Download App

भविष्यफल : नहीं संवरता इस से कल

इस देश के लोग काफी तरक्की होने के बावजूद अभी भी इतने अंधविश्वासी हैं कि वे अखबारों, टैलीविजन चैनलों व ज्योतिषियों के बताए हुए भविष्यफल पर यकीन कर के अपना काम करते हैं.

इस बारे में एक 30 साला बेरोजगार लड़के से पूछा गया, तो उस ने बताया कि वह अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद पिछले 3 साल से रोजगार की तलाश में परेशान हो चुका है.

एक निजी कंपनी में तो उस की नौकरी लगना तकरीबन तय था, मगर टैलीविजन चैनल पर अपने भविष्यफल को देख कर वह उस दिन इंटरव्यू देने

के लिए नहीं गया था, क्योंकि उस के भविष्यफल में उस दिन कोई बड़ा हादसा होने का योग बताया गया था.

इस बारे में जब उस ने अपनी मम्मी से सलाह ली, तो उन्होंने भी इंटरव्यू देने जाने से मना करते हुए कहा था कि जब हादसे में तेरी जान ही चली जाएगी, तो तेरी उस नौकरी का क्या करेंगे

उस नौजवान ने निराश हो कर कहा, ‘‘अगर मैं उस दिन टैलीविजन पर अपना भविष्यफल नहीं देखता, तो मुझे उस कंपनी में नौकरी मिल जाती. अब मैं ने अपना भविष्यफल देखना ही बंद कर दिया है.’’

ऐसे ही भविष्यफल के अंधविश्वास में एक 30 साला नौजवान की सही इलाज न मिलने पर मौत हो गई थी. उस नौजवान की अचानक तबीयत खराब हुई, तो उस के मातापिता उसे अस्पताल ले जाने लगे. पर उन के पंडित ने उस दिन का उस का भविष्यफल देखते हुए बताया कि अगर उसे अस्पताल ले जाया जाएगा, तो उस की मौत हो जाएगी, इसलिए उसे घर पर रख कर सुंदरकांड का पाठ कराया जाए.

पंडित की इस सलाह को मान कर उन्होंने उसी समय सुंदरकांड का पाठ कराना शुरू कर दिया. वे आधा पाठ भी नहीं कर पाए थे कि इलाज की कमी में उस नौजवान की मौत हो गई, क्योंकि उसे हार्ट अटैक आया था.

इसी तरह के अंधविश्वास के चलते एक दूसरे शहर में रह कर नौकरी करने वाला बेटा अपने ऐक्सिडैंट के शिकार हुए मातापिता के इलाज के लिए उन के पास समय पर नहीं पहुंच सका था. इस का नतीजा बहुत बुरा हुआ.

उसे जब अपने मांबाप के ऐक्सिडैंट होने की सूचना मिली, तो वह वहां जाने की तैयारी करने लगा. पर उस की पत्नी ने उस दिन वहां जाने से रोकते हुए बताया कि उस दिशा में आज दिशाशूल है. अगर आज वे उस दिशा में जाएंगे, तो उन की भी जान को खतरा हो जाएगा.

पत्नी के कहने पर उस ने दूसरे दिन जाना तय कर लिया था. दूसरे दिन रात में जब वे दोनों पतिपत्नी वहां पहुंचे, तब तक उन के मांबाप की इलाज की कमी में मौत हो चुकी थी.

दिशाशूल और भविष्यफल के राशिफल कुछ नहीं होते हैं. लोग अपनी राशि के भविष्यफल को देख कर डर कर अपने ऐसे कामों को भी नहीं करते हैं, जिन्हें करना उन के लिए बहुत जरूरी होता है.

जैसे किसी की राशिफल में उस दिन हानि का योग होता है, तो उस दिन वह हानि होने के डर से दुखी हो कर कोई काम करता ही नहीं है, क्योंकि वह यह जान लेता है कि उसे आज हानि होगी. वह यह नहीं सोचता है कि उस की राशि का वह ही अकेला शख्स नहीं है.

उसे यह भी सोचना चाहिए कि उस की राशि का एक आदमी कोई अपराध करता है, तो उस के उस अपराध के चलते क्या उस की राशि के सभी लोगों को सजा मिलेगी  

इसी तरह किसी की राशि में उस दिन लाभ है, तो क्या उस की राशि के सभी लोगों को लाभ मिलेगा

हम सभी लोगों को इन भविष्यफलों के बजाय अपना काम सचाई, ईमानदारी और मेहनत से कर के अपने कर्मफल देखने चाहिए.            

 

‘रोड शो’ बनाम ‘जनता दर्शन’ या ‘शक्ति प्रदर्शन’

विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह आक्रामक चुनाव प्रचार करते इससे पहले किसी प्रधानमंत्री को नहीं देखा गया. असल में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान रहे हैं. नरेंद्र मोदी को पता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद उनके अंदर आत्मबल बढ़ जायेगा. पार्टी के रूप में राम के प्रदेश में वनवास काट रही भाजपा को सत्ता का राजकाज मिल जायेगा. राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी चुनाव जीत जायेगा. राज्यसभा में आने वाले दिनों में भाजपा और ताकतवर हो जायेगी. उत्तर प्रदेश के चुनाव का केन्द्र की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा. इसलिये प्रधानमंत्री मोदी किसी भी तरह से कोई कोरकसर छोडना नहीं चाहते.

राहुल-अखिलेश की जोडी बनने के बाद विधानसभा चुनाव में इस जोड़ी का प्रचार अभियान और जनता की भीड़ को देखकर भाजपा के रणनीतिकर सकते में पड़ गये थे. राहुल- अखिलेश की जोड़ी को देखने उतरी भीड़ का जवाब देने के लिये जरूरी हो गया था कि भाजपा की रैली में भी भीड़ दिखाई दे. पहली बार वाराणसी में इस तरह का चुनाव प्रचार देखने को मिला.ऐ सा लग रहा है जैसे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ न हो कर वाराणसी हो गई हो. इस तरह के प्रचार में चुनाव आचार संहिता का पूरी तरह उल्लघंन हुआ.

बसपा की नेता मायावती कहती हैं ‘उच्च पद पर बैठे शख्स के द्वारा आचार संहिता का उल्लघंन पूरी तरह से अनुचित है. निर्वाचन आयोग को तत्काल इस पर कार्रवाई करनी चाहिये.’ भाजपा इसको रोड शो नहीं मानती. केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा ‘पीएम विश्वनाथ मंदिर और काल भैरव दर्शन के लिये गये थे. रास्ते में जन सैलाब उमड आया.’ उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता हदृय नारायण दीक्षित कहते हैं यह रोड शो नहीं जनता का दर्शन था. प्रधानमंत्री अपने क्षेत्र की जनता का दर्शन कर रहे थे.

वाराणसी में रह रहे लोग इसको शक्ति प्रदर्शन मानते हैं. चुनाव आचार संहिता के मसले को देखा जाये तो यह हर दल अपनी अपनी तरह से करता है. जितना बड़ा नेता होता है उतना बड़ा वह चुनाव उल्लघंन करता है. सभी नेता जानते हैं कि चुनाव आचार संहिता के जुड़े मसले केवल चुनाव भर के लिये होते हैं. चुनाव बीत जाने के बाद यह सब फाइलों की शोभा बढ़ाने लगते हैं. ऐसे में नेताओं को चुनाव आचार संहिता का डर खत्म हो गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये यह चुनाव साख का सवाल है. उत्तर प्रदेश की विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा प्रभाव उनकी इमेज पर पड़ेगा. अगर भाजपा यहां सरकार बनाने में सफल नहीं होती तो भाजपा के अंदर मोदी और उनके मनचाहे फैसलों के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो जायेगी. अगर यहां जीत मिलती है तो पार्टी में मोदी की हर चुनौती खत्म हो जायेगी. उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले और दूसरे चरण की वोटिंग में भाजपा को बढ़त नहीं दिखी तब नरेंद्र मोदी को आक्रामक प्रचारशैली का सहारा लेकर चुनाव मैदान में उतरना पड़ा.

विकास की बात करने वाली भाजपा ने वोटर धुव्रीकरण का काम शुरू किया. वोटर धुव्रीकरण को लेकर देखने वाली बात यह है कि जितना भाजपा को अपने प्रयासों से सफलता नहीं मिली उतनी सफलता विरोधियों के प्रचार से मिली. राहुल-अखिलेश गठबंधन के बाद बसपा ने जिस तरह से मुसलिमों को सबसे ज्यादा टिकट दिया उसका जवाब देते भाजपा ने एक भी मुसलिम को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया. इससे बसपा का दलित भी हिन्दुत्व के पक्ष में खडा हो गया. चुनाव में आगे चल रही बसपा इसी दांव से पिछड़ गई और भाजपा मजबूत होती गई.            

नौकरशाही : आया ऊंट पहाड़ के नीचे

बिहार कर्मचारी चयन आयोग (बीएसएससी) की परीक्षा के पर्चा लीक कांड में आयोग के चेयरमैन सुधीर कुमार की गिरफ्तारी के बाद एक और आईएएस सीके अनिल पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है. अनिल बीएसएससी के ओएसडी हैं और उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया है. एसआईटी उन्हें दबोचने के लिए रणनीति बना रही है. पेपर लीक मामले में एसआईटी को अनिल के खिलाफ कई पक्के सबूत मिल चुके हैं. इससे पहले 1982 बैच के आईएएस सुधीर कुमार को हजारीबाग  से गिरफ्तार किया गया था. सुधीर को भगाने और उन्हें नया सिम कार्ड मुहैया कराने में अनिल का ही हाथ होने के सबूत मिले हैं.

सुधीर कुमार की गिरफ्तारी के बाद आईएएस लौबी और सरकार के बीच रस्साकस्सी का खेल शुरू हो गया है. आईएएस एसोसिएशन अपने साथी की गिरफ्तारी का विरोध कर रहा है और मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रहा है. 26 फरवरी से ही राज्य के तमाम आईएएस काला बिल्ला लगा कर काम कर रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि वह एसोसिएशन के मेमोरेंडम का इंतजार कर रहे है, पर एसोसिएशन उनके पास नहीं जा कर राज्यपाल और बिहार विधान सभा के अध्यक्ष से मुलाकात कर रहा है. नीतीश मुस्कुराते हुए कहते हैं-‘मुझसे न कोई मिलने आया और न ही मेमोरेंडम ही भेजा गया’. 26 फरवरी को आईएएस एसोसिएशन के 100 सदस्यों ने राजभवन के सामने एक दूसरे का हाथ थाम कर श्रृंखला बनाई और राज्यपाल से गुहार लगाई कि मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए. एसोसिएशन के सचिव विवेक सिंह की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की. एसोसिएशन ने यह भी फैसला लिया है कि सरकार के किसी भी मौखिक आदेश को नहीं मानेंगे.

आईएएस एसोसिएशन के समर्थन में कई कर्मचारी संगठन भी सामने आने लगे हैं, जिसस आईएएस का आंदोलन मजबूत और तेज होने लगा है. एसोसिएशन सुधीर कुमार की जमानत के लिए कोर्ट जाने की तैयारियों में लगा हुआ है. 28 फरवरी को मुख्य सचिवालय में मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह की अगुवाई में योजना और विकास विभाग की खास बैठक होनी थी. बैठक में विभागीय खर्च का लेखा-जोखा पेश किया जाना था और खर्च की गति को तेज करने के लिए सभी जिलों के जिलाधीशों और अफसरों के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग होनी थी. उस बैठक में योजना और विकास विभाग के संयुक्त सचिव अरविंद चौधरी के अलावा कोई अफसर नहीं पहुंचा.

मुख्यमंत्री नीतीश व्यंग्य के लहजे में कहते है कि किसी का चेहरा देख कर जांच नहीं हो रही है और न ही किसी तरह का कोई समझौता किया जाएगा. एसोसिएशन के सीबीआई जांच की मांग पर नीतीश कहते हैं कि किसी भी मामले की सीबीआई से जांच करने की मांग का फैशन चला हुआ है. कभी-कभी तो यह लगता है कि जांच में बाधा डालने के लिए कहीं सीबीआई जांच की मांग तो नहीं की जाती है? ब्रहमेश्वर मुखिया हत्याकांड, मुजफ्फरपुर का नवरूणा अपहरण केस, पत्रकार राजदेव मर्डर केस जैसे कई मामले की जांच सीबीआई कर रही है, पर कोई प्रगति दिखाई दे रही है क्या?

आईएएस लौबी के दबाव की अनदेखी करते हुए नीतीश ने स्पेशल इन्वेस्टीगेश टीम (एसआईटी) से कहा है कि वह किसी तरह के दबाब और बयान से प्रभावित नहीं हों. हमारी सरकार न किसी को बचाएगी और न ही किसी को फंसाएगी. कानून सबके लिए बराबर है.

नीतीश के उलट लालू यादव का मानना है कि सुधीर कुमार एक ईमानदार औफिसर हैं और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है. गौरतलब है कि जब संप्रग सरकार में लालू रेल मंत्री बने तो सुधीर कुमार को अपना सचिव बनाया था. पिछले साल जब लालू के बेटे तेजस्वी यादब बिहार के पथ निर्माण मंत्री बने तो सुधीर कुमार को विभाग का प्रधान सचिव बनाया गया था. लालू के सुर में सुर मिलाते हुए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवामी मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी ने भी सुधीर कुमार को ईमानदार अफसर करार देते हुए कहा है कि महागठबंधन के भ्रष्टाचारी नेताओं को बचाने के लिए सुधीर कुमार को बलि का बकरा बनाया गया है.

पिछले साल भी एक आईएएस औफिसर को घूस लेते हुए दबोचा गया था. बिहार में अपनी पहली ही पोस्टिंग के दौरान 80 हजार रूपए घूस लेने के आरोप में आईएएस औफिसर जितेंद्र गुप्ता दबोचे गए थे. जितेंद्र बिहार के कैमूर जिला के मोहनियां के एसडीओ के तौर पर तैनात थे और 12 जुलाई की रात साढे 9 बजे के करीब उन्हें निगरानी विभाग ने उनके सरकारी क्वार्टर से गिरफ्तार किया था. बिहार में घूसखोरी के मामले में रंगे हाथ आईएएस को दबोचने और जेल भेजने की यह पहली वारदात है. जितेंद्र पर आरोप था कि समेकित चेकपोस्ट पर बड़ी गाड़ियों से जुर्माना वसूल कर उसे परिवहन विभाग में नहीं जमा कराया जाता था. कई दिनों तक जब एसडीओ ने रसीद के बारे में हिसाब-किताब नहीं दिया तो अप्रैल में उन्हें इसके बारे में पत्रा लिखा गया, उसके बाद उन्होंने पत्र के जरिए सूचना दी कि रसीद और उसका हिसाब वह जल्द दे देंगे. उसके 3 महीना गुजर जाने के बाद भी विभाग को रसीद और उसका हिसाब नहीं मिल सका है. 20 जुलाई को बिहार कैडर के 2013 बैच के आईएएस औपिफसर डाक्टर जितेंद्र गुप्त को सस्पेंड कर दिया गया था.

जितेंद्र की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही आईएएस लौबी पूरे तैश में आ गई थी. जितेंद्र की गिरफ्तारी के बाद 3-4 दिनों तक सत्ता के गलियारों और आईएएस लौबी में हाई वोल्टेज ड्रामा चलाता रहा. निगरानी ब्यूरो पर भरपूर दबाब बनाया गया. बिहार आईएएस एसोसिएशन के सचिव विवेक कुमार सिंह और दीपक कुमार सिंह निगरानी ब्यूरो के दफ्तर पहुंचे और महानिदेशक से देर तक बात की. उसके बाद एसोसिएशन के पदाधिकारियों और सदस्यों की लंबी बैठक चली, जिसमें जितेंद्र गुप्ता की गिरफ्तारी का विरोध किया गया. एसोसिएशन ने अपने औफिसर को बचाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक से भी मुलाकात की, पर बात नहीं बन सकी.

वहीं निगरानी ब्यूरो का तर्क है कि मोहनियां में ओवरलोडिंग के आरोप में जिन 4 ट्रकों को पिछले 3 जुलाई से रोक कर रखा गया था, उन ट्रकों के कागजात जितेंद्र के सरकारी क्वार्टर में लगी उनकी गाड़ी से बरामद किया गया. जब ट्रक को जब्त किया गया तो उसके कागजात को एसडीओ ने 10 दिनों तक अपने पास क्यों रखा? उसका सीजर लिस्ट क्यों नहीं बनवाया गया? सीजर लिस्ट की एक कौपी ट्रक ड्राइवर और दूसरी कौपी लोकल थाना को क्यों नहीं भेजा गया? नेशनल हाईवे पर ओवर लोडेड ट्रकों की जांच के दौरान एसडीओ ने डीटीओ और एमवीआई टीम को साथ क्यों नहीं लिया? ट्रक जब्त करने के 10 दिन बीत गए पर उस पर कोई जुर्माना तक क्यों नहीं लगाया गया? उन्हीं चारों ट्रकों को छोड़ने के लिए उन्हें 80 हजार रूपया घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.

मंत्रियों, विधायकों, सांसदों समेत पूरे शासन और प्रशासन को अपने इशारे पर नचाने वाले नौकरशाहों की चाल इस बार उलटी पड़ती दिख रही है. नीतीश कुमार आरोपी आईएएस को बख्शने के मूड में नहीं हैं और आईएएस लौबी लगातार सरकार पर दबाब बना रही है कि उनके साथी सुधीर कुमार को रिहा किया जाए. हवा यह भी फैलाई जा रही है कि सुधीर कुमार और सीके अनिल से नीतीश की पुरानी खुन्नस है और उसी वजह से उन्हें फंसा दिया गया है.  

मैं सिर्फ अपने काम पर ध्यान देता हूं : विद्युत जामवाल

एक्शन हीरो के रूप में अपनी पहचान रखने वाले विद्युत जामवाल का दावा है कि उनसे बेहतर स्टंट करने वाला पूरे विश्व में कोई नही है. तभी तो वह फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ में कार के नीचे से स्लिप करते हुए, छोटी छोटी खिड़कियों से बाहर कूदते हुए नजर आ रहे हैं. मजेदार बात यह है कि आज वह जो कुछ हैं, उसमें उनकी मां का भी योगदान है. उनकी मां केरला में आश्रम चलाती हैं ओर उसमें कलारी पयट्टू सिखाती है.

कलारी पट्टू सिखाते हुए आपकी मां ने क्या पाया?

– अब तक उन्होंने हजारों लोगों को सिखाया होगा. अब सीखने के बाद कौन क्या मम्मी से कहकर गया मुझे नहीं पता. पर मेरी मम्मी ने लोगों को इतनी चीजें दी हैं कि उसी के बदले में जो आशीर्वाद मिला, वह आशीर्वाद मुझे मिला. मैं गैर फिल्मी परिवार से हूं. पर मुझे फिल्मों में आसानी से काम करने का मौका मिल गया. बहुत कम समय में मेरी पहचान एक सफल एक्शन हीरो के रूप में हो गयी. मेरे लिए तो यह बड़ी उपलब्धि है. अब मेरी मां से किसने क्या कहा पता नहीं? पर मां ने जो काम किया, उसकी वजह से मुझे इतना आशीर्वाद मिला कि मैं सफल हूं.

यानी कि आप मानते हैं कि बालीवुड में गैर फिल्मी लोगों के लिए अपनी जगह बनाना कठिन हैं?

– जी हां! बहुत कठिन है. यहां प्रवेश पाने के लिए अपनी कला पर इतनी मेहनत करनी पड़ती है कि लोगों कि निगाहें आपकी कला पर से हट ना पाएं. मेरी मां को लोगों ने बहुत दुआएं दी हैं, जिसका फल मुझे मिल रहा है.

आप विदेशों में लाइव शो करते हुए भी सफल थे. तो फिर फिल्मों की तरफ रूझान कैसे हो गया?

– यदि आपको किसी क्षेत्र में बड़ा नाम बनाना है, तो बड़े कारनामे करने पड़ेंगे. मैं दो दिन पहले जोधपुर गया था. मैं जिस होटल में रूका हुआ था, उस होटल में मेरी मुलाकात कुछ उम्दा गायकों से हुई, पर उन्हें हम लोग नहीं जानते हैं. क्योंकि वह तो सिर्फ वहीं स्थानीय लोगों के बीच गाते रहते हैं. यदि ऐसे गायकों व संगीतकारों को नुसरत फतेह अली खान बनना है, तो बालीवुड जैसी जगहों पर आना पडे़गा. कहने का अर्थ यह कि बडे़ पैमाने पर एक्शन करने के मकसद से मैं फिल्मों से जुड़ा.

‘‘कमांडो’’ और ‘‘कमांडो 2’’ के बीच क्या फर्क है?

– जब मैंने पहली फिल्म ‘‘कमांडो’’ की थी, उस वक्त बालीवुड में लोगों को हिलाने की जरूरत थी. किसी कलाकार को एक्शन हीरो के रूप में लांच करना आसान नहीं था. जब विपुल अमृत लाल शाह से मेरी मुलाकात हुई थी, तो मैंने उनको बताया था कि मैं अपने सारे स्टंट खुद ही करना चाहता हूं. क्योंकि मैं निजी जीवन में स्टंट के लाइव शो करता रहता हूं. मैंने उनसे कहा था कि बालीवुड में लोगों को हिलाने के लिए यही करना होगा. मैंने ‘कमांडो’ में ऐसे एक्शन सीन किए कि लोग देखकर हैरान रह गए. जब हमने ‘‘कमांडो 2’’ पर काम शुरू किया, तो लोग सवाल कर रहे थे कि अब इसमें आप क्या करेंगे? आपने ‘कमांडो’ में सब कुछ दिखा दिया. पर ‘‘कमांडो 2’’ के ट्रेलर ने लोगों की जुबान पर ताला लगा दिया. वह हैरान हैं और बोल नही पा रहे हैं. लोग अंदर से हिले हुए हैं. गाड़ी के नीचे से निकलना लोगों को भले आसान लगता हो, पर जान निकल जाती है. मैं तो डमी का उपयोग नहीं करता. मेरे कद काठी का कोई डमी मिलेगा नहीं. मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि ‘कमांडो 2’ में जो उम्दा एक्शन है, उसे कोई छू भी नहीं सकता. लोग ‘फेसबुक’ पर लिखते हैं कि मैं भारत में सर्वश्रेष्ठ एक्शन कर रहा हूं, पर मैं सभी को बताना चाहता हूं कि मैं पूरे विश्व में सबसे उम्दा एक्शन कर रहा हूं. मैं तो दावे के साथ कहता हूं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी कलाकार मेरे जैसा एक्शन या स्टंट सीन नही कर सकता.

फिल्म ‘‘कमांडो 2’’ के निर्देशक देवेन भोजानी की पहचान उम्दा हास्य अभिनेता की है. उन्होंने कुछ हास्य सीरियल निर्देशित भी किए हैं. जबकि ‘‘कमांडो 2’’ तो एक्शन फिल्म है. ऐसे में आप दोनों के बीच सामंजस्य कैसे बैठा?

– देवेन भोजानी बहुत बड़े स्टार हैं. जब मैं स्टारडम की एबीसीडी भी नहीं जानता था, तब उन्होंने स्टारडम देखा था. कलाकार वही होता है, जो अच्छा अभिनय कर ले. वह बेहतरीन हास्य अभिनेता हैं. इसमें कोई दो राय नहीं. पर वह परदे पर बहुत अच्छा इमोशन भी कर लेते हैं, ड्रामा भी कर लेते हैं. तो उनसे मुझे कलाकार के तौर पर बहुत मदद मिली. वह हर इमोशन को खुद करके दिखाते थे. उन्हें 25 वर्ष का अनुभव है. यह अनुभव वैसे ही बहुत कुछ मजबूत कर देता है. आप जब फिल्म देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि उन्होंने एक एक चीज पर ध्यान दिया है.

जब आप पूरे विश्व के सामने अपने बेहतरीन एक्शन हीरो की बात पहुंचाना चाहते हैं, तो फिर ‘कमांडो 2’ में नाच गाने की जरुरत क्यों महसूस हुई?

– यह निर्माता जाने. निर्माता ने कहा कि आप अच्छा डांस कर लेना, मैंने डांस भी अच्छा कर लिया. इमोशन अच्छे देना है, तो मैं दे दूंगा. मैं एक कलाकार हूं. मैं सिर्फ अपने काम पर ध्यान देता हूं. मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या कर रहा है? हिंदी फिल्मों में लड़कियां गाना गाती हैं, नाच होता है. निर्माता चाहता है, तो मुझे एतराज भी नहीं.

‘‘कमांडो’’ से शोहरत बटोरने के बाद आपने ‘‘बुलेट राजा’’ में छोटा सा किरदार निभाया. यह बात समझ में नहीं आयी?

– तिग्मांशु धुलिया जिस तरह की फिल्में बनाते हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित था. मैंने बचपन मे उनके द्वारा निर्देशित फिल्म ‘‘हासिल’’ देखी थी. ऐसी फिल्म बनाना हर निर्देशक के बस की बात नहीं है. मैं उनके साथ फिल्में करना चाहता था. मैं उन्हें प्रभावित करना चाहता था कि आप मुझे अपनी अगली फिल्म में हीरो लो. इसलिए मैंने ‘बुलेट राजा’ में छोटा सा किरदार निभा लिया. उस छोटे से किरदार में मैंने इतना बेहतरीन काम किया कि उन्होंने मुझे उसके बाद फिल्म ‘‘यारा’’ में हीरो बना दिया. देखिए, हम कलाकारों को बार बार अपनी क्षमता साबित करनी पड़ती है. मैं तो उनमें से हूं, जो दो मिनट के किरदार में भी इतना चमकेगा कि पूरा हिंदुस्तान देखना चाहेगा. हम कोई फिल्म स्टार के बच्चे तो हैं नहीं. मुझे तो ‘बुलेट राजा’ में छोटा सा किरदार करना भी गर्व की बात लगी. इस फिल्म के रिलीज के तीन माह बाद तिग्मांशु धुलिया ने फोन करके कहा कि मैं उनकी फिल्म ‘यारा’ का हीरो हूं.

अदा शर्मा के साथ काम करने के अनुभव क्या रहे?

– बहुत अच्छे अनुभव रहे.

आप किसे अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं?

– मेरी किसी से प्रतिस्पर्धा नही है. मेरी प्रतिस्पर्धा अपने आप से है. मैं अपने हर सह कलाकार को दोस्त मानता हूं, दुश्मन नहीं. मैं दूसरों के जूतों में अपना पैर रखने की कोशिश नहीं करता. मेरे अंदर असुरक्षा की कोई भावना नहीं है. मैं हर काम निडरता के साथ करता हूं.

आपको नहीं लगता कि आप खुद एक एक्शन फिल्म को निर्देशित करें?

– जी नहीं! अभी तो अभिनय करने में मजा आ रहा है. इंसान को जिस काम में मजा आए, वही करना चाहिए. दूर की कभी नहीं सोचना चाहिए. मैं फिलहाल बेहतर से बेहतर कलाकार बनना चाहता हूं.

क्या आप हर दिन मार्शल आर्ट की प्रैक्टिस करते हैं?

– जी हां! जब जितना समय मिल जाए. 

बंद होते स्टूडियो के लिए इन्हें जिम्मेदार मानते हैं विक्रमादित्य

2001 में कारपोरेट सिस्टम की तर्ज पर काम करते हुए जी टीवी ने फिल्म ‘गदर एक प्रेम कथा’ का निर्माण कर बौलीवुड में हौलीवुड की तर्ज पर कई कारपोरेट कंपनियों यानी कि फिल्म स्टूडियो के शुरू होने का रास्ता साफ कर दिया था. इन स्टूडियो ने जमकर पैसा बांटा, मगर 2008 में पूरे विश्व में आई आर्थिक मंदी के चलते यह ढांचा हिला था. पर फिर संभल गया. 2011 के बाद भारत में डिजनी, फाक्स स्टार जैसे स्टूडियो आए और फिल्म निर्माण में लग गए. लेकिन 2016 में अचानक पांच छह स्टूडियो बंद हो गए. इन सभी ने हिंदी फिल्मों के निर्माण से तोबा कर ली. जो स्टूडियो कार्यरत हैं, उनकी हालत भी पतली है. आखिर इस तरह स्टूडियो के बंद होने के लिए कौन जिम्मेदार है?

इस मसले पर जब हमने ‘‘फैंटम फिल्मस’’ नामक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी से जुडे़ और ‘उडा़न’, ‘लुटेरा’ जैसी फिल्मों का निर्देशन करने के बाद प्रदर्शन के लिए तैयार फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ के निर्देशक  विक्रमादित्य मोटवणे से बात की, तो उन्होंने कहा -‘‘पूरा सच तो मुझे पता नहीं. पर मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इन स्टूडियों की फिल्म निर्माण को लेकर जो सोच थी, वह गलत रही. स्टूडियो के कर्ताधर्ता दर्शकों की पसंद भांप नहीं सके. शायद उन्होंने गलत फिल्म, निर्देशक या गलत कहानी चुन ली. गलतियां तो सबसे होती हैं. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं गलत निर्णय लेते हुए कलाकारों को जरूरत से ज्यादा पैसे दे दिए गए. देखिए, दर्शक बदल रहा है. सेटेलाइट टीवी खुलने का असर अब नजर आ रहा है. अब दर्शकों के पास हर दिन बहुत कुछ देखने का अवसर है, तो हम फिल्मकारों को भी उतनी ही गति से आगे बढ़ना पड़ेगा.

2008 में जब पूरे विश्व में मंदी आयी थी, उससे पहले सारे स्टूडियो इस तरह पैसा बांट रहे थे, जैसे कि पानी बहा रहे हों. मेरी भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? आज जब आर्थिक हालात सामान्य हो गए हैं, तब भी लग रहा है कि कलाकार को या यूं कह लो कि स्टार कलाकार को आज भी ज्यादा पैसे मिल रहे हैं. कहीं न कहीं कलाकारों की पारिश्रमिक राशि में कमी करनी पडे़गी. इस सच को तो मानना पडे़गा कि बाक्स आफिस पर फिल्म का चलना बहुत जरूरी है. यदि फिल्में नहीं चली, तो धीरे धीरे निर्माता गायब हो जाएंगे, तब इन स्टारों को लेकर फिल्म कौन बनाएगा? अब आमिर खान व सलमान खान को यह बात समझ आ गयी है. उनकी समझ में आ गया है कि फिल्म का चलना है, फिल्म नहीं चलेगी,तो क्या होगा?’’ 

जब बिरयानी के लिए धोनी ने छोड़ा होटल

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी एक शौकिया व्यक्ति हैं और वे अपने शौक को पूरा करने के लिए कुछ भी कर गुजरने की चाहत रखते हैं. और जब बात हैदराबादी बिरयानी की हो फिर धोनी को इसे खाने से कोई नहीं रोक सकता. एक ऐसा ही किस्सा है धोनी और लजीज हैदराबाद बिरयानी का.

दरअसल बात चैंपियंस लीग 2014 की है जब धोनी की आईपीएल टीम चेन्नई सुपरकिंग्स हैदराबाद के पांच सितारा होटल में ठहरी हुई थी. इसी बीच धोनी के भारतीय टीम के टीम मेट अंबाती रायडु ने अपने घर से उनके व पूरी टीम के लिए घर पर बनी हुई लजीज बिरयानी भेजी, लेकिन जब वे अपने साथियों के साथ बोर्ड रूम में बिरयानी का लुत्फ उठाने लगे तो होटल स्टाफ ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया.

उनका कहना था कि होटल में बाहर के खाना लाने की इजाजत नहीं है. होटल स्टाफ के मना किए जाने पर धोनी समेत टीम के खिलाड़ी नाराज हुए, इसके बाद धोनी ने जो किया वह शायद ही होटल स्टाफ ने कभी सोचा होगा.

धोनी ने तत्काल टीम मैनेजमेंट से होटल की बुकिंग कैंसिल करने के लिए कहा और टीम को उस होटल के प्रतिद्ववंदी होटल में ठहराया. धोनी के जाने का यह असर हुआ कि बीसीसीआई टीम के अन्य सदस्य भी अपनी बुकिंग कैंसिल करा कर वहां से चले गए. इससे भी बड़ी बात यह हुई कि बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन जो अगले दिन होटल में ठहरने वाले थे, वहां नहीं गए. उन्होंने भी अपनी बुकिंग कैंसिल कर दी.

व्हाट्सऐप के नए फीचर में दिखेगा नया टैब

व्हाट्सऐप ने अपने विंडोज ऐप के बीटा यूजर के लिए नए फीचर पेश किए हैं. व्हाट्सऐप के विंडोज बीटा ऐप को 2.17.86 पर अपडेट करने के बाद आपको इंडिविजुअल चैट से जुड़ी ज्यादा जानकारी मिल जाएगी. किसी चैट में जाने पर अब यूजर जान सकते हैं कि उन्होंने कितने टेक्स्ट मैसेज किए हैं और कितनी तस्वीरें व जिफ साझा किए हैं.  इसके साथ ही किसी यूजर ने कितनी मीडिया फाइल साझा की हैं, इसकी जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है. इसके अलावा एक नया साइज टैब भी है जिससे यूजर को पता चल जाएगा कि किसके साथ चैट करने पर कितने स्पेस की खपत हो रही है और ऐप में किस चैट ने सबसे ज्यादा स्टोरेज लिया है.

इसके अलावा एक नया 'साइज' टैब भी है जिससे किसी चैट में साझा की जाने वाली तस्वीरों और वीडियो के साइज की जानकारी मिल जाएगी. व्हाट्सऐप स्पेस की कमी को पूरा करने के लिए ज्यादा जगह लेने वाली चैट को डिलीट करने में यूजर की मदद करना चाहता है.

हालांकि, अभी ये सभी विकल्प बीटा टेस्टर के लिए ही उपलब्ध हैं और आप विंडोज स्टोर में जाकर बीटा यूजर बन सकते है. लेटेस्ट बीटा अपडेट सिर्फ विंडोज 10 मोबाइल और विंडोज 8.1 यूजर को ही सपोर्ट करेगा.
व्हाट्सऐप ने हाल ही में नए स्टेटस फीचर के साथ ऐप में बड़ा बदलाव किया था. यह फीचर एक तरह से स्नैपचैट के फीचर की तरह काम करता है और 24 घंटे के अंदर गायब हो जाता है. हालांकि, इसमें लोगों को फॉलो करने का कोई विकल्प नहीं है और आप सिर्फ व्हाट्सऐप पर मौजूद अपने कॉन्टेक्ट की तस्वीरें ही देख सकते हैं.

चुनावी रोजगार : भीड़ से लेकर साधन जुटाने तक में कमाई

उत्तर प्रदेश में मोहनलालगंज, लखनऊ की एक सुरक्षित विधानसभा सीट है. यहां पर पिछड़ी जातियों की आबादी सब से ज्यादा है. मोहनलालगंज, निगोहां, नगराम और गोसाईंगंज थाना क्षेत्रों तक इस की सीमा फैली हुई है. एक गांव से दूसरे गांव तक जाने के लिए कार

और दूसरी महंगी गाडि़यों से चुनाव प्रचार होता है. अब साइकिल और ट्रैक्टर जैसे साधनों से चुनाव प्रचार नहीं होता. कार और मोटरसाइकिल में पैट्रोल डलवाने का काम उम्मीदवारों का होता है. उम्मीदवार केवल खुद के साथ चलने के लिए ही भीड़ का इंतजाम नहीं करता, बल्कि उस के कुछ खास लोग भी चुनाव प्रचार करते हैं.

भीड़ जुटाने का काम पैसे दे कर किया जाता है. भीड़ कम होती है, तो विरोधी को उम्मीदवार ताकतवर नहीं लगता. ऐसे में हर उम्मीदवार अपने साथ भीड़ ले कर चलना पसंद करता है. उस के प्रचार में नारा लगाती यह भीड़ चुनाव प्रबंधन का नतीजा होती है. बहुत सारे लोगों के लिए चुनाव रोजगार का जरीया बन जाता है.  

नेताओं के लिए चुनाव किसी कारोबार जैसा हो गया है, जहां पर वे पैसे के बल पर हर साधन जुटाते हैं. पहले पार्टियों के कार्यकर्ता अपने दल के उम्मीदवार के लिए जीतोड़ मेहनत करते थे.  कई बार तो उम्मीदवार के पास इतना पैसा भी नहीं होता था कि वह अपने प्रचार में लगे लोगों के खानेपीने का इंतजाम कर सके. कई बार तो प्रचार करने वाले अपने खानेपीने का इंतजाम खुद करते थे.

अब नेताओं को कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती. भीड़ से ले कर चुनाव के दूसरे साधन जुटाने में पैसों का इंतजाम करना पड़ता है. चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खर्च की सीमा को तय कर रखा है. इस खर्च को देखें तो पता चलेगा कि नेता चुनाव लड़ने में तय सीमा के मुकाबले बेहिसाब खर्च करते हैं, पर खर्च हिसाब से दिखाते हैं.

कोई नेता यह नहीं कहता कि उस ने पैसे के बल पर भीड़ जुटाई है. यह काम खुद नेताओं द्वारा न कर के उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो उम्मीदवार का चुनाव संचालन करते हैं. ऐसे में भीड़ जुटाना भी एक तरह का प्रबंधन हो गया है.

भीड़ जुटाने का यह काम गांव से ले कर शहर तक में खूब चल रहा है. गांवों में भीड़ के साथ वाहनों का अलग से इंतजाम करना पड़ता है. नोटबंदी के चलते ज्यादातर उम्मीदवार अब अपने करीबी सहयोगियों को आगे कर के उन को चुनाव प्रबंधन के लिए सहारा बना रहे हैं.

नोटबंदी के चलते बहुत सारे छोटेमोटे कलकारखाने और मजदूरी के काम बंद हैं. ऐसे में खाली बैठे लोग चुनाव प्रचार कर के ही कुछ दिनों की कमाई के जुगाड़ में नेता के समर्थन में नारे लगाते दिख रहे हैं. गांव के मुकाबले शहरों में भीड़ जुटाना ज्यादा मुश्किल और खर्चीला काम होता है. कई लोग अपनी फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को उम्मीदवार के साथ लगा देते हैं.

इस तरह के प्रचारतंत्र में काम कर रहे लोगों का कहना है कि केवल प्रचार करने वाले को ही पैसा नहीं मिलता, बल्कि इंतजाम करने वाले को भी पैसा मिलता है. वह उस में कटौती कर के ही आगे लोगों को पैसा देता है. खानेपीने और वाहन के नाम पर अलग से पैसा लिया जाता है.

पैसों के लेने और देने की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है, जिस से किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगती. इस प्रक्रिया को गापनीय रखना भी सब से बड़ी शर्त होती है, जिस से यह नहीं पता चलता कि पैसा आया कहां से है और जाता कहां है.

पढ़े लिखों की डिमांड

एक तरफ नारा लगाने वाले ऐसे लोगों को भी रोजगार मिलता है, जो कम पढ़ेलिखे या अनपढ़ हैं, दूसरी तरफ उन लोगों के लिए भी रोजगार हैं, जो ठीकठाक पढे़लिखे हैं. ऐसे लोग नारा लगाने का काम नहीं करते हैं.

ये उम्मीदवार के दफ्तर का काम देखते हैं. कंप्यूटर, मोबाइल और लैपटौप चलाने वालों को खास अहमियत दी जाती है. ये लोग ही दफ्तर के जरीए उम्मीदवार के चुनाव प्रचार के लिए रणनीति बनाते हैं. दूसरा उम्मीदवार कैसे अपना चुनाव संचालन कर रहा है, इस पर भी नजर रखते हैं. अब ह्वाट्सएप और सोशल मीडिया को हैंडिल करने के लिए अलग से टीमें बनने लगी हैं.

दफ्तर में काम करने वाले यही लोग चुनाव में वोटर परची तैयार करने, उन को घरघर तक पहुंचाने का काम भी करते हैं. चुनाव के दिन वोटर घर से निकल कर उन के उम्मीदवार को वोट दे, यह कोशिश भी उन्हें करनी पड़ती है. ऐसे काम करने के लिए अलगअलग तरह के ‘पेड वर्कर’ होने लगे हैं.

कई उम्मीदवार तो चुनाव के सालों पहले से ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ लेते हैं. चुनाव के समय ऐसे लोगों की तादाद बढ़ जाती है. शहर से ले कर देहात तक कई स्वयंसेवी संगठन भी अपने लैवल पर उम्मीदवार के प्रचार का जरीया बन जाते हैं.

हिसाब किताब का बोझ

चुनाव आयोग की बंदिशों ने बहुत सारी कागजी कार्यवाही को बढ़ा दिया है. उन को पूरा करने के लिए जानकार लोगों की जरूरत होती है. ऐसे में वकीलों और हिसाबकिताब रखने वालों की मांग भी चुनाव में बढ़ जाती है. इस के लिए भी पैसा देना पड़ता है.

तहसील लैवल पर काम करने वाले बहुत सारे वकील चुनाव में ऐसे कामों में लग जाते हैं. कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो कई बार दूसरों को चुनाव लड़ाते हैं. ऐसे लोगों को चुनाव प्रबंधन में माहिर माना जाता है.

ऐसे ही प्रबंधन को संभाल रहे एक आदमी का कहना है, ‘‘उम्मीदवार अपने प्रचार में मसरूफ रहता है. उस के पास समय की कमी होती है. वह प्रचार के लिए फंड का इंतजाम तो कर सकता है, पर उस को कैसे खर्च करना है और उसे लिखतपढ़त में कैसे दिखाना है, जानकार लोग आसानी से कर लेते हैं.

‘‘ये लोग केवल लिखतपढ़त में ही माहिर नहीं होते, बल्कि चुनाव आयोग में उम्मीदवार के नामांकन को दाखिल करने तक में मदद करते हैं. वकील साथ होता है, तो काम आसान हो जाता है.’’

पीआर प्रबंधन भी जरूरी

उम्मीदवारों के लिए यह भी जरूरी होने लगा है कि वे अपनी बात को कैसे कहें. आज केवल अखबारों का ही दौर नहीं है, टैलीविजन चैनलों में भी बात रखनी पड़ती है. अखबारों में छपने वाली खबर को तैयार करने और बातचीत की कला को समझाने वाले लोग भी उम्मीदवार के लिए मददगार होने लगे हैं. ये लोग अखबारों में उम्मीदवार की इमेज को बेहतर तरीके से सामने रखने का काम करते हैं. अब पीआर प्रबंधन करने वाले पैसे ले कर ऐसे कामों को अंजाम देने लगे हैं.

पीआर प्रबंधन वाले लोगों में अखबारों में काम करने वाले ज्यादा होते हैं. ये लोग अखबारों में खबरों को परोसने के माहिर होते हैं. इन को राजनीतिक विषयों और नेताओं के बयानों पर टिप्पणी करने की जानकारी होती है. किस तरह से बयान अखबारों में सुर्खियां बनते हैं, ऐसी बातें नेता पीआर प्रबंधन करने वालों की सलाह मान कर करते हैं.

गांव से ले कर शहरों तक में ह्वाट्सएप ग्रुप चलने लगे हैं. इन ग्रुपों में उम्मीदवार अपने प्रचार की बातें और मुद्दे पोस्ट कराते रहते हैं. पीआर प्रबंधन वाले लोग इस तरह के नएनए रास्ते खोजने लगते हैं, जिन से कम से कम पैसे और समय में ज्यादा से ज्यादा प्रचार होता रहे.

नारा लिखने का काम भी ऐसा ही है. पहले कार्यकर्ता और पार्टी के लोग इस काम को अंजाम देते थे, पर अब पीआर प्रबंधन में लगे लोग इस को करते हैं. चुनाव में बजने वाली सीडी बनाने के लिए भी ऐसे लोगों को खोजा जाता है.

पीआर प्रबंधन के एक जानकार कहते हैं, ‘‘जितना अच्छा पैसा होगा, उतना बड़ा जानकार काम करने को तैयार होगा. पैसा अच्छा होता है, तो दिल्ली, मुंबई तक के लोगों से मदद ली जाती है.

‘‘उम्मीदवार के कहने पर प्रचार करने के लिए कुछ महिला चेहरों का भी इंतजाम हो जाता है. कई बार नामचीन लोगों को बुलाने का काम भी पीआर ही करता है.’’

कम शब्दों में कहें, तो नेता की शख्सीयत कैसी भी हो, मगर उस को चमकाने वाले मिल जाएं, तो चुनाव की बाजी जीती जा सकती है.          

बदल गया है पहनावा भी

 

राजनीति में नेताओं का पहनावा बदल रहा है. आज के दौर में ‘मोदी जैकेट’ का बहुत चलन है. गहरे और हलके रंगों में बिकने वाली यह जैकेट 2 सौ रुपए से ले कर हजारों रुपए की रेंज में मिलती है. चुनाव के समय ऐसे कपड़ों की खपत बढ़ जाती है. कपड़ों के साथ नए किस्म के जूते, तौलिए और गमछे भी खूब बिकते हैं. कुछ फैशनेबल नेताओं ने लिनन के कपडे़ पहनने शुरू किए हैं. बड़ी तादाद में नेता खादी और हैंडलूम के कपड़े पहनने लगे हैं. छोटे नेताओं में पावरलूम से बने कपडे़ पहनने का क्रेज है. नेताओं की जेब के हिसाब से खादी के कपडे़ दुकानों में मिलने लगे हैं. इस महंगाई के दौर में भी इन दुकानों में एक हजार रुपए खर्च कर के नेता बना जा सकता है.

 

कपड़ों के एक दुकानदार राम प्रसाद का कहना है, ‘‘लखनऊ के दारुलशफा में छोटेछोटे नेता अपने जिले से यहां आते हैं. रास्ते में उन के कपड़े गंदे हो गए या वे लाना भूल गए, तो यहां दुकान से कुरतापाजामा और गमछा ले कर नेता बन जाते हैं. यहां सस्ती दरों पर कपड़े मिल जाते हैं, इसलिए लोग यहां कपड़े लेना पसंद करते हैं.’’

 

यहां कुरतापाजामा और शर्ट का कपड़ा सौ रुपए से ले कर 250 सौ रुपए प्रति मीटर मिलता है. पैंट का कपड़ा 2 सौ रुपए से ले कर 5 सौ रुपए प्रति मीटर में बिकता है. यहां जैकेट 3 सौ रुपए से 4 सौ रुपए में मिलती है.

 

दारुलशफा के अलावा कुछ नेता श्री गांधी आश्रम में भी खरीदारी करते हैं. यहां खादी के कपड़े दारुलशफा से महंगे मिलते हैं. नई उम्र के नेता कुरते की जगह शर्ट पहनना पसंद करने लगे हैं. खादी की शर्ट 4 सौ रुपए से 12 सौ रुपए के बीच मिलती है. ऐसे कपड़ों को पहनने वाले नेताओं का मानना है कि आजकल खादी की जगह मसलिन खादी का चलन बढ़ रहा है. यह खादी 250 रुपए से 17 सौ रुपए प्रति मीटर तक में मिलती है. खादी और सिल्क की बनी सदरी भी रेडीमेड मिलने लगी हैं. इन की कीमत 13 सौ रुपए से ले कर 21 सौ रुपए तक हो सकती है.

 

सिल्क से बने कुछ कपडे़ महिला नेताओं को भी पसंद आते हैं. इन में सलवारसूट और साड़ी खास होती हैं. इन की कीमत 75 सौ रुपए तक होती है.

 

लिनन से तैयार कपड़े आजकल लोगों को खूब पसंद आने लगे हैं. कई बड़े नेता इस को पहनना पसंद करते हैं. लिनन का कुरता, शर्ट और पाजामे का कपड़ा एक हजार रुपए प्रति मीटर से ले कर 4 हजार रुपए प्रति मीटर में मिलता है. लिनन से तैयार जैकेट 2 हजार रुपए से 3 हजार रुपए तक में मिल जाती है. खादी के कुरतों में अब सफेद रंग के अलावा रंगीन कपड़ों का भी चलन बढ़ रहा है.

 

कुछ बडे़ नेताओं की पसंद पर भी खादी का कपड़ा तैयार किया जाता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई बार गांधी जयंती के मौके पर गांधी आश्रम आते हैं. यहां उन्हें महीन खादी के सूत को दोगुना कर तैयार किए गए कपडे़ पसंद आते हैं. मुलायम सिंह यादव सुपरफाइन मसलिन खादी पहनते हैं. यह बहुत पतली और आरामदायक होती है.

दुनिया को तोड़ें नहीं, जोड़ें

दुनिया का मौसम बदल रहा है. पर्यावरण तो प्रदूषित हो ही रहा है, हर देश में शासन ऐसे लोगों के हाथों में आ रहा है जो संकुचित सोच वाले हैं और जब बोलते हैं तो जहर उगलते हैं और कुछ करते हैं तो शहर ही नहीं पूरे देश गंदे हो जाते हैं. हम तो ऐसे नेताओं के आदी हैं ही लेकिन अब अमेरिका हम से बाजी मार ले गया. अमेरिका ने राष्ट्रपति चुनावों में डौनल्ड ट्रंप को चुना, जो 2 माह बाद भी अपना सही कैबिनेट नहीं बना सका है, पर उसे परवा नहीं है.वह जब बोलता है या व्हाइट हाउस के ओवल रूम में बैठ कर कोई आदेश निकालता है तो उसे इस की चिंता नहीं होती कि इस से कहां किस का दम घुटेगा. इंगलैंड की जनता ने भी यूरोपीय यूनियन से निकलने का फैसला ले कर ट्रंप को जिताने जैसा बरबादी वाला कदम उठाया है. फ्रांस में ला पेन नाम की पुरातनपंथी पार्टी कोयले से चलने वाले इंजन मानो वापस लाने को तैयार है, जो धुएं से दम घोट दें.

भारत में नोटबंदी के जहर का असर अभी भी बाकी है पर फिर भी राज्यों के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी दमखम से उतरी. यानी दुनिया के ज्यादातर देशों की जनता को न प्रकृति के पर्यावरण की चिंता है न राजनीतिक प्रदूषण की. लोकतंत्र ने हरेक को वोट देने का हक दिया है कि आगे आने वाली पीढि़यों की सुरक्षा का बंदोबस्त उन के अपने मातापिता वोट देते समय कर सकें, पर यहां तो लगता है कि लोकतंत्र के वोटरों और इसलामी देशों के हथियारबंद जिहादियों में कुछ खास फर्क नहीं. दोनों ही अपनेअपने देशों को नष्ट करने में लगे हैं.

यह दुनिया बनी भी तो जंगलों में रहने लायक थी. बस लाखों ने आज और अब की नहीं कल की सोची. तरहतरह की किताबें लिखी गईं. दुनिया के रहस्य जानने के लिए कोई एवरेस्ट पर चढ़ा तो कोई गहरे समुद्र में गया. लोगों ने चांद पर जाने के लिए वाहन बनाए तो आम आदमी को दुनिया भर में घंटों में पहुंचाने के लिए हवाईजहाज बनाए. सरकारों ने इन का कितना साथ दिया यह आकलन करना कठिन है पर सरकारों ने बहुतों को रोका, यह साफ है. अब इस रुकावट को शासन का तरीका माना जाने लगा है. हर देश में शासक अपने बाशिंदों को काले मध्य युग के से आदेश देने लगा है. दुनिया की जेलों में जगह नहीं बची है. हर जगह एक डर बैठ रहा है कि अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने, शहरों के प्रदूषण से, समुद्र में गंद भरने से ज्यादा नुकसान होगा या शासकों की गैर जिम्मेदारियों से.

आज का किशोर भ्रमित है कि कल क्या होगा  जिन्होंने अमेरिकाइंगलैंड जा कर पढ़ने की सोची थी उन का सपना धुंधला पड़ गया है. कल किस देश में सीरियाई आपसी युद्ध की बीमारी न फैल जाए यह अंदेशा होने लगा है. सारी दुनिया एक है, यह भ्रम टूट रहा है. जैसे गरमी के अंधड़ अपने साथ धूल लाते हैं, वैसा डर हर मन में धीरधीरे आ रहा है. उम्मीद करिए कि सद्बुद्धि जागेगी और लोग दुनिया को तोड़ेंगे नहीं, जोड़ेंगे.

खुद की चढ़ाई बलि

साल 2017. 31 जनवरी की सुबह. सूरज पूरी तरह नहीं निकला था. चारों ओर हलका अंधेरा था. तकरीबन 6 बजे राजरप्पा मंदिर का दरवाजा खुला. अपनेअपने हाथों में पूजा के थाल लिए लोग अंदर जाने लगे. एक नौजवान तड़के 5 बजे से ही मंदिर के बाहर खड़ा था. कुछ देर तक वह मंदिर के आसपास चक्कर लगाता रहा, उस के बाद पास की ही भैरवी नदी में नहाने लगा. नहाने के बाद वह नौजवान नए कपड़े पहन कर मंदिर के अंदर गया और काफी देर तक पूजापाठ करता रहा. उस के बाद उस ने 15 बार मंदिर के चक्कर लगाए, फिर वह धीमे कदमों से मंदिर से बाहर निकला और बलि वेदी के पास पहुंच गया. वहां जमीन पर बैठ कर वह कुछ देर तक इधरउधर देखता रहा.

इस दौरान उस ने कई बार अपने गले पर हाथ फेरा. उस के बाद मुख्य दरवाजे के पास बैठ कर उस ने धारदार हथियार से अपना गला रेत डाला. नतीजतन खून से लथपथ उस का जिस्म फर्श पर तड़पने लगा और कुछ पल में ही उस का जिस्म शांत पड़ गया. मंदिर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच के बाद मंदिर के प्रशासन और पुलिस को इस मामले की हकीकत का पता चला. झारखंड के राजरप्पा इलाके के छिन्नमस्तिका मंदिर में 31 जनवरी की सुबह एक नौजवान ने खुद की ही बलि चढ़ा दी. उस ने मंदिर की बलि वेदी के पास बैठ कर धारदार हथियार से अपना गला रेत लिया. फर्श पर खून ही खून नजर आ रहा था.

मंदिर में जमा लोगों के बीच अफरातफरी मच गई. मंदिर को तुरंत बंद कर दिया गया. राजरप्पा मंदिर में इस तरह की यह पहली वारदात हुई है. मंदिर में पशु बलि की प्रथा तो है, पर पहली बार किसी इनसान ने अपनी बलि दी. बलि देने वाले नौजवान की पहचान बिहार के बक्सर जिले के सिमरी ब्लौक के बलिहार गांव के संजय नट के तौर पर हुई है.

35 साला संजय नट सीआरपीएफ का जवान था. उस के पिता हृदय नट बिहार मिलिटरी पुलिस में सिपाही हैं. संजय नट की साल 2008 में सीआरपीएफ में बहाली हुई थी. फिलहाल वह ओडिशा के नौपाड़ा में सीआरपीएफ की 216 बटालियन में तैनात था. मंदिर के पुजारी ने पुलिस को खबर की और पुलिस ने मौके पर पहुंच कर लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. संजय नट की पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उस के घर वालों को सूचना दी गई. संजय नट के परिवार और गांव वालों को यकीन ही नहीं हो रहा है कि उस ने खुदकुशी कर ली है.

संजय नट की बीवी शारदा देवी ने बताया कि फिलहाल उन्हें कोई टैंशन नहीं थी और वे काफी खुशमिजाज इनसान थे. कोई यह मानने को तैयार ही नहीं है कि संजय नट जैसा जांबाज और हंसमुख इनसान खुदकुशी जैसा कदम उठा सकता है. संजय नट के घर वाले इस के पीछे कोई बड़ी साजिश मान रहे हैं और सरकार से इस मामले की पूरी छानबीन करने की गुहार लगाई है. संजय नट की बीवी शारदा देवी ने बताया कि 15 जनवरी, 2017 को वे छुट्टी पर घर आए थे. 29 जनवरी को वे हंसतेमुसकराते ड्यूटी जौइन करने घर से निकले थे. उन्होंने फोन कर के बताया भी था कि ओडिशा पहुंच कर ड्यूटी जौइन कर ली है. पता नहीं, वे कैसे झारखंड के राजरप्पा के छिन्नमस्तिका मंदिर पहुंच गए

संजय नट की मां भगीरथी देवी कहती हैं कि संजय अपनी नौकरी और परिवार से पूरी तरह खुश था. उसे किसी बात की पीड़ा नहीं थी. उस ने खुदकुशी नहीं की है, बल्कि किसी ने उस की हत्या की है. इस की गहरी छानबीन करने की जरूरत है. संजय नट की बेटी ने पुलिस को अलग तरह का बयान दे कर मामले में नया मोड़ दे दिया है. उस ने बताया कि उस के पिता धार्मिक स्वभाव के थे. वे अकसर कहा करते थे कि उन के ऊपर देवी आती है. खास बात यह है कि संजय नट ने जिस तरह के हथियार से अपना गला रेता था, वैसा ही हथियार मंदिर की देवी के हाथ में है. संजय की बीवी, मांबाप और बाकी घर वाले इस तरह की किसी बात से इनकार कर रहे हैं. सभी एक ही बात कह रहे हैं कि संजय को कोई तनाव नहीं था और न ही वह किसी पोंगापंथी के चक्कर में फंसा हुआ था. वह हर तरह से खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था.

राजरप्पा के थाना इंचार्ज अतिन कुमार ने बताया कि पहली नजर में तो मामला खुदकुशी का ही लग रहा है और मामले की पूरी जांच के बाद ही सचाई सामने आ सकेगी. इस बीच मंदिर के पुजारियों ने इसे  पोंगापंथी की शर्मनाक कारिस्तानी कह डाला. मंदिर के पुजारियों को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था कि किसी की जान गई है, बल्कि वे तो मंदिर के अपवित्र होने से परेशान थे. उन्हें यह डर सताने लगा कि मंदिर में किसी इनसान की लाश मिलने से उन के हजारों भक्त कहीं बिदक नहीं जाएं. इस से उन की मोटी कमाई को धक्का लग सकता था. इस के लिए पुजारियों ने नई नौटंकी रच डाली. पुलिस जब मंदिर से संजय नट की लाश को उठा कर ले गई, तो मंदिर का शुद्धीकरण किया गया. पुजारियों ने 5 गायों के दूध, पांच द्रव्य और 5 नदियों के पानी से मंदिर को अच्छी तरह से धोया. इस में तकरीबन 3 घंटे लगे. साफसफाई के बाद ही मंदिर के मुख्य दरवाजे को खोला गया.

मंदिर की न्याय समिति के सचिव शुभाशीष पंडा ने बताया कि नौजवान का गला रेत कर अपनी जान देना पूरी तरह से खुदकुशी का मामला है और मंदिर का उस से कोई लेनादेना नहीं है. राजरप्पा झारखंड के रामगढ़ जिले में है. कहा जाता है कि राजरप्पा का यह देवी मंदिर तकरीबन 6 हजार साल पुराना है. वहां हमेशा अंधभक्तों की भीड़ लगी रहती है. वैसे, सैंट्रल कोलफील्ड की बड़ी परियोजना की वजह से भी राजरप्पा जाना जाता है. राजरप्पा मंदिर रामगढ़ से तकरीबन 28 किलोमीटर और रांची से 80 किलोमीटर दूर है.

इस मंदिर की सिक्योरिटी के लिए कोई खास इंतजाम नहीं है. मंदिर की सिक्योरिटी होमगार्ड के 4 जवानों के हाथ में है. साल 2010 में मंदिर में मूर्ति चोरी होने के बाद सिक्योरिटी का यह इंतजाम किया गया था. मंदिर में हमेशा सैकड़ों लोगों की भीड़ रहती है और होमगार्ड के 4 जवानों के बूते सिक्योरिटी मुमकिन नहीं है. मंदिर परिसर में कुल 16 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, जिन में से 4 खराब पाए गए हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें