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वीना मलिक ने इस कारण तोड़ी अपनी शादी

पाकिस्तान की हॉट एक्ट्रेस वीना मलिक ने अपने पति असद बशीर खान से खुला तलाक ले लिया है. ये तलाक खुद उन्होंने ही लिया है. कानून के मुताबिक औरत जब खुद तलाक चाहती हैं तो उसे 'खुला' के लिए आवेदन करना होता है. पाकिस्तान की मीडिया के अनुसार, वीना मलिक के वकील अली अहमद ने इसकी पुष्टि कर दी है. कहा जा रहा है कि दोनों 9 जनवरी में ही अलग होने का फैसला कर लिया था. इस शादी से दोनों के 2 बच्चे भी है. मीडिया में छपी खबरों के अनुसार वीना फिल्मी करियर में वापस जाना चाहती थीं, जिसको लेकर उनकी अपने ससुराल वालों से पटरी नहीं बैठ रही थी.

इस बारे में वीना और असद ने कुछ भी कहने से इंकार किया है. जिसकी वजह से वीना ने तलाक लेने का फैसला लिया था. वीना मलिक हमेशा अपने फैसलों से लोगों को झटका देती रहती है. वीना मलिक ने 2013 में दुबई के बिजनेसमैन असद से शादी कर ली थी. कहा जाता है कि वीना मलिक बिना शादी के ही असद के बच्चे की मां बनने वाली थी, इसलिए दोनों नो जल्दबाजी में निकाह कर लिया था.

वीना मलिक भारत के शो बिग बॉस-4 का हिस्सा रह चुकी है. और अब खबरे आ रही है कि वीना मलिक पूरी तरह पाकिस्तानी राजनीति का हिस्सा बनने जा रही हैं और वह फिर से फिल्मी करियर में वापस जाना चाहती हैं.

फिल्मी दुनिया की अश्लील फिल्में

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी लोग फिल्में देखते हैं. और सभी अपने परवार के साथ फिल्म देखना बहुत पसंद करते हैं. लेकिन फिल्म जगत में बहुत सी ऐसी फिल्में हैं जो आप सिर्फ अकेले में ही देख सकते हैं. परिवार वालों के साथ ऐसी फिल्में देखने के लिए फिल्म समीक्षा के दौरान भी सख्त मना कर दिया जाता है.

कामसूत्र (1996)
मीरा नायर ने इस फिल्म में कमाल की भूमिका निभाई हैं, लेकिन इस फिल्म ने अपनी मर्यादा की सारी हदें पार कर दी थी, जो काफी ज्यादा था. सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म से बहुत से सीन हटाए हैं.

गांडू (2010)
ये बंगाली फिल्म थी, जो एक रैप म्युजिक पर आधारित थी. लेकिन इस फिल्म में कई खराब दृश्य थे, और काफी ड्रग्स का इस्तेमाल दिखाया गया था, इसी वजह से इस फिल्म को बैन किया गया था.

अनफ्रिडम (2015)
ये फिल्म लेसबीन के जीवन पर आधारीत थी, जिसमे इस्लाम आतंकवाद को दिखाया गया हैं. इन दोनों का मिश्रण फिल्म में कुछ ज्यादा था, इसी के चलते सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को बैन कर दिया.

सिन्स (2005)

ये फिल्म चर्च के फादर के महिला से संबंध पर आधारित थी. इस फिल्म का विरोध पुरे ख्रिस्ती समाज ने किया, और सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी.

होली पर सूखे रंगों का प्रयोग करें : वरुण धवन

सहायक निर्देशक से करियर की शुरुआत करने वाले वरुण धवन ने फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर से अभिनय की शुरुआत की. वे एक अच्छे डांसर हैं और गोविंदा को अपना आदर्श मानते हैं. वे हर फिल्म में अपना सौ प्रतिशत कमिटमेंट देते हैं और चाहते हैं कि फिल्म सफल हो. लेकिन अगर फिल्म नहीं चलती तो उन्हें दुःख भी होता है.

उन्हें क्लब और पार्टी में अधिक जाना पसंद नहीं. वे स्कूल और कॉलेज के दोस्तों के साथ घर पर ही अधिकतर पार्टी करते हैं, जहां उन्हें बहुत सुकून मिलता है. यहां तक पहुंचने में वे अपने मां को श्रेय देते हैं जिन्होंने हमेशा उनको काम की बारीकियां समझायी है. स्वभाव से बिंदास और हंसमुख वरुण से बात करना बेहद रोचक था पेश है अंश.

आप सच्चे दोस्त किसे मानते हैं? क्या वे आपके आलोचक हैं?

मुझे हंसी आती है कि मेरा एक दोस्त मुझे बद्री कहकर ही बुलाता था और आज मैंने फिल्म भी उसी  नाम से किया है. वे सब मेरे अच्छे क्रिटिक हैं. मेरे तीन दोस्त काफी अच्छे हैं. अंकित, कविश और अमन ये मेरे बचपन के दोस्त हैं. किसी भी फिल्म के सेट पर जाने से पहले मैं उनसे थोड़ी बात कर लेता हूं. सीन्स की चर्चा भी कर लेता हूं. वे गलत और सही बताते हैं. मेरे कजिन भाई आदित्य पूरी ने भी मेरी फिल्म स्टूडेंट ऑफ द इयर को देखकर कहा था कि मेरा वॉइस वीक है. ’हम्टी शर्मा की दुल्हनियां’ में मैंने अपनी आवाज पर काफी मेहनत की थी. अभी भी फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ में किया है. मैंने अपने ‘वोकल कॉड’ को ठीक करने के लिए कई तकनीक सीखे हैं.

फिल्म में मनोरंजन के साथ मेसेज भी हो इस पर आप कितना ध्यान देते है?

ये जरुरी नहीं कि हमेशा ही मेसेज हो, ये बड़े और स्टैब्लिश कलाकार के साथ होता है कि वे डायरेक्ट मेसेज देकर फिल्में बनाते हैं, जिसमें अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि कोई मेसेज मेरे फिल्म में भी हो. ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ में महिला और पुरुष के समान अधिकार को मनोरंजक रूप में दिखाया गया है. मेरी सोच फिल्म में कैसे बदली, एक पारंपरिक समाज और परिवार से निकलकर कैसे एक व्यक्ति अलग सोच सकता है. ये देखने लायक है.

क्या रियल लाइफ में आपने कभी ऐसे हालात देखे हैं जहां महिलाओं का अनादर हो रहा हो? इस तरह की घटनाओं के जिम्मेदार आप किसे मानते हैं, परिवार समाज या धर्म?

मैंने देखा है कि शादीशुदा कपल अगर एक दूसरे को इज्जत ना करें, तो उनका रिश्ता टूट जाता है. पहले ऐसा नहीं था, सामंजस्य न बैठा पाने की परिस्थिति में भी पत्नी, पति को स्वीकार कर लेती थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर वह उसे छोड़ देगी, तो उसके खुद के बच्चों का क्या होगा? वह कहां रहेगी? आजकल महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और वह पति के बिना अकेले रह सकती हैं. आज  परिवार में महिला को इज्जत देना बहुत जरुरी है.

मैं समाज को ही सबसे अधिक जिम्मेदार मानता हूं. अभी थोड़ा परिवर्तन हुआ है, पर वह बहुत कम है. मुझे पश्चिम की ये बातें अच्छी लगती है कि ‘डोमेस्टिक वॉयलेंस’ होने पर वे तुरंत पुलिस को बुला लेते हैं. मुझे याद आता है कि 12 वर्ष की उम्र में मेरे बिल्डिंग के एक फ्लैट में पति पत्नी के झगड़े में मैंने पुलिस को बुला लिया था.

बचपन से हमेशा आपको कैसी सीख मिली है?

मुझे बचपन से महिलाओं को आदर करना सिखाया गया है. मेरी मां की 6 बहने हैं. वहां मैं हमेशा जाता था. कजिन बहनों के बीच में मैं बड़ा हुआ हूं. अभी जो खबरें आये दिन महिलाओं को लेकर अखबार की सुर्खियां बनती हैं इसे देखकर मैं बहुत हैरान होता हूं कि आखिर इनकी सोच ऐसी क्यों है? मेरी मां हमेशा मेरे पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती रहीं. वह एक डिजाइनर हैं. मैं मां से काफी क्लोज हूं. उन्होंने मुझे पूरी तरह से गाइड किया है, क्योंकि पिता हमेशा व्यस्त रहते थें. मैंने अपनी जिंदगी में एक स्ट्रॉन्ग महिला को नजदीक से देखा है. मेरे पिता ने हमेशा मेरी मां को बहुत सम्मान दिया है.

आपको फिल्मों में एंट्री मिली कामयाब भी हुए, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है?

हर फिल्म सफल हो ये जरुरी नहीं. ये सोचकर मैं काम नहीं करता. इतना जरुर है कि ब्रांड वैल्यू को देखना पड़ता है. अलिया के साथ मेरी ये तीसरी फिल्म है, लोगों ने पहले हमें पसंद किया. इस बार भी वैसा ही हो, उसे बनाये रखने के लिए प्रेशर है. फिल्म ‘बदलापुर’ से पहले लोग कहते थे कि मुझे एक्टिंग नहीं आती, मुझे प्रूव करना पड़ा. उसके बाद मसाला फिल्में भी आई और चली भी, लेकिन दर्शकों को अभी भी मुझपर विश्वास नहीं है कि मेरी फिल्म हमेशा ही अच्छी होगी, उसके लिए ही मेहनत कर रहा हूं.

इंडस्ट्री में फीमेल एक्ट्रेस को मेल एक्टर्स से कम पारिश्रमिक मिलती है, आप अगर फिल्म बनाये तो क्या आप इस बात पर विचार करेंगे?

मेरे हिसाब से अलिया भट्ट, सोनम कपूर, कंगना रनौत, अनुष्का शर्मा, श्रद्धा कपूर, प्रियंका चोपड़ा आदि ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने सोलो एक्टिंग कर फिल्म को सफल बनाया है. ऐसे में आगे चलकर वे और बेहतर काम कर पाएंगी, क्योंकि उनमें बहुत टैलेंट है. समय बदल रहा है और ये एक व्यवसाय है जहां पैसे काफी महत्व रखते है. कोई भी फिल्म अगर अच्छा व्यवसाय करेगी, तो उस कलाकार की मांग बढ़ेगी.

आप के बारें में कहा जाता है कि आप गोविंदा की नकल करते हैं, ऐसी बातों को आप कैसे लेते है?

आलोचना को हमेशा सकारात्मक रूप से लेना चाहिए. इससे आपको सुधरने का मौका मिलता है, क्योंकि इंडस्ट्री में बनावटी अधिक हैं. मैं गोविंदा की तरह बन नहीं सकता, क्योंकि वे बहुत ही बेहतर कलाकार हैं. मैं हमेशा उनके काम की सराहना करता हूं.

क्या कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

मुझे ‘सोल्जर’ की एक्टिंग करने की इच्छा है.

आप की रियल लाइफ दुल्हनियां कैसी होनी चाहिए?

वह आत्मनिर्भर, साहसी और समझदार होनी चाहिए.

होली कैसे मनाते हैं? इस बार क्या करना है?

होली रंगों का त्यौहार है, इसे परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर मनाता हूं. मेरी फिल्म में भी होली पर गीत है. मुझे अमिताभ का 'रंग बरसे… गीत  और अक्षय कुमार की लेट्स प्ले होली… गाना पसंद है. होली पर सूखे रंगों का अधिक प्रयोग करें, जिससे पानी कम खर्च हो.

ये है भारत की पहली प्रीक्वल फिल्म

एक बार फिर तापसी पन्नू और अक्षय कुमार की जोड़ी ने बॉलीवुड में धमाका कर दिखाया है. सिनेमाघरों में जल्दी ही आने वाली तापसी और अक्षय अभिनीत फिल्म ‘नाम शबाना’ भारत की पहली "स्पिन ऑफ" फिल्म बन गई है. इस फिल्म का ट्रेलर भी काफी दिलचस्प रहा.

बॉलीवुड में अब तक कई फिल्मों के सीक्वल्स बनाए गए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी फिल्म का प्रीक्वल बनाया गया है. हां कुछ समय पहले सलमान खान द्वारा अभिनीत फिल्म दबंग को लेकर ऐसी चर्चाएं तो हुई थी कि पुलिस अफसर चुलबुल पांडे के जीवन की यात्रा दिखाते हुए इस फिल्म का प्रीक्वल बनाया जाएगा, लेकिन इससे पहले ही निर्माता नीरज पांडे ने ही अपनी फिल्म बेबी के किरदार शबाना के, ‘शबाना’ बनने तक के सफर पर एक धमाकेदार कहानी की योजना बनाकर उसे रिलीज के लिए पूरी तरह तैयार भी कर दिया.

यह फिल्म ‘नाम शबाना’ इसी महीने के अंत में यानि कि 30 मार्च 2017 को रिलीज की जानी है. हम आपके लिए इस फिल्म से जुड़ी कुछ प्रमुख जानकारी ले कर आएं हैं जो जानना आपके लिए बेहद जरूरी है..

1. सितंबर 2016 में रिलीज हुई फिल्म ‘पिंक’ के बाद से ही अभिनेत्री तापसी पन्नू अपने करियर में तेज गति से आगे बढ़ रही हैं. बॅालीवुड में कुछ चुनिंदा एक्ट्रेस ही ऐसी हैं, जिन्हें बहुत कम समय में सफलता हासिल होती है और जो बॉलीवुड में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने में कामयाब हो पाती हैं.

2. इन दिनों तापसी की फिल्म ‘नाम शबाना’ काफी चर्चा में चल रही है. इसकी अपनी दमदार टीम के साथ-साथ इस फिल्म ने एक बड़ा खिताब अपने नाम कर लिया है. फिल्म ने अपना नाम बॅालीवुड इतिहास में ऊपरी पायदान पर दर्ज करा लिया है.

3. इस साल तापसी की सबसे प्रत्याशित भूमिका शिवम नायर की फिल्म 'नाम शबाना' में ही है, जो नीरज पांडे के बेहद सफल 'बेबी' के लिए स्पिन ऑफ है. ‘नाम शबाना’ भारतीय सिनेमा की पहली स्पिन ऑफ फिल्म है. फिल्म बेबी के हिट होने के कारण ही ‘नाम शबाना’ की प्लानिंग की गई. खबरों के अनुसार पहले तो इस फिल्म के सीक्वल पर विचार किया जा रहा था पर बाद में इसे फिल्म बेबी के किरदार ‘शबाना’ पर केंद्रित कर दिया गया.

4. आपको जानकर हैरानी तो होगी कि तापसी पन्नू इत्तेफाक से फिल्म बेबी का हिस्सा बनी थी. उन्होंने निर्देशक नीरज पांडे से अपनी बड़ी सी फिल्म में एक छोटे से रोल को लिए गुजारिश की. नीरज पांडे की फिल्म बेबी में तापसी की 20 मिनट के रोल पर की गई मेहनत को देखते हुए नीरज ने उन्हें ढाई घंटे की एक पूरी फिल्म का प्रस्ताव दे डाला.

5. नीरज ने इस फिल्म के लिए यकीनन एक परफेक्ट प्लानिंग की और तापसी को कहानी से जोड़ा. अभिनेता मनोज बाजपेयी, अक्षय कुमार और अनुपम खेर के आने से यह फिल्म और भी लाजवाब हो गई है.

6. नीरज पांडे और निर्देशक शिवम ने ने दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने के लिए बेबी की लगभग पूरी कास्ट को ‘नाम शबाना’ में दोहराया है और खास बात ये कि अक्षय कुमार और अनुपम खेर का किरदार वही रखा गया है.

7. नीरज ने इस फिल्म की कहानी की कड़ियों को अक्षय कुमार से जोड़ा है, जिनकी एंट्री फिल्म के एक भाग खत्म होने के बाद ही होगी, यानि कि अक्षय को देखने के लिए दर्शको को फिल्म के आखिर तक रुकना होगा.

जब दो गेंदों में ही खत्म हो गया वनडे मैच

भारत और श्रीलंका के बीच 28 फरवरी 1992 को खेला गया मैच क्रिकट के इतिहास का सबसे छोटा वनडे मैच माना जाता है. मैकेय, क्वींसलैंड में खेले गए इस मैच में केवल दो गेंदे ही डाली जा सकी थीं.

मैकेय दिसंबर से मार्च के बीच भारी बारिश के लिए भी जाना जाता है. दुर्भाग्य से 28 फरवरी के इस मैच से पहले भी काफी बारिश हुई थी. लंच तक तो ऐसा लग ही नहीं रहा था कि इस जगह कोई मैच हो भी सकेगा.

हालांकि आयोजकों ने यहां होने वाले पहले अंतर्राष्ट्रीय मैच को इतनी आसानी से रद्द नहीं होने दिया. उन्होंने पिच को सुखाने के लिए हेलीकॉप्टर का प्रयोग किया. इससे पिच सूख गई लेकिन इतनी जल्दी नहीं जितना आयोजक चाहते थे.

लंच ब्रेक के दौरान भारतीय खिलाड़ी मैदान पर आए जिसके बाद प्रशंसकों में कुछ उत्साह बढ़ा. सभी खिलाड़ियों ने डॉक्टर अली ईरानी की देख-रेख में मैदान पर अभ्यास किया. जब काफी देर तक मैच रुका रहा तो अंपायरों के पास मुकाबले को 50-50 से 20-20 ओवरों तक सीमित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था.

जब मैच शुरु हुआ तो भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन ने कपिल देव को कृष्णामचारी श्रीकांत से साथ सलामी बल्लेबाजी के लिए भेजकर सभी को चौंका दिया. यह पहला मौका था जब कपिल देव ने पहले स्थान पर बल्लेबाजी की थी. साथ ही यह मैच अजय जडेजा का वनडे पर्दापण मैच था.

श्रीलंकाई कप्तान अरविंदा डी सिल्वा ने गेंद चंपका रामानायके को थमाई. पहली गेंद पर श्रीकांत ने बल्ले से रोका और अगली गेंद पर एक रन लिया. जिसके बाद फिर से आसमान में बादल दिखने लगे और सभी खिलाड़ी भागते हुए पवेलियन पहुंचे. इसके बाद बारिश रुकी ही नहीं और मैच का पूरा समय निकल गया. डेविड शेपहर्ड और इयॉन रॉबिनसन ने मैच को रद्द घोषित कर दिया.

वनडे मैच जहां एक भी गेंद नहीं खेली जा सकी

इस मैच के अतिरिक्त दो अन्य ऐसे मौके थे जब टॉस के बाद ही मैच को रोक देना पड़ा.

1. साल 2004 में नेटवेस्ट ट्रॉफी में रोस बाउल में न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज के बीच खेला गए वनडे मैच टॉस के बाद रोक दिया गया. कप्तान ब्राइन लारा ने इस मैच में टॉस जीतकर गेंदबाजी का फैसला किया था.

2. साल 2006-07 में सेडन पार्क में न्यूजीलैंड और श्रीलंका के बीच आयोजित मैच में एक भी गेंद नहीं डाली जा सकी. टॉस के बाद ही मैच रद्द कर दिया गया.

पंजाब में इस वजह से उतरा भगवा नशा

उत्तर प्रदेश की कामयाबी का भाजपा का नशा अगर पंजाब में उतरता दिखाई दिया तो इससे ये तथ्य तो स्थापित होते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कोई राष्ट्रीय या दूसरी लहर नहीं थी और राज्यों में सिर्फ सत्ता विरोधी लहर चली है. आम तौर पर लोग अपने अपने राज्यों की सरकारों के कामकाज से संतुष्ट नहीं रहते, भाजपा ने इसका फायदा अगर खासतौर से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उठाया तो पंजाब में इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा. शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन खारिज कर दिया गया है और वोटर ने कांग्रेस पर भरोसा जताया है तो बात  हैरत की इस लिहाज से भी है कि वहां सत्ता की प्रबल दावेदार आम आदमी पार्टी एक बेहतर विकल्प के रूप में थी, पर धाकड़ कांग्रेसी नेता केप्टन अमरिंदर सिंह की जमीनी पकड़ कांग्रेस के काम आई.

नशा पंजाब चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था जिसे लेकर काफी बवंडर पिछले एक साल से मच रहा था. राज्य  सरकार का उम्मीदों पर खरा न उतरना और बादल परिवार की बदनामी भी हार की वजह बने, इसीलिए भाजपा अब बड़ी मासूमियत से कह रही है कि हम तो पंजाब में अतिथि और सहयोगी थे. प्रचार का जिम्मा तो एसएडी का था यानि मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू वाली बात की जा रही है, जो राजनीति का शगल भी है.

नरेंद्र मोदी प्रचार के दौरान सिर्फ पंजाब की शान और खेतीबाड़ी की बातें करते बादल साहब बादल साहब करते रहे ,थे लेकिन राहुल गांधी ने नशे पर रोक की बात प्रमुखता से कही थी और सारे फैसले अपने हाथ में रखने का एक पुराना कांग्रेसी रिवाज भी पहली दफा तोड़ते अमरिंदर सिंह को अपने हिसाब से फैसले लेने की छूट दी थी, जिससे मतदाता में यह संदेश गया था कि अब कांग्रेस बदल रही है और सब कुछ दस जनपथ से तय नहीं होगा.

दरअसल में पंजाब में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती भाजपा एसएडी गठबंधन नहीं, बल्कि आप थी. अरविंद केजरीवाल यहां लंबे वक्त से सक्रिय थे, पर संगठनात्मक ढांचा न बना पाने के कारण लुढ़क गए. नवजोत सिंह सिद्धू भी एक बड़ा फेक्टर पंजाब में थे ,जिनहोंने पत्नी नवजोत कौर सहित भाजपा छोड़ दी थी, आप ने उन्हें नहीं लिया तो वे कांग्रेस में चले गए. उनकी लोकप्रियता का फायदा कांग्रेस को मिला, नतीजा सामने है कि भाजपा एसएडी गठबंधन और आप को पछाड़ते वह सत्ता में है और खुद को भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करने में सफल रही है.

पंजाब में कांग्रेस की वापसी से यह भी जाहिर होता है कि वोटर का मूड हर जगह अलग है. विधानसभा चुनाव मे स्थानीय मुद्दे काफी अहम होते हैं और रही बात जाति या धर्म की तो ये मुद्दे पंजाब में कहने भर को थे. यहां का युवा अच्छी बात है कि नशे के दुष्परिणामों को समझने लगा है, इसलिए उसने पंजाब के नाम या बदनामी से ऊपर उठते कांग्रेस को मौका दिया.

भाजपा के हवाले ‘राम का प्रदेश’ और ‘देव भूमि’

मिनी लोकसभा चुनाव कहे जा रहे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में 2 सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को भाजपा ने अपने कब्जे में ले लिया है. उत्तर प्रदेश को ‘राम का प्रदेश’ और उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ कहा जाता है. दोनों ही प्रदेशों में चुनाव के आधार अलग अलग थे. उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत पूरी भाजपा से अकेले चुनाव लड़ रहे थे. भाजपा ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को तोड़ कर हरीश रावत को बेबस कर दिया. अब भाजपा के लिये मुश्किल भरा दौर शुरू होगा, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के दलबदल करने वाले नेता एक साथ कैसे चलेंगे?

उत्तर प्रदेश में चुनाव के हालात पूरी तरह से अलग थे. चुनाव के कुछ समय पहले तक अखिलेश के मुकाबले सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी बसपा नेता मायावती को माना जा रहा था. इस बीच मुलायम का परिवार विवाद शुरू हुआ. इसके बाद राहुल और अखिलेश का गठबंधन शुरू हुआ. मायावती ने इसको हाशिये पर ढकेलने के लिये ‘मुस्लिम कार्ड’ खेला, जिसके तहत बसपा ने सबसे अधिक विधानसभा के टिकट मुस्लिम प्रत्याशियों को दिये. यही वह प्वाइंट था जिसमें चुनाव में मतों का ध्रुवीकरण शुरू हो गया. उत्तर प्रदेश की जनता के सामने एक तरफ बसपा थी जो मुसिलम गठजोड़ को आगे करके चुनाव जीतना चाहती थी. दूसरी तरफ भाजपा थी जिसने एक भी मुसलिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था.

बसपा को जिस दलित वर्ग पर भरोसा था वह धार्मिक धुव्रीकरण के समय भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया. केवल दलित ही नहीं पिछड़े वर्ग में भी यह भावना काम आई. भाजपा ने खुद ध्रुवीकरण की शुरुआत नहीं की पर उसको यह हवा रास आई और उसने धीरे धीरे अपने जुमलों के सहारे धार्मिक भावना को आगे किया. इसके तहत दीवाली और ईद, श्मशान और कब्रिस्तान जैसे मुद्दे उपर आये. नोटबंदी और दूसरे कारणों से दुखी लोगों के सामने कोई रास्ता नहीं था. ज्यादातर लोगों ने वोट नहीं दिया जिसने दिया वह सबकुछ भूल कर धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ खड़ा हो गया.

उत्तर प्रदेश में 2007 में बसपा, 2012 में सपा और अब 2017 में भाजपा को बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया है. सामाजिक स्तर पर 2017 में भाजपा की जीत का कुछ वैसा ही असर होगा जैसे दलित और पिछडों को पहले के 2 चुनावों में हुआ था. भाजपा के लिये इस जीत के बाद प्रदेश का विकास सबसे बड़ा मुद्दा होगा. उत्तर प्रदेश से भाजपा के पास 73 सांसद और भारी बहुमत से प्रदेश में सरकार बना चुकी है. अब भाजपा को प्रदेश के लिये अपने समर्थकों के लिये बहुत कुछ करना होगा. बसपा की हार से दलित वर्ग की आवाज का क्या होगा? यह सोचने वाली बात है.       

   

पंखों से नहीं हौसलों से उड़ान होती है…

लहरों की खामोशी को समंदर की बेबसी मत समझ ए नादां, जितनी गहराई अंदर है, बाहर उतनी तूफान बाकि है… समाज के कुछ लोगों की हिम्मत देखिए, पैदा करने वाले को ही कमजोर समझने की जुर्रत करते हैं. अकसर घर पर रहने वाली महिलाओं को कमजोर, कम पढ़ी-लिखी, बुद्धिहीन आदि समझा जाता है. यह कोई सामान्यीकरण नहीं पर कठोर सच है. घर पर रहने वाली महिलओं को कई बार यह सुनना पड़ता है कि, ‘तुम करती क्या हो, घर पर ही तो रहती हो. मुझे देखो दिन भर दफ्तर में मेहनत करके चार पैसे कमाता हूं…’ ऐसी सोच वालों को शत शत नमन. एक दिन घर का काम करके तो देखें, तब समझ में आए कि महिलाएं दिन भर घर पर रहकर क्या क्या करती हैं. अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस बीत चुका है तो जाहिर सी बात है आपको यह सब बातें बचकानी लगेंगी और वह भी किसी लड़की की कलम से तो और ज्यादा बचकानी लगेगी.

कई बार घर का बोझ हल्का करने के लिए भी महिलाएं ऑफिस का रुख करती हैं. घर और ऑफिस साथ-साथ कैसे संभालती हैं ये तो वे ही जानें. पर इन दोनों में सामन्जस्य बनाकर ही चलती हैं. सब सुनती हैं, सहती हैं पर खुद को अपनों और गैरों के लिए झौंक देती हैं. आज हम ऐसी महिलाओं के बारे में बात करेंगे जिनको दफ्तर जाने की आजादी या वक्त नहीं हैं. अगर आप भी अपनी आजीविका खुद ही अर्जित करना चाहती हैं तो ऐसे कई रास्तें हैं जिससे आप घर बैठे ही पैसे कमा सकती हैं.

आप घर बैठे ही इन सब में से कोई भी काम कर के आसानी से पैसे कमा सकती हैं-

1. ब्लॉग (ढूंढिए अपने अंदर की लेखिका को)

जरा याद करिए वो दिन जब आप कॉलेज की डायरी के पीछे गुप चुप कविताएं लिखती थी. न जाने कितने ही चैप्टर और विषयों के नोट्स बनाए थे आपने. शादी और घर वालों को संभालते संभालते आपके अंदर की नन्ही एनी फ्रैंक कहीं गुम सी हो गई. अब वक्त है अपने अंदर की महादेवी वर्मा को जगाने का. आप ब्लॉग लिखकर आसानी से घर बैठे ही पैसे कमा सकती हैं.

ब्लॉग लिखने के लिए विषय ढूंढना भी इतना मुश्किल नहीं है. आप अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से लेकर अलग-अलग व्यंजनों की रेसिपी के बारे में भी ब्लॉग लिख सकती हैं. ब्लॉग्स लिखकर पैसे कमाने के लिए आपको ऑनलान रिसर्च करना पड़ेगा. आमतौर पर ब्लॉग्स के लिए शब्दों के अनुसार पैसे मिलते हैं.

2. बच्चों का क्रेच

अगर आपके बच्चे बाहर पढ़ते हैं और आप घर पर अकेलापन महसूस करती हैं तो क्रेच इसका बहुत अच्छा उपाय है. बच्चे दिल बहलाएंगे और आप घर बैठे कमाई भी कर लेंगी. क्योंकि आपने बच्चों को बड़ा किया है तो आपको बच्चों को संभालने का एक्सपीरियंस भी होगा. पर क्रेच खोलने का निर्णय बड़ी सावधानी से लें, क्योंकि दूसरे माता-पिता आप पर भरोसा करके अपने बच्चे छोड़कर जाएंगे. आप पर जिम्मेदारियां होंगी.

3. पर्सनल शॉपिंग से करें कमाई

अगर आपके दोस्त और रिश्तेदारों को शॉपिंग का वक्त नहीं मिलता तो आप उनकी सहायता कर सकती हैं. आप ऑनलाइन ही उनके लिए शॉपिंग कर सकती हैं और अपने ग्राहकों के पास सीधे पहुंचा सकती हैं. इसके लिए आप शॉपिंग का 10-15 प्रतिशत हिस्सा फी के तौर पर ले सकती हैं. पर ध्यान रहे की आपकी पसंद अच्छी हो वरना आपको कोई फायदा नहीं होगा, दोस्तों-रिश्तेदारों से संबंध भी बिगड़ सकते हैं.

4. डायरेक्ट मार्केटिंग

आप डायरेक्ट मार्केटिंग का काम भी कर सकती हैं. ऑनलाइन मेकअप कैटलॉग बेचने से लेकर ज्वैलरी, वजन कम करने के प्रोडक्ट, घर की चीजें आदि के लिए भी डायरेक्ट मार्केटिंग कर सकती हैं. डायरेक्ट मार्केटिंग में आप कंपनियों की रिप्रेजेंटेटिव के तौर पर काम करेंगी.

5. क्राफ्ट मेकिंग

अगर आपके पास आर्ट एंड क्राफ्ट का स्पेशल टैलेंट है तो आप आसानी से इसे बिजनेस का रूप दे सकती हैं. आप दूसरों के घरों के लिए भी डेकोरेटिव आइट्मस बना सकती हैं.

6. घर पर बनाइए मिठाइयां

अगर मिठाइयां, केक, पेस्ट्री आदि बनाने में आप माहिर हैं तो ऐसा आप दूसरों के लिए भी कर सकती हैं. आप घर से ही अपना सामान दूसरों के घर डिलिवर करवा सकती हैं. लोगों को गुणवत्ता और स्वाद दोनों मिलेगा.

अगर आपको इंटरनेट और कंप्यूटर का ज्ञान है तब तो आप और भी आसानी से घर बैठे ही पैसे कमा सकती हैं. आप घर बैठे ही अपना बिजनेस भी शुरु कर सकती हैं, जरूरत है तो सिर्फ बुलंद हौसलों की, याद रखिए कि आपके अंदर बहुत शक्ति हैं और आप ही सबकी ऊर्जा का स्रोत हैं.

पेटीएम वॉलेट रिचार्ज का नहीं लगेगा चार्ज

हाल ही में डिजिटल पेमेंट कंपनी पेटीएम ने ऐलान किया था कि क्रेडिट कार्ड के जरिए पेटीएम वॉलेट को रीचार्ज करने पर 2 प्रतिशत का डिपॉजिट शुल्क लगेगा. लेकिन पेटीएम के यूजर को यह योजना पसंद नहीं आयी. हालांकी, यूजर की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पेटीएम कंपनी ने इस फैसले को वापस ले लिया है.

वैसे पेटीएम ने 2 प्रतिशत शुल्क चार्ज करने से पहले, नवंबर से पेटीएम ने यूजर को वॉलेट से अपने बैंक अकाउंट में बिना किसी शुल्क के पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा दी थी. आमतौर पर वॉलेट से पैसे ट्रांसफर करने पर चार्ज लिया जाता है. लेकिन देश में नोटबंदी के बाद से पेटीएम के साथ अन्य वॉलेट ने भी ऐसी ही सुविधा दी थी. मतलब है कि कार्ड धारक अपने पेटीएम वॉलेट में कार्ड के जरिए पैसे डाल सकते हैं. इसके बाद उस पैसे को बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करना संभव है. इस प्रक्रिया में वॉलेट और बैंक द्वारा कोई अतिरिक्त राशि की मांग नहीं की गई थी. कुछ यूजर इसके जरिए कार्ड में प्वाइंट जमा कर रहे थे जो मुफ्त कैश के जैसा है. और बिना ब्याज के पैसे इस्तेमाल कर रहे थे. इस पूरी प्रक्रिया के लिए पेटीएम की ओर से सब्सिडी दी जाती है. यूजर वॉलेट के जरिए कैश को इधर से उधर करके रीवार्ड प्वाइंट्स के जरिए मुफ्त में पैसे कमा रहे थे. पेटीएम ने अपने उन यूजर से 2 फीसदी चार्ज लेने का फैसला किया था जो यूजर क्रेडिट कार्ड के जरिए वॉलेट में पैसे डालते हैं. पेटीएम कम्पनी उनसे 2 प्रतिशत का चार्ज लेगी लेकिन पेटीएम का ये फैसला किसी को पसंद नहीं आया. हालांकी पेटीएम ने कहा भी था कि भरोसेमंद यूजर को कंपनी 2 प्रतिशत चार्ज को कूपन के तौर पर लौटा देगी जिसका इस्तेमाल पेटीएम पर किया जा सकता है. कम्पनी ने लाखों ग्राहकों और व्यापारियों के हितों को प्राथमिकता देते हुए, 2 प्रतिशत चार्ज वापस लेने का फैसला किया है.

कम्पनी ने किसी भी तरह के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए नए फीचर शुरु करने को कहा है. हालांकि, अभी पेटीएम ने साफ नहीं किया है कि कंपनी गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए क्या करेगी.

हाथ नहीं दातों से तीरंदाजी करता है यह एथलीट

दुनिया में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपने हाथ और पैर किसी ना किसी एक्सीडेंट में गवां दिए, लेकिन जब दुनिया और समाज वालों को लगा कि अब वो अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते तो उन्होंने उसी समाज और दुनिया के सामने एक ऐसी नई मिसाल पैदा की जिसके कारण आज भी पूरी दुनिया उनकी कायल हो चुकी है.

कुछ ऐसी ही कहानी है भारत के तीरंदाज अभिषेक सुनील थावड़े की. अभिषेक अपने हाथों से नहीं बल्कि अपने मुंह से तीरंदाजी करते हैं. आइए आज हम आपको बताते है, भारत के नए अर्जुन के बारें में.

जब अभिषेक एक साल के थे, तब उनका दायां हाथ पोलियो के कारण खराब हो गया था, डॉक्टर ने उन्हें गलत इंजेक्शन लगा दिया था, जिसके कारण वो उम्र भर के लिए अपाहिज हो गए. तब से ही जीवन उनके लिए एक संघर्ष बन गया. अभिषेक ने स्पोर्ट्स को अपनी जिन्दगी का हिस्सा बना लिया, उन्होंने दौड़ में कई मेडल्स जीते, इसके अलावा उन्होंने लॉन्ग जम्प में भी खूब सराहना प्राप्त की, इस तरह वो एक राष्ट्रिय स्तर के एथलीट बन गएं

जब सब ठीक होने लगा, तो फिर अभिषेक के साथ एक दुर्घटना हो गयी, उनके सीधे पैर के घुटने का ऑपरेशन करना पड़ा, इसके बाद डॉक्टर्स ने उन्हें भागने के लिए मना कर दिया, फिर भी अभिषेक ने हार नहीं मानी और एक दूसरे स्पोर्ट का रुख कर लिया. अपने एक करीबी दोस्त को देख कर उनकी रूचि तीरंदाजी में हो गयी, तीरंदाजी का उपकरण काफी भारी होता है, जिसे एक हाथ से उठाने में उन्हें दिक्कत आती थी.

उन्होंने इसका भी हल निकाल लिया और अपने दांत से तीर चलाना शुरू किया. प्रैक्टिस से उन्होंने इस नामुमकिन से लगने वाले काम में भी महारथ हासिल कर ली और एक बेहतरीन तीरंदाज बन गए. वे भारत के एकमात्र ऐसे तीरंदाज है जो अपने हाथों से नही बल्कि अपने मुंह से तीरंदाजी करते हैं.

अभिषेक महाराष्ट्र के अकेले ऐसे तीरंदाज हैं, जो ओपन और डिसेबल्ड, दोनों ही तीरंदाजी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं.

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