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‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’ सबसे पहले जानेंगी महारानी ऐलिजाबेथ

साल 2017 की मोस्ट अवेटेड फिल्म है 'बाहुबली'. हम और आप इस साल फिल्म 'बाहुबली: द कन्क्लूजन 2' का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. इस फिल्म से जुड़ी खबरों के मुताबिक फिल्म को सबसे पहले भारतीय दर्शक नहीं बल्कि ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय देखेंगी. यह फिल्म 'बाहुबली: द कन्क्लूजन 2', साल 2015 में आई ‘बाहुबली: द बिगिनिंग’ फिल्म का ही दूसरा भाग है. भारतीय सिनेमाघरों में यह फिल्म 28 अप्रैल को रिलीज होने वाली है.

जी हां, प्रभास, तमन्ना भाटिया और राणा डग्गुबती द्वारा अभिनीत फिल्म बाहुबली 2 का सबसे पहला प्रीमियर लंदन में होगा जिसकी खास मेहमान बनेंगीं महारानी एलिजाबेथ. सूत्रों के अनुसार 27 अप्रैल 2017 को लंदन स्थित बकिंघम पैलेस में ब्रिटिश और भारतीय सरकार द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. माना जा रहा है कि ये कार्यक्रम भारत की आजादी के 70 साल पूरे होने के जश्न स्वरूप मनाया जा रहा है और इसी आयोजन के दौरान ही फिल्म 'बाहुबली: द कन्क्लूजन 2' का खास प्रीमियर होगा.

कुछ लोगों की माने तो इस कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हिस्सा ले सकते हैं. इसका मतलब महारानी एलिजाबेथ द्वितीय और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी  'बाहुबली: द कन्क्लूजन 2' के सबसे पहले दर्शक होंगे.हम आपको बता दें कि महारानी एलिजाबेथ ने हाल ही में 28 फरवरी को इसी बकिंघम पैलेस में यूके-इंडिया ईयर ऑफ कल्चर को लॉन्च किया था और इस मौके पर भारत के राजनीति, खेल और मनोरंजन जगत से जुड़ी कई बड़ी हस्तियां जैसे अभिनेता कमल हासन, सुरेश गोपी, पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कपिल देव, फैशन डिजाइनर मनीष अरोड़ा, मनीष मल्होत्रा, गायक और एक्टर गुरदास मान, सितार वादक अनुष्का शंकर और भी कई खास शख्सियत शामिल हुईं.

शादी में फायरिंग दलितों पर रोब गांठने का फैशन

चारों ओर चहलपहल थी. खुशी का माहौल था. शहनाई के सुर माहौल में रस घोल रहे थे. इसी बीच शोर मचा कि बरात आ गई. दूल्हा कार से उतरा और उसे वरमाला के लिए बने स्टेज की ओर ले जाया गया. कुछ देर में दुलहन भी छमछम करते हुए स्टेज पर आई. लोग तालियां बजाने लगे. शहनाइयों की आवाज तेज हो उठी. दूल्हे ने दुलहन के गले में वरमाला डाली. दनादन हवाई फायरिंग होने लगी. बंदूकों और रायफलों की गोलियों से शामियाने में सैकड़ों छेद हो गए.

अचानक स्टेज के किनारे से चीख की आवाज उठी. एक बच्चा खून से सना जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. चारों ओर चीखपुकार मच गई. शहनाइयां और गाजेबाजे बंद हो गए.

दरअसल, हवाई फायरिंग करने वालों में से किसी एक की गोली गलती से बच्चे को जा लगी थी. लोग घायल बच्चे को उठा कर अस्पताल ले जाने के लिए भागे. कुछ देर पहले तक खुशी का माहौल अचानक मातम में बदल गया. कुछ लोगों ने पुलिस को खबर कर दी. आननफानन शादी की रस्मों को 10-12 मिनटों में खत्म कराया गया. पुलिस दूल्हे के फूफा को गिरफ्तार कर के ले गई. उसी की बंदूक से निकली गोली से बच्चा जख्मी हुआ था.

इसी तरह 7 दिसंबर, 2016 को पंजाब के भटिंडा शहर में शादी के समारोह में डांस का प्रोग्राम चल रहा था.  उसी दौरान कुछ नौजवान अपनी बंदूकों से हवाई फायरिंग भी कर रहे थे.

इसी बीच स्टेज पर डांस कर रही लड़की को एक गोली जा लगी और वह चीखते हुए खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी. उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. 25 साल की उस डांसर का नाम कुलविंदर कौर था और वह पेट से भी थी. पुलिस ने गोली चलाने वाले को दबोच लिया. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब जैसे राज्यों में शादीब्याह में हवाई फायरिंग करने का पुराना फैशन है. ऐसी फायरिंग की वजह से कइयों की जान जाने और जख्मी होने के बाद भी लोग इस से बाज नहीं आ रहे हैं. प्रशासन और पुलिस भी ऐसे जानलेवा फैशन पर रोक लगाने को ले कर खासा गंभीर नहीं हैं.

दरअसल, हवाई फायरिंग करने का मकसद खुशी जताने के साथसाथ दबंगों का आसपास के इलाकों के गरीबों और दलितों के बीच डर का माहौल बनाना भी होता है. बिहार पिछड़ा वर्ग महासंघ के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि अगड़ी जातियों में जो दबंग टाइप के लोग होते हैं, वे बंदूक, रायफल से गोलियां चला कर या तलवारें भांज कर निचली जातियों के लोगों में खौफ पैदा करते हैं  वे आगे बताते हैं कि पटना शहर के लोहानीपुर महल्ले में मुसहरों की पुरानी और बड़ी बस्ती है. उस के आसपास कुछ अगड़ी जाति के दबंगों ने ऊंचीऊंची इमारतें बना ली हैं. उन इमारतों के चारों ओर 10-12 फुट ऊंची चारदीवारी खड़ी की गई है. अंदर क्या होता है, इस का पता बाहर वालों को नहीं लगता है.

चारदीवारी के अंदर भी अजीब सा माहौल बना कर रखा जाता है. 5-7 दिनों में वहां के कुछ लोग अपनीअपनी छतों पर जा कर हवाई फायरिंग करते हैं. इस से पूरी बस्ती में खौफ का माहौल बना रहता है. शादी वगैरह के मौके पर तो अंधाधुंध फायरिंग की जाती है. किसी से इस बात की शिकायत भी नहीं की जा सकती. उन के जलसों में मंत्री, नेता, अफसर और पुलिस वाले ही मेहमान होते हैं. ऐसे में दलितों की शिकायत पर कितनी कार्यवाही होगी, इस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. दलित पिछड़ों पर रोब गांठने के लिए बंदूक, रायफल और पिस्तौल से हवाई फायरिंग की जाती है. दूल्हे के रिश्तेदार दनादन हवाई फायरिंग कर खुशियां जताते हैं, जबकि हकीकत में वे आसपास के गरीबों और दलितों के बीच खौफ पैदा करना चाहते हैं, ताकि दलित हर समय उन से सहम कर रहें. उन से बात करने की जुर्रत नहीं कर सकें. उन की बदमाशियों और शोषण के खिलाफ आवाज न उठा सकें.

शादी समारोहों में खुशी और ताकत जाहिर करने के लिए गोलियां चलाने का एक दर्दनाक वाकिआ देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा शहर में हुआ था. 18 फरवरी, 2010 को नोएडा के सैक्टर 10 में एक शादी समारोह में हवाई फायरिंग तब हुई, जब शादी की रस्में खत्म हो चुकी थीं. दुलहन की विदाई की तैयारी चल रही थी. इसी बीच दूल्हे के फूफा ने खुशी जताने के लिए हवाई फायरिंग की, लेकिन गोली सीधे दूल्हे के सीने में जा लगी और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

ताजा मामला उत्तराखंड के जसपुर इलाके का है, जहां 5 दिसंबर, 2016 को बरातियों द्वारा हवाई फायरिंग करने से 2 लोग घायल हो गए थे. उन्हें आननफानन प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया था. पुलिस में केस दर्ज नहीं किया गया था, क्योंकि गोली चलाने वाले भी अपने थे और जिन्हें गोली लगी थी, वे भी रिश्तेदारों में ही थे. पुलिस इस मसले पर कहती है कि हथियारों का गलत इस्तेमाल होने पर  आर्म्स ऐक्ट की धारा-17 और धारा-30 के तहत लाइसैंस रद्द किया जा सकता है. आरोपी को 3 साल की कैद और जुर्माने की सजा मिल सकती है. गोली चलाने पर किसी की मौत हो जाने पर धारा-304 के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है. इस के तहत गैरइरादतन हत्या का केस दर्ज होता है. इस मामले में 10 साल की सजा या फिर ताउम्र कैद हो सकती है. शादी या फिर किसी भी तरह के समारोह में हथियार ले कर जाने पर बैन लगना चाहिए. हालांकि केंद्र सरकार ने इस तरह का बैन लगाने का निर्देश सभी राज्य सरकारों को दिया है, इस के बाद भी इस पर रोक नहीं लग पा रही है.  

गोलियां चलानी हैं तो शादी में मत आओ

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बड़ौत थाने के वाजिदपुर गांव के फौजी रह चुके एक शख्स सुभाष कश्यप ने शादियों में गोलियां बरसाने वाले लोगों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा था.

उन्होंने अपनी शादी के कार्ड में अनोखी चेतावनी छाप कर लोगों का दिल जीत लिया था. उन्होंने उस कार्ड में वैवाहिक कार्यक्रमों के साथसाथ यह भी छापा था, ‘शादी में फायरिंग और शराब के सेवन पर पूरी तरह से पाबंदी है. जो लोग फायरिंग करना चाहते हैं और शराब पीना चाहते हैं, ऐसे लोगों से निवेदन है कि वे शादी में शामिल नहीं हों…’ शादी के मजे को किरकिरा बनाने वालों ने वहां न जाने में ही अपनी भलाई समझी.

एक ट्रांसजैंडर जिसने खुद बनाया रास्ता

ट्रांसजैंडर एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही जानेअनजाने हम अपनी भौंहें चढ़ा लेते हैं. सामाजिक रूप से जागरूक व्यक्तियों को छोड़ दें तो शेष लोगों के लिए अभी भी यह शब्द और इस का अर्थ एक टैबू है. ट्रांसवूमन को नीची नजरों से देखा जाता है. लोगों की पिछड़ी मानसिकता का नतीजा है कि हम इन लोगों को अकसर इनसान के आधारभूत अधिकारों से भी वंचित कर देते हैं. फिर इन में से कुछ ऐसे होते हैं जो अपने आत्मबल व लगन की बदौलत इस तरह की समस्याओं को पार कर आगे बढ़ते हैं और अपना मकसद पूरा करते हैं. ऐसी ही एक कहानी है, पोनी नाम की ट्रांसजैंडर वूमन की, जिस ने हर तरह के सामाजिक धब्बे को धता बताते हुए अपने डांस के पैशन को एक मुकाम तक पहुंचाया और सामाजिक रूप से बहिष्कृत स्लम के बच्चों को भी इस शिक्षा का अधिकारी बनाया.

टूटिकोरैन में जन्मी पोनी अपने परिवार में सब से छोटी हैं. बचपन से ही डांस उन का पैशन था. शुरू में उन के जैंडर ऐक्सप्रैशन की वजह से उन्हें ट्रेनिंग देने से इनकार कर दिया गया. पोनी ने 20 साल की उम्र में सैक्स रिअसाइनमैंट सर्जरी कराई थी. मैथ्स से बीएससी करने के बाद उन्होंने भरतनाट्यम और डांस में एमए किया. कभी सपना देखना नहीं छोड़ा. फिर एक एनजीओ की ओर से आमंत्रण मिला तो तुरंत उस अवसर को स्वीकार किया. यहां वे शुरू में 20 छात्रों को पढ़ाती थीं. धीरेधीरे समाज द्वारा स्वीकृत न किए जाने का उन का भय लुप्त होता गया. उन्हें छात्रों से बहुत सम्मान मिलता था. इस से उन्हें अपनी डांस क्लासेज शुरू करने की प्रेरणा मिली तो 2006 में चैन्नई में ‘अभिनया नृत्यालया’ की शुरुआत की. इस के लिए सरकार से 1 लाख लोन भी मिला. पोनी का मुख्य मकसद स्लम के बच्चों को पढ़ाना है, क्योंकि जब वे कम उम्र की थीं तब उन्हें एक डांस क्लास में लेने से इसलिए इनकार कर दिया था कि वहां केवल ब्राह्मणों के बच्चों को ही सिखाया जाता है.

आज पोनी की डांस ऐकैडमी में स्लम के बच्चे और कुछ ट्रांसजैंडर्स भी हैं. पोनी इन बच्चों की आंखों को भी सपने देखने का हौसला दे रही हैं. डिस्कवरी चैनल पर आनेवाले शो ‘इंडिया माई वे’ में भी इन की कहानी दिखाई गई.

महिलाओं के लिए कैरियर के सुनहरे अवसर

भारत के रोजगार बाजार में वर्ष 2016 में थोड़ी आशाजनक प्रवृत्ति दिखी है. इस साल कौशल आधारित रोजगार की तरफ बढ़ते झुकाव के साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी और इस से संबंधित रोजगार में बढ़ोतरी हुई है. कई सालों में पहली बार बाजार में फिर से रौनक लौटी है, जिस से रोजगार की तलाश करने वालों को अपनी क्षमता के मुताबिक कैरियर का रास्ता चुनने का विकल्प मिला है.

महिलाओं के लिए 2016 खासतौर पर शानदार वर्ष रहा है, क्योंकि कईर् मौके सिर्फ उन के लिए उपलब्ध रहे हैं. चाहे आईटी, ई-कौमर्स या कोई दूसरा उद्योग हो, इस साल महिला कार्यशक्ति के लिए नए और गतिशील रास्ते खुले हैं, जिस से वे उस कैरियर को चुन सकती हैं, जिस में उन की दिलचस्पी रही हो.

रोजगार बाजार का संक्षिप्त निरीक्षण

2016 में इतनी ज्यादा संभावनाएं दिखने से उद्योग के कई विशेषज्ञों ने पूर्वानुमान व्यक्त किया है कि 2017 रोजगार तलाश करने वालों के लिए समान रूप से सकारात्मक वर्ष रहेगा. प्रमुख पेशेवर रिक्रूटमैंट कंसल्टैंसी मिशेल पेज द्वारा किए गए बाजार के विश्लेषण के मुताबिक सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ जैसी राष्ट्र निर्माण पहल के चलते लगातार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के देश में प्रवाह के कारण भारत की आर्थिक वृद्वि सकारात्मक बनी रहेगी.

रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह के सकारात्मक तथ्यों के साथ देश में रोजगार का परिदृश्य भी ऐसी ही उम्मीदें दिखा रहा है. इस विश्लेषण के लिए सर्वेक्षण में जिन कंपनियों को शामिल किया गया, उन में से 80 फीसदी नियोक्ताओं ने संकेत दिया है कि अगले 12 महीनों में भारत में नियुक्तियों से संबंधित गतिविधियों के स्थिर से ले कर मजबूत बने रहने तक की संभावना है, जो एशिया में औसत के मुकाबले काफी ज्यादा होगी.

सर्वेक्षण में कहा गया है कि 60 फीसदी से ज्यादा कंपनियों द्वारा अगले साल कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी किए जाने की संभावना है. इन नए कर्मचारियों में 45 फीसदी मध्यम दर्जे के प्रबंधक होंगे. इस के अलावा विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि 83 फीसदी कंपनियों ने 2017 में विविधता को मध्यम से ले कर उच्च प्राथमिकता दी है.

आजकल भारत में कई संगठनों ने महिलाओं को कौरपोरेट क्षेत्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित कर लैंगिक समानता को प्राथमिकता देना शुरू किया है. वे महिलाओं की पेशेवर योग्यता को बढ़ाने के लिए काम का बेहतर माहौल दे कर अपना योगदान कर रहे हैं.

अब आइए भारत में महिलाओं के लिए कैरियर के कुछ बेहतर अवसरों की पड़ताल करते हैं, जिन के लिए 2017 में मजबूत रुझान बने रहने की संभावना है:

वर्चुअल सहयोगात्मक (कोलैब्रेशन)  अवसर: वर्चुअल सहयोग का मतलब ऐसे खास तरीके से है, जिस में प्रौद्योगिकी आधारित संचार के जरीए 2 या इस से ज्यादा वर्चुअल टीम सदस्यों के बीच सामूहिक प्रयास के मौके बनाए जाते हैं. जहां यह पूरी तरह से पारंपरिक सहयोग के समान है, वहीं फर्क इस तथ्य में है कि इस तरह के सहयोगात्मक मौडल में शामिल सहभागी दूसरे के साथ फिजिकल तरीके से संपर्क नहीं करते और करीबकरीब पूरी तरह से वर्चुअल नैटवर्क के जरीए संपर्क करते हैं. आसान शब्दों में वर्चुअल कोलैब्रेशन व्यक्ति को औनलाइन जैसे शब्द, दृश्य या लिखित रूप में संचार करने की इजाजत देता है.

मुख्यतया 5 तरह के वर्चुअल कोलैब्रेशन हैं:

सिंक्रोनस कोलैब्रेशन: सिंक्रोनस वर्चुअल कोलैब्रेशन में टीम के सदस्य एकदूसरे के साथ तुरंत जानकारी का आदानप्रदान करते हैं. इस तरह के कोलैब्रेशन के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं. चैट रूम और इंस्टैंट मैसेंजर्स.

ऐसिंक्रोनस कोलैब्रेशन: ऐंसिंक्रोनस कोलैब्रेशन मौडल में सहभागी मैसेज और आइडिया का जवाब तुरंत दे सकते हैं. ई मेल, शेयर्र्ड डाटाबेसेज, औनलाइन डिस्कशन बोर्ड इस तरह के कोलैब्रेशन के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं.

औडियो कौन्फ्रैंसिंग कोलैब्रेशन: औडियो कौन्फ्रैंस से कोलैब्रेशन में टीम के सदस्यों को बगैर किसी विजुअल डिस्क्रिप्शन के एकदूसरे से शाब्दिक रूप से संचार करने का अवसर मिलता है. इस तरह के कोलैब्रेशन के कुछ प्रमुख उदाहरणों में फोन काल, कौन्फ्रैंस काल आदि शामिल हैं.

वीडियो कौन्फ्रैंसिंग कोलैब्रेशन: वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के वर्चुअल मौडल में सहभागी को रियल टाइम में एकदूसरे के साथ शाब्दिक और दृश्य के जरीए संचार करने का अवसर मिलता है. ग्रुप वीडियो कौन्फ्रैंसिंग और डैस्कटौप वीडियो कौन्फ्रैंस इस तरह के कोलैब्रेशन के कुछ उदाहरण हैं.

कंप्यूटर मीडिएटेड कम्युनिकेशन: वर्चुअल कोलैब्रेशन के कंप्यूटर मेडिएटेड कम्युनिकेशन मौडल से टीम के सदस्यों को टैक्स्ट, चित्र या आंकड़ों के इस्तेमाल से संचार करने का अवसर मिलता है. ये बगैर किसी प्रभावी रियल टाइम वौयस या वीडियो चित्र के कंप्यूटर के जरीए प्राप्त किए जाते हैं. ऐप्लिकेशन स्पैसिफिक ग्रुपवेयर कंप्यूटर मीडिएटेड कम्युनिकेशन का एक उदाहरण है.

स्टोरीटैलर्स: स्टोरी टैलिंग (कहानी कहना) दुनिया की सब से पुरानी कलाओं में से एक है. भारत में स्टोरीटैलर्स पारंपरिक रूप से दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए थिएटर या ऐसे दूसरे विजुअल आर्ट का हिस्सा रहे हैं. हालांकि ज्यादा लोग स्टोरी टैलिंग को ठोस पेशेवर विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे. फिर क्यों इस गतिविधि को आजकल सब से ज्यादा प्रचलित कैरियर में से एक माना जा रहा है?

इस का जवाब बाजार की मांग में है. पिछले 2 सालों से भारत में गैरपारंपरिक कैरियर विकल्पों में तेजी दिखनी शुरू हुई है, जो उच्च रचनात्मक पेशेवरों के बीच काफी लोकप्रिय साबित हो रहे हैं. भारत में ऐसा ही एक पेशा है स्टोरी टैलिंग, जो कई लोगों खासकर महिलाओं के बीच तेजी से लोकप्रियता हासिल कर रहा है. जिन लोगों के पास मौकों के इस्तेमाल करने का हुनर हो और जो बांध कर रखने वाली, अविस्मरणीय और विनोदपूर्ण कहानियां कह सकते हैं, वे इस पेशे के लिए बिलकुल अनुकूल हैं.

छोटे उद्यमियों का उद्भव: भारतीय एमएसएमई उद्योग अपने अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र की वजह से पिछले कुछ वर्षों में सब से तेजी से बढ़ रहे क्षेत्रों में से एक बन गया है. अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र की वजह से ऐसे व्यवसायों के विकास के लिए कई अवसर पैदा हुए हैं. यह देश में स्टार्टअप कल्चर को बढ़ावा देने के लिए भी अनुकूल है और इस से कईर् छोटे उद्यमियों को अपना स्वयं का व्यवसाय तैयार करने में भी मदद मिली है. सरकार ने उभरते उद्यमियों को एक ऐसा मजबूत प्लेटफौर्म मुहैया कराने के लिए अपने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ अभियानों के तहत कई पहलों की घोषणा की है ताकि उन के व्यवसाय के विकास को सुगम बनाया जा सके.

परिणाम: ऐसी पहलों ने कई महिलाओं को आगे आने और अपनी स्वयं की इच्छाओं और शर्तों के आधार पर स्वयं को कौरपोरेट जगत में स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया है. भारत में कई महिला उद्यमी मौजूद हैं लेकिन अभी सामूहिक रूप से महिला केंद्रित व्यवसायों का प्रतिशत काफी कम है. चूंकि महिलाओं को पारंपरिक रूप से हमारे समाज में गृहिणी होने में विश्वास किया जाता है और इन में से ज्यादातर महिलाएं पारिवारिक वजह से या सामाजिक दबाव की वजह से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लेती हैं.

नैशनल सैंपल सर्वे और्गेनाइजेशन द्वारा कराई सिक्स्थ इकौनोमिक सैंसस की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सिफ 14% व्यावसायिक प्रतिष्ठान मौजूदा समय में महिला उद्यमियों द्वारा संचालित हैं. इस से पता चलता है कि लगभग 5.85 करोड़ व्यवसायों में से सिर्फ 80.5 लाख ही महिलाओं द्वारा संचालित हैं.

डिजाइन, क्रिएटिव और आर्ट में कैरियर: लगभग सभी लोगों में अपने कार्य क्षेत्र में रचनात्मकता लाने की प्रतिभा होती है. यह ऐसा तरीका हो सकता है जिस में वे अंकगणितीय समीकरण को हल करते हैं, किसी ऊंची इमारत के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करते हैं या अपनी कलात्मक रचनाओं के जरीए भावनाओं को प्रदर्शित करने की उन की क्षमता, रचनात्मकता किसी भी स्वरूप में इस्तेमाल की जा सकती है.

डिजाइन, क्रिएटिव और आर्ट में कुछ लोकप्रिय कैरियर अवसर निम्नलिखित हैं:

आर्किटैक्ट: लंबे समय से आर्किटैक्चर के क्षेत्र में अध्ययन करने या कैरियर निर्माण को पुरुषप्रधान पेशे के तौर पर देखा जाता रहा है. हालांकि महिलाओं को वास्तुकला के तौर पर कैरियर अपनाने से नहीं रोका जाता है, लेकिन उन्हें अन्य प्रतिस्पर्धियों से भेदभाव समेत और कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि इस क्षेत्र में हालात में अब काफी बदलाव आया है.

भले ही यह एक पारंपरिक कैरियर विकल्प है, लेकिन वास्तुकार बनने से व्यक्ति अपनी रचनात्मकता को सामने ला सकता है और विशेष डिजाइन तैयार कर सकता है. अपना प्रोजैक्ट शुरू होने पर वह वास्तव में अपने सपने को साकार कर सकता है.

फिल्म निर्माण: फिल्म निर्माण एक ऐसा पेशा है जो अब धीरेधीरे भारत में कई महिलाओं का पसंदीदा कैरियर बनता जा रहा है. चाहे यह किसी स्वतंत्र फिल्म या एक संपूर्ण बौलीवुड फिल्म का निर्देशन हो, देश में महिला फिल्म निर्माताओं को इस क्षेत्र में उन की योग्यताओं और क्षमताओं के लिए सराहा जा रहा है. उभरते कैरियर के तौर पर फिल्म निर्माण अगले कुछ वर्षों में कई महिलाओं के लिए एक भरोसेमंद कैरियर विकल्प बनने के लिए तैयार है.

स्वतंत्र सेवा प्रदाताओं में तेजी: स्वतंत्र सेवा प्रदाता आईएसपी वे लोग हैं, जो किसी संगठन या अपनी स्वयं की परियोजना के लिए विशेष सेवाएं मुहैया कराने के लिए सहमत होते हैं और किसी कंपनी या कौरपोरेट प्रतिष्ठान से जुड़े नहीं होते हैं. यह काफी हद तक फ्रीलांसिंग जैसा है, लेकिन आईएसपी किसी व्यक्ति या संगठन के लिए सिर्फ कुछ खास कार्य से ही समान्यतया एक बार सेवा मुहैया कराने के आधार पर जुड़े होते हैं.

संभावित कैरियर विकल्प के तौर पर आईएसपी बनना किसी व्यक्ति को कामकाजी जिंदगी के बेहतर संतुलन में सक्षम बनाता है, क्योंकि इस में कार्य के घंटे स्वतंत्र हैं. वे या तो वर्क फ्रौम होम का विकल्प अपना सकते हैं या प्राप्त हुई परियोजना के आधार पर काम कर सकते हैं. यह उन महिलाओं के लिए भी आकर्षक विकल्प हो सकता है, जो या तो विशेष अवसर तलाश रही हैं या ऐसी विशेष सेवाएं पेश कर अपने कौशल के दायरे को व्यापक बनाना चाहती हैं.

निष्कर्ष

कई उद्योग जानकारों द्वारा अगले वर्ष रोजगार बाजार अनुकूल रहने की भविष्यवाणी किए जाने के साथ ही उपरोक्त कैरियर रुझानों से यह स्पष्ट हो गया है कि 2017 में रोजगार तलाशने वालों के लिए उपयुक्त अवसर होंगे. इस के अलावा लगभग सभी नियोक्ता कंपनियां जाति, धर्म या लिंग भेदभाव से अलग विविध एवं उपयुक्त कार्य परिवेश तैयार करने की संभावना तलाश रही हैं, जिस से 2017 में लोगों को अपनी पसंद का रोजगार अवसर तलाशने में मदद मिल सकती है. कहने का मतलब यह है कि हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि नया वर्ष भारत में सभी प्रतिभाशाली महिलाओं के लिए नई संभावनाएं ले कर आ रहा है.                    

– साइरी चहल, शीरोज की संस्थापक एवं सीईओ

 

सैक्स शिक्षा युवाओं के लिए जरूरी

दिया की उम्र महज 20 साल है. वह अविवाहित है, लेकिन कैसे गर्भवती हो गई, दिया के मातापिता की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उन से कहां कमी रह गई? क्या दिया की परवरिश में कहीं कोई कमी रह गई थी? क्या वे अपनी जवान हो रही बेटी की हरकतों पर समय की कमी के चलते ध्यान नहीं दे पाए?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक अच्छे कालेज में पढ़ने वाली दिया के मातापिता को जब उस के गर्भवती होने की बात पता चली तो वे सन्न रह गए. उन्होंने तुरंत सामान पैक किया और दिया को ले कर दिल्ली से बाहर दूसरे शहर चले गए, ताकि बात आसपड़ोस या फिर रिश्तेदारों में न फैले. शहर के बाहर उस के पिता ने किसी अच्छे डाक्टर से उस का गर्भपात कराया और कुछ समय तक वहीं होटल में रहे. बाद में उसे दिल्ली वापस ले आए.

यह उदाहरण सिर्फ  दिया का ही नहीं है, बदलते समय के साथसाथ यंगस्टर्स की सोच में काफी बदलाव आया है, पश्चिमी सभ्यता उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. उम्र का यह दौर ऐसा होता है कि अगर मातापिता बच्चों को कुछ समझाएं तो उन्हें समझ नहीं आता. उन्हें पूरी दुनिया गलत नजर आती है.

एक अनुमान के मुताबिक, भारत की मैट्रो सिटीज से ले कर गांवों तक 25 से 30 फीसदी युवतियां किसी न किसी कारण गर्भपात कराती हैं. ये आंकड़े 25 साल से कम उम्र की युवतियों के हैं. अधकचरी जानकारी में टीनऐज में गर्भपात के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. सरकारी संस्था नैशनल सैंपल सर्वे औफिस के आंकड़ों पर गौर करें तो ग्रामीण क्षेत्रों में 20 साल से कम उम्र की युवतियों में गर्भपात का प्रतिशत मात्र 0.7 है, जबकि शहरों में यह 14% है.

युवती की बढ़ जाती हैं मुश्किलें

अविवाहिता जब संबंध बनाती है तब क्या सही और क्या गलत है, इस का खयाल तक उस के दिमाग में नहीं आता. तब मन गहरे समंदर में प्यार के गोते लगाता है. इस के दुष्परिणाम तब सामने आते हैं जब कम उम्र में युवती गर्भवती हो जाती है. इस उम्र में न तो प्रेमी शादी के लिए तैयार होता है और न ही प्रेमिका. लिहाजा, दोनों के सामने बस एक ही रास्ता होता है और वह है गर्भपात.

जब यह बात घर वालों को पता चलती है तो पूरे घर में बवंडर आ जाता है जो लाजिमी है, लेकिन इस गलती का युवती को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. उसे न केवल गर्भपात जैसे जटिल दौर से गुजरना पड़ता है बल्कि कई तरह की मानसिक परेशानियों से भी दोचार होना पड़ता है. प्रेमी के बदलते रवैए और घर वालों के तानों से पीडि़ता डिप्रैशन में चली जाती है जबकि कई मामलों में युवती ऐसे हालात में मौत को भी गले लगा लेती है.

कौन है जिम्मेदार

देश में अब टीनऐजर्स के लिए गर्भपात कोई नई बात नहीं है. युवा पहले शादी फिर सैक्स जैसी बातों को अब दकियानूसी मानते हैं और इस की वजह है उन्हें आसानी से सबकुछ उपलब्ध हो जाना, ऐसे में वे क्यों शादी का इंतजार करें और जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाएं.

इस के पीछे मुख्य कारण एकल परिवार भी है, जहां मातापिता दोनों कामकाजी हैं. ऐसे में वे बच्चों पर ज्यादा निगरानी नहीं रख पाते. बच्चे अकेले टीवी पर क्या देख रहे हैं या फोन पर क्या डाउनलोड कर रहे हैं, ये सब देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं है. आजकल टीवी और इंटरनैट के माध्यम से सब चीजें उपलब्ध हैं, जिस के दुष्परिणाम आगे चल कर हमारे सामने गर्भपात के रूप में आते हैं.

प्रेमी का व्यवहार भी है इस की वजह

प्यार की शुरुआत में तो सबकुछ अच्छा लगता है और कई बार युवती इस उम्मीद में रिश्ता भी बना लेती है कि उस की प्रेमी से शादी हो जाएगी, लेकिन जब वह गर्भ ठहरने की बात प्रेमी को बताती है तो अधिकतर मामलों में वह प्रेमिका से पीछा छुड़वाने की भरपूर कोशिश करता है. वह न तो बच्चे को अपना नाम देना चाहता है और प्रेमिका से शादी करने से भी मना कर देता है, जिस के चलते युवती के पास सिवा गर्भपात के कोई उपाय नहीं बचता और फिर उसे कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ता है. इस से न केवल उस का स्वास्थ्य प्रभावित होता है बल्कि मानसिक रूप से भी उसे गहरा सदमा लगता है.

गर्भपात के बाद युवती खुद को अलगथलग महसूस करती है. बारबार उसे लगता है कि उस के साथ धोखा हुआ है. धीरेधीरे उस के व्यवहार पर भी इस का गहरा असर दिखाई देता है.

गलती दोनों की

यदि शादी से पहले कोई युवती गर्भवती हो गईर् है तो इस में सिर्फ उस की ही गलती नहीं है, जितनी दोषी वह युवती है उतना ही दोष उस युवक का भी है. दोनों इस में बराबर के हकदार हैं. हमारा समाज शादी से पूर्व युवती के गर्भवती होने पर उसे कई तरह के ताने जैसे बदचलन, कुलटा, कलमुंही कह कर उस का तिरस्कार करता है, लेकिन उस युवक का क्या, जो गर्भ में पल रहे बच्चे का बाप है? क्या उस का कोई कुसूर नहीं? लिहाजा, किसी एक पर गलती का दोष न डाला जाए तो अच्छा है.

कैसे निबटें ऐसे हालात से

अगर आप कामकाजी या हाउसवाइफ हैं तो जरूरी है कि अपने बढ़ते बच्चों का ध्यान रखें. वे क्या कर रहे हैं, कब कहां जा रहे हैं, किस से बात कर रहे हैं? इन सब बातों को नजरअंदाज न करें बल्कि बच्चे का खयाल रखें, उस के साथ दोस्त की तरह व्यवहार करें. ध्यान रखिए डराधमका कर वह आप को कभी कुछ नहीं बताएगा. यदि आप का बच्चे के साथ व्यवहार दोस्ताना रहेगा तो वह आप के साथ सारी बातें शेयर करेगा. उस का फोन और लैपटौप भी समयसमय पर चैक करते रहिए.

हम यह नहीं कह रहे हैं कि आप जासूसी कीजिए, लेकिन यदि आप कभीकभार ये सब चीजें चैक करेंगे तो आप को पता चल जाएगा कि आप का बच्चा किस दिशा में जा रहा है.

सैक्स शिक्षा बच्चों के लिए आज काफी अहम हो गई है. स्कूलकालेजों में यदि सैक्स शिक्षा दी जाए तो बच्चों को इस के सही और गलत प्रभाव का पता चल जाएगा जिस से टीनऐज में गर्भपात के हालात से निबटा जा सकता है.                      

अमेरिकी और बाहरी में भेद

अमेरिका में अब जो भी बिलकुल गोरा या बिलकुल काला नहीं है, हर समय उस के सिर पर खौफ है कि न जाने कब कौन सा पुलिस वाला उसे पकड़ ले और उस से अपनी पहचान बताने की जिद करे. सैकड़ों लोगों को बिना प्रमाण के अमेरिका में आ बसने के अपराध पर जेलों में ठूंस दिया गया है. नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना चुनावी वादा पूरा कर रहे हैं कि वे सारी नौकरियां अमेरिकियों के लिए रखेंगे.

अमेरिका अब तक दुनियाभर का ड्रीम डैस्टिनेशन रहा है. वहां पहुंच जाओ तो बेड़ा पार समझो. लोग न जाने किनकिन तरह से बौर्डरों पर बनी बाधाओं को पार कर अमेरिका में घुसे हैं. अब राजनीतिक सत्ता की पलट के चलते वे अपना घर, पत्नी, पति, बच्चे छोड़ कर जाने को मजबूर किए जा रहे हैं. यह अमानवीय आतंक बंदूकों के आतंक की तरह है और हिटलरी अंदाज वाला है. जिन्होंने ट्रंप को वोट दिया था उन में से भी अधिकांश भौचक्के हैं कि चुनावी जुमलों को अमली जामा बिना तैयारी के पहना दिया जा रहा है.

कमांडो 2 : सरकारी एजेंडे का आइना

कुछ दिनों पहले ही हमने आपको बताया था कि देश की सरकार बदलने के साथ ही भारतीय सिनेमा किस तरह बदला हुआ नजर आ रहा है. मगर कोई फिल्मकार दर्शकों के मनोरंजन की बात भूलकर किस तरह सरकारी एजेंडे वाली फिल्म बनाता है, यह जानना हो तो विपुल अमृतलाल शाह निर्मित व देवेन भोजानी निर्देशित फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ देखनी चाहिए अन्यथा इस फिल्म में चंद बेहतरीन स्टंट दृश्यों के अलावा कुछ नही है.

यूं तो भारतीय सिनेमा की शुरूआत करने वाले फिल्मकारों ने देश को ब्रिटिशों से आजाद कराने के शस्त्र के रूप में फिल्म का सहारा लिया था. उस वक्त का फिल्मकार इस तरह का धार्मिक व ऐतिहासिक सिनेमा बना रहा था, जिससे देश की जनता का मनोरंजन हो तथा जनता के अंदर देश प्रेम व देश के प्रति कुछ करने की भावना प्रज्वलित हो. सिनेमा की इस कसौटी पर ‘‘कमांडो 2’’ कहीं से भी खरी नहीं उतरती.

कहने को तो फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ तीन साल पहले प्रदर्शित हो चुकी फिल्म ‘‘कमांडो’’ का सिक्वअल है. इस फिल्म में कमांडो मलेशिया जाकर देश का काला धन देश में लेकर आने की मुहीम पर है. जो कि वास्तव में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा 2014 में लोकसभा चुनाव के वक्त दिए गए भाषण व किए गए वादे के अनुरूप यह कमांडो चालाकी से देश के उद्योगपतियों व कालाबाजारियों का कालाधन इधर से उधर करने वाली अपराधी विक्की चड्ढा के माध्यम से सारा काला धान तीन करोड़ किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर यानी कि डलवा देने के बाद विक्की चड्ढा को मौत की नींद सुला देता है. और पता चलता है कि यह सारा काम कमांडो व इंस्पेक्टर बख्तावर ने देश के प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री के इशारे पर किए हैं.

फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ की कहानी शुरू होती है कमांडो करणवीर सिंह डोगरा (विद्युत जामवाल) द्वारा कुछ अपराधियों की एक्शन दृश्यों से. वह अपराधी को अपनी बंदूक की गोली से मौत की नींद सुलाने के बाद अपने सहयोगी द्वारा खुद पर गोली चलवाकर इसे एक जायज इनकाउंटर साबित करता है. फिर पता चलता है कि उसे विक्की चड्ढा को पकड़ने की मुहीम का हिस्सा बनना है.

देश की रॉ एजेंसी के पास विक्की चड्ढा के तीन चेहरे हैं. इनमें से एक चेहरा विक्की चड्ढा (ठाकुर अनूप सिंह) व उसकी पत्नी मारिया (ईशा गुप्ता) के साथ मलेशिया में पकड़ा जाता है. इस खबर से देश के काले बाजारियों में हड़कंप मच जाता है. इनका काला धन विदेशों में विक्की चड्ढा ही सुरक्षित करने का काम करता है. इन कालेबाजारियों के संग देश की गृहमंत्री लीला (शेफाली छाया) का बेटा दिशांक (सुहेल नायर) भी जुड़ा हुआ है. वह अपनी मां से कहता है कि विक्की को भारत न लाया जाए. लीला अपने बेटे से कहती है कि उन्हें अब तक विपक्षियों ने हराया नहीं था, पर अब उसने उन्हें हरा दिया.

उसके बाद बेटे के इशारे पर लीला कालेबाजारियों से मिलती है और उन्हें आश्वस्त करती है कि उनका नुकसान नहीं होगा. वह बताती है कि वह अपनी पसंद की टीम मलेशिया भेजेंगी और वहां से विक्की चड्ढा व उसकी पत्नी को भारत लाकर तिहाड़ जेल में रखा जाएगा. एक दिन जेल के अंदर एक हादसे मे वह घोयल होगा, अस्पताल जाते समय रास्ते में वह दम तोड़ देगा. किसी को भी किसी पर शक नहीं होगा. यह सारी बातचीत करणवीर और रॉ के चीफ सुनकर हैरान रह जाते हैं. पर करणवीर कहता है कि वह सब कुछ संभाल लेगा. फिर प्रधानमंत्री द्वारा बुलायी गयी बैठक में लीला अपनी सारी योजना समझाती हैं. लीला ने मलेशिया जाने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर बख्तावर (फ्रेडी दारूवाला), इनकाउंटर स्पेशलिस्ट भावना रेड्डी (अदा शर्मा), इंटरनेट हैकर जफर हुसेन व स्पेशल पुलिस इंस्पेक्टर पांडे को चुना है. एअरपोर्ट पर पता चलता है कि की करणवीर ने किस तरह एक चाल चली और पांडे की जगह खुद पहुंच गया. लीला,अपने चहेते इंस्पेक्टर बख्तावर से कहती है कि यदि करणवीर उसकी राह का रोड़ा बने तो उसे गोली से उड़ा देना, वह सब कुछ संभाल लेंगी.

मलेशिया पहुंचने पर भारतीय दूतावास के अय्यर साहब मिलते हैं. वह इन्हें उस जगह ले जाते हैं, जहां विक्की चड्ढा व उसकी पत्नी मारिया को रखा गया गया है. वहां पर मारिया, करणवीर के कहानी सुनाकर साबित करती है कि वह खुद देश भक्त बनना चाहती है. अब मारिया की योजना के अनुसार करण काम करता है. मारिया के इशारे पर जब करण उसे लेकर युनिवर्सिटी पहुंचता है, तो वहां तमाम खतरनाक लोग हैं. उस वक्त मारिया खुद ही विक्की चड्ढा को गोली मारकर कहती है कि असल में वह मारिया नहीं बल्कि विक्की चड्ढा है. पर अब तक करणवीर और बख्तावर के रास्ते अलग हो चुके हैं. बख्तावर,लीला से अय्यर को आदेश दिलाता है कि करणव भावना रेड्डी को बंदी बना ले. और वह विक्की चड्ढा के साथ दस प्रतिशत पर समझौता कर उसके साथ हो जाता है.

इधर करणवीर, अय्यर के फोन से लीला को फोन कर बीस प्रतिशत पर बात तय करता है. घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. पता चलता है कि विक्की चड्ढा एक सायबर हैकर की मदद से उन लोगों के बैंक एकाउंट हैक किए हैं, जो मर चुके हैं और अब वह काला बाजारियों का पैसा इन बैक खातो में ट्रांसफर कर सभी का धन सुरक्षित करने वाली है. विक्की चड्ढा, बख्तवार के सामने ही यह काम शुरू करती है. कुछ समय में वहां करणवीर पहुंचता है. उसे विक्की के गुंडो के अलावा बख्तावर का मुकाबला करना पड़ता है. सभी को परास्त करता है. पर ट्रांसफर को नहीं रोकता. सारा पैसा तीन करोड़ खातों में ट्रांसफर हो जाने के बाद करण बताता है कि उसने सारे बैंक एकाउंट नंबर बदलकर भारतीय किसानों के बैंक एकाउंट नंबर कर दिए थे. अब यह सारा धन तीन करोड़ भारतीय किसानों के बैंक खातो में पहुंच गया. उधर भारत का किसान अपने खाते में पैसा पाकर खुशी से झूम रहा है.

अब बख्तावर उठकर खड़ा हो जाता है. करण बताता है कि देश के प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के साथ मिलकर करण व बख्तावर ने एक योजना के तहत ही इस काम को अंजाम दिया है.

कहानी में सरकारी एजेंडे को नजरंदाज कर दें, तो कुछ भी नयापन नहीं है. मगर कहानी में कई तथ्यात्मक गलतियां हैं, जिन्हें सिनेमा की आजादी के नाम पर भुलाया जा सकता है. मसलन-काले धन पर कार्यवाही वित्तमंत्री करता है, गृहंमत्री नहीं.

एक्शन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म पसंद आ सकती है. विद्युत के प्रशंसक यह फिल्म देख सकते हैं. मगर अतिरंजित पटकथा व अतिंरजित अभिनय के चलते फिल्म काफी कमजोर हो जाती है. फिल्म के संवाद भी स्तरीय नहीं है. जिससे फिल्म का स्तर गिरता है. विद्युत जामवाल ने कुछ खतरनाक एक्शन दृश्य किए हैं, मगर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट के अलावा कोई भाव नहीं आता. उनके चेहरे पर गुस्सा भी नहीं आता.

फिल्म में मनोरंजन व रोमांस का अभाव है. अदा शर्मा फिल्म की नायिका हैं, इसलिए वह जबरन चूमा चाटी करती रहती हैं. पर अभिनय के मामले में अदा शर्मा काफी निराश करती है. उन्होंने तेलगू लड़की के किरदार को महज कैरीकेचर बना दिया है. ईशा गुप्ता कुछ दृश्यों में ही जमती है. उनके किरदार में जो शातिर बदमाश का भाव आना चाहिए, वह नहीं उभरता. फ्रेडी दारूवाला जमे नहीं. वह तो रिएलिटी शो के पात्र बनकर रह गए. शेफाली शाह भी ठीक ठाक रहीं. मां बेटे के बीच जो भावनात्मक दृश्य होना चाहिए था, उसे निर्देशक पकड़ नहीं पाए.

दो घंटे 15 मिनट की अवधिवाली फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ का निर्माण विपुल अमृतलाल शाह व निर्देशन देवेन भोजानी ने किया है. फिल्म के लेखक रितेश शाह, कैमरामैन चिरंतन दास तथा कलाकार हैं- विद्युत जामवाल, अदा शर्मा, फ्रेडी दारूवाला, सुहेल नायर, अनूप सिंह, शेफाली शाह व अन्य.

लॉरियल प्रोफेशनल की पहली भारतीय ब्रांड एम्बेसेडर ट्विंकल

ट्विंकल खन्ना ने फिलहाल तो फिल्मों से दूर है. लेकिन उनकी फैन फॉलोइंग अक्षय कुमार से कम नहीं है. वो सोशल मीडिया के जरिए हमेशा चर्चा में बनी रहती हैं. हाल ही में खबर मिली है कि सैलो ब्रांड लॉरियल प्रोफेशनल ने ट्विंकल खन्ना को ब्रांड अंबेसेडर बनाया है. ट्विंकल खन्ना लॉरियल की पहली भारतीय ब्रांड अंबेसेडर हैं.

ट्विंकल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी शेयर किया है जिसमें वो अपने सिल्की और शायनी बालों से लॉरियल को प्रमोट करती नजर आ रही हैं. गोवा में आयोजित लॉरियल प्रोफेशनल इंडियन हेयरड्रेसिंग अवार्डस के दौरान ट्विंकल खन्ना के नए ब्रांड एम्बेसेडर बनाए जाने की घोषणा की गई.
सूत्रों के अनुसार लॉरियल प्रोफेशनल के आयोजन में ट्विंकल की खासी तारीफें हुई हैं “लॉरियल प्रोफेशनेल ब्रांड हमेशा इनोवेशन को महत्व देता है और ट्रेंड में रहा है. ट्विंकल खन्ना एक लाजवाब ब्रांड एम्बेसेडर होंगी. वे ग्लैमरस हैं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं और आज की महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं. लॉरियल प्रोफेशनल के लिए खूबसूरती के इस सफर में ट्विंकल का पार्टनर होना बहुत खुशी की बात है.”

मुश्किल है भारत के लिए सीरीज में जीत!

ऑस्ट्रेलिया से पहला टेस्ट मैच 333 रन के बड़े अंतर से गंवाने वाली भारतीय टीम के लिए अब सीरीज में वापसी करना एक बड़ी चुनौती है. ऐसा इसलिए क्योंकि 1932 में टेस्ट क्रिकेट में प्रवेश करने के बाद से अब तक केवल तीन बार भारत पहला टेस्ट हारने के बाद सीरीज जीतने में सफल रहा है.

भारतीय टीम को चार टेस्ट मैचों की सीरीज में वापसी करने के लिए इंग्लैंड के खिलाफ 1972-73 की सीरीज, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 2001 की सीरीज और श्रीलंका के खिलाफ 2015 की सीरीज से प्रेरणा लेनी होगी, जिनमें पहला टेस्ट मैच हारने के बाद टीम ने जबर्दस्त वापसी की थी. वैसे इनमें से केवल भारत-इंग्लैंड सीरीज ही ऐसी थी जिसमें चार या इससे अधिक टेस्ट खेले गए थे. बाकी दोनों सीरीज तीन-तीन टेस्ट मैचों की थी.

भारत ने हालांकि दो अवसरों पर वेस्टइंडीज के खिलाफ 1987-88 में और इंग्लैंड के खिलाफ 2002 में चार टेस्ट मैचों की दोनों सीरीज का पहला मैच गंवाने के बाद सीरीज में 1-1 से बराबर की थी.

भारत कुल आठ बार पहला टेस्ट हारने के बाद सीरीज ड्रॉ कराने में सफल रहा है. भारत के लिए यह आंकड़ा थोड़ा राहत देने वाला है कि सीरीज के पहले टेस्ट मैच की तुलना में दूसरे टेस्ट मैच में उसका रेकॉर्ड बेहतर रहा है.

भारतीय टीम ने अब तक दो या इससे अधिक टेस्ट मैचों की सीरीज के पहले टेस्ट मैच के रूप में खेले गए 140 मैचों में से 38 में जीत दर्ज की जबकि 52 में उसे हार का सामना करना पड़ा. एक मैच टाई रहा और बाकी 49 अनिर्णीत समाप्त हुए. सीरीज के दूसरे टेस्ट मैच में हालांकि उसका रेकार्ड 140 टेस्ट, 42 जीत और 38 हार और 60 ड्रॉ का है.

मुझे रोज हील्स पहननी पड़ती हैं. मेरे टखनों में दर्द होता है. क्या इस से मेरे पोश्चर पर असर पड़ेगा.

सवाल

मैं 24 साल की हूं और मौडलिंग करती हूं. रोज हील्स पहननी पड़ती हैं. मेरे टखनों में दर्द होता है. क्या इस से मेरे पोश्चर पर असर पड़ेगा?

जवाब

टखनों में चाहे हलका दर्द हो या ज्यादा, जब भी ऐसा हो तब सतर्क जरूर हो जाएं. टखनों में दर्द का सामान्य कारण चोट या खिंचाव हो सकता है, पर आर्थ्राइटिस भी इस की वजह हो सकती है. इस से आप के पोश्चर पर असर पड़ सकता है. लेकिन आप रोज व्यायाम करती हैं तो धीरेधीरे दर्द ठीक भी हो सकता है. आप कम से कम 20 मिनट तक टखने पर बर्फ की पोटली रख कर भी दर्द से राहत पा सकती हैं. ऐसा 3 दिन तक दिन में 3 बार करें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

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