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देखिए लखनऊ की सबसे बड़ी लूट का लाइव वीडियो

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चौक सर्राफा बाजार में हुई डकैती का लाइव वीडियो पहली बार दिखा, जिसमें लुटेरे सर्राफा कारोबारियों को बेरहमी से पीटते हुये दिख रहे हैं. राजधानी लखनऊ में 40 किलो सोना और सवा करोड़ की नकदी सहित 16 करोड़ की सबसे बडी डकैती का पर्दाफाश करना पुलिस के लिये चुनौती भरा काम है. 5 मार्च की शाम 9 बजे के करीब चौक के सर्राफा बाजार में जिस तरह से लूट हुई वह पुलिस के लिये शर्म का विषय है. सर्राफा बाजार चौक कोतवाली से 50 मीटर दूर स्थित है. लुटेरे केवल लूट करने में ही सफल नहीं हुये, बल्कि फायरिंग करते भागने में भी सफल हुये. सर्राफा बाजार चौक की पतली गलियों में बना है. वहां यह लूटेरे मोटर साइकिल से आये और लूट कर भाग गये.

सर्राफा कारोबारी प्रवीण स्तोगी ने बताया कि उस समय दुकान बंद करने का समय हो रहा था. उसी समय यह घटना घटी. शनिवार और रविवार को दुकान में कैश ज्यादा होता था, वह कैश दुकान में ही रखते थे. इसके अलावा गहने भी स्ट्रांगरूम में रखे थे. सोमवार को दो दिन का कैश जमा करने बैंक में जाना था. इसलिये सब रखा था. प्रवीण रस्तोगी की मुकुंद ज्वेलर्स के नाम से ज्वेलरी शौप है. पुलिस ने घटना के वक्त मौजूद लोगों से बात की और सीसीटीवी फुटेज के बल पर लुटेरों के स्केच जारी किये है.

वैसे तो लखनऊ पुलिस ने पूरे शहर में सीसीटीवी कैमरे लगाये हैं. पर यह समय पर साथ नहीं देते हैं. इनमें से ज्यादातर कैमरे खराब हैं. पुलिस को कई अलग अलग गिरोहों पर लूट की शंका है. जिस समय लूट की घटना हुई चौक कोतवाली में पुलिस की बेहद कमी थी. पुलिस का ज्यादातर स्टाफ चुनाव ड्यूटी में गया था. अपराध जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि पुलिस लूट की जिन घटनाओं का पर्दाफाश करती है उनमें से ज्यादातर फर्जी होती हैं. जिससे सही लुटेरे पकड़े नहीं जाते. उनके हौसले बढ़ते रहते हैं.

पूरे प्रदेश में इस तरह से सर्राफा कारोबारियों और दूसरी जगहों पर लूट होती है. कुछ दिन तक पुलिस लुटेरों को पकड़ने का दावा करती है फिर मामला दब जाता है. सर्राफा कारोबारी अपने स्तर पर सुरक्षा का प्रबंध करते हैं पर वह पुलिस की तरह से व्यवस्था नहीं कर पाते हैं. जिस तरह से लखनऊ में लूट हुई, ठीक उसी तरह से इलाहाबाद में भी 27 फरवरी को लूट हुई थी. वहां भी बाइक सवार 4 लुटेरों ने लूट की थी. दो बदमाश हेलमेट पहने थे और बाकी 2 दो गमछे से अपने चेहरे ढके हुये थे. लखनऊ पुलिस अब वीडियो फुटेज के जरीये लुटेरों को तलाशने का काम कर रही है. दुकान के अंदर के वीडियो फुटेज में साफ दिख रहा है कि किस तरह से दुकानदार और लुटेरों के बीच संघर्ष हुआ.                      

महिला दिवस पर दें ये परफैक्ट ​गिफ्ट

किसी खास अवसर पर जब हमें अपनी बहन, फ्रैंड, गर्लफ्रैंड, औफिस की ​कलिग या फिर अपनी पत्नी को कोई गिफ्ट देना होता है तो हम कई गिफ्ट देखने के बाद ही उन में से एक बैस्ट चुनते हैं, उस वक्त हम सोचते हैं कि हम उन्हें कुछ ऐसा गिफ्ट दें, जिसे देखने के बाद उन के मुंह से बस यही निकले कि इस से अच्छा गिफ्ट और कुछ नहीं हो सकता. यह सब तो ठीक है लेकिन क्या कभी आप ने कुछ ऐसे गिफ्ट्स के बारे में सोचा है जो उन्हें खुशी दे, उन्हें सम्मान दे. यकीनन आप ने नहीं सोचा होगा, आइए इस महिला दिवस उन्हें कुछ ऐसे ही गिफ्ट्स देते हैं.

गंदे और भद्दे चुटकुलों को कहें ना

महिला हो या पुरुष मस्ती मजाक सभी को अच्छा लगता है, लेकिन इस का भी एक दायरा होता है. कई पुरुष जानबूझकर औफिस में व सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं से संबंधित भद्दे व गंदे जोक्स मारते हैं. ग्रुप में जब भी बात करते हैं तो ​महिलाओं को सैंटर टौपिक में रखते हैं और ठहाके मार के हंसते हैं. हर वक्त बस लड़कियों में कमी निकालते रहते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो अपनी इस आदत को बदल डालिए. सिर्फ यही नहीं बल्कि अगर आप के सामने भी कोई ऐसा करता है तो मूक दर्शक बन कर न देखते रहें बल्कि उसे भी समझाएं.

टैलेंट पर न करें शक

कुछ पुरुषों की आदत होती है कि वे ​महिलाओं को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें बारबार कहते रहते हैं कि तुम से नहीं हो पाएगा तुम रहने दो. कई बार तो औफिस में यह भी देखने को मिलता है कि अगर महिलाएं किसी काम को करने के लिए आगे आती हैं तो बौस तक कह देते हैं 'आरती तुम रहने दो इस काम को लड़के अच्छे से कर लेंगे, रोहित तुम इस काम को कर लो'. आप ऐसा व्यवहार करना छोड़ दें बल्कि अगर वे कोई काम करना चाहती हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करें, न कि उन के टैलेंट पर शक कर के उन्हें पीछे खींचे.

न ढूंढ़े टचिंग का बहाना

अक्सर पुरुष भीड़ की आड़ में महिलाओं को टच करने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं, मौका मिला नहीं कि हाथ साफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं. लेकिन क्या आप को पता है ऐसा कर के आप महिलाओं के साथ 'लिटिल रेप' करते हैं. जी हां, आज ईव टीजिंग भी लिटिल रेप से कम नहीं है इसलिए अपनी इस तरह की आदतों को छोड़िए और महिलाओं को सम्मान देना शुरू करिए.

न दें कैरेक्टर सर्टिफिकेट

महिलाओं को पूरी आजादी है कि वे क्या पहनना चाहती हैं और क्या नहीं, कहां जाना चाहतीं हैं और कहां नहीं, किस से बात करना चाहती हैं और किस से नहीं. आप इस आधार पर कभी भी किसी महिला का कैरेक्टर डिसाइड न करें कि वह कैसी है.

न करें कमैंट

पुरुष कितनी भी रफ ड्राइविंग करें लेकिन जब महिलाएं डाइविंग करते हुए थोड़ी सी भी गलती करतीं हैं तो ताने मारने लगते हैं कि समझ नहीं आता कि महिलाएं क्यों ड्राइव करती हैं, उन के लिए तो पिछली सीट ही ठीक है. आप इस तरह के कमैंट करना छोड़ दें बल्कि अगर वे गलती करते दिखें तो कमैंट के बजाय समझाएं.

आप भी बनना चाहते हैं क्रिकेट अंपायर!

भले ही सचिन तेंदुलकर व डॉन ब्रेडमैन ने क्रिकेट के महारथी हों, लेकिन क्रिकेट की फील्ड में दो जेंटलमेन ऐसे होते हैं जिनका रुतबा कुछ अलग ही रहता है. ये दो जेंटलमैन कोई और नहीं बल्कि अंपायर होते हैं. अंपायर के पास फील्ड में कोई भी निर्णय लेने की स्वतंत्रता रहती है. वह जो भी निर्णय लेता है दोनों टीमों के खिलाड़ियों को उसे स्वीकारना ही होता है.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पिछले सालों में कई अंपायर आए और उनमें से कुछ अंपायरों ने तो दर्शकों का भी दिल जीत लिया. अंपायरों की जीवनशैली भी बड़ी गजब होती है, उन्हें सालाना वेतन के अलावा हर मैच की फीस भी दी जाती है. कई क्रिकेट प्रेमी अंपायरिंग को प्रोफेशन बनाने के सपने को अपने दिलों में संजोए रहते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय अंपायर बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए होती है व इसकी प्रक्रिया क्या है इससे बहुत कम लोग परिचित हैं. आइए जानते हैं कि कैसे क्रिकेट अंपायरिंग में बनाएं करियर.

अंपायर बनने के लिए योग्यता

1. अंपायर बनने के लिए क्रिकेट के 42 नियमों को जानना आवश्यक है.

2. खेल की बेहतरीन समझ होनी चाहिए.

3. एक अच्छा व्यवस्थापक होना चाहिए जो मैदान में हर बिगड़ती बात को आराम से संभाल सके.

4. साथ ही किसी भी परिस्थिति में शांत रहने वाला होना चाहिए. गुस्सैल व्यक्ति अंपायर नहीं बन सकता.

कैसे बनें अंपायर

अंपायर बनने के लिए राज्य स्तरीय स्पोर्ट बॉडियों द्वारा समय-समय पर प्रायोगिक व लिखित परिक्षाएं आयोजित की जाती हैं. अगर व्यक्ति इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तब वह बीसीसीआई के द्वारा आयोजित की जाने वाली अंपायरिंग परीक्षा में बैठने के लिए योग्य माना जाता है.

अगर व्यक्ति इस दूसरे स्तर की परीक्षा को पास कर लेता है तो उसे बीसीसीआई पैनल के लिए चुन लिया जाता है और कुछ दिनों तक राष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग करने के बाद व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग करने का मौका दिया जाता है.

अन्याय सहना गलत

एक युवा साधारण से दर्जी के यहां काम करने वाला, दिल्ली सहित कई शहरों में जा कर बीसियों लड़कियों और कुछ लड़कों का बलात्कार कर पाए यह घिनौनी हरकत न केवल डरा देने वाली है, इस समाज के अन्याय को सहने की गलत आदत की पुष्टि भी करती है.

वह युवक तो अब कहता है कि उस ने 400-500 लड़कियों से जबरदस्ती की है पर पुलिस उस की निशानदेही पर केवल 15-20 तक पहुंच पाई है, क्योंकि वह युवक अनजान लड़कियों को पकड़ता था, उन्हें अकेले में ले जा कर दुराचार करता और छोड़ देता था. उसे खुद नहीं मालूम कि वे कहां रहती थीं.

इन लड़कियों के मातापिताओं ने मुंह सी रखे थे, यह ज्यादा भयावह है. इस तरह के दुर्जन होते हैं, इस का अंदाजा है पर उन के सताए लोग आज भी कानून व्यवस्था व सामाजिक मान्यताओं से इतना ज्यादा डरते हैं कि वे यातना का दुख सह लेते हैं पर हुए अपराध की सूचना नहीं देते.

आमतौर पर जेब कतरी जाए, चेन खींच ली जाए, घर में चोरी हो जाए, तो लोग तुरंत पुलिस तक पहुंच जाते हैं पर सैकड़ों मातापिता अपनी बच्चियों के साथ हुई बलात्कार की घटना की शिकायत पुलिस में यह सोच न करें कि कहीं उन की इज्जत पर बट्टा न लग जाए, यह सरकार की नाक काटने के बराबर है. यह कैसी सरकार है जिस ने इस सीरियल अपराध पर मुंह सी रखा है और जो सफाई मिल रही है वह छोटे इंस्पैक्टरों से मिल रही है.

साफ है हमारे यहां सरकारें राज करने आती हैं, राज चलाने नहीं. नेता चुनाव लड़ कर, जीत कर पद का लाभ उठाना चाहते हैं, कर्तव्य पूरा नहीं करना चाहते. यदि जनता को नेताओं व पुलिस पर भरोसा होता तो इन पीडि़तों में से आधे तो अपने क्षेत्र के नेताओं से मिलते और व्यथा सुनाते. लगता है आम आदमी को पूरा एहसास है कि सरकार तो क्या सरकार का सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच, पंच सब इस तरह राजनीति के स्विमिंग पूल में नहाने में व्यस्त हैं कि जनता की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं और उन के दरवाजे खटखटाने से कोई लाभ नहीं.

देश की स्थिति इस बुरी तरह खराब होगी कि एक अदना सा पर हिम्मती युवा इतना जघन्य काम लगातार कई सालों तक कर सके, देश की नाक कटाने वाला है. हम अपने को किस तरह का विश्व गुरु कहते हैं, किस मुंह से अपनी सभ्यता का बखान करते हैं, कैसे अपनी संस्कृति का ढोल पीटते हैं जब हमारे बीच ऐसे युवा मजे से सामाजिक व्यवस्था तारतार कर हमें जानवरों माफिक बनाते हैं? तिरंगे को सलाम या तिरंगे के अपमान पर बौखलाना देशभक्ति नहीं है, यह सिर्फ दिखावा है. जो देश समाज को सुरक्षा न दे सके उसे ज्यादा हांकना तो नहीं चाहिए.

एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग : कैरियर की ऊंची उड़ान

‘‘पापा, क्या मैं भी हवाईजहाज में बैठ कर उड़ सकती हूं? मैं भी अंतरिक्ष वैज्ञानिक बन सकती हूं? क्या मैं भी अंतरिक्ष यात्री बन सकती हूं?’’ ये सवाल किसी आम व्यक्ति के नहीं, बल्कि भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के थे, जो वे बचपन में अपने पिता से किया करती थीं. कल्पना ने भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री बनने का गौरव प्राप्त कर अपना यह सपना साकार किया. कल्पना चावला एयरोनौटिकल इंजीनियर थीं.

कल्पना ने काम के प्रति अपने जनून से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा. उन का यही जनून युवाओं को एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग की ओर प्रेरित कर रहा है. आज युवा इंजीनियरिंग की ट्रैडिशनल ब्रांचों को छोड़ कर एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग में ज्यादा रुचि ले रहे हैं.

क्या है एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग

एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग स्पेस से संबंधित है. इस में स्पेस साइंस और एयरोनौटिक्स का अध्ययन कराया जाता है. इस के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के एयरक्राफ्ट, रौकेट और मिसाइल से जुड़ी तकनीक की जानकारी दी जाती है. विमान की तकनीक, उड़ने की क्षमता, गति और ढांचे आदि के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है. साथ ही हवाईजहाज के कलपुरजों और ढांचे की बनावट व रखरखाव का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.

एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग में स्पेस और सैटेलाइट रिसर्च, डिजाइनिंग और डैवलपमैंट आदि पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

योग्यता

एयरोनौटिकल इंजीनियर बनने के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से पूरी तरह फिट होना जरूरी है. तुरंत निर्णय लेने की क्षमता, शार्प माइंड और पौजिटिव सोच वाले युवा इसे अपना सकते हैं. तेज दिमाग वाला ही यहां सफलता की ऊंची उड़ान भर सकता है.

एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग का संबंध सीधे आकाश से जुड़ा है. इसलिए वहां उन्हीं ग्रहों और आकाशीय तरंगों के हिसाब से काम करना होता है. इस क्षेत्र के लिए गणित का ज्ञान होना बहुत जरूरी है. अभ्यर्थी का मैथमैटिक्स और फिजिक्स विषय के साथ 12वीं पास होना अति आवश्यक है. प्रवेश परीक्षा के माध्यम से बीई या बीटैक में प्रवेश मिलता है. इस के अलावा इस कोर्स में प्रवेश के लिए एयरोनौटिकल सोसायटी औफ इंडिया की एसोसिएट मैंबरशिप परीक्षा भी एक अच्छा विकल्प है.

एयरोनौटिकल सोसायटी औफ इंडिया के एसोसिएट मैंबरशिप की परीक्षा पास करने के बाद एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग में अपना भविष्य बना सकते हैं. इस कोर्स में थ्योरी के साथसाथ प्रैक्टिकल का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.

कोर्स डायरैक्टर जनरल औफ सिविल एविएशन से मान्यताप्राप्त संस्थानों से ही करना चाहिए, क्योंकि ये मान्यताप्राप्त संस्थान पूरा कोर्स होने के बाद डीजीसीए द्वारा एयरोनौटिकल इंजीनियर को लाइसैंस देते हैं. यह लाइसैंस राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तर पर मान्य होता है.

एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग का बीई या बीटैक लैवल का कोर्स 4 साल का होता है. डिप्लोमा कोर्स की अवधि 2 से 3 साल की होती है.

कुछ विदेशी विश्वविद्यालय एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट लैवल पर प्रवेश परीक्षा के बाद कोर्स कराते हैं.

कुछ एयरोनौटिक्स संस्थान अंडरग्रैजुएट लैवल पर भी प्रवेश परीक्षा कराते हैं. चयनित उम्मीदवारों को मान्यताप्राप्त संस्थानों से प्रशिक्षण भी दिया जाता है.

वेतन

इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है. जौब की शतप्रतिशत संभावनाएं हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी एयरलाइंस को ट्रेंड व अनुभवी एयरोनौटिकल इंजीनियरों की खासी जरूरत होती है. अनुभवी व ट्रेंड इंजीनियरों की काफी डिमांड है.

इस के अलावा देश की ख्यातिप्राप्त कंपनी हिंदुस्तान एयरोनौटिक्स लिमिटेड भी अपने यहां एयरोनौटिकल इंजीनियरों की नियुक्ति करती है.

शुरुआती दौर में वेतन थोड़ा कम मिलता है, पर जैसेजैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन में भी वृद्धि होती रहती है. वैसे 25 से 30 हजार रुपए प्रतिमाह के वेतन पर देश के कई एयरोनौटिक्स संस्थान अपने यहां ट्रेनीज रखते हैं. बाद में यही धनराशि लाखों में पहुंच जाती है.                      

प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान

–       एयरोनौटिकल सोसायटी औफ इंडिया.

–       इंडियन इंस्टिट्यूट औफ एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग, देहरादून, उत्तराखंड.

–       स्कूल औफ एविएशन साइंस ऐंड टैक्नोलौजी, दिल्ली फ्लाइंग क्लब, नई दिल्ली.

–       मद्रास इंस्टिट्यूट औफ स्पेस साइंस तिरुवनंतपुरम.

–       इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली.

–       पंजाब इंजीनियरिंग कालेज, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़.

संस्कृति की ठेकेदारी में उलझी पोर्न साइट्स

पटना रेलवे जंक्शन पर कुल 10 प्लेटफौर्म हैं. जंक्शन होने के कारण यहां यात्रियों की भागदौड़ और धक्कामुक्की आम बात है. पिछले कुछ महीनों से हर प्लेटफौर्म पर ऐसे युवकयुवतियों की भरमार नजर आती है, जिन्हें रेलगाड़ी से कहीं आनाजाना नहीं होता. वे प्लेटफौर्म पर बैठे घंटों स्मार्टफोन पर नजरें टिकाए घंटों साथ गुजार देते हैं.

10 रुपए का प्लेटफौर्म टिकट ले कर वे युवा निश्चिंत हो कर पीठ पर लैपटौप बैग लटकाए वहां समय गुजारते हैं. ये युवा वहां पोर्न साइट्स सर्च करते रहते हैं और पोर्न फिल्में देखते हैं.

आप सोच रहे होंगे आखिर इस के लिए रेलवे प्लेटफौर्म पर जाने की क्या जरूरत है? जरूरत है, क्योंकि रेलवे ने पटना जंक्शन पर मुफ्त वाईफाई सेवा शुरू की है. इस से युवाओं को वहां मुफ्त में पोर्न साइट्स का आनंद लेने का मौका मिलता है.

रेलवे ने देश के कई स्टेशनों को वाईफाई सेवा से लैस कर दिया है, पर रेलवे की मुफ्त वाईफाई सेवा का सब से ज्यादा इस्तेमाल पटना जंक्शन पर हो रहा है. स्टेशन पर मुसाफिरों की बढ़ती संख्या और वाईफाई के इस्तेमाल को देखते हुए इस की क्षमता 10 गुना अधिक बढ़ाने की तैयारी की जा रही है. वाईफाई इस्तेमाल करने के मामले में दूसरे नंबर पर जयपुर, तीसरे पर बेंगलुरु और चौथे पर दिल्ली रेलवे स्टेशन हैं. गौरतलब है कि पटना जंक्शन समेत देश 23 रेलवे स्टेशनों को रेलटैल और युगल की ओर से मुफ्त वाईफाई सेवा से लैस किया गया है.

सभी 23 रेलवे स्टेशनों में से पटना रेलवे स्टेशन पर सब से ज्यादा मुसाफिर वाईफाई का उपयोग कर रहे हैं. फिलहाल पटना जंक्शन पर एक गीगाबाइट क्षमता के वाईफाई की मशीन लगाई गई है. यात्रियों द्वारा इंटरनैट का अधिक इस्तेमाल किए जाने से उस की गति काफी धीमी हो गई है. इसे सुधारने के लिए रेलवे ने वाईफाई की क्षमता 10 गीगाबाइट करने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को भेजा है.

रेलवे सूत्रों के मुताबिक पटना जंक्शन पर सब से ज्यादा रेल यात्री यूट्यूब और पोर्न साइट्स सर्च कर रहे हैं. सब से ज्यादा डाटा इन्हीं साइट्स को देखने से खर्च हो रहा है. उस के बाद विकिपीडिया को सर्च किया जा रहा है.

ज्यादातर मुसाफिर इन्हीं साइट्स का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं. इस के अलावा रेल यात्री मुफ्त वाईफाई से अपने मोबाइल ऐप्स भी जम कर अपडेट करते हैं. फिल्म डाउनलोड करने में यात्री वाईफाई का जम कर इस्तेमाल करते हैं. पटना के बाद बिहार के गया और हाजीपुर जंक्शन को भी रेलवे ने फ्री वाईफाई से लैस कर दिया है.

एक ओर जहां रेलवे की फ्री वाईफाई सेवा का ज्यादातर इस्तेमाल पोर्न साइट्स देखने के लिए किया जा रहा है, वहीं नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल बीएसएनएल, एमटीएनएल और दूसरे इंटरनैट सर्विस प्रोवाइडर्स को 13 पोर्न साइट्स पर बैन लगाने का आदेश दिया था. भजभज मंडली सरकार का मानना है कि पोर्न साइट्स देखने से बच्चे और युवा बिगड़ सकते हैं. यह बच्चों के भविष्य और देश के लिए ठीक नहीं है.

समाजसेवी किरण राय कहती हैं कि पोर्न साइट्स को देखने से सभ्यता और संस्कृति के बिगड़ने की दलील देना रूढि़वादी मानसिकता को दर्शाता है. आज इंटरनैट के जमाने में सबकुछ खुला है और हर कोई अपनी मरजी और जरूरत के हिसाब से उस का उपयोग कर रहा है. इसलिए पोर्न साइट्स के नाम पर संस्कृति की दुहाई देना या होहल्ला मचाना ठीक नहीं है.

जानकारों का मानना है कि सैक्स सृष्टि को चलाने के लिए जरूरी चीज है, फिर यह गंदा और समाज को भटकाने वाला कैसे हो सकता है? हां, यह जरूर है कि हर समय सैक्स के बारे में सोचना और उस में लिप्त रहना ठीक नहीं है. वैसे यह तर्क हर चीज पर लागू होता है. पटना हाईकोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि अति हर चीज की खराब है. जैसे किसी बीमारी के इलाज के लिए दवा की मात्रा तय की जाती है, उस का अधिक डोज जानलेवा हो सकता है. ठीक उसी प्रकार सैक्स की अति भी ठीक नहीं है.

पोंगापंथी समाज और सरकार को यह समझना चाहिए कि पोर्न साइट्स युवाओं को भटकाने का काम नहीं कर रही हैं. ये समाज का अहम हिस्सा हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट पोर्न साइट्स पर बैन लगाने वाली याचिका को खारिज नहीं करता.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी को उस के कमरे में पोर्न देखने से कैसे रोका जा सकता है? यह संविधान की धारा 21 के तहत मिला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है. कामसूत्र की रचना करने वाले देश में व्यक्तिगत आजादी को सब से ऊपर रखना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कामुकता व्यक्तिगत इच्छा है. इस पर जबरन या कानूनन रोक लगाना वाजिब नहीं है.

गौरतलब है कि इंदौर के रहने वाले एडवोकेट कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर पोर्न वैबसाइट्स पर रोक लगाने की मांग की थी. याचिकाकर्ता का तर्क था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले ज्यादातर अपराध की वजह पोर्न साइट्स हैं. इन से सैक्स अपराधों को बढ़ावा मिलता है. कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया है.

गूगल के सर्वे के मुताबिक भारत में 5 में से 3 मोबाइल फोन उपयोग करने वाले पोर्न साइट्स देखते हैं. देश के कुल 50त्न  स्मार्टफोन पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. देश में 4.31 मिनट, उत्तर प्रदेश में 7.11 मिनट और दिल्ली में 8.02 मिनट पर पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. इतना ही नहीं महिलाएं भी पोर्न साइट्स देखने में पीछे नहीं हैं. 25त्न महिलाएं पोर्न साइट्स देखना पसंद करती हैं. यह दुनिया भर के 23त्न आंकड़े से 2 फीसदी ज्यादा है.

डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि सैक्स करने या सैक्स की किताब पढ़ने वालों को उस से दिमागी शांति और आनंद मिलता है. किसी को सैक्स करने से रोका नहीं जा सकता और न ही किसी तरह की सैक्सी फिल्म देखने पर सरकार द्वारा पाबंदी लगाई जा सकती है. अगर पोर्न साइट्स देखने से युवा और समाज में भटकाव आता तो अमेरिका आज सब से फिसड्डी देश होता. अमेरिका में रोजाना 14.2 अरब लोग पोर्न पेज पर विजिट करते हैं, यह आंकड़ा दुनियाभर का 40% है.

भारत में करीब 8.22 मिनट पोर्न सामग्री देखी जाती है, जबकि दुनिया भर में यह आंकड़ा 8.56 मिनट है. उतरी भारत में सब से ज्यादा पोर्न साइट्स देखी जाती हैं. पोर्न साइट्स देखने के मामले में मिजोरम सब से आगे है.

भारत में सब से ज्यादा सनी लियोनी की पोर्न फिल्मों को देखा जाता है. उस के बाद लीजा एन, भारतीय सैक्स, भारतीय बीवी और भारतीय भाभी को सब से ज्यादा सर्च किया जाता है.

भारतीय समाज और संस्कृति में पोर्न और सैक्स पर बात करने की सख्त मनाही है. इस मसले पर बात करने वाले को समाज से भटका हुआ व्यक्ति माना जाता है. यदि किसी घर में किसी बच्चे ने गलती से भी इस बारे में कुछ पूछ लिया तो डांट कर उसे चुप करा दिया जाता है या दूसरी बातों से उसे बहला दिया जाता है.

पुराने समय में तो व्यभिचार समाज और परिवार पर ज्यादा हावी था. जानकारों का मानना है कि पुराने जमाने में परिवार के ही कई मर्द और औरतों के बीच नाजायज रिश्ता कायम हुआ करता था. किसी का अपने जेठ से तो किसी का भाभी से, ससुर का बहू से, दामाद के सास के साथ सैक्स के रिश्ते बनते रहते थे. यह सब काफी चोरीछिपे, परदे के पीछे और घुप्प अंधेरे में हुआ करता था, इसलिए उस समाज को सुसंस्कृत माना जाता है. आज सैक्स को ले कर धीरेधीरे ही सही खुलापन आया है, जिस से पुराने जमाने के तथाकथित सुसंस्कृत लोग हायतोबा मचाए रहते हैं.

हाईस्कूल के मास्टर सुकांत सिंह कहते हैं कि भारतीय समाज सैक्स को छिपछिपा कर उपयोग में लाता है. दबी जबान में इस के बारे में बातें की जाती हैं. पुराने जमाने में सैक्स की कहानियों की किताबें बड़े पैमाने पर बिकती थीं. उस समय भी बच्चे और बड़े दोनों चोरीछिपे उन किताबों को पढ़ते थे. बाप की अलमारियों और बक्सों से सैक्स कहानियों की किताबें चुरा कर उन के बच्चे भी पढ़ा करते थे.

क्या इस से समाज और देश बरबाद हो गया? क्या बड़ेबड़े अफसर, वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर, लेखक, कवि, साहित्यकारों ने कभी सैक्स की किताबें नहीं पढ़ीं? कभी पोर्न साइट्स नहीं देखीं? ऐसे में पोर्न साइट्स देखने वाले आज के युवाओं के भटकने या बरबाद होने की सोच बेकार है.

आज सैक्स की किताबों की जगह पोर्न साइट्स ने ले ली है और युवाओं के साथ बुजुर्ग भी उस का जम कर आनंद उठा रहे हैं. ये केवल मनोरंजन का जरिया भर हैं.

कैसे भारत की पहली महिला फायर फाइटर बनीं हर्षिनी कान्हेकर

भारत की पहली फायर वूमन हर्षिनी कान्हेकर ने यह सिद्ध कर दिया है कि जैंडर के आधार पर कोई काम निर्धारित नहीं होता, क्योंकि आज महिलाएं हर क्षेत्र में ऊंचाइयां छू रही हैं. हां, 10-15 साल पहले बात अलग थी, जब महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका जाता था.

हर्षिनी के इस सफल अभियान में उन के पिता ने बहुत सहयोग दिया. हर्षिनी के 69 वर्षीय पिता बापुराव गोपाल राव कान्हेकर महाराष्ट्र के सिंचाई विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर हैं. उन्हें पढ़ाई के बारे में बहुत जानकारी थी. उन्होंने अपनी पत्नी को भी शादी के बाद पढ़ने के लिए प्रेरित किया. वे हमेशा किसी न किसी कोर्स के बारे में हर्षिनी को बताते रहते थे, उस सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के लिए प्रोत्साहित करते थे ताकि हर्षिनी की स्पीड लिखने में बढ़े. उन्होंने हमेशा बच्चों को ग्राउंडेड रखा. वे कहते हैं, ‘‘मुझे पता था कि हर्षिनी इस फील्ड में अच्छा करेगी. उस का पैशन मुझे दिख गया था. मैं सुबह उठ कर उसे प्रैक्टिस के लिए रोज तैयार करता था ताकि उसे मेरे पैशन का भी पता लगे.’’

अपने पिता के सपने को साकार करते हुए आज हर्षिनी ओएनजीसी की फायर सर्विसेज की डिप्टी मैनेजर हैं. आइए जानते हैं उन की सफलता का राज:

यहां तक आने की शुरुआत कैसे हुई?

मेरे पिता हमेशा शिक्षा को ले कर बहुत जागरूक थे. किसी नए कालेज में जाने से पहले वे वहां की सारी सिचुएशन से हमें अवगत कराते थे. फायर कालेज में एडमिशन के दौरान वे मुझे वहां ले गए, तो पता चला कि वहां आज तक किसी लड़की ने दाखिला नहीं लिया है. सब चौंक गए कि लड़की यहां कैसे आई. उन्होंने यहां तक कहा कि मैडम आप आर्मी या नेवी में कोशिश करें, यह तो लड़कों का कालेज है. यहां आप टिक नहीं पाएंगी. ये बातें मुझे पिंच कर गईं. मगर मेरे पिता ने मेरा हौसला बढ़ाया और मैं ने तभी ठान लिया कि मैं यहीं पढ़ूंगी. मेरी फ्रैंड ने भी मेरे साथ फार्म भरा. यूपीएससी की इस परीक्षा में केवल 30 सीटें पूरे भारत में थीं. मैं ने प्रवेश परीक्षा दी और पास हो गई. मेरे लिए यह बड़ी बात थी.

पुरुषों के क्षेत्र में पढ़ने और काम करने में कितनी चुनौती थी?

परीक्षा पास करने के बाद भी लोगों ने तरहतरह की राय दीं. यह कोर्स क्या है यह समझने में मेरे मातापिता ने भी समय लिया. फिर मैं ने इस क्षेत्र के एक व्यक्ति से परामर्श लिया, तो पता चला कि कोर्स बहुत अच्छा है. फिर मेरे पिता ने भी मेरा पूरा साथ दिया और मैं ने ऐडमिशन ले लिया. जब मैं ने खाकी वरदी पहनी, तो मेरी मनोकामना तो पूरी हुई, पर दायित्व भी आ गया. जो लोग पहले हंस रहे थे वे अब चुप थे. मुझे प्रूव करना था. मैं वे सभी काम किया करती थी, जो लड़के करते थे. मैं ने अपनेआप को पूरी तरह से अनुशासन में ढाल लिया था ताकि कोई मेरे ऊपर उंगली न उठाए. कमजोरी मैं ने कभी कोई नहीं दिखाई, क्योंकि इस का असर बाकी लड़कियों पर पड़ता, क्योंकि मैं उन का प्रतिनिधित्व कर रही थी.

पिता की कौन सी बात को अपने जीवन में उतारती हैं?

लोग मुझे कहते हैं कि मैं बहुत साहसी हूं पर मेरे मातापिता मुझ से भी अधिक साहसी हैं. तभी तो उन्होंने मुझे लड़कों के कालेज में भेजने की हिम्मत दिखाई. जब मैं कोलकाता में 3 महीने जैंट्स होस्टल में अकेली रही. पिता मुझे अलग भी रख सकते थे, पर उन्होंने वहीं रह कर मुझे पढ़ने का निर्देश दिया. मुझे लगता है मेरे पिता ने समाज की उस सोच को बदलने में बड़ा कदम उठाया, जो लड़कालड़की में भेद करती है.

महिलाओं को मिलता है पुरुषों से कम वेतन

वर्ल्ड वुमन्स डे के ठीक पहले ऐसी खबर का सामने आना काने समाज के अंधे होने की तरफ इशारा कर रही है. एक तरफ तो महिलाओं के लिए एक दिन मनाने की तैयारियां जोरों शोरों से चल रही हैं, और दूसरी तरफ नीम के तरह कड़वा एक सच भी है. विश्व के कई देशों में आज भी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलता है.

औरतों को आज भी बहुत लोग कमजोर समझते हैं और उनकी काबिलियत पर भी शक किया जाता है. एक शोध में पता चला है कि हमारे देश में एक ही काम के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाएं 25 प्रतिशत तक कम वेतन मिलता है. शोध की रिपोर्ट के अनुसार पुरुष जहां एक घंटे में औसतन 345.80 रुपये कमाते हैं वहीं महिलाओं की कमाई केवल 259.8 रुपये है. हालांकि पुरुषों और महिलाओं के बीच का यह वेतन अंतर 2015 के अंतर से कम है.

एक किताब के अनुसार कई ठोस कदम उठाने के बावजूद 62.4 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि उनके साथ काम करने वाले पुरुषों को प्रमोशन के अधिक अवसर मिलते हैं.

यह बात तो समझ के परे है कि पढ़े-लिखे लोगों के बीच भी यह अंतर क्यों है ? क्योंकि बुद्धिजीवियों का तो यही मानना है कि शिक्षा से इंसानों की सोच को दिशा मिलती है. तो फिर आईटी से लेकर बैंकिंग जैसे बड़े बड़े सेक्टर में भी महिलाओं और पुरुषों में भेद-भाव क्यों ? सोचने वाली बात है कि एक दिन के लिए महिलाओं को सम्मानों से लाद दिया जाए और साल के 364 दिन हर कदम पर असमान व्यवहार दिखाया जाए.

 

कुकिंग मेरी हौबी नहीं, पैशन है : कीर्ति भौतिका

‘मास्टर शैफ सीजन-5’ की विजेता रहीं कोलकाता की कीर्ति भौतिका ने कोलकाता के जीडी बिड़ला कालेज से न्यूट्रिशन में ग्रैजुएशन किया है. कोलकाता के साल्टलेक इलाके में कीर्ति एक बेकरी शौप चलाती हैं. कीर्ति इसे बेकरी के बजाय केकरी कहना ज्यादा पसंद करती हैं. उन का केकरी सुगरप्लम केकरी के नाम से जाना जाता है और पूरे साल्टलेक में एगलैस केक व पेस्ट्री के लिए बहुत लोकप्रिय है.

कीर्ति ने महज 18 साल की उम्र में शैफ का कैरियर अपनाया और बेकरी सुगरप्लम केकरी से इस की शुरुआत की. कालेज में ग्रैजुएशन की पढ़ाई के साथ कीर्ति ने बेकरी शौप को बखूबी मैनेज किया. पिछले कई सालों से कीर्ति का वर्क शैड्यूल बड़ा व्यस्त रहा है. टाइम मैनेजमैंट से ले कर बेकरी मैनेजमैंट तक का सारा काम वे बड़ी शिद्दत से पूरा करती हैं. यही वजह है कि दिन की शुरुआत सुबह 5 बजे से होती है.

कीर्ति ने अपनी फाइनल डिश से मास्टर शैफ के जजों- विकास खन्ना, कुणाल कपूर और जोराबर कालरा का दिल जीत लिया था. पेश हैं कीर्ति से बातचीत के कुछ अंश:

मास्टर शैफ की जर्नी कैसी रही? सब से ज्यादा गर्व कब महसूस हुआ?

बहुत अच्छी रही. हर चैलेंज के दौरान मैं ने कुछ न कुछ सीखा. इस शो की सब से बड़ी उपलब्धि मेरे लिए यह रही कि हर दिन मैं ने सीखा. इस के अलावा बहुत सारे लोगों से मिली, जो दुनिया के अलगअलग हिस्सों से आए थे. शो के दौरान दुनिया के अलगअलग हिस्सों में जाना हुआ. शो में भाग लेने वाले हम सब एक बड़े परिवार की तरह थे बिलकुल फैमिली की तरह. यह पहला मौका था जब मैं अपने परिवार से इतनी दूर गई और वह भी कई महीनों के लिए. सब से अच्छी बात यह रही कि मैं ने बहुत दोस्त बनाए.

रही बात गर्व महसूस करने की तो ऐसा मौका 2 बार आया. उस क्षण को मैं जीतेजी कभी नहीं भूल पाऊंगी, जब मास्टर शैफ में मुझे मेरे नाम का ऐप्रन मिला. इस के अलावा उस समय भी मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ जब फाइनल ऐपिसोड में मेरे मम्मीपापा शो में मौजूद थे और शो का खिताब जीतते हुए उन्होंने मुझे देखा.

इस पूरी जर्नी में माथे पर शिकन लाने वाली कोई बात थी क्या?

नौनवैज को ले कर शुरुआत में थोड़ी परेशानी हुई थी. मजेदार बात यह है कि मास्टर शैफ का सीजन-4 वैज शो था. सब के इतना कहने के बाद भी मैं ने उस सीजन में भाग नहीं लिया था. सीजन-5 सामान्य था. जाहिर है इस में नौनवैज भी शामिल था. मास्टर शैफ में मुझे कई मौकों पर नौनवैज भी बनाना पड़ा. पहले तो मेरे पापा को यह बात गंवारा नहीं थी कि मैं नौनवैज बनाऊं. उन्होंने कहा कि घरपरिवार के लोग शो में तुम्हें नौनवैज बनाते देखेंगे तो बहुत बातें बनाएंगे. हमारे परिवार की बड़ी आलोचना होगी. लेकिन मैं ने पापा को किसी तरह इस के लिए मना लिया.

मास्टर शैफ में आप को जीत दिलाने वाली डिश कौन सी थी?

वह डिश थी एर्ल ग्रे टी ऐंड फिग टार्ट विद हनी सिट्रस क्रीम फिलिंग. इस डिश ने सभी जजों का दिल जीत लिया था.

मास्टर शैफ का खिताब जीतने के बाद लाइफ में कैसा और कितना बदलाव आया?

मास्टर शैफ का खिताब जीतने के बाद मेरे जीवन में बहुत बदलाव आया. पहले मैं होम कुक थी, पर अब मास्टर शैफ हूं. इस नाते मैं अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझती हूं. मेरा मानना है कि सिर्फ स्वाद काफी नहीं है, फूड का हैल्दी होना भी जरूरी है, इसलिए मैं ज्यादा से ज्यादा अपनी बनाई डिशेज में हैल्दी सामग्री का इस्तेमाल करती हूं. मसलन, मैदे की जगह आटा, जिस में बहुत फाइबर होता है, का प्रयोग करती हूं. इसी तरह कम से कम चीनी का प्रयोग या फिर चीनी के बदले शहद का इस्तेमाल करती हूं.

आगे की क्या योजना है?

2 साल पहले मैं ने सुगरप्लम केकरी खोली थी. अब मैं एक फूड स्टूडियो पर काम करना चाहूंगी. इस स्टूडियो से मैं बेकिंग क्लास लूंगी. यहां मैं भी बहुत कुछ सीखूंगी. मास्टर शैफ के दौरान मैं ने पाया कि हर इनसान के पास सिखाने के लिए कुछ न कुछ जरूर होता है. स्टूडियो में जितने लोगों से मैं मिलूंगी, उन को सिखाने के साथसाथ मैं खुद भी सीखूंगी.

मैंने बहुत कुछ गिव अप किया है : सुमन अग्रवाल

3 बेटियों की मां सुमन अग्रवाल न सिर्फ न्यूट्रिशन इंडस्ट्री की जानीमानी हस्ती हैं, बल्कि एक सफल व्यवसायी, लेखिका, गायिका के साथसाथ नृत्य कला में भी महारत हासिल कर चुकी हैं. वेट लौस, वेट मैंटेन, वेट गेन, डाइट फौर बूस्टिंग इम्यूनिटी, चिल्ड्रन न्यूट्रिशन जैसी सर्विसेज अपने जरीए लोगों तक पहुंचाने के लिए 2001 में उन्होंने मुंबई और कोलकाता में सैल्फ केयर सैंटर की शुरुआत की. स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए उन्होंने 3 किताबें- ‘द डौंट डाइट डाइट कुकबुक’, ‘अनजंक्ड हैल्दी ईटिंग फौर वेट लौस’ व ‘सुपर किड हैल्दी ईटिंग फौर किड्स ऐंड टीन’ भी लिखीं. मां बनने के बाद कैरियर की शुरुआत और सफलता पाने वाली सुमन की जिंदगी को आइए और करीब से जानें:

आप ने बतौर न्यूट्रिशनिस्ट एवं फिटनैस ट्रेनर शुरुआत कैसे की और आप का सफर कैसा रहा?

बचपन से मेरी इस क्षेत्र में रुचि रही है. 12-13 साल की उम्र से मैं हैल्थ और बीमारियों से जुड़ी किताबें पढ़ती थी, लेकिन मेरी शादी 20 साल की उम्र में ही हो गई और फिर बच्चे हो गए, इसलिए इस ओर बढ़ने का मौका नहीं मिला. अपनी तीसरी बेटी को जन्म देने के बाद मैं ने 1 साल का फूड ऐंड न्यूट्रिशन डिप्लोमा किया. मुझे हमेशा लगता था कि कुछ खाने से अगर बीमारी हो सकती है, तो खाने के जरीए ठीक भी हो सकती है. मैं सही थी. कोर्स के दौरान मुझे इन्हीं बातों की जानकारी मिली. जब मेरी छोटी बेटी 3 साल की हो गई तब मैं ने औफिस जौइन किया. धीरेधीरे मेरे पास क्लाइंट आने लगे और मेरा व्यवसाय बढ़ता गया. आम लोगों के साथसाथ आज सैलिब्रिटीज और इंडस्ट्रिलिस्ट भी मेरे क्लाइंट हैं. मैं ने शुरुआत अपने पति के औफिस के एक छोटे से कैबिन से की थी, लेकिन आज मेरा सैंटर 5000 स्क्वेयर फुट में फैला है. पहले मेरे पास सिर्फ एक कर्मचारी था और अब 50 हैं.

पुरुषप्रधान समाज में अपने लिए स्थान बनाना कितना मुश्किल रहा?

मैं खुश हूं कि इन क्षेत्रों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है, इसलिए मुझे बतौर प्रतिस्पर्धी बहुत कम पुरुषों का सामना करना पड़ा. हां, लेकिन शुरुआती दौर में मेरे साथ ऐसा बहुत होता था कि जब मेरे पुरुष दोस्त किसी पुरुष से मेरी तारीफ करते और उसे मेरे पास ट्रीटमैंट के लिए जाने को कहते तो वे यह कह कर टाल देते कि एक महिला पुरुष को कैसे ठीक कर सकती है. उन की यह प्रतिक्रिया मुझे थोड़ी देर के लिए निराश कर देती थी, पर मैं सारी चीजों को नजरअंदाज कर अपना पूरा ध्यान काम पर लगाती और आज परिणाम यह है कि मेरे पास जितनी महिला क्लाइंट हैं उतने ही पुरुष भी हैं.

आप के व्यक्तित्व को निखारने में आप के पिता की क्या भूमिका रही है?

सच कहूं तो मेरे अंदर न्यूट्रिशनिस्ट का बीज बोने वाले मेरे पिता ही थे. दरअसल, वे बहुत ज्यादा हैल्थ कौंशस थे. हमारा पूरा परिवार यानी 6 लोग, 4 भाईबहन और ममीपापा एकसाथ ब्रेकफास्ट करते थे, जो 1 घंटा चलता था. उस दौरान मेरे पापा इसी विषय पर बात करते कि क्या हैल्दी है और क्या नहीं. हमें क्या खाना चाहिए क्या नहीं. हालांकि वे इस क्षेत्र से नहीं थे, लेकिन उन की रुचि बहुत थी. वे स्वास्थ्य से जुड़ी ढेरों किताबें घर ले आते थे, जिन्हें मैं पढ़ती थी और इस तरह मेरी रुचि इस क्षेत्र में बढ़ती गई. मेरे पापा बहुत ही सपोर्टिव फादर रहे हैं. उन्होंने हम चारों भाईबहनों को फ्रीडम दे रखी थी. कभी हम पर बेमतलब की पाबंदी नहीं लगाई.

आज आप किस तरह के चैलेंजेस फेस कर रही हैं?

मेरे लिए घरपरिवार और बच्चों को संभालते हुए यहां तक पहुंचाना काफी मुश्किल रहा है. मैं ने काफी स्ट्रगल किया है. बहुत कुछ गिव अप किया है. मैं ने कभी टीवी नहीं देखा, कभी कोई किट्टी पार्टी जौइन नहीं की. मेरा फोकस मेरा परिवार और काम रहा है. 2004 में मैं ने ब्रेन सर्जरी भी करवाई थी. दरअसल, मेरे चेहरे के बाईं ओर के हिस्से पर मेरा कंट्रोल नहीं था. वह लगातार हिलता रहता था, जिस की वजह से मैं स्माइल भी नहीं कर पाती थी. नतीजतन मैं बहुत टौर्चर होती थी. डिप्रैशन भी मुझ पर हावी होने लगा था. लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. अपनी रिपोर्ट्स देशविदेश भेजीं. आखिरकार जरमनी में जा कर सर्जरी करवाई जो कामयाब रही.

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