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इस हीरोईन का टॉपलेस फोटोशूट हुआ वायरल

साउथ फिल्मों की हीरोईन सीरत कपूर इन दिनों अपने टॉपलेस फोटोशूट को लेकर चर्चा में हैं. हाल ही में उन्होंने इसके कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर भी पोस्ट करते हुए लिखा है- राजसी अंदाज. इन फोटोज में सीरत काफी बोल्ड लुक में नजर आ रही हैं. बता दें कि 3 अप्रैल, 1993 को मोम्बासा (केन्या) में जन्मीं सीरत ने अभी साउथ की कुछ चुनिंदा फिल्मों में ही काम किया है.

सीरत कपूर जल्द ही साउथ के सुपरस्टार नागार्जुन के साथ फिल्म 'राजू गरी गढ़ी 2' में नजर आएंगी. इस तेलुगु हॉरर कॉमेडी फिल्म को ओमकार ने डायरेक्ट किया है. फिल्म में नागार्जुन और सीरत के अलावा उनकी होने वाली बहू समांथा रूथ प्रभु भी नजर आएंगी.

सीरत ने अपना करियर 2011 में आई रणबीर कपूर स्टारर मूवी 'रॉकस्टार' से शुरू किया. इसमें उन्होंन बतौर असिस्टेंट कोरियोग्राफर काम किया था. सीरत के पिता विनीत कपूर हॉटलेयर थे, जबकि उनकी मां नीना सिहोटा कपूर एयर इंडिया में एयरहोस्टेस रह चुकी हैं. उनके बड़े भाई वरुण कपूर ने नेशनल आर्ट स्कूल सिडनी से ग्रैजुएशन किया है और फ्री-लांसर ग्राफिक डिजाइनर हैं.

सीरत ने 2014 में आई तेलुगु फिल्म 'रन राजा रन' से एक्टिंग डेब्यू किया. सीरत ने मुंबई के पोद्दार इंटरनेशनल स्कूल से शुरुआती पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने ब्रांद्रा के आरडी नेशनल कॉलेज से पढ़ाई की. सीरत ने मास कम्युनिकेशन में बीए की डिग्री के लिए दाखिला लिया लेकिन उनकी डेब्यू फिल्म 'रन राजा रन' की वजह से उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी.

सीरत कपूर ने फिल्मों के अलावा कई ऐड में भी काम किया है. उन्होंने विवेल, इंगेज कोलोन स्प्रे, अपोला टायर, महिंद्रा गस्टो और इंटेक्स के ऐड में फरहान अख्तर के साथ काम किया है.

एक्टिंग और डांसिंग के अलावा सीरत क्लासिकल सिंगर भी हैं. उन्होंने 12 साल की उम्र में राजश्री स्कूल ऑफ म्यूजिक से क्लासिकल सिंगिंग की ट्रेनिंग ली है.

जब शॉन टेट की गेंद पर मैदान में ही गिर गए थे डीविलियर्स

एबी डीविलियर्स का नाम ऐसे खिलाड़ियों के नाम में शामिल है जो अपने बल्ले को किसी जादुई छड़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं और अपनी शॉट्स से गेंदबाज को भौंचक्का कर देते हैं. डीविलियर्स आधुनिक क्रिकेट के एक ऐसे क्रिकेटर हैं जो मैदान में 360 डिग्री में कहीं भी शॉट खेलने में माहिर है. विरोधी टीम के खिलाफ डीविलियर्स जब भी बल्लेबाजी के लिए उतरते हैं दर्शकों का मन झूमने लगता है, क्योंकि वे यह जान जाते हैं कि अब असली इंटरटेनमेंट शुरू होने वाला है.

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जितने विस्फोटक आज डीविलियर्स दिखाई देते हैं, अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत में उन्हें भी कुछ दिनों तक जूझना पड़ा था. एक बार वह शॉन टेट की एक तेज गेंद से घायल होत-होते बचे थे और उसी दौरान हिट विकेट होकर उन्होंने अपना विकेट गंवा दिया.

यह वाकया दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे एक टी20 मैच का है. ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 183 रन बनाए. दक्षिण अफ्रीका ने लक्ष्य का पीछा करते हुए 1 रन पर ही पहला विकेट गंवा दिया. दूसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आए डीविलियर्स ने शॉन टेट की 155.4 किमी./घंटे की तेज रफ्तार वाली गेंद पर पुल शॉट लगाने की कोशिश की लेकिन डीविलियर्स गेंद की तेजी को भांप नहीं पाए और गेंद उनके पेट से जाकर टकराई. डीविलियर्स गेंद के लगने के तुरंत बाद जमीन पर बैठने की ओर झुके और इसी दौरान उनका बल्ला स्टंप्स से टकरा गया और वे अपना विकेट गंवा बैठे.

लोग बच्ची ना कहें, इसलिए करा लिया बोल्ड फोटोशूट

बॉलीवुड और तेलुगु एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती को लोग भले ही कम जानते हों, लेकिन इन दिनों अपने हॉट फोटोशूट के चलते वो सुर्खियों में हैं. साल 2013 में रिलीज हुई फिल्म 'मेरे डैड की मारुति' से पॉपुलर हुईं रिया की एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें वे काफी बोल्ड नजर आ रही हैं. कुछ दिनों पहले रिया ने एक फोटो शेयर की थी, जिसमें वो ब्रालेस नजर आईं थीं. इसमें उन्होंने सिर्फ dangri jeans पहनी थी. बता दें कि रिया 2014 में फिल्म 'सोनाली केबल' में नजर आ चुकी हैं. फिलहाल वो 'हाफ गर्लफ्रेंड' की शूटिंग कर रही हैं, जो 19 मई को रिलीज होगी.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिया चक्रवर्ती खुद के बारे में क्यूट शब्द सुनकर तंग आ चुकी थीं. यही वजह है कि उन्होंने बोल्ड फोटोशूट कराकर अपनी फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर कर दीं. रिया की ये हॉट फोटोज इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहीं हैं. रिया का कहना है कि वो खुद के बारे में बच्ची शब्द सुन-सुनकर थक गई थीं.

मार्च 2014 में रिया चक्रवर्ती के साथ छेड़खानी का मामला सामने आया था. रिया ने ट्विटर के जरिए अपने फैन्स को बताया था कि एक आदमी अचानक उनकी बिल्डिंग में आया और उन्हें इधर-उधर छूने लगा. यह तो शुक्र है कि उन्हें मार्शल आर्ट्स आता है और उनके किक मारते ही वह आदमी भाग गया.

1 जुलाई, 1992 को बेंगलुरु में बंगाली हिंदू फैमिली में जन्मीं रिया वीजे और एक्ट्रेस हैं. रिया की स्कूलिंग आर्मी पब्लिक स्कूल अम्बाला से हुई. रिया ने एमटीवी के कई शो होस्ट किए हैं. इनमें पेप्सी एमटीवी वाट्सअप, टिकटैक कॉलेज बीट और एमटीवी गॉन इन 60 सेकंड्स शामिल हैं.

रिया ने अपने कॅरियर की शुरुआत 2009 में आए एमटीवी रियलिटी शो टीवीएस स्कूटी टीन दिवा से की थी. 2012 में रिया ने तेलुगु मूवी 'तुनीगा तुनीगा' से फिल्मों में डेब्यू किया. इस मूवी में उन्होंने निधि का रोल प्ले किया. 2013 में रिया ने बॉलीवुड में फिल्म 'मेरे डैड की मारुति' से डेब्यू किया. इसमें उन्होंने जसलीन का रोल प्ले किया.

2017 में रिया की दो फिल्में रिलीज होंगी. पहली डायरेक्टर मोहित सूरी की 'हॉफ गर्लफ्रेंड' और दूसरी यशराज बैनर की 'बैंक चोर' है. पॉपुलर राइटर चेतन भगत के नॉवेल पर बेस्ड फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ 19 मई को रिलीज होगी. फिल्म में रिया के साथ अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर लीड रोल में हैं. रिया इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव रहती हैं और अक्सर अपनी बोल्ड फोटो शेयर करती हैं.

किसानों पर भारी गन्ने की उधारी खरीदारी

मासूम किसानों पर बिजली,पानी या बैंक कर्ज का बकाया होने पर कुर्की, वारंट, जेल जाने व जमीन बिकने तक की नौबत आ जाती है. वहीं दूसरी ओर अगर किसानों की उपज के अरबों रुपए धन्नासेठ दबा लें तो उन का बाल तक बांका नहीं होता. इस से जाहिर होता है कि हमारे मुल्क में खेती की प्रधानता व किसानों की अहमियत सिर्फ कहने की बातें हैं. चीनी मिलों के बेजा रवैए से मीठे गन्ने की खेती किसानों के लिए कड़वाहट की वजह बन चुकी है. कहने को गन्ना, देश की खास व नकदी फसल है, लेकिन ज्यादातर चीनी मिलें गन्ने की कीमत किसानों को वक्त पर नहीं देतीं. लिहाजा हर साल गन्ना कीमत के करोड़ों रुपए चीनी मिलों पर  बकाया पड़े रहते हैं. गन्ना उपज बेचने के बाद 2-3 सालों तक भी पैसा नहीं मिलता, लिहाजा ज्यादातर गन्ना किसानों की माली जरूरतें पूरी नहीं होतीं. वे अपना कर्ज नहीं चुका पाते. पैसे की तंगी से खासकर छोटे किसान तो बहुत ज्यादा परेशान रहते हैं.

उत्तर प्रदेश में चल रही 117 चीनी मिलों ने चालू सीजन में 16 फरवरी 2017 तक कुल 165 अरब 72 करोड़ 95 लाख रुपए का गन्ना खरीदा था. इस में से सिर्फ 108 अरब 12 करोड़ 95 लाख रुपए का ही भुगतान किया गया. 57 अरब 59 करोड़ 80 लाख रुपए का भुगतान बकाया है. इतना ही नहीं, साल 2015-16 के 3 अरब 2 करोड़ 32 लाख रुपए व साल 2014-15 के 99  करोड़ 78 लाख रुपए भी अभी तक चीनी मिलों पर बकाया हैं.

नुकसान किसानों का

यह तसवीर अकेले उत्तर प्रदेश की है. पूरे देश की चीनी मिलों पर बकाया रकम और भी बड़ी है. हालांकि गन्ने की कीमत किसानों को जल्द दिलाने के कायदेकानून हैं. मसलन टैगिंग आदेश के तहत मिलों को अपनी चीनी बेचने से मिली रकम का 85 फीसदी हिस्सा किसानों को गन्ने की कीमत अदा करने के लिए देना लाजिम है, लेकिन ऐसा नहीं होता. बकाएदार चीनी मिलों को नोटिस देने, उन की चीनी के गोदाम, शीरा व खोई आदि अटैच करने, वसूली के लिए आरसी जारी करने व एफआईआर लिखाने तक की रस्म अदायगी की जाती है, लेकिन इस सब के बावजूद ज्यादातर चीनी मिलें नियमों को ताक पर रख देती हैं. मिल मालिक सब का तोड़ निकाल लेते हैं, लिहाजा फायदा उन का व नुकसान किसानों का होता है.

गिरफ्तारी से बचने के लिए कई मिल मालिक तो देश छोड़ कर आसानी से बाहर चले जाते हैं. मसलन मोदीनगर व मलकपुर की चीनी मिलों पर 374 करोड़ रुपए का बकाया है. उन के मालिक लंदन निकल गए हैं. इसी तरह राणा समूह की 4 मिलों पर 200 करोड़ रुपए बकाया हैं, इन के मालिक युगांडा जा चुके हैं. अब सरकार उन की देश वापसी की लकीर पीट रही है. यदि उन के पासपोर्ट पहले जब्त हो जाते तो वे देश से बाहर ही नहीं जा पाते.

ज्यादातर चीनी मिलें किसानों का कई तरह से शोषण करती हैं. उन से गन्ना खरीद कर एकमुश्त अदायगी में आनाकानी करती हैं. वे मनमानी व सहूलियत के हिसाब से गन्ने की कीमत अदा करती हैं. 14 दिनों बाद भुगतान करने पर 15 फीसदी ब्याज देने का नियम है, लेकिन मिलें ब्याज नहीं देतीं. ज्यादातर मिलें तोल कांटों पर घटतोली कराती हैं. गन्ना मिलें अपने रसूख व पैसे के बल पर गन्ना मूल्य के बकाए व ब्याज के मामले कोर्टकचहरी ले जा कर कानूनी पचड़ों में फंसा देती हैं. नतीजतन बहुत से किसान अब गन्ने की खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं.

ढूंढ़े नहीं मिलेगा गन्ना

देश के 18 राज्यों में गन्ने की बहुतायत थी, लेकिन गन्ने की खेती अब लगातार घट रही है. मसलन साल 2014 में गन्ने का कुल रकबा 5341 हजार हेक्टेयर था, जो साल 2015 में घट कर 5307 हजार हेक्टेयर व साल 2016 में महज 5284 हजार हेक्टेयर रह गया. इसी तरह गन्ने की पैदावार में भी कमी आ रही है. साल 2015 के दौरान देश में गन्ने की कुल पैदावार 3456 लाख टन थी, जो साल 2016 में गिर कर 3369 लाख टन रह गई.

यदि गन्ने का रकबा व पैदावार घटने का यही सिलसिला जारी रहा तो जाहिर है कि जल्द ही भारतीय चीनी उद्योग के सामने कच्चे माल की तंगी आ सकती है. ध्यान रहे कि कमी आने पर दाल व गेहूं आदि की तरह गन्ने को दूर या दूसरे मुल्कों से आयात नहीं किया जा सकता है. लिहाजा मजबूरन दूसरे मुल्कों से चीनी आयात करनी पड़ेगी.

मजबूरी

ज्यादातर किसानों के सामने अपनी गन्ना उपज जल्दी से जल्दी बेचने की मजबूरी बनी रहती है, क्योंकि खेत से कटने के बाद गन्ना सूखने लगता है. लिहाजा गन्ने को ज्यादा नहीं रोका जा सकता. किसानों की इसी मजबूरी का सब फायदा उठाते हैं. कोल्हू क्रेशर वाले किसानों से गन्ना खरीद कर रकम तो नकद देते हैं, लेकिन वे औनेपौने दामों पर खरीद करते हैं. ज्यादा गन्ना आते ही वे रेट गिरा देते हैं या खरीद बंद कर देते हैं. ज्यादातर किसान गन्ने की कुल पैदावार में से गुड़, रस व बीज आदि के लिए करीब 40 फीसदी हिस्सा निकाल कर गन्ने की बाकी उपज चीनी मिलों को बेचना पसंद करते हैं .फिलहाल हमारे देश में 526 चीनी मिलें चल रही हैं. मिलों को गन्ना देने पर आमतौर पर किसानों को उपज की कीमत तयशुदा दरों पर मिलती है.

केंद्र सरकार ने गन्ने की दरें साल 2014 में 210 रुपए, साल 2015 में 220 रुपए व साल 2016 में 230 रुपए प्रति क्विंटल तय की थीं. देश में गन्ने का सब से ज्यादा रकबा 20 लाख 52 हजार हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में है. 18 नवंबर 2016 को उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2017 सीजन के लिए गन्ने की कीमतें 25 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाई थीं. इस के तहत अगेती गन्ने की कीमत 315 रुपए प्रति क्विंटल, सामान्य गन्ने की कीमत 305 रुपए प्रति क्विंटल तय करते हुए एकमुश्त अदायगी का ऐलान किया था. गन्ने की कीमतों में हुई इस मामूली बढ़ोतरी का कारण भी किसानों की चिंता नहीं, चुनावों में किसानों को लुभा कर उन के वोट हासिल करना था, क्योंकि पिछले 3 सीजन से उत्तर प्रदेश में गन्ने के रेट 280 व 290 रुपए प्रति क्विंटल ही चल रहे थे और किसानों की लगातार व भारी मांग के बावजूद सरकार ने गन्ने की कीमतों में कोई इजाफा नहीं किया था. इस तरह गन्ना किसानों की मुश्किलों का कोई अंत दिखाई नहीं देता.

चीनी मिलों के मुलाजिम तोल कांटे पर वजन करने के बाद किसानों को एक पर्ची थमा देते हैं, जिस पर तोल की तारीख, गन्ने का कुल वजन, प्रति क्विंटल गन्ने की दर व कुल कीमत आदि लिखी रहती है. कुछ अपवादों को छोड़ कर ज्यादातर चीनी मिलें 14 दिनों बाद भुगतान करने की आड़ में गन्ने की कीमत का भुगतान रोक लेती हैं.

तरकीब है

लखनऊ में जनसंचार संस्थान के निदेशक अशोक कुमार सिन्हा उत्तर प्रदेश में गन्ना विकास विभाग के आला अफसर रह चुके हैं. उन का कहना है कि देश में दाल, तेल, चावल व सूत आदि की भी बहुत से मिलें चलती हैं. वे भी किसानों से उन की दलहन, तिलहन, धान व कपास आदि की उपज खरीदती हैं, लेकिन वे तो उधारी नहीं करतीं. 14 दिनों बाद भुगतान के पुराने कानून की आड़ में किसानों से हो रही यह ज्यादती अब बंद होनी चाहिए.

पिछले दिनों एक केंद्रीय मंत्री ने लोकसभा में कहा था कि सरकार ने अब तक 1159 पुराने कानूनों को बेअसर किया है, जो लालफीताशाही बढ़ाने वाले थे. ऐसे 400 और कानूनों पर काम हो रहा है. बेशक यह सरकार का एक अच्छा व काबिलेतारीफ कदम है. लिहाजा गन्ना उत्पादक राज्यों को गन्ने की उधारी खरीद के पुराने कानून को बेअसर करने का मसौदा केंद्र सरकार को भेजना चाहिए, ताकि किसानों को गन्ना उपज की कीमत भी तुरंत मिले.

बहादुरगढ़ के किसान अमरपाल सिंह का कहना है कि चीनी मिलें अकसर गन्ने की कीमतें व लागत ज्यादा होने व बाजार में चीनी के दाम कम रहने से नुकसान होने का रोना रोती रहती हैं. किसानों के मुकाबले उन की लाबी बहुत मजबूत है. वे एकजुट हो कर खुद को बीमार उद्योग बताती हैं और सरकार से मोटी सहूलियतें हासिल करती हैं, लेकिन किसानों की रकम समय पर अदा नहीं करतीं. उस रकम को खुद इस्तेमाल करती हैं.

चीनी मिलों द्वारा किसानों का गन्ना मूल्य रोकने का सिलसिला बहुत पुराना है, मगर यह गन्ना किसानों का खुला शोषण है. गन्ना किसान इसे मजबूरी में सहते हैं, लेकिन यह किसानों के साथ सरासर नाइनसाफी है. लिहाजा 14 दिनों की उधारी पर गन्ना खरीद का पुराना कानून सरकार को बेअसर कर देना चाहिए, ताकि चीनी मिलों पर नकेल कसी जा सके. इस के लिए किसानों व उन के संगठनों को जागरूक व एकजुट हो कर इस बारे में अपनी मांग जोरदार तरीके से उठानी चाहिए.                     

पार्ट टाइम जॉब्स से बढ़ाएं इनकम

बढ़ती महंगाई के इस दौर में रेगुलर जॉब से घर का खर्च पूरा करना आसान नहीं है. अगर आपका परिवार भी है तो आपको अपने बच्‍चों के एडमिशन, इन्श्योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम, घर के रख-रखाव जैसे बड़े खर्चों का बोझ भी उठाना पड़ता है. इन सब के अलावा महंगाई की मार अलग पड़ती है. अगर आप भी ऐसी ही स्थिति से जूझ रहे हैं तो अपनी आय बढ़ाने के लिए आपको पार्ट टाइम जॉब करना चाहिए.

आज हम आपको ऐसे ही पार्ट टाइम जॉब के बारे में बता रहे हैं, जिनसे आप कुछ घंटों में ही ढेर सारा पैसा कमा सकते हैं.

1. ऑनलाइन सेलर

देश-विदेश में ई-कॉमर्स का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है. हमारे देश में फ्लिपकार्ट, अमेजन, स्‍नैपडील जैसी कंपनियों का बिजनेस कुछ ही साल में कई गुना बढ़ गया है. इन कंपनियों के साथ जुड़कर आप पैसे कमा सकते हैं. ये कंपनियां फ्री में सेलर बनाती हैं. सेलर के तौर पर आप जुड़कर अपने घर पर बैठे-बैठे पैसे कमा सकते हैं. इसके लिए आपको इनकी वेबसाइट पर खुद को रजिस्‍टर करना होगा. फिर आप जिस प्रोडक्ट को इनके प्लेटफॉर्म पर बेचना चाहते हैं उसको लिस्ट करना होगा. अगर आपके प्रोडक्ट की कीमत मार्केट से कम और क्वालिटी बेहतर है तो ऑर्डर खूब मिलेंगे.

इतनी होगी कमाई

– आप रोज 2 से 3 घंटे देकर यहां से 15 से 30 हजार रुपए कमा सकते हैं.

– एक बार चेन बन जाने पर आपको ज्‍यादा मशक्कत भी नहीं करनी होगी.

– इसमें टाइम का भी कोई बाउंडेशन नहीं होगा. ज्यादा समय दें तो कमाई बढ़ भी सकती है.

2. योगा या म्यूजिक टीचर

आज की भागमभाग भरी लाइफ में हर कोई शरीर को आराम देना चाहता है. ऐसे में योग, पर्सनल ट्रेनर और म्यूजिक टीचर की मांग तेजी से बढ़ी है. आप योग सिखाने के काम को पार्ट टाइम जॉब के तौर पर कर सकते हैं. आप इसके लिए पास के किसी पार्क से शुरुआत कर सकते हैं और कुछ लोगों को सुबह के समय योग की क्‍लास दे सकते हैं. वहीं अगर आपको म्यूजिक से लगाव है तो आप बच्‍चों से लेकर युवाओं तक को म्यूजिक की ट्रेनिंग दे सकते हैं.

इतनी होगी कमाई

– अगर आप रोज सुबह ऑफिस जाने से पहले 1 से 2 घंटे योग या म्यूजिक सिखाने में देते हैं तो आप 15 से 20 हजार रुपए प्रत्येक महीने बड़े आराम से कमा सकते हैं.

3. अंग्रेजी-हिंदी ट्रांसलेटर

अगर आपकी हिंदी या अंग्रेजी में से किसी एक भाषा पर अच्छी पकड़ है तो आप घर बैठे ट्रांसलेटर के तौर पर पार्ट टाइम जॉब कर सकते हैं. अंग्रेजी से हिंदी या हिंदी से अंग्रेजी ट्रांसलेटर्स की मांग तेजी से बढ़ी है. इसमें आपको प्रत्येक शब्‍द के अनुसार पैसे मिलते हैं.

ट्रांसलेशन वर्क के लिए आप पीआर कंपनियों, ऐड एजेंसियों, बुक पब्लिशिंग कंपनी, सरकारी विभागों से ले सकते हैं. इन दिनों हॉलीवुड की फिल्मों की हिंदी में डबिंग बढ़ी है. ट्रांसलेशन वर्क के लिए इस काम से जुड़े प्रोडक्शन हाउस से संपर्क कर सकते हैं.

ऐसे कर सकते हैं कमाई

– अगर आप अंग्रेजी से हिंदी करते हैं तो औसतन 1 रुपए प्रति शब्द के हिसाब से पैसे मिलते हैं.

– काम की क्वालिटी के हिसाब से इसके लिए 5 रुपए प्रति शब्द तक मिल सकते हैं.

– ऐसे में आप घर से रोज दो घंटे काम करके लगभग 1 हजार से 5 हजार रुपए प्रति दिन कमा सकते हैं.

– अगर महीने के 20 दिन भी आप काम करते हैं तो करीब 20 हजार से 1 लाख रुपए तक कमा कर सकते हैं.

4. डे केयर सेंटर

महिलाओं के लिए पार्ट टाइम जॉब के रूम में चाइल्ड केयर एक बेहतर ऑप्शन है. अगर, आपको बच्‍चों से प्‍यार है तो चाइल्ड केयर सेंटर खोल कर अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं. आज के समय में ज्‍यादातर पैरेंट्स वर्किंग हैं. ऐसे में बच्‍चों को स्‍कूल से छूटने के बाद चाइल्ड केयर सेंटर में रखना उनकी मजबूरी है. पर ध्यान रहे बच्चों के आने के साथ ही जिम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ जाती हैं.

इतनी होती है कमाई

– चाइल्ड केयर सेंटर में कुछ घंटे बच्चे रखने की फीस 1 से 2 हजार रुपए के बीच होती है.

– अगर, आप अपने आसपास के 10 बच्‍चों को यह सर्विस देते हैं तो महीने में 10 से 15 हजार रुपए आसानी से कमा सकते हैं.

तकनीक से तरक्की खेती के कचरे को बनाएं कमाई का जरीया

चावल निकालने के बाद बची धान की भूसी पहले भड़भूजों की भट्ठी झोंकने में जलावन के काम आती थी, लेकिन अब मदुरै, तिरूनवैल्ली और नमक्कन आदि में उस से राइस ब्रान आयल यानी खाना पकाने में काम आने वाला कीमती तेल बन रहाहै. इसी तरह गेहूं का भूसा व गन्ने का कचरा जानवरों को चारे में खिलाते थे, लेकिन अब उत्तराखंड के काशीपुर में उस से उम्दा जैव ईंधन 2जी एथनाल व लिग्निन बन रहा है. फिर भी खेती के कचरे को बेकार का कूड़ा समझ कर ज्यादातर किसान उसे खेतों में जला देते हैं, लेकिन उसी कचरे से अब बायोमास गैसीफिकेशन के पावर प्लांट चल रहेहैं. उन में बिजली बन रहीहै, जो राजस्थान के जयपुर व कोटा में, पंजाब के नकोदर व मोरिंडा में और बिहार आदि राज्यों के हजारों गांवों में घरों को रोशन कर रहीहै. स्वीडन ऐसा मुल्क है, जो बिजली बनाने के लिए दूसरे मुल्कों से हरा कचरा खरीद रह है.

तकनीकी करामात से आ रहे बदलाव के ये तो बस चंद नमूने हैं. खेती का जो कचरा गांवों मेंछप्पर डालने, जानवरों को खिलाने या कंपोस्ट खाद बनाने में काम आताथा, अब उस से कागज बनाने वाली लुग्दी, बोर्ड व पैकिंग मैटीरियल जैसी बहुत सी चीजें बन रही हैं. साथ ही खेती का कचरा मशरूम की खेती में भी इस्तेमाल किया जाता है. धान की भूसी से तेल व सिलकान, नारियल के रेशे से फाइबर गद्दे, नारियल के छिलके से पाउडर, बटन व बर्तन और चाय के कचरे से कैफीन बनाया जाताहै यानी खेती के कचरे में बहुत सी गुंजाइश बाकीहै. खेती के कचरे से डीजल व कोयले की जगह भट्ठी में जलने वाली ठोस ब्रिकेट्स यानी गुल्ली अपने देश में बखूबी बन व बिक रही है. खेती के कचरे की राख से मजबूत ईंटें व सीमेंट बनाया जा सकताहै.

जानकारी की कमी से भारत में भले ही ज्यादातर किसान खेती के कचरे को ज्यादा अहमियत न देते हों, लेकिन अमीर मुल्कों में कचरे को बदल कर फिर से काम आने लायक बना दिया जाता है. इस काम में कच्चा माल मुफ्त या किफायती होने से लागत कम व फायदा ज्यादा होता है. नई तकनीकों ने खेती के कचरे का बेहतर इस्तेमाल करने के कई रास्ते खोल दिए हैं. लिहाजा किसानों कोभरपूर फायदा उठाना चाहिए.

कचरा है सोने की खान

अमीर मुल्कों में डब्बाबंद चीजें ज्यादा खाते हैं, लेकिन भारत में हर व्यक्ति औसतन 500 ग्राम फल, सब्जी आदि का हरा कचरा रोज कूड़े में फेंकताहै. यानी कचरे का भरपूर कच्चा माल मौजूद है, जिस से खाद, गैस व बिजली बनाई जा सकतीहै. खेती के कचरे को रीसाइकिल करने का काम नामुमकिन या मुश्किल नही है. खेती के कचरे का सही निबटान करना बेशक एक बड़ी समस्या है. लिहाजा इस का जल्द, कारगर व किफायती हल खोजना बेहद जरूरी है. खेती के कचरे का रखरखाव व इस्तेमाल सही ढंग से न होने से भी किसानों की आमदनी कम है.

किसानों का नजरिया अगर खोजी, नया व कारोबारी हो जाए, तो खेती का कचरा सोने की खान है. देश के 15 राज्यों में बायोमास से 4831 मेगावाट बिजली बनाई जा रहीहै. गन्ने की खोई से 5000 मेगावाट व खेती के कचरे से 17000 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती है. उसे नेशनल ग्रिड को बेच कर किसान करोड़ों रुपए कमा सकतेहैं. 10 क्विंटल कचरे से 300 लीटर एथनाल बन रहाहै. लिहाजा खेती के कचरे को जलाने की जगह उस से पैसा कमाया जा सकता है, लेकिन इस के लिए किसानों को उद्यमी भी बनना होगा. फसलों की कटाई के बाद तने, डंठल, ठूंठ, छिलके व पत्ती आदि के रूप में बहुत सा कचरा बच जाताहै. खेती में तरक्की से पैदावार बढ़ी है. उसी हिसाब से कचरा भी बढ़ रहा है. खेती के तौरतरीके भी बदले हैं. उस से भी खेती के कचरे में इजाफा हो रहा है. मसलन गेहूं, धान वगैरह की कटाई अब कंबाइन मशीनों से ज्यादा होने लगी है. लिहाजा फसलों के बकाया हिस्से खेतों में ही खड़े रह जातेहैं. उन्हें ढोना व निबटाना बहुत टेढ़ी खीर है.

गेहूं का भूसा, धान की पुआल, गन्ने की पत्तियां, मक्के की गिल्ली और दलहन, तिलहन व कपास आदि रेशा फसलों का करीब 5000 टन कचरा हर साल बचताहै. इस में तकरीबन चौथाई हिस्सा जानवरों को चारा खिलाने, खाद बनाने व छप्पर आदि डालने में काम आ जाता है. बाकी बचे 3 चौथाई कचरे को ज्यादातर किसान बेकार मान कर खेतों में जला कर फारिग हो जातेहैं, लेकिन इस से सेहत व माहौल से जुड़े कई मसले बढ़ जाते हैं. जला कर कचरा निबटाने का तरीका सदियों पुराना व बहुत नुकसानदायक है. इस जलावन से माहौल बिगड़ता है. बीते नवंबर में दिल्ली व आसपास धुंध के घने बादल छाने से सांस लेना दूभर हो गया था. आगे यह समस्या और बढ़ सकतीहै. लिहाजा आबोहवा को बचाने व खेती से ज्यादा कमाने के लिए कचरे का बेहतर इस्तेमाल करना लाजिम है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के बागबानी महकमे ने ऐसे कई तरीके निकाले हैं, जिन से कचरा कम निकलता है.

चाहिए नया नजरिया

उद्योगधंधों में छीजन रोक कर लागत घटाने व फायदा बढ़ाने के लिए वेस्ट मैनेजमेंट यानी कचरा प्रबंधन, रीसाइकलिंग यानी दोबारा इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहाहै. कृषि अपशिष्ट प्रबंधन यानी खेती के कचरे का सही इंतजाम करना भी जरूरी है. कचरे को फायदेमंद बनाने के बारे में किसानों को भी जागरूक होना चाहिए. इंतजाम के तहत हर छोटी से छोटी छीजन को रोकने व उसे फायदे में तब्दील करने पर जोर दिया जाता है. अपने देश में ज्यादातर किसान गरीब, कम पढ़े व पुरानी लीक पर चलने के आदी हैं. वे पोस्ट हार्वेस्ट टैक्नोलोजी यानी कटाई के बाद की तकनीकों की जगह आज भी सदियों पुराने घिसेपिटे तरीके ही अपनाते रहतेहैं. इसी कारण वे अपनी उपज की कीमत नहीं बढ़ा पाते, वे उपज की प्रोसेसिंग व खेती के कचरे का सही इंतजाम व इस्तेमाल भी नहीं कर पाते.

ज्यादातर किसानों में जागरूकता की कमीहै. उन्हें खेती के कचरे के बेहतर इस्तेमाल की तनकीकी जानकारी नहींहै. ऊपर से सरकारी मुलाजिमों का निकम्मापन, भ्रष्टाचार व ट्रेनिंग की कमी रास्ते के पत्थर हैं. लिहाजा खेती का कचरा फुजूल में बरबाद हो जाताहै. इस से किसानों को माली नुकसान होताहै, गंदगी बढ़तीहै व आबोहवा खराब होती है. प्रदूषण बढ़ने की वजह से सरकार ने खेतों में कचरा जलाने पर पाबंदी लगा दीहै. उत्तर भारत में हालात ज्यादा खराबहैं. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के खेतों में कचरा जलाने वाले किसानों से 15000 रुपए तक जुर्माना वसूलने व खेती का कचरा निबटाने के लिए मशीनें मुहैया कराने का आदेश दिया है. अब सरकार को ऐसी मशीनों पर दी जाने वाली छूट बढ़ानी चाहिए. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने खेती का कचरा बचाने के लिए राष्ट्रीय पुआल नीति बनाई थी. इस के तहत केंद्र के वन एवं पर्यावरण, ग्रामीण विकास व खेती के महकमे राज्यों को माली इमदाद देंगे, ताकि खेती के कचरे का रखरखाव आसान करने की गरज से उसे ठोस पिंडों में बदला जा सके. लेकिन सरकारी स्कीमें कागजों में उलझी रहती हैं. खेती के कचरे से उम्दा, असरदार व किफायती खाद बनाई जा सकती है.

अकसर किसानों को दूसरी फसलें बोने की जल्दी रहती है, लिहाजा वे कचरे को खेतों में सड़ा कर उस की खाद बनाने के मुकाबले उसे जलाने को सस्ता व आसान काम मानते हैं. मेरठ के किसान महेंद्र की दलील है कि फसलों की जड़ें खेत में जलाने से कीड़ेमकोड़े व उन के अंडे भी जल कर खत्म हो जातेहैं, लिहाजा अगली फसल पर हमला नहीं होता.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के वैज्ञानिक खेतों में कचरा जलाना नुकसानदायक मानतेहैं. चूंकि इस से मिट्टी को फायदा पहुंचाने वाले जीव खत्म होतेहैं, लिहाजा किसान खेती का कचरा खेत में दबा कर सड़ा दें व बाद में जुताई कर दें तो वह जीवांश खाद में बदल जाताहै. रोटावेटर मशीन कचरे को काट कर मिट्टी में मिला देती है. आलू व मूंगफली की जड़ों, मूंग व उड़द की डंठलों और केले के कचरे आदि से बहुत बढि़या कंपोस्ट खाद बनती है. खेती के कचरे को किसी गड्ढे में डाल कर उस में थोड़ा पानी व केंचुए डालने से वर्मी कंपोस्ट बन जाती है, लेकिन ज्यादातर किसान खेती के कचरे से खाद बनाने को झंझट व अंगरेजी खाद डालने को आसान मानतेहैं.

ऐसा करें किसान

तकनीक की बदौलत तमाम मुल्कों में अब कचरे का बाजार तेजी से बढ़ रहाहै. इस में अरबों रुपए की सालाना खरीदफरोख्त होती है. लिहाजा बहुत से मुल्कों में कचरा प्रबंधन, उस के दोबारा इस्तेमाल व कचरे से बने उत्पादों पर खास ध्यान दिया जा रहा है. अपने देश में भी नई तकनीकें, सरकारी सहूलियतें व मशीनें मौजूद हैं. लिहाजा किसान गांव में ही कचरे की कीमत बढ़ाने वाली इकाइयां लगा कर खेती से ज्यादा धन कमा सकते हैं. खेती के कचरे से उत्पाद बनाने के लिए किसान पहले माहिरों व जानकारों से मिलें, कचरा प्रबंधन व उसे रीसाइकिल करने की पूरी जानकारी हासिल करें, पूरी तरह से इस काम को सीखें और तब पहले छोटे पैमाने पर शुरुआत करें. तजरबे के साथसाथ वे इस काम को और भी आगे बढ़ाते जाएं.

कृषि अपशिष्ट प्रबंधन आदि के बारे में खेती के रिसर्च स्टेशनों, कृषि विज्ञान केंद्रों व जिलों की नवीकरणीय उर्जा एजेंसियों से जानकारी मिल सकती है. पंजाब के कपूरथला में सरदार स्वर्ण सिंह के नाम पर चल रहे जैव ऊर्जा के राष्ट्रीय संस्थान में नई तकनीकों के बारे में बढ़ावा व ट्रेनिंग देने आदि का काम होताहै.

पूंजी इस तरह जुटाएं

किसान अकेले या आपस में मिल कर पूंजी का इंतजाम कर सकतेहैं. सहकारिता की तर्ज पर इफको, कृभको, कैंपको व अमूल आदि की तरह से ऐसे कारखाने लगा सकतेहैं, जिन में खेती के कचरे का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके. खाने लायक व चारा उपज के अलावा होने वाली पैदावार व खरपतवारों से जैव ऊर्जा व ईंधन बनाने वाली बायोमास यूनिटों को सरकार बढ़ावा दे रही है. लिहाजा सरकारी स्कीमों का फायदा उठाया जा सकताहै. केंद्र सरकार का नवीकरण ऊर्जा महकमा भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास संस्था, इरेडा, लोधी रोड, नई दिल्ली फोन 911124682214 के जरीए अपनी स्कीमों के तहत पूंजी के लिए माली इमदाद 15 करोड़ रुपए तक

कर्ज व करों की छूट जैसी कई भारीभरकम सहूलियतें देता है. जरूरत आगे बढ़ कर पहल करने व फायदा उठाने की है.

मशीनें

खेती के कचरे की प्रोसेसिंग कर के उस की गैस से बिजली व ठोस से ब्रिकेट बनाने में काम आने वाली मशीनों व औजारों आदि के लिए उद्यमी किसान निम्न पतों पर संपर्क कर सकतेहैं:

* मैं. एडवांस हाईड्राउ टेक, प्रा. लि. बी 91, मंगोलपुरी, इंडस्ट्रियल एरिया, फेज 2, नई दिल्ली-110034. फोन 91-11-4757100-99

* मैं. टेक्नोकैम इंजीनियरिंग प्रा. लि. चैतन्यपुरी, हैदराबाद, मो. 08071676221.

* मैं. अली इंजी, वर्क्स, अहमदगढ़, लुधियाना, मो. 08071682911.

* मैं. रौनक इंजी. 275, निकट ग्रेविटी कास्टिंग, राजकोट, गुजरात, मो. : 08048601411.

किसानों की तकदीर बदलने में लगे हामिद को मिले कई सम्मान

बिहार में औषधीय व सुगंधित पौधों की खेती की ओर किसानों का झुकाव ज्यादा हुआ है, जिस का मुख्य कारण है लागत कम और मुनाफा ज्यादा. हालांकि राज्य स्तर पर इन पौधों या इन के बीजों के साथ इन की खेती से होने वाले उत्पादन की खरीदबिक्री की सुविधा न के बराबर ही है, पर किसानों में कुछ कर गुजरने की ललक ने उन्हें इन की खेती की जानकारी व इन के उत्पादों की बिक्री के लिए दूसरे प्रदेशों तक पहुंचा दिया. इसी का नतीजा है कि अब राज्य के प्रगतिशील किसान नई ऊंचाइयां छूने की ओर बढ़ रहे?हैं.

परंपरागत खेती जैसे दलहन, तिलहन, धान व गेहूं आदि से इतनी कम आय होती है कि किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन कर रह गई?है. परंतु कुछ प्रयोगधर्मी किसान हैं, जो खेती में नफानुकसान की ज्यादा चिंता न कर के नित नए प्रयोग करते रहते हैं. इन्हीं में से एक किसान हैं राज्य के सीवान जिले के हसनपुर प्रखंड के लहेजी गांव निवासी मोहम्द हामिद खां. वे जिला व राज्य स्तरीय कई पुरस्कार हासिल कर चुके हैं. हामिद का कहना है कि किसान वैसी खेती करना चाहते हैं, जिस में समय कम व मुनाफा अधिक हो. जिले के अधिकतर किसान मेंथा, घृतकुमारी, पोपुलर व पेपट्रा की खेती कर रहे?हैं. इन का बाजार देश के अलावा विदेशों में भी है. कीमत भी अच्छी मिल जाती है. पेपट्रा 1500 रुपए प्रति किलोग्राम और मेंथा 900 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता है, इसलिए किसान इन की खेती ज्यादा कर के मुनाफा कर रहे हैं.

किसानों को कम लागत  में हो रही लाखों की आय : आज से करीब 3 साल पहले खस की खेती की शुरुआत करने वाले हामिद खां सीवान, छपरा व गोपालगंज आदि जिलों के दर्जनों किसानों को प्रशिक्षण दे कर खस के अलावा मेंथा, पेपट्रा, घृतकुमारी व पोपुलर की खेती करा रहे हैं, जिस से इन किसानों के जीवन की तसवीर बदल गई?है. इन की खेती से किसानों को कम लागत में हर साल लाखों रुपए की आय हो रही है.

खस, सतावर, कालमेघ, मेंथा, पामारोजा, सेट्रोनेला, लेमनग्रास, आर्टीमीसिया व कोलियस आदि की खेती से किसानों में कामयाबी की उम्मीद जगी है. बिहार के सीवान, छपरा व गोपालगंज जिलों में अभी लगभग 10 एकड़ में खस की खेती कर के तेल का उत्पादन किया जा रहा है. यह फसल 1 साल में तैयार हो जाती है. यदि अच्छी फसल हुई तो प्रति कट्ठा (1350 वर्ग फुट) 400 से 700 ग्राम तक तेल निकलता है, जिस की कीमत 15000 से 18000 रुपए प्रति लीटर होती है. फरवरी में इस फसल की खुदाई कर के आसवन विधि द्वारा तेल निकाला जाता है. इस मौसम में तेल की मात्रा ज्यादा मिलती है. जड़ निकाल कर बचे हुए पौधों को फिर से नई फसल के लिए खेत में लगाया जा सकता है.

इत्र बनाने वाली कंपनियां खरीदार : खस की खेती करने वाले ऐसे किसान जिन  के पास तेल निकालने का साधन नहीं है, उन के द्वारा उत्पादित जड़ें मोहम्द हामिद लगभग 6000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदने के साथ ही 1000 से ले कर, 1500 रुपए प्रति कट्ठे की दर से खेत में लगी फसल खरीदने के बाद जड़ों की खुदाई कर के खुद तेल निकालते हैं. इस का तेल लखनऊ व बाराबंकी आदि स्थानों पर इत्र बनाने वाली कंपनियां और व्यापारी 10000 से 12000 रुपए प्रति लीटर खरीद कर ले जाते हैं.

हामिद सीमैप लखनऊ से 2 रुपए प्रति पौधे की दर से पौधे ला कर नर्सरी तैयार करने के बाद 1 रुपए प्रति पौधे की दर से किसानों को बेचते हैं. वैसे तो इस की रोपाई पूरे साल की जा सकती है, परंतु दिसंबर से मार्च तक का समय इस की रोपाई के लिए ज्यादा अच्छा होता है. इस की खेती 6 महीने तक जलजमाव वाले खेत में भी की जा सकती है. कई विशेषज्ञों का ऐसा भी मानना है कि खस के पौधे यदि 2-3 महीने तक पानी में पूरी तरह से डूबे रह जाते हैं, तब भी इस की फसल पर कोई खराब असर नहीं पड़ता है.

जुलाई में रोपाई

सीमैप लखनऊ के वैज्ञानिक वीरेंद्र कुमार सिंह तोमर का कहना है कि राज्य की मिट्टी, विशेष रूप से दियारा की मिट्टी के लिए यह फसल ज्यादा लाभकारी है.

जलजमाव वाली जमीन में फरवरी व मार्च और सामान्य जमीन में जुलाई में बारिश होने पर खस की रोपाई कर के अच्छी फसल तैयार की जा सकती है. यदि खस की नर्सरी तैयार करनी हो तो फरवरी या मार्च में पौधे लगाने के 1 महीने बाद डीएपी खाद की एक सीमति मात्रा डाल कर नर्सरी की गुड़ाई व सिंचाई के साथ 3 महीने में 1 पौधे में 18 से 20 कल्ले तक निकल आते हैं, जिन्हें बाद में दूसरे खेतों में फसल के रूप में लगाया जाना चाहिए. राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर के वैज्ञानिक डा. हांडू का कहना है कि बिहार की मिट्टी व जलवायु खस की खेती के लिए सही है. यहां के किसान इस की खेती कर के अपनी माली हालत सुधार सकते हैं. साथ ही उन का यह भी मानना है कि खस की खेती पर बाढ़ व सूखे का

ज्यादा असर नहीं होता है. इस की खेती बंजर जमीन में भी की जा सकती है. पशु इस के कड़े डंठलों को नहीं खाते हैं, इसलिए इस की फसल की ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती है. वैज्ञानिकों का मिलता रहा सहयोग : अपनी इस सफलता का श्रेय सीमैप लखनऊ के वैज्ञानिक डा. कलीम अहमद, वैज्ञानिक वीरेंद्र कुमार सिंह तोमर व डा. एचपी सिंह आदि को देते हुए हामिद कहते हैं कि यदि आज के प्रगतिशील किसान वैज्ञानिकों के सहयोग व अपनी सूझबूझ के साथ औषधीय खेती करें, तो अच्छी कमाई कर सकते हैं.

प्रति एकड़ 40000 रुपए की आय : हामिद खां ने बताया कि खस, पोपुलर, घृतकुमारी, मेंथा व पेपट्रा की औषधीय खेती से 1 साल में प्रति एकड़ तकरीबन 40000 रुपए की आमदनी होती है. किसान यदि फरवरी में खस को काट कर मेंथा की सह फसल लेते हैं, तो प्रति एकड़ 15000 से 20000 रुपए की अलग से आमदनी की जा सकती है.

प्रयोग के तौर पर हामिद पापुलर के साथ पामारोजा, सेट्रोनेला व खस की खेती कर रहे हैं. हामिद द्वारा 4 एकड़ में 6 से 14 फुट की दूरी पर पापुलर लगाया गया है, जिस के बीच में सह फसल ली जाती है. उन का मानना है कि पापुलर के 400 पौधे प्रति एकड़ लगा कर 7 सालों में 3000 रुपए प्रति पेड़ की दर से लाखों रुपए की आय हासिल की जा सकती है.

खस के पौधों में दीमक लगती है, जिस से बचाव के लिए ट्राइसेल 20 ईसी 200 ग्राम प्रति एकड़ डाल कर खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए. खस के पौधे से पौधे की दूरी डेढ़ फुट व लाइन से लाइन की दूरी 2 फुट की होनी चाहिए.

केंद्रीय औषिध एवं सगंध पौधा संस्थान, लखनऊ द्वारा आयोजित औषधीय एवं सुगंध पौधों के उत्पादन हेतु उन्नत प्रौद्योगिकी पर प्रशिक्षण कार्यक्रम लहेली गांव में किया गया था, जिस से यहां के किसानों को काफी जानकारी मिली. हामिद द्वारा ढाई लाख की लागत से स्टील डिस्टलेशन प्लांट भी लगाया गया है. 1 टन की कूवत वाले इस प्लांट में 8 क्विंटल खस की जड़ें भर कर 72 घंटे में तेल निकाला जाता है. इसी प्लांट से लेमनग्रास, पामारोजा, सिट्रोनेला व मेंथा का भी तेल निकाला जाता है. अधिक जानकरी के लिए आप मोबाइल नंबर 09708250037 पर संपर्क कर सकते हैं.

पटवारी तेरी महिमा निराली

पटवारी राजस्व महकमे का भले ही एक मामूली कर्मचारी होताहै, लेकिन उस के कारनामे एक से बढ़ कर एकहैं. छोटे ही नहीं, बल्कि बड़े किसानों की गांठ से भी वह पैसा निकलवाने का तरीका बखूबी जानता है. पटवारी को बगैर भेंट चढ़ाए किसानों के जूते घिस जाते हैं, लेकिन काम नहीं होता. पटवारी की कलम का मारा किसान जिंदगी भर मुकदमे में उलझा रहता है. इसलिए झंझट से बचने के लिए लोग पटवारी को नाखुश नहीं करते और उस की मांग पूरी करते रहतेहैं.

बीच का खेत नहीं सूखा

पिछले साल यानी 2016 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सूबे सूखे की चपेट में थे. इस आपदा की मार से दोनों सूबे के कई किसानों ने मौत को गले लगा लिया. जो बचे वे पटवारियों की करामात के कारण खून के आंसू रोते रहे. सूखा पटवारियों के लिए कमाई का सुनहरा मौका था. जिन किसानों ने पटवारियों को खुश कर दिया, उन का मुआवजा बन गया, लेकिन जिन्होंने भेंट नहीं चढ़ाई, वे भटकते रह गए. सतना जिले के एक किसान सोमेश तिवारी ने बताया, ‘एक बड़े खेत के 3 हिस्से हैं. मुझे खेत के बीच में हिस्सा मिला है, लेकिन मैं ने उसे घूस नहीं दी थी. उस ने जो रिपोर्ट पेश की थी, उस में लिखाथा कि सोमेश की फसल को नुकसान नहीं हुआ है. सोचिए कि ऐसा कैसे हो सकताहै सूखे से तो पूरा खेत ही प्रभावित होगा न बीच की फसल सूखे से कैसे बच जाएगी मैं ने पटवारी की शिकायत कलेक्टर, विधायक और कृषि मंत्री सेभी की. अखबारों में खबर भी छपवाई, लेकिन उस का बाल बांका भी नहीं हुआ. मैं आज तक मुआवजा नहीं पा सका.’

बाढ़ से तबाही, मुआवजा न के बराबर

पिछले साल ही जुलाईअगस्त में मध्य प्रदेश के रीवा जिले में बाढ़ आई. शहर में तो तबाही हुई ही, कई गांव भी बरबाद हो गए. रीवा से 24-25 किलोमीटर दूर हटवा गांव से हो कर नई सड़क बनाई गईहै. उस सड़क में तकनीकी खामी यह है कि उस की ऊंचाई घरों से काफी अधिकहै. चूंकि मकान नीचे हो गए और नाले को पाट दिया गया, इसलिए बरसात का पानी महाना नदी में न जा कर लोगों के घरों में भर गया. इस से कई घरों में चूल्हे नहीं जले. कई मकान ढह गए. कुछ लोगों को पंचायत से खाना दिया गया और यहांवहां रहने का इंतजाम किया गया. लेकिन जब नुकसान की जांच होने लगी तो पटवारी ने अपनी करामात दिखा दी. जिन्हें कम नुकसान हुआ था, उन्हें ज्यादा मुआवजा दिलवा दिया और जो तबाह हो गए, उन्हें न के बराबर रकम मिली. कुछ लोगों ने दूर तक लिखापढ़ी की, मुख्यमंत्री तक बात पहुंचाई, लेकिन कोई हल नहीं निकला.

सरपंच के जरीए पहुंचताहै पैसा

मैं अपना एक तजरबा साझा कर रहा हूं. साल 2006 में मेरे पिताजी गुजर गए, तो मैं पटवारी के पास वारसाना (कागजी तौर पर पिता का वारिस बनना) कराने गया. पटवारी ने कहा, ‘आप सरपंच को पूरी जानकारी दीजिए, मसलन कितने भाईबहन हैं, माताजी हों तो उन का विवरण दीजिए. यह सब कर के आइए तो काम हो जाएगा.’

मैं अपने चचेरे भाई के साथ सरपंच के पास गया, ताकि काम आसानी से हो जाए. वहां कई लोग पहले से अलगअलग काम ले कर बैठे हुए थे. सरपंच पैसे ले कर लोगों के काम निबटा रहा था. वारसाने के लिए 500 से 1000 रुपए लिए जा रहे थे. यह बता दूूं कि मेरे गांव के लोग बहनबेटियों के नाम वारसाने में दर्ज नहीं कराते. यह पटवारी और सरपंच की कमाई का जरीया होताहै. पैसे ले कर बहनबेटी को मरा घोषित करने में उन्हें देर नहीं लगती. मेरा घर चूंकि मध्य प्रदेश में है और मैं छत्तीसगढ़ में सालों से रहता हूं, इसलिए सरपंच मुझे ठीक से नहीं जानता था. मेरे चचेरे भाई ने उसे मेरा परिचय दिया तो वह बोला, ‘गांव के हेडमास्टर से लिखवा कर लाइए कि आप कितने भाईबहन हैं, तो फिर मैं दस्तखत कर दूंगा. मैं तो आप कोठीक से जानता नहीं. आप गलत जानकारी देंगे तो मैं फंस जाऊंगा.’

इस पर मेरे चचेरे भाई ने सरपंच को हड़काया, ‘इन्हें कैसे नहीं जानते वोट डालने ये रायपुर से आएथे. सरपंच बन गए तोभूल गए जल्दी से करो काम इन का. ये नहीं जाएंगे किसी हेडमास्टर के पास. जैसे सब का काम कर रहे हो, वैसे ही इन का भी कर दो. ले लो जो तुम्हारा हिसाबकिताब होता हो.’

‘नहीं, भाई गंगा मैया की कसम खा कर कहता हूं कि मैं किसी का एक पैसा नहीं लेता, जनता की सेवा फ्री करता हूं. लेकिन सचिव और पटवारी नहीं मानते न, इसलिए 500 रुपए जमा करा दीजिए, काम हो जाएगा. पटवारी के पास भी नहीं जाना पड़ेगा, जो मैं कहता हूं, वही वे करतेहैं,’ सरपंच ने नरम पड़ कर मेरे चचेरे भाई से पूछा, ‘इन की बहनों का क्या करनाहै 2 बहनें हैं न उन्हें मृत घोषित कराना है या उन का नाम लिखनाहै.’

‘नहीं सरपंच साहब, बहनों ने लिख कर दिया है कि उन्हें हिस्सा नहीं चाहिए. उन्हें मरी घोषित करूंगा तो वे बेहद दुखी होंगी.’

मैं ने यह कह कर बहनों का लिखा हुआ कागज सरपंच के सामने रख दिया.

‘ठीकहै. आप पत्रकार हैं, पैसे मत दीजिए. मैं अपनी तरफ से पटवारी को दे दूंगा. वे मानने वाले नहीं, लेकिन आप का काम हो जाएगा,’ सरपंच न जाने क्या सोच कर बोला और

मुझे बख्श दिया. कुछ दिनों बाद मेरा वारसाना बन गया.

पटवारियों के कर्मचारी

ज्यादातर पटवारी सरकारी काम कराने के लिए निजी कर्मचारी रखतेहैं. वे कर्मचारी पटवारी के मकान में काम करतेहैं. उन कर्मचारियों में बेरोजगार युवक और

पढ़नेलिखने वाले बच्चे होतेहैं. किसान और दूसरे लोग उसी कर्मचारी को भेंटचढ़ावा चढ़ातेहैं. कर्मचारी के मार्फत पटवारी पैसे लेतेहैं. कर्मचारी रखने के सवाल पर एक पटवारी ने बताया, ‘काम इतना ज्यादा होताहै कि मैं अकेले नहीं कर पाता, इसलिए निजी तौर पर सहयोगी रख लियाहै. इस से किसानों और छात्रछात्राओं के काम नहीं अटकते, लोग परेशान नहीं होते और कुछ पैसे एक बेरोजगार को भी मिल जातेहैं. मैं अपने सहयोगी से पैसे नहीं मांगता. जो दे देताहै, वह रख लेता हूं.’

जब पटवारी को पड़ गई मार

मैं एक ऐसे पटवारी को जानता हूं, जो रंगीनमिजाज था. यह बता दूं कि गांवों मेंपटवारी किसी बड़े आदमी के घर में ही रुकतेहैं. जहां वे रुकतेहैं, वहां उन की दामाद की तरह खातिरदारी होती है. जब वे आतेहैं, तो चौकीदार गांव में घूमघूम कर लोगों को इस की जानकारी देता है. किसान वहीं जा कर अपना काम करातेहैं. एक पटवारी ऐसे घर में रुकते थे., जहां कई जवान लड़कियां थीं. उस घर में उस युवा पटवारी की खूब आवभगत होती थी. कहने को तो पटवारी उस घर की बेटियों को बहन मानता था, लेकिन बाद में उस की करतूत उजागर हो गई. एक लड़की को गर्भ ठहर गया. जब पता चला कि यह करतूत पटवारी ने की है, तो उस की जम कर धुनाई हुई. सारा खायापीया निकल आया. नौकरी जातेजाते भी बची. लेदे कर उस ने वहां से अपना तबादला कराया, तब कहीं जान बची.

नमस्कार का जवाब नहीं देते

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में एक पटवारी थे. उन का किस्सा उन के दामाद और मेरे पत्रकार साथी ने सुनाया, ‘मेरे ससुर साहब एक बार किसी बड़े अधिकारी से खफा हो गए. उन्होंने उन के आलीशान बंगले का कुछ हिस्सा अतिक्रमण घोषित कर दिया. अफसर परेशान. मकान टूटने की नौबत आ गई. वेभागेभागे कलेक्टर के पास गए. कलेक्टर ने मेरे ससुर साहब को बुलाया. चूंकि कलेक्टर मेरे ससुर साहब से बखूबी परिचित थे, इसलिए मुसकरा कर पूछा, ‘पंडितजी, बात क्याहै क्यों खफा हैं इन से’ इस पर मेरे ससुर साहब बोले, ‘बात यहहै साहब कि मैं इन्हें नमस्कार करता हूं, तो ये उस का जवाब नहीं देते. इसलिए ऐसी नाप कर दी कि इन का बंगला अतिक्रमण में आ गया.’ यह सुनना था कि कलेक्टर ने ठहाके लगाए. उस अफसर ने माफी मांगी, तब जा कर ससुर साहब ने सही नाप की और बंगला टूटने से बच गया.’

जायद में ज्वार की खेती

भारत में दुधारू पशुओं की संख्या में खासा इजाफा हुआ है. 19वीं पशुगणना 2012 के अनुसार देश में दुधारू पशुओं की संख्या 6.52 फीसदी बढ़ गई है. दूध उत्पादक देशों की फेहरिस्त में भारत का पहला स्थान है, मगर फिर भी प्रति पशु दुग्ध उत्पादकता में विकसित देशों से हम बहुत पीछे हैं. इस का मुख्य कारण पशुओं को हरा चारा न मिल पाना है. जायद के मौसम में हरे चारे की खासतौर पर कमी होती है. ऐसे में जायद में हरे चारे (ज्वार) की वैज्ञानिक ढंग से खेती कर के अच्छाखासा लाभ कमाया जा सकता है.

ज्वार को देश में अलगअलग नामों से जानते हैं. इसे उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय भाषा में कर्बी, मराठी में ज्वारी, कन्नड़ में जोर और तेलुगू में जोन्ना कहते हैं. महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान व गुजरात जैसे सूबों में इस की खूब खेती की जाती है. उत्तरी भारत में इस की खेती खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है. खास बात यह है कि इसे कम बारिश वाले इलाकों में भी उगाया जा सकता है. चारे के अलावा इसे अन्न और जैव उर्जा के लिए भी इस्तेमाल करते हैं. इस से साइलेज भी तैयार किया जाता है. इस की खास किस्म से स्टार्च व दानों से अल्कोहल भी हासिल किया जाता है. यही कारण है कि खाद्यान्न फसलों में कुल बोए जाने वाले रकबे में इस का तीसरा स्थान है.

मिट्टी : ज्वार की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट और हलकी व औसत काली मिट्टी जिस का पीएच मान सामान्य हो बेहतर होती है. अगर अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय मिट्टी हो तो ऐसे स्थानों पर इस की खेती करना सही नहीं होता.

खेत की तैयारी : पलेवा कर के पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से या हैरो से कर के 1 से 2 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए.

बोआई का समय : हरे चारे के लिए जायद में बोआई का सही समय फरवरी के अंतिम हफ्ते से ले कर मार्च के अंत तक होताहै.

बीज दर : मल्टीकट (कई बार कटने वाली) प्रजातियों के 25-30 किलोग्राम बीज और सिंगल कट (सिर्फ 1 बार कटने वाली) प्रजातियों के 30-40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए.

बीज उपचार : बीजजनित और मिट्टी रोगों से बचाव के लिए बोआई से पहले बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए.

बोआई का तरीका : ज्वार की ज्यादातर बोआई छिटकवां विधि से की जाती है, जो कि वैज्ञानिक तरीका नहीं है. बेहतर होगा कि इसे हल के पीछे कूड़ों में लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए बोएं.

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के बाद मिली रिपोर्ट के अनुसार ही करना चाहिए. यदि किसान के पास खूब सड़ी हुई गोबर की खाद, खली या कंपोस्ट वगैरह मौजूद हो, तो बोआई से 15-20 दिनों पहले इन का इस्तेमाल करें. सिंगल कट वाली प्रजातियों में 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन बोआई के 1 महीने बाद सही नमी होने पर छिड़क कर देना चाहिए. मल्टीकट वाली प्रजातियों में 60-70 किलोग्राम नाइट्रोजन व 40 किलोग्राम फास्फोरस बोआई के समय और 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन हर कटाई के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

सिंचाई : बारिश होने से पहले फसल की हर 8-12 दिनों के अंतराल पर या जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

खरपतवार नियंत्रण : फसल की बोआई के तुरंत बाद 1.5 किलोग्राम घुलनशील एट्राजिन 50 फीसदी या सिमेजिन को 1000 लीटर पानी में घोल कर अंकुरण से पहले खेत में छिड़काव करना चाहिए.

कटाई : पशुओं को उम्दा चारा खिलाने के लिए सिंगल कट फसल की कटाई 5 फीसदी फूल आने पर या 60-70 दिनों के बाद करनी चाहिए. वहीं दूसरी ओर मल्टी कट प्रजातियों की पहली कटाई सामान्य प्रजातियों से तकरीबन

10 दिनों पहले कर लेनी चाहिए और बाद की कटाई 30-35 दिनों के अंतराल पर जमीन की सतह से 6-8 सेंटीमीटर की (तकरीबन 4 अंगुल) ऊंचाई से करनी चाहिए. इस से कल्ले आसानी से निकलते हैं.

उपज : सिर्फ हरे चारे की बात की जाए तो मल्टी कट वाली प्रजाति की उपज तकरीबन 750-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है. वहीं सिंगल कट वाली प्रजातियों की उपज तकरीबन 250-450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती

ज्वार की कुछ उन्नत प्रजातियां

यूपी चरी 1 : सिंगल कट वाली यह प्रजाति पत्ती रोगों के लिए सहनशील है. इस का तना रसीला और मिठास वाला होता है. यह तेजी से बढ़ोतरी करने वाली अगेती प्रजाति है, जो पूरे भारत में उगाई जा सकतीहै. इस की उपज 330 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह प्रजाति 115 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जातीहै.

एचसी 171 : सिंगल कट वाली यह प्रजाति पत्ती रोगों और कीटों के लिए सहनशीलहै. इस का तना मध्यम मोटा, मीठा और रसीला होताहै. यह प्रजाति पूरे भारत में उगाई जा सकतीहै. इस की उपज 520 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह प्रजाति 105 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जातीहै.

पूसा चरी 1 : सिंगल कट वाली इस प्रजाति के बीज बहुत कठोर व सफेद होतेहैं. इस का तना रसीला और मध्यम मोटाई का होताहै. यह पूरे भारत में उगाई जा सकतीहै. इस की उपज 280 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह प्रजाति 105 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जातीहै.

एसएल 44 : सिंगल कट वाली इस प्रजाति का तना पतला, मिठास रहित व रसीला होताहै. इस की पत्तियां लंबी और मध्यम चौड़ाई की होतीहैं. इसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान  व उत्तर प्रदेश में उगाया जा सकताहै. इस की उपज 320 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह प्रजाति 75 से 100 दिनों में पक कर तैयार हो जातीहै.

पूसा चरी 23 : मल्टी कट वाली यह प्रजाति सूखा और पानी रुकने के प्रति सहनशील होतीहै. इस की पत्तियां संकरी, दाना नीलेलाल रंग का और तना पतला होताहै. यह पूरे भारत में उगाई जा सकतीहै. इस की उपज 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस के पकने में 95 से 100 दिनों का समय लगताहै.

आम का सफल उत्पादन और बागों की देखभाल

आम भारत के सब से खास फलों में से एकहै. यह एक ऐसा अनमोल फल है, जो सभी को भाताहै. आम में विटामिन ए व सी काफी मात्रा में होता है. इस फल से अमचूर, चटनी, अचार, स्क्वैश, जैम वगैरह बनाए जा सकते हैं. दूसरे देशों को आम भेजने के लिए इस की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना बहुत जरूरी है.

आम की कम उत्पादकता का खास कारण बाग लगाने के 8-10 सालों तक कम उपज हासिल होनाहै, क्योंकि शुरुआती साल में बौर कम आतेहैं और फसल कम होती है. इस तरह शुरू के कई सालों तक फायदेमंद उपज नहीं मिलतीहै और बाग में पेड़ों के बीच की जमीन पर दूसरी फसल उगा कर घाटा पूरा करना पड़ता है. अच्छी उपज हासिल करने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है.

जलवायु : आम की खेती उष्ण व उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में समुद्रतल से 600 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक की जातीहै. तीनों कृषि जलवायु क्षेत्रों में इस की खेती सफलतापूर्वक की जा सकतीहै. इस में फूल आने के समय बारिश होने पर फल कम बनते हैं और कीड़ों व बीमारियों का प्रकोप

बढ़ जाताहै. अधिक तेज हवा व आंधी द्वारा आम की फसल को नुकसान पहुंचता है.

जमीन : बलुई, पथरीली और जलभराव वाली जमीन में इस का उत्पादन लाभकारी नहींहै. आम की सफल खेती के लिए सही जल निकास वाली गहरी दोमट जमीन ही मुनासिब होती है. आम की पैदावार के लिए मिट्टी का पीएच 5.5-7.5 सही माना जाता है.

उम्दा किस्में

उत्तर भारत : दशहरी, लंगड़ा, चौसा, रतौल, बांबे ग्रीन, लखनऊ, सफेदा.

दक्षिण भारत: मलगोवा, तोतापुरी, बैगनपल्ली, नीलम, अलफांसो, सुवर्णरेखा, पाइरी.

पूर्वी भारत : दशहरी, फजली, गुलाबखास, किशनभाग, लंगड़ा, जरदालू, हिमसागर, बांबे ग्रीन.

पश्चिम भारत: अलफांसो, केसर, पाइरी, वनराज, जमादार.

उन्नत संकर : आम्रपाली, मल्लिका, अंबिका, रत्ना, अरुनिका.

मूलवृंत: सामान्य रूप से 1 साल पुराने देशी आम के बीजू पौधों का मूलवृंत के लिए इस्तेमाल किया जाता है. बहुभ्रूणीय मूलवृंत पर ग्राफ्ट किए गए पौधे समान आकार व गुण वाले होते हैं. बहुभ्रणीय मूलवृंत जैसे टर्पेटाइन, सावरे, विलाई कोलंबन, 13-1 व कुरुक्कन, उसरीली मिट्टियों के लिए अच्छे माने गए हैं. ये दक्षिण भारत में लोकप्रिय हो रहेहैं. उत्तर भारत में बहुभ्रूणीय मूलवृंतों के अभाव के कारण देशी आम की गुठलियों से बीजू पौध तैयार कर के मूलवृंत के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

पौधे तैयार करना : आम के बीजू पौध तैयार करने के लिए गुठलियों को जूनजुलाई में बो दिया जाताहै. नर्सरी में 8-10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सड़ी गोबर की खाद मिलानी चाहिए. आम के पौधे तैयार करने की विधियों में भेंट कलम, वीनियर ग्राफ्टिंग, सैफ्टवुड/क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग और स्टोन या इपीकोटिल ग्राफ्टिंग खास हैं. प्रचलित भेंट कलम विधि में कई कमियांहैं, लिहाजा इसे प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए. वीनियर व सौफ्टवुड/क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग द्वारा अच्छे किस्म के पौधे कम समय में तैयार होते हैं. दक्षिण भारत में 25×10 सेंटीमीटर की पौलीथिन की थैलियों में मूलवृंत तैयार कर के वीनियर/क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग कर केव्यावसायिक स्तर पर आम के पौधे तैयार किए जा रहेहैं. इस तकनीक को प्रोत्साहित करने की जरूरत है.

आम के पौधे कलम बंधन की तमाम विधियों द्वारा तैयार किए जा सकते हैं. इस में मूलवृंत के लिए 6 महीने से 1 साल के पौधे ठीक होतेहैं. आम की गुठलियों से मातृ मूलवृंत या बीजू पौध तैयार किया जाता है. बहुभ्रूणीय गुठलियों से समान गुणों वाले पौधे तैयार किए जा सकतेहैं, मानक मूलवृंत न होने पर मूलवृंत के लिए स्वस्थ व वजनदार गुठलियों का चयन करना चाहिए. अधिकतम अंकुरण के लिए गुठली को फलों से निकालने के तुरंत बाद 1 मीटर चौड़ी व 20 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियों में बोना सही पाया गया है. अंकुरण के 20-25 दिनों बाद बीजू पौधों को पहले से तैयार खेत में लगा देतेहैं. क्यारियों में पहले से बोई गई गुठलियां जब अंकुरित हो जाएं तब उन्हें पहले सेभरे हुए पौलीबैग में गुठली सहित उखाड़ कर लगातेहैं. काले रंग के पालीबैग में 3 हिस्सा मिट्टी व 2 हिस्सा सड़ी गोबर की खाद के मिश्रण में पौधों कोस्थानांतरण करतेहैं.

इन कोमल बीजू पौधों की कीड़ों व बीमारियों से मानसून के समय हिफाजत करना जरूरीहै. करीब 1 साल में बीजू पौधे कलम के लिए तैयार हो जाते हैं.

आम के उम्दा पौधे तैयार करने के लिए निम्न विधियां प्रचलितहैं:

विनियर कलम बंधन

* 1 साल आयु और 0.50 से 0.75 सेंटीमीटर व्यास वाले स्वस्थ बीजू पौधे मूलवृंत के रूप में इस्तेमाल किए जातेहैं.

* सांकुर के लिए 3-4 महीने पुरानी मनचाही किस्म की स्वस्थ शाखाएं इस्तेमाल की जाती हैं.

* सांकुर शाख को 7-10 दिनों पहले ही मातृ पेड़ में पर्ण रहित करें फिर अग्रकली विकसित होने पर काट लें.

* सांकुर शाख में एक तरफ लंबा व दूसरी तरफ छोटा तिरछा चीरा लगाएं. मूलवृंत में 15-20 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर बगल में 3-4 सेंटीमीटर तिरछा चीरा लगाएं.

* सांकुर शाख को मूंलवृंत में लगा कर 200 गेज पालीथीन स्ट्रिप से अच्छी तरह बांध दें.

* उत्तर भारत में जून से सितंबर तक खुली क्यारियों व पालीहाउस की सुविधा होने पर किसी भी समय इस विधि द्वारा आम के पौधे तैयार किए जा सकतेहैं. इस विधि द्वारा अगले साल की रोपाई के लिए पौधे तैयार हो जाते हैं.

कोमल शाख कलम बंधन

* 6 महीने से 1 साल के मूलवृंत लें.

* विनियर की तरह ही सांकुर शाख तैयार करें. सांकुर शाख व मूलवृंत की मोटाई एक जैसी होनी चाहिए.

* मूलवृंत के शीर्ष कटे भाग से 4-6 सेंटीमीटर का लंबवत चीरा बीचोंबीच लगाएं.

* पहले से तैयार सांकुर शाख के आधार पर 4-6 सेंटीमीटर तिरछी कटाई 2 तरफ से करें.

* सांकुर शाख का प्रत्यारोपण मूलवृंत पर कर के उस जगह को 200 गेज मोटी पालीथीन स्ट्रिप से अच्छी तरह बांध दें.

* सांकुर शाख व मूलवृंत को प्रत्यारोपण से पहले 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम से उपचातिर कर लें.

* कोमल शाख कलम बंधन एक आसान विधिहै. इस के द्वारा बेहतर आम के बाग को तैयार किया जा सकताहै. इस विधि को उत्तर भारत में प्रोत्साहित करने की बेहद जरूरतहै.

प्रांकुर प्रवर्धन

* 10-15 दिनों के हलकी हरी पत्तियों वाले पौधों का इस्तेमाल मूलवृंत के लिए करें.

* पौधे को गुठली के साथ 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम में 5 मिनट तक उपचारित करें. फिर इस की शीर्ष शाखा को 6-8 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट कर शीर्ष भाग से बीचोंबीच 3-4 सेंटीमीटर का लंबवत चीरा लगाएं.

* 2-3 महीने पुरानी सांकुर शाख जिन्हें विनियर विधि की तरह तैयार किया गया हो को प्रत्यारोपण के लिए लें.

* सांकुर शाख के आधार पर दोनों तरफ से तिरछा काट कर मूलवृंत में बनाए खांचे में इन्हें एक स्थान पर बैठा कर प्रत्यारोपित करें.

* सांकुर शाख केऊपर प्रत्यारोपण के बाद 10-15 दिनों के लिए ऊपर से पतली पालीथीन नलिका लगाएं.

* शीर्ष कलिका निकलने के बाद लगाई गई नलिका को हटा दें. बारिश के मौसम में इस विधि द्वारा अच्छी सफलता की उम्मीद होती है.

पेड़ लगाना : आम के पेड़ों को लगाने के लिए बारिश का मौसम सब से अच्छा माना गयाहै. जिन इलाकों में बारिश अधिक होती है, वहां बारिश के अंत में आम का बाग लगाना चाहिए. मई महीने में करीब 50 सेंटीमीटर व्यास के 1 मीटर गहरे गड्ढे खोद कर उन में करीब 30-40 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद मिट्टी में मिला कर और 100 ग्राम क्लोरपाइरीफास पाउडर प्रति गड्ढे की दर से भर देना चाहिए. गड्ढा खोदने व भरने का काम बारिश का मौसम आने से पहले जरूर कर लेना चाहिए. बारिश के मौसम में पौधों की रोपाई प्लांटिंग बोर्ड की सहायता से करनी चाहिए. पौधों की दूरी किस्म के मुताबिक 10-12 मीटर होनी चाहिए. आम्रपाली किस्म के लिए यह दूरी 2.5 मीटर होनी चाहिए. बागों में ऐसी किस्में (जैसे दशहरी के बाग में बांबे ग्रीन) जरूर लगानी चाहिए, जिन से परागण में मदद मिल सके.

अंत:फसलें : आम के बाग में पहले 10 सालों तक अंत:फसलों को उगा कर काफी लाभ हासिल किया जा सकता है. इस से जमीन का पूरा इस्तेमाल भी होता है. आम के बाग में लोबियाआलू, मिर्चटमाटर, मूंगचना, उड़दचना आदि फसलचक्र उपयोगी साबित हुए हैं. लोबियाआलू फसल चक्र से सब सेज्यादा आय हासिल की जा सकती है. इस के अलावा सब्जियां और तिलहनी फसलें जैसे मूंगफली, तिल, सरसों आदि भी उगाई जा सकती हैं. गेंदा व ग्लैडियोलस फूलों की अंत:फसलें भी फायदेमंद हैं, जिन्हें बागबान अपना रहे हैं. आम के थालों में फसल नहीं बोनी चाहिए. ज्वार, बाजरा, गन्ना व धान जैसी फसलों की पैदावार अंत:फसल के रूप में नहीं की जानी चाहिए.

खाद : आम के बागों को 10 सालों तक हर साल उम्र के गुणांक में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की क्रमश: 100 ग्राम, 50 ग्राम व 100 मात्रा प्रति पेड़ की दर से जुलाई में पेड़ के चारों तरफ बनाई गई नाली में देनी चाहिए. 10 साल या इस से पुराने बागों में 1000 ग्राम नाइट्रोजन, 500 ग्राम फास्फोरस व 1000 ग्राम पोटाश की मात्रा तने से करीब 1.5 मीटर दूरी पर बनाई गई 25 सेंटीमीटर चौड़ी नाली में डालनी चाहिए. इस के अलावा मिट्टी की भौतिक व रासायनिक दशा में सुधार के लिए 25-30 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद प्रति पेड़ देनी चाहिए.

सिंचाई : बाग लगाने के पहले साल में 2-3 दिनों के अंतर पर, 2-5 साल होने पर 4-5 दिनों के अंतर पर और जब पौधे फलने लगें तो फल लगने के बाद 2-3 बार पानी देना चाहिए. बाग में पहली सिंचाई फल लगने के बाद, दूसरी सिंचाई फलों के कांच की गोली के बराबर होने पर और तीसरी सिंचाई मई के दूसरे हफ्ते में करने से फलों के आकार व गुणवत्ता में इजाफा होताहै. सिंचाई हमेशा थालों में ही करनी चाहिए.

निराईगुड़ाई : बागों को साफसुथरा रखने के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई और साल में 2 बार जुताई कर देनी चाहिए. इस से खरपवतार और भूमिगत कीट नष्ट हो जातेहैं.

कुलतार (पैक्लोव्यूट्राजाल)

का इस्तेमाल

आम के पेड़ में हर साल फल आने व पेड़ की बढ़वार को सही रखने के लिए कुलतार का इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए हर पेड़ की सालाना उम्र पर 1 मिलीलीटर कुलतार को 5 लीटर पानी में मिला कर पेड़ के मुख्य तने के चारों ओर मिट्टी में मिला कर हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. उत्तरी भारत में कुलतार के इस्तेमाल का सही समय 15 सितंबर से 15 नवंबर माना जाताहै. इस के इस्तेमाल से जुलाईअगस्त में आई नई शाखाओं पर फरवरीमार्च में बाकायदा फूल व फल आने शुरू हो जातेहैं.

पुराने बागों को ठीक करना : ऐसा देखा गया है कि 45-50 सालों बाद आम के पेड़ों का फैलाव काफी बढ़ जाताहै और उन की शाखाएं बढ़ कर दूसरे पेड़ों कोछूने लगती हैं. इस से सूरज की रोशनी पेड़ों तक सही मात्रा में नहीं पहुंच पातीहै. इस कारण प्रकाश संश्लेषण नहीं हो पाता है, नतीजतन पेड़ों में फूल व फल सही तरीके से नहीं आ पाते. ऐसे बाग कीड़ों व बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. ऐसे बागों को कटाईछंटाई तकनीक से उत्पादक बनाया जा सकता है.

ऐसे पेड़ों की सभी शाखाओं को जमीन से 4-5 मीटरऊंचाई पर दिसंबर में काट देना चाहिए.  शाखाओं को पहले नीचे की तरफ से काटतेहैं और बाद में ऊपर से काटते हैं. काटने के बाद कापर आक्सीक्लोराइड का लेप बना कर काटी गई जगहों पर लगाना कारगर होताहै. कापर आक्सीक्लोराइड की जगह पर गोबर और मिट्टी का लेप भी लगाया जा सकताहै.

मार्चअप्रैल में इन कटी हुई शाखाओं पर नए कल्ले आने लगतेहैं और हर कटी शाखा पर भरपूर मात्रा में टहनियां व पत्तियां निकलतीहैं. इन में से 8-10 अच्छी टहनियों को बढ़ने देना चाहिए. बाकी फालतू टहनियों को जूनजुलाई तक हटा देना चाहिए. इन कटे पेड़ों में 2.5 किलोग्राम यूरिया, 3.0 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 1.5 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति पेड़ की दर से डालना चाहिए. इन उर्वरकों में से यूरिया की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा फरवरी में और यूरिया की बची आधी मात्रा जून में इस्तेमाल करतेहैं. इस के अलावा 50-100 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद प्रति पेड़ देना फायदेमंद होता है.

इन कटे पेड़ों में अप्रैल से जून तक 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. साथ ही कीड़ों व रोगों के लिए चौकन्ना रहना चाहिए.

कीड़ों की रोकथाम

भुनगा: इस कीट के बच्चे व वयस्क दोनों ही मुलायम टहनियों, पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. इस की वजह से फूल सूख कर गिर जातेहैं. यह कीट एक प्रकार का मीठा पदार्थ निकालता है, जो पेड़ों की पत्तियों, टहनियों आदि पर लग जाताहै. इस मीठे पदार्थ पर काली फफूंदी पनपती है, जो पत्तियों पर काली परत के रूप में फैल कर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर खराब असर डालती है.

इलाज : बाग से खरपतवार हटा कर उसे साफसुथरा रखें. घने बाग की कटाईछंटाई दिसंबर में करें. बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें. पुष्पगुच्छ की लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होने पर भुनगे का प्रकोप होताहै. इस की रोकथाम के लिए 0.005 फीसदी इमिडा क्लोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें. 0.005 फीसदी थायामेथोक्लाज या 0.05 फीसदी प्रोफेनोफास का दूसरा छिड़ाकाव फल लगने के बाद करें.

गुजिया: इस के बच्चे और वयस्क पत्तियों व फूलों का रस चूसतेहैं. जब इन की तादाद ज्यादा हो जातीहै, तो इन के द्वारा रस चूसे जाने के कारण पेड़ों की पत्तियां व बौर सूख जातेहैं और फल नहीं लगते हैं. इस

कीट का हमला दिसंबर से मई महीने तक देखा जाता है.

इलाज : खरपतवारों और अन्य घासों को नवंबर में जुताई द्वारा बाग से निकालने से सुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप, गरमी व चीटियों द्वारा नष्ट हो जातेहैं. दिसंबर के तीसरे हफ्ते में पेड़ के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण 1.5 फीसदी प्रति पेड़ की दर से मिट्टी में मिला देने से अंडों से निकलने वाले निम्फ मर जातेहैं. पालीथीन की 30 सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊंचाई पर दिसंबर के दूसरेतीसरे हफ्ते में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फों का पेड़ों पर ऊपर चढ़ना रुक जाताहै. पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांधना चाहिए. इस के बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकताहै. यह पट्टी बाग में मौजूद सभी आम के पेड़ों व अन्य पेड़ों पर भी बांधनी चाहिए. अगर किसी वजह से यह विधि नहीं अपनाई गई और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई, तो ऐसी हालत में 0.05 फीसदी कार्बोसल्फान 0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर या 0.06 फीसदी डायमेथोएट 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर का छिड़काव करें.

पुष्प गुच्छ मिज : आम के पेड़ों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में हानि होती है. इस का पहला प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है. नए विकसित बौर में अंडे दिए जाने व लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में घुसने से बौर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं. इस का दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है. फलों में अंडे देने व लार्वा के घुसने की वजह से फल पीले हो कर गिर जातेहैं. तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है.

इलाज : अक्तूबर व नवंबर में बाग में की गई जुताई से मिज की सूंडि़यों के साथ सोए पड़े प्यूपे भी नष्ट हो जातेहैं. जिन बागों में इस कीट का हमला होता रहा है, वहां बौर फूटने पर 0.06 फीसदी डायमेथोएट का छिड़काव करना चाहिए. अप्रैलमई में 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण प्रति पेड़ के हिसाब से छिड़काव करने पर पेड़ के नीचे सूंडि़यां नष्ट हो जाती हैं. फरवरी में भुनगे के लिए किए जाने वाले कीटनाशी के छिड़काव से इस कीट की भी अपनेआम रोकथाम हो जातीहै.

डासी मक्खी : वयस्क मक्खियां अप्रैल में जमीन से निकल कर पके फलों पर अंडे देती हैं. 1 मक्खी 150 से 200 तक अंडे देतीहै. 2-3 दिनों के बाद सूंडि़यां अंडों से निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देतीहैं.

इलाज : इस कीट के असर को कम करने के लिए सभी गिरे हुए व मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए. पेड़ों के आसपास सर्दी के मौसम में जुताई करने से जमीन के अंदर के प्यूपों को नष्ट किया जा सकताहै. काठ से बने यौनगंध ट्रैप को पेड़ पर लगाना इस की रोकथाम में बहुत कारगर है. इस ट्रैप के लिए प्लाईवुड के 5×5×1 सेंटीमीटर आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल, मिथाइल यूजिनाल, मैलाथियान के घोल में भिगो कर लगाना चाहिए. यौनगंध ट्रैप को 2 महीने के अंतर पर बदलना चाहिए. 10 ट्रैप प्रति हेक्टेयर लटकाने चाहिए.

रोगों की रोकथाम

पाउडरी मिल्ड्यू (खर्रा, दहिया) : इस रोग के लक्षण बौरों, पत्तियों व नए फलों पर देखे जा सकतेहैं. इस रोग का खास लक्षण सफेद कवक या चूर्ण के रूप में जाहिर होताहै. नई पत्तियों पर यह रोग आसानी से दिखताहै, जब पत्तियों का रंग भूरे से हलके हरे रंग में बदलता है. नई पत्तियों पर ऊपरी और निचली सतह पर छोटे सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देतेहैं, जो निचली सतह पर ज्यादा होतेहैं. बौरों पर यह रोग सफेद चूर्ण की तरह दिखाई पड़ताहै और बौरों में लगे फूलों के झड़ने की वजह बनताहै. इस रोग की वजह से फूल नहीं खिलते हैं और समय से पहले ही झड़ जातेहैं. नए फलों पर पूरी तरह सफेद चूर्ण फैल जाताहै और मटर के दाने के बराबर हो जाने के बाद फल पेड़ से झड़ जातेहैं.

इलाज : पहला छिड़काव 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक का घोल बना कर उस समय करना चाहिए, जब बौर 3-4 इंच का होता है. दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डिनोकोप का होना चाहिए, जो पहले छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद हो. दूसरे छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राईडीमार्फ का होना चाहिए.

एंथ्रेकनोज : यह रोग पत्तियों, टहनियों और फलों पर देखा जा सकताहै. पत्तियों की सतह पर पहले गोल या अनियमित भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे बनतेहैं. प्रभावित टहनियों पर पहले काले धब्बे बनतेहैं और फिर पूरी टहनी सलेटी रंग की हो जातीहै. पत्तियां नीचे की ओर झुक कर सूखने लगती हैं और बाद में गिर जातीहैं. बौर पर सब से पहले पाए जाने वाले लक्षण हैं, गहरे भूरे रंग के धब्बे, जो कि फूलों पर जाहिर होतेहैं. बौर व खिले फूलों पर छोटे काले धब्बे उभरते हैं, जो धीरेधीरे फैलतेहैं और आपस में जुड़ कर फूलों को सुखा देतेहैं. ज्यादा नमी होने पर यह रोग तेजी से फैलताहै.

इलाज : सभी रोगग्रसित टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए और बाग में गिरी हुई पत्तियों,टहनियों और फलों को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए. मंजरी संक्रमण को रोकने केलिए 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए. संक्रमण को रोकने के लिए 0.3 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव भी लाभकारी है. 0.1 फीसदी थायोफनेट मिथाइल या 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का बाग में फल तोड़ाई से पहले छिड़काव करने से गुप्त संक्रमण को कम किया जा सकताहै.

उल्टा सूखा रोग : टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना इस रोग का मुख्य लक्षण है. विशेष तौर पर पुराने पेड़ों में बाद के पत्ते सूख जातेहैं, जो आग से झुलसे हुए से मालूम पड़तेहैं. शुरू में नई हरी टहनियों पर गहरे रंग के धब्बे पड़ जातेहैं. जब ये धब्बे बढ़तेहैं, तब नई टहनियां सूख जाती हैं. ऊपर की पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं और धीरेधीरे सूख जाती हैं. इस रोग का ज्यादा असर अक्तूबरनवंबर में दिखाई पड़ताहै.

इलाज : छंटाई के बाद गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी मिला कर कटे भाग पर लगाना फायदेमंद होताहै. संक्रमित भाग में 3 इंच नीचे सेछंटाई के बाद बोर्डो मिक्चर 5:5:50 या 0.2 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव रोग की रोकथाम में बेहद कारगर होताहै.

कुछ खास प्रजातियां

अंबिका: आम्रपाली व जनार्दन पसंद किस्मों के संकरण से विकसित इस किस्म को साल 2000 में संस्थान द्वारा पेश किया गया. इस का पेड़ कम फैलाव लिए हुए और कम शाखाओं वाला होता है. नियमित फलत वाली यह किस्म मौसम में देर से तैयार होतीहै. इस के फल का आकार तिरछा व अंडाकार होता है और औसत वजन 250-350 ग्राम होता है. तैयार होने पर इस के फल का रंग बैगनीहरा होता है. पकने पर यह चमकीला पीला व लाल हो जाताहै. पके हुए फल का गूदा कम रेशे वाला व सख्त होता है. इस का गूदा नारंगीपीला होताहै. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 80 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होताहै. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

अरुनिका : इस के पेड़ का आकार बौना होताहै. यह नियमित फलत वाली किस्म है, जिस में ऐंथ्रेकनोज को सहने की कूवत होती है. इस के फल आकर्षक होतेहैं और गूदा सख्त होता है. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 60 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होता है. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

दशहरी : लखनऊ के पास दशहरी गांव में हुई उत्पत्ति के कारण इस किस्म को दशहरी नाम से जाना जाता है. दशहरी उत्तर भारत की खास व्यावसायिक किस्म है और देश के उम्दा आमों में इस का खास स्थान है. इस का फल आकार में मध्यम व लंबा होताहै. इस का औसत वजन 200-250 ग्राम होता है. इस के पके फलों का रंग पीला होता है, जो मध्य मौसम में पकतेहैं. इस के फलों की गुणवत्ता अच्छी व भंडारण कूवत मध्यम होती है.

लंगड़ा : उत्तर भारत के बनारस, गोरखपुर व बिहार क्षेत्र में उगाई जाने वाली आम की इस किस्म के फल मध्यम, अंडाकार व हलके हरेपीले रंग के होते हैं. इस के फल मध्यम मौसम में पकतेहैं. फलों की गुणवत्ता उत्तम और भंडारण कूवत मध्यम होती है. इस के फलों में मिठास व खटास का अच्छा मिश्रण होता है, जिस से यह बेहद स्वादिष्ठ किस्म मानी जातीहै. साथ ही फलों में गूदे की मात्रा ज्यादा व गुठली पतली होती है. बिहार में इसे मालदा नाम से भी जाना जाताहै.

चौसा : आम की इस किस्म की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला नामक स्थान में एक तालुकेदार के बाग में संयोगवश एक बीजू पेड़ के रूप में हुई. इस की खास महक व स्वाद के कारण इसे भारत के उत्तरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. इस के फल बड़े, चपटे व अंडाकार होतेहैं. इस के फलों का रंग हलका पीला होता है और गुणवत्ता अच्छी होती है. इस के फल रसीले होतेहैं. आम की यह किस्म देर में पक कर तैयार होती है.

आम्रपाली : आम की यह किस्म दशहरी व नीलम से विकसित की गईहै. इस के पेड़ बौने होतेहैं और फल देर में पकतेहैं. इस के फल मध्यम आकार के और स्वादिष्ठ होतेहैं. फलों की भंडारण कूवत अच्छी होती है. यह किस्म सघन बागबानी के लिए अच्छी है. 1 हेक्टेयर में इस किस्म के 1600 पौधे लगाए जा सकतेहैं, जो 5 साल के बाद 16 टन प्रति हेक्टेयर फल देने की कूवत रखतेहैं. ज्यादा विटामिन ‘ए’ व छोटे आकार के कारण गृह वाटिका में इस का खास महत्त्व है.

मल्लिका : आम की यह संकर किस्म नीलम और दशहरी के संकरण से विकसित की गई. इस के फल पीले और मध्यम बड़े आकार के होतेहैं. इस के फल का औसत भार 300 ग्राम होता है. फलों में गूदे की मात्रा काफी होती है व गुठली पतली होतीहै. इस के फलों की गुणवत्ता व भंडारण कूवत अच्छी है. यह देर से तैयार होने वाली किस्म है. आंध्र प्रदेश व कर्नाटक आदि राज्यों में इस की व्यावसायिक खेती बढ़ रही है. यह किस्म प्रसंस्करण के लिए अच्छी है.

तोड़ाई के बाद की देखभाल

* उत्पादित आमों का करीब 25-30 फीसदी भाग बाग से ग्राहकों तक पहुंचने में नष्ट हो जाताहै. यदि तोड़ाई, पेटी बंदी व भंडारण की सही तकनीक अपनाई जाए तो इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकताहै.

* आम के फल 12-15 हफ्ते बाद प्रजाति के मुताबिक पूरी तरह तैयार होते हैं. दशहरी व लंगड़ा आम 12 हफ्ते और चौसा व मल्लिका आम 15 हफ्ते में तैयार होतेहैं.

* तैयार फलों की तोड़ाई 8-10 मिलीमीटर लंबी डंठल केसाथ करनी चाहिए, जिस से फलों पर चेप नहीं लगे व पकने पर फल दाग रहित हों. तोड़ाई के समय फलों को चोट व खरोच न लगने दें.

* तोड़ाई के लिए संस्थान द्वारा विकसित यंत्र हैं. इस से प्रति घंटे 600-800 फल तोड़े जा सकतेहैं.

* तोड़ाई के बाद फलों कोछायादार जगह में रखें और मिट्टी लगने से बचाएं.

* फलों की पैकिंग के लिए 0.5 फीसदी छेद वाले 4 किलोग्राम कूवत वाले गत्ते के बक्से संस्थान द्वारा तैयार किए गएहैं, जो भंडारण व परिवहन के लिए सही होते हैं.

* तोड़ाई के बाद ऐंथ्रेक्नोज, स्टेम एंड राट व ब्लैक राट रोगों से बचाने के लिए फलों को 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम के कुनकुने पानी में 10 मिनट तक डुबो कर रखने के बाद सुखा कर पेटीबंद करना चाहिए.

* शीत भंडारण विधि में आम की तमाम प्रजातियों जैसे दशहरी, मल्लिका व आम्रपाली को 2 डिगरी सेंटीग्रेड, लंगड़ा को 15 डिगरी सेटीग्रेड व चौसा को 10 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान व 85-90 फीसदी आपेक्षित आर्द्रता पर 2-3 हफ्ते तक रखा जा सकताहै.

* दशहरी किस्म के फलों को 2 फीसदी कैल्सियम क्लोराइड डाईहाइडे्रट के घोल में 500 मिलीमीटर वायुमंडलीय दाब पर 5 मिनट के लिए उपचारित कर के कम तापमान पर 27 दिनों तक भंडारित किया जा सकता है.

* पूरी तरह तैयार फलों को 250-750 पीपीएम ईथरल के कुनकुने पानी केघोल में 5 मिनट तक डुबाने के बाद पूरी तरह सुखा

कर भंडारित करें, तो सभी फल आकर्षक पीले रंग में समान रूप से पकतेहैं.                                       

– डा. बालाजी विक्रम व पूर्णिमा सिंह सिकरवार

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