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मेरी उम्र 28 वर्ष है. मेरे पति के सीमन में शुक्राणु नहीं हैं. हम बच्चे के लिए क्या करें.

सवाल

मेरी उम्र 28 वर्ष है. मैं एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत हूं. मेरे पति के सीमन में शुक्राणु नहीं हैं. हम बच्चे के लिए क्या करें?

जवाब

आप के पति की शारीरिक रचना की जांच करनी होगी. स्पर्म बैंक से स्पर्म ले कर डोनर आईयूई का रास्ता प्रभावी साबित हो सकता है. हो सकता है कि आप के पति का स्पर्म कहीं रुक रहा हो. अगर ऐसा है तो उस का भी इलाज

संभव है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

यदि मैं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल कर रही हूं तो क्या पति को कंडोम का भी प्रयोग करना चाहिए.

सवाल

मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती हूं. अभी मैं और मेरे पति परिवार नियोजन के लिए तैयार नहीं हैं. मैं यह जानना चाहती हूं कि यदि मैं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल कर रही हूं तो क्या पति को कंडोम का भी प्रयोग करना चाहिए?

जवाब

जन्म नियंत्रक विधियां जैसेकि गर्भनिरोधक गोली आईयूएस या गर्भनिरोधक इंजैक्शन आदि अनचाहे गर्भ को रोकने में कारगर साबित होते हैं. लेकिन ये सभी यौन संक्रमण से किसी भी प्रकार की सुरक्षा प्रदान नहीं करते. जन्म नियंत्रण के तौर पर कंडोम का प्रयोग यौन रोगों से बचाता है, साथ ही अनचाहे गर्भ की भी समस्या को खत्म करता है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

बद्रीनाथ की दुल्हनिया : हल्की फुल्की मनोरंजक फिल्म

लगभग तीन साल बाद फिल्म ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ फ्रेंचाइजी की नई फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ लेकर आए हैं निर्माता करण जोहर और निर्देशक शशांक खेतान. यदि आप दिमाग या तर्क की कसौटी पर बिना कसे फिल्म देखेंगें तो मनोरंजन पा सकते है.

फिल्म की कहानी शुरू होती है झांसी के मशहूर साहूकार अंबरनाथ (रितुराज सिंह) से जिनके दो बेटे हैं. आलोक (यष सिन्हा) व बद्रीनाथ (वरुण धवन). अंबरनाथ दिल के मरीज हैं. ऑक्सीजन का सिलेंडर हमेशा अपने पास रखते हैं. उन्होंने बड़े बेटे आलोक की शादी अपनी मर्जी से पढ़ी लिखी लड़की उर्मिला (श्वेता बसु प्रसाद) से कराई थी. बदले में उन्हें उर्मिला के पिता ने गाड़ियों के दो शो रूम दहेज में दिए थे. बेचारे आलोक को मजबूरन अपने प्यार साक्षी को भुलाना पड़ा. अब बद्री की शादी के लिए लड़की देखी जा रही है. बद्री का काम है पिता ने जिन्हें कर्ज दिया है, उनसे वसूली करते रहना.

उधर बद्री के दोस्त सोमदेव (साहिल वैद्य) ने ‘चुटकी शादी डॉट काम’ शुरू की है. एक दिन प्रकाष से जब बद्री कर्ज का पैसा लेने जाता है, तो पता चलता है कि उसकी शादी तय हो गयी. तब बद्री व उसका दोस्त सोम भी प्रकाष की शादी में बराती बनकर कोटा जाते हैं. जहां उनकी मुलाकात त्रिवेदी परिवार की दो बेटियों कृतिका और वैदेही (आलिया भट्ट) से होती है. कृतिका ने रितिक रोशन जैसा पति पाने के सपने के चलते तीस लड़के ठुकराए हैं.

उधर वैदेही का प्रेमी सागर उसके साथ सैलून खोलने के नाम पर उनके पिता के पी एफ के साढ़े बारह लाख रूपए लेकर चंपट हो चुका है. अब वैदेही का सपना जिंदगी में कुछ बनना है. वह एयर होस्टेस बनकर हवा में उड़ना चाहती है. पहली मुलाकात में ही दसवीं पास बद्री, वैदेही को दिल दे बैठता है. पर वैदेही साफ साफ कह देती है कि वह उससे शादी नहीं करना चाहती.

अपनी शादी वैदही से हो जाए, इसके लिए बद्री अपने भाई आलोक की मदद मांगता है. भाई व उसकी भाभी मदद करने को तैयार है. पता चलता है कि आलोक की पत्नी उर्मिला की सलाह के चलते उनका व्यापार काफी बढ़ चुका है. सोमदेव, वैदेही का रिश्ता लेकर अंबरनाथ के पास पहुंचता है. ब्रदी के माता पिता को वैदेही पसंद आ जाती है. पर मसला दहेज का है. सोमदेव कहता है कि त्रिवेदी सब कुछ संभाल लेंगे. इधर बद्री बार बार सोमदेव के साथ कोटा जाता रहता है. वैदेही के माता पिता तो सोमदेव की बातों से प्रभावित हैं. मगर वैदेही साफ साफ बद्री से कहती है कि वह उससे शादी नहीं करेगी. पर पिता के गम को देखकर वैदही, बद्री को बुलाकर कहती है कि पहले उसकी बड़ी बहन कृतिका की शादी करायी जाए. अब सोमदेव व बद्री प्रयास शुरू करते हैं.

कृतिका देश विदेश में माता की चैकी करने वाले भूषण के नाम पर समझौता कर लेती है. पर भूषण के पिता को दहेज में लंबी रकम चाहिए. बद्री अपने भाई व भाभी की मदद से कृतिका की शादी में दहेज की आधी रकम खुद देता है और अपने पिता की मांग को भी पूरी करने की योजना बना लेता है. तय होता है कि एक ही मंडप में एक ही दिन कृतिका की भूषण और वैदेही की बद्री से शादी होगी. पर जयमाल के वक्त पता चलता है कि वैदेही भाग गयी है. एक माह बाद पता चलता है कि वैदेही मुंबई में एयर होस्टेस की ट्रेनिंग ले रही है. तो बद्री के पिता बद्री से कहते हैं कि वह मुंबई जाकर वैदही को पकड़कर लाए.

फिर वह उसे बीच चैराहे पर अपने अपमान की सजा उसे देंगे. बद्री जाने लगता है तो आलोक व उसकी भाभी उसे समझाते हैं. जब बद्री व उसका मित्र सोमदेव मुंबई पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि वैदेही तो सिंगापुर गयी. बद्री व सेामदेव सिंगापुर पहुंचते हैं. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. इस बीच वैदेही व बद्री को फिर से अहसास होता है कि वह दोनों प्यार करते हैं. पर वैदेही के सपनों को पूरा होने से रोकने की बजाय बद्री खुद बिना बताए सोमदेव के साथ वापस झांसी पहुंच जाता है और पिता से कह देता है कि वह वैदही को नहीं ढूढ़ पाए.

अब बद्री के पिता अंबरनाथ एक पूजा का आयोजन करते हैं, जिससे आलोक की पत्नी बेटे को जन्म दे. उसी पूजा में वह बद्री की शादी का ऐलान करने वाले हैं. इस मौके पर वैदही के माता पिता को अपमानित करने के मकसद से बुलाया गया है. बद्री शराब पीकर सारी भड़ास निकाल देता है और पिता को गलत ठहराते हुए कहता है कि वह वैदेही को नहीं भूल सकता. तभी वहां वैदेही पहुंच जाती है. वैदेही शादी के लिए हां कह देती है. फिर वैदेही दो साल के लिए सिंगापुर चली जाती है. उसके बाद वापस आकर झांसी में ही एयर होस्टेस ट्रेनिंग स्कूल खोलती है.

यूं तो फिल्म की कहानी में नयापन नहीं है. कहानी के स्तर पर यह फिल्म कई फिल्मों की कहानियों का मुरब्बा है. फिल्म में सदियों से चली आ रही कुरीति दहेज प्रथा पर ध्यान खींचा गया है. इस पर हजारों फिल्में बन चुकी हैं. कानून बन चुके हैं. पर समस्या ज्यों का त्यों बरकरार है. लड़के व लड़कियों के बीच हर परिवार व समाज में जो अंतर किया जाता है, उस पर भी यह फिल्म कुछ संदेश देती है. पर इस मुद्दे को भी कई फिल्मों में उठाया जा चुका है. फिल्म के लेखक व निर्देशक शशांक खेतान इन मुद्दो को प्रभावशाली ढंग से फिल्म में नहीं उठा सके.

दर्शकों के मनोरंजन का ख्याल रखते हुए रोमांस, हल्के फुल्के हास्य के क्षण, मस्ती आदि भी है, मगर यह दृश्य फिल्म को मजबूती प्रदान करने की बजाय कमजोर बनाते हैं. मगर कहानी में कई जगह भटकाव भी है. फिल्म की लंबाई कम की जानी चाहिए थी. होली का त्योहार आ गया है, इसलिए फिल्म के अंत में जबरन होली का एक गाना ठूंसा गया है. कुछ दृश्य अति बनावटी लगते हैं. सिंगापुर के ज्यादातर दृश्य बनावटी लगते हैं.

इंटरवल के बाद की फिल्म देखते समय लगता है कि यह फिल्म सिंगापुर टूरिज्म के प्रचार के लिए बनायी गयी है. फिल्म के कई घटनाक्रम तर्क या दिमाग की कसौटी पर खर उतरने की बजाय बचकाने दिमाग की उपज लगते हैं. यानी कि फिल्म के कुछ हिस्से उन हास्य फिल्मों की तरह हैं, जिनके निर्देशक कहते हैं कि उनकी हास्य फिल्म देखने के लिए दिमाग घर पर रखकर आएं. फिल्म का क्लायमेक्स तो बहुत घटिया है. बद्री की भड़ास के बाद उसके पिता की प्रतिक्रिया को न दिखाकर फिल्म का संदेश दर्शक तक पहुंचता ही नहीं है. लगता है कि निर्देशक शायद समझ ही नही पाया कि उसे फिल्म का अंत किस तरह से करना है.

फिल्म में छोटे शहरों की भाषा, रहन सहन आदि को भी यथार्थ रूप में पेश करने का सराहनीय प्रयास है. निर्देशक के तौर पर शशांक खेतान ने सराहनीय काम किया है. कैमरामैन ने भी झांसी व कोटा को उनकी खूबसूरती के साथ अपने कैमरे में कैद किया है. गीत संगीत ठीक ठाक है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो आलिया भट्ट ने अपने किरदार के साथ भरपूर न्याय किया है. मगर वरुण धवन कुछ दृश्यों में मात खा गए. शराबी के रूप में वह एकदम असफल रहे. पर फिल्म में दोनों की केमिस्ट्री जबरदस्त है. दर्शक इनकी जोड़ी का लुत्फ उठाने के लिए यह फिल्म देख सकते हैं.

दो घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ का निर्माण ‘धर्मा प्रोडक्शन’ के बैनर तले हीरू जोहर, करण जोहर व अपूर्वा मेहता ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक शशांक खेतान, कैमरामैन नेहा परती मटियानी, संगीतकार अमाल मलिक, तनिष्क बागची व अखिल सचदेव तथा कलाकार हैं- वरुण धवन, आलिया भट्ट व अन्य.

2 युवतियों का साथ रहना ज्यादा सुखद

पुलिस ने परिवारों की शिकायतों पर 2 युवतियों को 2 साल तक लापता रहने के बाद साथ रहते पाया और पता चला कि दोनों ने मरजी से परिवारों के खिलाफ जा कर साथ रहने का फैसला किया था. एक जयपुर में अकाउंटैंट का काम कर रही है तो दूसरी रिसैप्शनिस्ट है. दोनों में शारीरिक संबंध हैं या नहीं, यह तो जांचा नहीं गया पर पुलिस बीच में इसलिए पड़ी कि परिवारों ने उन के अपहरण की आशंका जताई थी. गनीमत है कि पुलिस ने बयान ले कर उन्हें छोड़ दिया और परिवारों को कहा कि वे अपनी बेटियों को समझाना चाहें तो समझाएं.

2 युवतियों का साथ रहना अब धीरेधीरे बहुत आम होता जाएगा. लिव इन रिलेशनशिप में युवक के साथ रहना युवती पर बहुत भारी पड़ता है. उसे हर समय गर्भवती होने का डर तो रहता ही है, पड़ोसियों और सहयोगियों के मजाक का भी पात्र बनना पड़ता है. 2 लड़कियां साथ रहें तो आमतौर पर आपत्तियां नहीं उठतीं और समाज उलटे थोड़ा सहयोगी बना रहता है. लोग उन्हें छेड़ने वालों से बचाते हैं, चाहे बंद दरवाजे के पीछे वे कैसे भी रहती हों.

अगर कसबों, गांवों से आ कर शहरों में रहना पड़े तो 2-3 लड़कियों का साथ रहना सब से ज्यादा सुखद व सरल है. उन के बीच अगर यौन संबंध हों तो शायद लड़कों का दखल भी न हो और वे आराम से वर्षों साथ रह सकती हैं. हां, पैसे को ले कर विवाद खड़े हो सकते हैं पर ये विवाद तो स्त्रीपुरुष विवादों में भी खड़े होते हैं. घरों से दूर रह रही लड़कियों के मातापिताओं के लिए भी यह स्थिति सुखद है, क्योंकि इस में जो बहनापा या मित्रता पनपती है, वह ज्यादा स्थाई, सुरक्षित व स्नेहभरी होती है. लड़कियां एकदूसरे को अच्छी तरह समझती हैं.

इस मामले में लड़कियां लापता हुईं या परिवारों को बता कर गईं अभी पता नहीं है पर यह पक्का है कि घर वाले जानते थे कि वे कहां और कैसी हैं वरना 2 साल तक हल्ला मचाते रहते. वे खुद नहीं चाहते होंगे कि लोग बातें बनाएं. असल में तो परिवारों को इस तरह के संबंधों को विवाह से पहले प्रोत्साहन देना चाहिए, क्योंकि 2 लड़कियां जब बहनें न हो कर साथ रहें तो ही जान पाती हैं कि साथ रहने में कैसा लेनदेन और कैसी अपेक्षाएं होती हैं. यही ज्ञान विवाह बाद काम आता है. 2 लड़कियों को साथ रहने पर जमीनी हकीकत पता चल जाती है और वे बेहतर पत्नियां बन सकती हैं.

ऐक्सपायर्ड मेकअप प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल

महिलाएं हजारों रुपए खर्च कर डिफरैंट शेड्स की लिपस्टिक्स, आईलाइनर, मसकारा जैसे कौस्मैटिक्स खरीद तो लेती हैं, लेकिन कभी उन का इस्तेमाल पूरी तरह से नहीं कर पातीं और फिर डेट ऐक्सपायर्ड होने पर आधे से ज्यादा बचे प्रोडक्ट्स मन मार कर फेंकने पड़ते हैं. यदि आप का भी मन महंगे कौस्मैटिक्स को फेंकने का नहीं करता, तो न फेंकें और कुछ इस तरह करें उन्हें रियूज:

लिपबाम

कड़ाके की सर्दी से अपने नर्मनाजुक होंठों की सुरक्षा के लिए बेशक आप भी लिपबाम का इस्तेमाल करती होंगी और गरमी के दस्तक देते ही उसे दरकिनार कर देती होंगी, लेकिन अब ऐसा न करें, क्योंकि आप न सिर्फ यूज किए, बल्कि ऐक्सपायर्ड हो चुके लिपबाम को भी रियूज कर सकती हैं. जी हां, अगर आप को शू बाइट की शिकायत है, तो जहां शू बाइट हो रही हो, वहां लिपबाम लगाएं और शूज पहन लें. इस से आप काफी कंफर्टेबल फील करेंगी और शू बाइट भी नहीं होगी.

आईशैडो

क्या आप के पास भी ऐक्सपायर्ड हो चुका डिफरैंट शेड्स वाला आईशैडो पैलेट पड़ा है और अब आप उसे फेंकने की तैयारी में हैं? अगर हां तो ऐसा न करें. शायद आप को यकीन न हो, लेकिन ऐक्सपायर्ड हो चुके आईशैडो से आप घर बैठे नेलपौलिश बना सकती हैं. इस के लिए एक ट्रांसपैरेंट नेलपौलिश लें और उस के ब्रश को आईशैडो पर रगड़ कर (ठीक उसी तरह जिस तरह आप आईशैडो लगाने के लिए ब्रश घुमाती हैं) नाखूनों पर लगाएं. इस से आप मनचाहा नेलपैंट कलर भी लगा लेंगी और आईशैडो खरीदने में लगी रकम को भी वसूल लेंगी.

लिपस्टिक

डेट ऐक्सपायर्ड होने की वजह से अगर आप अपनी पसंदीदा लिपस्टिक नहीं लगा पा रहीं तो टैंशन न लें, क्योंकि अब आप उसी रंग का लिपबाम लगा सकती हैं. इस के लिए 1 छोटी कटोरी में 1 छोटा चम्मच वैसलीन जैसी कोई भी कोल्ड क्रीम लें. अब इस में चाकू से काट कर थोड़ी सी लिपस्टिक डाल दें. फिर इसे 3 मिनट के लिए माइक्रोवेव में रखें. अब आप जब इसे बाहर निकालेंगी तब यह अच्छी तरह पिघल कर लिक्विडनुमा नजर आएगी. अब इसे जमने के लिए कुछ घंटों के लिए फ्रीजर में रख दें. आप का लिपबाम तैयार है.

काजल

अकसर ऐसा होता है कि जब हम कहीं जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तब अचानक हमारी नजर मांग के पास खड़े छोटे सफेद बाल पर पड़ती है. बेशक कुछ महिलाएं इसे तुरंत कैंची से काट देती हैं, लेकिन तब भी जड़ के करीब सफेद बाल झांकता नजर आता है. ऐसे में इसे छिपाने के लिए ऐक्सपायर्ड हो चुका काजल आप के काम आ सकता है, जो आप के सफेद बाल को मिनटों में काला कर सकता है.

पाउडर बेस्ड कौस्मैटिक

फेस पाउडर या पाउडरनुमा फाउंडेशन, आईशैडो, ब्लशऔन की डेट अगर ऐक्सपायर्ड हो गईर् है और उस की मात्रा बहुत अधिक है, तो उस का इस्तेमाल क्राफ्ट पेपर को चमकाने या फिर किसी पेंटिंग को नया रूप देने के लिए भी किया जा सकता है. कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स में शाइनी इफैक्ट के लिए यूज किया जाने वाला ग्लिटर आप की पेंटिंग को और भी खूबसूरत लुक दे सकता है.

क्रीम बेस्ड कौस्मैटिक

डेट ऐक्सपायर्ड होने के बाद मौइश्चराइजर, सनस्क्रीन या फिर बौडी लोशन को स्किन मौइश्चराइजिंग के लिए यूज न करते हुए लैदर की चीजों को चमकाने के लिए इन का इस्तेमाल किया जा सकता है जैसे लैदर के बूट, शूज, बैग, पर्स, बैल्ट, जैकेट, कोट आदि. इन्हें पोंछने के लिए कौटन पर क्रीम लगाएं और हलके हाथों से लैदर की चीजें पोंछें. इस से धूल लगी हुई लैदर की चीजें फिर से चमकने लगेंगी.

मसकारा

बाकी मेकअप प्रोडक्ट्स के मुकाबले मसकारा की उम्र बहुत कम होती है. ऐसे में इसे पूरी तरह यूज करने से पहले ही इस की डेट ऐक्सपायर्ड हो जाती है और इसे न चाहते हुए भी फेंकना पड़ता है. लेकिन आप ऐसा न करें, क्योंकि ऐक्सपायर्ड हो चुका मसकारा न सही, लेकिन मसकारा ब्रश आप के बहुत काम आ सकता है. अत: इस के ब्रश को अच्छी तरह धो कर उसे अपने मेकअप टूल्स बौक्स में रख लें और इस का इस्तेमाल बतौर आईब्रो ब्रश और आईलैशेज को कर्ल करने के लिए करें.

आईलाइनर

अगर आप का पैंसिल या पैननुमा किसी भी शेड का आईलाइनर आउटडेटेड हो गया है, तो उसे फेंकने के बजाय उसे रियूज करें जैसे अगर आप के घर में रखी किसी पेंटिंग का रंग धूप से उड़ चुका है, तो उस के बौर्डर को आईलाइनर से आउटलाइन दें. इसी तरह इस का इस्तेमाल आप किचन कैबिनेट में रखे अलगअलग डब्बों को नाम देने के लिए (अंदर कौन सी चीज रखी है यह लिखने के लिए) भी कर सकती हैं. इस के लिए पहले डब्बों पर प्लेन पेपर चिपकाएं, फिर आईलाइनर से सुंदर अक्षरों में उस का नाम लिखें. यह नौर्मल पैन और पैंसिल से ज्यादा उभरा नजर आता है और जल्दी मिटता भी नहीं है.

नेलपौलिश

अगर किसी नेलपौलिश की डेट ऐक्सपायर्ड हो चुकी है, तो उसे अपने कौस्मैटिक बौक्स से हटा कर ज्वैलरी बौक्स में रख दें. जी हां, यह आप के बहुत काम आ सकती है जैसे अगर आप जब भी आर्टिफिशियल नैकलैस पहनती हैं और आप को स्किन ऐलर्जी जैसे खुजली, लाल चकत्तों आदि की शिकायत होती है तब नैकलैस के पीछे नेलपौलिश लगा दें. इस से स्किन ऐलर्जी नहीं होगी. इसी तरह ऐक्सपायर्ड नेलपौलिश का इस्तेमाल आप चाबी, फुटवियर की हील्स, हेयरक्लिप जैसी ऐक्सैसरीज को रंगने के लिए भी कर सकती हैं.

क्या खास है फिल्म ‘ब्लू माउंटेंस’ में

हाल ही में फिल्म ब्लू माउंटेंस का बॉलीवुड नगरी मुंबई में पोस्टर रिलीज किया गया है. यह फिल्म 7 अप्रैल 2017 को भारतीय सिनेमा घरों में आने वाली है. इस फिल्म की कहानी पूरी तरह से आज के युवाओं पर केंद्रित है.

यह फिल्म सुमन गांगुली द्वारा लिखी गई है और इसका निर्देशन भी सुमन ने ही किया है. फिल्म का निर्माण दिल्ली के जाने माने हस्तशिल्प निर्यातक राजेश कुमार जैन द्वारा किया गया है.

कैसे रियलिटी शोज से रातोंरात स्टार बनने के बाद मिली सफलता से उत्साहित युवा किस कदर सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं और कोई विफलता उन्हें अचानक तनाव में डाल देती है इस फिल्म की पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है.

इस फिल्म में रणवीर शौरी, ग्रेसी सिंह, राजपाल यादव और यथार्थ मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाले हैं. इस फिल्म का संगीत संदीप सूर्या, आदेश श्रीवास्तव और मोंटी शर्मा ने दिया है.

यह फिल्म ब्लू माउंटेन्स बदलते मौसम के माध्यम से ब्लू माउंटेन्स के बदलते रंगों की तरह ही है. यह फिल्म भी किसी के जीवन में जीतने या हारने की यात्रा की और मानवीय भावनाओं के बदलने की स्थितियों की खोज करती है.

फिल्म “मातृ” से वापसी करेंगी रवीना टंडन

रवीना टंडन 13 साल बाद एक बार फिर स्क्रीन पर वापसी कर रही हैं और रवीना टंडन की वापसी उनकी धमाकेदार फिल्म “मातृ” से होगी. रवीना टंडन की फिल्म औरतों के उन मुद्दों पर आधारित है जिन्हें कभी उठाया नहीं गया है और जो समाज में अपनी बुराइयों का घर बना कर बैठ गए हैं.

रवीना टंडन के फैंस फिल्म का पहला लुक देखकर उनकी फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

2003 में सत्ता के साथ सबको अंदर तक हिलाने वाली रवीना टंडन ने 2004 में शादी के बाद, फिल्मों से नाता कम रखा. रवीना ने 2004 के बाद जो भी काम किया उस पर रवीना टंडन वाला स्टाम्प नहीं था.

दमन, शूल और सत्ता जैसी फिल्मों के बाद. उनकी अगली फिल्म का पहला लुक देखकर फैन्स बहुत खुश हैं. क्योंकि ये वो 13 साल पुरानी वाली रवीना टंडन ही वापस आ रहीं हैं. फिल्म “मातृ द मदर” 13 अप्रैल में रिलीज होगी और रवीना टंडन एक बार फिर धमाकेदार अंदाज में वापसी करेंगी. हालांकि रवीना टंडन ने अनुराग कश्यप की बॉम्बे वेलवेट में भी काम किया था. अब रवीना की फिल्म का पहला लुक आ चुका है और रवीना टंडन की तस्वीर देखकर तो फिलहाल यही लग रहा है कि उनकी फिल्म काफी शानदार होगी.

कानून सबके लिए एक है

उस दिन तारीख थी 8 दिसंबर. राजस्थान के शहर धौलपुर के कचहरी परिसर में उस दिन आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. सर्दी होने के बावजूद लोग 10 बजे से पहले ही कचहरी पहुंच गए थे. कारण यह था कि उस दिन बहुचर्चित नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था, जिस में अभियुक्त थे धौलपुर के बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह. अदालत के फैसले से जहां एक तरफ विधायक बी.एल. कुशवाह के भविष्य का निर्णय होना था, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के कई प्रमुख दलों की निगाहें भी इस फैसले पर टिकी थीं. इस की वजह यह थी कि विधायक को सजा होने पर बसपा की एक सीट कम हो जाती, जिस के लिए उपचुनाव होना तय था, क्योंकि राजस्थान में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2018 तक था.  अदालत ने नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाने की तारीख 8 दिसंबर पहले ही तय कर दी थी. सत्र न्यायाधीश सलीम बदर निर्धारित समय पर अदालत पहुंच गए. उन्हें ही इस केस का फैसला सुनाना था. पुलिस गार्ड भी अभियुक्तों बी.एल. कुशवाह और सत्येंद्र सिंह को जेल वैन में ले कर समय पर अदालत आ गए थे.

अपर सत्र न्यायाधीश के कुरसी संभालते ही अदालत में सन्नाटा छा गया. दोनों अभियुक्त तो अदालत में थे ही, मृतक नरेश कुशवाह के घर वाले, राज्य सरकार की ओर से नियुक्त लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता, विपक्ष के वकील रामकुमार शर्मा और सत्येंद्र सिंह के वकील सुरेंद्र शर्मा भी अदालत में मौजूद थे. अदालत में शांति बनाए रखने का आदेश देने के बाद न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘अदालत ने दंड के रूप में दी जाने वाली सजा पर दोनों पक्षों को ध्यान से सुना. अभियुक्तों के वकीलों का तर्क है कि इस से पहले अभियुक्तों ने कोई भी अपराध नहीं किया है. उन के विरुद्ध अपराध भी पहली बार सिद्ध हुआ है, जो जघन्य से जघन्यतम नहीं है. इसलिए उन्हें दिए जाने वाले दंड में नरमी बरती जानी चाहिए. जबकि लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता ने नरेश कुशवाह हत्याकांड को जघन्य अपराध बताते हुए अधिकतम दंड देने की गुजारिश की है.’’

न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाते हुए आगे कहा, ‘‘दोनों पक्षों के तर्कों पर मनन करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि आरोपी बनवारी लाल कुशवाह की छोटी बहन सीमा कुशवाह का प्रेम संबंध नरेश कुशवाह के साथ था और वह नरेश से प्रेम विवाह करना चाहती थी. लेकिन दोनों परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई बराबरी नहीं थी. सीमा का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध और रौबरुतबे वाला था. जबकि नरेश एक साधारण किसान का बेटा था.

‘‘आरोपी बनवारी लाल को यह बात बरदाश्त नहीं थी कि उस की बहन ऐसे युवक से शादी करे जिस का परिवार उस के परिवार के साथ खड़ा होने लायक ही न हो, इसलिए उस ने नरेश कुशवाह की हत्या का षडयंत्र रचा और अपने निजी सुरक्षाकर्मी सत्येंद्र सिंह और उस के करीबी रोबिन सिंह को पैसा दे कर नरेश कुशवाह की हत्या करवा दी, जो औनर किलिंग की श्रेणी में आती है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी घटनाओं पर अत्यधिक कड़ा रुख अपनाते हुए दिशानिर्देश दिए हैं कि ऐसे अपराधियों को मृत्युदंड से दंडित किया जाना चाहिए.’’ न्यायाधीश श्री सलीम बदर ने इस संबंध में कुछ उदाहरण पेश करने के बाद कहा, ‘‘प्रस्तुत मामले में आरोपी बनवारीलाल कुशवाह ने अपने धनबल का प्रयोग कर के किराए के हत्यारों से नरेश कुशवाह की हत्या इसलिए कराई ताकि उस की बहन सीमा उर्फ सुषमा नरेश से प्रेम विवाह न कर सके. इस के लिए सत्येंद्र सिंह और रोबिन सिंह को पैसा दिया गया. इस केस की तमाम पत्रावलियों और साक्ष्यों पर गौर करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि इस केस की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि इसे जघन्य से जघन्यतम माना जाए.’’

न्यायाधीश महोदय ने एक नजर अदालत में मौजूद लोगों पर डाली और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘अदालत आरोपी सत्येंद्र सिंह जाट, निवासी जलालपुर करीरा, जिला बुलंदशहर को भादंसं की धारा 302 और धारा 120बी के तहत हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास व 10 हजार रुपए का दंड देती है.’’ कुछ देर रुक कर न्यायाधीश महोदय ने उचटती नजरों से बी.एल. कुशवाह की ओर देखा और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘आरोपी बनवारीलाल कुशवाह, निवासी जमालपुर, जिला धौलपुर पर भादंसं की धारा 120बी सपठित धारा 302 भादंवि के आरोप साबित हुए हैं. अत: बनवारीलाल कुशवाह को भी आजीवन कारावास और 10 हजार रुपए के अर्थदंड की सजा दी जाती है.’’

इस केस के अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध चूंकि अभी जांच चल रही थी, इसलिए न्यायाधीश महोदय ने पुलिस को आदेश दिया कि जल्दी से जल्दी जांच और गिरफ्तारी का काम किया जाए. अदालत का फैसला सुन कर विधायक बनवारीलाल कुशवाह व सत्येंद्र सिंह के चेहरे उतर गए. जबकि मृतक नरेश कुशवाह के पिता मेघसिंह और मां जमुना देवी ने इस फैसले पर खुशी जताई. अदालत के निर्णय के बाद पुलिस बल ने दोनों आरोपियों को अपनी कस्टडी में ले लिया. अब उन्हें आगे की जिंदगी जेल में काटनी थी. दरअसल, 27 दिसंबर, 2012 को झीलकापुरा गांव के रहने वाले थानसिंह कुशवाह ने धौलपुर के सदर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि 2 युवक लाल रंग की डिसकवर मोटरसाइकिल पर उन के घर आए और उस के भाई नरेश कुशवाह को बुला कर ट्यूबवेल पर ले गए.

कुछ देर बाद उस ने गोली चलने की आवाज सुनी तो वह छोटे भाई पुष्पेंद्र और अन्य ग्रामीणों के साथ खेत में स्थित ट्यूबवेल पहुंचा. वहां वे दोनों युवक नरेश को गोली मार रहे थे और कह रहे थे कि जान से मार डालो. जब हम लोग वहां पहुंचे तो दोनों हमलावर मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गए. हम नरेश को अस्पताल ले कर गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसी दिन पुलिस ने सदर थाने में मुकदमा संख्या 316/2012 धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया. हत्या की सूचना पर तत्कालीन पुलिस अधिकारियों में एएसपी किशन सहाय, सीओ सिटी दशरथ सिंह, थानाप्रभारी हवा सिंह आदि मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका मुआयना कर के पूछताछ की लेकिन यह पता नहीं चला कि नरेश की हत्या करने वाले कौन थे और हत्या की वजह क्या थी. पुलिस ने उसी दिन नरेश के शव का पोस्टमार्टम करा कर उस के घर वालों को सौंप दिया. पुलिस ने मामले की जांचपड़ताल शुरू की. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि हत्यारे अज्ञात थे. उन का कोई अतापता नहीं चल पा रहा था. पुलिस ने मृतक नरेश के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने इस बात की आशंका जताई कि नरेश की हत्या प्रभावशाली लोगों के इशारे पर की जा सकती है.

इन प्रभावशाली लोगों में बनवारीलाल कुशवाह का नाम सामने आया. बनवारीलाल कुशवाह का मध्य प्रदेश व अन्य कई जगहों पर चिटफंड का लंबाचौड़ा कारोबार होने की बात भी पता चली. यह भी पता चला कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश के पूर्व गृह राज्यमंत्री और मौजूदा विधायक नारायण सिंह का रिश्तेदार है. नरेश की हत्या की वजह यह पता चली कि नरेश का बनवारीलाल कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा से प्रेम प्रसंग चल रहा था. सीमा नरेश से विवाह करना चाहती थी. बनवारीलाल इस के खिलाफ था. इस की वजह यह थी कि नरेश बेहद गरीब परिवार से था, जबकि सीमा आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से संपन्न परिवार की बेटी थी. बनवारीलाल ने एकदो बार दूसरों के माध्यम से नरेश को इस बात के लिए आगाह भी किया था, लेकिन सीमा नरेश से ही शादी करना चाहती थी. संभव है इसी बात को ले कर नरेश की हत्या की गई हो.

इस बीच, बनवारीलाल कुशवाह ने सन 2013 के आखिर में हुए राजस्थान की 14वीं विधानसभा के चुनाव में धौलपुर सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र दाखिल कर दिया. कहते हैं कि चिटफंड कंपनियों से मोटा पैसा कमाने और छोटे भाई बालकिशन की ससुराल राजनीतिक परिवार में हाने के कारण बनवारीलाल कुशवाह की राजनीति में आने की इच्छा थी. बनवारीलाल कुशवाह ने अपने संपर्कों के बल पर बसपा का टिकट हासिल कर लिया. राजस्थान में उस समय जनता महंगाई जैसे कारणों को ले कर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की सरकार बदलना चाहती थी. इसलिए भाजपा के पक्ष में लहर चल निकली. भाजपा की लहर के बावजूद धौलपुर से बसपा के टिकट पर बनवारीलाल कुशवाह विधायक चुन लिए गए.

विधानसभा चुनाव के दौरान बनवारीलाल कुशवाह द्वारा भरे गए नामांकन पत्र के साथ 8 नवंबर, 2013 को नोटरी से सत्यापित शपथपत्र में उन्होंने खुद की वार्षिक आय 1 करोड़ 47 लाख 64 हजार 130 रुपए बताई, जबकि पत्नी शोभारानी की वार्षिक आय 38 लाख 55 हजार 750 रुपए बताई. शपथपत्र में बनवारीलाल ने खुद की ओर से 18 कंपनियों में 12 करोड़ 55 लाख रुपए एवं पत्नी शोभारानी की ओर से 15 कंपनियों में 2 करोड़ 85 लाख रुपए का निवेश बताया गया. शपथपत्र में कुशवाह ने धौलपुर के गांव जमालपुर में 3.83 एकड़ जमीन, दलेलपुर में 0.63 एकड़ जमीन और धौलपुर में 20,664 वर्गफुट गैर कृषि भूमि होना बताया. इस के अलावा उन्होंने दिल्ली एवं ग्वालियर में अपनी संपत्तियां होने की बात भी कही थी.

विधायक चुने जाने के बाद बनवारीलाल कुशवाह पर विधानसभा चुनाव में गलत शपथपत्र पेश करने के आरोप भी लगे. इस संबंध में कई लोगों की ओर से अलगअलग अधिकारियों को ज्ञापन भी दिए गए. ज्ञापन में आरोप लगाए थे कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश में चिटफंड धोखाधड़ी मामले में आरोपी हैं. बनवारीलाल कुशवाह भले ही धौलपुर से विधायक चुने गए, लेकिन वे गिरफ्तारी के डर से राजस्थान विधानसभा के पहले सत्र में तय समय पर शपथ लेने नहीं पहुंचे. बाद में 6 फरवरी, 2014 को वे शपथ लेने विधानसभा पहुंचे, उस से पहले ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले कर पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि वे अंतरिम जमानत पर हैं. बाद में पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के बाद बनवारीलाल कुशवाह ने 7 फरवरी, 2014 को विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल के चैंबर में शपथ ली. अगर वे चुनाव के 60 दिनों के भीतर शपथ नहीं लेते तो उन की विधानसभा सदस्यता रद्द हो सकती थी.

दूसरी ओर पुलिस नरेश हत्याकांड की जांच कर रही थी. एक साल से अधिक समय से मामले की जांच एक से दूसरे पुलिस अधिकारियों के बीच घूमती रही. मृतक नरेश के परिजनों द्वारा पुलिस पर लगातार काररवाई का दबाव बनाने से मामले की जांच में तेजी आई. जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अप्रैल 2014 में सत्येंद्र सिंह को नरेश की हत्या के आरोप में उत्तर प्रदेश की बुलंदशहर जेल से रिमांड लिया. बुलंदशहर जिले के शिकारपुर थानाक्षेत्र के गांव करीरा के रहने वाले सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की साजिश धौलपुर विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने रची थी. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद धौलपुर पुलिस ने नरेश हत्याकांड में सत्येंद्र सिंह के विरुद्ध धारा 302, 120बी एवं 201 भादंसं के तहत और बनवारीलाल कुशवाह के विरुद्ध भादंसं की धारा 302 एवं 120बी के तहत मामला दर्ज कर लिया. इन के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी इस मामले में नामजद किया गया.

नरेश हत्याकांड में नाम आने से विधायक बनवारीलाल कुशवाह की मुश्किलें बढ़ गईं. कुशवाह के साथ उन के भाई शिवराम एवं चचेरे भाई जितेंद्र कुशवाह ने जून, 2014 में धौलपुर की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 6 जून, 2014 को तीनों कुशवाह भाइयों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी. इस अर्जी में कुशवाह बंधुओं ने कहा कि नरेश की हत्या में उन्हें गलत फंसाया जा रहा है. इस के जवाब में लोक अभियोजक अनंतराम त्यागी ने अदालत में दलील दी कि नरेश की हत्या के अपराध में पुलिस ने सत्येंद्र नामक व्यक्ति को पकड़ा था. उस ने पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की योजना विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने बनाई थी. नरेश की हत्या के लिए 4 लाख रुपए की सुपरी दे कर बुलंदशहर से एक शूटर को भी बुलाया गया था.

त्यागी ने अदालत को बताया कि नरेश के परिजनों ने सत्येंद्र की शिनाख्त धौलपुर जिला कारागार में की थी. इस प्रकरण की जांच भरतपुर आईजी द्वारा की जा रही है. प्रारंभिक जांच में माना गया है कि नरेश हत्याकांड में बी.एल. कुशवाह का हाथ है. विधायक कुशवाह ने बाद में दूसरी अदालतों से इस मामले में अग्रिम जमानत हासिल करने के प्रयास किए, लेकिन उन्हें किसी भी अदालत से राहत नहीं मिली. पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिशों में जुटी थी. इसी बीच विधायक के खिलाफ मामला होने के कारण इस प्रकरण की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई. सीबीसीआईडी ने जांच कर के विधायक कुशवाह की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. पुलिस के बढ़ते दबाव को देख कर आखिरकार कुशवाह ने 13 अक्तूबर, 2014 को जयपुर स्थित पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने विधायक बी.एल. कुशवाह को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने इस की सूचना राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को भी दे दी. कुशवाह के आत्मसमर्पण के मौके पर सीबीसीआईडी के डीआईजी डा. गिरराज मीणा ने बताया कि मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक सिमकार्ड की जानकारी मिली थी. यह सिमकार्ड दिल्ली स्थित गरिमा होम्स एंड फार्म्स लिमिटेड के नाम थी, जो कंपनी के कर्मचारी सत्येंद्र सिंह को जारी हुई थी.

सत्येंद्र सिंह विधायक कुशवाह का गनमैन था. नरेश की हत्या के बाद से वह भी फरार था. उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्येंद्र को आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार किया था. राजस्थान पुलिस सत्येंद्र को बुलंदशहर जेल से गिरफ्तार कर के लाई थी. डीआईजी डा. मीणा ने बताया था कि सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उस ने अपने साथी रोबिन के साथ मिल कर नरेश की हत्या की थी. इस हत्या की साजिश विधायक बी.एल. कुशवाह ने अपने साथियों के साथ रची थी. जांच में सामने आया कि नरेश और विधायक कुशवाह की बहन के प्रेम संबंध थे. वे दोनों शादी करना चाहते थे, इसीलिए बी.एल. कुशवाह और उन के भाई नरेश को अपनी बहन से दूर रहने की चेतावनी देते थे.

बाद में बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने धौलपुर के मनिया स्थित गेस्टहाउस में गनमैन सत्येंद्र के साथ मिल कर नरेश की हत्या की साजिश रची थी. नरेश की हत्या के लिए घटना से कुछ दिन पहले शूटर रोबिन सिंह को धौलपुर लाया गया था. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने बी.एल. कुशवाह को दूसरे दिन अदालत में पेश कर के रिमांड पर ले लिया. बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में धौलपुर जिला जेल भेज दिया गया. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अक्तूबर, 2014 के आखिर में धौलपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट (एक) की अदालत में बी.एल. कुशवाह एवं सत्येंद्र सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया. यह प्रकरण विधिवत सुनवाई के लिए धौलपुर के सत्र न्यायालय में पहुंचा. जहां इस केस की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायायाधीश ने शुरू की. इसी बीच कुशवाह ने अपनी मां की तबीयत खराब होने की बात कह कर मां की देखभाल के लिए अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 27 मई, 2015 को कुशवाह को 2 लाख रुपए के मुचलके पर सशर्त अंतरिम जमानत दे दी. बाद में 10 जून को कुशवाह ने धौलपुर जिला कारागार में अपनी हाजिरी दी.

जेल जाने के बाद से ही कुशवाह जमानत हासिल करने के प्रयासों में जुटे थे, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने उन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. बाद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2016 में आदेश दिया कि इस केस को 6 महीने में निपटाया जाए. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद धौलपुर के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय में 6 महीने से इस मामले की निरंतर सुनवाई चल रही थी. सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दी गई 6 महीने की अवधि 22 अगस्त, 2016 को पूरी हो गई तो कुशवाह ने अपने वकील के मार्फत अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश धौलपुर की अदालत में जमानत अर्जी दाखिल की, जिसे 2 सितंबर, 2016 को अदालत ने खारिज कर दिया. इस के बाद 8 दिसंबर, 2016 को इस केस में फैसला सुना दिया गया. बाद में 13 दिसंबर को राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने धौलपुर से बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह की सदस्यता समाप्त कर दी. इस के साथ ही धौलपुर विधानसभा सीट खाली होने की घोषणा कर दी गई. यह संयोग ही रहा कि बी.एल. कुशवाह सन 2013 में 8 दिसंबर को पहली बार विधायक चुने गए थे और ठीक 3 साल बाद 8 दिसंबर, 2016 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. बाद में विधानसभा अध्यक्ष ने उन की सदस्यता भी 8 दिसंबर, 2016 से ही समाप्त की.

नरेश हत्याकांड के अभी 3 आरोपी फरार चल रहे हैं. इन में बी.एल. कुशवाह के भाई शिवराम और जितेंद्र कुशवाह के अलावा शूटर रोबिन शामिल हैं. रोबिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का रहने वाला है. पुलिस के अनुसार, रोबिन ने ही नरेश को गोली मारी थी. नरेश की हत्या के समय वह सत्येंद्र के साथ था. पुलिस की जांचपड़ताल एवं अदालत के फैसले में नरेश कुशवाह एवं सीमा उर्फ सुषमा कुशवाह के प्रेम प्रसंग की जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार है—

धौलपुर के सदर थानान्तर्गत गांव झीलकापुरा के रहने वाले मेघसिंह कुशवाह के 5 बेटे थे. मेघसिंह गरीब किसान हैं. खेतीबाड़ी कर अपना गुजरबसर करते हैं. मेघसिंह का बेटा नरेश कुशवाह धौलपुर की कमला कालोनी में किराए का कमरा ले कर 12वीं की पढ़ाई कर रहा था. खर्च चलाने के लिए वह कुछ कामकाज भी करता था. इसी मकान में नरेश के ऊपर वाले कमरे में किराए पर बी.एल. कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा अपनी बहन रिंकेश के साथ रहती थी. ये दोनों बहनें धौलपुर में गर्ल्स स्कूल में 9वीं कक्षा की छात्राएं थीं. इसी दौरान नरेश का सीमा से प्रेम शुरू हुआ. दोनों एक साथ ही खाना बनाते और खाते थे. बाद में उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सीमा ने तय कर लिया था कि वह शादी नरेश से ही करेगी. नरेश से वह उस के मोबाइल पर बात भी करती थी. नरेश ने उसे कई बार फोन करने को मना भी किया लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी, इसलिए नहीं मानी. नरेश उस से कहता था कि हम दोनों की शादी नहीं हो सकती, क्योंकि तुम बड़े और पैसे वाले घर की लड़की हो. इस पर सीमा नरेश से कहती कि चाहे कुछ भी हो जाए, शादी मैं तुम से ही करूंगी. मैं अपने भाइयों को तुम से शादी करने के लिए मना लूंगी. सीमा ने 2-3 बार नरेश की मां जमुनादेवी से भी बात की थी. उन्होंने उसे नरेश से बातें करने से मना किया था लेकिन सीमा ने नरेश की मां को समझाया कि इलेक्शन के बाद मैं अपने भाइयों को शादी के लिए मना लूंगी. सीमा ने जमुनादेवी को बताया कि उस ने अपनी भाभी से भी यह बात बता दी है.

जमुनादेवी ने नरेश को भी समझाया था कि सीमा पैसे वाले बड़े घर की लड़की है, जिस के साथ तेरी शादी नहीं हो सकती. तू उस से बात मत किया कर. इस पर नरेश ने कहा था कि सीमा खुद फोन करती है और कहती है कि शादी करूंगी तो तुझ से वरना मर जाऊंगी.

नरेश की हत्या से 20 दिन पहले जब दोनों बात कर रहे थे तो सीमा के छोटे भाई को पता चल गया. इस के बाद उस ने नरेश को धमकी दी कि तू उस की बहन का पीछा छोड़ दे वरना अंजाम ठीक नहीं होगा. नरेश की हत्या से 7-8 दिन पहले बनवारीलाल कुशवाह ने भी सीमा से प्रेम को ले कर नरेश को अंजाम भुगतने की धमकी दी थी.

सीमा नरेश को प्रेमपत्र भी लिखती थी. एक बार वह नरेश के साथ एक मंदिर में मनौती मांगने भी गई थी, वहां नरेश ने अपने एक चचेरे भाई को सीमा से मिलवाते हुए कहा था कि यह तेरी भाभी है. हम शादी की मन्नत मांगने आए हैं.

बाद में सीमा के लिखे प्रेमपत्र नरेश के एक बैग से मिले. यह बैग काफी दिनों तक धौलपुर में उसी मकान मालिक के पास पड़ा रहा, जिस में नरेश किराए का कमरा ले कर रहता था. पुलिस ने इन प्रेमपत्रों की लिखावट की पुष्टि के लिए सीमा की स्कूल की उत्तर पुस्तिकाओं व प्रेमपत्रों की हस्तलिपि की जयपुर में विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच कराई. इस में दोनों हस्तलेख एक ही पाए गए थे.

जिस दिन नरेश की हत्या की गई थी, उस दिन सीमा जयपुर में थी. इस घटना का उसे बाद में पता चला था. नरेश की हत्या से पहले ही सीमा का रिश्ता धौलपुर के रहने वाले गोरेलाल कुशवाह के लड़के आकाश से तय कर दिया गया था.

नरेश हत्याकांड की जांच के दौरान 5 जनवरी, 2013 यानी नरेश की हत्या से करीब एक हफ्ते बाद धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज कराए अपने बयानों में सीमा ने अपने व नरेश के प्रेम संबंधों को सहज व स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया था. हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गई थी. इस पर जज साहब ने अपने फैसले में लिखा कि सीमा अभियुक्त बनवारीलाल कुशवाह की सगी छोटी बहन है. बनवारीलाल कुशवाह वर्तमान में धौलपुर से निर्वाचित विधायक हैं.

कोई लड़की जो अपने प्रेमी के साथ विवाह करना चाहती हो और इस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर रही हो, वह तब तक ही अपने प्रेमी का साथ देगी, जब तक उस का अपना अंतिम उद्देश्य अर्थात प्रेमी के साथ विवाह न हो जाए.

लेकिन जब उस का प्रेमी ही जीवित न हो तो उस का अपने परिवार वालों के साथ बगावत करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. उस लड़की की लाचारी को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता, जिसे उसी घर में रहना है, जिस घर का व्यक्ति उसी के प्रेम संबंधों के चलते उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में जेल में बंद हो.      

– कथा अदालत के फैसले एवं विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित

पैसों पर टिकी मोहब्बत

पुरानी दिल्ली स्थित जामा मसजिद के पास सड़क के किनारे दाहिनी ओर कई मध्यम दर्जे के होटल हैं, जिन में दूरदराज से जामा मसजिद देखने आए लोग ठहरते हैं. इन्हीं होटलों में एक है अलदानिश, जिस के मैनेजर सोहेल अहमद हैं.  19 नवंबर, 2016 को वह होटल के रिसेप्शन पर बैठे अपनी ड्यूटी कर रहे थे, तभी साढ़े 11 बजे एक लड़का एक लड़की के साथ उन के पास आया. दोनों काफी खुश लग रहे थे. लड़के ने साथ आई लड़की को अपनी पत्नी बताते हुए कहा कि वह जामा मसजिद देखने आया है. उसे एक दिन के लिए एक कमरा चाहिए. सोहेल ने लड़के का नामपता पूछ कर रजिस्टर में नोट किया. उस के बाद आईडी मांगी तो उस ने जेब से अपना आधार कार्ड निकाल कर उन के सामने काउंटर पर रख दिया. आधार कार्ड उसी का था. उस का नाम आजम और पता राजीव बस्ती, कैप्टननगर, पानीपत, हरियाणा था. इस के बाद सोहेल ने सर्विस बौय मोहम्मद मिनहाज को बुला कर आजम को कमरा नंबर 203 देखने के लिए भेज दिया.

थोड़ी देर बाद अकेले ही वापस आ कर आजम ने कहा कि कमरा उसे पसंद है. इस के बाद अन्य औपचारिकताएं पूरी कर के सोहेल ने कमरा नंबर-203 उस के नाम से बुक कर दिया. कमरे का किराया 12 सौ रुपए जमा कर के आजम वापस कमरे में चला गया. सोहेल ने रुपए और आधार कार्ड अपनी दराज में रख लिया. करीब 2 घंटे बाद आजम मैनेजर सोहेल के पास आया और अपना आधार कार्ड मांगते हुए कहा कि उसे उस की फोटो कौपी करानी है. सोहेल ने आधार कार्ड दे दिया तो वह तेजी से बाहर निकल गया. उस के जाने के थोड़ी देर बाद मोहम्मद मिनहाज किसी काम से कमरा नंबर 203 में गया तो उस ने वहां जो देखा, सन्न रह गया.

मिनहाज भाग कर नीचे आया और मैनेजर सोहेल अहमद के पास जा कर बोला, ‘‘कमरा नंबर 203 के बाथरूम में लड़की की लाश पड़ी है. शायद उस के साथ जो आदमी आया था, उस ने उसे मार दिया है.’’ यह सुन कर सोहेल परेशान हो उठा. उस ने तुरंत होटल के मालिक इसलामुद्दीन के बेटे दानिश को फोन कर के सारी बात बताई. दानिश होटल आने के बजाय सीधे थोड़ी दूर स्थित जामा मसजिद पुलिस चौकी पर पहुंचा और चौकीइंचार्ज मोहम्मद इनाम को सारी बात बता दी. चौकीइंचार्ज इनाम चौकी में मौजूद सिपाहियों को ले कर होटल जा पहुंचे. लाश का सरसरी तौर पर निरीक्षण करने के बाद उन्होंने हत्याकांड की सूचना थाना जामा मसजिद के थानाप्रभारी अनिल बेरीवाल को दे दी.

सूचना मिलते ही अनिल बेरीवाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल से ही उन्होंने इस घटना की सूचना  उच्चाधिकारियों को दे दी थी. अतिरिक्त थानाप्रभारी धन सिंह सांगवान भी सूचना पा कर होटल पहुंच गए थे. थोड़ी देर में सैंट्रल डिस्ट्रिक की क्राइम टीम तथा एफएसएल टीम भी पहुंच गई थी. लाश का सिर बाथरूम में टौयलेट पौट के ऊपर तथा पैर दरवाजे की तरफ थे. गरदन पर चोट के निशान थे. लगता था हत्या गला दबा कर की गई थी. एफएसएल टीम ने अपना काम निपटा लिया तो अनिल बेरीवाल ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जयप्रकाश नारायण अस्पताल भिजवा दिया. होटल से लौट कर पुलिस टीम ने अपराध संख्या 135/2016 पर हत्या के इस मुकदमे को अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी धन सिंह सांगवान को सौंप दी गई. धन सिंह सांगवान ने होटल के मैनेजर सोहेल अहमद को थाने बुला कर पूछताछ की तो उस ने हत्या का शक मृतका के शौहर आजम पर जताया. आजम अपना आधार कार्ड भले ही साथ ले गया था, लेकिन उस में दर्ज उस का पता मैनेजर ने अपने रजिस्टर में लिख लिया था. उस का मोबाइल नंबर भी लिखा हुआ था.

आजम का पता धन सिंह को मिल ही गया था. उन्होंने उसे गिरफ्तार करने के लिए एक पुलिस टीम गठित की, जिस में एसआई धर्मवीर, हैडकांस्टेबल नीरज तथा कुछ अन्य लोगों को शामिल किया. अगले दिन सुबह 8 बजे वह अपनी टीम के साथ होटल के रजिस्टर में लिखे पते पर पहुंचे तो पता चला कि आजम पहले वहां एक कमरा किराए पर ले कर रहता था. लेकिन अब वह अपनी अम्मी समीना, अब्बा मोहम्मद सलीम के साथ राजीव कालोनी के मकान नंबर-1109/10 (गंदा नाला के निकट) रहता है. इस के बाद धन सिंह वहां पहुंचे तो वह घर में सोता हुआ मिल गया. उसे जगाया गया तो दिल्ली पुलिस को देख कर उस के हाथपांव फूल गए. पुलिस पहचान के लिए अलदानिश होटल के सर्विस बौय मिनहाज को साथ ले कर आई थी. आजम को देखते ही उस ने कहा, ‘‘साहब, यही आदमी उस औरत के साथ होटल में आया था.’’ मुजरिम के पकड़े जाने से धन सिंह सांगवान ने राहत की सांस ली. आजम ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस ने मृतका का नाम शबनम बताया. वह कभी उस के पड़ोस में रहने वाले अलादिया की पत्नी थी. लेकिन इस समय वह दिल्ली में रहता था. धन सिंह ने आजम से अलादिया का फोन नंबर ले कर उसे फोन किया कि उस की पत्नी दुर्घटना में घायल हो गई है, वह दिल्ली के थाना जामा मसजिद पहुंच जाए. धन सिंह आजम को ले कर दिल्ली आ गए. वह थाने पहुंचे तो मृतका का शौहर अलादिया उन का इंतजार कर रहा था. उसे जयप्रकाश नारायण अस्पताल ले जाया गया तो उस ने मृतका की लाश की शिनाख्त अपनी पत्नी शबनम के रूप में कर दी.

अगले दिन शबनम की लाश का पोस्टमार्टम हुआ तो पता चला कि उस की मौत दम घुटने से हुई थी. आजम को अगले दिन तीसहजारी कोर्ट में पेश कर के पूछताछ के लिए एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान आजम ने शबनम का मोबाइल (बिना सिम का), अपना मोबाइल और श्मशान घर की छत पर फेंका गया शबनम का पर्स बरामद करा दिया. पूछताछ में उस ने शबनम की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

सोनिया उर्फ शबनम जिला शामली के गांव कुडाना के रहने वाले रामनरेश की बेटी थी. 2 बेटों पर एकलौती होने की वजह से सोनिया को कुछ ज्यादा ही लाडप्यार मिला, जिस से वह स्वच्छंद हो गई. लेकिन उस के कदम बहकते, उस के पहले ही रामनरेश ने सन 2009 में उस की शादी उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के लोनी के रहने वाले करण के साथ कर दी. शुरूशुरू  में तो सब ठीक रहा, लेकिन जब घरगृहस्थी का बोझ सोनिया पर पड़ा तो वह परेशान रहने लगी. करण की आमदनी उतनी नहीं थी, जितने उस के खर्चे थे. करण उस की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाता था. सोनिया ने देखा कि करण उस के मन की मुरादें पूरी नहीं कर पा रहा है तो जल्दी ही उस का मन उस से भर गया.

करण और सोनिया के बीच मनमुटाव रहने लगा. कोई न कोई बहाना बना कर सोनिया अकसर कुडाना आ जाती. उसी बीच बस से आनेजाने में उस की मुलाकात बस कंडक्टर अलादिया से हुई. वह गाजियाबाद का रहने वाला था. वह सोनिया की सुंदरता पर मर मिटा. उसे खुश करने के लिए अलादिया उस की हर मांग पूरी करने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि एक दिन सोनिया अलादिया के साथ भाग गई. अलादिया सोनिया को ले कर सोनीपत पहुंचा और वहां कैप्टननगर में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. कुछ दिनों बाद अलादिया ने सोनिया के साथ निकाह कर लिया और उस का  नाम शबनम रख दिया. सोनिया की इस हरकत से नाराज हो कर ससुराल वालों ने ही नहीं, मायके वालों ने भी उस से रिश्ता खत्म कर लिया. सोनिया उर्फ शबनम अलादिया के साथ खुश थी. उसे खुश रखने के लिए अलादिया उस की हर बात मानता था और उस के सारे नाजनखरे उठाता था. चूंकि अलादिया बस कंडक्टर था, इसलिए वह सुबह घर से निकलता तो देर रात को ही घर वापस आता था. दिन भर शबनम अकेली रहती थी. उस के पड़ोस में आजम भी अकेला ही रहता था. उस के अम्मीअब्बू राजीव कालोनी में गंदा नाला के निकट रहते थे.

वह शबनम का हमउम्र था. शबनम उसे बहुत अच्छी लगती थी, इसलिए कोई न कोई बहाना बना कर वह उस से बातें करने की कोशिश करता था. वह एक कबाड़ी के यहां काम करता था, जहां से उसे 9 हजार रुपए वेतन मिलता था.

चूंकि आजम अकेला ही रहता था. इसलिए सारे पैसे खुद पर खर्च करता था. लेकिन इधर शबनम पर दिल आया तो वह उस के लिए खानेपीने की चीजें ही नहीं, गिफ्ट भी लाने लगा. फिर तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैधसंबंध बन गए. चूंकि अलादिया दिन भर घर से बाहर रहता था, इसलिए आजम को शबनम से मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन इस तरह की बातें कहां छिपी रहती हैं. शबनम और आजम के संबंधों की जानकारी अलादिया को हो गई. उस ने इस बारे में शबनम से पूछा तो उस ने कहा कि कभीकभार आजम उस से मिलने घर आ जाता है, लेकिन उस से उस के संबंध ऐसे नहीं हैं, जिसे गलत कहा जा सके. अलादिया समझ गया कि शबनम आजम से अपने अवैध संबंधों को स्वीकार तो करेगी नहीं, इसलिए उसे दोनों को चोरीछिपे पकड़ना होगा. कुछ दिनों बाद एक दिन अलादिया काम पर जाने की बात कह कर घर से निकला जरूर, लेकिन काम पर गया नहीं. 3-4 घंटे इधरउधर समय गुजार कर वह दोपहर को अचानक घर पहुंचा तो देखा कि घर का दरवाजा अंदर से बंद है. उस ने शबनम को आवाज लगाई तो थोड़ी देर में शबनम ने दरवाजा खोला. उस समय उस के कपड़े तो अस्तव्यस्त थे ही, चेहरे का भी रंग उड़ा हुआ था.

शबनम की हालत देख कर अलादिया को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि अंदर क्या हो रहा था. वह उसी बारे में सोच रहा था कि अंदर से सिर झुकाए आजम निकला. अलादिया ने उसे रोक कर खूब खरीखोटी सुनाई और अपने घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. कुछ कहे बगैर आजम चुपचाप चला गया.

उस के जाने के बाद अलादिया ने शबनम की जम कर खबर ली. शबनम ने माफी मांगते हुए फिर कभी आजम से न मिलने की कसम खाई. इस के बाद कुछ दिनों तक तो शबनम आजम से दूरी बनाए रही, लेकिन जब उस ने देखा कि अलादिया को उस पर विश्वास हो गया है तो वह फिर लोगों की नजरें बचा कर आजम से घर से बाहर मिलने लगी. आजम शबनम को फोन कर के कहीं बाहर बुला लेता और वहीं दोनों तन की प्यास बुझा कर घर वापस लौट आते. शबनम को खुश करने के लिए आजम उस की हर मांग पूरी करता था. आजम और शबनम भले ही चोरीछिपे घर से बाहर मिलते थे, लेकिन अलादिया को उन की मुलाकातों का पता चल ही जाता था.

परेशान हो कर अलादिया शबनम के साथ पानीपत छोड़ कर दिल्ली आ गया और बदरपुर में किराए क  कमरा ले कर रहने लगा. उस का सोचना था कि इतनी दूर आ कर शबनम और आजम का मिलनाजुलना नहीं हो पाएगा. लेकिन उन के बीच संबंध उसी तरह बने रहे. मोबाइल द्वारा दोनों के बीच बातचीत होती ही रहती थी. मौका मिलते ही शबनम आजम को फोन कर देती थी और जहां दोनों को मिलना होता था, आजम वहां आ जाता था. इस के बाद किसी होटल में कमरा ले कर दोनों मिल लेते थे. शबनम जब भी आजम से मिलने आती थी, वह उस के लिए कोई न कोई गिफ्ट ले कर आता था, उसे नकद रुपए भी देता था.

19 नवंबर को शबनम ने फोन कर के आजम को दिल्ली के महाराणा प्रताप बसअड्डे पर बुलाया. आजम पानीपत से चल कर करीब 10 बजे बसअड्डे पर पहुंचा तो शबनम उसे वहां इंतजार करती मिली. वहां से दोनों जामा मस्जिद के पास स्थित होटल अलदानिश पहुंचे और मौजमस्ती के लिए किराए पर कमरा ले  लिया. पहले दोनों ने जी भरकर मौजमस्ती की. उस के बाद दोनों बातें करने लगे. शबनम ने आजम से 10 हजार रुपए मांगे. आजम ने कहा कि इस समय उस के पास इतने रुपए नहीं हैं तो शबनम को गुस्सा आ गया और उस ने आव देखा न ताव, एक करारा थप्पड़ आजम के गाल पर जड़ दिया. शबनम के हाथ से थप्पड़ खा कर आजम को भी गुस्सा आ गया. शबनम की इस हरकत का बदला लेने के लिए आगेपीछे की सोचे बगैर आजम कूद कर उस के सीने पर सवार हो गया और दोनों हाथों से गला पकड़ कर दबा दिया. पलभर में ही शबनम ने दम तोड़ दिया.

शबनम की हत्या करने के बाद आजम ने लाश को उठाया और उसे बाथरूम की फर्श पर लिटा कर उस का पर्स और मोबाइल फोन ले कर होटल के रिसैप्शन पर पहुंचा. वहां बैठे होटल के मैनेजर सोहेल अहमद से अपना आधार कार्ड फोटोस्टेट कराने के बहाने ले कर वह फरार हो गया. बसअड्डे से उस ने  पानीपत जाने वाली बस पकड़ी और अपने घर पहुंच गया. थोड़ी देर बाद उस ने शबनम का खाली पर्स कालोनी में बने श्मशान घर की छत पर फेंक दिया. शबनम के मोबाइल फोन से उस का सिम निकाल कर बाहर फेंक दिया और मोबाइल फोन अपने पास रख लिया. उस ने सोचा था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी, लेकिन घटना के अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

23 नवंबर को रिमांड की अवधि समाप्त होने पर उसे फिर से तीसहजारी कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.     

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नेतागिरी की आड़ में

अचानक हुए हजार व 5 सौ के नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे देश में अफरातफरी का जो माहौल कायम हुआ, उस से उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर भी अछूता नहीं रहा. बैंकों में भीड़ उमड़ पड़ी थी. कोई पुराने नोटों को जमा करना चाहता था तो कोई अपनी जरूरत के हिसाब से नए नोट लेना चाहता था. हर रोज बैंकों में लंबी कतारें लग रही थीं. होने वाली परेशानी से लोगों में गुस्सा भी पनप रहा था. कई दिन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस थे. पुलिस को भी अतिरिक्त ड्यूटी करनी पड़ रही थी. कानूनव्यवस्था की स्थिति न बिगड़े, इस के लिए बैंकों में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. ऐसे में ही एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ को सूचना मिली कि कुछ लोग नए नकली नोटों का धंधा कर रहे हैं. इस के लिए उन्होंने पूरा नेटवर्क भी तैयार कर लिया है. सूचना गंभीर थी, लिहाजा जे. रविंद्र गौड़ ने इस की जानकारी एसपी (क्राइम) अजय सहदेव को दे कर सर्विलांस टीम को अविलंब काररवाई करने के आदेश दिए. थाना पुलिस को भी निर्देश दिए गए कि चैकिंग अभियान चला कर संदिग्ध लोगों की तलाश की जाए. सर्विलांस टीम ने कुछ संदिग्ध लोगों के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया.

23 दिसंबर, 2016 की रात नेशनल हाइवे संख्या 58 दिल्लीदेहरादून मार्ग स्थित पल्लवपुरम थानाक्षेत्र के मोदी अस्पताल के सामने पुलिस चैकिंग अभियान चला रही थी. आनेजाने वाले संदिग्ध वाहनों की जांच सख्ती से की जा रही थी. दरअसल पुलिस को सूचना मिली थी कि नकली नोटों का धंधा करने वाले कुछ लोग उधर से निकलने वाले हैं. सीओ वी.एस. वीरकुमार के नेतृत्व में थाना पल्लवपुरम पुलिस और सर्विलांस टीम इस चैकिंग अभियान में लगी थी. पुलिस को एक काले रंग की इंडीवर लग्जरी कार आती दिखाई दी. कार पर किसी पार्टी का झंडा लगा था और उस के अगले शीशे पर बीचोबीच बड़े अक्षरों में वीआईपी लिखा स्टिकर लगा था.

 पुलिस ने कार को रोका. उस में कुल 3 लोग सवार थे. एक चालक की सीट पर, दूसरा उस की बराबर वाली सीट पर और तीसरा पिछली सीट पर बैठा था. कार रुकवाने पर उस में सवार कुरतापायजामा और जवाहर जैकेट पहने नौजवान ने रौबदार लहजे में पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, मेरी कार को क्यों रोका?’’

‘‘सर, रूटीन चैकिंग है.’’ एक पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले की यह बात उस नौजवान को नागवार गुजरी हो, इस तरह उस ने तंज कसते हुए कहा, ‘‘रूटीन चैकिंग है या आम लोगों को परेशान करने का हथकंडा. आप यह सब करते रहिए और हमें जाने दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, हमें आप की कार की तलाशी लेनी होगी.’’ पुलिस वाले ने कहा.

पुलिस वाले का इतना कहना था कि युवक गुस्से में चीखा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा, हम कोई चोरउचक्के हैं. तुम जानते नहीं मुझे. मैं लोकमत पार्टी का नेता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है सर, लेकिन यह हमारी ड्यूटी है. वैसे भी कानून सब के लिए एक है.’’

‘‘पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है न कि हम जैसे लोगों को परेशान करना. मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है. अगर मैं अपने पावर का इस्तेमाल करने पर आ गया तो एकएक की वरदी उतर जाएगी.’’ युवक ने धमकी दी.

वह युवक चैकिंग का जिस तरह विरोध कर रहा था, उस से पुलिस को उस पर शक हुआ. एक बात यह भी थी कि कई बार शातिर लोग इस तरह की कारों का इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं. पुलिस ने तीनों युवकों को जबरदस्ती नीचे उतारा और कार की तलाशी शुरू कर दी. पुलिस को कार में एक बैग मिला. पुलिस ने जब उस बैग को खोला तो उस में 2 हजार और 5 सौ के नए नोट बरामद हुए. उन के मिलते ही पुलिस को धमका रहे युवक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस ने बरामद रकम को गिना तो वह 4 लाख 27 हजार रुपए निकली. पुलिस ने उस के बारे में पूछा, ‘‘यह पैसा कहां से आया?’’

‘‘सर, ये हमारे हैं.’’ जवाब देते हुए युवक सकपकाया.

पुलिस ने नोटों पर गौर किया तो उन का कागज न सिर्फ हलका था, बल्कि रंग भी नए नोटों के मुकाबले थोड़ा फीका था. इस से पुलिस को नोटों के नकली होने का शक हुआ. दूसरी तरफ बरामद रकम के बारे में युवक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. पुलिस ने कार की एक बार फिर तलाशी ली तो उस में से एक तमंचा और 2 चाकू बरामद हुए. पुलिस ने तीनों को हिरासत में लिया और थाने ला कर उन से पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो उन्होंने पुलिस को चकमा देने का प्रयास किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उन्होंने जो सच कबूला, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. वे तीनों नकली नोट छाप कर उन्हें बाजार में चलाने का धंधा कर रहे थे.

पुलिस से बहस करने वाला युवक ही इस धंधे का मास्टरमाइंड था. वह एक पार्टी का पदाधिकारी था और नेतागिरी की आड़ में ही नकली नोटों के इस धंधे को अंजाम दे रहा था. वह नकली नोटों के बदले जमा होने वाली असली रकम के बल पर चुनाव लड़ना चाहता था. जिन युवकों को गिरफ्तार किया गया था, उन के नाम मोहम्मद खुशी गांधी, ताहिर और आजाद थे. तीनों मेरठ के ही भावनपुर थानाक्षेत्र के गांव जेई के रहने वाले थे. पुलिस ने उन के गांव जा कर उन की निशानदेही पर खुशी के घर से प्रिंटर, स्कैनर, कटर और एक प्लास्टिक के कट्टे में भरी कागज की कतरनें बरामद कीं. बरामद सामान के साथ पुलिस उन्हें थाने ले आई. पुलिस ने तीनों युवकों से विस्तृत पूछताछ की तो एक युवा नेता के गोरखधंधे की ऐसी कहानी सामने आई, जो हैरान करने वाली थी. मुख्य आरोपी खुशी गांधी हनीफ खां का बेटा था. हनीफ के पास काफी खेतीबाड़ी थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से गांव में उन का रसूख था. खुशी अपने 5 भाइयों में चौथे नंबर पर था. उस के बड़े भाई खेती करते थे. लेकिन खुशी का मन खेती में नहीं लगा. गलत संगत में पड़ने की वजह से उस के कदम बहक गए थे.

बेटे का चालचलन देख कर हनीफ ने उसे समझाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन उस के मन में तो कुछ और ही था. खुशी महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह दिन में सपने देखता था और ऊंची उड़ान भरना चाहता था. वह इस सच को स्वीकार नहीं करना चाहता था कि बिना मेहनत के सपनों की इमारत खड़ी नहीं होती. वक्त के साथ खुशी के रिश्ते जरायमपेशा लोगों से भी हो गए. संगत अपना गुल जरूर खिलाती है. कुछ संगत तो कुछ शौर्टकट से अमीर बनने की चाहत उसे जुर्म की डगर पर ले गई. हर गलत काम दफन ही हो जाए, यह जरूरी नहीं है. आखिर एक मामले में वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. दरअसल, 2 साल पहले मेरठ के ही टीपीनगर थानाक्षेत्र के एक तेल कारोबारी के यहां डकैती पड़ी. इस मामले में पुलिस ने खुशी को भी गिरफ्तार कर के जेल भेजा था. कुछ महीने बाद उस की जमानत हो गई थी. अच्छा आदमी वही होता है, जो ठोकर लगने पर संभल जाए. लेकिन खुशी उन लोगों में नहीं था. अपने जैसे युवकों की उस की मंडली थी. वह छोटेमोटे अपराध करने लगा था. किसी का एक बार अपराध में नाम आ जाए और उस के बाद पुलिस उसे परेशान न करे, ऐसा नहीं होता. खुशी पुलिस के निशाने पर आए दिन आने लगा तो खाकी से बचने के लिए उस ने राजनीति को हथियार बना लिया. इस के लिए उस ने अलगअलग पार्टी के नेताओं से रिश्ते बना लिए. वह रैलियों में भी जाता और लड़कों की टोली अपने साथ रखता. अपना रसूख दिखाने के लिए उस ने एक इंडीवर कार खरीद ली.

उस ने नेशनल लोकमत पार्टी का दामन थाम लिया. खुशी युवा था. पार्टी ने न सिर्फ उसे प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह पार्टी का प्रत्याशी भी बन गया. कार में सायरन व पार्टी का झंडा लगाने के साथ उस ने उस पर वीआईपी भी लिखवा दिया था. 8 नवंबर को प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा के बाद पुरानी मुद्रा पर रोक लग गई और नई मुद्रा आनी शुरू हुई. खुशी को लगा कि अमीर बनने का यह अच्छा मौका है. उस ने सोचा कि अगर पैसा होगा तो वह चुनाव भी अच्छे से लड़ सकेगा. पैसों के लिए ही उस के मन में नकली नोट छापने का आइडिया आ गया.

उस ने अपने 2 साथियों ताहिर और आजाद से बात की. वह जानता था कि देहाती इलाकों में नई करेंसी में असली और नकली की पहचान करना आसान नहीं है. क्योंकि नए नोट अभी पूरी तरह प्रचलन में नहीं आए हैं. उस ने शहरी बाजारों में भी नकली नोट चलाने के बारे में सोच लिया. इस खुराफाती काम में उस ने जरा भी देरी नहीं की और बाजार से अच्छे किस्म का स्कैनर, प्रिंटर और कागज खरीद लाया. फिर क्या था, उस ने नए नोटों से नकली नोटों के प्रिंट निकालने शुरू कर दिए.

खुशी ने शहर जा कर खरीदारी में वे नोट चलाए तो आसानी से चल गए. इस के बाद उस के हौसले बढ़ गए और वह नकली नोट छापने और चलाने लगा. उन रुपयों से उस ने जम कर शौपिंग की. देहात के भोलेभाले लोगों को भी उस ने अपना निशाना बनाया. खुशी ने नकली नोट चलाने के लिए कुछ एजेंट बना रखे थे, जिन्हें वह 40 हजार के पुराने नोटों के बदले एक लाख के नए नकली नोट देता था. वह कार का सायरन बजाते हुए पुलिस के सामने से निकल जाता और उस पर किसी को शक नहीं होता. वह खादी की आड़ में खाकी वरदी से बचे रहना चाहता था. खुशी शातिर किस्म का युवक था. वह जानता था कि यह काम ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, क्योंकि जल्दी ही लोग असलीनकली नोट में फर्क करना सीख जाएंगे, इसलिए वह जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा नोट खपाने की कोशिश कर रहा था. यही वजह थी कि वह पुलिस के निशाने पर आ गया.

पूछताछ के बाद एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता कर के युवा नेता के कारनामों का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने खुशी और उस के साथियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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