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दीपा मलिक : समाज की नकारात्मक सोच को करारा जवाब

लाचार, बेचारी जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले समाज की इस सोच को अपनी हिम्मत और इच्छाशक्ति के बलबूते बदलने वाली देश की पहली महिला पैरालिंपिक मैडलिस्ट दीपा मलिक का जीवन चुनौतियों से भरा रहा. उन्होंने इतिहास तब रचा जब रियो में गोला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीत कर पैरालिंपिक में पदक हासिल करने वाली देश की पहली महिला खिलाड़ी बनीं. दीपा ने स्पाइन ट्यूमर से जंग जीती और फिर खेलों में मैडलों का अंबार लगा डाला. कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त होते हुए भी उन्होंने अपनी उम्र से ज्यादा स्वर्ण पदक जीत कर जज्बे और जोश की मिसाल कायम की.

दीपा शौटपुटर के अलावा स्विमर, बाइकर, जैवलिन व डिस्कस थ्रोअर हैं. पैरालिंपिक खेलों में उन की उल्लेखनीय उपलब्धियों के कारण उन्हें भारत सरकार ने अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया था और इस वर्ष उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा गया.

विपरीत हालात में खुद के साथ बेटियों को संभालने और देश का नाम रोशन करने की ताकत कहां से मिली?

मुझे कुछ करने की ताकत 3 चीजों से मिली. पहली मुझे समाज की उस नकारात्मक सोच को बदलना था जिस में मेरे लिए बेचारी और लाचार जैसे शब्दों का प्रयोग लोग करने लगे थे. इस अपंगता में जब मेरा दोष नहीं था तो मैं क्यों खुद को लाचार महसूस कराऊं? मुझे समाज को दिखाना था कि हम जैसे लोग भी बहुत कुछ कर सकते हैं. हिम्मत और जज्बे के आगे शारीरिक कमी कभी बाधा नहीं बनती. दूसरी ताकत मेरी बेटियां बनीं, जिन्हें मैं संभाल रही थी. मैं नहीं चाहती थी कि बड़ी हो कर मेरी बेटियां मुझे लाचार मां के रूप में देखें. तीसरी ताकत खेलों के प्रति मेरा शौक बना, जिस ने इस स्थिति से लड़ने में मेरी बहुत सहायता की.

पेरैंट्स का कैसा सहयोग रहा?

आज उन्हीं की बदौलत में यहां हूं. मैं जब ढाई साल की थी तब पहली बार मुझे ट्यूमर हुआ था. इस का पता भी पापा ने ही लगाया. जब मैं घर में गुमसुम रहने लगी तो पापा ने मुझे चाइल्ड मनोवैज्ञानिक को दिखाया. जब मेरी बीमारी का पता चला तब पुणे आर्मी कमांड हौस्पिटल में मेरा इलाज हुआ. मैं जब तक बैड पर रही, पापा हमेशा मेरे साथ रहे. मेरे पापा बीके नागपाल आर्मी में कर्नल थे. मां भी अपने जमाने की राइफल शूटर थीं. शादी के बाद जब 1999 में दूसरी बार मेरा स्पाइनल कोर्ड के ट्यूमर का औपरेशन हुआ तब भी मुझे पापा ने ही संभाला.

आप ने परिवार को कैसे संभाला?

मेरे पति भी आर्मी में थे. पहली बेटी देविका जब डेढ़ साल की थी तो उस का एक्सीडैंट हो गया. हैड इंजरी थी जिस से उस के शरीर का एक हिस्सा पैरालाइज हो गया. यह देख कर मैं बिलकुल नहीं घबराई. मैं ने खुद उस की देखभाल की, फिजियोथेरैपी की. आज वह बिलकुल स्वस्थ है और लंदन में साइकोलौजी से पीएचडी कर रही है. दूसरी बेटी भी पैरालाइज थी. उसे भी ठीक किया. आज वह भी पूरी दुनिया घूम चुकी है. मैं तो मानती हूं कि मैं ने बेटी पढ़ा भी ली और बचा भी ली. लेकिन तीसरी सर्जरी के बाद मैं व्हीलचेयर पर आ गई, लेकिन तब भी हिम्मत नहीं हारी.

खेलों की शुरुआत कैसे हुई?

बचपन से ही खेलों से लगाव था, लेकिन 2006 के बाद मैं ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ी. कुछ नए नियम भी बनवाए. मैं पहले महाराष्ट्र की तरफ से खेलती थी. 2006 में एक तैराक के रूप में मुझे पहला मैडल मिला. उस समय मैं पूरे भारत में अकेली दिव्यांग तैराक थी.

आप ने यमुना नदी भी पार की है?

जब बर्लिन से मैं लौटी तब घर नहीं गई और यह तय किया कि मैं यमुना को पार करूंगी और विश्व में सब को बताऊंगी कि मैं असल तैराक हूं. किसी स्विमिंग पूल की तैराक नहीं हूं. इलाहाबाद के एक कोच से कहा कि आप कैसे भी हो मुझे यमुना पार कराओ. पहले तो उन्होंने मना किया पर फिर मेरे जज्बे को देख कर प्रैक्टिस कराने लगे. फिर 2009 में मैं ने यमुना नदी पार कर विश्व रिकौर्ड बनाया, जो लिम्का बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज हुआ. मेरे पास ‘गिनीज वर्ल्ड रिकौर्ड्स’ बुक वालों को बुलाने के लिए पैसे नहीं थे वरना यह रिकौर्ड गिनीज बुक में दर्ज होता.

गोदरेज की ‘नयी सोच’ के साथ लौंच हुआ ‘ग्रीन इन्वर्टर एसी’

गर्मी के मौसम को देखते हुए और बिजली की खपत को कम करने के उद्देश्य से गोदरेज एप्लायंस ने ‘नयी सोच’ को प्राथमिकता देते हुए ग्रीन इन्वर्टर एसी एनएक्सडब्लू 5.8 आईएसईईआर रेटिंग के साथ मुंबई में लौंच किया गया. इस बारे में बिजनेस हेड और ईवीपी कमल नंदी कहते है कि ‘सोच के बनाया है’, इस टैग लाइन के साथ गोदरेज की हमेशा कोशिश रहती है कि उपभोक्ता की नयी सोच के साथ उत्पाद बाजार में उतारा जाए.

लगातार तापमान के बढ़ने की वजह से एसी की मांग बाजार में बढ़ी है, लेकिन कई बार ग्राहक अधिक बिजली की बिल के डर से एसी नहीं खरीदते. गोदरेज ने इसे थ्री टायर और टू टायर सिटी के हिसाब से बनाया गया है. ये एसी लक्जरी ब्रांड के अन्तर्गत आता है.

पर्यावरण की दृष्टि से भी इसे पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है. उत्पाद समूह हेड अनूप भार्गव का इस विषय पर कहना है कि इस उत्पाद के साथ एक ऐप भी लौंच किया गया है जिसकी सहायता से ग्राहक एसी की गुणवत्ता को खुद देख सकेंगे और इस एसी की तुलना अन्य एसी से कर सकेगा. यह एक जांचा परखा उत्पाद है और लोगों को इसकी उपयोगिता पसंद आयेगी.

प्रतिष्ठा मूल्य पर लड़खड़ाए अरुण जेटली

कोर्ट रूम में जब दो दिग्गज वकील आमने सामने होते हैं तो असली लुत्फ वहां मौजूद लोगों और जज को भी आता है. हालत दंगल जैसे होते हैं जिसमे बराबरी के दो पहलवान लंगोट बांधे पहले नजरों से एक दूसरे की हैसियत और मनोवल नापते हैं फिर अपने गुरु और इष्ट का ध्यान करते दांव पेंच आजमाने लगते हैं. अखाड़े की धूल छंटने के बाद कुश्ती प्रेमियों को दिखता है कि किस पहलवान की छाती पर दूसरे का पांव रखा है और वह शान से अपनी मूंछों पर ताव देकर जता रहा है कि देख लो अच्छे से कि मैं ही वह सूरमा हूं जिसने नीचे पड़े वाले को चित कर पिद्दी बना दिया.

कानून के अखाड़े के दो दिग्गज वकील राम जेठमलानी और अरुण जेटली आमने सामने थे. जेटली वादी थे और जेठमलानी प्रतिवादी अरविंद केजरीवाल के वकील थे, संक्षेप मे वाद यह है कि प्रतिवादी ने वादी के बारे में कुछ ऐसी बातें सार्वजनिक तौर पर कहीं थीं जिनसे वादी को लगा था कि वे मानहानि के दायरे में आती हैं, लिहाजा वह न्याय के लिए ओनरेबल कोर्ट जा पहुंचा और 10 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का दावा ठोक दिया था. वादी को लगा था कि चूंकि वह नामी वकील भी हैं इसलिए पहली दूसरी पेशी में ही प्रतिवादी को पानी पिला देगा, पर प्रतिवादी भी कम चतुर नहीं निकला और जेठमलानी जैसा ख्यातिनाम वकील कर वादी की मुश्किल बढ़ा दी.

खैर जिरह शुरू हुई, प्रतिवादी के वकील ने अपनी एनक उतारी और उसे हिला डुलाकर उपस्थित लोगों को एहसास कराया कि क्यों तेज गेंदबाज रन अप लेते वक्त गेंद को पेंट से रगड़ता रहता है अपना आत्मविश्वास चार्ज कर जज के सामने सर झुकाने की रस्म अदा करने के बाद वह वादी से मुखातिब हुआ और उसकी आखों में आंखे डाल कर चंद ऐसे सवाल पूछे जिनसे वादी लड़खड़ा गया. वादी खुद हमले और बचाव के मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञाता है, पर तजुर्बे में मात खा गया. मानहानि का मुकदमा कानून की धाराओं पर कम तर्क और वाकपटुता से ज्यादा लड़ा जाता है, इसलिए वादी के साथ साथ उसके वकील भी प्रतिवादी के वकील के इस सवाल पर सकपका उठे कि यह कैसे तय किया जाये कि भरपाई आर्थिक रूप से हो सकती है और मानहानि 10 करोड़ की ही है. इस पर वादी ने वही जबाब दिया जो प्रतिवादी का वकील उससे उगलवाना चाहता था कि मानहानि की भरपाई आर्थिक तौर पर नहीं हो सकती है, परिवार और समाज में उसकी जो अहमियत है उसकी बिना पर ही 10 करोड़ का दावा उसने ठोका है.

अब प्रतिवादी के वकील ने यह पूछते गुगली बाल डाल दी कि कहीं मामला खुद को महान समझने का तो नहीं, साख और प्रतिष्ठा में क्या फर्क है, ठग भी अगर कुछ लोगों को थोड़ा दान दे दे तो लेने वालों के बीच उसकी साख होगी, इसलिए आप की याचिका का कोई तर्कसंगत कारण नजर नहीं आता. वादी बौखलाकर बताने की कोशिश करता रहा कि बात सिर्फ कीमत की नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की भी है, बात उसकी सच्चाई निष्ठा की भी है, वह भी 1977 से वकालत कर रहा है और फलाने ढिकाने अहम पदों पर रह चुका है वगैरह वगैरह. वादी ने अदालत को इंप्रेस करने के लिए भावुक होने की भी कोशिश की, पर उसका दिन ही खराब था जो वह प्रतिष्ठा और उसके आर्थिक मूल्य में कोई  तालमेल नहीं बैठा पाया.

वह अगर झूठा अहम और बड़प्पन छोड़ कह देता कि हां प्रतिष्ठा की भरपाई 10 करोड़ से हो जाएगी तो बात कुछ और होती. वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर दायर मानहानि के मुकदमे की पैरवी करते हुये राम जेठमलानी ने साबित कर दिया कि जितनी जेटली की उम्र है उससे कुछ कम का उन्हे वकालत का तजुरबा है. फैसला कुछ भी आए पर जेटली लड़खड़ा तो गए ही हैं. 

पापा बाहर से सख्त और अंदर से नर्म हैं : गीता फोगट

हर लड़की की तरह चूडि़यां झुमके पहनने और बिंदी लगाने का शौक राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान गीता फोगट को भी है. मगर यह शौक पूरा करने के लिए उन्हें बचपन से काफी संघर्ष करना पड़ा.

इस संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब बचपन में ही उन के पिता महावीर फोगट ने उन्हें अखाड़े में पहलवानी के लिए उतार दिया. मगर आज उसी संघर्ष का नतीजा है कि गीता पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन कर रही हैं, जिस का पूरा श्रेय गीता अपने पिता को देती हैं. बातचीत के दौरान उन्होंने अपने पिता से जुड़ी कई बातें बताईं:

क्या बचपन से ही आपको अपने पिता से इतना जुड़ाव था?

माता पिता से तो हर बच्चे को जुड़ाव होता है. हम बहनें भी मम्मी पापा दोनों से ही भावनात्मक रूप से काफी जुड़ी थीं. मगर जब पापा ने मुझे और बबीता पर पहलवानी सीखने का दबाव बनाया, तो वे हमें दुश्मन जैसे लगने लगे.  पहलवानी की वजह से हमारा रहनसहन आम लड़कियों से अलग हो गया था. हमारी सारी सहेलियां हम से दूर रहने लगी थीं. सुबह शाम अखाड़ा और पापा यही हमारी जिंदगी थी. पापा हमें टीवी तक नहीं देखने देते थे. हमें उन की आहट से भी डर लगता था. ऐसा लगने लगा था कि हमारा बचपन पहलवानी करने में खो सा गया है. मगर तब यह नहीं पता था कि उन की बदौलत हमें एक दिन इतनी शोहरत मिलेगी.

आप को अपने पिता की कौन सी बात सब से अधिक अच्छी लगती है?

हरियाणा में महिलाओं को घूंघट से बाहर निकलने की भी इजाजत नहीं होती. अपनी मां को भी हम ने हमेशा घूंघट में ही देखा. ऐसे माहौल में भी पापा ने हमारी परवरिश इस तरह की कि हमें कभी लगा ही नहीं कि हम लड़कियां हैं और हमें ऐसे नहीं रहना चाहिए. गांव में सभी ने पापा का विरोध किया. यह तक कह दिया कि पहलवानी से लड़कियों का शरीर बिगड़ रहा है. कौन करेगा इन से शादी? मगर पापा के कदम कभी पीछे नहीं हटे. पापा की तरह मैं भी कभी किसी भी परिस्थिति में घबराती नहीं हूं. पापा ने यह साबित कर दिया कि अलग सोच को नई दिशा देने से ही समाज में बदलाव संभव है.

पहलवानी के अलावा आप ने अपने पिता से और क्या सीखा?

मेरे पापा बहुत सख्त थे और बहुत ज्यादा अनुशासनप्रिय भी. पापा हमें प्रैक्टिस के लिए सुबह 3:30 बजे उठा देते थे और खुद भी हमारे साथ होते थे. खाना पीना सब हमें समय से लेना होता था. एक खिलाड़ी के लिए यह सब बहुत जरूरी है. यदि खिलाड़ी में अनुशासन न हो, तो वह कभी सफल नहीं हो सकता. 

आप के पिता अन्य पिताओं से कैसे अलग हैं?

पापा बाकी पिताओं से बहुत अलग हैं. अपनी बेटियों को अखाड़े में उतारने के लिए दम चाहिए, जो हर पिता में नहीं होता. जब हम ने पहलवानी शुरू की तब हमारे गांव और आसपास के गांवों में भी कोई महिला पहलवान नहीं थी. पापा प्रैक्टिस के लिए हमें बेझिझक लड़कों के साथ अखाड़े में उतार देते थे और हम भी लड़कों से जीत कर पापा को खुश कर देती थीं.

क्या अब भी वे उतने ही सख्त हैं जितने पहले थे?

नहीं. शुरुआती दिनों में जब हम पहलवानी नहीं करना चाहती थीं बस तभी तक पापा हमें सख्त लगते थे,मगर जब हमें समझ में आया कि वे हमारा ही भविष्य बना रहे हैं तब एहसास हुआ कि पापा बाहर से सख्त और अंदर से नर्म हैं.                

मेरे पापा बेहद खुले विचारों के हैं : मनीषा कीर

भोपाल के नजदीक छोटे से कसबे गोरेगांव की रहने वाली 17 वर्षीय मनीषा कीर को बीते 4 वर्षों में शौट गन ट्रैक शूटिंग में 17 गोल्ड मैडल मिल चुके हैं, जिन में से 2 अंतर्राष्ट्रीय टूरनामैंट में प्राप्त हुए. उड़ती चिडि़या पर निशाना लगाना मनीषा के लिए बाएं हाथ का खेल है. हालांकि मनीषा ने भोपाल की नैशनल राइफल अकादमी से ट्रेनिंग ली है, मगर निशानेबाजी का पहला पाठ उन्होंने अपने पिता, जो पेशे से मछुआरे हैं, से पहले ही सीख लिया था. मछलियों पर निशाना लगा कर जाल बिछाने की कला ने ही मनीषा को अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहना सिखाया. अपनी सफलताओं की सब से अहम कड़ी अपने पिता को मानने वाली मनीषा से बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश इस प्रकार हैं:

आप की सफलता में आप के पिता का कितना सहयोग रहा?

मेरे पापा ही मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं. किसी वस्तु पर निशाना लगाने के लिए जो एकाग्रता चाहिए होती है, वह मैं ने उन्हीं से सीखी है. मैं बचपन में पापा के साथ भोपाल के बड़े तालाब में मछलियां पकड़ने जाती थी. तब मैं देखती थी कि पापा कैसे मछलियों पर सारा ध्यान केंद्रित कर जाल बिछाते थे. शौट गन ट्रैक शूटिंग में भी निशाना साधने से पहले लक्ष्य पर फोकस करना पड़ता है तब जा कर निशाना सही लगता है.

क्या आज भी आप अपने पिता के साथ मछलियां पकड़ने जाती हैं?

ट्रेनिंग और टूरनामैंट्स की वजह से अब मैं घर पर ज्यादा वक्त नहीं बिता पाती हूं. लेकिन जब भी घर जाती हूं पापा के साथ मछलियां पकड़ने बड़े तालाब पर जरूर जाती हूं.

पिता की दी किस सलाह को आप हमेशा याद रखती हैं?

जब मेरा अकादमी में ऐडमिशन हो गया और मुझे होस्टल में रहने जाना पड़ा तब गांव के कई लोगों ने पापा से कहा कि इतनी छोटी उम्र में बेटी को बाहर भेज दिया. कोई ऊंचनीच हो गई तो? तब मुझे भी उन लोगों की बातों से डर लगने लगा. लेकिन पापा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि उन की तरह मेरी जिंदगी भी मछलियों के लिए जाल बिछाते हुए बीत जाए. पापा ने बोला कि जब आगे बढ़ते हैं, तो कठिनाइयां सामने आती ही हैं. मगर उन से लड़ कर जब हम और आगे जाते हैं तब हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता. मैं उन की इस बात को हर टूरनामैंट से पहले याद करती हूं और अपनी बैस्ट परफौर्मैंस देती हूं.

पिता की कौन सी बात सब से अधिक प्रभावित करती है?

छोटे से गांव से होने के बावजूद पापा बहुत खुले विचारों के हैं. उन्होंने मुझे और मेरी बहन सुनीता को हमेशा अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रोत्साहित किया. मेरी ही तरह मेरी बहन भी नैशनल लैवल की खिलाड़ी है. पापा ने हमेशा खेल के साथ हमें पढ़ाई में भी आगे रहने के लिए प्रोत्साहित किया. पापा समय के साथ चलने वालों में से हैं और उन की यह बात मुझे बहुत प्रभावित करती है.

आप ने अपने पिता को सब से बड़ी खुशी क्या दी है?

मेरे पिता निशानेबाजी में माहिर थे. उन्हें गुलेल से बहुत अच्छा निशाना लगाना आता है. मगर कभी किसी ने उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया और मछलियां पकड़ने के पुश्तैनी काम को जारी रखने की मजबूरी ने उन के इस हुनर को दबा दिया. मगर मुझे जब भी किसी टूरनामैंट में जीत हासिल होती है तो सब से अधिक खुशी उन्हीं को होती है. वे मुझ से कहते हैं कि जो वे न कर सके वह उन की बेटी ने कर दिखाया. यह बात उन्हें सब से ज्यादा सुकून देती है. 

कैंसर मेरी जिंदगी का सिर्फ एक पन्ना है : आनंदा शंकर जयंत

यदि आप कैंसर को एक चुनौती के रूप में लेती हैं और यह तय करती हैं कि आप को इस से लड़ना ही है, छुटकारा पाना ही है तो यह मुश्किल नहीं है. इस का ताजा उदाहरण हैं आनंदा शंकर जयंत, जिन्होंने अपनी कीमो थेरैपी के दौरान भी डांस प्रैक्टिस को जारी रखा और अपने पैशन से कैंसर पर जीत हासिल की. पेश हैं, आनंदा से हुई मुलाकात के कुछ अहम अंश:

कैंसर का पता चलने पर आप की क्या प्रतिक्रिया रही?

मैं काफी उदास हो गई. घर आ कर रोई भी, पर इसलिए नहीं कि मुझे ब्रैस्ट कैंसर है, बल्कि इसलिए कि इस की वजह से मेरे डांस में गैप आ जाएगा, मैं डांस नहीं कर पाऊंगी. दरअसल, जब आप कला के क्षेत्र से ब्रेक लेते हैं तो आप खत्म से हो जाते हैं, पर मैं कला को नहीं छोड़ना चाहती थी. अत: मैं इस सोच के साथ आगे बढ़ी कि कुछ भी हो जाए,लेकिन मुझे इस कठिनाई से बाहर निकलना ही है.

उस वक्त कई तरह की बातें दिमाग में आ रही थीं. अचानक मेरे दिमाग में एक खयाल आया और मैं ने अपने पति जयंत से पूछा कि क्या यह अंत है मेरे जीवन का, नहींनहीं मेरे डांस का? तो उन्होंने प्यार से कहा कि तुम बस ट्रीटमैंट लो. सब ठीक हो जाएगा. उन का पौजिटिव व्यवहार देख कर मैं ने निर्णय लिया कि मैं कैंसर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दूंगी. अत: मैं ने अपनेआप से तेज आवाज में 3 बातें कहीं-

पहली यह कि कैंसर मेरी जिंदगी का सिर्फ एक पन्ना है, मैं इसे पूरी किताब नहीं बनने दूंगी, दूसरी यह कि मैं इसे अपनी जिंदगी से बाहर कर दूंगी न कि अपनी जिंदगी में शामिल होने दूंगी और तीसरी यह कि मैं कभी यह सवाल नहीं करूं गी कि मैं ही क्यों?

वह दिन है और आज का दिन मैं ने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि इस पर जीत हासिल कर के आगे बढ़ी.

इस स्थिति में डांस पर कैसे फोकस किया?

इस कठिन स्थिति से बाहर निकलने का श्रेय मैं अपने पति और डांस को ही देती हूं. डांस ने न सिर्फ मुझे परेशान होने से बचाया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि कैंसर मेरे जीवन को घेरे न रखे. 7 जुलाई, 2008 को मेरी सर्जरी हुई थी. सर्जरी के 3 दिन बाद मैं घर आई. 2-3 दिन आराम जरूर किया, लेकिन खुद को कभी बीमार के रूप में नहीं रखा. उस दौरान भी मैं बच्चों को रिहर्सल करवाती थी, अपने लैपटौप पर काम करती थी.

इस दौरान पति का कैसा सहयोग रहा?

मेरे पति जयंत बहुत ही रोमांटिक इनसान हैं. वे मेरे सब से अच्छे दोस्त हैं. उस वक्त उन के प्यार व सपोर्ट से ही मैं कैंसर की गिरफ्त से बाहर निकल पाई. कीमो थेरैपी के बाद जब मैं सोई रहती थी तब वे ही मुझे कहते थे कि उठो, बहुत हुआ सोना. अब प्रैक्टिस करो. उस दौरान उन की सब से अच्छी बात यह थी कि वे मुझे कुछ भी करने से नहीं रोकते थे,बल्कि कहते थे तुम्हारी बौडी है, तुम अपनी बौडी को अच्छी तरह से जानती हो, इसलिए तुम्हारा जो करने का दिल करता है करो.

एक डांसर के लिए उस के बाल और खूबसूरती बहुत माने रखती है. ऐसे में बाल झड़ने पर आप क्या फील कर रही थीं?

अधिकांश महिलाओं को लगता है कि बालों के बिना कैसे रहेंगी, कैसी दिखेंगी, लोग क्या कहेंगे. लेकिन मैं ने अपने बालों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि मेरे डाक्टर ने मुझे बताया था कि कीमो थेरैपी के दौरान बाल झड़ते हैं, लेकिन कीमो साइकिल खत्म होते ही आ भी जाते हैं. मेरे साथ हुआ भी ऐसा ही. 8वीं कीमो के बाद 2-3 महीने के अंदर मेरे बाल आ गए. हां, उस दौरान मैं विग लगाने लगी थी.

हैल्थ को ले कर महिलाओं से क्या कहना चाहेंगी?

महिलाएं परिवार के सदस्यों को देखने के बाद ही अपने बारे में सोचती हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें तो कोई प्रौब्लम नहीं है, फिर क्यों डाक्टर के पास जाएं. जब होगी तब देखी जाएगी. इसी वजह से कई मामलों में ट्रीटमैंट संभव नहीं हो पाता. इसलिए जरूरी है कि 40 साल की उम्र के बाद हर महिला को साल में एक बार मैडिकल चैकअप जरूर करवाना चाहिए. यह एक नौर्मल टैस्ट है, जो आप की हैल्थ के लिए जरूरी है. अगर टैस्ट में कैंसर का पता भी चलता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है और न ही इसे अपनी जिंदगी का अंत समझना चाहिए, बल्कि इस सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि अच्छा हुआ पहले पता चल गया.

परिवार के साथ बहुत धक्के खाए हैं : गीता टंडन

मन में अगर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कठिन से कठिन हालात भी आगे बढ़ने की राह में रोड़ा नहीं बनते. ऐसी ही जीवन की कठिन राह पर अपने आत्मविश्वास के बलबूते सफलता की नई इबारत लिखने वाली बॉलीवुड की स्टंट वूमन गीता टंडन हैं.  बॉलीवुड में कई अभिनेत्रियों के लिए स्टंट कर चुकीं गीता की बीती जिंदगी भी उन के प्रोफैशन के जैसी ही कठिन और जोखिम भरी रही है.

महज 15 साल की उम्र में शादी हो जाने और उस के बाद पति व सास की प्रताड़ना से निकल कर 2 बच्चों को पालने तथा स्टंट जैसे जोखिम भरे प्रोफैशन के साथ सम्मान की जिंदगी जीने वाली गीता रीबोक ‘फिट टू फाइट’ अवार्ड से सम्मानित हैं. एक मुलाकात के दौरान उन से हुई बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश पेश हैं:

स्टंट वूमन बनने का सफर कैसा रहा?

जैसे हर एक काली रात के बाद सुबह होती है, मेरा जीवन भी कुछ उसी तरह का रहा. जब 15 साल की थी, तो पिता ने मेरी शादी यह सोच कर कर दी कि मैं शादी के बाद खुश रहूंगी, क्योंकि शादी के पहले मैं ने अपने परिवार के साथ बहुत धक्के खाए थे. लेकिन शादी के बाद भी वे सभी अरमान हवा हो गए, जो मैं ने संजोए थे. पति शराबी था. रोज पीटता था. सास भी प्रताडि़त करती थी. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी जब मेरी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया, तब मैं ने फैसला किया कि मैं ऐसे ही अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी बरबाद नहीं होने दूंगी. अत: पति का घर छोड़ दिया. समाज ने बहुत कुछ कहा. पति का घर छोड़ने के बाद कई रातें सड़कों पर गुजारीं. लोगों के घरों में काम किया, क्योंकि मुझे पैसों की जरूरत थी.

3 साल ऐसे ही संघर्ष करते निकल गए.  इस के बाद एक भांगड़ा पार्टी में शामिल हो गई. शादीविवाह पर डांस करने लगी. जब पैसे आए तब जिंदगी में कुछ सुधार आया, लेकिन मुझे और पैसों की जरूरत थी. तभी किसी ने फिल्मों में स्टंट के बारे में बताया कि इस में पैसे अच्छे मिलते हैं. तब मैं यह काम करने लगी.

अतीत कैसा रहा?

पिछला समय कठिनाइयों में गुजरा है. तभी आने वाला समय अच्छा बन पाया है. मैं अपने बुरे अतीत को हमेशा अपने लिए पौजिटिव मानती हूं,क्योंकि अगर जरूरतें न होतीं तो मैं कभी इस प्रोफैशन को न चुन पाती. मैं मानती हूं कि मेरी पैसे की जरूरत ही इस काम के लिए मेरा जनून बन गई.

इतना जोखिम भरा काम ही क्यों चुना?

मैं ऐसा बिलकुल नहीं बोलूंगी कि मेरा बचपन से ही स्टंट करने का सपना रहा है. सच बताऊं तो जब मैं जीवन की उस राह पर खड़ी थी जब मुझे पैसों की बहुत जरूरत थी तब जो काम मिला मैं करती गई. मेरा मानना है कि काम कोई छोटाबड़ा नहीं होता. अगर मुझे सड़क पर झाड़ू लगाने का काम भी मिलता तो मैं हां कर देती, क्योंकि उस में पैसे तो मिलते. ऐसे ही जब स्टंट करने का काम मेरे पास आया तो मैं ने हां कह दी. मेरे पास इस काम की कोई ट्रेनिंग नहीं थी, लेकिन वक्त हर काम करवा देता है.

असली पहचान कब मिली?

पहले मुझे सिर्फ इंडस्ट्री के लोग ही जानते थे कि मैं एक स्टंट वूमन हूं और2 बच्चों की सिंगल मदर हूं. लेकिन जब मेरी डौक्यूमैंटरी आई तब लोगों के सामने मेरी कहानी आई. इस के बाद तो मेरी जिंदगी ही बदल गई. मुझे कई अवार्ड मिले. इंटरव्यू के लिए लोगों के फोन आने लगे. पहले मैं अपनी कहानी सब के सामने लाने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन जब लोगों ने कहा कि मेरी कहानी से और लोग भी प्रेरित होंगे तब मैं ने डौक्यूमैंटरी के लिए हां कही.

सपने देखती हैं?

मेरा मानना है कि अगर सपने ही न होंगे, तो उन्हें सच करने की प्रेरणा कहां से मिलेगी. मेरा  अक्षय कुमार के साथ काम करने का बचपन से सपना था. फिल्म ‘दे दनादन’ में उन्हें करीब से देखने का मौका तो मिल गया. लेकिन साथ काम कभी नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि मैं तो एक स्टंट वूमन हूं कोई ऐक्ट्रैस नहीं.

अपने बच्चों के लिए क्या सपने हैं आप के?

मैं ने हमेशा उन्हें एक बात सिखाई है कि जिंदगी में जैसा खुद को बनाओगे वैसे ही तुम्हें लोग मिलेंगे. खूब पढ़ो और वह सब करो, जो मैं न कर पाई. उन दोनों में मैं अपना बचपन और जवानी जीते देखना चाहती हूं. बेटा फिल्म इंडस्ट्री में आना चाहता है पर क्या काम करेगा, यह अभी तय नहीं है.

शक्ति मोहन : अपनी कामयाबी का श्रेय अपने पिता को देती हूं

मिडिल क्लास फैमिली में यदि एक से ज्यादा लड़कियां हों तो कुछ परिवारों में मातापिता उन की परवरिश और शादी को ले कर आज भी चिंतित हो उठते हैं मगर दिल्ली के रहने वाले बृजमोहन शर्मा की सोच अलग थी. उन्होंने अपनी बेटियों को अपना मुकाम हासिल करने की पूरी आजादी दी.

शक्ति मोहन अपनी कामयाबी का सारा श्रेय अपने पिता बृजमोहन शर्मा को देती हैं. डांस रिऐलिटी शो ‘डांस इंडिया डांस सीजन 2’ की विजेता बनने के बाद 10 सालों से वे मुंबई में रह रही हैं. डांस शो जीतने के बाद राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई शोज की जज भी बन चुकी हैं. कई फिल्मों में भी काम किया है. शक्ति को आईएएस बनने की इच्छा थी, लेकिन डांस करना बहुत पसंद था. 8 साल भरतनाट्यम और 4 साल कंटैंपरेरी डांस सीखा. शक्ति की 3 बहनें हैं- नीति मोहन, कृति मोहन और मुक्ति मोहन. सभी बहनें किसी न किसी रूप में कला से जुड़ी हैं.

जब शक्ति ने डांस के क्षेत्र में आगे बढ़ने की बात की, तो उन की बड़ी बहन ने बताया कि यह क्षेत्र तो अच्छा है, लेकिन इस में स्टैबिलिटी कम है. लेकिन शक्ति के पिता को उन पर पूरा भरोसा था और इसीलिए यहां तक पहुंचने के हर कदम पर वे शक्ति को आगे बढ़ाने में सहायता करते रहे. शक्ति से बात करना दिलचस्प रहा. पेश हैं, कुछ अंश:

यहां तक पहुंचने में पिता का कितना सहयोग रहा?

पिता ने हम सभी बहनों को सब से अधिक आजादी दी है. उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि सिर्फ पढ़ाई करो. मुझे जो पसंद है उसे करने में वे मुझ से भी एक कदम आगे रहते हैं. किसी भी अचीवमैंट पर वे सब से पहले तालियां बजाने वाले हैं. आज मैं जो भी हूं, उन की बदौलत हूं. मैं अपनी कामयाबी का श्रेय अपने पिता को देती हूं.

उन की किस बात को आप जीवन में उतारना पसंद करती हैं?

डेटूडे लाइफ के उतारचढ़ाव को वे समझाते हैं, जिस से कोई निर्णय लेना मेरे लिए आसान हो जाता है. उन्होंने कभी मेरे ऊपर कोई प्रैशर नहीं बनाया कि तुम यह क्या कर रही हो, इस से क्या मिलेगा आदि. वे हमेशा कहते हैं कि यह तुम्हारी लाइफ है, तुम्हें जो अच्छा लगे, जिसे करने में अच्छा अनुभव हो उसे करो. वे कहते हैं कि किसी भी काम को अगर आप मेहनत और लगन से करते हैं, तो सफलता अवश्य मिलती है. इस  के लिए धैर्य बनाए रखना बहुत जरूरी है.

पिता का दिया कोई ऐसा गिफ्ट, जिसे आप हमेशा अपने पास रखना पसंद करती हैं?

जब मैं ने मुंबई यूनिवर्सिटी में स्नातक में टौप किया था, तो मेरे पिता ने मुझे एक पैन दिया था, जिसे वे बहुत सहेज कर रखते थे. मुझे इतनी खुशी हुई कि मैं बयां नहीं कर सकती. मेरे लिए वह सब से कीमती भेंट है.

क्या लड़की होने के नाते पिता ने कभी कोई सलाह दी है?

हम 4 बहनें हैं, हम ने बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की है. वहां भी हमें पूरी फ्रीडम थी. पिता ने कभी यह नहीं समझने दिया कि हम लड़कियां हैं. हालांकि कई बार रिश्तेदार और पड़ोसी कहते थे कि ये क्या कर रहे हैं? लड़की को नचा रहे हैं अथवा उन के बेटा नहीं है, उन की लाइफ के अंत में क्या होगा आदि. लेकिन पिता ने हमें कभी इस बात का एहसास नहीं करवाया. दिल्ली में रहते हुए हम रात को भी रिहर्सल के लिए जाते थे. बस में जाना, रात को लौटना आदि सब करते थे. किसी प्रकार की रोकटोक नहीं थी. इस से हमारे अंदर दायित्व की भावना और अधिक आ गई थी. दरअसल, जब कोई आप से उम्मीद रखता है, तो आप की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि आप उम्मीद को तोड़ें नहीं.

पिता की सोच अपने जीवन में उतारती हूं : स्वरा भास्कर

‘निल बट्टे सन्नाटा’ फिल्म से चर्चा में आईं अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने आज अपने अभिनय के बल पर एक अलग मुकाम हासिल कर लिया है. तेलुगु परिवार में जन्मी स्वरा का पालनपोषण दिल्ली में हुआ. वहां से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर अभिनय की इच्छा से मुंबई आईं और कुछ दिनों के संघर्ष के बाद फिल्मों में काम करने लगीं. उन की पहली फिल्म कुछ खास नहीं रही, पर ‘तनु वैड्स मनु’ में कंगना राणावत की सहेली पायल की भूमिका निभा कर उन्होंने दर्शकों का दिल जीत लिया.

स्वरा भास्कर के पिता उदय भास्कर नेवी में औफिसर थे. अब वे रक्षा विशेषज्ञ हैं और मां इरा भास्कर प्रोफैसर हैं. पेश हैं, स्वरा से हुई मुलाकात से कुछ अहम अंश:

फिल्मों में कैसे आना हुआ?

मैं बॉलीवुड से बहुत प्रभावित थी. ‘चित्रहार’ और ‘सुपरहिट मुकाबला’ मेरे मनोरंजन के 2 स्रोत थे. जैसेजैसे बड़ी होती गई मेरी पसंद बदलती गई. पहले मैं सोचती थी टीचर बनूंगी, फिर वेटरनरी डाक्टर. लेकिन जेएनयू में पढ़ते समय मैं ने इफ्टा के साथ थिएटर करना शुरू किया. वहां के गुरु कहे जाने वाले पंडित एन.के. शर्मा ‘एक्ट वन’ नामक संस्था चलाते हैं. उन के साथ मैं ने एक नाटक किया. मुझे लगा कि मुझे ऐक्टिंग के क्षेत्र में कोशिश करनी चाहिए.

मुंबई कैसे आना हुआ?

मैं और मेरी एक सहेली जिसे वकील की जौब मिली थी मुंबई आ गईं. मेरी मां यहां किसी को जानती थीं. लेकिन उन के घर पर गैस्ट आने की वजह से उन्होंने मुझे और मेरी दोस्त को अपने औफिस में ठहरा दिया जहां मैं औफिस टाइम में बाहर घूमा करती थी. 20 दिनों के बाद मुझे रहने की जगह मिली. मुझे शुरुआती दौर में असिस्टैंट डायरैक्टर रवींद्र रंधावा और राइटर अंजुम राजावली का बहुत सहयोग मिला. मुंबई आने के बाद मैं ने कई जगहों पर अपना पोर्टफोलियो भेजा. सारा अच्छा काम मुझे औडिशन के सहारे ही मिला है.

कितना संघर्ष रहा?

आप अगर फिल्म इंडस्ट्री से नहीं हैं और कोई आप का जानकार यहां नहीं है, तो आप को संघर्ष करना ही पड़ता है. फिर भी मुझे काम जल्दी मिल गया और मिल भी रहा है.

पिता की कौन सी बात जीवन में उतारती हैं?

मेरे पिता सैल्फ्मेड हैं. मैं उन की सोच को अपने जीवन में उतारती हूं. मैं पिता के बहुत क्लोज हूं. मुंबई आते वक्त उन्होंने कहा था कि तुम दूसरे शहर जा रही हो. वहां क्या होगा मुझे पता नहीं. आप को खुद हर निर्णय लेना होगा. इस तरह उन्होंने आजादी के साथसाथ जिम्मेदारी भी खूबसूरती से दे दी.

आप अधिकतर लीक से हट कर फिल्में करती हैंइस की वजह क्या है?

खुद से अलग चरित्र निभाने में ही चुनौती होती है. इस से आप सीखते हैं और परफौर्म करने का अवसर मिलता है. मैं हर तरह की फिल्म पसंद करती हूं लेकिन वह कहानी मेरे लिए अधिक माने रखती है जो मेरी जिंदगी से काफी दूर हो. ‘अनारकली आरा वाली’ के वक्त मुझे आरा जाना पड़ा. मैं वहां उन औरतों से मिली जो ऐसी परफौर्मैंस करती हैं. ‘निल बट्टे सन्नाटा’ के वक्त मैं आगरा गई थी. वहां नौकरानियों के साथ उन के काम पर जाती थी. उन के घर जा कर, उन के साथ खाना तक खाया. ये चीजें मुझे अच्छी लगती हैं.

महिलाओं का शोषण आज भी होता है. इस के लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं?

पुरुषों को लगता है कि महिलाओं के साथ कुछ भी करना उन का हक है. यह वैसा ही है जैसाकि किसी जमाने में जमींदार किसानों के साथ करते थे, ब्राह्मण नीची जातियों के साथ करते थे. यह एक मानसिकता है, जिस में एक सिरफिरा आशिक अपनी प्रेमी को मार देता है या उस पर तेजाब फेंकता है. नाराज पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है या एक आशिक रेप करता है. यह वही पिता, भाई, पति या आशिक है, जो महिलाओं को इनसानियत और समानता नहीं दे पा रहा है. इस मानसिकता से जब तक अच्छी तरह डील नहीं किया जाएगा, ऐसा होता रहेगा. इस के लिए मैं पहला जिम्मेदार दुनिया के सभी धर्मों को मानती हूं. हालांकि मैं एक धर्मनिरपेक्ष लड़की हूं, लेकिन यह आप को मानना पड़ेगा कि धर्म कहीं न कहीं नारी विरोधी है. इस के बाद संस्कृति, समाज, परिवार और परंपराएं ऐसी मानसिकता को जन्म देती हैं.

चुनौतियां मुझे कुछ नया करने को प्रेरित करती हैं : रश्मि शर्मा

मध्यवर्गीय परिवार में जन्मीं रश्मि शर्मा ने कभी नहीं सोचा था कि वे आगे चल कर राइटर से क्रिएटिव डायरैक्टर और फिर प्रोड्यूसर बनेंगी. लेकिन मेहनत, लगन और कुछ कर दिखाने की जिद ने उन्हें आम से खास बना दिया. 2008 में रश्मि ने पहली बार धारावाहिक ‘राजा की आएगी बरात’ के लिए काम किया. उस के बाद ‘रहना है तेरी पलकों की छांव में’, ‘मिसेज कौशिक की 5 बहुएं’, ‘देश की बेटी नंदनी’ के साथ मानो उन की सफलता का सिलसिला शुरू हो गया. धारावाहिक ‘साथिया साथ निभाना’ और ‘ससुराल सिमर का’ ने अब तक 1000 से भी अधिक ऐपिसोड पूरे कर लिए हैं, तो उन के दूसरे सीरियल्स जैसे ‘शक्ति’, ‘स्वरागिनी’, ‘सरोजिनी’ आदि हमेशा टीआरपी की रेस में आगे रहे. बता दें कि इन में से कुछ धारावाहिक उन्होंने खुद लिखे हैं. आइए, रश्मि के व्यक्तित्व को और करीब से जानें:

आप के मन में प्रोड्यूसर बनने का खयाल कब आया?

मैं ने इंडस्ट्री में शुरुआत बतौर क्रिएटिव डायरैक्टर की. प्रोड्यूसर बनने से पहले मैं कई धारावाहिकों की क्रिएटिव हैड रह चुकी हूं. उन धारावाहिकों की कहानी को सोचना, स्टोरी लाइन बनाना, उसे दर्शकों के सामने परोसना यह सब मेरा काम होता था. कई धारावाहिकों में काम करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि जो चीजें आज मैं दूसरों के लिए कर रही हूं, उन्हें मैं अपने लिए भी तो कर सकती हूं. दरअसल, आप जब किसी दूसरे इनसान के प्रोडक्ट को प्रेजैंट करते हैं, तो आप पर बहुत सारी पाबंदियां लगाई जाती हैं. दूसरों के लिए धारावाहिक करते समय कई बार मुझे ऐसा लगता था कि अगर यह शो मेरा होता तो मैं इसे अलग दिशा में ले जाती. इन्हीं सोचों के साथ और खुद को पहले एक अच्छा क्रिएटिव हैड साबित करने के बाद मैं ने प्रोड्यूसर बनने की सोची.

मेल डौमिनेटिंग ग्लैमर इंडस्ट्री में अपने लिए स्थान बनाना कितना मुश्किल रहा?

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं और यह कहूंगी भी कि ग्लैमर इंडस्ट्री में मेल डौमिनेशन बहुत ज्यादा स्ट्रौंग है. यहां एक फीमेल होने के नाते अपनी बात रखना और मनवाना बहुत मुश्किल है. लेकिन एक औरत होते हुए भी मैं ने अपनेआप को दोनों इंडस्ट्री (फिल्म और टीवी) में बेहतरीन तरीके से पेश किया. मैं अपनी बातें मनवाने में सफल भी रही हूं. हां, लेकिन मैं यह बात भी कहना चाहती हूं कि जब मैं क्रिएटिव हैड थी, तब मुझे यह डौमिनेशन सहना पड़ा था,लेकिन मेरा इस बात में गहरा यकीन है कि अगर आप को अपना काम आता है, आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं, तो आप को कोई डौमिनेट नहीं कर सकता. मेरे अंदर शुरू से सीखने की कला रही है. मैं ने बहुत निचले दर्जे से काम करना शुरू किया था, इसलिए मैं अपना काम अच्छी तरह जानती हूं और सही फैसला लेने में सक्षम हूं.

आप के व्यक्तित्व को निखारने में आप के पिता की क्या भूमिका रही है?

मेरे पिता प्रिंसिपल थे और मां हाउसवाइफ. मेरे पिताजी का जहांजहां तबादला होता था, हम उन के साथ चले जाते थे. मेरी पढ़ाई भी उन्हीं की निगरानी में हुई है. आज मेरी लाइफ में जो अनुशासन है, काम के प्रति जो डैडिकेशन है और काम को ले कर मैं जितनी फोक्सड हूं, सब उन्हीं की बदौलत है. चूंकि मेरे पिता ऐजुकेशन बैकग्राउंड से रहे हैं, इसलिए वे ओपन माइंडेड भी थे. वे अकसर कहते थे कि जहां मन चाहे उस दिशा में कैरियर बनाओ, लेकिन पढ़ाई पर खास ध्यान दो. उन का मानना था कि लड़का हो या लड़की उस का पढ़ालिखा होना बहुत जरूरी है.

आज किस तरह की चुनौतियां आप के सामने हैं?

हमेशा कुछ नया करना इस फील्ड की सब से बड़ी चुनौती है, जो कभी खत्म होने वाली नहीं है. यहां सब से बड़ी चुनौती है नया कौन्सैप्ट सोचना. कुछ ऐसा जो किसी और के दिमाग में न हो. बिलकुल अलग. मेरे लिए अपनेआप में यह एक चुनौती है कि मैं वह न सोचूं जो लोग सोच रहे हैं. मेरी सोच उन से अलग हो. इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है. काफी नए लोग नए टेलैंट के साथ आ रहे हैं. ऐसे में अपनेआप को सब से अलग रखना और अपनी बात को सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचाना अपनेआप में एक चुनौती है. लेकिन यह एक ऐसी चुनौती है, जो मुझे कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती है.

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