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चुनाव के ‘साइड इफेक्ट’

चुनाव के मौसम में टीवी से लेकर अखबारों तक में चुनावी खबरें पूरी तरह से छाई रहती हैं. जिसको देखकर लगता है जैसे चुनाव के समय समाज में अपराध होने कम हो गये हों. हकीकत यह है कि अपराध कम नहीं होते, अखबार में उसको जगह मिलनी कम हो जाती है. थानों की पुलिस चुनावी कराने में लग जाती है, जिससे घटनाओं का खुलासा कम होता है. चुनाव के मौसम में अखबारों में आधे से अधिक पेज चुनावी खबरों में रंग जाते हैं. अखबारों के संवादादाताओं को चुनावी खबरों, लेख, रिपोर्टिग, इंटरव्यू में लग जाना पड़ता है.

डेस्क पर काम करने वालों को भी इस मौसम में अलग अलग जिलों में भेज दिया जाता है. खबरिया चैनल अपने स्ट्रिंगर के भरोसे चुनावी खबरें नहीं कर सकते ऐसे में दिल्ली से लेकर लखनऊ तक स्टूडियों में बैठे लोगों को जिलों जिलों जाना पड़ता है. चुनाव के समय अखबारों से लेकर खबरिया चैनलों की विज्ञापन के रूप में कमाई बढ़ जाती है. ऐसे में उनको जनसमस्याओं को दरकिनार कर चुनावी खबरों को जगह देनी मजबूरी हो जाती है.

खबरिया चैनल चुनाव को लेकर तरह तरह के विशेष आयोजन भी करते हैं. इसमें लोगों से बातचीत सबसे खास होती है. पहले यह कम होता था, अब तो हालत यह हो गई है कि राजनीतिक दलों के पास खबरिया चैनलों में पार्टी का पक्ष रखने वाले नेताओं की कमी हो जाती है. ऐसे में नये नये प्रवक्ताओं को यहां भेजा जाता है. राजनीतिक दलों की नजर में जिस चैनल का महत्व ज्यादा होता है वह वहां अपने महत्वपूर्ण प्रवक्ता को भेजता है. जिसका महत्व कम होता है वह सबसे नये प्रवक्ता को भेजता है. हर दल के कुछ लोग जनता बन कर सामने की सीटों पर बैठ जाते हैं. इसके बाद खबरिया चैनल का एंकर जो एंकर कम एक्टर अधिक हो जाता है वह ऐसे सवाल जवाब करता है जैसे वह अकेला ही यह कर रहा हो.

कई बार ऐसे आयोजनों में सनसनी फैलाने के लिये ऐसी बातों का सहारा लिया जाता है जिसमें विचार विमर्श कम और लड़ाई झगडा टकराव अधिक दिखता है. एंकर अपने मतलब भर का समय गुजार मुद्दों को वहीं छोड देता है. इसमें टकराव बढ़ भी जाता है. इस चुनाव में लखनऊ में एक पार्टी की महिला कार्यकर्ता पर हमला बोल दिया दूसरी पार्टी के लोगों ने. लोकसभा चुनाव के समय वाराणसी में ऐसी घटनायें हो चुकी हैं.

चुनाव का साइड इफेक्ट थानों के साथ ही साथ तहसील, स्कूल और कचहरी पर भी पड़ता है. मतदान से लेकर मतगणना तक यहां के कर्मचारी लगे होते हैं. जिससे यह लोग अपने काम को छोड़ कर चुनावी काम में लग जाते हैं. तहसील और कचहरी में परेशान लोगों को चुनाव के बाद बुलाया जाता है. स्कूल में बच्चों की छुट्टी हो जाती है. एक ही टीचर पूरे स्कूल के बच्चों को संभालता है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश बोर्ड की कक्षा 10 और 12 की परीक्षाओं को चुनाव बाद कराया गया. चुनाव के कारण इन परीक्षाओं का समय बढ़ाया गया. चुनावी मौसम में सरकार की मशीनरी पूरी तरह से चुनाव में व्यस्त रहती है. जिससे बाकी काम टाल दिये जाते हैं.

जब 1 दिन में हो गए लाखों बेरोजगार

नौकरी का क्या है? आज है तो कल नहीं. स्नैपडील ने एक साथ सैंकड़ों कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घोषणा की. इस घोषणा से दो बातें पता चली. पहली जो कि सर्वविदित है, कोरपोरेट की नौकरी का कोई भरोसा नहीं होता. दूसरी ये कि ई-कॉमर्स सेक्टर में ‘कंपीटिशन कितना टफ’ हो गया है. कंपीटिशन तो हर जगह टफ है, पर ई-कॉमर्स सेक्टर? यह बात हैरत में डालने वाली नहीं तो और क्या है? ऑनलाइन शॉपिंग की बढ़ते चलन को देखते हुए लोगों को ये बात हजम करने में जरा दिक्कत हो रही है. पर लोग इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ने के साथ ही नित नई ई-कॉमर्स कंपनियां और स्टार्ट-अप भी बाजार में आ रहे हैं. जिससे पुराने कंपनियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है.

ई-कॉमर्स कंपनियां ही नहीं, आईटी इंडस्ट्री, स्टील सेक्टर और यहां तक की मीडिया इंडस्ट्री में भी छंटनी की इस प्रक्रिया ने जोर पकड़ लिया है. इनमें से कुछ कंपनियों ने घाटे में न होने के बावजूद भी कर्मचारियों को ‘पिंक स्लिप’ दे दिया. ज्यादती तो है, पर कोरपोरेट सेक्टर की यही खासियत है, जी भर के काम लेना, वक्त आने पर निकाल देना…

पिछले कुछ समय में बड़े पैमाने पर छटनी के इस चलन ने कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ लिया है. आइए नजर डालते हैं, ऐसी ही कुछ कंपनियों पर जहां से कई कर्मचारियों को एक साथ बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया

1. स्नैपडील

घाटे का हवाला देते हुए ई-कॉमर्स कंपनी स्नैपडील ने 600 कर्मचारियों को निकालने की घोषणा की है. फरवरी के अगले कुछ दिनों में स्नैपडील निस्काशन की इस प्रक्रिया को पूरा करेगी. गौरतलब है कि फाउंडर ने सैलेरी न लेने की घोषणा भी की है. ऐमेजॉन और फ्लिपकार्ट से मिल रही कड़ी टक्कर के कारण कंपनी को यह कदम उठाना पड़ा है.

2. माइक्रोसोफ्ट

माइक्रोसोफ्ट ने एडवांस में घोषणा कर दी थी कि जून 2017 तक कंपनी से 2,850 लोगों को निकाल दिया जाएगा. इसी कड़ी में जनवरी 2017 में माइक्रोसोफ्ट ने 700 नौकरियां छीन ली. भारतीय मूल के सीईओ के आने के बाद से कंपनी ने कई कर्मचारियों को छंटनी की.

माइक्रोसोफ्ट ने 2014 में एक साथ 18,000 लोगों को नौकरी से निकाल दिया था. माइक्रोसोफ्ट के इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर पहली बार लोगों को निकाला गया था.

3. लार्सन ऐंड टर्बो (एल ऐंड टी)

इंजीनियरिंग कंपनी एल ऐंड टी ने साल 2016 में 14000 कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया था. कंपनी के मालिकों ने कंपनी को ‘रिफ्रेम’ करने का हवाला देते हुए कर्मचारियों की नौकरी छीन ली. एल ऐंड टी की कंपनियां कई सेक्टर में फैली हैं. सभी सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी की गई थी. घाटे में न होने के बावजूद कंपनी ने कर्मचारियों की छंटनी की थी, कंपनी के कर्ता-धर्ता ने खुद ये बयान दिया था.

4. सिस्को सिस्टम्स इन्क

सिस्को ने अगस्त, 2016 में एक साथ 5,500 को टर्मिनेट कर दिया. मालिकों ने यह कहा कि कर्मचारियों को निकालकर जो पैसे बचेंगे उसे कंपनी के ग्रोथ के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. सिस्को स्विच से लेकर राउटर तक बनाती है.

5. आईबिएम

एक विदेशी अखबार के अनुसार सितंबर, 2017 में आईबिएम ने मार्च में छंटनी की प्रक्रिया शुरु की. इसके कारण 5,000 से ज्यादा कर्मचारियों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. कंपीटिशन के दवाब ने इस कंपनी के कई लोगों की नौकरी छीन ली.

6. फ्लिपकार्ट

स्नैपडील अकेला ऐसा ई-कॉमर्स सेक्टर नहीं है, जिसने एक साथ कई कर्मचारियों को नौकरी से निकाला हो. पिछले साल जुलाई में फ्लिपकार्ट ने एक साथ 1000 कर्मचारियों की छंटनी की. अपनी इस काम को फ्लिपकार्ट ने ‘कॉमन प्रैकटिस’ करार दिया.

7. इन्टेल

चिप बनाने की कंपनी इन्टेल ने भी जुलाई 2016 में 12,000 कर्मचारियों को बाहर का दरवाजा दिखा दिया. आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार रेवेन्यु बढ़ने के बावजूद कंपनी ने दुनिया भर से अपने कई कर्मचारियों को निकाल दिया था. कंपनी ने अपनी सफाई में लॉस को छंटनी का कारण बताया.

8. एस्सार स्टील प्लांट

स्टील जाएंट एस्सार ने भी कंपनी को हो रहे घाटे की भरपाई कर्मचारियों को निकालकर की. कुछ को तो टर्मिनेशन लेटर दिया गया. पर कुछ कर्मचारियों को दुर्गम जगहों पर ट्रांसफर कर के कंपनी छोड़ने पर मजबूर किया गया. अपने एक ही प्लांट से कंपनी ने 700 से ज्यादा लोगों को नौकरी से निकाल दिया था.

जापान में कुछ योद्धा ‘हाराकिरी’ से गुजरते हैं. यह एक तरह का अनुष्ठान है, जिसमें योद्धा आत्महत्या करता है. योद्धा खुद को ही बड़ी दर्दनाक मौत देता है. यही नहीं, उसके सगे-संबंधी, दोस्त सबके सामने यह खूनी खेल चलता है. कर्मचारियों को यूं बेवजह निकाल देना ‘हाराकिरी’ से कम नहीं है. बड़े पैमाने पर छंटनी करके कंपनी बाजार में अपनी साख गिरा लेती है. पर जैसा कि पहले ही कहा गया है, यहा कोरपोरेट की दुनिया है, यहां संभल कर चलना भी बहुत ज्यादा फायदेमंद नहीं होता है.

क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए पूर्णा की खास स्क्रीनिंग

राहुल बोस की आने वाली फिल्म पूर्णा की एक खास स्क्रीनिंग का आयोजन भारतीय क्रिकेट टीम के लिए पूना में किया गया. यह पूर्णा मालवथ की जिंदगी पर आधारित फिल्म है जिसने 13 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी. 

राहुल बोस भारतीय क्रिकेट टीम को अपनी फिल्म दिखाना चाहते थे. राहुल बोस का मानना था कि विराट कोहली इस लड़की की मेहनत को अच्छे से पहचान सकेंगे. राहुल बोस ने भारतीय क्रिकेट टीम को अपनी फिल्म दिखाने के लिए खुद अनिल कुंबले से बात की था. राहुल बोस ने पूना के टेस्ट मैच के पहले टीम के फिल्म देखने का प्रस्ताव अनिल कुंबले के सामने रखा था.  

भारतीय टीम 19 फरवरी को पुणे पहुंचने वाली थी. फिल्म की कहानी सुनते ही पूरी टीम तुरंत फिल्म देखने के लिए तैयार हो गई. यह फिल्म सभी कठिनाइयों से लड़कर (गरीब, अनपढ़, आदिवासी  लड़की) सफलता पाने  की कहानी है. फिल्म का ट्रेलर 23 फरवरी को रिलीज होगा. 

अनिल, विराट और टीम के अन्य लोगों ने यह फिल्म देखी. असली पूर्णा हैदराबाद में फिल्म की रिलीज के पहले पहुंच जाएंगी.

जब क्रिकेट में हुआ एल्युमिनियनम के बैट का इस्तेमाल

क्रिकेट में लकड़ी के बैट का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर डेनिस लिली मैदान में बल्लेबाजी के दौरान एल्युमिनियनम धातु से बने बैट को लेकर उतरे थे. लिली के इस कदम ने क्रिकेट फील्ड में बवाल मचा दिया था.

डेनिस एक बेहतरीन गेंदबाज थे लेकिन सवाल यह उठता है कि उन्होंने एल्यूमिनियम के बैट का इस्तेमाल क्यों किया? उसके पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है. तो आइए जानते हैं एल्युमिनियम बैट के इस किस्से से.

आपको बता दें कि डेनिस लिली अपने क्रिकेट करियर के दौरान ऑस्ट्रेलियाई टीम के सबसे ज्यादा विवादों से घिरने वाले खिलाड़ियों में से एक रहे. ऐसे ही एक विवाद को उन्होंने 1979 में इंग्लैंड के खिलाफ खेले जा रहे एक टेस्ट मैच के दौरान हवा दी. इस मैच में जब लिली मैदान पर बल्लेबाजी करने उतरे तो उनके हाथ में साधारण लकड़ी से बना बैट नहीं, बल्कि एल्युमिनियम धातु से बना बैट था.

एल्युमिनियम का यह बैट लिली के दोस्त ग्रेम मोनेगन की कंपनी ने बनाया था. यह बैट परंपरागत क्रिकेट बैट के रिप्लेसमेंट के लिए बनाया गया था जो स्कूलों और विकासशील देशों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. मोनेगन ने एल्युमिनियम के इस बैट का निर्माण बेसबॉल के बैट को ध्यान में रखकर किया था जहां लकड़ी के बैट को एल्युमिनियम से रिप्लेस किया गया था. लिली अपने दोस्त मोनेगन की कंपनी में हिस्सेदार थे इसलिए उन्होंने एक मार्केटिंग स्टंट का पूरा करने के लिए उस बैट के साथ अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच में खेलने का निर्णय लिया.

चूंकि उस समय तक क्रिकेट में इस तरह के बैट को इस्तेमाल करने को लेकर कोई रोक-टोक नहीं थी, इसलिए लिली के लिए इस बैट के साथ मैदान पर जाना और भी आसान हो गया. हालांकि यह पहली बार नहीं था जब लिली ने एल्युमिनियम के बैट का इस्तेमाल किया था, बल्कि इस घटना के ठीक 12 दिन पहले उन्होंने इसी बैट का इस्तेमाल वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट मैच में भी किया था. लेकिन उस टेस्ट मैच में उनके बैट के खिलाफ किसी ने विरोध व्यक्त नहीं किया था.

लिली के बैट को लेकर विरोध तब शुरू हुआ जब लिलि ने इयान बॉथम की गेंद पर स्ट्रेट ड्राइव खेला, जिस पर लिली ने तीन रन लिए. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल के मुताबिक गेंद को चार रन के लिए जाना चाहिए था. इसीलिए चैपल ने 12वें खिलाड़ी रोडनी हॉग को लिली को परंपरागत लकड़ी के बैट को देने के लिए कहा.

जब ये सब चल ही रहा था कि इंग्लिश टीम के कप्तान माइक बियर्ली ने अंपायर से शिकायत की. बियर्ली ने कहा कि धातु का बैट लेदर की गेंद को खराब कर रहा है. इसके बाद अंपायरों ने लिली को बैट बदलने को कहा.

कबड्डी.. कबड्डी.. कबड्डी..

कबड्डी एक ऐसा खेल है जिसे प्रमुख रूप से भारत में खेला जाता है. 4000 साल पुराना यह खेल बांग्लादेश का राष्ट्रीय खेल है. प्रायः खुले मैदान में खेला जाने वाले इस खेल के इतिहास का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है. लेकिन ऐसा माना जाता है कि जब मनुष्य में आत्मरक्षा और शिकार की भावना विकसित हुई तभी से इस खेल को खेला जाने लगा.

यह एक ऐसा खेल है जिसे भारत में ही अलग-अलग नाम से जाना जाता है. इसे उत्तर भारत में कबड्डी, दक्षिण में चेडु-गुडु तो पूरब में हु तू तू के नाम से जाना जाता है. भारत के पड़ोसी देशों में भी कबड्डी बड़े पैमाने पर खेली जाती है. इसे बांग्लादेश में हा-दो-दो, तो श्रीलंका में गुड्डु और थाईलैंड में थीचुबा नाम से जाना जाता है.

कबड्डी एक ऐसा खेल है जिसे भारत में हर उम्र का व्यक्ति खेलता है और खेलना चाहता है फिर चाहे वह बच्चा हो या युवा. यह कहना गलत नहीं होगा कि कबड्डी ही एसी खेल है जिसे भारत का हर एक बच्चा जानता होगा और बचपन में इस खेल का लुत्फ भी उठाया होगा.

यूं तो यह खेल काफी पुराना है लेकिन इसे लोकप्रियता और औपचारिकता प्रदान करने का श्रेय महाराष्ट्र के विभिन्न सामाजिक संगठनों को जाता है. 1918 में कुछ सामान्य नियम बनाए गए और प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं. लेकिन कबड्डी के नियमों के औपचारिक गठन औऱ प्रकाशन का ऐतिहासिक कदम 1923 में भारतीय ओलंपिक संघ के नेतृत्व में उठाया गया. कबड्डी का पहला अंतर्राष्ट्रीय प्रर्दशन 1936 में बर्लिन ओलंपिक में किया गया. आज कबड्डी को लोकप्रिय बनाने और अंतराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए नियमों में कई बदलाव किए जा रहे हैं.

1950 में भारतीय कबड्डी महासंघ की स्थापना हुई. पुरुषों के लिए पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1952 में मद्रास में आयोजित की गई, जबकि महिलाओं की पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1955 में कोलकाता में हुई. पहली एशियाई कबड्डी प्रतियोगिता 1980 में आयोजित की गई थी.

कबड्डी के मैदान का आकार पुरुषों और महिलाओं को लिए अलग-अलग होता है. पुरुषों के मैदान का आकार 121/2 मी.*10 मी. होता है तो वहीं महिलाओं के लिए यह 11मी.*8मी.

कबड्डी आंध्र प्रदेश, तेलांगना पंजाब और तमिल नाडु का प्रादेशिक खेल है. ऐसा माना जाता है कि कबड्डी शब्द मूलतः तमिल शब्द ‘कै-पिडि’ से लिया गया है जिसका अनुवाद है ‘हाथ पकड़े रहना’.

भारत में कबड्डी इतना लोकप्रिय है कि इसे बड़े पर्दे पर भी कई बार दर्शाया गया. तमिल, तेलगु, कन्नड़ भाषीय फिल्मों ने कबड्डी को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा. सिर्फ दक्षिण ही नहीं इसे कई बॉलीवुड फिल्मों में भी शामिल किया गया. 1997 में आई फिल्म परदेस, हु-तु-तु (1999), युवा, बदलापुर ब्वॉयेज और तेवर इसके उदाहरण हैं.

आपको बता दें की कबड्डी विश्‍व कप की शुरूआत वर्ष 2004 में की गई थी. भारत ने अब तक हुए कबड्डी के सारे विश्‍व कप जीते हैं.

जब बीवी पेट से हुई, तो मैंने बच्चा गिराने की दवा लेकर खिला दी थी. अब मैं क्या करूं.

सवाल

सुहागरात के बाद जब बीवी पेट से हुई, तो मुझे 2 महीने बाद पता चला. मैं ने मैडिकल स्टोर से बच्चा गिराने की दवा ले कर खिला दी थी. अब 7 महीने हो चुके हैं, पर वह दोबारा पेट से नहीं हुई. मैं क्या करूं?

जवाब

कभी भी बाजार से दवा ला कर गर्भपात नहीं करना चाहिए. इस के लिए माहिर डाक्टर की मदद लेनी चाहिए. ऐसी मनमानी से अकसर नुकसान हो जाता है.

अब आप किसी माहिर महिला डाक्टर से अपनी बीवी का चैकअप कराएं और उसी के मुताबिक इलाज कराएं. वैसे, आप की बीवी का फिलहाल पेट से न होना महज संयोग भी हो सकता है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मुझे बीवी के साथ सेक्स करने में मजा नहीं आता. ऐसा क्यों है. इस बारे में बताएं.

सवाल

मैं 25 साल का हूं. मेरी शादी हो चुकी है और 2 बच्चे भी हैं. मुझे बीवी के साथ हमबिस्तरी करने में मजा नहीं आता. फोरप्ले करने में भी मजा नहीं आता. ऐसा क्यों है? मुझे हमबिस्तरी करने का मन क्यों नहीं करता है? इस बारे में बताएं?

जवाब

अगर आप का मन हमबिस्तरी करने के लिए नहीं करता, तो कोई बात नहीं. शराफत से बगैर हमबिस्तरी किए जिंदगी बिताते रहें. 2 बच्चे होने के बाद बीवी को भी इस की खास जरूरत नहीं होगी. लिहाजा, इस बारे में दिमाग न खपाएं. एक अरसे बाद अगर हमबिस्तरी की इच्छा हो, तो बीवी आप के पास है ही.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

फिल्म ‘ट्रैप्ड’ का ट्रेलर रिलीज

राजकुमार राव की मोस्ट अवेटेड थ्रिलर फिल्म 'ट्रैप्ड' का ट्रेलर रिलीज हो चुका है और 24 घण्टों से भी कम समय में इसे तकरीबन 11 लाख व्यूअर्स द्वारा देखा भी जा चुका है.

राजकुमार राव अभिनीत फिल्म ‘ट्रैप्ड’ 17 मार्च 2017 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. फिल्म ‘उड़ान’ और ‘लुटेरा’ जैसी फिल्मों के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी ने साल 2013 के बाद से अब फिल्म 'ट्रैप्ड' से ही बड़े पर्दे पर निर्देशन में फिर वापसी की है. 

फिल्म ‘ट्रैप्ड’ एक ऐसे शख्स की कहानी है जो बहुमंजिली इमारत में स्थित अपने घर में फंस जाता है और उसके पास यहां से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता है और न ही भोजन, पानी या बिजली की कोई व्यवस्थता होती है.

फिल्म की पूरी कहानी तो आपको इसे देखने के बाद ही मालूम होगी, फिलहाल फिल्म के ट्रेलर को देखकर आप कुछ अंदाजा लगा सकते हैं.

खास भारत के लिए लॉन्च हुआ स्काइप लाइट ऐप

मुंबई में स्थित माइक्रोसॉफ्ट की एक कॉन्फ्रेंस में कंपनी के सीईओ ने स्काइप लाइट को लॉन्च किया. यह कंपनी के लोकप्रिय कॉलिंग और इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप स्काइप का लाइट वर्जन है. इसी के साथ माइक्रोसॉफ्ट ने स्काइप प्लस आधार फीचर की भी घोषणा की. यह स्काइप लाइट का आधार पीचर है जो स्काइप लाइट के साथ ऐप में उपलब्ध होगा.

स्काइप लाइट एंड्रॉयड ऐप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है. इसे माइक्रोसॉफ्ट द्वारा खास भारत के लिए लॉन्च किया गया है, खासकर यह ऐप सध्यम रेंज से कम दाम वाले मोबाइल फोन के लिए लॉन्च किया है. इस ऐप को हैदराबाद में काम करने वाली माइक्रोसॉफ्ट के रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर द्वारा बनाया गया है. कंपनी के सीईओ ने बताया कि भारत में कई लाख लोग स्काइप का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों के पास ज्यादा पावरफुल फोन नहीं हैं. इसके अलावा भारत में 4जी नेटवर्क के लॉन्च किए जाने के बावजूद ज्यादातर जगहों पर 3जी या 2जी वाली स्पीड में ही इंटरनेट चलाना पढ़ता है. भारत के ज्यादातर हिस्सों में यूजर इन्हीं नेटवर्क पर हैं. इस वजह से स्काइप लाइट को लॉन्च किया गया है.

नया ऐप 13 एमबी का है. इसे गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध कराया गया. इसमें स्काइप के ज्यादातर अहम फीचर मौजूद हैं- इंस्टेंट मैसेजिंग, ऑडियो-वीडियो कॉलिंग और स्काइप बॉट्स.   माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी के मुताबिक, जब यूजर तेज कनेक्शन या वाई-फाई से जुड़े होंगे तो ऐप अपने आप ही एचडी कॉल में स्विच हो जाएगा जो आम स्काइप कॉल जैसा है. और जब भी कनेक्शन कमजोर होगा, संकेत के जरिए कॉल क्वालिटी कमजोर कर दी जाएगी. ऐप अपने आप ही यूजर द्वारा साझा किए जा रहे इमेज को संकेत कर देगा, ताकि डेटा की खपत कम हो. अगर यूजर दुबारा किसी तस्वीर को साझा करना चाहते हैं तो ऐसा सीधा स्काइप से ही संभव हो जाएगा. इसके लिए तस्वीर को दोबारा डाउनलोड और अपलोड करना नहीं पड़ेगा.

स्काइप लाइट यह भी बताएगा कि कितने डेटा की खपत हुई है. इसमें वाई-फाई और सेल्युलर डेटा की विस्तृत जानकारी रहेगी. यह भी पता चलेगा कि स्काइप लाइट को इस्तेमाल करके कितने डेटा की बचत की गई है.

स्काइप लाइट का आधार इंटिग्रेशन
स्काइप प्लस, स्काइप लाइट का आधार फीचर है. इसकी मदद से यूजर की पहचान करना संभव होगा. कॉल के दौरान नीचे दिख रहे मेन्यू बटन पर क्लिक करते हैं तो आपको रिक्वेस्ट आधार वैरिफिकेशन का विकल्प मिलेगा. इस पर टैप करें. इसके बाद उस शख्स को वैरिफिकेशन रिक्वेस्ट भेजा जाएगा जिससे आप स्काइप लाइट पर बात कर रहे हैं. अगर वो शख्स आपकी रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेता है, तो इसके बाद आपके आधार नंबर से जुड़े फोन नंबर पर ओटीपी आएगा. ओटीपी डालते ही पहचान की पुष्टि हो जाएगी. माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने बताया कि इसका इस्तेमाल बाद में सरकारी विभागों में किया जा सकता है.

स्काइप लाइट में 7 भारतीय भाषाओं का समर्थन

नए स्काइप लाइट ऐप में सात भारतीय भाषाओं के लिए सपोर्ट मौजूद रहेगा. आप इसका भरपूर लाभ उठा पाएंगे. ऐप हिंदी, गुजराती, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगू और ऊर्दू भाषा को सपोर्ट करेगा. कंपनी ने इस ऐप से की गई हर किस्म की बातचीत की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी ली है.

भारत में पहला पैनिक बटन वाला मोबाइल लॉन्च

भारत के केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा बुधवार को पैनिक बटन वाला पहला मोबाइल फोन भारत में लॉन्च किया गया. बहुराष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी एलजी ने इस फोन को भारतीय बाजार में उतारा है. भारत में नोएडा से कंपनी द्वारा निर्मित इस स्मार्टफोन का नाम K10 2017 रखा गया है और इसकी कीमत 13,990 रुपये तय की गई है.

फोन में दिये गए इस पैनिक बटन के बारे में हम आपको जानकारी देना चाहते हैं कि ये पैनिक बटन इस मोबाइल के पीछे दिया गया है. किसी भी तरह की आपात कालीन स्थिति में इस बटन को तीन बार दबाना होगा, इस पैनिक बटन को तीन बार दबाने पर नेशनल हेल्पलाइन इमरजेंसी नंबर 112 पर आपके द्वारा अपने आप ही कॉल लग जाएगा और फिर जाहिर तौर पर आप अपनी समस्या बता सकेंगे.

इस फोन की खास बात ये है कि आपके नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हो जाने के बावजूद भी ये पैनिक बटन काम करेगा. आपको बता दें कि भारतीय सरकार ने जनवरी 2017 से सभी मोबाइल फोन्स में पैनिक बटन अनिवार्य करने की बात कही थी.

यह फोन पूरी तरह देश में ही निर्मित किया गया है. एलजी K10 का डिस्प्ले स्क्रीन 5.3 इंच है. फोन का प्रोसेसर ऑक्टा कोर मीडियाटेक MT6750 है, साथ ही ये 2GB रेम के साथ बाजार में उतारा गया है. फोन की आंतरिक मेमोरी 16GB है, इसके अलावा फोन में रियर कैमेरा 13 मेगापिक्सल का और दूसरा कैमरा 5 मेगापिक्सल का है. एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा संचालित एलजी K10 की बैटरी 2,800mAh है, जो रिमूवेबिल भी है.

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