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जब चोरी हो जाए आपकी गाड़ी

अपना घर, अपनी गाड़ी तो हर किसी का ख्वाब होता है. हम खुद के घर और अच्छी सी गाड़ी के लिए कड़ी मेहनत भी करते हैं, जिन्हें विरासत में ये सब मिल जाता है उनकी बात अलग है. आपके घर और आपकी गाड़ी पर कोई आंच न आए इसलिए आप इंश्योरेंस भी करवाते हैं. पर दुर्घटनाओं को कोई नहीं रोक सकता. आपके घर पर चोरी या आपकी गाड़ी भी चोरी हो सकती है. अगर आपकी भी गाड़ी चोरी हो गई है तो आपको टेंशन नहीं लेना चाहिए, वैसे भी ऐसे मौके पर बुद्धि काम करना बंद कर देती है. गाड़ी चोरी होने की स्थिति में आपको सावधानी से काम लेना चाहिए.

सही वक्त पर सही निर्णय लेने से आप इस स्थिति में आसानी से निपट सकते हैं. गाड़ी चोरी होने के बाद इन कामों को करना न भूलें

1. जमा करें सारे जरूरी कागजात

सबसे पहले अपने गाड़ी के सारे पेपर्स इकट्ठा करें. जैसे की आरसी बुक, इंश्योरेंस के पेपर्स, ड्राइविंग लाइसेंस. हमेशा ओरिजनल की फोटो कॉपी अपने पास रखें. ऐसे में अगर ओरिजनल कॉपी भी गाड़ी के साथ चोरी हो जाती है तो आपके पास दस्तावेज की कॉपी तो होगी.

2. एफआईआर लिखवाएं

आपके साथ हुई दुर्घटना का पूरी जानकारी देते हुए एक एप्लीकेशन लिखें और इसे नजदीकी पुलिस थाने में जाकर जमा करें. पुलिस कंप्लेन के साथ ही गाड़ी के कागजात भी जमा करें. आपकी कंप्लेन के आधार पर पुलिस एफआईआर लिखेगी और कार्यवाई शुरु करेगी.

3. बीमा कंपनी को सूचित करें

पुलिस में कंप्लेन करने के बाद आप बीमा कंपनी को गाड़ी चोरी होने की जानकारी दें. इंश्योरेंस क्लेम के फॉर्म को सारे दस्तावेजों के साथ जमा करें. क्लेम के साथ आरसी की कॉपी, बीमा पॉलिसी की कॉपी, एफआईआर की कॉपी लगाना न भूलें. जल्द से जल्द इंश्योरेंस के लिए क्लेम करें.

4. आरटीओ को भी सूचित करें

बीमा के लिए क्लेम करने के बाद आपको आरटीओ ऑफिस में भी गाड़ी चोरी होने की जानकारी देनी होगी. शिकायत पत्र के साथ सारे दस्तावेजों की कॉपी भी लगाएं. एफआईआर की कॉपी और क्लेम की कॉपी भी जरूर लगाएं.इसके साथ ही अगर आपके पास अपनी गाड़ी की तस्वीर है तो वो भी जमा करें. शिकायत की रसीद लेना भूलें.

इन सब के अलावा जो सबसे जरूरी है, वो है ‘पीछे पड़े रहना’. आप उस देस के बाशिंदे हैं, जहां लोगों को मुफ्तखोरी की आदत है, पर मुफ्त में कोई काम नहीं कर सकते. भले ही वो काम मुफ्त में करने की कानूनी पाबंदी ही क्यों न हो. इसलिए अपने जूते घिसने के लिए भी मानसिक तौर पर तैयार रहें. क्योंकि ईमानदारी का फल हमेशा मीठा नहीं होता. इसके साथ ही हर ऑफिस में जाकर अपने कंप्लेन की जानकारी जरूर लें. 

आईपीएल से मिली इन भारतीय खिलाड़ियों को पहचान

इंडियन प्रीमियर लीग के अब तक 9 सीजन हो चुके हैं. दसवें सीजन की तैयारी चल रही है. अब तक के 9 सीजन से कई ऐसे युवा भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई.

2017 के सीजन में भी कई सारे युवा भारतीय खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं. अब देखना ये है कि उनका प्रदर्शन इस आईपीएल सीजन में कैसा रहता है और क्या आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन कर वो नैशनल टीम में अपनी जगह बना पाएंगें.

आइए एक नजर डालते हैं 5 भारतीय खिलाड़ियों पर जिन्होंने आईपीएल से अपनी पहचान बनाई.

प्रज्ञान ओझा

प्रज्ञान ओझा अकेले ऐसे भारतीय गेंदबाज हैं जो इंडियन प्रीमियर लीग में पर्पल कैप जीत चुके हैं. 2010 के सीजन में डेक्कन चार्जर्स की तरफ से खेलते हुए उन्होंने 21 विकेट भी चटकाए थे.

2009 में डेक्कन चार्जर्स की आईपीएल विनिंग टीम का वो हिस्सा थे और चार्जर्स की जीत में उनका अहम योगदान था.

घरेलू क्रिकेट और आईपीएल में अच्छे प्रदर्शन की वजह से उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में खेलने का मौका मिला. उन्हें बांग्लादेश और 2008 के एशिया कप के लिए टीम में शामिल किया गया. 2009 में उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ अपना टेस्ट डेब्यू किया. रविचंद्रन अश्विन के साथ मिलकर अगले कुछ सालों तक उन्होंने शानदार गेंदबाजी की.

युसुफ पठान

आईपीएल से पहले आक्रामक बल्लेबाज यूसुफ पठान ने बड़ौदा की तरफ से खेलते हुए रणजी ट्रॉफी में अच्छे-खासे रन बनाए. 2008 में पहले आईपीएल सीजन में वो राजस्थान रॉयल्स की विनिंग टीम का हिस्सा थे.

पहले आईपीएल सीजन में पठान ने धमाकेदार प्रदर्शन किया था और फाइनल मुकाबले में मैन ऑफ द् मैच चुने गए थे. उस सीजन में यूसुफ पठान ने 31.07 की औसत और 179.01 की शानदार स्ट्राइक रेट से 435 रन बनाए थे.

आईपीएल में उनके धमाकेदार प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें 2008 में एशिया कप के लिए भारतीय टीम में चुन लिया गया. न्यूजीलैंड और साउथ अफ्रीका के खिलाफ सीरीज में उन्होंने कई मैच जिताऊ पारियां खेली.

भारतीय टीम से बाहर होने के बावजूद आईपीएल में युसुफ पठान का शानदार खेल जारी रहा. इस साल वो कोलकाता नाइट राइडर्स की जर्सी में दिखेंगें.

अंबाती रायडू

घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद अंबाती रायडू को भारतीय टीम में नियमित जगह नहीं मिली थी. 2010 में मुंबई इंडियंस ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया. रायडू ने घरेलू क्रिकेट की तरह आईपीएल में भी अपना जलवा कायम रखा.

आईपीएल और घरेलू मैचों में उनके मेहनत का नतीजा रंग लाया और 2013 में जिम्बॉब्वे के खिलाफ उन्होंने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय वनडे मैच खेला. अपने पहले ही वनडे मैच में अंबाती रायडू ने शानदार अर्धशतकीय पारी खेली और विराट कोहली के साथ मिलकर मैच विनिंग साझेदारी की.

34 वनडे मैचों में रायडू का औसत करीब 50 का है. इस आईपीएल सीजन में भी वो मुंबई इंडियंस की टीम का हिस्सा होंगें.

सौरभ तिवारी

2008 के अंडर-19 वर्ल्ड कप में सौरभ तिवारी का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था. 2008 के पहले आईपीएल में मुंबई इंडियंस ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया. हालांकि पहले सीजन में उन्हें ज्यादा मैचों में मौका नहीं मिला लेकिन 2010 के सीजन से वो टीम का नियमित हिस्सा बन गए.

मुंबई इंडियंस की तरफ से खेलते हुए उन्होंने मध्यक्रम में अंबाती रायडू के साथ मिलकर काफी अच्छी साझेदारियां की. 2010 के आईपीएल सीजन में सौरभ तिवारी ने 29.92 की औसत से 309 रन बनाए.

2010 के आईपीएल में शानदार प्रदर्शन का उन्हें ईनाम मिला और एशिया कप के लिए उन्हें भारतीय टीम में चुन लिया गया. हालांकि एशिया कप में उन्हें एक भी मैच खेलने का मौका नहीं मिला. उसी साल ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ विशाखापट्टनम वनडे मैच से उन्होंने अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज किया. हालांकि वनडे मैचों में उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली और वो महज 3 वनडे मैच ही अभी तक खेल पाए हैं.

अक्षर पटेल

स्पिन गेंदबाज अक्षर पटेल ने 2013 के रणजी सीजन में गुजरात की तरफ से शानदार गेंदबाजी की. इसी वजह से 2014 के आईपीएल सीजन में किंग्स इलेवन पंजाब ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया.

पहले आईपीएल सीजन में अक्षर पटेल काफी सफल रहे और उन्होंने 17 विकेट चटकाए. इसकी वजह से किंग्स इलेवन पंजाब की टीम पहली बार आईपीएल के फाइनल में पहुंची. अगले सीजन में भी उन्होंने शानदार ऑलराउंड प्रदर्शन किया. उन्होंने 13 विकेट चटकाने के साथ ही 206 रन भी बनाए.

2014 में बांग्लादेश के खिलाफ वनडे मैच से उन्होंने अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज किया. 2015 के वर्ल्ड कप में वो भारत की 15 सदस्यीय टीम का हिस्सा थे. अभी तक वो भारत की तरफ से 34 वनडे और 7 टी-20 मैच खेल चुके हैं.

पुराने स्मार्टफोन को बेचें नहीं, करें रियूज

मोबाइल फोन इस्तेमाल करने से आज की तारीख में भला कोई बचा है? अपने-अपने  मोबाईल फोन से आजकल आपको भी बेहद लगाव हो चुका है और एक खास बात ये कि अगर आपका फोन पुराना हो जाता तो आप उसे जल्दी छोड़ना नहीं चाहेंगे, विशेषकर अगर वो फोन आपको किसी ने उपहार में दिया हो!

पुराना फोन आप सभी के लिए अपने आप में बहुत खास बन जाता है. कई बार पुराने फोन से जुड़ी यादों के कारण आप चाहते हैं कि पुराना फोन हमेशा आपके पास ही रहे. ऐसे में अगर बात की जाए तो अब सवाल यहां ये है कि आप अपने पुराने मोबाइल फोन का करें तो क्या करें?

आइए हम बताते हैं कि आपका पुराना एंड्रॉयड स्मार्टफोन आपके लिए कितना उपयोगी हो सकता है. कुछ इस तरह आप अपने पुराने फोन को बिना बेचे, घर पर ही उसका भरपूर इस्तेमाल कर सकते हैं:-

1. होम मीडिया कंट्रोलर: कितना अच्छा हो अगर आपका खराब हुआ पुराना फोन आपके लिए एक मीडिया कंट्रोलर बन जाए. क्या आप चौंक गए? जी हां! आज के इस तकनीकी युग में सिर्फ आपको फोन ही नहीं बल्कि घर के और भी कई डिवाइसेज स्मार्ट होते जा रहे हैं.

आप अपने फोन से ही म्यूजिक प्लेयर, टीवी और एसी को कंट्रोल कर सकते हैं. यानि कि अब आप अपने पुराने फोन को घर में किसी मीडिया कंट्रोलर की तरह उपयोग कर सकते हैं. यदि आपके फोन में आईआर ब्लास्टर है तो फिर कोई बात ही नहीं. बगैर किसी अतिरिक्त एप्लिकेशन के यह आपके टीवी, एसी और म्यूजिक सिस्टम को कंट्रोल कर लेगा. अन्यथा आप फोन में रिट्यून, यूनिफाइड रिमोट, पावर डीवीडी और यास्टर दो कोडी या एक्सबीएमसी रिमोट ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं. वहीं यदि आपके घर में वाईफाई है तो आप इससे क्रोम स्टिक से कनेक्ट कर इसे क्रोम कास्ट के रूप में उपयोग कर सकते हैं. जहां इंटरनेट आधारित चीजों को टीवी पर देखा जा सकता है.

2. डिजिटल फोटो फ्रेम: क्या आप जानते हैं कि आप अपने पुराने फोन को डिजिटल फोटो फ्रेम में भी बदलकर इस्तेमाल कर सकते हैं. यदि आपके घर में वाईफाई है तो फोन से टीवी सहित अन्य डिवाइस को जोड़कर इसे देख सकते हैं. अन्यथा अपने पुराने फोन या टैबलेट को ही डिजिटल फ्रेम में बदल सकते हैं. इसके लिए फोटो स्लाइड और डिजिटल फोटो स्लाइड शो जैसे ऐप्लिकेशन्स आपके लिए मददगार होंगे.

3. बच्चों का डिजिटल स्लेट: कितनी दिलचस्प बात है कि आपका एंड्रॉयड स्मार्टफोन बच्चों के लिए स्लेट बन जाए. आप अपना पुराना एंड्रॉयड फोन या टैबलेट बच्चों के लिए बेहद उपयोगी बना सकते हैं.

आप उस पर बच्चों के लिए उपयोगी ऐप, मूवी और पोयम आदि डाउनलोड कर सकते हैं. इसके साथ-साथ आप अपने फोन को बच्चों के लिए डिजिटल स्लेट के रूप में भी उपयोग सकते हैं. फोन पर ही बच्चे लिखना और पढ़ना भी सीख सकते हैं.

4. सिक्योरिटी कैमरा: आज तो लगभग हर घर में सिक्योरिटी के लिए कैमरे लगाए जा रहे हैं. ऐसे में आप अपने फोन का उपयोग सिक्योरिटी कैमरे की जगह पर भी कर सकते हैं. आप अपने फोन का वीडियो, कम्प्यूटर डेस्कटॉप से नियंत्रित कर सकते हैं या फिर आपको एसएमएस के माध्मय से सर्वर लिंक भेज दिया जाएगा. जहां से कि आप रिकॉर्ड वीडियो देख सकते हैं. कुछ ऐप्लिकेशन ऐसे हैं जो रिकॉर्ड वीडियो को सर्वर पर स्टोर करते हैं और उन्हें आप बाद में देख सकते हैं.

फोन को सिक्योरिटी कैमरे के रूप में उपयोग करने के लिए आपको होम सिक्योरिटी कैमरा और सेफ आई होम अलार्म जैसे ऐप्स का सहारा लेना चाहिए.

5. एमपी3 प्लेयर: आप अपने पुराने फोन को एक एमपी3 प्लेयर के रूप में भी उपयोग कर सकते हैं. इसमें आप चाहें तो ब्लूटूथ के माध्मय से इसे म्यूजिक सिस्टम में जोड़कर तेज आवाज में म्यूजिक का मजा ले सकते हैं या फिर इसे आप अच्छे हेडफोन के साथ अपना निजी एमी3 प्लेयर भी बना सकते हैं.

फिल्लौरी : कई कमजोर कड़ियों का संगम

बॉलीवुड की सबसे बड़ी बीमारी ‘अहम ब्रह्मास्मि’ की है. जिस फिल्म निर्देशक या निर्माता की पहली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल होती है, वह उसी दिन से सोचने लगता है कि वह जो काम करता है, वही सही है. उसके बाद वह किसी की परवाह किए बगैर ‘‘अहम ब्रह्मास्मि’’ के अहम में चूर होकर अति घटिया फिल्में बनाता है.

हमें फिल्म ‘‘फिल्लौरी’’ देखकर बॉलीवुड की ‘अहम ब्रह्मास्मि’ की ही बीमारी याद आ गयी. इसी बीमारी का शिकार इस फिल्म की निर्माता अनुष्का शर्मा और उनके भाई कर्णेश शर्मा हैं. पहली फिल्म ‘‘एन एच 10’’ को मिली सफलता के बाद वह ‘‘फिल्लौरी’’ जैसी स्तरहीन व बोर करने वाली फिल्म बनाएंगी, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी. फिल्म के प्रदर्शन से कुछ दिन पहले हमसे बातचीत करते हुए अनुष्का शर्मा ने जितने बड़े दावे किए थे, वह सारे दावे फिल्म देखने के बाद खोखले साबित नजर आए. दो अलग अलग युगों की प्रेम कहानियों के  बीच सामंजस्य बैठाने में लेखक व निर्देशक असफल हैं. इसी के चलते दर्शक भी कहानी को ठीक से समझने से वंचित रह जाता है.

एक भूतनी की प्रेम कहानी को देश की आजादी से पहले 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार के साथ जिस तरह से जोड़ा गया है, वह अविश्वसनीय के साथ साथ अति हास्यास्पद लगता है. काश हमारे फिल्मकार देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास के साथ इस तरह के मजाक करने से बचे, तो कितना अच्छा हो.

फिल्म की कहानी शुरू होती है अपनी बचपन की दोस्त अनु (मेहरीन पीरजादा) के साथ शादी करने के लिए कनाडा से भारत वापस आने वाले कनन से. कनन भारत आ गया है, पर शादी व प्यार को लेकर वह अभी भी दुविधा में है. इसी बीच शादी के लिए कुंडली मिलान के दौरान पंडित बताते हैं कि कनन तो मंगली है. इसलिए उसे पहले पेड़ से शादी करनी पड़ेगी. अनमने मन से कनन को यह बात माननी पड़ती है. कनन की पेड़ से शादी हो जाती है. कनन पूरे परिवार के साथ घर वापस आता है.

उधर कनन के पिता ने पेड़ को काट देने का आदेश दे दिया है. घर पहुंचने पर एक भूतनी कनन के पीछे पड़ जाती है. पता चलता है कि यह भूतनी शशि (अनुष्का शर्मा) उसी पेड़ पर रहती थी, पर पेड़ कट गया, तो वह कहां जाए. वह कनन के पास क्यों आयी, यह भी वह नहीं जानती. मगर प्यार व शादी को लेकर कनन के मन में जो दुविधा है, उसे शशि अपनी कहानी बताते हुए दूर करने का प्रयास करती है. इसी के साथ अब कनन व अनु तथा शशि व रूप फिल्लौरी की प्रेम कहानी समानांतर चलती है. कनन व अनु की शादी वैषाखी के दिन ही होनी है.

शशि की प्रेम कहानी 98 साल पहले की है. पंजाब के फिल्लौरी गांव की रहने वाली शशि को उसके भाई ने बेटी की तरह पाला है जो कि आयुर्वेदिक दवाएं देते हैं. शशि को गांव के नकारा युवक रूप फिल्लौरी (दलजीत दोशांज) से प्यार हो गया है. रूप गीत लिखता व गाता है. धीरे धीरे शशि भी फिल्लौरी के नाम से गीत लिखकर अखबार में छपवाने लगती है. एक दिन इनकी प्रेम कहानी का पता शशि के भाई को चल जाता है. जब शशि, रूप के घर में होती है, तो शशि का भाई वहां जाकर दोनों की पिटाई करता है और शशि को लाकर घर में बंद कर समझाता है कि रूप उसके योग्य नहीं है. दो दिन बाद रूप, शशि के भाई से कहता है कि अब वह शशि के लायक बनने के लिए अमृतसर जा रहा है.

कुछ दिन बाद रूप वहां से शशि के नाम तीन सौ रूपए भेजता है. पत्र में लिखता है कि अमृतसर की संगीत कंपनी ने उसके गीतों का एलबम निकाला है. शशि के लिखे गीतों को रूप ने गाया है. एलबम पर दोनों का नाम है. इससे शशि का भाई खुश होकर उनकी शादी के लिए हामी भर देता है. रूप ने बैसाखी के पर्व पर वापस आने की बात लिखी है. बैसाखी के दिन शशि के घर शादी की तैयारियां हो चुकी है. शशि दुल्हन के वेष में है. तभी पता चलता है कि शशि तो रूप के बच्चे की मां बनने वाली है. पर शादी नहीं होती है. क्योंकि रूप वापस नहीं लौटता है. शशि का भाई सलाह देता है कि वह लाहौर जाकर गर्भपात करवा ले. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. परेशान शशि घर से भागती है और एक पेड़ के नीचे दम तोड़ देती है.

शशि की प्रेम कहानी सुनते सुनते अंत में भूतनी शशि के संवाद दोहराते हुए कनन, अनु से कहता है कि अब तक वह ख्यालों में था पर अनु ही उसकी सच्चाई है. और वह उससे शादी करने को तैयार है.

उसके बाद कनन व अनु, भूतनी शशि से पूछते है कि रूप के साथ शादी न होने की घटना कब की है. तो वह कहती है कि 98 साल पहले यानी कि 1919 की है. कनन को याद आता है कि उसी दिन जलियांवाला बाग कांड हुआ था. जब अंग्रेजों ने निहत्थे लोंगों पर गोलियां बरसाई थी. कनन अपने साथ गाड़ी में अनु व भूतनी शशि को बैठाकर जलियांवाला बाग, अमृतसर पहुंचता है. जहां शशि व रूप की आत्मा का मिलन हो जाता है.

फिल्म ‘‘फिल्लौरी’’ की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी तो इसकी लेखक अन्विता दत्ता हैं, जिन्होंने अति घटिया कहानी व पटकथा लिखी है. शायद उन्हें पंजाबी शादियों के बारे में कुछ भी पता नहीं है. पूरी फिल्म में पंजाबी शादी का कोई माहौल नजर नहीं आता. लेखक के साथ ही अनुष्का शर्मा भी कमजोर कड़ी कही जाएंगी, क्योंकि कहानी व पटकथा का चयन तो अनुष्का शर्मा ने ही किया है. इंटरवल से पहले फिल्म ‘‘फिल्लारी’’ अंग्रेजी फिल्म ‘‘कॉर्प्स ब्राइड’’ की याद दिला जाती है. यानी कि मूल कथानक वहीं से प्रेरित है. इंटरवल के बाद इस फिल्म को देखना सबसे बड़ा सिर दर्द है.

फिल्म में अनुष्का शर्मा को ग्लैमरस नहीं दिखना था, इसलिए उन्होंने खूबसूरत अदाकारा मेहरीन कौर पीरजादा को भी ग्लैमरस नहीं दिखने दिया. पूरी फिल्म में वह रोती हुई नजर आती हैं. फिल्म में कहानी नहीं थी, इसलिए उन्होंने दृश्यों को इस तरह धीमी गति से खींचा कि फिल्म किसी तरह घिसट घिसट कर मंजिल पाती है. पूरी फिल्म सिर्फ बोर करती है.

दर्शक मन ही मन कहने लगता है-‘‘कहां फंसायो नाथ.’’ फिल्म को एडिट कर छोटा किए जाने की जरुरत है. आत्मा व इंसानों के बीच बातचीत की कल्पना करना अपने आप में अविष्वनीय होता है, पर लेखक व निर्देशक ने फिल्म के क्लायमेक्स के समय इसकी पराकाष्ठा भी पार कर डाली.

जहां तक फिल्म के गीत संगीत का सवाल है, तो यह पहले भी लोकप्रिय नहीं हुए हैं. फिल्म देखते समय भी गीत संगीत प्रभावहीन नजर आते हैं. फिल्म के वीएफएक्स की थोड़ी सी तारीफ की जा सकती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो दलजीत सिंह दोशांज ने बहुत निराश किया. इस फिल्म में अनुष्का शर्मा भी एक अदाकारा के रूप में नहीं उभरती हैं. दलजीत दोशांज हों या अनुष्का शर्मा, दोनों के चेहरे पर पर पूरी फिल्म में एक जैसे भाव ही नजर आता है. सूरज शर्मा ने दुविधा में फंसे युवक की मनः स्थिति को कुछ अर्थों में सही रूप में पेश किया है, मगर उनके किरदार को भी पटकथा की मदद नहीं मिली. मेहरीन कौर पीरजादा के लिए करने को कुछ था ही नहीं.

‘‘चक दे’’, ‘‘प्यार के साइड इफेक्ट्स’’, ‘‘हिम्मतवाला’’, ‘‘हाउसफुल’’ और ‘‘दोस्ताना’’ जैसी फिल्मों में बतौर सहायक रहे निर्देशक अंशाई लाल की स्वतंत्र निर्देशक के रूप में यह पहली फिल्म है. वह भी इस फिल्म की एक कमजोर कड़ी हैं. वैसे ज्यादातर असफल फिल्मों में सहायक रहे अंशाई से ज्यादा उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि की ‘फॉक्स स्टार इंडिया’ के साथ मिलकर अनुष्का शर्मा की कंपनी ‘‘स्लेट फिल्मस’’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘‘फिल्लौरी’’ के निर्देशक अंशाई लाल, लेखक व गीतकार अंविता दत्ता, संगीतकार जसलीन रोयल व शाश्वत सचदेव, पार्श्व संगीत समीर उद्दीन, तथा कलाकार हैं-अनुष्का शर्मा, दलजीत दोशांज, सूरज शर्मा, मेहरीन पीरजादा आदि.

मोदी सी तेजी में योगी

प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तरह से नरेन्द्र मोदी ने सरकारी विभागों से लेकर संसद तक में सुधार और साफ सफाई का अभियान चलाया था कुछ उसी राह पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी चल रहे हैं. मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर हजरतगंज थाने तक उनकी यह तेजी दिखाई दी. आने वाले दिनों में दूसरे ऑफिसों में भी अभियान दिखेगा. देखने वाली बात यह होगी की इस अभियान का सरकारी कामकाज पर क्या असर पड़ता है?

इससे जनता को सच में कितनी राहत का अनुभव होता है. सरकारी नौकर अभी तेल देखो तेल की धार देखोके मुहावरे की तरह से पूरे अभियान को देख रहे हैं. कुछ साल पहले बसपा नेता से मुख्यमंत्री बनी मायावती भी अपने शुरूआती फैसलों से लोगों को चौकाने वाली काम करती थी. कई बार सड़क, नाली का औचक्क निरीक्षण करते समय अपने पैर की ठोकर मार कर देखती थी कि ईंटा कितना सही लगा है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में पहली बार प्रवेश किया तो संसद भवन की सीढियों के पैर छुये. उस समय शपथ ली थी कि संसद के इस पवित्र जगह को अपराधियों से मुक्त कर देंगे. यही नहीं स्वच्छता अभियान के तहत केन्द्र सरकार के मंत्रियों से लेकर सरकारी विभागों और विश्वविद्यालयों तक में सफाई अभियान शुरू हो गया. इसका प्रभाव कब तक चला और क्या असर हुआ किसी भी रेलवे स्टेशन पर जाकर देखा जा सकता है.

केन्द्र के सरकारी विभागों में कितना भ्रष्टाचार कम हुआ वहां पर काम कराने वाले लोगों को बेहतर तरह से पता है. प्रधानमंत्री ने हर सांसद को कहा था कि वह हर साल एक गांव को गोद लेकर उसका विकास करे. शुरूआत में उसका भी बहुत प्रचार हुआ. दूसरे साल किसी सांसद ने यह नहीं बताया कि अब उसने कौन सा गांव गोद लिया है जो गांव पिछले साल गोद लिया था उसको क्या हुआ.

मोदी जी की ही तरह योगी जी भी मुख्यमंत्री बनने के बाद तेजी में हैं. सरकारी सिस्टम को गतिशील और स्वच्छ बनाने की शपथ दे रहे हैं. सरकारी विभाग जितने बेहतर तरह से काम करे इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता. सरकारी विभागों में सुधार एक दिन में नहीं आयेगा. सरकारी नौकर जनता का काम बिना रिश्वत के समय पर कर दे इसके लिये केवल सिटीजन चार्टर लागू करने से काम नहीं होने वाला.

सरकारी नौकरों की कार्यशैली बदलनी होगी. इनकी पोशाक बदलने से कुछ नहीं होगा यह जनता के दर्द को समझ ऐसी सोंच डालनी होगी. पुलिस और तहसील सुधर जायें. किसानों की जमीनों पर से अवैध कब्जे हट जाये किसानों को जमीन की नापजोख के लिये दरदर भटकना न पड़े ऐसा प्रयास हो.

जब थाने की पुलिस पीड़ित की बात सुनने से लेकर उसपर कड़ी कारवाई करने लगे तो किसी भी तरह के एंटी रोमियो स्क्वायड की जरूरत नहीं होगी. पुलिस संवेदनशील हो जाये वह जनता और बदमाश के बीच के फर्क को बखूबी समझती है बस केवल महसूस नहीं करती. नेताओं और दंबगो की दबाव में आकर गलत काम करना बंद कर दे इससे बड़ा कोई सुधार नहीं हो सकता.

योगी जी आपको थाने जाने की जरूरत नहीं है. आपका इकबाल इतना है कि हर पुलिस थाना, तहसील और सरकारी ऑफिस सुधर सकता है. आपका संदेश ही काफी है. यह तेजी बनी रहे तो बहुत कुछ हो सकता है. अभी यह लोग समझ रहे है कि योगी जी की तेजी कुछ दिनों की है ऐसे में यह लोग बुरे दिनों की तरह जल्दी से इसको बीत जाने की राह देख रहे हैं. यह दिन लंबे चले तभी सार्थक प्रभाव पड़ सकेगा.

एड्स रोगियों को बार-बार टीबी होने का खतरा

टीबी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है जो हवा के जरिये एक इंसान से दूसरे में फैलती है और इसका बैक्टीरिया शरीर के जिस भी हिस्से में फैलता वहां के टिश्यू को पूरी तरह नष्ट कर देता है. समय पर इलाज कराने से बैक्टीरिया को फैलने से रोका जा सकता है और टीबी से बचा जा सकता है. एचआईवी पॉजिटिव लोगों में बार-बार टीबी होने की संभावना अधिक होती है. एड्स रोगियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण उनका शरीर टीबी के बैक्टीरिया के वार को नहीं सह पाता है, जिस कारण वो टीबी से ग्रसित हो जाते हैं.

टीबी मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक बैक्टीरिया से होता है. यह बैक्टीरिया हवा के द्वारा श्वासनली में प्रवेश करता है. टीबी के फैलने के कई अन्य कारण भी हैं जैसे कि छिंकना, खांसना, खुले में थूकना. आम तौर पर यह बीमारी फेफड़ों से शुरू होती है. यह बैक्टीरिया फेफड़ों के टिश्यू को नष्ट कर देता है. सही वक्त पर इलाज कराने से टीबी से निजात पाया जा सकता है.

एचआईवी पॉजिटिव लोगों के लिए टीबी ज्यादा खतरनाक है. अगर किसी एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को एक बार टीबी हो जाता है, तो ठीक होने के बाद भी बार बार टीबी होने का खतरा रहता है.

लगातार चेकउप करवाने के बाद ही टीबी के बैक्टीरिया का पता लगाया जा सकता है. एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों को टीबी होने पर उनके बचने की गुंजाइश भी कम हो जाती है. वैदिकग्राम के डॉक्टर दीपक कुमार का कहना है कि “टीबी फैलने वाली बीमारी है. इसके बैक्टीरिया को फैलने से रोकने के लिये साफ-सफाई का खासा ध्यान रखना चाहिए. इसके साथ ही हाइजिन का भी ख्याल रखना जरुरी है. हाइजिन का ख्याल ना रखने की वहज से ही निचले तबके के लोगों में इस बीमारी के होने का खतरा ज्यादा रहता है. एड्स रोगियों को टीबी से मिलते-जुलते किसी भी लक्षण के दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिये क्योंकि थोड़ी भी देर होने पर यह जानलेवा हो जाता है.”  

 

 

‘बाहुबली 2’ पर भारी पड़ी रजनीकांत की फिल्म

‘बाहुबली 2’ को लेकर मीडिया में पिछले कुछ दिनों में बहुत खबरें चली हैं. “बाहुबली 2” सबसे ज्यादा कामयाब बताया जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि यह वैश्विक स्तर पर 700 करोड तक का कारोबार करने में कामयाब होगी. और इस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म साबित होगी. लेकिन अभी हाल ही में जो खबर मिली है उसे देखते हुए ऐसा महसूस होने लगा है कि इस वर्ष की सर्वाधिक हिट फिल्म “बाहुबली-2” नहीं बल्कि दक्षिण भारत के ही महानायक रजनीकांत अभिनीत “2.0” होने जा रही है.

रजनीकांत की इस फिल्म ने निर्देशक एस.एस. राजामौली की फिल्म को एक बार फिर मात दे दी है. पहले रजनीकांत ने राजामौली को बजट के मामले में मात दी थी और अब रजनीकांत ने उन्हें सैटेलाइट राइट्स बिकने के मामले में पीछे छोड दिया है.

आईपीएल 10 से बाहर हुए ये 10 क्रिकेटर

आईपीएल का दसवां सत्र 5 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है. पिछले साल की विजेता टीम सनराइजर्स हैदराबाद ही इस सत्र की शुरुआत करेगी. आईपीएल 10 का पहला धमाकेदार मुकाबला सनराइजर्स हैदराबाद और विराट कोहली की टीम रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु के बीच होगा. आपको बता दें कि बंगलुरु टीम पिछले सत्र की उपविजेता टीम रही थी.

आईपीएल की उद्घाटन समारोह के साथ पहला मैच हैदराबाद के राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम में आयोजित होगा. वहीं इस सत्र का फाइनल मैच भी हैदराबाद में ही आयोजित किया जाएगा.

साल 2008 में अपनी शुरुआत से ही आईपीएल दर्शकों का चहेता बन गया है. इस फटाफट टी20 लीग में वह सब कुछ था जो क्रिकेट प्रशंसकों को पसंद आए.

लेकिन इस फटाफट क्रिकेट से खिलाड़ियों का हटना लगातार जारी है. अब साउथ अफ्रीकी स्टार क्विंटन डि कॉक के भी टूर्नामेंट में खेलने पर सस्पेंस है. वह दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से खेलते हैं. अब तक आईपीएल से अलग-अलग कारणों से करीब 10 खिलाड़ी हट चुके हैं. इसमें कोलकाता नाइट राइडर्स के विस्फोटक बैट्समैन आंद्रे रसेल भी शामिल हैं, जिनपर डोपिंग के कारण एक साल का बैन लगा है.

आइए एक नजर डालते हैं आईपीएल 10 से अब तक हट चुके खिलाड़ियों पर..

खिलाड़ी

टीम

कारण

आंद्रे रसेल

कोलकाता नाइटराइडर्स

एक साल का बैन

डेल स्टेन

सनराइजर्स हैदराबाद

इंजरी के कारण ऑक्शन से हटें

मिशेल स्चार्क

रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु

बिजी शेड्यूल

जेपी डुमिनी

दिल्ली डेयरडेविल्स

नाम वापस लिया

इमरान ताहिर

दिल्ली डेयरडेविल्स

कोई खरीदार नहीं

इरफान पठान

राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स

कोई खरीदार नहीं

इशांत शर्मा

राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स

कोई खरीदार नहीं

केविन पीटरसन

राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स

ऑक्शन से हटें

मिशेल मार्श

राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स

कंधे में चोट

रोस टेलर

दिल्ली डेयरडेविल्स

कोई खरीदार नहीं

 

इस आईपीएल कैमरा लगाकर खेलेंगे प्लेयर्स!

5 अप्रैल से शुरू होने वाला आईपीएल का दसवां सीजन और भी रोमांचक होने वाला है. सूत्रों की मानें तो बीसीसीआई चाहता है कि बैटिंग के दौरान बल्लेबाज भी कैमरा लगाकर खेलें जिससे दर्शकों को वैसा ही अनुभव हो जैसा खिलाड़ी बैटिंग के दौरान महसूस करता है. खिलाड़ियों के हेलमेट में कैमरा लगाया जा सकता है.

अभी तक आपने अंपायर्स को सिर पर कैमरा लगाए देखा होगा पर अगर रिपोर्टस की मानें तो इस आईपीएल में आपके फेवरेट प्लेयर्स अपने हेल्मेट में कैमरा लगाकर उतरेंगे.

आमतौर पर एक क्रिकेट मैच के दौरान 28 एचडी कैमरों का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन आज इससे कई ज्यादा कैमरे प्रयोग मे लाए जाते हैं, जिससे दर्शक को फील्ड का सभी मोमेंट दिखाया जा सके. तो जानिए मैच के दौरान कहां-कहां लगे होते हैं स्पेशल कैम.

अंपायर के सिर पर

अंपायर्स के सिर पर कैमरा लगाए जाते हैं. उनके हेलमेट पर कैमरा लगा होता है.

स्टंप में कैमरा

बल्लेबाज के पीछे के व्यू के लिए स्टंप में कैमरा लगाया जाता है.

स्टंप के पीछे

सिर्फ स्टंप में ही नहीं, स्टंप के पीछे भी कैमरा लगाया जाता है. स्टंप के पीछे ग्राउंड में कैमरा लगाया जाता है.

स्पाइडर कैम

एरियल व्यू के लिए स्पाइडर कैम का यूज होता है.

व्यवस्थित निवेश, चिंतामुक्त जीवन

सिस्टमेटिक यानी व्यवस्थित होना तमाम क्षेत्रों में सफलता की पहली शर्त होती है. बचत और निवेश के मामले में इसकी अहमियत ज्यादा है. ऐसा इसलिए क्योंकि बचत और निवेश में अनुशासन बरतने से बड़ी पूंजी इकट्ठी होती है और वह समय के साथ-साथ बढ़ती जाती है.

इस मामले में कई मौकों पर दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन यदि इनसे सही तरीके से निपट लिया जाए तो आगे की राह आसान हो जाती है. एकमुश्त रकम इकट्ठी करना हमेशा आसान नहीं होता, लिहाजा नियमित बचत को आदत बना लेना चाहिए.

अनुशासित निवेश का सबसे सरल तरीका म्युचुअल फंडों में पैसा लगाना है, लेकिन सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) निवेश का ऐसा जरिया है, जो इस मामले में सहज अनुशासन सिखाता है.

सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप)

सिप किसी फंड में निश्चित अंतराल पर निश्चित रकम का नियमित निवेश है. आम तौर पर निवेश की दो किस्तों के बीच एक महीने का अंतर रखा जाता है.

सिप बिलकुल सहज तरीके से म्युचुअल फंड्स में निवेश करके सबसे ज्यादा संभव लाभ कमाने के रास्ते में आने वाली दो कठिनाइयों का समाधान करता है. पहला यह कि चूंकि सिप के तहत निश्चित रकम का नियमित निवेश किया जाता है और इस मामले में एनएवी (संपत्ति का निवल मूल्य) या बाजार में गिरावट या तेजी का ध्यान नहीं रखा जाता, लिहाजा निवेशक स्वत: कम मूल्यों पर ज्यादा यूनिटें खरीदता है.

नतीजतन यूनिटों की औसत कीमत कम रहती है, जिसका सीधा मतलब है ज्यादा कमाई. निवेश का एक आधारभूत सिद्धांत है ‘कम दाम में खरीदना और ऊंचे दाम में बेचना.’ सिप सहज तरीके से यह जरूरत पूरी करता है.

यदि आप एक ही बार में बड़ी रकम निवेश करते हैं, तो आप ज्यादा कीमतों पर यूनिटें खरीदकर मुश्किल में पड़ सकते हैं. इसका मतलब होगा कि आपने अधिक एनएवी पर निवेश किया है. ऐसे में बाजार में गिरावट आने पर लाभ की रकम कम हो जाएगी. सिप इस समस्या से बचाता है.

इसके जरिए एक निश्चित अवधि में औसत कीमत पर निवेश किया जा सकता है. दूसरा फायदा यह है कि सिप से निवेश करते समय मनोवैज्ञानिक मदद मिलती है. निवेशक स्वाभाविक रूप से बाजार में पैसा लगाने की सही टाइमिंग की तलाश में रहते हैं. बाजार में जब गिरावट आती है तो आम तौर वे बिकवाली शुरू कर देते हैं, निवेश नहीं बढ़ाते.

निवेश का समय और रकम पहले से निर्धारित होती है. इसका फायदा होता है कि यह फैसला नहीं करना पड़ता कि अधिक-से-अधिक लाभ कमाने के लिए कब निवेश करना है. गैर-अनुभवी निवेशकों के लिए अपनी पूंजी से बढ़िया रिटर्न पाने की दिशा में यह सबसे बड़ी बाधा साबित होती है. दरअसल, जो निवेशक कम कीमत पर लिवाली करता है वह अंतत: फायदे में ही रहता है.

सिस्टमेटिक विड्रावल प्लान (एसडब्ल्यूपी) किसी फंड में किए गए निवेश को नियमित तरीके से भुनाने का प्लान है. इसके तहत निवेशक निश्चित रकम निकाल सकता है, निश्चित संख्या में यूनिटों की बिक्री कर सकता है या फिर एक निश्चित स्तर से ऊपर मुकम्मल रिटर्न निकाल सकता है. अन्य तमाम बातों के अलावा यह किसी इन्वेस्टमेंट फंड से नियमित आय का सुविधाजनक तरीका है.

सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान (एसटीपी)

एसटीपी एक फंड से किसी दूसरे फंड में नियमित तरीके से निवेश ट्रांसफर करने की योजना है. यह सिप जैसा ही है, लेकिन इसमें निवेश की रकम दूसरे फंड से निकाली जाती है. एसटीपी का इस्तेमाल अक्सर तब किया जाता है, जब निवेशक के पास किसी इक्विटी फंड में डालने के लिए एकमुश्त रकम हो.

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि हमेशा यही बेहतर होता है कि एक ही बार में बड़ी रकम निवेश करने की जगह सिप के जरिए नियमित तरीके से निवेश किया जाए. ऐसे मामलों में किसी एएमसी के डेट फंड में एकमुश्त रकम डाली जा सकती है और सीधे-सीधे निर्देश दिया जा सकता है कि हर महीने चुने हुए इक्विटी फंड में निश्चिम रकम ट्रांसफर की जाए. निवेश के इस तरीके को एसटीपी कहा जाता है.

सिस्टमेटिक प्लान से जुड़ी बातें

1.सिप बाजार के उतार-चढ़ाव की परवाह किए बगैर औसत लागत पर नियमित निवेश का तरीका है

2.सिप मुनाफा कमाने का पक्का साधन नहीं है. ऐसे हालात भी होते हैं, जब एकमुश्त निवेश से भी बेहतर आय हो सकती है.

3. ऐसा तब होता है, जब बाजार उस स्तर से कभी भी नीचे न आया हो, जिस स्तर पर निवेश शुरू किया गया था.

4.आम तौर लंबी अवधि में बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण सिप से बेहतर कमाई पक्की होती है.

5.यह कहने का कोई आधार नहीं है कि किसी खास तरीके का नियमित निवेश सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है.

6.सिप के जरिए सबसे अधिक कमाई के लिए स्वाभाविक बचत चक्र पर ध्यान देने की दरकार होती है, इसी से तय करना चाहिए कि निवेश का अंतराल कितना हो.

सिप निवेशक की सुविधाओं के अनुरूप होना चाहिए. स्वाभाविक आय और बचत के आधार पर. निवेश की दो किस्तों के बीच एक महीने का अंतर हो सकता है, एक हफ्ते का या फिर तीन महीनों का भी.

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