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तो इसलिए सेंसर बोर्ड से भिड़ गए विक्रमादित्य मोटावणे

मशहूर लेखक व निर्देशक तथा फिल्म निर्माण कंपनी ‘‘फैंटम’’ के सदस्य विक्रमादित्य मोटवणे इन दिनों अपने निर्देशन में बनी फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ को लेकर काफी शोहरत बटोर रहे हैं. बॉलीवुड के तमाम कलाकार व फिल्मकार उनकी फिल्म व उनके निर्देशन की तारीफ कर रहे हैं, मगर विक्रमादित्य मोटवणे को यह बात अखरती है कि सेंसर बोर्ड से लड़ाई के मसले पर बॉलीवुड एकजुट नहीं हो पाता. जबकि उनकी कंपनी ने ‘उड़ता पंजाब’ के लिए अदालत तक सेंसर बोर्ड को घसीटा था.

जब ‘ट्रैप्ड’ के प्रमोशन के सिलसिले में विक्रमादितय मोटावणे से हमारी मुलाकात हुई तो व्रिकमादित्य मोटवणे से हमने सीधा सवाल किया कि सेंसर बोर्ड से आपको बड़ी शिकायत रहती है, पर आप यानि कि फिल्म इंडस्ट्री कोई बड़ा ठोस कदम क्यों नहीं उठाती? इस पर ‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास व एक्सक्लूसिब बात करते हुए विक्रमादित्य मोटावणे ने कहा- ‘‘फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ के समय हम अदालत तक गए. पर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में एकता नहीं है. हम लोग एकजुट होकर कोई लड़ाई नहीं लड़ते हैं. हमने अदालत में भी गुहार लगायी. सरकार के पास भी गुहार लगायी है कि सेंसर बोर्ड की गाइड लाइन्स बदली जाए. अब जो ‘लिपस्टिक इन बुरखा’ के साथ हुआ है, वह कमाल हुआ है. अब हम औरत की सोच को लेकर फिल्म नहीं बना सकते. मैं इतना वरिष्ठ नहीं हूं कि सभी को इकट्ठा कर कह सकूं कि चलो लड़ाई लड़कर समस्या को खत्म कराते हैं. दूसरी तरफ बॉलीवुड हर किसी के लिए सॉफ्ट टारगेट हैं. हम लोग टैक्स बहुत भरते हैं, फिर भी हमीं पर हथौडे़ बहुत चलते हैं. लोग सड़क पर सिगरेट पीते हैं, मगर उन पर पुलिस कार्यवाही नहीं करती, पर हम लोगों से कहा जाता है कि नोस्मोकिंग का डिसक्लेमर डालो. कल्चर का सारा ठेका फिल्मवालों पर ही है. हमारी सरकार ब्रिटिश जमाने की सोच के तहत फिल्मवालों पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है. हम 18 साल की उम्र में गाड़ी चलाने का लाइसेंस पाते हैं,वोट देने का अधिकार पाते हैं, पर फिल्म देखने का अधिकार नहीं होता. जबकि गाड़ी चलाना तो सबसे ज्यादा खतरनाक है. किसी को भी नुकसान पहुंचा सकता है. मगर हमारे यहां सौ रूपए देकर बड़ी आसानी से ड्रॉयविंग लायसेंस बन जाता है, पर फिल्म को सिनेमाघर में प्रदर्शित करने के लिए सेंसर के लिए कडे़ कानून हैं.’’

आईटी क्षेत्र में उछाल, सूचकांक ने लगाई छलांग

20 फरवरी को मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक करीब 200 अंक चढ़ कर 5 माह के उच्चतम स्तर पर बंद हुआ. आईटी क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में इस दौरान जम कर खरीदारी हुई जिस का बाजार पर पूरे समय सकारात्मक रुझान रहा.

सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन को आईटी क्षेत्र की प्रमुख रिलायंस कंपनी के शेयर 8 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए. कंपनी ने इस से पहले ऐलान कर दिया था कि 1 अप्रैल से वह अपने जियो सिम की सेवाएं मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराएगी बल्कि अन्य कंपनियों की तुलना में कम दाम पर सेवाएं देगी.

इसी बीच, आईटी क्षेत्र की एक अन्य प्रमुख कंपनी भारती एअरटेल ने घोषणा की थी कि उस का नौर्वे की कंपनी टेलीनौर की भारतीय इकाई को खरीदने का सौदा पक्का हो गया है. दोनों कंपनियों के बीच इस के लिए लंबे समय से बातचीत चल रही थी. देश की 2 बड़ी आईटी कंपनियों के इस सौदे से बाजार में जोरदार चहलपहल रही, जिस के कारण सूचकांक सितंबर 2016 के बाद पहली बार 29,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर तक और नैशनल स्टौक ऐक्सचेंज का सूचकांक 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया.

सूचकांक की इस बढ़त की बुनियाद में पहले सप्ताह के दौरान बाजार में लगातार रहा तेजी का माहौल और वैश्विक स्तर पर मिले अच्छे संकेत भी रहे. इस की एक वजह भारतीय रिजर्व बैंक का वह निर्णय भी है जिस में बैंक ने विदेशी निवेशकों को अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की अनुमति दी. इसी दौरान भारतीय विनिमय और प्रतिभूति बोर्ड यानी सेबी की तरफ से एक महत्त्वपूर्ण बयान आया कि बाजार में कुछ कंपनियों के शेयरों में आने वाले उछाल पर नजर रखने के लिए एक प्रणाली विकसित की जा रही है. इस व्यवस्था के लागू होने से बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और कंपनियों के शेयरों में आने वाली बनावटी उछाल पर रोक लगेगी.

बाजार के जानकारों का कहना है कि यह तेजी स्थायी नहीं है. अभी अमेरिकी फैड रिजर्व की मौद्रिक नीति घोषित होनी है और वहां ब्याजदरों में बढ़ोतरी किए जाने की संभावना जताई जा रही है, जिस का वैश्विक बाजारों पर गहरा असर पड़ना निश्चित है.

असल मैजिक तो चाटुकारों का है

सत्तर के दशक के एक धाकड़ कांग्रेसी नेता थे असम के देवकान्त बरुआ, उनकी इकलौती योग्यता थी इंदिरा गांधी की चापलूसी करते रहना, जिसके एवज में इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया था और बिहार का राज्यपाल भी बना दिया था. एक और कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ला थे, जो इंदिरा गांधी की स्तुति यह कहते करते थे कि तेरी सुबह की जय तेरी शाम की जय तेरे काम की जय तेरे नाम की जय.

ये आपातकाल के पहले की बातें हैं जब इंदिरा गांधी की तूती भारतीय राजनीति में ठीक वैसे ही बोलती थी जैसे अब उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक जीत के बाद नरेंद्र मोदी की बोल रही है. देश में कहीं भी देख लें मोदी के नाम की माला जपने वालों में एक होड़ सी पैदा हो गई है. चारों तरफ जश्न का सा माहौल है. भाजपाई उन्हें करिश्माई नेता साबित करने पर उतारू हो आए हैं. जगह जगह विजयोत्सव मनाए जा रहे हैं. जल्द ही मोदी के नाम के भजन कीर्तन भी शुरू हो जाएं तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

व्यक्ति पूजा की यह हद इंदिरा युग की याद बेवजह नहीं दिलाती, जिन्हें कांग्रेसियों ने देवी साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जिसका खामियाजा आखिरकार आपातकाल के रूप में देश को भुगतना पड़ा था. इंदिरा गांधी कोई हार तो हार, अदालत का फैसला न मानने तक की हद तक मनमानी करने पर उतारू हो गईं थीं, जिसकी एक बड़ी वजह तत्कालीन चाटुकार थे. नरेंद्र मोदी को भगवान साबित करने तुले लोग बरुआ और शुक्ला सरीखा गुनाह ही  कर रहे हैं जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं, क्योंकि यह उनका हक हर लिहाज से है.

मोदी भक्त यह बात जानबूझ कर अनदेखी कर रहे हैं कि 3 राज्यों में भाजपा कांग्रेस से पिछड़ी है. जोड़ तोड़ कर वह गोवा और मणिपुर में सरकार बना ले, यह उसका संवैधानिक अधिकार है, पर इससे साबित यह होता है कि कोई लहर मोदी के नाम की नहीं थी, अगर होती तो पंजाब उससे अछूता नहीं रहता, फिर जश्न किस बात का? बिलाशक उत्तर प्रदेश में भाजपा ने उम्मीद से परे वह आंकड़ा पार कर लिया है जिसका अंदाजा उस मीडिया को भी नहीं था, जो अब दिन रात मोदी के गुणगान तरह तरह से कर अपनी झेंप और खिसियाहट ढक रहा है.

लोकतन्त्र के मायने मोदी भक्ति में गुम होते जा रहे हैं, तो यह खुद मोदी के लिए चिंता की बात है कि देश कहां आकर ठहर गया है. बात बात में नेहरू गांधी परिवार को कोसते रहने वाले नरेंद्र मोदी अगर अपनी जय जय कार होते देख आत्म मुग्धता के शिकार हो चले हैं तो शायद ही अभी वे भांप पाएं कि ये चाटुकार दरअसल में उनका कितना और कैसा कैसा नुकसान कर रहे हैं और जय जय कार की यह अति आम लोगों में उनके प्रति एक खास तरह की एलर्जी भी पैदा कर सकती है.

सार्वजनिक रूप से जश्न मनाए जाने में पैसे की बरबादी तो होती ही है, साथ ही लोगों में भय भी पैदा होता है कि आखिर एक राज्य की जीत पर इतना हल्ला क्यों. हल्ला मचाने वाले नेता क्या साबित करना चाहते हैं, सिर्फ यही कि मोदी नायक हैं, रोल मॉडल हैं, चमत्कारी नेता हैं और पूज्यनीय हैं और यह बात वे तरह तरह से बार बार कर रहे हैं तो लगता है कि आम लोगों की उम्मीदों पर या तो नरेंद्र मोदी खरे नहीं उतर पा रहे हैं, जिसे शोर शराबे से ढका जा रहा है या फिर यह मान लिया जाए कि अब कुछ कामधाम नहीं होना है. जय जय कार से ही देश चलना है.

दांत हैं अनमोल

दांतों के हलके से दर्द को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि यह हलका दर्द भी किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है. ठंडागरम लगना, पायरिया, कैविटी, सांस में बदबू और दांतों का बदरंग होना आदि मात्र यही दांतों की बीमारियां नहीं हैं बल्कि खराब दांतों की वजह से आप को गरदन में दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द, सिरदर्द, दिमागी तनाव, ब्रेन कैंसर और मुंह के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. अगर गर्भवती महिला के दांतों में कोई गंभीर समस्या है तो गर्भस्थ शिशु पर भी इस का प्रभाव पड़ सकता है. यहां तक कि गंदे और टेढ़ेमेढ़े दांत आप को दिल का रोगी भी बना सकते हैं. आमतौर पर हम दांतों के दर्द को हलके में लेते हैं, कम दर्द हुआ तो नमक और तेल का सहारा व ज्यादा हुआ तो कोई दर्दनिवारक गोली खा ली. प्रिया ने भी अपने दांत के दर्द को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आज वह हर हफ्ते अस्पताल के चक्कर लगातेलगाते परेशान है. क्योंकि उस का सामान्य दर्द अब कैंसर की शक्ल ले चुका है.

डैंटल कालेजों के अध्ययन बताते हैं कि गलत लाइफस्टाइल का कुप्रभाव दांतों पर भी पड़ता है. दिल्ली की 80 प्रतिशत आबादी दांतों की किसी न किसी परेशानी से जूझ रही है. दांतों में दिक्कतें बचपन से ही शुरू हो जाती हैं. लेकिन हम ध्यान नहीं देते, जबकि सिर्फ साफसफाई का ध्यान रख कर भी 50 फीसदी दांतों की बीमारियों को दूर रखा जा सकता है.

दांतों की अच्छी तरह सफाई न होने पर उन पर परत जम जाती है. इस में जमा बैक्टीरिया टौक्ंिसस बनाते हैं, जो दांतों को नुकसान पहुंचाते हैं. दांतदर्द अपनेआप में कोई बीमारी नहीं है बल्कि आने वाले खतरे का संकेत मात्र है. दांतों के दर्द की शुरुआत आमतौर पर मसूड़ों में सूजन, ठंडागरम लगना और कैविटी लगने से होती है. ज्यादातर मामलों में दर्द की वजह कैविटी होती है. दांतों के सड़ने पर उस की सतह पर होने वाले छिद्र यानी होल को कैविटी कहते हैं. इस से आसानी से बचा जा सकता है. आप का डाक्टर आसानी से इस का इलाज कर सकता है बशर्ते, इसे शुरुआत में ही पहचान लिया जाए. अगर आप के दांत में काले या भूरे धब्बे दिखाई दें और दांतों में दर्द हो, तो समझ लीजिए कि आप को कैविटी है. अगर आप जल्दी इलाज नहीं कराएंगे तो दांतों में सड़न के साथ ही मसूड़ों में सूजन, जबड़ों में दर्द और सिरदर्द की शिकायत हो सकती है. मीठे खा- पदार्थों से बैक्टीरिया पैदा होता है और इस से दांतों में ब्लैक स्पौट बन जाते हैं. आमतौर पर इसे ही हम कीड़ा लगना कहते हैं. ऐसे में तुरंत डैंटिस्ट के पास जाएं.

दांतों में होने वाले दर्द की जड़

सीनियर डैंटल सर्जन डा. शारदा अरोड़ा कहती हैं कि आजकल मसूड़ों और दांतों में दिक्कत बचपन से ही शुरू हो रही है. इस का एक कारण बच्चों को पिज्जा, चौकलेट, आइसक्रीम और चाउमीन जैसे फास्ट फूड खिलाना है. मुंह की दिक्कतों का सीधा असर शरीर के बाकी हिस्सों पर पड़ता है. वे कहती हैं कि डायबिटीज के रोगियों को दांतों का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए. डायबिटीज का मतलब है रक्त में ग्लूकोज की ज्यादा मात्रा. अगर शुगर कंट्रोल में नहीं है तो दांतों और मसूड़ों पर भी बुरा असर पड़ता है. डायबिटीज के मरीजों में मसूड़ों के खिसकने, इन्फैक्शन और जीभ में जलन होने जैसी दिक्कतें होती हैं. डायबिटीज की बीमारी उन रक्तकणों को नुकसान पहुंचाती है जो शरीर को संक्रमण से बचाने का काम करते हैं.

गम डिजीज

गम डिजीज यानी मसूड़ों की बीमारी एक तरह का इन्फैक्शन है जो दांतों के नीचे हड्डियों तक फैल जाता है. यह एक आम समस्या है जिस के  कारण दांत टूट जाते हैं. गम डिजीज के 2 स्टेज होते हैं. अगर पहले स्टेज पर ही इस का पता चल जाए तो इस से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है. गम डिजीज से पहले की स्टेज को जिंजीवाइटिस कहते हैं. इस दौरान ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आना, मसूड़ों का दांतों के ऊपर निकल जाना, मसूड़ों का लाल होना, सूजन और दर्द, निरंतर सांसों से दुर्गंध आना जैसे लक्षण होते हैं.

प्रैग्नैंट महिलाओं में मसूड़ों की समस्या होना आम बात है. इसलिए उन्हें अपनी सेहत और दांतों का खास खयाल रखना चाहिए. गम डिजीज की दूसरी स्टेज बहुत गंभीर होती है. इस के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं– किसी चीज को काटते समय सभी दांतों का समान रूप से नहीं बैठना, मसूड़ों और दांतों के बीच पस बनना, दांतों का गिरना, दांतों और मसूड़ों के बीच बहुत गैप होना आदि. अगर गम डिजीज का इन में से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो दांतों को ठीक से ब्रश करें, और तुरंत दांतों के डाक्टर से सलाह लें.

दांत का दर्द

आमतौर पर कुछ खाते समय दांतों में भोजन का अंश फंस जाना, कैविटी, नया दांत निकलना या कोई सख्त चीज काटने के कारण दांतों में क्रैक की वजह से भी दांत में दर्द होने लगता है. इस के लिए गरम पानी से कुल्ला करें और धीरेधीरे दांतों के बीच फ्लौस करें ताकि अगर खाना अटका हो तो वह निकल जाए. अगर दर्द ज्यादा हो तो कोईर् दर्दनिवारक दवा लें, आइसपैक या टौवेल में आइस लपेट कर उसे गालों पर कुछ देर के लिए रखें.

नौक्डआउट टीथ

अगर आप गिर जाते हैं या मुंह में चोट लगती है तो आप के दांत हिल सकते हैं. ऐसे में अगर आप तुरंत ध्यान देते हैं और डैंटिस्ट के पास जाते हैं तो आप के दांत पूरी तरह निकलने से बच सकते हैं. अगर आप को चक्कर आए या आप बेहोशी जैसा महसूस करें या फिर गिरने से कोई और गंभीर चोट आई हो तो तुरंत डैंटिस्ट के पास जाएं.

दांतों में धब्बे

तंबाकू और दूसरी कई खानेपीने की चीजों के कारण दांतों में काले दाग या धब्बे हो जाते हैं. उम्र बढ़ने के साथ ही धब्बे भी बढ़ते जाते हैं. हालांकि इन धब्बों से कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन दिखने में ये अच्छे नहीं लगते. वैसे भी हर कोई सफेद चमकते दांत ही चाहता है. इन से बचने के लिए कैमिकलरहित व फ्लोराइडरहित यानी सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें जिस से दाग कम हो सकें. आप डैंटिस्ट के पास जा कर ब्लीच भी करवा सकते हैं लेकिन यह बहुत महंगा पड़ेगा. दूसरे व्हाइटनिंग टूथपेस्ट बहुत धीरेधीरे असर करते हैं, जबकि सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट बहुत जल्द असर करते हैं.

तनाव का दांतों पर असर

टैंशन का हमारे दांतों पर सीधा असर पड़ता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक, तनाव में नींद में दांत पीसना और बर्निंग माउथ सिंड्रोम जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. दांत पीसने की आदत से दांत टूट सकते हैं. इस से सिरदर्द और जबड़ों में दर्द भी हो सकता है. तनाव, दांत पीसने की वजह बनता है, जिस से दांत बिगड़ जाते हैं. इस के  अलावा बर्निंग माउथ सिंड्रोम में जीभ, होंठ, तालू या पूरे मुंह में जलन महसूस होती है. यह समस्या आमतौर पर वृद्ध महिलाओं में होती है.

दांतों से दिल को खतरा

ओरल इन्फैक्शन में जो बैक्टीरिया होते हैं, वही बैक्टीरिया हार्ट प्रौब्लम का कारण भी होते हैं. एक रिसर्च के मुताबिक, हार्ट अटैक के 40 फीसदी मरीजों में मसूड़ों की दिक्कत पाई गई. इसलिए ओरल इन्फैक्शन को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए. हार्ट के साथ ही लंग्स इन्फैक्शन भी ओरल इन्फैक्शन के बैक्टीरिया से बढ़ता है. जब दांत खराब होते हैं या मसूड़ों में सूजन होती है तो धमनियां सिकुड़ जाती हैं. इस की वजह से दांतों में मौजूद बैक्टीरिया ब्लड वेसल्स में जा कर उन में भी ब्लौक बना देते हैं और वे संकरी हो जाती हैं. रिसर्च यह भी कहती है कि जिन महिलाओं को मसूड़ों की दिक्कत होती है, उन के मिसकैरिज या प्रीमैच्योर बच्चा होने की आशंका बढ़ जाती है.

सर्वाइकल पेन दांतों की देन

सर्वाइकल पेन और माइग्रेन की वजह आप के दांत भी हो सकते हैं. लंबे समय तक रहना वाला यह इन्फैक्शन जौइंट में दर्द का मुख्य कारण बनता है. डाक्टर नीरजा सिंघला एक सीनियर डैंटिस्ट हैं, उन्हें माइग्रेन और सर्वाइकल पेन की समस्या थी. उन्होंने 10 सालों तक कईर् तरह के इलाज कराए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. खुद डाक्टर होने के  बावजूद वे समझ नहीं पा रही थीं कि उन के इस दर्द की वजह क्या है. उन्होंने फिजियोथेरैपी का सहारा लिया. लेकिन थोड़ाबहुत ही फायदा हुआ, समस्या जड़ से समाप्त नहीं हुई. इसी दौरान उन की मुलाकात न्यूरो मसक्यूलर डैंटिस्ट डाक्टर संजय अरोड़ा से हुई और तब उन्हें पता चला कि उन के दर्द की जड़ उन के दांत हैं.

डाक्टर संजय अरोड़ा का दावा है कि सर्वाइकल पेन की मुख्य वजह आप के दांतों की बनावट ही है. जब हमारे ऊपर और नीचे के दांत टकराते हैं, तो इस का पूरा दबाव हमारे जबड़े पर पड़ता है. दांतों के टकराने से जबड़े पर अतिरिक्त दबाव बनता है और दांतों तक खून पहुंचाने वाली मुलायम नसें प्रभावित होती हैं. चूंकि जबड़े का संबंध हमारे गले और कंधे से है, इसलिए अतिरिक्त दबाव के कारण ये प्रभावित हो जाते हैं. जिस से कंधे और बैकपेन की दिक्कत होने लगती है. इस के लिए बाकायदा दांतों में फिलिंग की जाती है ताकि दांत टकराएं नहीं और आप के जबड़े को हिलनेडुलने की पूरी जगह मिल जाए.

दांतों के मूवमैंट की एक उचित जगह होती है. लेकिन कैविटी और बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल से दांत प्रभावित होते हैं. कई बार शेखी बघारने या दोस्तों को दिखाने के चक्कर में हम अखरोट जैसी कड़ी चीजें भी दांतों से तोड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन हमें पता नहीं होता कि इसी दौरान हम सर्वाइकल पेन नाम की नई समस्या खुद अपने लिए तैयार कर लेते हैं. दरअसल, सबकुछ दांतों की बनावट पर निर्भर करता है.

बच्चे के दांतों का रखें ध्यान

बच्चों को फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट प्रयोग न करने दें. नवजात शिशु की दूध की बोतल अच्छे से साफ करें, साथ ही सोते हुए उन के मुंह में बोतल न छोड़ें. जितना संभव हो, उन्हें चौकलेट या च्यूइंगम से दूर रखें. हो सके तो बच्चे के मसूड़ों की हाथ से मालिश करें. बच्चों को सौ प्रतिशत नैचुरल टूथपेस्ट का इस्तेमाल करने दें. यदि उसे वे खा भी लेंगे यानी उन के पेट में वह चला जाएगा तो भी किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा.                  

क्या करें

–       खानेपीने के बाद कुल्ला करें.

–       सोते हुए दांत चबाने की आदत है तो गार्ड्स पहनें. इस से दांत घिसेंगे नहीं.

–       6 महीने में दांतों की जांच जरूर कराएं.

–       रोजाना 2 बार ब्रश करें.

–       कम से कम 3 मिनट तक जरूर ब्रश करें.

–       जीभ को भी साफ करें.

क्या न करें

–       खट्टी चीजें ज्यादा न खाएं.

–       जंक और पैक्ड फूड ज्यादा खाने से बचें.

–       ज्यादा मीठा न खाएं. दांतों में चिपकने वाली चीजों से बचें.

–       दांतों पर कुछ भी रगड़ें नहीं. दांतों पर रगड़ने से इनेमल के खराब होने का खतरा होता है.

–       उंगलियों से मसूड़ों की मसाज करें.

बच्चों की मासूमियत से खिलवाड़

कम उम्र में बच्चे लाखों रुपए हासिल कर मातापिता की कमाई का जरिया बन रहे हैं. टीवी और विज्ञापनों की चकाचौंध अभिभावकों की लालसा को इस कदर बढ़ा रही है कि इस के लिए वे अपने बच्चों की मासूमियत और उन के बचपन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. घंटों मेकअप और कैमरे की बड़ीबड़ी गरम लाइट्स के बीच थकाऊ शूटिंग बच्चों को किस कदर त्रस्त करती होगी, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन, इन सब से बेखबर मातापिता अपने लाड़लों को इस दुनिया में धकेल रहे हैं.

कुछ समय पहले कानपुर में भारी बरसात के बीच दोढाई हजार बच्चों के साथ उन के मातापिता 3 दिनों तक के चक्कर लगाते एक औडिटोरियम में आते रहे ताकि साबुन बनाने वाली कंपनी के विज्ञापन में उन बच्चे नजर आ जाएं. कंपनी को सिर्फ 5 बच्चे लेने थे. सभी बच्चे चौथी-पांचवीं के छात्र थे और ऐसा भी नहीं कि इन 4-5 दिनों के दौरान बच्चों के स्कूल बंद थे, या फिर बच्चों को मोटा मेहनताना मिलना था. विज्ञापन में बच्चे का चेहरा नजर आ जाए, इस के लिए मांबाप इतने व्याकुल थे कि इन में से कई कामकाजी मातापिता ने 3 दिनों के लिए औफिस से छुट्टी ले रखी थी. वे ठीक उसी तरह काफीकुछ लुटाने को तैयार थे जैसे एक वक्त किसी स्कूल में दाखिला कराने के लिए मांबाप डोनेशन देने को तैयार रहते हैं.

30 लाख बच्चे कंपनियों में रजिस्टर्ड : महानगर और छोटे शहरों के मांबाप, जो अपने बच्चों को अत्याधुनिक स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए हायतौबा करते हुए मुंहमांगा डोनेशन देने को तैयार रहते हैं अब वही अपने बच्चों का भविष्य स्कूलों की जगह विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में रुपहले परदे पर चमक दिखाने से ले कर सड़क किनारे लगने वाले विज्ञापनबोर्ड पर अपने बच्चों को टांगने के लिए तैयार हैं.

आंकड़े बताते हैं कि हर नए उत्पाद के साथ औसतन देशभर में सौ बच्चे उस के विज्ञापन में लगते हैं. इस वक्त 2 सौ से ज्यादा कंपनियां विज्ञापनों के लिए देशभर में बच्चों को छांटने का काम इंटरनैट पर अपनी अलगअलग साइटों के जरिए कर रही हैं. इन 2 सौ कंपनियों ने 30 लाख बच्चों का पंजीकरण कर रखा है. वहीं, देश के अलगअलग हिस्सों में करीब 40 लाख से ज्यादा बच्चे टैलीविजन विज्ञापन से ले कर मनोरंजन की दुनिया में सीधी भागीदारी के लिए पढ़ाईलिखाई छोड़ कर भिड़े हुए हैं. इन का बजट ढाई हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का है. जबकि देश की सेना में देश का नागरिक शामिल हो, इस जज्बे को जगाने के लिए सरकार 10 करोड़ रुपए का विज्ञापन करने की सोच रही है. यानी, सेना में शामिल हों, यह बात भी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर मौडलिंग करने वाले युवा ही देश को बताएंगे.

सवाल सिर्फ पढ़ाई के बदले मौडलिंग करने की ललक का नहीं है, बल्कि जिस तरह शिक्षा को बाजार में बदला गया और निजी कालेजों में नएनए कोर्सों की पढ़ाई हो रही है, उस में छात्रों को न तो कोई भविष्य नजर आ रहा है और न ही शिक्षण संस्थान भी शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए कोई खास मशक्कत कर रहे हैं. वे अपनेअपने संस्थानों को खूबसूरत तसवीरों और विज्ञापनों के जरिए उन्हीं छात्रों के विज्ञापनों के जरिए चमका रहे हैं, जो पढ़ाई और परीक्षा छोड़ कर मौडलिंग कर रहे हैं.

मातापिता की महत्त्वाकांक्षा : चिंता की बात यह है कि बच्चों से ज्यादा उन के मातापिता के सिर पर चकाचौंध, लोकप्रियता व ग्लैमर का भूत सवार है. वे किसी भी तरह अपने बच्चों को इन माध्यमों का हिस्सा बनाना चाहते हैं. होड़ इतनी ज्यादा है कि सिर्फ कुछ सैकंडों के लिए विज्ञापनों में अपने लाड़लों का चेहरा दिख जाने के बदले में मातापिता कई घंटों तक बच्चों को खेलनेखाने से महरूम रख देते हैं. तो क्या बच्चों का भविष्य अब काम पाने और पहचान बना कर नौकरी करने में ही जा सिमटा है या फिर शिक्षा हासिल करना इस दौर में बेमानी हो चुका है या शिक्षा के तौरतरीके मौजूदा दौर के लिए फिट नहीं हैं?

मांबाप तो हर उस रास्ते पर बच्चों को ले जाने के लिए तैयार हैं जिस रास्ते पर पढ़ाईलिखाई माने नहीं रखती है. असल में यह सवाल इसलिए कहीं ज्यादा बड़ा है क्योंकि सिर्फ छोटेछोटे बच्चे नहीं, बल्कि 10वीं और 12वीं के बच्चे, जिन के लिए शिक्षा के मद्देनजर कैरियर का सब से अहम पड़ाव परीक्षा में अच्छे नंबर लाना होता है, वह भी विज्ञापन या मनोरंजन की दुनिया में कदम रखने का कोई मौका छोड़ने को तैयार नहीं होते. डराने वाली बात यह है कि परीक्षा छोड़ी जा सकती है, लेकिन मौडलिंग नहीं. भोपाल में 12वीं के 8 छात्र परीक्षा छोड़ कंप्यूटर साइंस और बिजनैस मैनेजमैंट इंस्टिट्यूट की विज्ञापन फिल्म में 3 हफ्ते तक लगे रहे. यानी पढ़ाई के बदले पढ़ाई के संस्थान की गुणवत्ता बताने वाली विज्ञापन फिल्म के लिए परीक्षा छोड़ कर काम करने की ललक ज्यादा महत्त्व वाली हो चली है

सही शिक्षा से दूर बच्चे : महज सपने नहीं, बल्कि स्कूली बच्चों के जीने के तरीके भी कैसे बदल रहे हैं, इस की झलक इस से भी मिल सकती है कि एक तरफ सीबीएसई की 10वीं व 12वीं की परीक्षाओं के लिए छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय सरकार से 3 करोड़ रुपए का बजट पास कराने के लिए जद्दोजेहद कर रहा है तो दूसरी तरफ स्कूली बच्चों की विज्ञापन फिल्म का हर बरस का बजट 2 सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चला है.

एक तरफ सरकार मौलिक अधिकार के तहत 14 बरस तक की उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने के मिशन में जुटी है, तो दूसरी तरफ 14 बरस तक की उम्र के बच्चों के जरिए टीवी, मनोरंजन और रुपहले परदे की दुनिया हर बरस एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा मुनाफा बना रही है. जबकि मुफ्त शिक्षा देने का सरकारी बजट इस मुनाफे का 10 फीसदी भी नहीं है. यानी वैसी पढ़ाई यों भी बेमतलब सी है, जो इंटरनैट या गूगल से मिलने वाली जानकारी से आगे जा नहीं पा रही है

वहीं, जब गूगल हर सूचना उपलब्ध कराने का सब से बेहतरीन साधन बन चुका है और शिक्षा का मतलब भी सिर्फ सूचना के तौर पर जानकारी हासिल करना भर बन कर रह गया है तो फिर देश में पढ़ाई का मतलब अक्षर ज्ञान से आगे जाता कहां है. ऐसे में देश की नई पीढ़ी किधर जा रही है, यह सोचने के लिए इंटरनैट, गूगल या विज्ञापन की जरूरत नहीं है. बस, बच्चों के दिमाग को पढ़ लीजिए या उन के मातापिता के नजरिए को समझ लीजिए, जान जाइएगा.

उम्र 6 माह, कमाई 17 लाख : मुंबई की विज्ञापन एजेंसी द क्रिएटिव ऐंड मोटिवेशनल कौर्नर के चीफ विजुअलाइजर अक्षय मोहिते के अनुसार, विज्ञापन मातापिता के लिए तिजोरी भरने जैसा है. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि 6 माह से ले कर डेढ़ साल तक के बच्चे, जो न तो बोल पाते हैं और न ही जिन्हें लाइट, साउंड, ऐक्शन का मतलब पता है, अपने मातापिता को लाखों कमा कर दे रहे हैं.

आजकल टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में 65 फीसदी विज्ञापनों को शामिल किया जाता है. मोहिते बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डायपर बनाने वाली एक कंपनी ने महज 17 सैंकंड के विज्ञापन के लिए 6 माह के बच्चे को 17 लाख रुपए की फीस दी.

दान की मूंछ

पुरानी कहावत है कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते क्योंकि वह दूध मुंह से नहीं, थनों से देती है. दान की महिमा अपरंपार है. लोग तरहतरह से दान देते हैं. और पंडेपुजारी उस से भी ज्यादा तरीकों से दान लेते हैं. दान एक लाइलाज बीमारी सा भी है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने सरकारी खजाने से 5 करोड़ रुपए का सोना तिरुपति के मंदिर में दान में दिया और इस पर भी जी नहीं भरा, तो भगवान को सोने की मूंछें भी दान कर डालीं. मूंछदान का यह पहला मामला था, इसलिए बवाल मचा. लेकिन इस का विरोध करने वाले भी गच्चा खा गए. विरोधियों ने जनता के पैसे को निजी मन्नतों के एवज में दान देने पर एतराज जताया. बात में दम तब आता जब वे यह कहते कि जो सब को देता है उसे देने की क्या जरूरत और वह भी मूंछें. विष्णु के कई रूप और अवतार क्लीनशेव भी हैं, इन में से एक वेंकटेश है.

अर्धनग्न विधायक

विनय बिहारी बिहार के पश्चिम चंपारण जिले की लौरिया सीट से भाजपा के विधायक हैं. वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. कई भोजपुरी फिल्मों में अभिनय कर चुके विनय गाते भी अच्छा हैं. उन्होंने अक्तूबर 2016 से पूरे कपड़े नहीं पहने हैं और तब तक नहीं पहनने का प्रण भी ले रखा है जब तक कि उन के विधानसभा क्षेत्र की खस्ताहाल सड़कों की हालत नहीं सुधर जाती. विनय ने अपना कुरता केंद्रीय सड़क मंत्री नितिन गडकरी को और पायजामा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भेज रखा है.

विरोध के इस अनूठे अहिंसक तरीके पर भी सुनवाई नहीं हुई तो वे बीते दिनों विधानसभा में दंडवत यानी घुटने के बल आए और अपने छिले घुटने मीडिया को दिखाए. विनय बिहारी की प्रतिबद्धता का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि बिहार सरकार ने सड़कों के लिए 80 करोड़ रुपए तो स्वीकृत किए ही, साथ ही उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रताप सिंह ने उन्हें कपड़े पहनाए.

जेठमलानी का दुख

मशहूर वकील रामजेठमलानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दुखी हैं और इस दुख को सार्वजनिक करने का वे कोई मौका नहीं चूकते. बात ठीक भी है कि दुख को दिल के अंदर नहीं रखना चाहिए वरना वह डिप्रैशन में तबदील हो जाता है. जेठमलानी का दुख व्यापक है. वे नोटबंदी से भी खफा हैं और कौलेजियम सिस्टम में सरकार यानी नरेंद्र मोदी के दखल को ठीक नहीं मानते.

भोपाल आए तो इस दुख को उन्होंने विस्तार से व्यक्त किया, बताया कि एक वक्त में वे नरेंद्र मोदी के बड़े समर्थक व प्रशंसक थे और उन के लिए खूब ऊर्जा खर्च की थी. इकलौती मुद्दे की बात उन्होंने यह कही कि भाजपा ने उन्हें इस शर्त पर लिया था कि वे अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ चल रहे हत्या के मुकदमे की पैरवी करेंगे. इस से साबित होता है कि नामी वकील संसद में पहुंचने की फीस इस तरह भी लेते हैं. 

मंदिर में धरना

भगवान के दरबार यानी मंदिर में सब एक हैं, यह बात भी भगवान के अस्तित्व की तरह एक अवधारणा भर है. सच यह है कि मंदिर और भगवान सिर्फ पैसों वालों के लिए हैं और एक वर्ग विशेष की खुराफात की देन हैं. इस फलसफे से दूर हुआ यों कि शिवरात्रि के मौके पर साध्वी उमा भारती उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजाअर्चना करने पहुंचीं तो सुरक्षा कारणों से प्रशासन ने उन्हें गर्भगृह में जाने से रोक दिया.

इस पर उमा ने जो तांडव मचाया तो हाहाकार मच गया. वे वहीं धरने पर बैठ गईं. 7-8 मिनटों के अल्पकालिक धरने के बाद उन्हें इजाजत मिल गई यानी नियम बदल दिया गया. उमा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भी खिंचाई कर डाली. उमा की बौखलाहट शबाब पर है. इस की वजहें कुछ भी हों पर उजागर हो गया कि साध्वी, संत, साधुओं को मंदिरों में जाने की उसी तरह छूट है जैसे रेलकर्मियों को रेलवेस्टेशनों पर घूमते रहने के लिए किसी पास या इजाजत की जरूरत नहीं पड़ती.

कौन आ रहा है

ये कौन आ रहा है

आहिस्ताआहिस्ता

नाम तो बता

तनबदन में मेरे

घुसता जा रहा है

दिलोदिमाग में है छाया

इधर आ रहा है

दबे पांव आहट से

सांसें दहला रहा है

तेरे आते पड़ने लगा

अकेलेपन का साया

जिंदगी का मजा

तेरे बिन आ रहा था

दबे पांव आहट से

धड़कनें दहला रहा है

पास आने पर ही है दिखता

बुढ़ापा बड़ा है

तू विकृत अवस्था

है हंसता हुआ

जिंदगी लिए जा रहा था

जवानी के खोए

गीत गा रहा था

ये कौन आ रहा आहिस्ताआहिस्ता

जवानी तो गई

वापस न आती

बुढ़ापा तो आ कर

हमेशा को बसता

अब तक था कच्चा

अब जीवन पकेगा

जीवन तरु का

मीठा फल है बुढ़ापा

रोरो कर इस को

करना न निष्फल

बुढ़ापे को आना है

आ कर रहेगा

दिलदार व्यक्ति

कभी न डरेगा.

– रीता गुप्ता

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