद कर दिया. वह ईस्ट औफ कैलाश में स्थित नर्सरी के पास फुटपाथ पर चाय की दुकान चलाने लगी. बलराम का साथ मिलने पर अनारकली के जीवन में खुशहाली लौट आई थी. करीब 20 साल तक दोनों लिवइन रिलेशन में रहते रहे.

इस बीच बलराम समयसमय पर उड़ीसा स्थित अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने चला जाता था. उस के 2 बेटियां और एक बेटा था. बीवी और जवान बच्चों को इस बात की भनक तक नहीं लग सकी थी कि वह दिल्ली में किसी औरत के साथ रह रहा है.

करीब डेढ़ महीने पहले बलराम उड़ीसा से दिल्ली लौटा तो अनारकली का व्यवहार कुछ बदला हुआ था. हालांकि अनारकली का सारा खर्च वह खुद उठाता था, इस के बावजूद भी वह उस के साथ रूखा व्यवहार कर रही थी. इतना ही नहीं, वह बिस्तर पर भी उसे अपने पास नहीं फटकने देती थी. बलराम को शक हो गया कि जरूर इस के किसी और से संबंध हो गए हैं. वह पता लगाने में जुट गया कि ऐसा कौन आदमी है.

बलराम ने जल्द ही इस बारे में जानकारी जुटा ली. उसे पता चला कि अनारकली के एक नहीं बल्कि 2 औटो ड्राइवरों से नाजायज संबंध हैं. यह जानकारी मिलते ही बलराम के तनबदन में आग सी लग गई. उस का मन तो कर रहा था कि वह अनारकली को अभी ऐसी सजा दे, जिसे वह जिंदगी भर न भूल सके. पर वह कोई बात सोच कर अपना गुस्सा पी गया.

उस ने शाम को अनारकली से उस के बदले व्यवहार के बारे में बात की तो वह उस के साथ लड़ने को आमादा हो गई. दोनों में कुछ देर बहस हुई और मामला शांत हो गया.

एक दिन बलराम दोपहर के समय कमरे पर पहुंचा तो दरवाजा अंदर से बंद मिला. किवाड़ के बीच में जो दरार थी, उस पर आंख गड़ा कर देखा तो कमरे के अंदर जल रही ट्यूबलाइट की रोशनी में सारा नजारा दिख गया. अनारकली एक व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. इस के बाद तो बलराम का शक विश्वास में बदल गया.

बलराम ने दरवाजा खटखटाने के बजाय अनारकली को फोन लगाया तो उस ने स्क्रीन पर नंबर देखने के बाद अपना फोन स्विच्ड औफ कर दिया. इस के अलावा उस ने कमरे में जल रही ट्यूबलाइट भी बंद कर दी.

तब बलराम ने दरवाजा खटखटाया. करीब 4-5 मिनट बाद अनारकली ने दरवाजा खोला तो सामने बलराम को देख कर उस के होश उड़ गए. उसी दौरान कमरे में अनारकली के साथ जो युवक था, वह वहां से भाग गया. तब बलराम ने उस से उस युवक के बारे में पूछा तो अनारकली बोली, ‘‘कोई भी हो, तुम्हें उस से क्या मतलब?’’

‘‘मेरे होते हुए तुम किसी और को यहां नहीं बुला सकती.’’ वह बोला.

‘‘क्यों, मैं ने तुम्हारे साथ क्या शादी की है जो मुझ पर इस तरह से हुकुम चला रहे हो. अपनी जिंदगी मैं अपनी तरह से जिऊंगी. इस में कोई भी दखलअंदाजी नहीं कर सकता. इसलिए बेहतर यही है कि तुम इस मुद्दे पर ज्यादा बात मत करो.’’ अनारकली ने जवाब दिया.

बलराम उस का मुंह देखता रह गया. बात भी सही थी, उस ने अनारकली से शादी थोड़े ही की थी. दोनों का स्वार्थ था, इसलिए वे साथसाथ रह रहे थे. बलराम से जब उस का मन भर गया तो उस ने किसी और के साथ नजदीकी बना ली.

अनारकली की बात पर बलराम ने भी बहस करनी जरूरी नहीं समझी. वह उसे समझाने की कोशिश करने लगा. पर उसी समय उस ने यह जरूर तय कर लिया था कि इस धोखेबाज औरत को वह सबक जरूर सिखाएगा. और यह काम उस के साथ रह कर संभव हो सकता था.

बलराम के दिल में कसक तो थी ही. वह बस मौके का इंतजार कर रहा था. बात 2 दिसंबर, 2016 की है. दोपहर के समय बलराम दशघरा गढ़ी स्थित अपने कमरे पर आया. उस के दिल में अनारकली के प्रति गुस्सा तो भरा ही हुआ था. बलराम ने उस के चरित्र को ले कर बात शुरू की तो अनारकली भड़क गई. दोनों तरफ से गरमागरमी होने लगी. तभी बलराम कमरे में स्लैब पर रखा अपना हथौड़ा उठा लिया और उस का एक वार उस के सिर पर किया.

हथौड़े के वार से अनारकली बेहोश हो कर गिर पड़ी और उस के सिर से खून निकलने लगा. इस के बाद उस ने उस की पीठ पर भी हथौड़े से कई वार किए. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

अनारकली की हत्या करने के बाद बलराम को तसल्ली हुई पर उस के सामने समस्या यह आ गई कि लाश को ठिकाने कैसे लगाए.

कुछ देर सोचने के बाद वह कमरे में रखा किचन में प्रयोग होने वाला चाकू उठा लाया. उस चाकू से उस ने अनारकली को कूल्हे के ऊपर से काट कर 2 हिस्सों में कर दिया. कमरे में बड़ेबड़े 2 ट्रैवल बैग रखे थे. उन में रखे कपड़े निकाल दिए. इस के बाद उस ने उन में लाश के टुकड़े रख दिए. फिर उस ने कमरे का खून साफ किया. अब वह अंधेरा होने का इंतजार करने लगा.

अंधेरा होने पर उस ने वह बैग उठाया, जिस में अनारकली का सिर और धड़ वाला भाग रखा था. उस बैग को रिक्शे में ले कर वह कैप्टन गौड़ मार्ग पर नाले के पास स्थित बसस्टैंड पर उतर गया. कुछ देर वहां बैठने के बाद जब उसे आसपास कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने उस बैग को नाले के किनारे झाडि़यों में डाल दिया.

एक बैग को ठिकाने लगाने के बाद वह कमरे पर आया और दूसरे बैग को रिक्शे में ले कर कैप्टन गौड़ मार्ग पर स्थित मसजिद के पास उतर गया.

फिर वहां से कुछ मीटर आगे चल कर उस ने वह बैग भगेल मंदिर के पास पुलिया के नीचे गिरा दिया. वह इलाका श्रीनिवासपुरी क्षेत्र में आता है. वहां से बह रहे बड़े नाले में 2 छोटे नाले भी जुड़े हुए हैं. वह बैग जिस में अनारकली के कूल्हे और पैर वाला भाग था, लुढ़क कर एक छोटे नाले के किनारे पहुंच गया.

दोनों बैग ठिकाने लगाने के बाद बलराम ने राहत की सांस ली. फिर कमरे की सफाई कर के खून से सनी चादर कूड़े के ढेर पर फेंक आया. इस के बाद वह ताला लगा कर अपने एक जानकार के यहां चला गया.

नोटबंदी के बाद जिस तरह जगहजगह नोट पड़े होने की खबरें सामने आई हैं, उसी तरह नाले के पास झाडि़यों में पड़े उस बैग को किसी व्यक्ति ने लालच में आ कर खोला होगा. पर नोटों की जगह उस में लाश देख कर उसे जरूर पसीना आ गया होगा. डर की वजह से वह बैग को खुला छोड़ कर भाग गया.

उधर भगेल मंदिर के पास छोटे नाले के पास जो बैग गिरा था, उसे कुत्तों ने फाड़ कर उस में से लाश निकाल कर खा ली. केवल एक टांग पर कुछ मांस बचा था. जानवरों की खींचातानी में वह हिस्सा नाले में गिर गया.

पुलिस ने एम्स की मोर्चरी में लाश के जो 2 हिस्से रखवाए थे, उन की डीएनए जांच की गई तो वह दोनों एक ही महिला के पाए गए. बलराम से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा और चाकू भी कमरे से बरामद कर लिया. खून से सनी चादर जहां फेंकी थी, पुलिस उसे वहां ले कर गई पर नगर निगम की गाड़ी वहां के कूड़े को ले जा चुकी थी, जिस से वह चादर वहां नहीं मिल सकी. पुलिस ने बलराम को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर के साकेत कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अर्चना बेनीवाल की कोर्ट में पेश कर उसे 2 दिनों के रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में संबंधित स्थानों की तसदीक कराने के बाद उसे फिर से कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक बलराम जेल में बंद था. मामले की विवेचना इंसपेक्टर राजेश मौर्य कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

दोस्ती पर भारी उसूल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बढ़ती नज़दीकियों से चिंतित लोहियावादियों और तीसरी ताकतों के मुखियाओं के लिए यह बात सुकून देने वाली है कि कम से कम समान नागरिक संहिता के संवेदनशील मुद्दे पर नीतीश मोदी सरकार के साथ नहीं हैं. दूसरे लफ्जों में कहें तो सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का दम भरने बाले राजनैतिक दलों के समूह में बने हुये हैं.

कई दिग्गज नेताओं सहित राजद प्रमुख लालू यादव ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली होगी जब नीतीश ने राष्ट्रीय आयोग के चेयरमेन जस्टिस बीएस चौहान को लंबा चौड़ा पत्र लिखते यह मंशा जताई कि समान नागरिक संहिता जबरन थोपी ना जाये. यह अलग बात है कि अपने पत्र में नीतीश ज्यादा आक्रामक नहीं हुये. उनकी असहमति का मजमून और भाषा बड़ी शिष्ट है, जिसका कुछ हिस्सा जवाहरलाल नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया से लिए लगते हैं, पर भाषा से ज्यादा अहम विचार हैं, जिनमे यह तो उन्होंने जता ही दिया है कि जिन मुद्दों पर उनका सियासी वजूद खड़ा है, उनसे कोई समझौता कर वे अपनी जमीन नहीं खोना चाहते.

गौरतलब है कि सिक्खों के त्योहार प्रकाशपर्व पर नरेंद्र मोदी जब पटना गए थे, तब उन्होंने बिहार की शराबबंदी की खुलकर तारीफ की थी. इसके पहले नीतीश नोट बंदी से इत्तफाक जताते कईयों को चौंका चुके थे. गौरतलब यह भी है कि ये वही नीतीश थे, जिन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा कोसते उनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को बहुत बड़ा खतरा बताया था. मोदी नीतीश के बीच मे तब कड़वाहट का आलम यह था कि लोग डरने लगे थे कि कभी कहीं ये दोनों आमने सामने पड़ गए तो एक दूसरे की गिरहवान ना पकड़ लें. गंगा जी का बहुत सारा पानी बह जाने के बाद जब दोनों में गुटरगूं शुरू हुई तो एक बारगी दोनों शोले फिल्म के जय और वीरू जैसे दोस्ताने पर उतरते नजर आने लगे थे.

कई लोग इस राजनैतिक दोस्ताने को देख हैरान भी थे कि कल के इन प्रतिद्वन्दियों के बीच यह कौन सी नई खिचड़ी पक रही है. तब कहने वाले यह कहने से भी खुद को नहीं रोक पा रहे थे कि जल्द ही नीतीश लालू को छोड़ भाजपा का दामन थाम लेंगे. बहरहाल समान नागरिकता के मुद्दे पर 5 राज्यों के विधान सभा चुनाव के पहले नीतीश ने अपना रुख साफ करते संकेत तो दे दिया है कि वे तीसरी ताकत से कटना नहीं चाहते, पर सच यह भी है कि राजनीति में कब दुश्मन दोस्त और दोस्त दुश्मन बन जाये कहा नहीं जा सकता.  

यूपी को यह साथ पसंद है

कांग्रेस और सपा गठबंधन के बाद दोनो दलों के प्रमुख नेताओं राहुल गांधी और अखिलेश यादव का रोड शो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित किया गया. होटल ताज में 50 मिनट की प्रेस कांफ्रेंस से लेकर 15 किलोमीटर लंबे रोड शो के दौरान दोनो ही नेताओं ने 3 घंटे तक आपसी दोस्ती, समझदारी और करीबी संबंधों का जोश दिखाने में लगे रहे. होटल ताज में जहां राहुल और अखिलेश ने एक साथ लंच किया, वहीं रोड शो के दौरान दोनों ही नेता एक दूसरे को चाकलेट और च्यूइंगम खिलाते नजर आये. दोनों नेताओं की यह कमेस्ट्री खूब पंसद की जा रही है. दोनों ही नेताओं का पहनावा करीब करीब एक जैसा था. अंतर यह था कि अखिलेश ने काले रंग की सदरी और सफेद रंग का पैजामा पहन रखा था. तो राहुल ने पैजामा की जगह डेनिम की जींस और काली सदरी की जगह काले रंग की जैकेट पहन रखी थी.

हजरतगंज में गांधी प्रतिभा के दर्शन से शुरू हुआ यह रोड शो पुराने लखनऊ के ठाकुरगंज तक गया. 15 किलोमीटर लंबे रोड शो को तय करने में 3 घंटे का समय लगा. घंटाघर पर दोनों नेताओं ने जनसभा में एक दूसरे की तारीफ की. अखिलेश यादव ने साफ कहा कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं है. इससे एक बात साफ हो गई की केन्द्र सरकार में सपा को प्रधानमंत्री के रूप में राहुल की दावेदारी से कोई एतराज नहीं है. होटल ताज में प्रेस काफ्रेंस से पहले राहुल और अखिलेश एक साथ बंद कमरे में मिले. इसके बाद एक साथ ही सवालों के जवाब भी दिये. दोनों नेताओं को देखने के लिये भीड जुटी थी.

राहुल और अखिलेश के इस गठजोड़ पर सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव नाराज हैं, तो राहुल की मां सोनिया गांधी इसके पक्ष में हैं. कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि मुलायम की यह नाराजगी बहुत नहीं चलेगी. एक बार सोनिया जी प्रयास करेंगी तो मुलायम सिंह इस विरोध को छोड़ देंगे. रोड शो के दौरान अखिलेश के बच्चे टीना और अर्जुन एसी रथ के अंदर कांग्रेस नेताओं के साथ सेल्फी खीचतें दिखे. वह बाहर खड़े लोगों के फोटो अपने मोबाइल से खींच रहे थे.

अखिलेश यादव बच्चों और परिवार को समय देने के लिये उनको साथ भी रखते हैं. अपने राजनीतिक सफर के समय मुलायम सिंह यादव कभी इस तरह से अखिलेश को साथ नहीं रखते थे. अखिलेश यादव अपने उस दर्द को अपने बच्चों को अनुभव नहीं करने देना चाहते हैं. अपने परिवार के विवाद पर कुछ समय पहले अखिलेश ने कहा था कि मैं सोचता हूं कि ‘क्या मैं अपने बेटे से कभी इतना नाराज हो सकता हूं’

राहुल और अखिलेश के रोड शो में भीड तो काफी थी. कार्यकर्ताओं में भी जोश था. संख्या की बात करे तो सपा के लोग ज्यादा थे. पुराने लखनऊ में मुसलिम वोटर ज्यादा हैं. इस रोड शो का उद्देश्य भी यही था कि मुसलिम समुदाय पूरी तरह से इस गठबंधन के साथ खड़ा हो. इस प्रयास में भी यह रोड शो काफी सफल रहा है. यह साथ वोट के रूप में कितना बदलेगा इस का सही अंदाजा तभी लग सकेगा जब दोनो नेताओं की बाकी प्रदेश में रैलियां होंगी. यह तय है की आगाज अच्छा है. 

बड़े काम की हैं ये 10 वेबसाइट्स

इंटरनेट पर करोड़ों वेबसाइट्स उपलब्ध हैं और हर रोज हजारों नई वेबसाइट्स तैयार होती हैं. मगर वेबसाइट्स के इस महासागर में कुछ ही वेबसाइट्स ऐसी हैं, जो अलग सी सर्विसेज ऑफर करती है. हम आपको बता रहे हैं ऐसे 10 वेबसाइट्स के बारे में जो बहुत काम के हैं.

Mailinator.com

इन दिनों लगभग सभी वेबसाइट्स आपको साइन-अप करने के लिए ईमेल एड्रेस इस्तेमाल करने को कहती है. वे साइट्स आपकी ईमेल आईडी को अन्य सर्विसेज के साथ शेयर करेंगी या नहीं, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. अगर उन्होंने शेयर कर दी तो आपके मेलबॉक्स में स्पैम्स की बाढ़ आ जाएगी. इसलिए Mailnator सर्विस का इस्तेमाल करके आप ऐसा ईमेल एड्रेस बना सकते हैं, जो कुछ ही घंटों बाद नष्ट हो जाता है. आप टेंपररी ईमेल के जरिए साइनअप करके अपना अकाउंट ऐक्टिवेट कर सकते हैं. स्पैम की चिंता किए बगैर आप ऐसा कई बार कर सकते हैं. आप कितने ईमेल एड्रेस बना सकते हैं, इसकी कोई लिमिट नहीं है. ध्यान देने वाली बात यह है कि इसके जरिए आप मेल सिर्फ रिसीव कर पाएंगे, सेंड नहीं.

Zamzar.com

एक फाइल को दूसरी फाइल में कन्वर्ट करना है तो इसे ट्राई करें. इस साइट पर 1200 तरह की फाइल्स को कन्वर्ट किया जा सकता है. अगर आपके पास ऐसा फॉरमैट है जो साइट पर कन्वर्ट नहीं हो रहा, आप उसे ईमेल कर दीजिए और वे इसे कन्वर्ट कर देंगे.

PrivNote.com

कई बार आप किसी निजी जानकारी को किसी के साथ शेयर करना चाहते हैं, मगर सेफ्टी की चिंता होती है. इस साइट के जरिए आप ईमेल या चैट के जरिए टेक्स्ट नोट भेज सकते हैं, जो सामने वाले द्वारा पढ़ लिए जाने के बाद डिलीट हो जाता है. आप नोट को एनक्रिप्ट भी कर सकते हैं.

Newsmap.jp

क्या आपको कभी ऐसे सिंगल पेज की जरूरत महसूस हुई है जहां पर आप लेटेस्ट और ट्रेडिंग न्यूज को एक ही जगह पा सकें? Newsmap यही काम करता है.

SimplyNoise & ASoftMurmur

किसी काम पर फोकस करना हो तो ये वेबसाइट्स आपकी मदद करेंगी. ये फ्री में आपको बहुत सारे ऐंबियंट साउंड ऑफर करती हैं. आप नॉइज़ सिलेक्ट करके ऑडियो लेवल और स्लीप टाइमर ऑप्शन वगैरह सेट कर सकते हैं. ये दोनों वेबसाइट्स के एंड्रॉयड और iOS ऐप्स भी हैं.

ManualsLib.com

जब आप कोई नया प्रॉडक्ट खरीदते हैं, हो सकता है कि इसमें यूजर मैनुअल न हो. यह भी हो सकता है कि आपने वह फेंक दी हो या गुम हो गई हो. ऐसे में आप ManualsLib.com में जाकर विभिन्न डिवाइसेज की कैटिगरी में जाकर अपने डिवाइस या प्रॉडक्ट को सर्च कर सकते हैं. उसकी मैन्युअल आपके सामने होगी.

AccountKiller.com

ज्यादातर सोशल नेटवर्क वेबसाइट्स अकाउंट क्लोज करने की प्रक्रिया को जटिल बनाकर रखती हैं. अगर आप अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स को डिलीट करना चाहते हैं तो AccountKiller.com पर जाएं. यह आपको बताएगी कि कौन सी वेबसाइट से अकाउंट हटाना कितना मुश्किल.

Printfriendly.com

कभी ब्राउजर से किसी वेबपेज को डायरेक्ट प्रिंट करने की कोशिश की है? अजीब सा प्रिंट आता है, जिसमें तस्वीरें, लिंक वगैरह नजर आते हैं. अगर आप चाहते हैं कि मुख्य टेक्स्ट ही प्रिंट हो, इसके लिए आपको उस पेज का URL लेकर Printfriendly.com में पेस्ट करना होगा. कुछ ही सेकंड्स में यह प्रिंटेबल पेज दिखा देता है, जहां से आप प्रिंट दे सकते हैं.

TwoFoods.com

अगर आप अपनी सेहत को लेकर फिक्रमंद हैं और यह देखना चाहते हैं कि आप कितनी कैलरीज ले रहे हैं, TwoFoods.com आपके लिए ही है. इसमें एक पेज का इंटरफेस है, जो अलग-अलग तरह के खाने की कैलरी के बारे में बताता है. आप किसी डिश का नाम इनपुट कीजिए और यह उसमें मौजूद कैलरी, कार्ब, फैट्स और प्रोटीन की जानकारी दे देगा.

Savr.com

हम सभी कई तरह के डिवाइस पर काम करते हैं, मगर उनके बीच फाइल्स को शेयर करना आसान नहीं है. अगर आप चाहते हैं कि यूएसबी ड्राइव के बिना या खुद को ही ईमेल भेजे बिना फाइल्स शेयर की जा सकें तो Savr.com को ट्राई करें. 

भंसाली पर हुए हमले पर “पद्मावती” के स्टार्स की चुप्पी

गुरूवार की शाम जयपुर में जयगढ़ किले में शूटिंग के दौरान ‘राजपूत करणी सेना’ से जुड़े लोगों के एक समूह ने फिल्म ‘‘पद्मावती’’ के निर्माता निर्देशक संजय लीला भसांली को ना सिर्फ थप्पड़ मारा, बल्कि उनके बाल पकड़कर खींचे और शूटिंग के कई उपकरण नष्ट किए. मगर हर मसले पर आम तौर पर मुखर रहने वाले बौलीवुड के ज्यादातर लोग इस मसले पर खामोश हैं.

संजय लीला भंसाली ने अपने तथा अपनी यूनिट के सदस्यों पर हुए इस हमले के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर मदद मांगी. तो वहीं बौलीवुड तक इस खबर के पहुंचते ही अशोक पंडित, करण जोहर, अनुराग कश्यप, राम गेापाल वर्मा, महेश भट्ट, प्रियंका चोपड़ा, आलिया भट्ट व कृति सैनन ने इसकी भत्र्सना करते हुए दोषियों पर कार्यवाही की मांग भी की.

लेकिन इन चंद लोगों के अलावा बौलीवुड का पूरा तबका चुप है. यह बात समझ से परे है. क्योंकि किसी भी देश में, किसी भी वर्ग को अपना विरोध जताने के लिए किसी रचनात्मक इंसान पर हमला करने, थप्पड़ मारने, उसकी निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का हक नहीं होना चाहिए, पर बौलीवुड के अधिकांश लोग चुप हैं.

बौलीवुड के सदस्यों की चुप्पी के कई मायने हो सकते हैं. मगर संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘पद्मावती’’ में का पद्मावती का मुख्य किरदार निभा रही अभिनेत्री दीपिका पादुकोण, शासक अलाउद्दीन खिलजी का किरदार निभा रहे अभिनेता रणवीर सिंह और राजपूत राजा रावल रतन सिंह का किरदार निभा रहे अभिनेता शाहिद कपूर की चुप्पी तो समझ से परे है. शूटिंग के दौरान हुए हमले पर इन सबको सबसे पहले आवाज उठानी चाहिए.

एक सूत्र के अनुसार इन कलाकारों की खामोशी से पूरे देश और पूरी फिल्म इंडस्ट्री में एकमात्र संदेश यही जाता है कि यह सभी ‘राजपूत करणी सेना’ की मांगों के साथ हैं.‘राजपूत करणी सेना’ का आरोप है कि संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म ‘‘पद्मावती’’ में रानी पद्मावती को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं. यदि दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह और शाहिद कपूर को लगता है कि ‘राजपूत करणी सेना’ के आरोप सही हैं और संजय लीला भंसाली फिल्म को गलत तरीके से बना रहे हैं. तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ऐसे में इन कलाकारों ने इस फिल्म में काम करना क्यों स्वीकार किया?

सूत्रों के अनुसार ‘राजपूत करणी सेना’ का आरोप है कि संजय लीला भंसाली, जयपुर के जयगढ़ किले में फिल्म “पद्मावती” की शूटिंग के दौरान पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी पर प्रेम दृष्यों का फिल्मांकन कर रहे थे, जिसका उन्होंने विरोध किया. वार राजपूत रानी पद्मावती ने अलाउद्दीन खिलजी के सामने घुटने टेकने की बजाय वीरता से लड़ी और अंत में जौहर किया था. ऐसे में पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के प्रेम दृष्यों का फिल्मांकन उन्हें पसंद नही आया, जिसके चलते विरोध किया गया.

जयपुर के सूत्रों से जो खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार ‘राजपूत करणी सेना’ का एक समूह जब फिल्म “पद्मावती” का विरोध करते हुए जयगढ़  किला पहुंचा,तो उन्हें भगाने के लिए संजय लीला भंसाली द्वारा नियुक्त सुरक्षा कर्मियों ने गोलियां चलायी, जिससे भीड़ हिंसक हो गयी और उसने संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारा, उनके बाल खींचे. मगर जयपुर पुलिस की तरफ से गोली चलाने की बात की पुष्टि नहीं की गयी है. जयपुर पुलिस के अनुसार संजय लीला भंसाली की तरफ से ‘राजपूत करणी सेना’ के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी गयी है, जिसकी जांच पुलिस कर रही है.

फिल्म ‘‘पद्मावती’’ को लेकर यह विरोध नया नहीं है. अगस्त 2016 में ही ‘पटेल नवनिर्माण सेना’ ने भी संजय लीला भंसाली को चेतावनी देते हुए आगाह किया था कि वह मुंबई में इस फिल्म की शूटिंग ना करें. इसके अलावा जब संजय लीला भंसाली ने ‘‘पद्मावती’’ बनाने की घोषणा की थी, तबसे ‘राजपूत करणी सेना’ उन्हें चेतावनी देती आ रही है कि रानी पद्मावती को गलत तरीके से पेश किया जाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

बहरहाल, इस सारे मसले पर फिलहाल संजय लीला भंसाली की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है. पर उन्हें थप्पड़ मारे जाने का वीडियो वायरल हो चुका है.

बेडरूम सीन में दिखेगा ‘पति-पत्नी टशन’

जब बेडरूम को लेकर चर्चा होती है तो ज्यादातर लोग नॉटीनेस और रोमांटिक सी फीलिंग में डूब जाते हैं. असल में पति-पत्नी की टशन बेडरूम में भी साफ झलकती है.

आज के दौर में पति-पत्नी दोनों ही सोसाइटी के सामने अपने संबंधों को लेकर बहुत सजग होते हैं. अपने खराब संबंधों की झलक तक सोसाइटी के सामने नहीं आने देते. बेडरूम में इनका वह टशन बाहर निकलता है.

जीटीवी के सीरियल वो अपना साकी नायिका रिद्धी डोगरा कहती हैं, बेडरूम सीन में नॉटीनेस और रोमांस तो तमाम बार दिखता रहा है. पहली बार इस कहानी में बेडरूम का टशन दिखेगा. जहां पति-पत्नी लड़ते झगड़ते चीजें फेंकते दिखेंगे. पहले मुझे लगा कि यह स्टोरी राइटर की कल्पना भर होगी. जब सीरियल शुरू हुआ तो कई लेडीज ने यह स्वीकार किया कि बेडरूम नॉटीनेस और रोंमास ही नहीं टशन से भी भरा होता है. ज्यादातर लोग इन बातों को छिपा जाते हैं.

जम्मू की रहने वाली रिद्धी डोगरा राजनीतिक परिवार से हैं. उनके पिता जम्मू कश्मीर में मंत्री रहे हैं. रिद्धी के फूफा भाजपा के बड़े नेता अरूण कुमार जेटली हैं. रिद्धी के करियर की शुरूआत डांस शो से हुई थी. इसके बाद वह कई टीवी सीरियल कर चुकी हैं. नच बलियेऔर खतरों के खिलाड़ीमें उनकी पहचान बनी.

रिद्धी कहती है मैं कॉमेडी और रोमांटिक शो करना चाहती हूं. सीरियल वो अपना सामें मेरा किरदार निगेटिव दिखता जरूर है पर यह अलग सा है. टीवी की दूसरी निगेटिव किरदार से यह पूरी तरह अलग है.

निजी जीवन में रिद्धी अपने पति राकेश को लेकर बहुत पजेसिव है. राकेश भी बहुत पॉपुलर एक्टर हैं. रिद्धी कहती हैं कि मैं राकेश को अपना प्रॉपर्टी समझती हूं. राकेश अपने व्यवहार से बहुत स्वीट हैं. ऐसे में टीवी जगत और बाहर की कई लड़कियां उनको अप्रोच करने की कोशिश करती है. कई बार मुझे बहुत बुरा लगता है. पर हम भी जानते हैं कि एक्टिंग की फील्ड में यह जायज है.

टीवी पर दिखाई जाने वाली कहनियों के बारे में रिद्धी कहती हैं, आज टीवी का दर्शक यह कहता है कि अलग कहानी होनी चाहिये. पर जब कहानी आगे बढ़ती है तो दर्शकों को वही पुराना टेस्ट पंसद आने लगता है. टीवी के दर्शकों को स्पून फीडिंगपंसद होती है. जिससे कुछ दिन चलने के बाद शो वापस पुरानी कहानियों के ट्रेंड पर चल देती है.

रिद्धी कहती हैं कि टीवी सीरियलों को स्टोरी बेस्ड होना चाहिये. यह ज्यादा दिन तक नहीं चलने चाहिये. मुझे राइटिंग का शौक है. मैंने पति के साथ मिलकर कई कांसेप्ट तैयार किये हैं. समय आने पर उनको लेकर कुछ नया प्रयोग दिखेगा’.

वीरू ने किस से कर दी सचिन-विराट की तुलना

टीम इंडिया के पूर्व सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग को कौन नहीं जानता. सहवाग पहले गेंदबाजों की धज्जियां उड़ाकर भारतीय फैन्स का मनोरंजन करते थे तो अब वो अपनी कॉमेंट्री और मजेदार ट्वीट्स से धूम मचा रहे हैं.

इन दिनों सचिन और विराट को लेकर तुलना का बाजार गर्माया हुआ है. कोहली जब-जब अपने बल्ले की चमक बिखेरकर टीम इंडिया को जीत दिलाते है तब-तब इन दोनों दिग्गजों को लेकर तुलना शुरू हो जाती है.

लेकिन अब वीरेंद्र सहवाग ने इन दोनों की तुलना की है और वो भी अपने ही अंदाज में. इसे लेकर वीरू ने एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में सहवाग बताते हैं कि, सचिन के साथ जब आप बल्लेबाजी करने उतरते हो तो ऐसा लगता है कि आप जंगल में एक शेर के साथ जा रहे हो. तो कोई आपके आसपास भी नहीं आता है और ना ही आपको कोई कुछ बोलता है.

वहीं विराट कोहली के बारे में सहवाग कहते हैं कि, विराट कोहली के साथ जब आप मैदान पर जाते हो तो ऐसा लगता है कि एक लोमड़ी के साथ जा रहे हो. जो बहुत चतुर है इसे पते है कि उसे जंगल से कैसे बचकर निकलाना है.

हालांकि इसके बाद सहवाग ये भी कहते हैं कि क्रिकेट में सचनि और कोहली की तुलना करना ठीक नहीं दोनों ही अपने अपने दौर के दिग्गज हैं.

मैंने हमेशा नई चुनौतियां स्वीकार की: हुमा कुरैशी

फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से चर्चा में आयी अदाकारा हुमा कुरैशी ने अच्छी खासी शोहरत बटोर ली है. उनकी ‘एक थी डायन’ जैसी इक्का दुक्का फिल्मों को नजरंदाज कर दें, तो अब तक प्रदर्शित सभी फिल्में सुपरहिट रही हैं. हुमा इन दिनों जोश खरोश से भरी नजर आती हैं. इसकी वजह भी है. हुमा कुरैशी की अक्षय कुमार के साथ आने वाली फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ 17 फरवरी को प्रदर्शित होने जा रही है. जबकि उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘वायसराय हाउस’  मार्च माह में प्रदर्शित हो रही है.

अब तक के अपने करियर की यात्रा को किस तरह से देखती हैं?

बहुत ही अच्छा लग रहा है. मैंने कभी सोचा नहीं था कि बॉलीवुड में मुझे इतनी जल्दी इतनी सफलता मिल सकेगी. पर पांच साल के अंदर बहुत कुछ रोचक तरीके से बदल गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे हर फिल्म में एकदम अलग तरह के किरदार निभाने के मौके मिले और हर बार लोगों ने मुझे पसंद किया. यूं तो काम करते हुए मजा आ रहा है. लेकिन जब भी मेरे पास नयी फिल्म का ऑफर आता है, तो मुझे इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि मैं कुछ नया कैसे करूंगी. वैसे भी अब सिनेमा काफी बदल चुका है. एक कलाकार के तौर पर मैं इस बात में यकीन करती हूं कि वह काम करो, जो आपको चुनौती दे. मैंने हमेशा नई नई चुनौतियां स्वीकार की है. मेरे लिए हर दिन रोचक होना जरुरी है.

संघर्ष के दिन तो याद आते ही होंगे?

आज मैं जिस मुकाम पर पहुंची हूं, वहां तक पहुंचने के लिए मुझे बड़ी मेहनत करनी पड़ी है. मुझे अच्छी तरह से याद है कि मुझे मुंबई में अपने करियर को बनाने के लिए मेरे पिता ने मुझे सिर्फ एक वर्ष का समय दिया था. बॉलीवुड के बारे में सभी को पता है कि यहां किस ढंग से काम होता है. मैंने तमाम रिजेक्शन सहे. ऑडिशन के लिए लंबी कतारों में खड़ी हुई हूं. पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. अंततः मेरी मेहनत मेरे अंदर के अभिनय क्षमता ने मुझे सफलता दिला दी.

आपको नहीं लगता कि गैंग्स ऑफ वासेपुर से जिस अंदाज में आपका करियर शुरू हुआ था, उसे देखते हुए तो आपका करियर काफी आगे जाना चाहिए था?

पता नहीं, सर! पर यदि आपको ऐसा लगता है, तो मैं इससे बहुत खुश हूं. आपकी बातों से यह जाहिर होता है कि मेरी क्षमता में आपको विश्वास है. मैंने भी अपनी तरफ से बेहतर काम करने की कोशिश की. मैं किसी भी तरह की प्लानिंग करने में यकीन नहीं करती. मेरे पास जिन फिल्मों के ऑफर आते हैं, उनमें से जो फिल्में मुझे पसंद आती हैं, वह मैं कर लेती हूं. जिनका कथानक मुझे पसंद नहीं आता, उन्हें मैं नहीं करती. मुझे उम्मीद है कि ‘जॉली एलएलबी 2’ के प्रदर्शन के बाद स्थितियां बदलेंगी.

जॉली एलएलबी 2’ करने के लिए किस बात ने आपको इंस्पायर किया?

इसकी कहानी बहुत अच्छी है, फिर मुझे सुभाष कपूर के साथ काम करना था. इस फिल्म के हीरो अक्षय कुमार हैं, जिनके साथ मुझे काम करना था. मैं अक्षय कुमार से काफी प्रभावित हूं. वह पिछले कुछ वर्षों से एक के बाद एक बहुत ही अच्छी अलग तरह की फिल्में कर रहे हैं. वह चरित्रों को पकड़ कर उन्हें बाखूबी निभा रहे हैं. मैंने उनके अनुशासन और उनके फोकस को लेकर भी कई कहानियां सुनी थी. इसलिए भी मैं उनके साथ काम करना चाहती थी. मैंने जितना सोचा था, इस फिल्म को करते हुए उससे कही ज्यादा बेहतर अनुभव हुए फिल्म के दो टे्लर और तीन गाने बाजार में आ चुके हैं, जिनका बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है.

आपके अनुसार जॉली एलएलबी 2’ है क्या?

लोग इसे कोर्ट रूम ड्रामा कह रहे हैं. मैं भी मानती हूं कि यह कोर्ट रूम ड्रामा है. पर बहुत अलग तरह का है. इस फिल्म में ऐसा कोर्ट रूम ड्रामा है, जो बहुत अलग है. इससे पहले ‘जॉली एलएलबी’ में कोर्ट रूम ड्रामा एक लैंड मार्क था. मगर हमारी फिल्म की कहानी का जॉली एलएलबी से कोई संबंध नहीं है. उस फिल्म में अलग जॉली था, अलग कहानी थी. इस फिल्म में अलग जॉली है. अलग कहानी है. हम लोग एक विचार को आगे लेकर जा रहे हैं, अब फिल्म में अक्षय कुमार हैं. इसलिए कहानी थोड़ी बड़ी और बेहतरीन हो गयी है. फिर मैं इस फिल्म का हिस्सा हूं. फिल्म में मनोरंजन के साथ साथ संदेश भी है.

फिल्म का संदेश या विचार क्या है?

इस फिल्म में कोर्ट रूम ड्रामा तो कोर्ट रूम के अंदर होता है, पर किसी मुकदमे को लेकर अदालत से बाहर जो ड्रामा चलता है, उसका भी चित्रण है. फिल्म की कहानी में कुछ रहस्य भी है.

आपने जॉली एलएलबी देखी होगी. जॉली एलएलबी 2’ उसी का सिक्वअल है, तो दोनों फिल्मों में क्या फर्क पाती हैं?

बहुत फर्क है. कहानी में अंतर है. यह बड़े बजट की फिल्म है. इसका कैनवास बड़ा है. इसमें कॉमेडी, ड्रामा, ह्यूमर, सब कुछ बहुत अलग स्तर पर है. इसके साथ ही इस बार तो इस फिल्म में मैं हूं.

इसके अलावा क्या कर रही हैं?

मैंने गुरिंदर चड्ढा के निर्देशन में एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘वायसराय हाउस’ की है, जिसमें वायसराय हाउस के अंदर कार्यरत एक हिंदू लड़के व एक मुस्लिम लड़की की प्रेम कथा है. मैंने इसमें मुस्लिम लड़की आलिया नूर का किरदार निभाया है, जो कि उर्दू अनुवादक है. यह फिल्म 1947 के देश के बंटवारे से पहले के चार पांच माह की कहानी है.

‘वायसराय हाउस’ तो पीरियड व ऐतिहासिक फिल्म है. इसके लिए आपने कोई शोधकार्य किया था?

जी हां! इतिहास मेरा प्रिय विषय रहा है. मैंने इतिहास में ऑनर्स किया है, जब मैं इस फिल्म का हिस्सा बनी, तो शूटिंग करने से पहले मैंने काफी पढ़ाई की. काफी रिसर्च किया. ‘इंडिया रिमेंम्बर्ड’, ‘चिल्ड्रेन इन द मिड नाइट’ सहित कई किताबें पढ़ी. उस दौर के कुछ लोगों से मिली, बातचीत की. उस दौर में जब एक कैबिनेट मंत्री थी, राजकुमार निर्मित कौर उनकी नीस ही उर्दू अनुवाद थी, जो कि अब 98 साल की हैं, उनसे मिली बहुत कुछ उनसे जानने का मौका मिला. लंदन में गुरिंदर ने ही उनसे मेरी मुलाकात करवायी, मुझे यह जानना था कि उस वक्त यह टीनएजर लड़की कैसी होती है, किस तरह से बात करती है.

इस फिल्म में तमाम विदेशी कलाकारों के साथ आपने काम किया है, क्या अनुभव मिले?

मुझे लगा कि कलाकार कलाकार होता है, फिर चाहे वह भारतीय हो या विदेशी. हां! बहुत अनुशासन प्रिय होते है. मैंने देखा कि उनके अंदर भारत को लेकर जानने की इच्छा है. उनके अंदर भारत को लेकर बहुत उत्सुकता है.

फिल्म वायसराय हाउस को कहां फिल्माया गया है?

जोधपुर और दिल्ली में इसे फिल्माया है. फिल्म देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि में भारत की कहानी है. इस फिल्म को करना बहुत कठिन था, फिल्म बहुत निजी भी है. इस फिल्म को करके मैं उत्साहित भी हूं. मुझे गर्व हैं कि मैंने ‘वायसराय हाउस’ जैसी फिल्म की है.

गुरिंदर चड्ढा को लेकर क्या कहेंगी?

गुरिंदर चड्ढा से मिलने के बाद मैंने सीखा कि एक पंजाबन को कही भी ले जाओ, वह हमेशा पंजाबन रहेगी. गुरिंदर चड्ढा के माता पिता भारतीय पंजाबी हैं, पर उनका जन्म ब्रिटेन के साउथ हॉल में हुआ, जहां उनके पिता काम करते थे, तो वह पूरी तरह से ब्रिटिश हैं. पर वह बहुत देशी हैं, भारतीय हैं, दिल से तो वह पंजाबन ही हैं. मैं भी पंजाबन हूं. मैं पंजाबी समझ लेती हूं. पर बोल नहीं पाती. पर पता नहीं क्यों गुरिंदर को लगता था कि मैं पंजाबी बहुत अच्छा बोलती हूं, तो वह मुझे हमेशा पंजाबी में ही बात करती थीं. उनके साथ काम करते हुए मैंने पाया कि गोरों के बीच वह मेरे अंदर अपना घर पाती थी. फिल्म भी खूबसूरत बनी है. आप यह मान लें कि यह फिल्म एक ब्रिटिश पंजाबी भारतीय देश के बंटवारे को किस नजरिए से देखे, उसकी कथा हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर बहुत ही बैलेंस्ड नजरिया पेश किया है. किसी एक देश या भावना पर आधारित यह फिल्म नहीं है. उन्होंने किसी को अच्छा बुरा दिखाने की बजाए, जो वास्तव में घटित हुआ था, उसको उसके सही परिप्रेक्ष्य रूप में पेश किया है.

तमाम कलाकार वेब सीरिज कर रहें हैं और आप?

जो वेब सीरिज कर रहे हैं, उन्हें मैं बधाई देती हूं. पर फिलहाल मैं उससे दूर हूं.

आपने गौहर खान के साथ एक लघु फिल्म एक दोपहर की है. क्या कहेंगी?

इस फिल्म की निर्देशक स्वाती, हबीब फैजल की सहायक हैं. एक दिन हबीब फैजल ने मुझे फोन किया कि उनकी सहायक एक फिल्म बना रही हैं, और वह चाहती हैं कि मैं यह फिल्म करूं. जब कोई मुझसे कहता है कि वह फिल्म मैं ही करूं, तो मेरी उत्सुकता बढ़ जाती है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है? इसी उत्सुकता के साथ जब मैं स्वाती से मिली, तो उसमें मुझे जोश नजर आया. कहानी अच्छी लगी. हमने एक दिन में ही पूरी फिल्म की शूटिंग पूरी की.

अब तक आपने जो किरदार निभाए हैं, उनमें से किस किरदार ने आपकी निजी जिंदगी पर प्रभाव डाला है?

किसी किरदार ने मेरी जिंदगी पर असर डाला या नहीं डाला, यह तो नहीं बता सकती. पर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ मेरे करियर की बहुत खास फिल्म है. इसी फिल्म से मैंने अपनी जिंदगी व करियर में बहुत कुछ पाया है. इस फिल्म से पहले मुझे भी नहीं पता था कि मैं किस तरह का अभिनय कर सकती हूं. मुझे सिर्फ यह पता था कि मुझे अभिनय करना है. पर मेरे अंदर अभिनय की गुणवत्ता को इस फिल्म ने उजागर किया, इस फिल्म ने मुझे अपने अंदर के कलाकार को जानने पहचानने का मौका दिया. वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति भी दिलायी.

आपके सपने क्या हैं?

कई सपने हैं. एक बायोपिक फिल्म करनी है. एक्शन फिल्में करनी हैं. एक मेंटल लड़की का किरदार निभाना चाहती हूं. क्षेत्रीय फिल्मों में भी काम करना चाहती हूं. मैं अच्छा काम करना चाहती हूं और इंज्वॉय करना चाहती हूं. मेरे सपनों का कोई अंत नहीं है.

आइटम नंबर को लेकर आपकी क्या सोच है?

मेरा मानना है कि यदि फिल्म में आइटम नंबर की जरूरत है, तो आइटम नंबर होने चाहिए. कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि आइटम नंबर की वजह से नारियों के साथ हिंसा हो रही है, नारियों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, तो यह गलत है.

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