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बेमतलब की सरकारी धौंस

अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा 7 देशों के निवासियों पर अमेरिका में घुसने पर लगाए गए प्रतिबंध और नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए नोटबंदी के फैसले में बेहद समानता है. दोनों फैसलों में आतंकवादियों के नाम पर हर निर्दोष को काला साबित कर दिया गया. दोनों में न कोई विचार हुआ, न संसद का फैसला हुआ. दोनों में बेमतलब की सरकारी धौंस दिखाई गई. दोनों में आम शरीफ लोगों को कतारों में खड़ा होना पड़ा, अपना जीवन आंखों के सामने एक सरकारी आदेश के आगे फलतेफूलते पेड़ के ठूंठ होते दिखा.

डौनल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी जैसे नेता दुनियाभर में पनपने लगे हैं और युवाओं की बिना सीमाओं वाले विश्व की तमन्ना समाप्त होती दिख रही है. आज का युवा इंटरनैट से दुनियाभर से जुड़ा है पर सरकारें इन जुड़े युवाओं पर नक्शों पर खिंची सीमाओं पर पक्की दीवारें बनाने की तैयारी में लगी हैं. पहले कभी रूसियों ने पूर्वी जरमनी का हिस्सा पूर्वी बर्लिन के और खुले पश्चिमी बर्लिन के बीच दीवार बनाईर् थी जो 1989 में टूटी. आज महान नेता पैदा हो रहे हैं जो युवा तमन्नाओं पर दीवारों पर दीवारें बना रहे हैं. हर देश में अपनेपराए का भेद अब गहरा रहा है. धर्म को इस में बड़ा मजा आ रहा है, क्योंकि धर्म के पाखंड से विमुख हो रहे युवाओं को भड़का कर आतंकवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टर बनाया जा रहा है और जो कट्टर होता है वह सर्वव्यापी धर्म के पाखंड और सरकार के प्रचार में भेद नहीं कर पाता. डौनल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी दोनों धर्म की कट्टरता का सरकारी धौंसपट्टी थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

युवाओं का मन धर्म, जाति, रंग, उम्र और यहां तक कि लिंग भेद भी नहीं मानता. उन को तो अपने साथी से मतलब होता है.  फिल्म ‘क्वीन’  की तरह यूथ होस्टलों में एक कमरे में अलग रंगों के, अलग देशों के युवा मजे में एकदूसरे के साथ रह सकते हैं. युवाओं का दिल बड़ा है पर डौनल्ड ट्रंप, नरेंद्र मोदी, फ्रांस की मेरीन ली पेन, टर्की के रिसप एरडोगन अपने देशों में दीवारों की बातें ही नहीं कर रहे, वे युवाओं में अलगाव का जहर भर रहे हैं. मुसलिम देशों में यह कट्टरता की नफरत पहले फैली जब अलकायदा ने धर्म के नाम पर अलगाव करना शुरू किया. इस भयंकर वायरस को दूर करने के बजाय हर देश अपना विषैला वायरस पैदा करने में लग गया है ताकि यह विश्व ‘पा’ के सीमा रहित ग्लोब की तरह न हो, छोटेछोटे समुदायों में बंटा हो, जो धर्म, जाति, रंग, सोच, पैसे आदि पर लड़तेमरते रहें. अमेरिका की बढ़ती बेकारी, यूरोप का आर्थिक संकट, भारत की उलटीपुलटी अर्थव्यवस्था इसी का परिणाम है.

युवाओं को सीमाओं से मुक्त करो, नई दुनिया में शांति और तरक्की होगी. वरना तो बंटाधार होगा, युद्धों की झड़ी लगेगी.

दोस्ती की आड़ में सैक्स नहीं

अंतरा ने जब अपने पिता के ट्रांसफर के कारण नए शहर के एक नए स्कूल में दाखिला लिया तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि उस की खूबसूरती के कारण स्कूल के अधिकांश युवक उस से दोस्ती करना चाहते थे. जिस की वजह से कभी कोई उसे गिफ्ट देता तो कोई चौकलेट. किंतु शहरी लाइफस्टाइल और विपरीतलिंगी दोस्ती के गहरे अर्थों से अनजान अंतरा को यह रहस्य बिलकुल भी पता नहीं था कि इस के पीछे हकीकत क्या है. शुरूशुरू में तो अंतरा को यह सब अच्छा लगता था, क्योंकि उस से दोस्ती करने वालों और उसे चाहने वालों की लाइन जो लगी रहती थी, लेकिन अंतरा वह सब नहीं देख पा रही थी जो असल में इस दोस्ती के पीछे छिपा हुआ था. उस के लिए ऐसी दोस्ती का मतलब केवल बाहर होटल या रेस्तरां में लंच तथा डिनर करना, स्कूल कैंटीन और कौफी हाउस में कोल्डडिं्रक ऐंजौय करना और चौकलेट्स शेयर करना तथा दोस्तों की बर्थडे पार्टियों में केक खाना और मस्ती के साथ नाचगाना करने के रूप में सीमित था.

इन सब पार्टियों के कारण अंतरा अकसर स्कूल से अपने घर बड़ी देर से लौटती थी. उस के मम्मीपापा भी ज्यादा टोकाटाकी नहीं करते थे. इसलिए अंतरा खुल कर इन पलों को जी रही थी, लेकिन अंतरा के साथ एक दिन जो घटा उस की उस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी. संयोग से एक दिन गौरव का बर्थडे था, जिसे अंतरा अपना सब से अच्छा दोस्त समझती थी, उस दिन अंतरा स्कूल के बाद अन्य दोस्तों के साथ गौरव का बर्थडे सैलिब्रेट करने के लिए शहर से कुछ दूर स्थित गौरव के फार्म हाउस गई. वहां केक, मिठाइयों और चौकलेट्स के साथसाथ शराब और बियर की बोतलें भी खुलीं. अंतरा इस से बच न सकी. नशे में बेखबर अंतरा वह सबकुछ कर रही थी, जिस का उसे जरा भी अंदाजा नहीं था. नशे की हालत में धीरेधीरे उस के दोस्तों ने अंतरा के साथ छेड़खानी शुरू कर दी. पार्र्टी में अंतरा 10-12 दोस्तों के बीच अकेली लड़की थी. अपने बदन पर अपने दोस्तों की छुअन की सिहरन को अंतरा खूब महसूस कर रही थी, लेकिन जब अंतरा को लगा कि उस के साथ जबरदस्ती की जा रही है तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. ऐसे में अपने दोस्तों से उस ने छोड़ने की मिन्नतें कीं, लेकिन वे सभी अंतरा की खूबसूरती के नशे में अंधे हो चुके थे.

अंतरा को जब लगा कि वे ऐसे नहीं मानेंगे तो वह जोरजोर से चिल्लाने लगी और पास में रखी खाली बोतलें खिड़कियों के शीशे पर मारने लगी. कहीं लोग इकट्ठे न हो जाएं इस भय से अंतरा के दोस्तों ने उसे छोड़ दिया. इस जाल से निकलने के बाद अंतरा को नए अनुभव के साथ नई जिंदगी मिली थी, जो उस के लिए बड़ी सीख थी. सच पूछिए तो अंतरा जैसी निर्दोष और मासूम युवती के जीवन की व्यथा की यह कहानी एक लेखक की कोरी कल्पना हो सकती है, लेकिन वास्तविक दुनिया में इस तरह की सच्ची और कड़वी कहानियों से प्रिंट मीडिया के पेज और टैलीविजन के चैनल्स भरे रहते हैं. यह भी सच है कि इस तरह की घटना का शिकार होने वाली अंतरा वास्तविक जीवन और मौडर्न दुनिया में अकेली नहीं है. अंतरा जैसी कुछ युवतियां परिवार और समाज के भय से या तो आत्महत्या कर लेती हैं या फिर अपने पर किए गए जुल्मों को चुपचाप सह लेती हैं. अहम प्रश्न यह उठता है कि जिस दोस्ती को मानव जीवन का अनमोल उपहार माना जाता है, आखिर उसी पवित्र रिश्ते को कलंकित करने की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए कौन जिम्मेदार होता है? साइकोलौजी के जनक कहे जाने वाले सिगमंड फ्रायड का यह मानना था कि मानो जीवन की हरेक ऐक्टिविटी केवल 2 उद्देश्यों से प्रभावित होती है, प्रसिद्धि पाने की लालसा और सैक्स. इस तरह सैक्स को मानव जीवन में एक कुदरती आवश्यकता के रूप में शुमार किया जाता है.

सच पूछिए तो किसी युवक और युवती के बीच दोस्ती संबंधों की मर्यादा और उस की पवित्रता का वहन करना कोईर् आसान काम नहीं होता. दोस्ती का यह रिश्ता जिस नाजुक डोर से बंधा होता है वह तनमन की हलकी सी गरमी से भी दरक उठता है. लिहाजा, यदि आप भी तथाकथित दोस्ती के किसी ऐसे बंधन से बंधे हुए हैं तो आप को इस पवित्र रिश्ते को स्वच्छ रखने के लिए अपने मन पर बड़ी कठोरता से नियंत्रण रखने की आवश्यकता है, क्योंकि युवक और युवतियों की दोस्ती के बंधन की उम्र बहुत छोटी होती है. ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की दोस्ती की आड़ में केवल युवक ही सैक्सुअल रिलेशन बनाने की ताक में रहते हैं बल्कि युवतियां भी इस में पीछे नहीं रहतीं. संस्कार जब एक छोटे से गांव से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर कालेज की पढ़ाई के लिए शहर आया तो उसे शुरू में सबकुछ अजीब सा लगता था. वह बहुत शर्मीले स्वभाव का था और वह युवतियां तो दूर युवकों से भी बड़ी मुश्किल से बात करता था. लेकिन वह बहुत होशियार था और पेरैंट्स उसे एक आईएएस औफिसर के रूप में देखना चाहते थे. वर्षा भी उसी की क्लास में पढ़ती थी और संस्कार के रिजर्व नेचर और होशियार होने के कारण उसे मन ही मन काफी चाहती भी थी, लेकिन वह संस्कार को इस बारे में बता पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी.

संयोग से एक दिन उस के कालेज का एक हिल स्टेशन पर जाने का प्रोग्राम बना और इस दौरान दोनों को बस में एकसाथ बैठने का मौका मिल गया. मौका पा कर वर्षा ने संस्कार के हाथों में हाथ डाल कर अपने मन की बात कह डाली. यह सुन संस्कार के होश उड़ गए और उस ने बिना सोचेसमझे ही उसे मना कर दिया, क्योंकि वह जिस बैकग्राउंड से आया था उस में उस के लिए इन सब चीजों को ऐक्सैप्ट करना संभव नहीं था. ठीक है, तुम मुझे प्यार नहीं कर सकते तो हम दोनों दोस्त बन कर तो रह ही सकते हैं. क्या तुम मेरी फैं्रडशिप भी ऐक्सैप्ट नहीं करोगे? वर्षा ने प्यार के अंतिम तीर के रूप में जब यह प्रश्न संस्कार के सामने रखा तो संस्कार भावनाओं के सागर में गोते लगाने लगा और इस के लिए उस ने हामी भर दी. दोस्ती के नाम पर अब वे दोनों साथ घूमतेफिरते, मस्ती करते. वक्त के साथ उन दोनों के बीच दोस्ती और भी गहरी होती गई और धीरेधीरे साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाई जाने लगीं. वैलेंटाइन डे के दिन जब पूरा कालेज डांस और म्यूजिक में बिजी था तो संस्कार और वर्षा फरवरी की उस कुनकुनी ठंड में शहर के एक खूबसूरत पार्क में साथसाथ जीवन जीने के सपने बुन रहे थे.

सूरज डूब चुका था और शाम के साए में रोशनी धीरेधीरे खत्म हो रही थी. वहां से लौटते हुए वर्षा और संस्कार की करीबी में जीवन की सारी मर्यादाओं की रेखा मिट चुकी थी. दोस्ती के बंधन में प्यार और वासना की भूख ने कब सेंध लगा दी, इस का एहसास भी प्रेमी युगल को नहीं हो पाया. जब इस प्रकार दोस्ती निभाने का प्रश्न उठता है तो ऐसा करना किसी तलवार की धार पर चलने से कम खतरनाक नहीं होता. पहले तो आप इस प्रकार के रिश्ते को अपने परिवार वालों से छिपा कर न रखें. महंगे गिफ्ट्स के ऐक्सचेंज से दूर रहने की कोशिश करें, क्योंकि जब इस प्रकार के महंगे गिफ्ट्स के ऐक्सचेंज की शुरुआत होती है तो एकदूसरे से अपेक्षाओं का दायरा काफी बढ़ जाता है और इस के साथ सब से बड़ी बात यह होती है कि इस प्रकार की अपेक्षाओं की कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होती. दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पार्टी और फंक्शन में अपने फ्रैंड्स के साथ अकेले जाने से परहेज करें, क्योंकि मन के आवेग का कोई भरोसा नहीं होता. यदि ऐसी पार्टियों में जाना निहायत जरूरी हो तो अपने परिवार के किसी सदस्य या फिर कौमन फैं्रड्स के साथ जाएं. ऐसा करने से आप सेफ रहेंगी.

हिंदी सीखने में मुश्किल आई : शाल्मली खोलगडे

बौलीवुड सिंगर शाल्मली खोलगडे के गाने ‘बेबी को बेस पसंद है…’, ‘मुझे तो तेरी लत लग गई…’, ‘बलम पिचकारी…’, ‘मैं परेशां…’ हर पार्टी की शान बन गए हैं. वैसे, शाल्मली खोलगडे को केवल गाने गाना ही पसंद नहीं है, बल्कि वे डांस और ऐक्टिंग का भी शौक रखती हैं. स्कूली दिनों में उन को यह तय करने में बहुत मुश्किल आई थी कि कैरियर के रूप में वे इस दिशा में जाएं

शाल्मली खोलगडे की मां उमा खोलगडे क्लासिकल सिंगर और थिएटर आर्टिस्ट हैं. वे बेटी को भी उसी दिशा में ले जाना चाहती थीं. शाल्मली खोलगडे ने अपने कैरियर की शुरुआत एक मराठी फिल्म से की थी. उन को असल पहचान फिल्म ‘इशकजादे’ के गाने ‘मैं परेशां…’ से मिली. इस के बाद उन्होंने एक के बाद कई हिट गाने गाए. पेश हैं, उन के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

ऐक्टिंग और डांस के शौक के बाद आप सिंगिंग की लाइन में कैसे आईं?

मेरी मां क्लासिकल सिंगर हैं. उन की कोशिश थी कि मैं भी क्लासिकल सिंगर बनूं. मैं उन दिनों गानों को ले कर बहुत गंभीर नहीं थी. 8वीं क्लास में मां ने मेरी बात मान ली और कहा कि जो तुम को बनना है, बनो.स्कूल के बाद कालेज तक मैं यह समझ नहीं पा रही थी कि किस राह पर आगे जाऊं. मैं ऐक्टिंगडांस सबकुछ पसंद कर रही थी. हमारे कालेज में मल्हार फैस्टिवल हुआ था. उस में सोलो सिंगिंग का एक कंपीटिशन था. उस में मैं गाना गा रही थी.  गाने के साथ म्यूजिक और सबकुछ देख कर मैं काफी प्रभावित हुई और सोच लिया कि अब तो मुझे सिंगर ही बनना है.

क्या अब सिंगिंग महज प्लेबैक सिंगिंग नहीं रह गई है?

अब गायकी का दौर बदल रहा है. गायकों को स्टेज पर एक अच्छा परफौर्मर होना भी जरूरी होता है. इस में आप का ग्लैमर और लुक भी अहम रोल अदा करता है. मेरा डांस और ऐक्टिंग का जो शौक था, वह परफौर्मर के रूप में मुझे काम देता है. टैलीविजन चैनल ‘स्टार प्लस’ के सिंगिंग रिएलिटी शो ‘दिल है हिंदुस्तानी’ में करन जौहर और शेखर रविजानी के साथ जज की भूमिका में मुझे बहुतकुछ सीखने को मिला है.

सिंगिंग के रिएलिटी शो के कई विजेता बौलीवुड सिंगिंग में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाते हैं?

बौलीवुड में भी कंपीटिशन बहुत है. रिएलिटी शो में केवल वे लोग होते हैं, जो उस शो में हिस्सा ले रहे होते हैं. बौलीवुड सिंगिंग में और लोग भी मुकाबले में होते हैं. शो जीतने के बाद ही किसी सिंगर का असल कैरियर शुरू होता है. कई बार विजेता संघर्ष करना बंद कर देता है. ऐसे में उस की पहचान वहीं खो जाती है. यह बात जरूर है कि आज के दौर में अगर आप की आवाज में दम है, तो मौके जरूर मिलेंगे. कई ऐसे कलाकार भी हैं, जो शो में विजेता नहीं बन सके, पर बाद में सिंगिंग में बेहतर कैरियर बनाने में कामयाब हो गए.

आप मराठी हैं, पर हिंदी बहुत अच्छी तरह से बोलती हैं. कैसे?  

स्कूल में हिंदी गलत लिखने और बोलने को ले कर मुझे कई बार मार भी खानी पड़ी है. हिंदी बोलने में मुझे काफी मुश्किलें आईं. मुझे मराठी और अंगरेजी अच्छी आती थी. जब हिंदी गाना शुरू किया, तो हिंदीं सीखना शुरू किया. सच कहूं, तो गाना सीखने से ज्यादा मुश्किल हिंदी सीखने में आई. अब मेरी हिंदी अच्छी है, यह सुन कर अच्छा लगता है.

आप सिंगिंग में किस तरह का कंपीटिशन देखती हैं?

एक सिंगर के रूप में मुझे हर गाने के लिए कंपीटिशन से गुजरना पड़ता है. एक गाने को म्यूजिक डायरैक्टर अलगअलग सिंगर के साथ गवा कर देखता है. इस के बाद किसी एक सिंगर की आवाज में उस को फाइनल करता है. यह हर किसी के साथ होता है, चाहे सिंगर नया हो या पुराना.

क्या आप को वैस्टर्न गाने ज्यादा पसंद हैं?

ऐसा नहीं है. ज्यादातर म्यूजिक डायरैक्टरों को लगता है कि मुझ पर वैस्टर्न गाने ज्यादा अच्छे लगते हैं. यही वजह है कि मेरे हिस्से में पार्टी गाने ज्यादा आए हैं. मेरे कई स्लो गाने भी पसंद किए गए हैं. वैसे, अच्छा सिंगर वही माना जाता है, जो हर तरह के गाने को बखूबी गा सके.

भरम और शरम से फैलता एड्स

पटना,  बिहार के मीठापुर इलाके की रहने वाली राधिका को उस के बेटे उमेश ने इलाज के लिए बिहार के सब से बड़े सरकारी अस्पताल पटना मैडिकल कालेज अस्पताल में भरती कराया था. उस औरत को पेट में दर्द और सूजन की शिकायत थी. डाक्टर ने उसे कुछ दवा दे कर 10 दिन बाद आने के लिए कहा. उमेश ने बताया कि दवा खाने के बाद भी उस की मां की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और दर्द काफी ज्यादा बढ़ गया. वह दोबारा अपनी मां को अस्पताल ले गया. मैडिकल इमर्जैंसी में कहा गया कि यह सर्जिकल इमर्जैंसी का मामला है, वहां ले कर जाओ. सर्जिकल इमर्जैंसी ने इसे मैडिकल इमर्जैंसी का मामला बता कर भरती करने से मना कर दिया.

उमेश ने अपनी मां को ले कर 19-20 दफा मैडिकल और सर्जिकल इमर्जैंसी के चक्कर लगाए. आखिरकार सर्जिकल इमर्जैंसी में जांच कर एचआईवी समेत कुछ टैस्ट कराने को कहा गया. टैस्ट में जब एचआईवी पौजिटव पाया गया, तो डाक्टरों का रवैया पहले से ज्यादा खराब हो गया. उन्होंने परचे को फाड़ डाला और किसी प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने की सलाह दे डाली. उमेश के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह प्राइवेट अस्पताल का खर्च उठा पाता, इसलिए वह अपनी बीमार मां को ले कर घर चला गया. कुछ दिनों के बाद जब राधिका की तबीयत काफी बिगड़ने लगी, तो उमेश फिर से उसे पटना मैडिकल कालेज अस्पताल ले गया. डाक्टरों ने उसे डांटफटकार लगाते हुए अस्पताल से जाने की धमकी दे डाली. बाद में अस्पताल के सुपरिंटैंटैंड के दखल के बाद राधिका को भरती कराया गया. उस के बाद भी राधिका का इलाज शुरू नहीं हो पाया और कुछ ही घंटे बाद उस ने दम तोड़ दिया.

एड्स और एचआईवी को ले कर जागरूकता पैदा करने की मुहिम पर सरकार करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाती है, पर सरकार के मातहत काम करने वाले कई डाक्टरों में ही जागरूकता नहीं है. एड्स छुआछूत की बीमारी नहीं है. जिस्मानी रिश्ता बनाने और एड्स मरीज का खून किसी मरीज को चढ़ाने से ही एड्स होने का खतरा होता है. पटना मैडिकल कालेज अस्पताल में एड्स की मरीज राधिका के इलाज करने को ले कर डाक्टरों के रवैए ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों और मुलाजिमों के बीच भी एड्स को ले कर जागरूकता फैलाने की ज्यादा दरकार है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के अधिकार में साफतौर पर कहा गया है कि एड्स मरीजों को तालीम, सेहत और जायदाद से जुड़े समान अधिकार दिए गए हैं. अगर कोई डाक्टर एड्स मरीज के साथ भेदभाव करता है, तो वह जीवन के अधिकार के उल्लघंन का अपराधी करार दिया जाएगा.

बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली 25 साल की सपना अपने पति के एड्स की बीमारी को छिपाने का नतीजा भुगत रही है. वह बताती है कि उस का पति नागपुर में ट्रक ड्राइवर था. अचानक वह बीमार पड़ा. पहले डाक्टर ने बताया कि उसे कैंसर हो गया है, पर बाद में पता चला कि एड्स है. सपना ने परिवार में किसी को नहीं बताया कि उस के पति को एड्स है. उस ने गुपचुप तरीके से पटना के बाद दिल्ली में इलाज कराया, पर अपने पति को बचा नहीं सकी. नैशनल एड्स कंट्रोल और्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एचआईवी के 86 फीसदी मामलों में असुरक्षित सैक्स संबंध से ही यह बीमारी फैलती है. एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने पर 2.57 फीसदी लोग एड्स की चपेट में आते हैं.

वैसे तो खून देने वालों का एचआईवी टैस्ट कराने के बाद ही किसी मरीज को खून चढ़ाया जाता है, पर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई डाक्टर इस बात की अनदेखी करते हैं. एचआईवी संक्रमित सूई से एड्स के चंगुल में फंसने वालों का आंकड़ा 1.97 फीसदी है. एचआईवी की चपेट में आने पर मरीज पहले टीबी का शिकार होता है, क्योंकि टीबी होने पर शरीर में बीमारी से लड़ने की ताकत कम हो जाती है. कुछ को निमोनिया या मैनिनजाइटिस भी होता है. इस मसले पर एड्स स्पैशलिस्ट डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि असुरक्षित यौन संबंध एड्स के फैलने की सब से बड़ी वजह है. तकरीबन 70 फीसदी आदमी को एचआईवी संक्रमित होने का पता ही नहीं चलता है, क्योंकि इस बीमारी के लक्षण 10 से 12 साल के बाद सामने आते हैं.

लगातार बुखार आना, एक महीने से ज्यादा समय तक दस्त होना, 10 फीसदी से ज्यादा वजन कम हो जाना, मुंह में छाले आना, बदन पर खुजली होना, 3-4 हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी और उलटी होना इस के खास लक्षण हैं. ऐसा होने पर तुरंत डाक्टर को दिखा कर एचआईवी पर जीत हासिल की जा सकती है.

एड्स को ले कर आज भी समाज में कई तरह के भरम फैले हुए हैं. किसी को गले लगाने और चुंबन लेने या साथ सोने से एड्स नहीं फैलता है. बगैर कंडोम के सैक्स करने, किसी एचआईवी मरीज का खून किसी सेहदमंद इनसान को चढ़ा देने और बच्चों को स्तन से दूध पिलाने पर ही एड्स फैलता है. थूक वगैरह से यह बीमारी होने का कोई खतरा नहीं होता है. लोग यह समझते हैं कि मच्छरों के काटने से भी एड्स फैलता है, जबकि मच्छर के काटने पर भी एड्स का कोई खतरा नहीं होता है. कोई भी कीड़ा जब किसी इनसान को काटता है, तो वह उस के खून या जिस्म में फैले वायरस को दूसरे इनसान के शरीर में नहीं डाल सकता है. एचआईवी मरीज के शौचालय का इस्तेमाल करने पर भी एड्स नहीं होता है.

साथी से वफादारी और सैक्स बनाने पर कंडोम का इस्तेमाल कर एड्स से बचा जा सकता है. अगर सैक्स करने वाले दोनों लोग एड्स के शिकार हों, तो उस के बाद भी सैक्स करते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूरी है, वरना इन्फैक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इस से इलाज में दिक्कत हो सकती है और जान भी जा सकती है.अगर पति और पत्नी दोनों को एड्स हो, तो भी वे एड्स के वायरस से मुक्त बच्चे को जन्म दे सकते हैं. डाक्टर की सलाह और इलाज से ऐसा मुमकिन है. मैडिकल साइंस के मुताबिक, अभी भी देश के 60 फीसदी लोगों को एड्स के बारे में कुछ नहीं पता है. एचआईवी पोजिटिव होने पर आरटीआर दवाओं को नियमित रूप से लिया जाए, तो मरीज कई सालों तक सामान्य जिंदगी जी सकता है.                           

एड्स के खिलाफ डटा एक डाक्टर

पटना के मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी गरीब मरीजों के इलाज, जांच और दवा का पूरा इंतजाम खुद करते हैं. ‘बिल क्लिंटन एड्स फाउंडेशन’ से जुड़े डाक्टर दिवाकर तेजस्वी पिछले 15 सालों से एड्स और टीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और आम लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं. 23 सितंबर, 2005 को उन्होंने पहली बार पटना के भीड़ भरे एक्जीबिशन रोड पर बीच सड़क पर मजमा लगाया और एड्स से पीडि़त महिला रामपति के हाथों से बिसकुट खा कर उन्होंने यह बताने की कोशिश की थी कि एड्स छूत की बीमारी नहीं है. एड्स के मरीज को इलाज के साथ हमदर्दी की भी जरूरत होती है. बिहार के सारण जिले के चैनवा प्रखंड के चड़वा गांव की रहने वाली रामपति के पति मुख्तार की मौत एड्स की वजह से हो चुकी थी. डाक्टर दिवाकर तेजस्वी ‘पब्लिक अवेयरनैस फौर हैल्थफुल एप्रोच फौर लीविंग’ के नाम से अपना संगठन भी चला रहे हैं. इस के साथ ही गांवों और दूरदराज के इलाकों में हैल्थ कैंप लगा कर आम आदमी को एड्स और हैल्थ के प्रति जागरूक करने की मुहिम चला रहे हैं. वे अब तक एक हजार से ज्यादा जागरूकता और फ्री हैल्थ चैकअप कैंप लगा चुके हैं.

18 अगस्त, 1968 को पटना में जनमे डाक्टर दिवाकर तेजस्वी एचआईवी एड्स के स्पैशलिस्ट और एड्स पर अपनी रिसर्च को कई इंटरनैशनल मंचों पर पेश कर चुके हैं. वे कहते हैं कि एड्स अब लाइलाज बीमारी नहीं रही है. अगर सही समय पर इस का सही तरीके से इलाज शुरू कर दिया जाए, तो इस का मरीज लंबी जिंदगी जी सकता है. जिस तरह से डायबिटीज, ब्लड प्रैशर वगैरह के मरीज नियमित रूप से दवा खा कर आम जिंदगी जी रहे हैं, उसी तरह एड्स के मरीज भी जी सकते हैं. इतना ही नहीं, अगर पति और पत्नी दोनों एचआईवी पोजिटिव हैं, तो वे डाक्टरी देखरेख में सेहतमंद बच्चे पैदा कर सकते हैं. साल 1992 में नालंदा मैडिकल कालेज अस्पताल से एमबीबीएस की डिगरी हासिल करने वाले डाक्टर दिवाकर तेजस्वी बताते हैं कि संक्रमित औरत के पेट में पल रहे बच्चे को अगर आपरेशन कर के निकाल लिया जाए और वह अपने बच्चे को अपना दूध न पिलाए, तो बच्चे को मां से संक्रमण का खतरा एक फीसदी भी नहीं रहता है.

इसी तरह मर्द के वीर्य को धो कर महिला के गर्भ में आर्टिफिशियल इन्ट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन तकनीक से डाला जाए और दवा से औरत का वायरल लोड 1000 कौपी से कम रखा जाए, तो सेहतमंद बच्चे पैदा हो सकते हैं. फिलहाल यह तकनीक काफी खर्चीली है, पर आने वाले दिनों में इस खर्च में कमी आएगी. डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि एचआईवी एड्स ज्यादातर मजदूरों और ट्रक ड्राइवरों के जरीए फैलता है. असुरक्षित यौन संबंध एड्स के फैलने की सब से बड़ी वजह है. तकरीबन 70 फीसदी मरीजों को एचआईवी संक्रमित होने का पता ही नहीं चलता है, क्योंकि इस बीमारी के लक्षण 10 से 12 साल के बाद सामने आते हैं. लगातार बुखार आना, एक महीने से ज्यादा समय तक दस्त होना,

10 फीसदी से ज्यादा वजन कम हो जाना, मुंह में छाले आना, बदन पर खुजली, 3-4 हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी और उलटी होना इस के मुख्य लक्षण हैं. ऐसा होने पर तुरंत डाक्टर को दिखा कर अपना इलाज कराएं.

ज्ञानरंजन : एड्स मरीजों के इलाज में अपनी बीमारी भूल गए

‘बिहार नैटवर्क औफ पीपुल लीविंग विद एचआईवी एड्स’ के अध्यक्ष ज्ञानरंजन बताते हैं कि एड्स को ले कर समाज में कई तरह की गलत बातें फैलाई गई हैं. इस बीमारी का पता लगने के बाद भी उसे छिपाने की कोशिश ही जानलेवा साबित होती है. अगर पता लगने के तुरंत बाद किसी अच्छे डाक्टर की सलाह पर दवाएं लें, तो जिंदगी को बेहतर और लंबा बनाया जा सकता है. पटना के रहने वाले 35 साल के ज्ञानरंजन खुद एचआईवी पोजिटिव हैं और साल 2001 में खून चढ़ाने के दौरान वे एचआईवी की चपेट में आ गए थे. साल 2004 में ब्लड डोनेशन के दौरान उन्हें एचआईवी पोजिटिव होने के बारे में पता चला. तब से अब तक वे दवा खा कर आम जिंदगी गुजार रहे हैं. उन की बीवी भी एचआईवी की शिकार हैं, लेकिन उन के बच्चे इस से मुक्त हैं.

ज्ञानरंजन बताते हैं कि बच्चे के जन्म से पहले उन्होंने पूरी सावधानी बरती और डाक्टर की देखरेख में रहे. एड्स के मरीजों की देखभाल करने और उन के इलाज में हर तरह की मदद करने को ही उन्होंने अपना मिशन बना लिया है.

मौताणा : मौत से मुआवजे का खेल

राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आज भी एक प्रथा है ‘मौताणा’, जिस ने अब तक हजारों परिवारों को तबाह कर दिया है. राजस्थान की अरावली पहाडि़यों से सटे उदयपुर, बांसवाड़ा, सिरोही व पाली के आदिवासी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों में इस प्रथा का सब से ज्यादा चलन है. इस प्रथा की शुरुआत तो सामाजिक इंसाफ के मकसद से हुई थी, जिस में अगर किसी ने किसी शख्स की हत्या कर दी, तो कुसूरवार को सजा के तौर पर हर्जाना देना पड़ता था, लेकिन अब दूसरी वजहों से हुई मौतों पर भी आदिवासी ‘मौताणा’ मांग लेते हैं. पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि किसी भी वजह से हुई अपनों की मौत का कुसूर दूसरों पर मढ़ कर जबरन ‘मौताणा’ वसूल किया जाने लगा है. दरअसल, जब मरने वाले का परिवार किसी को कुसूरवार मान कर उसे ‘मौताणा’ चुकाने के लिए मजबूर करता है, तो आदिवासियों की अपनी अदालत लगती है. वहां पंच कुसूरवार को सफाई का मौका दिए बिना ही ‘मौताणा’ चुकाने का फरमान जारी कर देते हैं. भुखमरी की मार झेल रहे आदिवासी परिवारों को लाखों रुपए का ‘मौताणा’ चुकाना पड़ता है, जिस से वे बरबाद हो जाते हैं.

‘मौताणा’ नहीं चुकाने पर मृतक का परिवार कुसूरवार परिवार के सदस्य की जान तक ले सकता है. रकम नहीं चुकाने पर यह रिवाज हिंसक रूप ले लेता है. चूंकि ‘मौताणा’ की रकम काफी ज्यादा होती है, इसलिए कभीकभार सारी जमीनजायदाद दांव पर लगानी पड़ जाती है. ऐसे में कई परिवार या तो डर कर घर छोड़ देते हैं या फिर बरबाद हो जाते हैं. उदयपुर के गल्दर इलाके में मोटरसाइकिल से हादसा हुआ, तो उसे बिठाने वाले को 80 हजार रुपए देने पड़े. कुएं में लाश मिली, तो मालिक ने ‘मौताणा’ मांगा. नवंबर, 2016 में ढेडमारिया के भैरूलाल डामोर की बीमारी से मौत हुई. चचेरे भाई से ‘मौताणा’ लेने के लिए लाश को 35 दिनों तक घर पर ही रखा गया. परिवार वाले ‘मौताणा’ ले कर ही माने.

कउचा गांव में एक औरत को सांप ने डस लिया. मायके वालों ने ‘मौताणा’ मांगते हुए कहा कि सांप ससुराल का था. महादेव नेत्रावला गांव में कुत्ते के काटने पर मालिकों से ‘मौताणा’ लिया गया. इसी तरह नालीगांव में साल 1995 में हत्या के मामले में ‘मौताणा’ न चुकाने पर 30 परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा था. 30 साल बाद ये लोग घर वापस लौट सके. राजस्थानगुजरात बौर्डर के आंजणी गांव में ‘मौताणा’ की रकम नहीं मिलने पर अजमेरी की लाश सवा साल तक पेड़ से लटकी रही. कोटड़ा में 14 साल पहले हामीरा की दास्तान तो और भी अलग है. उस के घर के बाहर कोई लाश फेंक गया. हामीरा के परिवार पर हत्या का आरोप लगा. लिहाजा, उन्हें खेत छोड़ कर दूसरों के रहमोकरम पर जिंदगी बसर करनी पड़ रही है.

राजस्थानगुजरात के बौर्डर वाले इलाके में एक सड़क हादसे में 6 साल के एक छात्र रमेश की मौत होने पर उस की लाश ‘मौताणा’ की मांग को ले कर 11 दिन से बड़ली गांव में पेड़ से लटकती एक खाट पर रखी रही. इसी दौरान हादसे में घायल उस की मां अमीया हिम्मतनगर के अस्पताल में भरती रही, वहीं पिता मोहन की उदयपुर के अस्पताल में हालत नाजुक बनी रही. इसी तरह जोगीवड़ में अप्रैल, 2016 में परथा देवा गरासिया की हत्या के बाद दूसरे पक्ष को ‘झाल’ यानी अंतिम संस्कार की रकम 90 हजार रुपए भरनी थी. इस के लिए 6 बीघा जमीन गिरवी रखी. बाकी रकम न देने पर तकरीबन 30 परिवारों को इलाका छोड़ना पड़ा.

साल 2015 में सुबरी गांव के दिनेश की हत्या पर 7 लाख रुपए ‘मौताणा’ चुकाने के लिए एक पक्ष के झालिया ने 70, परथा ने 40, लक्ष्मण ने 20, रूंडा ने 45 हजार रुपए में जमीन गिरवी रखी और मवेशी बेचे. राजस्थान का एक ताजा वाकिआ बेचैन करने वाला है. उदयपुर जिले के कड़नवा गांव के रहने वाले 40 साला वेहता गमार की मौत हो गई थी. उस की मौत के 10 दिन बाद भी लाश को सिर्फ इसलिए चिता मयस्सर नहीं हुई, क्योंकि उस के गांव के पंचों को मौत का मुआवजा चाहिए था. एक घटना उदयपुर के आदिवासी इलाके झाड़ोल के चतरपुरा गांव की है, जहां एक 20 साल की निरमा ने शादी के बाद खुदकुशी कर ली थी.

इस घटना में भी निरमा के मायके पक्ष का आरोप था कि उस की ससुराल वालों ने निरमा की हत्या की है, इसलिए अपना अपराध मानते हुए उन्हें ‘मौताणा’ की रकम देनी चाहिए. ससुराल पक्ष पर दबाव बनाने के लिए निरमा के मायके वाले तीरकमान, लाठियों और सरियों से लैस हो कर चढ़ाई करने चतरपुरा गांव पहुंचे थे. घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई, लेकिन ‘मौताणा’ प्रथा की वजह से लाश को उतारा नहीं गया, बल्कि पहले मायके पक्ष को खबर भिजवाई गई, बाद में पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया गया, फिर लाश का पोस्टमार्टम हुआ और उस के बाद अंतिम संस्कार.

उदयपुर के एएसपी हनुमान प्रसाद ने बताया कि पहली नजर में यह आत्महत्या का मामला लगता है, क्योंकि विवाहिता के पति और ससुर घर पर नहीं थे. चूंकि निरमा और शांतिलाल पारगी की शादी हुए बहुत ज्यादा समय नहीं बीता था, इसलिए मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच की जाएगी. ऐसा भी देखने में आया है कि पुलिस अगर ज्यादा सख्ती करती है, तो आदिवासी उस समय भले ही राजी हो जाएं, पर अपने मन में दुश्मनी पाले रहते हैं और देरसवेरे अपने विरोधी आदिवासी समूह से बदला जरूर लेते हैं. राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद से जुड़ी डाक्टर राधिका लड्ढा का कहना है कि आदिवासियों में प्रचलित यह प्रथा एक सामाजिक बुराई है, जो शिक्षा के प्रचार और जागरूकता से धीरेधीरे कम तो हो रही है, लेकिन अभी भी ‘मौताणा’ के रूप में रकम वसूलने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है.

आस्था संस्थान के अश्विनी पालीवाल के मुताबिक, राजस्थान में ‘पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार अधिनियम 1996’ के तहत आदिवासियों को छोटेमोटे झगड़े पारंपरिक तरीके से निबटाने की छूट है, लेकिन इस प्रथा के नाम पर हिंसा सही नहीं है. बहुत से मामलों में पीडि़त को तो कुछ मिलता भी नहीं है और कई बार तो पीडि़त ‘मौताणा’ की मांग करना भी नहीं चाहते, पर वे भी अपनी जाति के पंचों के आगे कुछ नहीं कर पाते. ‘मौताणा’ विवाहिता या मर्द की अकाल मौत तक ही सीमित नहीं है. अब सड़क हादसों में पशुओं के मारे जाने या अस्पताल में बीमारी से मौत होने जैसे मामलों में भी वसूली करने की कोशिश की जाती है.

अपनों ने ही चुराई उस्ताद की शहनाई

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के दालमंडी इलाके के चाहमामा निवासी काजिम हुसैन ने बीते साल 4 दिसंबर, 2016 की रात को पुलिस को सूचना दी थी कि उन के पिता मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की चांदी की 4 शहनाइयां घर में रखे बक्से का ताला तोड़ कर चोरी कर ली गई हैं. जब यह घटना घटी थी, तब वह हड़हा स्थित अपने पुश्तैनी मकान पर परिवार के साथ गए हुए थे. मामला गंभीर था, इसलिए चौक पुलिस ही नहीं, क्राइम ब्रांच पुलिस ने चोर का पता लगाने की काफी कोशिश की. लेकिन जब ये लोग कुछ नहीं कर पाए तो इस मामले की जांच को एसटीएफ को सौंप दिया गया. सर्विलांस से पता चला कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाइयां चोरी की सूचना देने वाले काजिम के बेटे नजरे हसन ने ही चुराई थीं और वह असम भागने वाला था. पुलिस को मुखबिरों से पता चला था कि नजरे हसन हड़हा बीर बाबा मंदिर के पास खड़ा किसी का इंतजार कर रहा है. एसटीएफ इंसपेक्टर विपिन राय की अगुवाई में टीम ने घेराबंदी कर के नजरे हसन और उसे रुपए देने आए 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में पता चला कि नजरे हसन को रुपए देने वाले छोटी पिपरी में ज्वैलर्स की दुकान चलाने वाले शंकरलाल और उस का बेटा सुजीत था. नजरे हसन ने पूछताछ में बताया था कि एक दिसंबर को घर में रखे बड़े बक्से का ताला तोड़ कर उसी ने शहनाइयां चुराई थीं. इस बात का किसी को पता न चल पाए, इस के लिए उस ने मुख्यद्वार का ताला नहीं तोड़ा था. नजरे हसन ने चारों शहनाइयों को चुरा कर छोटी पियरी स्थित शंकर ज्वैलर्स के मालिक शंकरलाल और उस के बेटे सुजीत को 17 हजार रुपए में बेच दी थीं. ज्वैलर्स पितापुत्र ने बताया कि 4 शहनाइयों में 3 शहनाइयां चांदी की थीं, जबकि एक शहनाई लकड़ी की थी. उस पर केवल चांदी का पत्तर लगा था. उस समय वे उसे बाकी बचे 42 सौ रुपए और लकड़ी वाली शहनाई देने आए थे. इस के बाद एसटीएफ ने ज्वैलर्स की दुकान से शहनाई को गला कर निकाली गई एक किलोग्राम 66 ग्राम चांदी बरामद कर ली थी.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने भले ही कभी सपने में नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन उन के अपने ही उन की मशहूर शहनाई बेचने जैसी घटना को अंजाम देंगे. लेकिन इसी बहाने इस बात पर विचार किया जा सकता है कि इतने बड़े कलाकार के घर वालों के सामने कैसे हालात पैदा हो गए कि देश के लिए जो शहनाइयां धरोहर थीं, उन का सौदा उस ने चंद हजार रुपए में कर डाला. देश में शास्त्रीय संगीत को संजोए रखने के लिए सरकार काफी बड़ी रकम खर्च करती है, इस के लिए तमाम विश्वविद्यालय और संस्थान हैं, जहां लाखों करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. इस के बावजूद एक कलाकार की जिंदगी का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अपना जीवन किस तरह गुजारता है.

जिन मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाइयां चोरी हुई थीं, उन का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था. उन के पिता का नाम पैगंबर खां और माता का नाम मिट्ठनबाई था. ये लोग डुमरांव के ठठेरी बाजार में किराए के एक मकान में रहते थे. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का बचपन का नाम कमरुद्दीन था. वह अपने मातापिता की दूसरी संतान थे. उन से बड़े थे शम्सुद्दीन. बाद में उन के दादा रसूल बख्श ने उन का नाम बिस्मिल्लाह खां रख दिया, जिस का मतलब होता है अच्छी शुरुआत. भारत के प्रख्यात शहनाई वादक होने के नाते सन 2001 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था. वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे, जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. उन्होंने शहनाई बजाना घर वालों से ही सीखा था. उन के घर वाले दरबारी राग बजाने में माहिर थे. वे बिहार की भोजपुर रियासत में अपना हुनर दिखाने जाते थे. उन के पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते थे.

6 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां अपने पिता के साथ बनारस आ गए थे. यहां उन्होंने अपने चाचा अलीबख्श विलायती से शहनाई बजाना सीखा. उन के उस्ताद चाचा विलायती विश्वनाथ मंदिर में स्थाई रूप से शहनाई बजाते थे. वह शिया मुसलमान थे, इस के बावजूद अन्य हिंदुस्तानी संगीतकारों की भांति धार्मिक रीतिरिवाजों के प्रबल पक्षधर थे और देवीदेवताओं में कोई अंतर नहीं समझते थे. वह काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में भी जा कर शहनाई बजाते थे और गंगा किनारे भी बैठ कर घंटों रियाज करते थे. उन का मानना था कि ऐसा करने से गंगा मइया प्रसन्न होती हैं. सन 1956 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार पाने वाले बिस्मिल्लाह खां को इस के बाद ‘पद्मविभूषण’ (1980) और ‘भारत रत्न’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. अफगानिस्तान से ले कर अमेरिका तक की यात्रा कर के उन्होंने शहनाई घरघर पहुंचाई. अपने अनोखे शहनाई वादन की कला से शहनाई को प्रतिष्ठा दिलाने वाले बिस्मिल्लाह खां का 21 अगस्त 2006 को देहांत हो गया था.

वाराणसी में वह गंगा को संगीत सुनाते थे. उन की आत्मा का नाद उन की शहनाई की स्वरलहरियों में गूंजता हुआ हर सुबह बनारस को संगीत के रंग से सराबोर कर देता था. शहनाई उन के कंठ से लग कर नाद ब्रह्म से एकाकार तो होती ही थी, मिलन के स्वर गंगा की लहरों से मिलते हुए अनंत सागर की ओर निकल पड़ते थे. एक दिन इसी शहनाई के सुर थम गए और अपने धाम में विश्राम करते हुए सुरों की अनंत यात्रा पर निकल पड़े. देश की आजादी में गूंजे बिस्मिल्लाह खां की शहनाई के स्वर 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी की पूर्वसंध्या पर लालकिले पर फहराते तिरंगे के साथ स्वरलहरियां भी आजाद भारत के आजाद आसमान में शांति का संगीत बन कर फैल रही थीं. यह उन के सुरों का ही कमाल था कि लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह खां का शहनाई वादन देश के स्वतंत्रता उत्सव की एक प्रथा बन गई. उस्ताद ने एक ऐसे दौर में इस संगीत को रचा था, जब गानेबजाने को सम्मान की निगाह से नहीं देखा जाता था. तब उन्होंने लोकधुनों को अपनी तपस्या और रियाज से खूब संवारा और क्लासिकल मौसिकी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया. बहुत कम ही लोग जानते हैं कि खां साहब की मां कभी नहीं चाहती थीं कि उन का बेटा शहनाई वादक बने. वह इसे हलका काम समझती थीं, क्योंकि शहनाई वादकों को उस समय शादीब्याह और अन्य समारोहों में बुलाया जाता था. ऐसी जुगलबंदियां, जिन का कोई सानी नहीं था. बिस्मिल्लाह खां ने शहनाई को मंदिरों, राजेरजवाड़ों के मुख्यद्वारों और शादीब्याह के अवसर पर बजने वाले लोकवा- से उठा कर शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पहुंचाया. उस्ताद ने अपने चाचा उस्ताद मरहूम अलीबख्श के कहे मुताबिक शहनाई को शास्त्रीय संगीत का वा- बनाने में जिंदगी भर जितनी मेहनत की, उस की कोई मिसाल नहीं है.

उन्होंने कई जानेमाने संगीतकारों के साथ जुगलबंदी कर के पूरी दुनिया को चौंका दिया. उस्ताद ने अपनी शहनाई के स्वर विलायत खां के सितार और पंडित वी.जी. जोग के वायलिन के साथ जोड़ कर संगीत के इतिहास में स्वरों का नया इतिहास रच दिया था. उन की शहनाई जुगलबंदी के एलपी रिकौर्ड्स ने बिक्री के सारे रिकौर्ड तोड़ दिए थे. बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि उस्ताद के इन्हीं जुगलबंदी के एलबम्स के आने के बाद जुगलबंदियों का दौर चला. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की धुन बनारस के गंगा घाट से निकल कर दुनिया भर में गूंजी. उन की शहनाई की गूंज से फिल्मी दुनिया भी अछूती नहीं रही. उन्होंने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसा घर’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ीं. आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिंदी फिल्म ‘स्वदेस’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा…’ में शहनाई की मधुर तान छेड़ी थी.

संगीत से दिलों को जोड़ने का सपना, संगीत सुर और नमाज, इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह खां की जिंदगी में और दूसरा कुछ नहीं था. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, तानसेन पुरस्कार से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को सन 2001 में भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था. यकीनन उस्ताद के लिए जीवन का अर्थ केवल संगीत ही था. उन के लिए संगीत के अलावा सारे इनामइकराम, सम्मान बेमानी थे. वह संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे. वह कहते थे सिर्फ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहजीब को एकाकार करने की ताकत रखता है. इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा रखने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की आखिरी इच्छा अधूरी रह गई. दुख की बात यह रही कि उन के बाद उन के घर में किसी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई. यही वजह थी कि उन के अपने पोते को बाबा की शहनाई बेचने पर विवश होना पड़ा. अभाव में पलेबढ़े लोग कला के जरिए अपना नाम तो हासिल कर लेते हैं, पर जिंदगी में बहुत कुछ पीछे छूट जाता है. भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 4 शहनाइयां किसी और ने नहीं, उन के अपने पोते नजरे हसन उर्फ शादाब ने मौजमस्ती में हुई उधारी चुकाने के लिए चुराई थीं. देश के लिए जो शहनाइयां धरोहर थीं, उन का सौदा शादाब ने छोटी पियरी के ज्वैलर शंकरलाल सेठ और उस के बेटे सुजीत सेठ से महज 17 हजार रुपए में कर डाला था. मंगलवार को यह खुलासा करते हुए एसटीएफ की वाराणसी इकाई ने चौक के हड़हा बीर बाबा मंदिर के पास से उसे, शंकरलाल और सुजीत को गिरफ्तार किया था. तीनों के पास से 3 शहनाइयों की गली हुई एक किलोग्राम 66 ग्राम चांदी, 4200 रुपए और लकड़ी की एक शहनाई बरामद की थी. उस्ताद मुहर्रम की पांचवीं और आठवीं तारीख को इसी शहनाई से आंसुओं का नजराना पेश करते थे. गलाई गई तीनों शहनाइयां क्रमश: पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव, पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और लालूप्रसाद यादव द्वारा उपहार में दी गई थीं.

घटना का खुलासा होने के बाद नजरे हुसैन के पिता और उस्ताद के सब से छोटे बेटे काजिम हुसैन घर में ताला बंद कर के कहीं चले गए हैं. इस से बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि शहनाई के जिस उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सुर की पूरी दुनिया दीवानी थी, आज उन के घर के हालात ऐसे हो गए हैं कि उन के पोते को अपना खर्च चलाने के लिए दादा की धरोहर शहनाइयां बेचनी पड़ीं. इस से पता चलता है कि शास्त्रीय संगीत के इस फनकार का जीवन किस तरह अभावों से ग्रस्त था. अपनी मेहनत और हुनर के सामने पूरी दुनिया को झुकाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां परिवार के लिए इतना भी पैसा नहीं कमा पाए कि वे बेहतर जिंदगी जी सकते. आज लोग चर्चा कर रहे हैं कि पोते ने उस्ताद की शहनाई बेच दी, लेकिन यह सोचने का किसी के पास समय नहीं है कि एक कलाकार के परिवार को ऐसे हालात से क्यों रूबरू होना पड़ा.

बॉलीवुड के वो सितारे जो सरोगेसी से बने पैरेंट्स

विधि आयोग ने सरोगेसी को कानूनी जामा पहनाने की सिफारिश करते हुए कहा था कि इसके जरिये बच्चे की ख्वाहिश रखने वाले अभिभावकों में से एक के दाता होने की शर्त लगाकर इसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाए. लेकिन विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस पेचीदे मुद्दे पर कानून की खामोशी ऐसे वक्त में ठीक नहीं होगी जब कानून को मानवीयस्वतंत्रता के संरक्षक के तौर पर काम करना है.

किराये पर कोख देने के मुद्दों से निपटने के लिए कानून की जरूरत पर जोर देते हुए आयोग ने कहा कि इससे जुड़ी चीजें बेहद जटिल हैं और इसे समग्र कानून की आवश्यकता है.

हमारे देश में सरोगेसी से पैरेंट्स बनने का चलन काफी दिनों से चल रहा है. हालांकि भारत सरकार सरोगेसी पर नियंत्रण बनाने के लिए नया बिल भी लेकर आयी है. लेकिन माता-पिता के मन पर ऐसे बिल का कोई असर नहीं होता है. सरोगेसी का चलन इन दिनों बॉलीवुड में अधिक प्रचलन में है. बहुत से बॉलीवुड कलाकार सरोगेसी के जरिए पैरेंट्स बन चुके हैं और पैरेंट्स बन रहे हैं.

बॉलीवुड कलाकार जो सरोगेसी के जरिए बने पैरेंट्स.

तुषार कपूर

अभिनेता तुषार कपूर तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने अपने सिंगल पैरेंट बनने की घोषणा की. तुषार कपूर किराए की कोख लेकर पिता बने हैं. यह इस तरह का देश में पहला मामला है.

फिल्मकार करण जौहर

अभी हाल ही में खबर मिली है कि करण जौहर पिता बन गए हैं. करण जौहर एक सिंगल पैरेंट्स है और वह दो जुड़वां बच्चों के पिता बन गए हैं. इनमें एक बेटा है और एक बेटी.

लेकिन खबर है कि अब केंद्र सरकार जो बिल लेकर आई है उसमें सिंगल पैरेंट के सरोगेसी के जरिए पिता बनने पर पाबंदी लगाई जा सकती है. 

आमिर खान-किरण राव

आमिर खान ने साल 2005 में किरण राव से शादी की थी. उनके बेटे आजाद राव खान को जन्म देने के लिए आमिर-किरण ने कोख किराए पर ली थी. हालांकि आमिर की पहली पत्नी रीना दत्ता से एक बेटा जुनैद और बेटी ईरा हैं. किरण प्राकृतिक तरीके से मां नहीं बन सकती थीं, उनकी मां बनने की दिली इच्छा थी इसलिए बेटे आजाद को जन्म देने के लिए आमिर और किरण ने सरोगेसी का सहारा लिया.

सोहेल खान-सीमा खान

सोहेल खान और सीमा खान के छोटे बेटे योहान खान का जन्म 2011 में सरोगेसी के जरिये ही हुआ.

सतीश कौशिक

16 वर्ष पहले फिल्म अभिनेता सतीश कौशिक ने अपने दो वर्षीय बेटे को खो दिया था. इसके बाद उन्होंने सरोगेसी के जरिए अपना परिवार बढ़ाया. सरोगेसी के जरिए सतीश कौशिक को एक बेटी हुई है.

मैं सेहत को लेकर काफी सतर्क हूं. इसके बावजूद पीठ में दर्द रहता है. क्या यह कोई बड़ी समस्या है.

सवाल

मैं 41 साल की हूं. मैं सेना में काम करती थी. मैं सेहत और खानपान को ले कर काफी सतर्क हूं. इस के बावजूद मुझे पीठ में दर्द रहता है. क्या यह कोई बड़ी समस्या है?

जवाब

यह कोई बड़ी समस्या नहीं है, पर भविष्य में बड़ी मुश्किल का सबब बन सकती है. आप सेना में थीं, तो व्यायाम का महत्त्व जरूर जानती होंगी. बढ़ती उम्र के साथ यह समस्या आम है, पर व्यायाम पीठ में दर्द से छुटकारे के लिए किए जाने वाले किसी भी इलाज का जरूरी हिस्सा है. दर्द के लिए दवाएं भी उपलब्ध हैं. हीट या कोल्ड थेरैपी (आइस पैक्स) भी सूजन कम कर पीठ का दर्द कम करने में काफी मददगार होती है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मुझे डायबिटीज है. क्या इस वजह से भविष्य में मुझे हड्डियों से जुड़ी तकलीफ होने की आशंका है.

सवाल

मैं 36 साल की हूं. मुझे मधुमेह (डायबिटीज) है. क्या इस वजह से भविष्य में मुझे हड्डियों से जुड़ी तकलीफ होने की आशंका है? अगर हां, तो उस का सामाधान बताएं?

जवाब

अगर आप डायबिटिक हैं, तो आप को डाक्टर से मिल कर सटीक डाइट चार्ट का अनुसरण करना चाहिए. आप को हड्डियों और जोड़ों से संबंधित कई तरह की तकलीफें होने की आशंका ज्यादा है. शोध बताते हैं कि ऐसे लोगों को आर्थ्राइटिस और जोड़ों का दर्द जैसी समस्या होने का खतरा दोगुना रहता है. आप को जब जोड़ों में दर्द का एहसास हो तो ‘हौट ऐंड कोल्ड अप्रोच’ आजमाएं. व्यायाम से भी प्रभावित मांसपेशियों को मजबूती मिलेगी और दर्द के साथसाथ सूजन भी कम होगी.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

इन खेलों को खेलने से पहले आपको देखनी पड़ेगी आपकी जेब

“पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब” यह कहावत अब धीरे धीरे गलत साबित हो रही है. आज खेलों के प्रति लोगों का नजरिया तेजी से बदल रहा है. लोगों का खेल की तरफ झुकाव बढ रहा है. कुछ विशेषज्ञों की मानें तो खेल से दिमाग और शरीर दोनों ही स्वस्थ रहता है.

कुछ खेल आसानी से घर में या घर के बाहर खेले जा सकते हैं तो कुछ खेल ऐसे भी है जिन्हें पैसे वालो का खेल कहा जाता है और जिन्हें खेलना हर किसी के बस की बात नहीं है. क्योकि इन खेलो के उपकरण ही इतने महंगे आते है की यह आमजन से दूर हो जाते है और यह हर समय भी नहीं खेले जा सकते.

तो आज जानिए दुनिया के ऐसे ही कुछ खेल के बारे में जिसे खेलना हर किसी के बस की बात नहीं.

घुड़सवारी

यह दुनिया के सबसे पुराने और प्रसिद्ध खेलो में से एक है. इस खेल में घोड़े में ऊपर बैठकर किसी वस्तु का पीछा करना होता है. घुड़सवारी एक लेकप्रिय खेल है लेकिन बहुत महंगा होने के कारण इस खेल को बहुत ही कम लोग खेल पाते हैं. इस खेल में घोड़े का रखरखाव, भोजन, देखभाल और ट्रेनिंग तो महंगी है ही इसके अलावा खेलो के दौरान घोड़े को एक से दुसरे स्थान पर ले जाना भी महंगा कार्य है.

फार्मूला 1

फार्मूला 1 दुनिया में सबसे प्रसिद्ध खेलो में से एक है लेकिन बहुत महंगा भी. इस खेल की एक विशेष बात यह है की इस खेल के खिलाड़ी के पास खुद की कार होनी चाहिए जो दुनिया की बहुत ही महंगी स्पोर्ट्स कार होती है. आमतौर पर यह रेसिंग गेम है, जिसमे ड्राईवर को अलग-अलग प्रकार के रास्ते पर ड्राइव करना पड़ता है.

पोलो

पोलो अनेक देशो में बहुत लोकप्रिय है जैसे ब्रिटेन. लेकिन यह खेल अपने बहुत ही महंगे होने के कारण हमेशा से ही अति धनी लोगो और रईस परिवारों से सम्बंधित रहा है. इस खेल के इतने महंगे होने का कारण इस खेल से सम्बंधित घोड़ा और खेल उपकरण है. तथा अधिकतर पोलो खिलाडियों को कम से कम चार घोड़े तो बैकअप के लिए ही रखने पड़ते हैं.

विंगसूटिंग

विंगसूट एक बहुत ही अलग तरह का और दिलचस्प खेल है. इस खेल में खिलाडी को ऊंची जगह से हवा में विंगसूट पहनकर छलांग लगानी होती है और विंगसूट की सहायता से ही हवा में ज्यादा से ज्यादा देर तक तैरना पड़ता है. लोगो को यह जानकार हैरानी होगी की एक विंगसूट की कीमत लगभग 2,500 डॉलर तक ही होती है.

नौकायन

इस खेल में सबसे ज्यादा आवश्यकता बोट की होती है और प्रत्येक खिलाड़ी के पास खुद की नाव होना जरूरी है तथा इसके अलावा नाव के ऊपर लगने वाले पाल और अन्य उपकरण होना भी आवश्यक है. इस खेल में इस्तेमाल की जाने वाली ‘पाल नौका’ करीब 2 मिलियन डॉलर तक की हो सकती है.

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