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तोलें, फिर बोलें

वाणी एक माध्यम है जो विचारों का आदानप्रदान करने में सहायक है परंतु कभीकभार यह भी हो जाता है :

रहिमन जिह्वा बावरी, कहिगे सरग पाताल,
आपु तो कहि भीतर रही जूती सहत कपाल.

यानी उच्चारण कितना हो, ज्यादा क्या है और कम क्या  जितना हम साबित कर सकें या जिस को निभा पाएं उतना ही कहें. शब्दों को यहांवहां कहना ठीक होगा या नहीं. यह बात विचारणीय है, क्योंकि आज के दौर में जनमानस में एक बात गहरे बैठ गई है :

जो इधरउधर की बकता है,
वही तो उत्तम से उत्तम वक्ता है.

सही बात, सही समय पर कहना, सही व्यक्ति से कहना और सही वक्त पर कहना, यही वे खास बिंदु हैं जिन पर अमल कर के वाक कला को विकसित व पल्लवित किया जा सकता है अन्यथा समाज से तिरस्कृत होने में देर नहीं लगती. यह भी सच है कि जिसे अपने भावों को सही तरीके से व्यक्त करना नहीं आता वह किसी काम का नहीं रह जाता. गूंगे के गुड़ वाली बात भी बहुत महत्त्व रखती है कि अगर अच्छी बात भी सब से नहीं बांटी तो एक अच्छा अनुभव अनसुना, अनसमझा व अनबूझा ही रह जाएगा. यह भी गलत ही होगा. एक बड़ी खूबसूरत कहावत भी तो है न :

जबान शीरीं, मुल्क गीरीं,
जबान टेढ़ी, मुल्क बांका.

यानी कायदे से बोलना इतना फायदेमंद है कि सभी वश में हो जाते हैं. महाभारत की कथाओं में शिशुपाल का प्रसंग भी तो हमें यही समझाता है न कि शिशुपाल के वश में उस के शब्द थे ही नहीं. सहने की भी एक सीमा होती है, आखिरकार इस कड़वी वाणी और अंडबंड शब्दावली के चलते ही शिशुपाल को जान से हाथ धोना पड़ा. कहने का तात्पर्य यह है कि बोलना किसी कला से कम नहीं है. बात को रुई सा मुलायम और कोमल ही रहने देना चाहिए. रूखापन लाने से सभी का नुकसान होता है :

बातहि हाथ पाइए,
बातहि हाथी पांव.

जो बात करने की कला जानता है वह सबकुछ पा लेता है, जो यह कला नहीं जानता वह गलत बोलने के फलस्वरूप दंडित भी हो जाता है. दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि मूर्ख ही होगा वह व्यक्ति जो बोलने से पहले तोलता न हो.

सेफ ऐबौर्शन

आजकल के युवा जितनी जल्दी फ्रैंडशिप करते हैं उतनी ही जल्दी रिलेशन भी बना लेते हैं, जिस का नुकसान उन्हें ताउम्र भुगतना पड़ सकता है. कई बार तो सावधानी बरतने के बावजूद गर्भ ठहर जाता है और उन्हें समझ नहीं आता कि क्या करें, किस से सलाह लें. ऐसे में घर में पता चलने के डर से व समाज में बदनामी से बचने के लिए वे कैमिस्ट से ऐबौर्शन पिल्स ले आते हैं जिस के उन के शरीर पर घातक परिणाम भी देखने को मिलते हैं.

कई बार तो जान जाने का खतरा बन जाता है. ऐसे में जरूरत है यह समझने की कि यहां तक नौबत ही न आए और अगर आ भी गई है तो डरें नहीं बल्कि प्रौब्लम को फेस करें और किसी अनुभवी डाक्टर से संपर्क कर के ही ऐबौर्शन करवाएं.

इस संबंध में फोर्टिस हौस्पिटल की सीनियर गाइनोकोलौजिस्ट डा. बंदिता सिन्हा से बात हुई तो उन्होंने बताया कि भारत में अविवाहित युवतियों के ऐबौर्शन के केसेज पहले की तुलना में काफी बढ़े हैं, क्योंकि आज वे जल्दीजल्दी पार्टनर चेंज करने में विश्वास करने लगे हैं. ऐसे में वे खुद की फीलिंग्स पर कंट्रोल नहीं कर पाने के कारण जोश में आ कर होश खो बैठते हैं जिस से उन के सामने जटिल परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है और वे इस से नजात पाने के लिए जहां कहीं से भी ऐबौर्शन पिल्स अरेंज करते हैं, चाहे इस के लिए कितने ही पैसे खर्च हों, वे देने के लिए तैयार रहते हैं.

इतना ही नहीं कईर् डाक्टर्स भी इस स्थिति का फायदा उठा कर मरीज से ढेरों रुपए ऐंठने में नहीं सकुचाते. इन्हीं सब बातों को देखते हुए पिछले 3-4 साल से सरकार ने ऐबौर्शन पर बैन लगाया है कि अगर कोई भी डाक्टर ऐबौर्शन करते हुए या फिर एमटीपी पिल्स देते पकड़ा गया तो उस का लाइसैंस रद्द कर दिया जाएगा. आप सिर्फ एमटीपी मान्यता प्राप्त नर्सिंग होम और अस्पताल में ही गर्भपात करवा सकते हैं.

रोक का खास कारण यह भी

पुरुष प्रधान देश में यही माना जाता है कि अगर वंश को आगे बढ़ाना है तो उस के लिए परिवार में पुत्र का जन्म होना बहुत जरूरी है. ऐसे में जब परिवार वालों को सोनोग्राफी के माध्यम से यह पता चलता है कि गर्भ में बेटी है तो वे डाक्टर को मुंहमांगी रकम दे कर ऐबौर्शन करवाने के लिए तैयार हो जाते हैं. इसी का नतीजा है कि हरियाणा के 70 गांवों में पिछले कुछ सालों से लड़कियों ने जन्म नहीं लिया. आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं कि वहां पता लगते ही कि गर्भ में लड़की है, ऐबौर्शन करवा दिया जाता है.

लेकिन फिर भी कुछ स्थितियों में युवतियों व महिलाओं को बिना परेशानी के ऐबौर्शन कराने का अधिकार है, जो हैं :

 –      अगर युवती या महिला जबरदस्ती किसी के यौन शोषण का शिकार हुई है और वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती तो उसे ऐबौर्शन करवाने का पूरा अधिकार है.

 –   यदि इस से महिला या युवती के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता हो.

 –      अगर यह पता लगे कि गर्भ में  पल रहे बच्चे का विकास सही ढंग से नहीं हो रहा और उसे 9 माह तक गर्भ में रखना सही नहीं है, तो ऐसी स्थिति में भी ऐबौर्शन करवाया जा सकता है. इसे डाक्टरी भाषा में मैडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैग्नैंसी कहते हैं.

क्या है मैडिकल टर्मिनेशन औफ प्रैग्नैंसी

एमटीपी प्रक्रिया, जिस में डाक्टर की देखरेख में ऐबौर्शन को अंजाम दिया जाता है, को हर डाक्टर अंजाम नहीं दे सकता. सिर्फ अनुभवी गाइनोकोलौजिस्ट या सिर्फ वे डाक्टर्स जिन्होंने एमटीपी की ट्रेनिंग ली होती है, इसे अंजाम दे सकते हैं, क्योंकि वे जरूरत पड़ने पर अपने अनुभव के बल पर स्थिति को संभाल सकते हैं.

डाक्टरी देखरेख में ऐबौर्शन 2 तरीके से होते हैं :

ऐबौर्शन पिल्स

इस तरीके से ऐबौर्ट करने के लिए सब से पहले यह देखा जाता है कि कितने माह का गर्भ है. अगर गर्भ 6 से 8 सप्ताह के बीच है तो उसे पिल्स द्वारा रिमूव किया जा सकता है और इस का पता लगाने के लिए डाक्टर अल्ट्रासाउंड करता है. एमटीपी पिल डाक्टर की सलाह पर ही दी जाती है. यह पिल असल में गर्भाशय से पदार्थ को बाहर निकालने का काम करती है.

डाक्टर बताते हैं कि दवाएं कितने समय के अंतराल में लेनी हैं, क्योंकि जरा सी लापरवाही पूरे कोर्स को खराब कर सकती है. सिर्फ  दवाएं लेने से ही काम पूरा नहीं होता बल्कि डाक्टर 15 दिन के बाद अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाता है जिस से करंट सिचुएशन के बारे में पता चल जाता है. अगर कोई पीस वगैरा रह गया होता है तो इस प्रोसैस को पुन: दोहराया जाता है या फिर सर्जरी से बाहर निकाला जाता है.

सर्जरी से

इस में बेहोश कर के ऐबौर्शन किया जाता है. इसे तब किया जाता है जब 8 सप्ताह से ज्यादा का गर्भ हो चुका होता है, क्योंकि इस के बाद पिल्स असर नहीं करतीं. इसे डाइलेशन ऐंड क्रूटेज प्रोसैस कहते हैं. इस में आप डाक्टर्स की देखरेख में रहते हैं और आप को प्रौपर केयर मिलती है. यह काफी सेफ प्रोसैस माना जाता है.

डाक्टर से करवाना क्यों फायदेमंद

गर्भपात के लिए कैमिस्ट वगैरा से दवा लेना हानिकारक होता है क्योंकि उन्हें आप की इंटरनल स्टेज के बारे में तो पता नहीं होता, इसलिए कौंप्लिकेशंस पैदा होने का भय रहता है. इस से आप की जान भी जोखिम में पड़ सकती है. कभीकभी ओवर ब्लीडिंग होने से सिचुएशन आउट औफ कंट्रोल भी हो सकती है. इसलिए जरूरी है डाक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें.

अगर आप को अस्थमा, एनीमिया वगैरा की शिकायत है तो डाक्टर चैकअप के बाद ही बताते हैं कि गोली देना सही रहेगा या नहीं. यहां तक कि सर्जरी के वक्त कंसर्ल्ट फौर्म भी भरवाया जाता है, जिस में पूरी जानकारी दी जाती है. यह भी बताया जाता है कि आप को औपरेशन के कितने दिन बाद दिखाने के लिए आना है. इस से आप काफी सेफ रहते हैं.

ऐबौर्शन के बाद क्या क्या सावधानियां बरतें

 –  इस दौरान भारी चीजें उठाने व झुकने वगैरा से थोड़े समय तक परहेज करना चाहिए.

 – किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन भूल कर भी न करें.

 – डाइटिंग न करें, क्योंकि इस दौरान लंबे समय तक भूखे रहना सेहत पर बुरा प्रभाव डाल सकता है.

 –  एकदम से सैक्स न करें, खुद को थोड़ा समय दें, क्योंकि कई बार ऐसा करने से दोबारा प्रैग्नैंसी का खतरा बन जाता है.

 –  इस समय आप जितना अच्छा खाएंगी व अच्छा सोचेंगी उतनी ही जल्दी फिट हो पाएंगी.

 

सैक्स : भ्रम से निकलें युवा

अकसर युवा सैक्स को ले कर कई तरह की भ्रांतियों से घिरे रहते हैं. अपनी गर्लफ्रैंड से सैक्स को ले कर अपने इमैच्योर फ्रैंड्स से उलटीसीधी ऐडवाइज लेते हैं और जब उस ऐडवाइज का सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है तो शर्मिंदगी से किसी से बताने में संकोच करते हैं. यहां युवाओं को यह बात समझनी जरूरी है कि सैक्स से सिर्फ मजा ही नहीं आता बल्कि इस से सेहत का भी बड़ा गहरा संबंध है.

सैक्स और सेहत को ले कर कम उम्र के युवकों और युवतियों में ज्यादातर नकारात्मक भ्रांतियां फैली हैं. स्वास्थ्य के लिए सैक्स कितना अच्छा है, यह बात न इन्हें स्कूल और कोचिंग सैंटर्स में पढ़ाई जाती है और न ही पैरेंट्स सैक्स ऐजुकेशन को ले कर इतने जागरूक हैं कि अपने युवा बच्चों को सैक्स और सेहत के बीच के सही तालमेल और पोजिटिवनैगेटिव फैक्टर्स से रूबरू करा सकें. आएदिन देशदुनिया में कहीं न कहीं सैक्स और सेहत को ले कर रिसर्च होती रहती है जिस से अंदाजा लगाना आसान होता है कि सैक्स कोई बीमारी नहीं बल्कि आप की सेहत के लिए बहुत आवश्यक है बशर्तें इस के बाबत आप को सही गाइडैंस मिली हो.

सैक्स, सेहत और भ्रांतियां

सैक्स के बाद युवतियों के हिप्स और ब्रैस्ट का वजन बढ़ जाता है. सैक्स करने से कमजोरी आती है. सैक्स करने से शरीर में खून की कमी होती है. सैक्स के दौरान भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है. सैक्स करने से पढ़ाई में मन नहीं लगता. ज्यादा सैक्स करने से वजन कम हो जाता है. सैक्स करने से लड़की तुरंत प्रैग्नैंट हो जाती है. सैक्स तनाव का बड़ा कारण है, सैक्स करने से हार्टअटैक का खतरा बढ़ जाता है. सैक्स का याद्दाश्त पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, सैक्स करने से ब्लड प्रेशर अनियंत्रित रहता है… वगैरावगैरा.

यह तमाम भ्रांतियां आजकल के युवकयुवतियों के दिमाग में घर कर गई हैं. इन के चलते सैक्स को ले कर जो रवैया युवाओं में होना चाहिए, वह नहीं दिखता.

हर मिथक और गलतफहमी के वैज्ञानिक और मैडिकल तथ्य हैं जो इन को सिरे से खारिज करते हैं. मसलन, वजन बढ़ने वाली बात की जाए, तो सैक्सुअल रिलेशन की शुरुआत होते ही युवतियों के हिप्स और ब्रैस्ट का वजन नहीं बढ़ता है. एक तर्क यह है कि युवतियों और महिलाओं के खून में स्पर्म आत्मसात हो जाता है और वह बाहर नहीं निकल पाता, लेकिन समझने वाली बात यह है कि 2-3 मिलीलिटर स्पर्म से मात्र 15 कैलोरी बढ़ती हैं. इसलिए सैक्स को मनोवैज्ञानिक रूप से वजन बढ़ने का सही तथ्य नहीं माना गया है.

विल्किस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और एक अन्य अमेरिकन शोध बताते हैं कि  सप्ताह में एक या दो बार सैक्स करने से इम्युनोग्लोबुलिन नाम के ऐंटीबौडी में बढ़ोतरी होती है. इसलिए रैगुलर ऐक्सरसाइज करें और हैल्दी डाइट से वजन मैंटेन करें न कि सैक्स न करने से. शोध में यह बात भी सामने आई है कि यह हार्ट के लिए बेहद फायदेमंद है. वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि सप्ताह में 2 बार या इस से ज्यादा बार सैक्स करने वाले पुरुषों में दिल की बीमारी होने की आशंका 45 फीसदी तक कम होती है. इतना ही नहीं सैक्स करना आप के ब्लडप्रैशर और हृदयगति के लिए भी अच्छा है. सैक्स के दौरान जितना ज्यादा स्खलन होगा उस से प्रोस्टैट कैंसर होने की आशंका उतनी ही कम होगी.

रिसर्च से यह सच भी सामने आया कि जो लोग ज्यादा तनाव में रहते हैं वे ज्यादा सैक्स करते हैं. ऐसा करने से तनाव दूर हो जाता है. यह शोध मैसाच्यूसैट्स स्थित न्यू इंगलैंड इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने किया है.   

परफैक्ट टाइमिंग है जरूरी

सैक्स के दौरान अगर सेहत को भी अनुकूल रखना चाहते हैं तो युवाओं को सैक्स का समय, माहौल और मानसिक दशा पर सतर्कता बरतने की जरूरत होती है. मान लीजिए आप सैक्स रात को ढाई बजे कर रहे हैं. उस समय एक सैक्स पार्टनर को हलकीहलकी नींद आ रही है. ऐसे में जाहिर है सैक्स का भरपूर आनंद तो मिलेगा नहीं, मानसिक तनाव ही बढे़गा. सैक्स सर्वे भी स्पष्ट करते हैं कि मौर्निंग सैक्स करने वाले ज्यादा खुश रहते हैं और हैल्दी भी यानी सैक्स के साथ टाइमिंग की बड़ी भूमिका है. स्कूल या औफिस से लौट कर सैक्स करने में जो आनंद और शरीर को रिलैक्स मिलेगा उस का अनुपात सुबहसुबह तरोताजा मूड में सैक्स करने वाले कपल से अलग होगा. इस का एक कारण यह भी है कि मोर्निंग सैक्स करने वालों के शरीर में एक ऐसे तत्त्व का रिसाव होता है जो पूरे दिन प्यार बनाए रखने में लाभदायक सिद्ध होता है. हफ्ते में तीन बार सुबहसुबह सैक्स करने वालों को हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा भी कम हो जाता है.

इसी तरह अगर किसी से झगड़ा हुआ है किसी नुकसान के चलते मन अस्थिर है, तो ऐसे समय सैक्स करने से न तो शारीरिक संतुष्टि मिलती है और न सैक्स का मजा, उलटा यह गलती बारबार दोहराने में सैक्स के प्रति मन भी उचटने लगता है और उदासीनता सैक्स लाइफ के लिए बिलकुल भी ठीक नहीं है.

सैक्स से रहें हैल्दी 

सैक्स का सेहत से कितना गहरा रिश्ता है इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते साल  स्वीडिश सरकार ने अपने देश के नागरिकों की सैक्स लाइफ से चिंतित हो कर व्यापक पैमाने पर एक स्टडी शुरू की. 2019 में पूरी होनी वाली यह स्टडी इसलिए करवाई गई क्योंकि लोगों का सैक्स के प्रति झुकाव कम हो रहा था. वहां के हैल्थ मिनिस्टर के मुताबिक यदि स्वीडिश नागरिकों की सैक्स लाइफ तनाव और अन्य हैल्थ समस्याओं के कारण प्रभावित हो रही है तब भी यह एक राजनीतिक समस्या है.

सैक्स स्टडी कर रहे शोधकर्ताओं के मुताबिक, ‘‘सैक्स से लोगों की सेहत पर व्यापक असर होता है. जो लोग हफ्ते में कम से कम एक बार सैक्स करते हैं वे सैक्स न करने वालों की तुलना में ज्यादा खुश और प्रोडक्टिव रहते हैं.’’

सैक्स के दौरान न सिर्फ इम्यून सिस्टम बेहतर होता है बल्कि शरीर की फुरती में भी इजाफा होता है. इतना ही नहीं सही मूड, अवस्था और जगह में किए गए सैक्स से बालों, स्किन और नाखूनों को भी बेहतर बनाने में मदद मिलती है. सैक्स करने से हड्डियां और मसल्स भी मजबूत होते हैं. जो सैक्स को ले कर उदासीन रहते हैं उन्हें मीनोपोज के बाद आस्टियोपोरोसिस की समस्या का खतरा रहता है. नियमित सैक्स से एस्ट्रोजन हारमोंस का रिसाव ज्यादा होता है जो सेहत के लिए फायदेमंद होता है. सैक्स ऐक्सपर्ट मानते हैं कि युवाओं में अकसर सैक्स के दौरान एनर्जी लैवल और ऐक्ससाइटमैंट की कमी के चलते तनाव रहता है. ऐसे में वे सुझाव देते हैं कि ऐरोबिक्स शरीर को फिट रखने के लिए सब से बेहतरीन और शानदार वर्कआउट है. इस को करने से शरीर में हमेशा उत्तेजना और फुरती बनी रहेगी. ऐरोबिक्स एनर्जी लैवल को हमेशा बढ़ाए रखता है.

सैक्स, नुकसान और समाधान

जीवनयापन के लिए खाना, पानी, हवा की तरह सैक्स भी एक शारीरिक जरूरत है और इसे सक्रिय रखना युवा रहने के लिए बेहद जरूरी है. एक तरफ जहां सैक्स न करने के कई नुकसान हैं वहीं कुछ हमारी बिगड़ी आदतें ऐसी होती हैं जो हमें सेहत और सैक्स के मोरचे पर कमजोर कर देती हैं. पहले बात करते हैं सैक्स से जुड़े नफेनुकसानों की. सैक्स न करने वाले हमेशा तनाव में डूबे रहते हैं और यह तनाव हमारे जीवन की सभी जरूरी चीजों को बुरी तरह से प्रभावित करता है. काम, पढ़ाई और निजी संबंधों में तनाव जहर का काम करता है.

जहां सैक्स के कई फायदे हैं वहीं कुछ नुकसान भी हैं. कहते हैं न कि अति हर चीज की बुरी होती है. सैक्स के मामले में यह बात लागू होती है. दिन में 2-3 बार सैक्स करना उसी को सूट करता है जिस का स्टेमिना बेहद अच्छा हो वरना इस से दिल के रोगियों के लिए मुश्किलें भी पैदा हो सकती हैं. इसी तरह जो युवा हस्तमैथुन के आदी हो जाते हैं, उन के लिए भी यह अनहैल्दी हो सकता है. गर्लफ्रैंड नहीं हो जिस की वजह से जो युवा पोर्न का सहारा लेते हैं, धीरेधीरे वे पोर्न के भी इतने आदी हो जाते हैं कि हर पल उन के दिमाग में वही चलता रहता है. इस एडिक्शन के चलते असली सैक्स के दौरान वह उत्तेजना नहीं आती जो पोर्न देखने के दौरान आती है. कई बार युवा अपने साथी दोस्तों, उन की गर्लफ्रैंड और सैक्स लाइफ के किस्से सुन कर कौंप्लैक्स के शिकार हो जाते हैं और चिड़चिडे़ और गुस्सैल होने लगते हैं. यह चीज आप के बोलचाल और व्यव्हार में भी दिखती है.

स्मोकिंग करने से भी सैक्स लाइफ बुरी तरह से बिगड़ जाती है. आजकल के युवा स्मोकिंग को फैशन और लाइफस्टाइल का हिस्सा मान कर कूल और टशन के नाम पर स्मोकिंग करते हैं. इस से सैक्स और्गन के सिकुड़ने से ले कर नपुंसक होने तक का खतरा रहता है.

मोटापा, अनियमित जीवनशैली और मानसिक तनाव जैसे कई तत्त्व सैक्स का खेल बिगाड़ सकते हैं. युवाओं को इन्ही कमियों को दूर करना होगा तभी वे युवावस्था का आनंद ले सकेंगे. याद रखें जिन युवाओं की सैक्सुअल जरूरतें समय से पूरी हो जाती हैं उन का स्वास्थ्य ऐसा न कर पाने वालों की तुलना में अच्छा होता है. इसलिए सैक्स से सेहत के तालमेल को सही बैठा कर बिंदास जिंदगी जीने के लिए कमर कस लीजिए, क्योंकि न तो जवानी बारबार आती है और न आप चिर युवा रह सकते हैं.                             

खलनायकों की खूबसूरत बीवियां

डैनी डेंजोंगपा

डैनी ने सिक्किम की राजकुमारी 'गावा' से शादी की थी. डैनी बहुत सी नेपाली, तेलुगू और तमिल फिल्मों में काम करने के अलावा गायकी में भी हाथ आजमा चुके है.
गुलशन ग्रोवर

गुलशन ग्रोवर ने साल 2001 में कशिश से शादी की थी. लेकिन ये शादी ज्यादा नहीं चल पायी और दोनों ने 2002 में एक दुसरे से तलाक ले लिया था.
आशुतोष राणा

आशुतोष राणा इंडस्ट्री का बहुत बड़ा नाम हैं और काफी सफल एक्टर भी रहे हैं. आशुतोष राणा ने साल 2001 में रेणुका शहाणे से शादी की थी. रेणुका कई मराठी फिल्मों के अलावा 1991 के लोकप्रिय धारावाहिक सुरभि में भी काम कर चुकी है.
रंजीत

1966-1967 में आयी फिल्म 'सावन भादो' से भारतीय फिल्मों में एंट्री करने वाले रंजीत ने 1986 में अलोका बेदी से शादी की थी.

शक्ति कपूर

शक्ति कपूर ने बॉलीवुड एक्ट्रेस पद्मिनी कोल्हापुरी की बहन शिवांगी कोल्हापुरी से शादी की थी. फिल्म किस्मत के दौरान शक्ति को शिवांगी से प्यार हो गया था और दोनों ने शादी कर ली थी.

अब आसानी से ट्रांसफर करें अपनी ग्रैच्युटी

भविष्य निधि या प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) ट्रांसफर करने के नियम आसान बनाने के बाद अब सरकार ग्रैच्युटी ट्रांसफर से जुड़े नियमों पर भी नर्मी बरतने की तैयारी कर रही है. अब 5 साल की अवधि से पहले नौकरी छोड़ने पर भी आपको ग्रैच्‍युटी का नुकसान नहीं होगा. इसके लिए सरकार ने नंबर सिस्टम जारी करने का निश्चय किया है. हर कर्मचारी को ग्रैच्‍युटी के लिए यूनिक नंबर दिया किया जाएगा. इसके लिए श्रम मंत्रालय द्वारा मौजूदा नियमों में बदलाव किया जाएगा.  

सूत्रों के अनुसार सरकार ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों तक ग्रैच्युटी का फायदा पहुंचाना चाहती है. इसके लिए सरकार जल्द ही ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों और इंडस्ट्री के लोगों के साथ बातचीत करेगी.

श्रम मंत्रालय द्वारा किए गए एक रिसर्च में पाया गया कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग ज्यादा जल्दी नौकरियां बदलते हैं. कांट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को न चाहते हुए भी नौकरी छोड़नी पड़ती है क्योंकि उनके ठेकेदार जब जी चाहे उन्हे नौकरी से निकाल सकते हैं या कहीं और ट्रांसफर कर सकते हैं. इन सब से सबसे ज्यादा नुकसान कर्मचारियों को होता है.

मौजूदा नियमों के अनुसार ग्रैच्यूटी के लिए एक कंपनी में कम से कम 5 साल की सर्विस करना जरूरी है. अगर कोई 5 साल से पहले कंपनी छोड़ देता है तो उसे सीटीसी पैकेज से कटा हुआ पैसा भी नहीं मिलता है. इससे कर्मचारियों को काफी नुकसान होता है.

श्रम मंत्रालय के अनुसार सरकार की यही कोशिश है कि कर्मचारियों के फायदे के लिए नीतियों में बदलाव जरूरी है. इसके साथ ही कंपनियों के नफे में कमी न हो इसकी भी व्यवस्था हो. अब सरकार की क्या मंशा है यह तो वो ही जाने, बाद बाकि मजदूरों और कर्मचारियों के गए बीते दिन तब भी थे, और शायद आगे भी रहेंगे.

जब मोरे को चिढ़ाने के लिए मेढक की तरह कूदे थे मियांदाद

भारत-पाकिस्तान के बीच 1992 वर्ल्ड कप मैच के दौरान मोरे-मियांदाद का झगड़ा आज भी क्रिकेट फैंस को याद है. इस मैच में मियांदाद ने मोरे को डराने और चिल्लाकर गेंदबाजों को नसीहत देने से रोकने के लिए मेढक कूद लगाई थी.

सिडनी में हुए इस मैच में किरण मोरे ने मियांदाद के खिलाफ अपील क्या की, मियांदाद को गुस्सा आ गया. उन्होंने सचिन तेंदुलकर के उस ओवर में मिड ऑफ पर शॉट लगाया और रन के लिए तेजी से दौड़ पड़े, लेकिन खतरे को भांपते हुए क्रीज में लौट गए. इस बीच आए थ्रो पर मोरे ने बेल्स उड़ाई, तो मियांदाद आपा खो बैठे और विकेट के आगे मेढक कूद लगाई. जिससे दुनियाभर के क्रिकेट प्रशंसक सन्न रह गए.

आपको बता दें कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ल्ड कप में अब तक छह मुकाबले हो चुके हैं और सभी में भारत की जीत हुई है. लेकिन जब भी इन दोनों चिर प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबला होता है, यह कहना मुश्किल होता है कि मैच कौन जीतेगा. 

स्वदेशी पनडुब्बी से मिसाइल का सफल प्रक्षेपण

अपने देश में ही निर्मित कलवरी श्रेणी की पनडुब्बी से पहली बार नौसेना ने मिसाइल का सफल परीक्षण किया. भारतीय नौसेना ने जल की सतह के एकदम नीचे उसकी युद्ध क्षमता को बढ़ाने की दिशा में इस प्रक्षेपण को एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया है.

भारत की सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट 75 के तहत बनाई जा रहीं भारत की 6 स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों में से पहली पनडुब्बी से प्रक्षेपास्त्र का प्रक्षेपण 2 मार्च को किया गया. इस परीक्षण के दौरान अरब सागर की सतह पर एक लक्ष्य बनाकर उस पर सफलतापूर्वक निशाना साधा गया.

रक्षा मंत्रालय की ओर से यह बात कही गई कि “सभी छह डीजल-इलेक्ट्रिक संचालित पनडुब्बियों पर युद्धपोत रोधी मिसाइल लगाई जाएंगी, जिनका एक प्रामाणिक रिकॉर्ड भी है. ये मिसाइल्स पनडुब्बियों को सतहों के एक विस्तृत क्षेत्र तक मौजूद खतरों को नेस्तनाबूद कर देने की क्षमता प्रदान करेंगी. इस परीक्षण में प्रक्षेपण के दौरान मिसाइल ने एक विस्तृत रेंज तक सतह पर स्थित अपने लक्ष्य पर सफलतापूर्वक निशाना साधा ऐसा केवल केवल कलवरी द्वारा ही मुमकिन हो सका है. यकीनन ये सफलता सतह के नीचे भारत की युद्ध क्षमता बढ़ाने में महल्वपूर्ण है”.

इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही मुंबई स्थित माझगांव डॉक लिमिटेड में किया जा रहा है और फ्रांसीसी नौसेना रक्षा और ऊर्जा कंपनी डीसीएनएस द्वारा इसे डिजाइन किया गया है.

आ गया एंड्रॉयड जीमेल ऐप का नया अपडेट

जीमेल ने अपने एंड्रॉयड जीमेल ऐप के लिए नया अपडेट जारी कर दिया है. नए अपडेट के साथ ही एंड्रॉयड 7.1 और उसके बाद के वर्जन पर चल रहे ऐप में नए शॉर्टकट जोड़ दिए गए है. ऐप शॉर्टकट के अलावा, सर्च इंजन गूगल ने एंड्रॉयड पर ईमेल क्लाइंट के साथ टास्क एक्सचेंज करने के लिए सपोर्ट जारी कर दिया है.

इस अपडेट से पहले ऐप में सिर्फ एक ऐप शॉर्टकट उपलब्ध था जिससे यूजर एक नया ईमेल मैसेज कंपोज कर सकते थे. हालांकि, यह शॉर्टकट अभी भी मौजूद है, लेकिन अब इसके साथ तीन ईमेल अकाउंट तक के लिए भी शॉर्टकट दिए गए हैं. ऐप शॉर्टकट को होमस्क्रीन पर ड्रैग किया जा सकता है. इससे अलग-अलग ईमेल अकाउंट को चलाना आसान हो जाता है.  

सूत्रों के मुताबिक इन अकाउंट का क्रम उन पिछले तीन अकाउंट पर आधारित होता है जिन्हें ऐप में इस्तेमाल किया गया है.
सर्च इंजन गूगल ने अपने लेटेस्ट अपडेट के साथ जीमेल ऐप में टास्क एक्सचेंज करने के लिए एक्सचेंज टास्क्स सपोर्ट शामिल किया है. यह एक नया फीचर आपके काम को एक्सचेंज के साथ सिंक कर देगा जिससे आप हमेशा अपनी टास्क लिस्ट को सबसे ऊपर देख सकते हैं. आप कोई टास्क क्रिएट कर सकते हैं, प्राथमिकता या तारीख को एडिट कर सकते हैं. एंड्रॉयड पर जीमेल ऐप तैयार है और इसे सुरक्षित तौर पर इंस्टॉल किया जा सकता है.

रिर्पोट के अनुसार एक संयुक्त टास्क लिस्ट के साथ, अब आपके जरूरी कामों पर ध्यान देना आपके लिए आसान होगा और एक बार काम पूरा करने के बाद लिस्ट को जांच लें.

आधार और फोन नंबर से जुड़ेंगे सभी बैंक खाते

कैशलेस इकॉनमी पर जोर देने वाली सरकार ने सभी बचत बैंक खातों को आधार कार्ड और मोबाईल नंबर से जोड़ने का फैसला किया है. सरकार ने बैंकों को 31 मार्च 2017 तक सभी बचत खातों को जोड़ने और ग्राहकों को मोबाइल बैंकिंग के लिये सक्षम बनाने का निर्देश दिया है.

एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए सरकार ने सभी बैंकों को इसे अभियान के तौर पर चलाने की सलाह दी है. मोबाइल के जरिये भुगतान के लिये खाते से मोबाइल नंबर को जोड़ना और एम-बैंकिंग हेतु उपयुक्त बनाना पूर्व शर्त है जबकि आधार संख्या से खाते को जोड़ा आधार युक्त भुगतान प्रणाली (एईपीएस) के उपयोग के लिये एक पूर्व शर्त है.

एक अनुमान के अनुसार केवल 65 प्रतिशत बचत खाते मोबाइल नंबर से और 50 प्रतिशत आधार से जुड़े हैं. मोबाइल नंबर से जुड़े कुल 65 प्रतिशत खातों में से सिर्फ 20 प्रतिशत खातों में ही मोबाइल बैंकिंग की सुविधा है. बयान के अनुसार, ‘इस प्रक्रिया को ग्राहकों के लिये आसान बनाने के लिये एमईआईटीवाई ने बैंकों से फोन आदि के जरिये ग्राहकों से संपर्क कर इसकी सहमति की संभावना तलाशने को कहा है. फिलहाल इसके लिये ग्राहकों को बैंक शाखा या एटीएम जाने की आवश्यकता होती है.’ इस अभियान को तत्काल प्रभाव से शुरू किया गया जाएगा. इस अभियान पर एमईआईटीवाई के साथ वित्तीय सेवा विभाग नजर रखेंगे. 

सचिन नहीं, इस क्रिकेटर के नाम है पहला दोहरा शतक बनाने का रिकॉर्ड

अगर आप यह मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का पहला दोहरा शतक बनाने वाले सचिन तेंदुलकर पहले क्रिकेटर हैं तो आप गलत हैं, क्योंकि इस कारनामें को एक दूसरे क्रिकेटर ने उनसे 13 साल पहले साल 1997 में मुकम्मल किया था. इस क्रिकेटर का नाम बेलिंडा क्लार्क. बेलिंडा एक महिला क्रिकेटर हैं.

क्लार्क ने डेनमार्क के खिलाफ खेलते हुए 155 गेंदों में 229 रनों की पारी खेली थी. इस तरह वह विश्व क्रिकेट में पहला दोहरा शतक लगाने वाली पहली बल्लेबाज बनीं. सचिन तेंदुलकर पुरुष क्रिकेट में पहला दोहरा शतक लगाने वाले बल्लेबाज बने जिसे उन्होंने साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध मुकम्मल किया था.

ऑस्ट्रेलिया महिला टीम की कप्तान रहीं बेलिंडा क्लार्क 1997 में अपनी टीम ऑस्ट्रेलिया के साथ मुंबई में खेले जा रहे आईसीसी ‘विमन वर्ल्डकप’ में शामिल हुई थीं. ऑस्ट्रेलिया टीम की कप्तान क्लार्क ने डेनमार्क के खिलाफ 155 गेंदों में 229 बनाए. उनकी इस तूफानी पारी की मदद से ऑस्ट्रेलिया ने 412 रनों का पहाड़ जैसा स्कोर खड़ा किया था.

गैर तर्जुबे वाले डेनमार्क के गेंदबाजी आक्रमण को जिस तरह से क्लार्क ने नेस्तनाबूद किया था वह शायद उन्हें जिंदगी भर याद रहेगा. बाद में हुए साक्षात्कार में क्लार्क ने बताया कि वह इस मैच में पूरे 50 ओवर बल्लेबाजी करना चाहती थीं ताकि वह भारतीय परिस्थितियों के आधार पर अपने आपको ढाल सकें.

क्लार्क ने ऑस्ट्रेलिया की ओर से साल 1991 में पर्दापण किया था और 1994 में वह टीम की कप्तान बनी. अपनी कप्तानी में उन्होंने दो विश्व कप ऑस्ट्रेलिया के नाम किए. क्लार्क ने साल 2005 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

भले ही पुरुष क्रिकेटरों ग्रेग चैपल, एलन बॉर्डर, और स्टीव वॉ के नीचे बेलिंडा क्लार्क का नाम दब गया हो, लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि बेलिंडा क्लार्क एक बेहतरीन क्रिकेटर थीं. यह बहुत ही कम लोग जानते हैं कि उनके बेहतरीन प्रदर्शन के कारण उन्हें साल 1998 में विज़डन ऑस्ट्रेलिया क्रिकेटर के अवॉर्ड से नवाजा गया था. इसके अलावा वह विमन क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की सीईओ भी रहीं.

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