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अंधविश्वास परोसते टीवी धारावाहिक

रजनी पिछले 7-8 महीनों से अपने पीहर में रह रही है. करीब 5 वर्ष पहले उस की शादी बड़ी धूमधाम से राजेश के साथ हुई थी. राजेश एक स्कूल में टीचर था तथा रजनी भी अंगरेजी में मास्टर की डिगरी ले चुकी थी. शादी के थोड़े समय बाद ही दोनों में मनमुटाव होने लगा. दोनों के ही घर वालों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, मगर वे झुकने को तैयार नहीं थे. एक दिन गुस्से में राजेश ने रजनी पर हाथ उठा दिया और उसी दिन अपमान की आग में सुलगती रजनी ने पति का घर छोड़ दिया. तब से वह अपने पीहर में ही रह रही है.

एक दिन रजनी की 7 वर्षीय भतीजी नेहा ने अपनी मां यानी रजनी की भाभी से कहा, ‘‘मां, बूआ संतोषी माता की पूजा क्यों नहीं करतीं? इस से उन के सारे दुख दूर हो जाएंगे.’’ यह सुन कर उस की मां को हैरानी हुई. उस ने जब पूछा कि तुम क्या जानती हो संतोषी माता के बारे में? बेटी ने बताया कि उस ने ऐंड टीवी पर एक सीरियल में देखा था, जिस में संतोषी माता अपनी पूजा करने वाली संतोषी की बहुत मदद करती हैं. अगर बूआ भी उन की पूजा करेंगी तो संतोषी माता जरूर कोई चमत्कार करेंगी और फूफाजी को सबक सिखाएंगी.

अंधविश्वासों का जाल

विज्ञान विषय की 16 वर्षीय छात्रा आंचल ने एक दिन अपनी मां से कहा कि अब से वह पीरियड्स के दौरान मंदिर नहीं जाएगी और रसोई के काम में भी हाथ नहीं लगाएगी. कारण पूछने पर उस ने बताया कि उस ने टीवी में एक सीरियल में देखा था कि ऐसा करने पर बहुत पाप लगता है और नरक में जाना पड़ता है. सुन कर उस की मां अवाक रह गई. सिर्फ नेहा और आंचल ही नहीं, कच्ची उम्र के बहुत से बच्चे टीवी सीरियलों द्वारा फैलाए जा रहे इन अंधविश्वासों के जाल में उलझे हुए हैं. 2013 में राजस्थान के गंगापुर सिटी में रहने वाले एक परिवार ने जोकि टीवी पर सिर्फ धार्मिक सीरियल ही देखा करता था, भगवान शिव से मिलने और स्वर्ग जाने की चाहत में जहर खा लिया और 8 में से 5 लोगों की मृत्यु हो गई.

आज के समय में टीवी मनोरंजन का सब से सस्ता और सहज उपलब्ध साधन है. घरघर के ड्राइंगरूम और बैडरूम में जगह बनाने वाले इस इडियट बौक्स से सब से ज्यादा लगाव महिलाओं और बच्चों का होता है. ऐसा नहीं है कि पुरुषों को इस से परहेज है, मगर वे अपनेआप को अधिकतर न्यूज और स्पोर्ट्स चैनल और ज्यादा हो तो बिजनैस चैनल तक ही सीमित रखते हैं. उन के पास टीवी देखने का वक्त भी कम ही होता है. मगर बच्चे और महिलाएं विशेषकर गृहिणियां इस की सब से ज्यादा शौकीन होती हैं.

महिलाओं में धर्म के प्रति आस्था भी अधिक देखी जाती है, इसलिए भी वे धार्मिक धारावाहिक देखना अधिक पसंद करती हैं. एक तरह से वे इसे घर बैठे गंगा स्नान करने जैसा मानती हैं यानी मनोरंजन का मनोरंजन और भक्ति की भक्ति. और बच्चे तो होते ही हैं जिज्ञासाओं से भरपूर. उन्हें तो फिक्शन और अनहोनी सी लगने वाली घटनाएं और अजीबोगरीब किरदार सदा से ही आकर्षित करते रहे हैं. बच्चों और महिला दर्शकों की अधिक संख्या के चलते ही टीवी चैनलों पर इस तरह के धारावाहिकों की बाढ़ सी आ गई है. चाहे वह लाइफ ओके चैनल का सीरियल ‘देवों के देव महादेव’ हो या फिर ऐंड टीवी पर दिखाया जाने वाला सीरियल ‘गंगा’ ये सभी बढ़चढ़ कर टीआरपी बटोर रहे हैं और किरदारों के चमत्कारिक और डरावने कारनामों के साथसाथ दर्शकों को हंसा और रुला भी रहे हैं.

टीआरपी बटोरने का गलत तरीका

सिर्फ धार्मिक सीरियल ही नहीं कई अन्य सीरियल भी अंधविश्वास परोसने में पीछे नहीं हैं. कलर्स टीवी पर एक धारावाहिक में एक इच्छाधारी नागिन को मौडर्न अवतार में बदला लेते दिखाया गया है. इसी तरह स्टार प्लस के धारावाहिक ‘मोहब्बतें’ में एक किरदार शगुन के भूत को दिखाया गया है, जो दूसरे किरदार इशिता को परेशान कर रहा है. पिछले दिनों जी टीवी पर एक धारावाहिक ‘कुबूल’ प्रसारित किया जा रहा था, जिस की पृष्ठभूमि में भोपाल के शाही घराने और वहां के नवाब को दिखाया गया था. अतिआधुनिक परिवेश वाले इस सीरियल में चुड़ैल, टोनेटोटके, काला जादू, बुरी आत्माएं, पिशाच और न जाने क्याक्या परोसा जाता था.

मानसिक शिकार होते लोग

कहने का तात्पर्य यह है कि इन सीरियलों को देख कर लगता है कि अंधविश्वास पिछड़े और अनपढ़ लोगों में ही नहीं होता, बल्कि पढ़ेलिखे, उच्च पद पर आसीन और सभी आधुनिक गैजेट्स इस्तेमाल करने वाले लोग भी समान मानसिक रूप से इस के शिकार होते हैं. इस तरह के धारावाहिक देखदेख कर बड़े हो रहे बच्चों के बाल मन में ये घटनाएं और इन के किरदार अपनी स्थाई जड़े जमा लेते हैं और बड़े होने पर इन्हें कितनी भी दलीलें दे कर समझाया जाए, इन के अवचेतन मन में ये घटनाएं कहीं न कहीं छिपी रह ही जाती हैं. आज लगभग हर छोटाबड़ा चैनल अपने दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर अंधविश्वास परोस रहा है. बेशक चैनल का मकसद सिर्फ दर्शकों का मनोरंजन करना और अपनी लोकप्रियता बढ़ाना ही होता होगा, मगर जानेअनजाने इन के जाल में उलझते बच्चे अपनी राह से भटक रहे हैं. कुछ दिन पहले अपने पड़ोस में रहने वाली 8वीं कक्षा की छात्रा ममता को सुबहसुबह मंदिर जाते हुए देखा तो यों ही पूछ लिया, ‘‘अरे तुम मंदिर से आ रही हो… स्कूल को देर नहीं हो रही?’ इस पर ममता कहने लगी, ‘‘क्या करूं? मम्मी की जिद है कि व्रत करूं या न करूं, मगर हर सोमवार को शिवजी के दर्शन अवश्य करूं. मेरे विरोध करने पर उन्होंने मुझे ‘देवों के देव महादेव’ सीरियल देखने को कहा जिस में वाकई में यह दिखाया गया है कि ऐसा करने से हर मनोकामना पूरी होती है.’’

अनहोनी की आशंका

अब बड़े होने पर चाहे ममता पढ़लिख कर कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, हर सोमवार को शिवजी के दर्शन वह अवश्य करेगी. चाहे मंदिर जा कर करे या फिर घर पर ही. अगर किसी कारण यह संभव न हो पाए तो उस के मन में हमेशाअनहोनी की आशंका बनी रहेगी. विविधताओं से भरे और करीब सवा अरब की आबादी वाले हमारे देश में सिर्फ 33 हजार लोग ही नास्तिक हैं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कुछ ही लोग ऐसे हैं जो भगवान को नहीं मानते. इस से पहले 2012 में जारी वैश्विक धार्मिकता सूचकांक के एक अनुमान के मुताबिक भारत में सिर्फ 3% लोग ही हैं जो ईश्वर में यकीन नहीं करते. आस्था और अंधविश्वास के बीच की विभाजनरेखा बहुत ही महीन होती है. हम अनजाने ही इसे कब पार कर जाते हैं और कब यह आस्था हमारे अंधविश्वास में बदल जाती है हम खुद भी नहीं पहचान पाते.

टैलीविजन तो खुद ही विज्ञान की देन है, लेकिन यह टीवी 21वीं सदी के विज्ञान के पथ पर बढ़ते बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल कर उन्हें अंधविश्वास की ओर धकेल रहा है. अंधश्रद्घा निर्मूलन समिति के डा. दिनेश मिश्रा के अनुसार, इन दिनों टीवी धारावाहिकों में डायन, नागनागिन, काला जादू और प्राचीन कुरीतियों से जुड़ी घटनाओं आदि को बहुतायत से दिखाया जा रहा है और इस के नकारात्मक प्र्रभाव भी सामने आ रहे हैं. यानी जिस तकनीक का इस्तेमाल अंधविश्वास दूर करने में किया जाना चाहिए उसी का उपयोग अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जा रहा है.

किसी काम का नहीं कानून

विश्व भर में भारत के वैज्ञानिकों की एक खास पहचान है. लेकिन हमारे टीवी सीरियल आज भी जादूटोना और भूतप्रेतों से बाहर नहीं निकल पा रहे. 1988 में आए एक टीवी सीरियल ‘होनीअनहोनी’ को डीडी चैनल पर प्रसारित करने पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि इस में अंधविश्वास, भूतप्रेत जैसे कंटैंट दिखाए जा रहे थे. हालांकि बाद में कोर्ट ने इसे प्रसारित करने के आदेश दे दिए थे. ब्रौडकास्टिंग कंटैंट कंप्लेंट काउंसिल यानी बीसीसीसी पहले ही इस तरह के कंटैंट को प्रसारित करने वाले चैनलों को ऐडवाइजरी जारी कर चुका है और पिछले दिनों भी इस के चेयरमैन मुकुल मृदुल ने एक निर्देश जारी किया था, जिस के अनुसार बीते दिनों में काउंसिल को टीवी शोज में डायन, चुड़ैल, जादूटोना, अंधविश्वास जैसे सीन खासतौर पर महिलाओं को नैगेटिव रूप में अधिक दिखाए जाने की शिकायतें बहुत मिली हैं, इसलिए इन्हें बढ़ाचढ़ा कर न दिखाया जाए, साथ ही अगर स्टोरी लाइन के लिहाज से यह आवश्यक हो तो चैनल को टैलीकास्ट करते समय स्क्रोल चलाना होगा कि यह सब काल्पनिक है. फिर भी सवाल यह उठता है कि क्या बीसीसीसी केवल तभी कोई कदम उठाता है जब कोई शिकायत दर्ज हो? क्या खुद उस की नजर इन पर नहीं पड़ती?

बचने की जरूरत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सभी को बोलने और अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर कुछ भी दिखाने पर रोक लगनी ही चाहिए और विशेषकर तब जब मामला आने वाली पीढ़ी यानी कि बच्चों से जुड़ा हो. साथ ही गृहिणियों को भी अपना कीमती समय इन धारावाहिकों को देखने में बरबाद न कर कुछ रचनात्मक करना चाहिए. अपने बच्चों के लिए भी यह उन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे खुद भी अंधविश्वासों से दूर रहें और उन्हें भी दूर रखें. अच्छे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक सीरियल ही देखें.

‘कैमरामैन और निर्देशक दोनों के माइंड सेट में फर्क होता है’

बौलीवुड की माया किसी की समझ में नहीं आ सकजी. लगभग एक माह पहले दिवंगत हुए दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता वृत्त चित्र निर्माता दीपक राय के भतीजे अमित राय ने दिल्ली में उनके साथ बतौर सहायक काम करते हुए काफी कुछ सीखा. दीपक राय ने अमित राय को कैमरा चलाने से लेकर फिल्म निर्देशन तक सिखाया था. पर जब निर्देशक बनने की तमन्ना के साथ अमित राय मुंबई पहुंचे, तो उन्हे काफी संघर्ष करना पड़ा. अंततः अमित राय ने बतौर कैमरामैन शाहिद कपूर के करियर की पहली फिल्म ‘‘इश्क विश्क’’ से बौलीवुड में शुरुआत की थी. उसके बाद उन्होंने ‘सरकार’, ‘सरकार राज’, ‘दम मारो दम’ सहित 15 से 20 फिल्में की. 15 साल तक कैमरामैन की हैसियत से काम करते रहने के बाद उन्होंने 2012 में फिल्म निर्देशन में कदम रखने का फैसला किया. बतौर फिल्म निर्देशक ‘रनिंग शादी डाट काम’ बनायी, जो कि दो वर्ष से प्रदर्शित नहीं हो पा रही थी. अब 17 फरवरी को फिल्म ‘रनिंग शादी डाट काम’ प्रदर्शित होने जा रही है.

प्रस्तुत है उनसे बात चीत के अंश….

किस बात ने आपको सिनेमा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया?

– मैं दिल्ली से हूं. हर दिन शुक्रवार फिल्म देखने का शौक था. पहले मैं अमिताभ बच्चन की वजह से फिल्में देखता था. धीरे धीरे मुझे निर्देशक के नजरिए से फिल्मों में फर्क नजर आने लगा. दिल्ली में कालेज की पढ़ाई के दौरान ही मेरे अंदर फिल्म निर्देशक बनने का कीड़ा जागा था और उसी मकसद से मैं मुंबई आया था. मेरे चाचा दीपक राय डाक्यूमेंटरी फिल्म मेकर थे. उन्हे दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखी थीं. 16-17 साल की उम्र में मैं चाचा के कमरे में गया. किताबें तलाश करते हुए एक फिल्म की पटकथा दिखी. मैने पढ़ना शुरू किया. पहली बार मुझे अहसास हुआ कि कोई इंसान अपने कमरे में बैठकर पूरी फिल्म की कल्पना करता है. वह अपने दिमाग में पूरी कल्पना कर कहानी लिखता है. उसके बाद वह चीज परदे पर आती है. इससे मैं बहुत फैशिनेट हुआ. यहां से मेरी रूचि बदल गयी. फिर मैंने लिखना शुरू किया. अलग अलग निर्देशकों के बारे में पढ़ना शुरू किया. एक किताब सत्यजीत रे पर पढ़ी. उसके बाद मेरी पूरी सोच बदल गयी. मेरी समझ में आया कि एक निर्देशक किस तरह पूरी फिल्म को परदे पर साकार करता है. सत्यजीत रे से मैं प्रभावित हुआ. वह कहानी लिखते थे, निर्देशन करते थे, खुद संगीत देते थे. चरित्र चित्रण का रेखा चित्र भी बनाते थे. वह कैमरा भी खुद ही चलाते थे. तो मेरी समझ में आया कि एक बेहतरीन फिल्मकार बनने के लिए फिल्म माध्यम के हर विधा की समझ होनी चाहिए और कैमरा की समझ सबसे ज्यादा जरुरी है. उनके पास कैमरा था. कालेज के जमाने में मैं उनका सहायक बन गया और कैमरे से भी मेरा खेलना शुरू हो गया था. धीरे धीरे कैमरा एंगल की समझ हो गयी. अब मैं आश्वस्त हो गया था कि फिल्म निर्देशित करते समय मैं अपने कैमरामैन को बता सकूंगा कि मुझे यह एंगल चाहिए, इस तरह की लाइटिंग चाहिए.

मुंबई कब आए थे?

– मैं 17 वर्ष पहले मुंबई फिल्म निर्देशक बनने आया था. पर मुंबई का संघर्ष आप समझ सकते हैं. हम अपने कुछ मित्रों के साथ दिल्ली से आये थे. हम सभी जोगेश्वरी पूर्व में तबेले के ऊपर एक कमरा लेकर रहते थे. हमारे बीच तय यह हुआ था कि जिसे पहले काम मिलेगा, वह काम करेगा और घर का खर्च संभालेगा. एक साथी थे सुहास खान. वह कैमरामैन रहे हैं. फिल्म ‘मर्डर’ के कैमरामैन वही थे. कुछ फिल्में निर्देशित की हैं. मुझे कैमरा चलाना आता था. उसने मुझे पहले कुछ टीवी सीरियल में कैमरामैन के रूप में काम करने का मौका दिलाया. फिर मुझे पहली फिल्म मिली ‘इश्क विश्क’. 15 साल तक कैमरामैन के रूप में काम करने के बाद मैंने फिल्म ‘‘रनिंग शादी डाट काम’ का निर्देशन किया.

फिल्म ‘रनिंग शादी डाट काम’’ के प्रदर्शन में दो साल का समय लग गया. इस बीच आप क्या करते रहे?

– हर फिल्म की अपनी तकदीर होती है. इसी के चलते इस फिल्म के प्रदर्शन में देरी हुई. पर मेरा एक पैर हमेशा एड की दुनिया में रहा है. मैंने कई विज्ञापन फिल्में निर्देशित की हैं. मैंने शुजीत सरकार व आर बालकी के साथ कुछ विज्ञापन फिल्में कैमरामैन के रूप में की हैं. आर बालकी की कंपनी के लिए मैने कुछ एड फिल्में निर्देशित की हैं. अमिताभ बच्चन के साथ जस्ट डायल सहित कई ब्रांड की एड फिल्में निर्देशित की हैं. एड फिल्म व फीचर फिल्म के निर्देशन में आईपीएल और टेस्ट क्रिकेट वाला अंतर है. कैमरामैन और निर्देशक दोनों के माइंड सेट में काफी फर्क होता है. कैमरामैन के तौर पर सेट पर भले आप राजा होते हैं, पर फिल्म के निर्माण के दौरान आपकी सीमाएं तय होती हैं.

आप सत्यजीत रे से प्रभावित रहे हैं. बतौर कैमरामैन आपने जो फिल्में  की, उन सबसे आपके निर्देशन में बनी यह फिल्म एकदम जुदा है?

– जी हां! यह बहुत अलग तरह की फिल्म है. इसकी वजह यह है कि यदि मैं छोटे शहर व किरदार की कहानी चुनता हूं, तो यह उनकी रियालिटी है. इसी तरह सत्यजीत रे की फिल्मों में रियालिटी होती थी. फिल्म ‘सरकार’ में भी रियालिटी थी. अब यदि राम गोपाल वर्मा अमृतसर में फिल्म बनाएंगे, तो उसकी कहानी अलग होगी. इस तरह मेरी स्प्रिट वही है, जिस तरह के सिनेमा से मैं प्रभावित रहा हूं. पर ‘रनिंग शादी डाट काम’ कोई संजीदा सिनेमा नहीं है. ‘सरकार’ पूरी तरह से इंटेस फैमिली ड्रामा है. पर हमारी फिल्म लाइट हार्टेड फिल्म है. पर इसमें स्लैपस्टिक कामेडी नहीं है. इसमें ह्यूमर है. पर फिल्म के पात्र वास्तविक हैं. इनका ह्यूमर इनकी वास्तविकता से जुड़ा हुआ है.

राम गोपाल वर्मा ने आपको निर्देशक के रूप में ब्रेक नहीं दिया?

– उन्होंने सोचा था. मैं बता दूं कि मेरे व रामू के रिश्ते बहुत अलग हैं. हम अच्छे दोस्त, अच्छे सहकर्मी हैं. वह मेरे लिए सिनेमा का संसार हैं. मैं अपनी फिल्म सिनेमैटिक गाड के औरा में निर्देशित नहीं करना चाहता था. रामू जी में दूसरों को अपनी बात कंविंस करने की ताकत है, इसलिए भी मैं उनकी फिल्म निर्देशित नहीं करना चाहता था. मुझे दबाव में काम करना पसंद नहीं. मैं कैमरामैन के रूप में वाइस कैप्टन था, वह निर्देशक के तौर कैप्टन थे. वह कहे तो मैं कैमरा लेकर समुद्र में कूद सकता था. पर निर्देशक के तौर पर उनकी बात नहीं सुन सकता था. मैं नहीं चाहता था कि मेरे व उनके रिश्ते गड़बड़ाएं. मैं रिश्तों को बहुत महत्व देता हूं.

कैमरामैन अच्छा हो, तो कमजोर निर्देशक भी अच्छी फिल्म दे सकता है? आपकी राय?

– मुझे ऐसा नही लगता. एक फिल्म अच्छे कंटेंट पर ही चलती है.

सिनेमा के बदलाव को किस तरह से देखते हैं?

– मेरे हिसाब से यह उत्साहवर्धक समय है. स्टूडियो कल्चर की वजह से सिनेमा के निर्माण में काफी बदलाव आ गया है. अब काम करने का तरीका सुधर गया है. अनुशासन आ गया है.

2017 मेकअप मंत्रा

औल टाइम हौट, गौर्जियस और फैब्यूलस लुक पाना चाहती हैं, तो जरूरत है फैशन ब्यूटी के बदलते ट्रैंड को जान कर, समझ कर और उसे अपना कर अपनी पर्सनैलिटी में निखार लाने की. मेकअप ट्रैंड को फौलो कर के आप अपनी खूबसूरती में निखार ला कर पा सकती हैं टैन औन टैन ब्यूटी लुक.

क्रिस्टल क्लीयर मेकअप

नए साल में क्रिस्टल क्लीयर मेकअप का चलन रहेगा, जो ट्रांसपैरेंट मेकअप का ही ऐडवांस रूप है और पहले से कहीं बेहतर. इसलिए अगर आप फ्रैश, नैचुरल व क्लीयर सौफ्ट लुक पाना चाहती हैं, तो क्रिस्टल क्लीयर मेकअप आप के लिए बैस्ट औप्शन है. इसलिए अब मेकअप प्रोडक्ट्स खरीदते समय यह ध्यान रखें कि कलर शेड्स ज्यादा लाउडी न हों. क्रिस्टल क्लीयर मेकअप में अपनी स्किनटोन के अनुसार नौर्मल फाउंडेशन का चुनाव न कर के स्किन ल्यूमिनाइजर फाउंडेशन का चुनाव करें. इस में मौजूद नैचुरल पिगमैंट्स आप की स्किन को सौफ्ट लुक देने में ज्यादा असरदार होते हैं. यह फाउंडेशन अनईवन स्किनटोन को विजुलाइज हुए बिना ईवन टोन देता है.

आईशैडो में नैचुरल पेस्टल शेड्स, एचडी वौल्यूमाइजिंग मसकारा व जैल लाइनर, चीक्सबोन पर लाइट ब्लशर स्ट्रोक्स हाईलाइटर के साथ, आर्टिफिशियल लैशेज, लौंग लास्टिंग हाईग्लौस या लिपस्टिक से अपने लुक को कंप्लीट करें. ओवर मेकअप की हैबिट को बायबाय कहें. क्रिस्टल क्लीयर मेकअप प्रोडक्ट के लिए बौबी ब्राउन, लोरियल आदि बेहतरीन विकल्प हैं.

ग्राफिक आई मेकअप

इस बार ब्यूटी सीजन में पिछले साल के मुकाबले स्मोकी आईज के साथ ग्राफिक लाइनर का चलन रहेगा. जहां एक ओर स्मोकी आईज इफैक्ट के लिए अपर और लोअर लिड पर लाइनर व काजल को आईशेड के साथ स्मज कर के स्मोकी लुक क्रिएट किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर ग्राफिक लाइनर में बिना स्मज इफैक्ट के आंखों को लाइनर से स्पष्ट व मौडर्न लुक का चलन रहेगा. आईशेड्स में वाईब्रेंट, मिक्स फैमिली कलर शेड्स, फाइन पार्टिकल शिमर, निओन व डस्टी कलर शेड्स का चलन रहेगा.

हाई शाइन

इस सीजन में लिप्स की ब्यूटी को ऐनहांस करने के लिए लिपस्टिक के बोल्ड शेड्स को हाई शाइन ग्लौस के साथ डिफाइन करें. एक तरफ क्रिस्टल क्लीयर मेकअप का चलन रहेगा तो दूसरी तरफ लिप्स की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए ब्लड रैड, बरगंडी, मैरून, प्लम, पेस्टल, ब्राइट पिंक और न्यूड नैचुरल कलर का क्रेज देखने को मिलेगा. मेबलिन, कलरबार, क्रायलोन, लैक्मे आदि विकल्प हैं.

आर्च आईब्रोज विद ब्रोज मेकअप

बिना किसी मेकअप के भी केवल परफैक्ट आईब्रोज आप के चेहरे की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा सकती हैं. स्पैशियली आर्च शेप विद लौंग लैंथ आईब्रोज का चलन रहेगा. इस के साथ लास्ट कलर आईब्रोज को आप कलर आईब्रोज मेकअप पेलेट की मदद से आइडियल लुक दे सकती हैं. हलकी आंखों पर रोज रात को जैतून के तेल में आईब्रो पैंसिल डुबो कर लगाएं व ट्रांसपैरेंट मसकारे से उन्हें सैट करें.

ब्लांड हेयर

बालों की खूबसूरती को निखारने के लिए कलर ब्लांड लोलाइट व हाईलाइट का अलग ही क्रेज देखने को मिलेगा. इस के साथ मल्टीकलर हेयर टैक्स्चर टैंपरेरी, थिन हाईलाइट, चंकी हाईलाइट, ओंब्रे हाईलाइट, टैक्स्चर वौल्यूम हाईलाइट और फौइल हाईलाइट आदि के बेहतरीन औप्शन आप ट्राई कर सकती हैं.

कलर लैशेज

यह सीजन फनलविंग व ऐक्सपैरिमैंट का रहेगा. पलकों की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल लैशेज का चलन जोरों पर रहेगा. आर्टिफिशियल लैशेज में नैचुरल लुकिंग लैशेज के स्थान पर रनवे लैशेज, डबलअप लैशेज, ऐजी लैशेज, कलर लैशेज, ज्वैल, कोर्सेट, कर्ली, स्पार्की आदि बेहतर विकल्प रहेंगे.

3डी नेल आर्ट

मेकअप मंत्रा में अगला नंबर नेल आर्ट व नेल पेंट्स का है. स्पैशियली हौट नेल जैल कलर, न्यूड, मैटेलिक गोल्ड, मैग्नेटिक कलर, ब्रौंज, डीप वाइन, निओन, वाइब्रेट कलर आदि के अलावा नेल आर्ट में 3 डी, फैंटेसी, हाफ मून, स्टोन व फ्लौवर नेल आर्ट, ऐक्वा नेल आर्ट, थीम बेस नेल आर्ट्र, फ्रैंच विद स्टोन नेल आर्ट, टू ऐंड थ्री कलर नेल आर्ट, पेपर नेल आर्ट, मारबल नेल आर्ट, डौट, प्रिंटेड नेल आर्ट का चलन रहेगा. इस के अलावा नेल आर्ट किट व नेल स्टीकर की मदद से आप खुद भी चंद मिनटों में नेल डिजाइन बना सकती हैं.

डिजाइनर ड्रैस

आखिरी ब्यूटी फैशन मंत्रा है डिजाइनर ड्रैस, जिस में अनारकली ड्रैस, लहंगाचोली, डिजाइनर ब्लाउज विद लाइट वर्क साड़ी, डिजाइनर साड़ी विद कंट्रास्ट कलर, स्टाइलिश गाउन, स्टाइलिश कुरती, डिजिटल प्रिंट साड़ी, ड्रैपिंग साड़ी, ऐथनिक डिजाइन साड़ी, हैंडवर्क साड़ी, नैट साड़ी, वन मिनट ड्रैप साड़ी, स्लिम लुक साड़ी आदि. फैब्रिक कलर की बात करें, तो पेस्टल के साथ बोल्ड कलर का मिक्समैच कौंबिनेशन काफी पौपुलर रहेगा. इस के अलावा निओन, मल्टी कलर, क्रीम विद डार्क मैरून ब्लू कलर कौंबिनेशन, पिंक विद औक्सीडाइज कलर, गोल्ड और ऐक्वा फ्यूशिया कलर औन डिमांड हेयरस्टाइल का चलन रहेगा.केशों को रिंगलैट्स, शाइन, स्ट्रेटनिंग, क्रिपिंग, हौट रोलर, फिंगर वेव आदि से न्यू लुक दिया जाएगा. साथ ही कर्ली फंकी पोनी, कर्ल विद फ्रिंज, साइड बन, फ्रैंच पोनीबन, फिशटेल लूज पोनी व बन, रैट्रो बन, हाई बन, डबल ऐंड ट्रिपल ट्विस्ट नौट, नीडिल कर्ल, फंकी बोल्ड बन आदि स्टाइल का क्रेज रहेगा, जिसे विभिन्न प्रकार की ऐक्सैसरीज से कंप्लीट कर के फाइनल टच दिया जाएगा.

कैराटिन ट्रीटमैंट से चमकाएं बाल

हेयर रीबौंडिंग, हेयर स्ट्रेटनिंग, हेयर स्मूदनिंग ये तीनों ही ट्रीटमैंट भारतीय महिलाओं के लिए नए नहीं हैं. देश की करीब 70% महिलाओं को इन में से किसी एक ट्रीटमैंट का अनुभव जरूर हुआ होगा. खासतौर पर जब युवावर्ग की महिलाओं की बात की जाए, तो रीबौंडिंग, स्ट्रैटनिंग व स्मूदनिंग के बिना तो उन का गुजारा ही नहीं है. मगर अब इन तीनों के साथ हेयर ट्रीटमैंट भी जुड़ चुका है. हेयर कैराटिन ट्रीटमैंट के नाम से कौस्मैटिक इंडस्ट्री में प्रसिद्ध यह ट्रीटमैंट बालों में कैराटिन की मात्रा को बढ़ाने के लिए किया जाता है.

क्या है कैराटिन ट्रीटमैंट

गृहशोभा की फेब मीटिंग में ब्यूटीशियनों को कैराटिन ट्रीटमैंट पर विस्तृत जानकारी देने आए ऐक्सपर्ट सैम इस ट्रीटमैंट के बारे में बताते हैं, ‘‘महिलाओं में बढ़ती उम्र के साथ होने वाले हारमोनल बदलाव के कारण बालों और नाखूनों पर सब से अधिक प्रभाव पड़ता है. जहां नाखूनों में क्यूटिकल्स के खराब होने की समस्या हो जाती है, वहीं बालों को प्रोटीन लौस की दिक्कत से जूझना पड़ता है. चूंकि बाल कैराटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं, इसलिए इस के लौस होने से बाल पतले और फ्रीजी हो जाते हैं. ऐसे बालों पर रीबौंडिंग और स्ट्रेटनिंग का भी कुछ खास असर नहीं पड़ता है, बल्कि कमजोर बालों में हेयर फौल की समस्या और बढ़ जाती है. ऐसे बालों के लिए कैराटिन ट्रीटमैंट वरदान है. इस ट्रीटमैंट में बालों पर प्रोटीन की परत चढ़ाई जाती है और प्रैसिंग के द्वारा प्रोटीन लेयर को लौक कर दिया जाता है.’’

कैराटिन ट्रीटमैंट की प्रक्रिया

इस ट्रीटमैंट के लिए बालों से चिकनाहट को पूरी तरह से दूर करने के लिए 2 बार शैंपू किया जाता है. इस के बाद बालों को 100% ब्लो ड्राई किया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि बालों में बिलकुल मौइश्चराइजर न बचे और कैराटिन प्रोडक्ट को अच्छी तरह बालों में पैनिट्रेट किया जा सके. ब्लो ड्राई के बाद बालों को 4 भागों में बांट कर गरदन वाले हिस्से से प्रोडक्ट लगाना शुरू किया जाता है. प्रोडक्ट लगाने के बाद बालों को फौइल पेपर से 25 से 30 मिनट के लिए कवर कर दिया जाता है. इस के बाद बालों को फिर से ब्लो ड्राई किया जाता है और 130 से 200 डिग्री तापमान के बीच बालों की प्रैसिंग की जाती है, ताकि प्रोडक्ट अच्छी तरह बालों में पैनिट्रेट हो जाए.

इस प्रक्रिया के 24 घंटे बाद बालों को पानी से साफ कर के 180 डिग्री तापमान पर उन की फिर से प्रैसिंग की जाती है. प्रैसिंग के बाद बालों को कैराटिन युक्त शैंपू से साफ किया जाता है और कैराटिन कंडीशनर लगा कर 6-7 मिनट के लिए छोड़ दिया जाता है. फिर बालों को साफ कर के ब्लो ड्राई किया जाता है और इसी के साथ कैराटिन ट्रीटमैंट की प्रक्रिया पूरी हो जाती है.

कैराटिन ट्रीटमैंट नहीं है रीबौंडिंग

बहुत सी महिलाएं कैराटिन ट्रीटमैंट को रीबौंडिंग समझने की भूल कर बैठती हैं और बाद में ट्रीटमैंट में खामियां ढूंढ़ने लगती हैं. सैम बताते हैं, ‘‘कैराटिन ट्रीटमैंट बालों की फ्रीजीनैस दूर कर उन्हें शाइनी और स्मूद बनाता है. मगर यह बालों को स्ट्रेट नहीं करता. हां, जिन महिलाओं के बाल पहले से स्टे्रट हों उन के बालों में कुछ समय के लिए स्ट्रैटनिंग वाला इफैक्ट जरूर आ जाता है. मगर जिन के बाल कर्ली हैं उन के बाल शैंपू वाश के बाद पहले की तरह ही हो जाते हैं, बस स्मूदनैस और शाइनिंग रह जाती है. साथ ही बाल पहले से ज्यादा हैल्दी भी लगने लगते हैं.’’

महिलाओं को यह भी भ्रम है कि कैराटिन ट्रीटमैंट परमानैंट होता है जबकि ऐसा नहीं है. सैम के अनुसार, कैराटिन ट्रीटमैंट में बहुत ही माइल्ड प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल होता है जबकि स्मूदनिंग और रीबौंडिंग में हार्ड कैमिकल्स का प्रयोग किया जाता है. कैराटिन ट्रीटमैंट का असर बालों पर 4-5 महीने रहता है. इस के बाद फिर से यह ट्रीटमैंट देना होता है.        

इन बातों का रखें ध्यान

– इस ट्रीटमैंट की प्रक्रिया के दौरान हीट इक्विपमैंट्स का प्रयोग किया जाता है, जिस से बालों को काफी नुकसान पहुंचता है. भले ही यह नुकसान ट्रीटमैंट के प्रभाव के कारण न दिखे, मगर 4-5 महीने बाद जब ट्रीटमैंट का असर खत्म हो जाता है तब बालों में डैमेजेस दिखने लगते हैं. ऐसा न हो इस के लिए बालों को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है. मसलन, कैराटिन युक्त हेयरस्पा इस में काफी मददगार साबित होते हैं.

– ट्रीटमैंट के बाद बालों को कम से कम फोल्ड करें. दरअसल, यह स्ट्रेटनिंग ट्रीटमैंट नहीं है, मगर इस में स्ट्रेटनिंग वाला इफैक्ट आ जाता है. बालों को फोल्ड करने पर यह इफैक्ट खत्म हो जाता है.

– अन्य ट्रीटमैंट्स की तरह कैराटिन ट्रीटमैंट भी एक कैमिकल ट्रीटमैंट है. इस के प्रयोग के बाद बालों का रंग 1 लैवल फेड हो जाता है. अत: इस बदलाव के लिए पहले से ही खुद को तैयार कर लें.

– ट्रीटमैंट के बाद बालों में केवल सल्फेट फ्री शैंपू और सल्फेट फ्री कंडीशनर ही लगाएं. ट्रीटमैंट से पहले प्रोडक्ट के इनग्रीडिऐंट्स जरूर देखें. ग्लाइकोलिक ऐसिड वाले प्रोडक्ट के इस्तेमाल से बचें, क्योंकि इस से भी बालों का प्राकृतिक रंग खराब होता है.

– यह ट्रीटमैंट खासतौर पर उन महिलाओं के लिए अच्छा साबित हो सकता है जिन के बाल पहले करवाए गए कैमिकल ट्रीटमैंट से डैमेज हो चुके हैं.

– यह ट्रीटमैंट किसी अनुभवी प्रोफैशनल से ही कराएं और फौर्मल्डेहाइड फ्री कैराटिन ट्रीटमैंट करने के लिए कहें. दरअसल, कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि कैराटिन ट्रीटमैंट में फौर्मल्डेहाइड फ्री कैराटिन ट्रीटमैंट भी उपलब्ध है, इसलिए वही सैलून चुनें जहां फौर्मल्डेहाइड फ्री कैराटिन ट्रीटमैंट दिया जाता है.

जहां चाह, वहां राह

अकसर हम इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं या फिर प्रशासन को कोसते हैं कि हमारे आसपास हरियाली घटती जा रही है अथवा पेड़ सूखते जा रहे हैं. मगर सिर्फ अफसोस जाहिर करने या प्रशासन को कोसने से बात नहीं बनती. 14 महिलाओं के स्वयंसेवी ग्रुप ‘रास्ता छाप’ की सदस्याएं कालेज के समय से एकदूसरे से परिचित थीं और पेंटिंग में रुचि रखती थीं. इन्होंने अपनी कला के जरीए लोगों को जागरूक करने का एक नायाब तरीका निकाला. इन्होंने सूखे पेड़ों पर पेंटिंग करनी शुरू की ताकि इन की उपयोगिता व खूबसूरती बढ़ जाए और इन लोगों का ध्यान बरबस ही इन की तरफ जाए. इस ग्रुप की सदस्या प्रिया भीमानी बताती हैं, ‘‘हमारा मकसद पेड़ों को प्रिजर्व, प्रोटैक्ट व प्लांट करना है ताकि पर्यावरणीय संतुलन कायम रखने के प्रयास में हम अपना सहयोग दे सकें और लोगों को भी इस के लिए प्रेरित कर सकें. हम पेड़ों के सूखने की वजहों को समझ उन्हें दूर कर इन्हें फलनेफूलने का मौका देना चाहते हैं.

‘‘डैड ट्री पर पेंट करना एक तरह से फील गुड माहौल तैयार करता है और संबंधित इलाका भी खूबसूरत दिखने लगता है.

‘‘करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुई इस मुहिम के तहत हम ने मुंबई के जुहू, बांद्रा, वर्सोवा व खार के आसपास के इलाकों में अपने कार्य को अंजाम दिया. धीरेधीरे हमारे प्रयासों को लागों का सहयोग मिलने लगा. स्वयं सहायता समूह व सैलिब्रिटीज भी इस कार्य में सपोर्ट में आगे आए. हमें मीडिया का अटैंशन भी मिलने लगा. ग्रुप की सदस्य नीलू विर्क कहती हैं कि पेंटिंग मुख्य रूप से समस्या के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए शुरु की गई. अब हम मुंबई के जुहू इलाके में 4 सौ पेड़ लगाकर उन की देखभाल कर रहे हैं. हम लोगों को अधिक से अधिक प्लांटेशन व ट्री अडौप्ट करने को प्रेरित करते हैं. 1 डैड ट्री के बदले में 2 नए प्लांट लगाने जरूरी हैं.’’

सब से बड़ी बात है कि ये महिलाएं किसी से शिकायत नहीं करतीं और न ही प्रशासन से कोई उम्मीद रखती हैं कि वह कुछ करे. बस गांधीवादी तरीके से समाज की सोच में बदलाव ला कर इस समस्या का समाधान ढूंढ़ना चाहती हैं. जिंदगी में अकसर हमारा सामना कुछ ऐसी परिस्थितियों या नजारों से होता है, जिन्हें हम बदलना चाहते हैं. मगर यह आसान नहीं होता. ऐसे में जमाने को कोसने या मुंह लटकाए बैठने से बेहतर है कि हम स्वयं इस परिवर्तन के वाहक बनें. एक छोटी शुरुआत ही अकसर बड़े से बड़े परिवर्तन का आधार बनती हैं. कुछ और भी ऐसी ही क्रांतिकारी सोच व हौसलों से भरी महिलाएं हैं:

बिक्सी पिंक कैब्स: अकसर महिलाओं को कहीं आनेजाने के दौरान इस बात को ले कर टैंशन रहती है कि वे कैब करें या औटो. मगर सुरक्षित किसी में भी नहीं हैं. उस पर जाम व स्वयं गाड़ी/स्कूटी चलाना हर महिला को आता हो यह भी जरूरी नहीं. ऐसी ही समस्या का सामना दिव्या ने भी किया था, मगर उन्होंने इस का हल भी निकाला. दिव्या उस वक्त जौब करती थीं और औफिस से उन का घर करीब 30 किलोमीटर दूर था. रोज उन्हें जाम और प्रदूषण से रूबरू होना पड़ता. मैट्रो की भीड़ की वजह से वे बाय रोड ही जातीं. मगर रोड पर भी गाडि़यां जाम में फंस जातीं. ऐसे में दिव्या हमेशा गौर करतीं कि जाम में बड़ी गाडि़यों के मुकाबले बाइक्स, स्कूटीज आराम से निकल जाती हैं. तभी उन्हें खयाल आया कि क्यों न स्त्री व पुरुषों के लिए अलगअलग मोटरसाइकिल टैक्सी सर्विस शुरू की जाए.

अपने इसी खयाल को हकीकत में बदलने के लिए अपने पति मोहित शर्मा व उन के दोस्त डेनिस चिंग के साथ दिव्या ने 4 जनवरी, 2016 को गुरुग्राम में बिक्सी ब्लू सर्विसेज (पुरुषों के लिए) और 20 जनवरी, 2016 को बिक्सी पिंक सर्विसेज (महिलाओं के लिए) की शुरुआत की. यह एक ऐप बेस्ड सर्विस है, जिस में मोबाइल पर ऐप डाउनलोड कर रजिस्ट्रेशन कराना होता है. शुरू के 2 किलोमीटर तक क्व20 और फिर प्रति किलोमीटर क्व5 किराए पर यह सर्विस उपलब्ध है. यह पहली टैक्सी सर्विस सुविधा है, जो सिर्फ महिलाओं के लिए है. दिव्या बताती हैं, ‘‘पिंक स्कूटीज पर पिंक टीशर्ट व यलो हैलमेट में लेडी ड्राइवर ही महिलाओं के लिए मुहैया कराई जाती हैं. सभी दोपहिया वाहनों पर यलो नंबर जारी किए गए हैं, क्योंकि हरियाणा में कानूनी तौर पर इस का परमिट मिला हुआ है. गुरुग्राम के अलावा फरीदाबाद में भी यह सुविधा उपलब्ध है. बिक्सी पिंक कैब के तहत फिलहाल 18 महिला ड्राइवर उपलब्ध हैं.’’

ऐप की इनबिल्ट ट्रिप ट्रैकिंग सुविधा दोस्तों व परिवार को पूरी यात्रा पर नजर रखने में मदद करती है. दिव्या आगे कहती हैं, ‘‘ड्राइवर नियुक्त करते वक्त हम उन का 3-4 साल का ड्राइविंग ऐक्सपीरियंस मांगते हैं. फिर उन्हें 1 माह की ट्रेनिंग दी जाती है. हम उन की पुलिस वैरिफिकेशन भी करवाते हैं ताकि यह सुरक्षित टैक्सी सर्विस बन सके.’’

महिला सरपंच छवि राजावत

यह बात बहुतों के मन में आती है कि गांव के पिछड़े इलाकों में ध्यान देने की जरूरत है, उन्हें आधारभूत सुविधाएं मुहैया करानी जरूरी हैं, उन्हें साथ ले कर चलना जरूरी है. तभी देश वास्तव में प्रगति कर सकेगा. मगर कितने लोग हैं जो ऊंची पढ़ाई कर के वापस गांव लौटना पसंद करते हैं जहां उन की जड़ें जुड़ी हुई हैं और जहां उन की जरूरत सब से ज्यादा है.

मगर छवि राजावत इन सब से अलग हैं. उन्होंने एमबीए करने के बाद न सिर्फ अपने गांव वापस आने का हौसला दिखाया, बल्कि सब से कम उम्र की महिला सरपंच बन कर अपने गांव को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया. सोडा गांव, जयपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर है. यह गांव टोंक जिले में आता है, जिसे सरकार ने राजस्थान के सब से पिछड़े जिलों में शुमार किया है. यहां की औसत साक्षरता दर महज 5.3% है.लेडी श्रीराम कालेज से पढ़ाई और पुणे से एमबीए करने के बाद छवि ने टाइम्स औफ इंडिया, कार्लसन ग्रुप औफ होटल्स, एयरटेल जैसी बड़ी कंपनियों के लिए काम किया, मगर फिर एहसास हुआ कि निचले स्तर पर बदलाव लाना बहुत जरूरी है. छवि सोडा गांव के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली व अन्य आधारभूत सुविधाओं के लिए लगातार काम कर रही हैं. उन्होंने अपने गांव में पेयजल की निरंतर आपूर्त्ति के लिए काम किया और 40 से भी अधिक सड़कों के निर्माण का काम पूरा किया.

युवा: गांवों और छोटे शहरों में लड़कियों को सामान्यतया खेलकूद से दूर ही रखा जाता है, साथ ही उन की पढ़ाईलिखाई या कैरियर पर भी कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता.

देश के सब से पिछड़े, असुरक्षित व अशिक्षित राज्यों में शुमार झारखंड के रांची शहर के सीमावर्ती इलाके में कमोबेश यही स्थिति है. मगर 2009 में स्थापित ‘युवा’ ने इस इलाके के लोगों की सोच व नजरिए में काफी बदलाव ला दिया है. इस कौन्सैप्ट को इजाद करने वाले यानी युवा के फाउंडर डायरैक्टर हैं कोच फ्रैंज गैस्टलर. ‘युवा’ ने ग्रामीण इलाकों में गर्ल्स स्पोर्ट्स टीम को विकास के प्लेटफार्म के रूप में इस्तेमाल किया है. आज ‘युवा’ की लड़कियां अपने जीवन की किताब फिर से लिख रही हैं और वह भी फुटबौल से शुरुआत करते हुए.

जब एक लड़की युवा टीम बनाती है या फिर इस में शामिल होती है तो पौजिटिव पीयर प्रैशर के जरीए वह एक अधिक नियमित छात्रा बन जाती है. गु्रप के खिलाड़ी एक कैप्टन चुनते हैं, जो लड़कियों की सेहत व पढ़ाई का खयाल रखती है. यदि कोई लड़की किसी दिन स्कूल न आए तो टीम की लड़कियां वजह पूछने उस के घर पहुंच जाती हैं और मिल कर उस की समस्या का समाधान करती हैं. इस तरह ग्रुप में लड़कियां स्वयं को मजबूत महसूस करती हैं. यही नहीं जब कोई लड़की इस ग्रुप में शामिल हो जाती है, तो टीम कैप्टन और कोच उस के घर जाते हैं और जल्दी शादी के बजाय कैरियर के विभिन्न औप्शंस पर चर्चा करते हैं ताकि वह लड़की अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं ले सके और शादी तब करे जब उस की इच्छा हो. जब कोई लड़की ‘युवा फुटबौल टीम’ जौइन करती है तो वह युवा ‘ऐकैडमिकब्रिज प्रोग्राम’ भी जौइन कर लेती है, जिस में शिक्षा की अहमियत कंप्यूटर आदि की कोचिंग, व्यक्तित्व विकास आदि से जुड़ी वर्कशौप्स शामिल होती हैं. हर सप्ताह 1 घंटे की वर्कशौप भी होती है, जिस में सेहत, जैंडर बेस्ड वायलैंस, सैल्फ एस्टीम, फाइनैंस आदि पर चर्चा की जाती है.

फिर जब उन की फुटबौल टीम बाहर खेलने जाती है और जीतती है तो गांव के दूसरे लोग भी अपनी बेटियों को फुटबौल खेलने को भेजने की चाह रखने लगते हैं. इस तरह ‘युवा’ द्वारा उस इलाके की दूसरी लड़कियों को भी अपनी जिंदगी की किताब फिर से अपने हाथों लिखने का मौका मिलने लगा है. ‘युवा’ ऐसे स्ट्रौंग यंग लीडर्स क्रिएट करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं.

अप्पन समाचार: बिहार के मुजफ्फरपुर मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर सुदूर दियारा क्षेत्र में एक गांव है- चांदकेवारी. इस अति पिछड़े गांव में अशिक्षा व गरीबी के साथसाथ नक्सलियों का आतंक भी व्याप्त है. गांव की लड़कियों के लिए घर की देहरी से निकल कर स्कूल जाना या जौब करना बेहद कठिन है मगर आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि 2007 में इस गांव में एक अनूठे वूमन चैनल के रूप में ‘अप्पन समाचार’ की शुरुआत की गई. इस का श्रेय जाता है सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार संतोष सारंग को. संतोष ने न सिर्फ लड़कियों को घर से बाहर निकाला वरन उन के हाथों में कैमरे भी थमाए. शुरू में 7 लड़कियां थीं. बाद में यह संख्या बढ़ती गई. जब ये लड़कियां कैमरे, माइक्रोफोन व ट्राईपोड के साथ साइकिल पर सवार हो कर घर से समाचार इकट्ठा करने निकलतीं तो इन्हें पासपड़ोस वालों के कमैंट्स सुनने पड़ते. मगर इन्होंने हिम्मत नहीं हारी. 14 से 35 उम्र की ये ग्रामीण लड़कियां/महिलाएं गांवदेहात की स्थानीय खबरों को बखूबी कैमरे में कैद करती हैं, ऐंकरिंग करती हैं और फिर ऐडिटिंग करवा कर खबरों को लोगों तक पहुंचाया जाता है.

करीब 45-50 मिनट के इस समाचार बुलेटिन में किसानों, गरीबी, सामाजिक कुरीतियों, कल्याणकारी योजनाओं, पर्यावरण, कानून, सरकारी योजनाओं, महिला मुद्दों आदि से जुड़े समाचार ज्यादा होते हैं. इन लड़कियों का मानना है कि बड़े समाचार चैनल न तो उन के गांव तक पहुंच पाते हैं और न ही वे उन लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों को दिखाते हैं, जबकि इन्हें आए दिन इन परेशानियों से दोचार होना पड़ता है. ऐसे में अपने बीच की परेशानियों को उठाने व लोगों के बीच दिखाने में खुशी होती है. आज इन लड़कियों के काम की तारीफ विदेशों तक हो रही है और अब इन का काम कई गांवों तक फैल चुका है.

‘शीरोज’ हैंगआउट कैफे: ऐसिड अटैक महिलाओं के प्रति किया गया एक ऐसा अपराध है जो उन से उन की पहचान छीन लेता है. अवर्णनीय शारीरिक पीड़ा के साथसाथ समाज द्वारा अस्वीकृत किए जाने का संताप उन के हौसलों को बुरी तरह कुचल डालता है. निर्भया कांड के बाद 2013 में भले ही इस अपराध को सैक्शन 326 और बी के तहत कैटेगराइज्ड कर दिया गया है और 10 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है, फिर भी सख्त कानूनी फंदे के अभाव में अभी भी ऐसी घटनाओं को बखूबी अंजाम दिया जाता है. ऐसे में पीडि़ताओं के पास एक ही विकल्प रह जाता है कि सारी जिंदगी रोतीसिसकती बदसूरत चेहरे को लिए अंधेरे में खो जाएं. लेकिन ‘शीरोज हैंगआउट’ इस के विपरीत एक ऐसा स्थान है जहां छीनी हुई पहचान को ही अपनी पहचान बना कर पूरे हौसले के साथ पीडि़ताओं को आत्मनिर्भर जिंदगी जीने का मौका मिलता है.

निर्भया कांड के बाद महिलाओं को न्याय दिलाने के उद्देश्य से एक कैंपेन ‘स्टौप ऐसिड अटैक’ चलाया गया. इसी के तहत 10 दिसंबर, 2014 को आगरा में आलोक दीक्षित, आशीष शुक्ला व लक्ष्मी अग्रवाल द्वारा शीरोज हैंगआउट नाम से एक ऐसे कैफे की शुरुआत की गई, जो पूरी तरह ऐसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा संचालित किया जाता है. शीरोज मतलब शी+हीरोज. और्डर लेने से ले कर दूसरी सर्विसेज, मैनेजमैंट, अकाउंटिंग आदि सारे काम ऐसिड विक्टिम महिलाएं ही करती हैं. यह कैफे ‘पे एज यू विश’ पौलिसी के साथ काम करता है. ऐसिड अटैक सर्वाइवर्स के मैडिकल व लीगल ऐक्सपैंशेज कैफे से प्राप्त रुपयों से पूरे किए जाते हैं. इस कैफे में लाईब्रेरी, बुटीक से ले कर इन सर्वाइवर्स द्वारा बनाए आर्ट व क्राफ्ट भी डिस्प्ले किए गए हैं. इस तरह लजीज स्नैक्स और कौफी के अलावा यहां आने वालों को एक अलग एहसास भी होता है. लोग इन की कहानियों से प्रेरित होते हैं.

शीरोज के कोफाउंडर, आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘‘महिलाएं जिन के चेहरे जला कर उन की पहचान छीन ली गई, उन के लिए पुन: समाज से जुड़ना बहुत कठिन होता है और वह भी ऐसे समाज में जहां खूबसूरती एक लड़की की वैल्यू के लिए बहुत जरूरी मानी जाती है. ‘‘ऐसे में दूसरों पर आश्रित रहने या डिप्रैशन की जिंदगी जीने के बजाय उन्होंने अपनी आंखों में फिर से नए सपने सजाने का विकल्प चुना और वाकई शीरोज में काम करते हुए इन की जिंदगी बदल गई है. फिलहाल आगरा के अलावा लखनऊ और उदयपुर में भी शीरोज हैंगआउट खोले गए हैं. कुल 18 लड़कियां हमारे यहां हैं.’’ अपराधियों ने इन लड़कियों की पहचान पर हमला किया था पर अब यही इन लड़कियों की पहचान का सबब बन गया है. इन के अंदर का विश्वास वापस आ रहा है. पहले जहां लोग ऐसी विक्टिम्स से मिलने से कतराते थे अब बगल में खड़े हो कर फोटो खिंचवाते हैं. ये लड़कियां अब असहाय या बेसहारा नहीं वरन अपने घर को सपोर्ट कर रही हैं. इन का आउटलुक पूरी तरह बदल गया है.

पंडितजी

वे तो कहीं से भी पंडितजी जैसे नहीं लगते थे. उन का नाम भी कूडे़मल था. वे महीनों इसलिए नहीं नहाते थे कि साबुन खर्च होगा और जब नहाते थे, तभी जांघियाबनियान बदलते थे. एक दिन रास्ते में मिलने पर मैं ने उन से पूछ ही लिया, ‘‘क्यों पंडितजी, कूड़े से काम नहीं चला क्या, जो मल भी साथ में जोड़ दिया?’’

पंडितजी सांप की तरह फुंफकार कर रह गए, पर डस नहीं पाए, क्योंकि भरे बाजार में वे तमाशा नहीं बनना चाहते थे. बाजार में दुकानदारों से दान वसूल करने के लिए वे सुबहसुबह पहुंच जाते थे. दुकानदार भी पंडितजी के मुंह नहीं लगना चाहते थे, इसलिए कुछ रुपए दे कर उन से पीछा छुड़ाते थे. पंडितजी के दर्जनभर बच्चे थे. 6 लड़के और 6 लड़कियां. उन में से एक भी ऐसा नहीं था, जो 5वीं क्लास से ज्यादा पढ़ा हो. पंडितजी खुद भी नहीं पढ़े थे. कुछ मंत्र उन्होंने रट जरूर लिए थे, जिन का मतलब वे खुद भी नहीं जानते थे. शब्दों से ज्यादा वे आवाज पर जोर देते थे, इसलिए शब्द किसी की समझ में नहीं आते थे और उन का काम चल जाता था. चूंकि उस इलाके में दूरदूर तक कोई दूसरा पंडित नहीं था, इसलिए कूड़ेमल के मजे थे. पर बुरा समय कह कर नहीं आता. एक दिन 2 अनजान लड़के पंडितजी के घर आए और पंडितानी से बोले, ‘‘पंडितजी ने परोसे के लिए चांदी के बरतन मंगाए हैं.’’

पंडितानी बेचारी सीधीसादी थी. उसे नहीं मालूम था कि जमाना कहां जा रहा है. फिर शक की कोई गुंजाइश भी तो नहीं थी. पंडितजी अकसर बरतन मंगवा लेते थे, इसलिए पंडितानी ने चांदी के बरतन उन लड़कों को दे दिए. शाम को पंडितजी जब अपने बच्चों के साथ घर लौटे, तो पंडितानी ने बरतनों का जिक्र किया. तब पंडितजी ने बताया कि उन्होंने तो बरतन लाने के लिए किसी को भी नहीं भेजा था. पर अब क्या हो सकता था.

पंडितजी खून का घूंट पी कर रह गए. पर वह उन चांदी के बरतनों को भुला नहीं पा रहे थे, जो सेठ बीरूमल के पिता की तेरहवीं में मिले थे. आखिर सेठों के बाप रोजरोज तो मरते नहीं.

पंडितजी अभी यह दुखड़ा भूले भी नहीं थे कि एक रोज उन के पीछे एक तिलकधारी

20 किलो दूध से भरी बालटी लिए उन के घर पहुंच गया और पंडितानी से बोला, ‘‘पंडितजी ने गाय खरीदी है. उसी का दूध भेजा है और 10 हजार रुपए लाने को कहा है.’’

घर में दूध आए तो कौन मना करता है, फिर पंडितानी की आंखों के सामने तो एक बढि़या गाय की तसवीर उभर रही थी. ऐसे में उन्होंने ज्यादा पूछताछ करने की जरूरत नहीं समझी. दूध की बालटी हिफाजत से रख कर पंडितानी ने संदूकची में रखे बंडलों में से 10 हजार रुपयों का एक बंडल दूध लाने वाले को दे दिया.

पंडितानी ने दूध को खूब औटाया और मावे की महक से मस्त हो गई. वह गाय को कहां बांधेगी, यही सोच रही थी कि पंडितजी और बच्चे वहां आ पहुंचे.

पंडितानी ने खुश हो कर पूछा, ‘‘गाय कहां बांध आए जी? मैं तो उस की आरती उतारने के लिए उतावली हो रही थी.’’

पंडितजी को लगा कि आज फिर घर में सेंध लग गई. उन्होंने सवालिया नजरों से अपनी प्यारी पंडितानी की ओर देखा. वह खुशी से चहकते हुए बोली, ‘‘जिन के दरवाजे पर गौ माता बंधी रहती है, वे लोग खुशनसीब होते हैं जी.’’

मगर यह पहेली पंडितजी को कतई समझ नहीं आ रही थी.

‘‘तुम किस गाय की बात कर रही हो?’’ पंडितजी ने ठहरी आवाज में पूछा.

‘‘वही, जिस का दूध आज शाम को आप ने भेजा था. वह भला आदमी तो स्टील की बालटी भी वापस नहीं ले गया. उसी ने तो बताया था कि आप ने गाय खरीदी है और 10 हजार रुपए मंगवाए हैं.’’

पंडितजी की आंखों का फ्यूज अचानक उड़ गया. उन्होंने दोनों हाथ अपनी छाती पर मारे और धड़ाम से जमीन पर गिर गए. लगता था कि अब वे कभी नहीं उठेंगे, मगर उन की बीवी को 7 पूतों का कोटा पूरा करना था और अभी तो कुल जमा 6 ही थे, इसलिए पंडितजी को उठना ही पड़ा.

‘‘10 हजार रुपए,’’ पंडितजी के मुंह से निकला. उन्होंने मिमियाती आवाज में कहा, ‘‘मैं ने पाईपाई जमा कर के यह रकम जोड़ी थी. मेरे साथ यह क्या हो गया?’’

अब तो थाने जाए बिना गुजारा नहीं था. पता नहीं, वह ठग क्यों उन के पीछे लगा था. रपट लिखतेलिखवाते आधी रात बीत गई. दारोगाजी बारबार ठग का हुलिया पूछते, पर पंडितजी क्या बताते. उन्हें उस के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था. पंडितानी ने भी चोर का चेहरा ठीक से नहीं देखा था. जिस ने भी यह किस्सा सुना, उस ने पंडितजी के साथ हमदर्दी जताई, पर इस से उन का घाटा पूरा होने वाला नहीं था. पर चारा भी क्या था. वह थकहार कर बैठ गए. एक शाम को फिर 2 लड़के पंडितजी के घर पहुंचे और पंडितानी से बोले, ‘‘पंडितजी थाने में बैठे हैं. दारोगाजी ने ठग को पकड़ लिया है. आप को चल कर पहचान करनी है.’’ भोलीभाली पंडितानी फिर झांसे में आ गई और तुरंत थाने चल दी. फिर वह कहां गई, किसी को कुछ मालूम नहीं.

बिहार : 4 हजार करोड़ लीलती नदियां

नेपाल में भारी बारिश होने और पहाड़ी चट्टानों के खिसकने से हर साल बिहार में भारी तबाही मचती रही है. 2 अगस्त, 2016 को काठमांडू से सौ किलोमीटर उत्तरपूर्व भट्टकोसी जिले के पास जमीन खिसकने से सुनकोसी नदी में रुकावट आने से बहुत बड़ी झील बन गई थी, जिस में सौ फुट की ऊंचाई तक पानी जमा हो गया था. नेपाली सेना रुकावट को ब्लास्ट के जरीए हटाने लगी, तो नेपाल से सटे बिहार के 8 जिलों में बाढ़ से भारी तबाही का मंजर पैदा हो गया. सुपौल, सहरसा, अररिया, मधेपुरा, पूर्णिया, खगडि़या, मधुबनी और भागलपुर जिले के कई इलाके बाढ़ में डूब गए. झील की रुकावट को हटाने से 25 लाख क्यूसैक पानी पूरी रफ्तार से कोसी नदी में पहुंचने लगा था, जिस से 3 अगस्त, 2016 को कोसी नदी का जलस्तर 10 मीटर तक बढ़ गया था. गौरतलब है कि नेपाल में भारी बारिश होने से साल 2008 में 18 अगस्त को बिहारनेपाल सीमा पर कुसहा बांध के टूटने से कोसी नदी में आई भयंकर बाढ़ ने काफी तबाही मचाई थी. बाढ़ की वजह से बिहार के 5 जिलों के 247 गांव पूरी तरह से गायब हो गए थे, 3 सौ लोगों की मौत हुई थी और 30 लाख लोग रातोंरात बेघर हो गए थे. नेपाल की नदियों से हर साल बिहार में मचने वाली तबाही को कम करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 15 सितंबर, 2016 को नई दिल्ली में नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ से मिल कर सप्तकोसी नदी और सनकोसी नदी पर बांध बनाने के लिए बातचीत की थी.

नीतीश कुमार ने कहा था कि इन दोनों नदियों का ठीक से जलप्रबंधन जरूरी है. उन पर बांध और पनबिजली बनने से भारत और नेपाल दोनों को फायदा होगा. याद रहे कि बिहार की कई बड़ी नदियां नेपाल से निकलती हैं और उस की बाढ़ से बिहार को भारी तबाही झेलनी पड़ती है. हर साल जून से ले कर अगस्त महीने के बीच नेपाली नदियां बिहार में कहर बरपाती रही हैं, जिस से सालाना 4 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान होता है. बाढ़ की चपेट में 5 सौ से ज्यादा इनसानी और 2 हजार से ज्यादा जानवरों की जानें जाती हैं. इस के साथ ही साथ 2 लाख से ज्यादा घरों को बाढ़ बहा ले जाती है और 6 लाख हैक्टेयर में लगी फसलों को बरबाद कर डालती है. उत्तरी बिहार की 75 फीसदी से ज्यादा आबादी बाढ़ के खतरों के बीच जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर है, वहीं राज्य की जमीन का 70 फीसदी से ज्यादा इलाका बाढ़ से प्रभावित होता है.

नेपाल की नदियों में आने वाली बाढ़ से बिहार के किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, कटिहार, खगडि़या, भागलपुर, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर जिलों को हर साल भारी नुकसान उठाना पड़ता है. पर्यावरण मामलों के जानकार प्रोफैसर आरके सिन्हा बताते हैं कि भूकंप, बाढ़ और जमीन खिसकना हिमालय का पुराना स्वभाव रहा है. इन खतरों के प्रति लापरवाह रह कर इनसान हिमालय का दोहन व शोषण ही करता रहा है. पर्यावरण को बचाने की गुहार लगाने वाली संस्थाएं पिछले कई सालों से चिल्ला रही हैं कि भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान वगैरह देश हिमालय क्षेत्रों में कई बांध बना रहे हैं, जिस से अगले कुछ सालों में हिमालय क्षेत्रों में तकरीबन 4 सौ विशाल जलाशय बन जाएंगे.

इन जलाशयों के बनने से सब से ज्यादा 292 बांध भारत बना रहा है. इस के अलावा चीन सौ, नेपाल 13, पाकिस्तान 9 और भूटान 2 बांध बनाने की योजना पर काम कर रहा है. इस से पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है, साथ में इनसानी जानमाल पर खतरा भी बढ़ रहा है. गौरतलब है कि कोसी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाना किसी भी माने में गलत नहीं है. केवल कोसी की बाढ़ से ही बिहार का 21 हजार वर्ग किलोमीटर उपजाऊ खेत तबाह हो जाता है.

18 अगस्त, 2008 को नेपाल में बने कुसहा बांध को तोड़ कर बिहार के एक बड़े हिस्से में काफी ज्यादा तबाही मचा दी थी. उस बाढ़ ने 30 लाख लोगों के घर, परिवार, मवेशी और फसल को बरबाद कर डाला था. कोसी नदी नेपाल में सप्तकोसी नदी के नाम से जानी जाती है. कोसी समेत कई नदियां जो बिहार में तबाही मचाती रही हैं, उन का उद्गम और जलग्रहण क्षेत्र नेपाल है. कोसी के अलावा नेपाल की नदियां नारायणी (गंडक), करनाली (घाघरा), मेंची, बागमती, कमला बलान भी बारिश के मौके पर बिहार में तबाही मचाती रहती हैं. अगर बिहार में बारिश नहीं हो और नेपाल में भारी बारिश हो जाए, तो ये सारी नदियां बिहार के कई इलाकों में बाढ़ की तबाही मचा देती हैं.

नेपाल की नदियों में भूस्खलन हो जाए, नदी की धारा बदल जाए या रास्ता रुक जाए, तो उस से भी बिहार को परेशानी झेलनी पड़ती है. राज्य आपदा प्रबंधन महकमे के मुताबिक, साल 1980 से ले कर साल 2012 के बीच हर साल तकरीबन 10 लाख हैक्टेयर खेती वाली जमीन बाढ़ के पानी में डूबती रही है. इस वजह से 6 लाख हैक्टेयर में लगी खरीफ की फसल पूरी तरह चौपट हो जाती है. बाढ़ से 17 लाख मवेशी भी प्रभावित होते हैं.

सहरसा जिले का किसान रामदेव महतो कहता है कि बाढ़ में घर के ढहने के बाद एक कच्चा घर बनाने में 20-25 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. गरीब किसानों की मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो घर बनाने में ही खर्च हो जाता है.

साल 2015-16 में सरकार को बाढ़ राहत बांटने में 360 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े थे. बाढ़ तकरीबन 25 सौ करोड़ रुपए की फसलें लील जाती है. इस के अलावा घरों, मवेशियों और सरकारी इमारतों को भी बाढ़ हर साल 3 सौ करोड़ रुपए की चपत लगा देती है.

झगड़ा सपा का

ऐन चुनावों से पहले या यों कहिए कि चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में राज कर रही समाजवादी पार्टी के घर में आपसी झगड़ा बापबेटे और चाचाओं का मसला तय हो या नहीं, यह दूसरों को फायदा जरूर पहुंचा देगा. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के लिए यह झगड़ा जून की बरसात की तरह ठंडक देने वाला है. बाप बेटे में कहासुनी कोई नई बात नहीं है और दुनियाभर में होती रहती है और अकसर बेटे बाप से नाराज हो कर चले जाते हैं. जहां एक परिवार का धंधा होता है, वहां भी बेटे अपना हिस्सा छोड़ कर अलग काम शुरू कर देते हैं. अखिलेश यादव ने यदि मुलायम सिंह यादव से अलग होने की जिद ठान ली है, तो कोई खास बात नहीं है. चुनावों से पहले ही यह होता है, क्योंकि तभी एकदूसरे के बारे में जौहर दिखाने का मौका मिलता है. कुश्ती हजार आदमियों के सामने दंगल में की जाती है, घर की चारदीवारी में नहीं.

इस का नुकसान मुलायम सिंह परिवार को होगा या नहीं, यह कोई बड़ी बात नहीं. राजनीति में जो भी आता है, वह हार के लिए तैयार हो कर आता है. हर चुनाव में 5-10 लोगों में से एक को सीट मिलती है और हार कर बाकी फिर अगले चुनाव में लग जाते हैं. यह दुकानदारी नहीं है कि बाजार में 10 दुकानें साथसाथ चलती रहें, कुछ अच्छी, कुछ खराब. हारने को तो समाजवादी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में ही हार गई थी, जब भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा की 80 में से 71 सीटें जीत ली थीं और समाजवादी पार्टी के लिए बस 5 सीटें छोड़ी थीं. इस घर के झगड़े के बाद अगर समाजवादी पार्टी की हालत कांग्रेस की जैसी हो जाए, तो भी नेताओं को फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जोड़तोड़ कर के वे राजनीति की कमाई पर जीते रहेंगे.

नुकसान असल में आम जनता को होगा. मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के मनसूबों पर ब्रेक लगा रखा था. भारतीय जनता पार्टी सिर्फ राज ही नहीं करना चाहती, वह समाज को भी पीछे धकेलना चाहती है. भाजपा की नीतियों में अमीरों की जगह है, ऊंचों की जगह है, संतोंमहंतों की जगह है, सदियों से धर्म और शासकों के कुचलों की कोई जगह नहीं है. समाजवादी पार्टी ने 5 साल में या उस से पहले बहुजन समाज पार्टी ने 5 साल में ऐसा कुछ किया हो, जिस से इन लोगों को नई रोशनी मिली हो, नहीं लगता, पर इन पर अत्याचार जरूर रुक गया. सत्ता केवल बहुत ऊंचों से पिछड़ों के हाथों में आ गई और सरकारी नौकरियों, छोटी दुकानदारी, गलीमहल्लों की लीडरी में पिछड़ों की भी पहुंच होने लगी थी. बात सरकारों की नीतियों की नहीं, माहौल की है. समाजवादी पार्टी अगर हारती है और बहुजन समाज पार्टी भी उस की जगह नहीं ले पाती तो एक बार फिर कांग्रेसीभाजपाई युग लौटेगा, जिस में ऊंचों की चलेगी. मुलायमअखिलेश कुश्ती में समाजवादी पार्टी की अगर हार होती है, तो आम गरीब जनता को भुगतना पड़ सकता है.

हेमंत सोरेन : पिता के साए से निकलने की छटपटाहट

झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हेमंत सोरेन को अपने पिता शिबू सोरेन की परछाईं से बाहर निकलने का नुसखा हाथ लग गया है. राज्य की रघुवर दास सरकार ने हेमंत सोरेन को अपनी राजनीति चमकाने और आदिवासियों के बीच गहरी पैठ बनाने का बेहतरीन मौका दे दिया है. सीएनटी ऐक्ट (छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908) और एसपीटी ऐक्ट (संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949) में संशोधन कर रघुवर दास सरकार ने बैठेबिठाए नया झमेला मोल ले लिया है. हेमंत सोरेन इस मुद्दे को भुनाने की जुगत में लग गए हैं और वे हर मंच से ऐलान कर रहे हैं कि जब तक सरकार सीएनटी और एसपीटी ऐक्ट में किए गए बदलाव को वापस नहीं लेगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. हेमंत सोरेन को उम्मीद है कि जिस तरह से उन के पिता शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य की मांग को ले कर एक बड़ा आदिवासी आंदोलन खड़ा करने में कामयाब हुए थे, उसी तरह की कामयाबी अब उन्हें भी मिल सकती है. 10 अगस्त, 1975 को जनमे हेमंत सोरेन फिलहाल झारखंड मुक्ति मोरचा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. साल 2014 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्हें और उन की पार्टी को करारी हार मिली थी. वे दुमका विधानसभा सीट पर भाजपा के हेमलाल मुर्मू से 24,087 वोटों से चुनाव हार गए थे.

81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत होती है और भाजपा गठबंधन ने 42 सीटों पर कब्जा जमा कर हेमंत सोरेन की सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. झारखंड विकास मोरचा 19 सीटें जीत कर दूसरी सब से बड़ी पार्टी बनी थी. झारखंड मुक्ति मोरचा को 8, कांग्रेस को 6 और बाकी को 6 सीटें हासिल हुई थीं. भाजपा गठबंधन को 35 फीसदी वोट मिले थे, जबकि साल 2009 के चुनाव में उसे 11 फीसदी ही वोट मिले थे. हेमंत सोरेन की अगुआई में चुनाव लड़ कर झामुमो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले सीट और वोट फीसदी दोनों में इजाफा हुआ. साल 2009 में झामुमो को 18 सीटें और कुल 14.47 फीसदी वोट मिले थे, जबकि साल 2014 के चुनाव में उसे 19 सीटों पर जीत मिली, पर वोट फीसदी में जोरदार इजाफा हुआ. यह आंकड़ा मोदी लहर के बाद भी 20.4 फीसदी तक पहुंच गया था. विधानसभा चुनाव में भाजपा का सीधा मुकाबला झामुमो से रहा था.

41 साल के हेमंत सोरेन अपने पिता की अक्खड़ और उग्र सियासत के उलट शांत, हंसमुख और हमेशा मुसकराने वाले नेता हैं. वे हर किसी की बात गौर से सुनते हैं और उस के बाद ही अपनी बात कहते हैं.

ज्यादातर आदिवासी जहां मांस और मदिरा के शौकीन होते हैं, वहीं हेमंत सोरेन शाकाहारी हैं. बीआईटी, मेसरा से मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले इस युवा नेता ने साल 2003 में सियासत के अखाड़े में कदम रखा था और झामुमो के झारखंड छात्र मोरचा के अध्यक्ष के तौर पर राजनीति का कखग सीखना शुरू किया था.

हेमंत सोरेन ने साल 2005 में अपने पिता की सीट दुमका से चुनावी राजनीति की शुरुआत की, पर मुंह की खानी पड़ी थी. साल 2009 में दुमका विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे. उस के बाद अर्जुन मुंडा की सरकार में 11 सितंबर, 2010 को उपमुख्यमंत्री बने. 13 जुलाई को मुख्यमंत्री बने और 14 दिसंबर, 2014 तक उस कुरसी पर रहे.

विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार और मुख्यमंत्री की कुरसी चले जाने के बाद हेमंत सोरेन हार मान कर चुप बैठने और कुरसी का मातम मनाने के बजाय अपनी पार्टी को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नया जोश और जुनून भरने की कवायद में पूरे जोरशोर से लगे हुए हैं. पारंपरिक सियासतबाज के उलट अपनी हार का ठीकरा दूसरी पार्टियों के सिर फोड़ने के बदले हेमंत सोरेन अपनी कमजोरियों को ढूंढ़ने और दुरुस्त करने की मुहिम में लगे हुए हैं.

हेमंत सोरेन रोज कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं. उन से सीधी बातचीत कर रहे हैं. पार्टी को झाड़पोंछ कर चमकाने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है. पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि जनता के बीच रहिए, उन की सुनिए. उन की हर परेशानी को दूर करने की कोशिश कीजिए. सियासत की लंबी पारी खेलनी है, तो नेताओं के बीच बैठ कर ऐशमौज करने के बजाय जनता के साथ रहिए. जनता सब देखती है और मेहनत का फल भी देती है. ‘गुरुजी’ उर्फ शिबू सोरेन के बेटे और मुख्यमंत्री की कुरसी गंवाने वाले हेमंत सोरेन झारखंड की सियासत की नई कहानी लिखने को बेचैन हैं. ज्यादातर जींस और टीशर्ट या सूट पहनने वाले हेमंत सोरेन नेताओं की नकल करने के बजाय पार्टी को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश में लगे दिखते हैं.

हेमंत सोरेन में अपने पिता की सोच और साए से बाहर निकल कर पार्टी को नया रंगरूप देने की छटपटाहट साफ दिखती है. वे जनता के भरोसे को जीतने और उस की उम्मीदों पर खरा उतर कर राजपाट करने की बात करते हैं, जबकि उन के पिता शिबू सोरेन राजनीतिक फायदे को देख कर पाला बदलने और सरकार बनानेगिराने के खेल के माहिर खिलाड़ी रहे हैं. साल 1980 में शिबू सोरेन पहली बार जब सांसद बने, तो उस समय वे कांग्रेस के साथ थे. 1983 में जनता दल बना, तो उन्होंने कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर जनता दल का दामन थाम लिया. 2 साल बाद उन्हें लगा कि वहां उन की दाल नहीं गल रही है, तो फिर कांग्रेस की गोद में जा बैठे और 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा.

साल 1990 आतेआते कांग्रेस से शिबू सोरेन का मन भर गया और उन्होंने फिर से जनता दल का झंडा उठा लिया. उन्होंने जनता दल के घटक दल के रूप में चुनाव लड़ा. उन की पार्टी झामुमो के 6 उम्मीदवार जीत कर संसद पहुंच गए. 1993 में उन का माथा फिर घूमा और वे अपने 6 सांसदों के साथ कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव के पक्ष में खड़े हो गए. इस के लिए वे 3 करोड़, 20 लाख रुपए घूस लेने के आरोप में भी फंसे हुए हैं.

इस के कुछ समय बाद ही उन का कांग्रेस से मन उचट गया और वे भाजपा के साथ मिल कर नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम में लग गए. साल 1996 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री तो बने, पर सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए और जनता दल टूट गया. तब ‘गुरुजी’ यानी शिबू सोरेन लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े हो गए. साल 2000 में जब अलग झारखंड राज्य बना, तो वे मुख्यमंत्री बनने के लोभ में भाजपा की अगुआई वाले राजग में शामिल हो गए.

जब भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना दिया, तो शिबू सोरेन बिदक कर कांगे्रसराजद गठबंधन की छत के नीचे जा बैठे. साल 2007 में शिबू सोरेन ने मधु कोड़ा को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाने में मदद की और साल 2008 में खुद मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में कोड़ा सरकार को गिरा दिया था. हेमंत सोरेन कहते हैं कि सियासत ही क्या, किसी भी काम में उठने और गिरने का दौर चलता रहता है. गिरने के बाद अपनी गलतियों और कमजोरियों को खोज कर उसे दूर कर के ही दोबारा चोटी पर पहुंचा जा सकता है. अपनी पार्टी झामुमो को मजबूत करने के साथसाथ वे सीएनटीएसपीटी ऐक्ट में बदलाव करने, केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून और स्थानीय नीति को ले कर भाजपा सरकार के खिलाफ विरोधी दलों को एकजुट करने की मुहिम में भी लग गए हैं. इस से भाजपा के रघुवर दास की अगुआई वाली सरकार के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.                 

म्यूचुअल फंड निवेश का बेहतर विकल्प

वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश करना एक बेहतरीन विकल्प है. नौसिखियों के लिए शेयर बाजार कई बार जोखिम भरा साबित हो जाता है. इसलिए म्यूचुअल फंड से शुरुआत करना और इस में मजबूती से जमे रहना हमेशा समझदारी भरा कदम साबित होता है. आप अगर अनुशासित तरीके से निवेश करेंगे तो म्यूचुअल फंड हर हाल में बैंक के फिक्स डिपोजिट या अन्य माध्यमों से 1.5 गुना तक ज्यादा रिटर्न देगा. आसान शब्दों में कहा जाए तो अगर गलत फैसले हो जाएं तो भविष्य की फाइनेंशियल सिक्योरिटी के लिए की गई मेहनत कष्टदायी हो सकती है. दरअसल, निवेशकों का निवेश के जरिए रातोंरात अमीर बनने का सपना ही उन की बरबादी की वजह बनता है.

म्यूचुअल फंड में निवेश करने का फैसला तो निवेशक के ऊपर है, लेकिन सब से जरूरी चीज है म्यूचुअल फंड की नियमित मौनिटरिंग. यह मौनिटरिंग हफ्तेवार, मासिक या तिमाही हो सकती है. कई बार लोग लंबे समय के निवेश का मतलब यह समझ लेते हैं कि पैसा लगा दो और कई साल बाद उस पर नजर डालो. लेकिन निवेशक ने पैसा लगाया है तो उस की दशादिशा का ध्यान रखना भी निवेशक की ही जिम्मेदारी है. अगर वह खुद न कर पाए तब इनवेस्टमेंट मैनेजर की मदद ली जा सकती है. निवेश से संबंधित कोई भी फैसला करने से पहले यह जानना अहम है कि आप कितना जोखिम ले सकते हैं.

इस बात पर गौर करें कि आप अपने निवेश के मूल्यांकन में उतारचढ़ाव को ले कर सहज रह पाएंगे या नहीं. निवेश में यह बात कोई माने नहीं रखती कि आप का पैसा इक्विटी में लगा हो और लघु अवधि के तेजी से बदलते हालात के चलते आप की रातों की नींद उड़े. लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आप का निवेश लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को भी पूरा करने में मददगार साबित हो. म्यूचुअल फंड में निवेश के कई लाभ हैं.

टैक्स लाभ

म्यूचुअल फंड में निवेश करने से कर बचाने में भी मदद मिलती है. इस के अलावा कुछ विशेष फंडों में निवेश कर आप धारा 80 सी के तहत कर लाभ ले सकते हैं. लाभांश यानी डिविडेंड का पैसा सीधा निवेशक के हाथ में पहुंचता है, जो करमुक्त होता है.

योजना पर डटे रहें

निवेश करने से पहले इस बात की अच्छी तरह जांचपरख कर लें कि वर्तमान संपत्ति और व्यवसाय पर उस का क्या असर पड़ सकता है. जैसेजैसे वक्त बीतेगा, आप की जिंदगी में बदलाव आता रहेगा. इसलिए आप को नियमित रूप से अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा कर उस में वांछित बदलाव भी करने होंगे. लेकिन कम वक्त की उथलपुथल की वजह से लंबी अवधि की योजना से छेड़छाड़ किया जाना समझदारी नहीं है.

विविधता ही है सही रणनीति

म्यूचुअल फंड में 500 रुपए में ही छोटा निवेशक डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो हासिल कर सकता है. निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि पोर्टफोलियो का विविधीकरण (डायवर्सिफिकेशन) उन्हें बाजार में आने वाली मंदी के दौरान बचा सकता है. इसलिए डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो होना जरूरी है. म्यूचुअल फंड में निवेश करते वक्त डायवर्सिफिकेशन की रणनीति अपनाई जानी चाहिए.

दूसरा, आप को सेक्टरवार निवेश पर सीमा तय करनी चाहिए और लार्जकैप तथा मिडकैप शेयरों में कितना पैसा लगाया जाना है, यह निर्णय लेते वक्त संतुलन कायम करना काफी जरूरी है. अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से शेयरों पर निगाह रखने में नाकाम रहता है, तो उसे ऐसा पोर्टफोलियो तैयार करना चाहिए, जिस में केवल म्यूचुअल फंड शामिल हों या फिर पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज का फायदा भी उठाया जा सकता है. इस से निवेशक पूंजी वापस हासिल कर सकता है और मुनाफा ज्यादा रफ्तार से बनाया जा सकता है.

सिस्टेमैटिक प्लान

जानकारों की सलाह है कि इंडेक्स में गिरावट के वक्त सिस्टेमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी में निवेश रोकने की गलती से निवेशकों को जरूर बचना चाहिए. बाजार लुढ़कने के दौरान आप को पोर्टफोलियो के किसी एक शेयर या सेक्टर की ओर झुके होने से जुड़ी गलती में सुधार करना चाहिए और इस दौरान नियमित रूप से निवेश जारी रखना चाहिए. अगर निवेशक लंबी अवधि की रणनीति के तहत डायवर्सिफाइड और व्यवस्थित निवेश का तरीका अपनाते हैं, तो बाजार में गिरावट के बावजूद वे फायदा बटोरने में कामयाब रहेंगे. किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने के लिए जरूरत है धैर्य और म्यूचुअल फंड में जोखिम घटाने के रास्तों को जानने की.

म्यूचुअल फंड को आमतौर पर निवेश का सुरक्षित माध्यम बताया जाता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन के प्रबंधन का जिम्मा विशेषज्ञ लोग बड़े ही पेशेवर तरीके से संभालते हैं. लेकिन क्या इस का यह मतलब है कि म्यूचुअल फंड में कतई जोखिम नहीं होता? जी नहीं, ऐसा नहीं है. आइए, इन से जुड़े तरहतरह के खतरों को समझें तथा इन्हें कम करने के तरीकों और रणनीतियों से वाकिफ हों.

फंड का ढीला प्रदर्शन

आमतौर पर निवेशकों को उम्मीद रहती है कि उन की ओर से चुना गया फंड बेंचमार्क के समान रफ्तार दिखाए. हालांकि कई मामलों में फंड बेंचमार्क की गति से भी पिछड़ जाते हैं और निवेशकों की उम्मीदें बिखर जाती हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि सभी फंड बेंचमार्क इंडेक्स को पटखनी देने में कामयाब साबित नहीं होते. यही वजह है कि इंडेक्स से हलका प्रदर्शन करने की संभावना वास्तविक होती है.

बाजार के जोखिम

म्यूचुअल फंड निवेश बाजार के जोखिम से जुड़ा होता है और इस बात की कोई गारंटी या आश्वासन नहीं होता कि फंड का उद्देश्य हासिल हो जाएगा. शेयर, फंड या बांड फंड की कीमत में छोटी अवधि या लंबी मियाद में भी आने वाली गिरावट, बाजार से जुड़े जोखिम का नतीजा होती है. शेयर बाजार चक्रीय गति से चलते हैं. 2 तरह की अवधि सामने आती है. एक वक्त में बाजार में तेज रफ्तार दर्ज की जा सकती है तो दूसरे पल में इस में गिरावट के दर्शन हो सकते हैं. अतीत का बेहतर प्रदर्शन इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता कि भविष्य में भी उस फंड की चाल बढि़या रहेगी और निवेशकों को उम्मीद के मुताबिक मुनाफा मिलेगा.

जरूरत से ज्यादा डायवर्सिफिकेशन

जरूरत से ज्यादा डायवर्सिफिकेशन की स्थिति उस वक्त सामने आ सकती है, जब 2 या उस से ज्यादा निवेश एकदूसरे को ओवरलैप करते हैं. एक बढि़या डायवर्सिफिकेशन वाले पोर्टफोलियो में ऐसी एसेट क्लास शामिल होती हैं, जो ज्यादा गहरा रिश्ता नहीं रखतीं और इसलिए उन्हें अनुपूरक समझा जाता है.

अलगअलग सेक्टरों में अपने निवेश का दायरा फैलाने से 2 निवेशों के बीच करीबी ताल्लुकात बनने से रोकने में मदद मिलेगी और साथ ही कीमतों में उथलपुथल का जोखिम भी काफी हद तक कम रह जाएगा. ऐसा इसलिए है, क्योंकि सभी उद्योग या सेक्टर एक ही वक्त में एकसाथ ऊपर या नीचे नहीं चलते. जरूरत से ज्यादा डायवर्सिफिकेशन या निवेश को भेदभावपूर्ण तरीके से विस्तारित बनाने से ज्यादा मदद नहीं होगी. हां, यह नुकसान की वजह जरूर बन सकता है.

खर्च

भले ही कोई फंड मुनाफा देने में नाकाम साबित हो, लेकिन निवेशक को फीस और दूसरे शुल्क चुकाने ही होते हैं. म्यूचुअल फंड निवेशकों को कई तरह के शुल्कों का भुगतान करना होता है, जो एकसाथ पैकेज में आते हैं. फीस फंड हाउस मार्केटिंग, डिस्ट्रिब्यूशन, प्रोसेसिंग, एसेट मैनेजमेंट खर्च और दूसरे प्रशासनिक व्यय से निबटने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

निवेश के चलन में बदलाव

पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट मैनेजर को वक्त और हालात के साथ अपनी रणनीति में बदलाव करने होते हैं. इस मोरचे पर म्यूचुअल फंड अपने निवेश के उद्देश्य और स्टाइल से अलग राह पकड़ता है. ऐसा आमतौर पर तब होता है, जब फंड मैनेजर अलगअलग रणनीतियों के साथ प्रदर्शन में सुधार के लिए प्रयोग करता है. नतीजा यह होता है कि फंड का जोखिमरिटर्न अनुपात गड़बड़ा जाता है.

प्रबंधक का जोखिम

जब कोई इनवेस्टमेंट मैनेजर अपने पोर्टफोलियो को प्रभावी रूप से नहीं संभाल पाता, तो फंड अपने उद्देश्यों तक पहुंचने में नाकाम साबित हो सकता है. इस के अलावा फंड मैनेजर की रणनीति बदलने से निवेश का स्टाइल भी बदल सकता है.

उद्योग का जोखिम

उद्योग का जोखिम किसी एक उद्योग या सेक्टर के शेयरों के समूह से पैदा होता है. उद्योग से जुड़ी स्थिति बदलने पर मुश्किल हो सकती है.

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