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इन कारणों से बढ़ जाता है इलाज का खर्च

वक्त के बदलने के साथ जितनी तेजी से बीमारियां बढ़ी हैं उतनी ही तेजी से इलाक का खर्च भी बढ़ा है. इन सब के अलावा बचा-कुचा काम बिगाड़ने के लिए महंगाई तो है ही. कई बार तो इलाज का खर्च निकालने के लिए लोगों को अपना घर भी गिरवी रखना पड़ता है. पर दवाओं और ऑपरेशन के खर्चे के अलावा हमारी अपनी गलती से भी इलाज का खर्च बढ़ जाता है.

इन गल्तियों के कारण बढ़ जाता है इलाज का खर्च-

1. नियमित रूप से जांच न करवाना

ये आदत ज्यादातर भारतीयों में है कि वे नियमित रूप से अपनी जांच नहीं करवाते हैं. पर नियमित रूप से अपने पूरे शरीर की मेडिकल जांच करवाना बहुत जरूरी है. इससे आपको दोहरा लाभ होगा, सही समय पर पता लगने से आप जल्द से जल्द अपना इलाज करवा सकेंगे और इससे आपका खर्च भी थोड़ा कम हो जाएगा. बीमारी जितनी देर से डिटेक्ट होती है, आपका स्वास्थय उतना ही गिरता है और आपकी जेब पर भी इसका भारी प्रभाव पड़ता है.  

2. बीमा पॉलिसी की सही जानकारी न होना

आपने हेल्थ इंश्योरेंस ले तो लिया है पर बीमा लेते समय आपने पॉलिसी के कागजात ठीक से नहीं पढ़े, क्योंकि या तो आपको सब्र नहीं है या आपको पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं हुई. पर बिना ढंग से पढ़े कोई भी बीमा ले लेना सही नहीं है. पॉलिसी के कागजात ढंग से नहीं पढ़ने के कारण आपको पॉलिसी की सभी शर्तों के बारे में पता नहीं चलेगा. ऐसे में जब आपको या आपके परिवार के किसी सदस्‍य को इलाज की जरूरत पड़ती है तब आपको पता चलता है कि किस-किस बीमारी को आपकी पॉलिसी में कवर नहीं मिलता है. इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप सारी जानकारियां जुटा कर ही मेडिकल इंश्योरेंस लें.

3. किसी लंबी बीमारी के बारे में छिपाना

अगर आप मेडिक्लेम कर रहे हैं तो आपसे फॉर्म में कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं. जिसमें आपसे आपकी बीमारियों और मेडिकल हिस्ट्री के बारे में भी पूछा जाता है. इन सवालों का सही जवाब देना बहुत जरूरी है. बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि अपनी पुरानी बीमारी की जानकारी दिए बिना ही उनका काम चल जाएगा. अगर आपने कोई बात छिपाई है तो बीमा कंपनी वाले पता लगा ही लेते हैं, क्योंकि आपके द्वारा दी गई जानकारी को क्रोस-चेक भी किया जाता है. पर बेहतर इलाज के लिए अपने बारे में सारी जानकारी देना जरूरी है. सही जानकारी देने से आपको मेडिक्लेम भी आसानी से मिल जाएगा.

अब गाने सुनिए इन बेहतरीन फ्री म्यूजिक प्लेयर्स के साथ

कई बार आपके कम्प्यूटर या लैपटॉप के विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम के अलग-अलग वर्जन के साथ आने वाले डिफॉल्ट म्यूजिक प्लेयर्स आपकी सभी जरूरतों पर खरे नहीं उतर पाते हैं.

आज हम आपको कुछ ऐसे ऐप्स के बारे में बता रहे हैं, जो आपके लैपटॉप पर, आपके लिए गाने सुनने का मजा बढ़ा देते हैं.

1. फूबार2000

फूबार2000 या foobar2000 एक फ्री और अच्छा म्यूजिक ऐप है, जो आपकी पसंद के मुताबिक सामान्य या उच्च श्रेणी का हो सकता है. इसका मॉड्यूलर डिजाइन बहुत ही बेहतरीन होता है. इस फ्री म्यूजिक ऐप को सिंपल और आपकी मेमरी क्षमता के लिहाज से इतना कुशल बनाया गया है. आप इस ऐप में अपने मन के अनुसार फीचर्स जोड़ सकते हैं. कम्प्यूटर में म्यूजिक से संबंधित हर तरह की उपयोगी चीजें जैसे सीडी बर्निंग, प्ले स्टेशन साउंड फाइल्स की डीकोडिंग, विजुअलाइजेशंस, प्लेलिस्ट ऑर्गनाइजर्स आदि सब इसमें हैं.

2. स्पोटिफॉय

Spotify या स्पोटिफॉय का डेस्कटॉप ऐप बेस्ट फीचर्स के साथ आपकी सभी सुविधाओं तक पहुंच आसान करता है. कहने का मतलब है कि Spotify एक डिजिटल संगीत सेवा है जो आपको लाखों गाने तक पहुंच प्रदान करती है.

3. म्यूजिक बी

म्यूजिक बी विंडोज के लिए यह एक नायाब म्यूजिक मैनेजर और प्लेयर होने के साथ, शानदार फ्री म्यूजिक ऐप है. तकनीकी के हिसाब से MusicBee में डिजिटल प्रोसेसिंग इफेक्ट के साथ एक मल्टी ब्रैंड इक्वलाइजर होता है, जो कि आपके सिस्टम में हाई ऑडियो कॉर्ड्स को सपोर्ट करता है.

4. डोपेमिन

Dopamine का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. इसमें एक सामान्य विजार्ड है, जो कि आपको अपने गाने इंपोर्ट करने और उन्हें चलाने की सहूलियत प्रदान करता है. यह आश्चर्यजनक रूप से गाने सुनने की सुविधाएं प्रदान करता है.

5. मीडिया मोंकी

अगर आपके लैपटॉप की मीडिया लाइब्रेरी थोड़ी भी अव्यवस्थित है तो मीडिया मोंकी ऐप या MediaMonkey इसे एक क्रम में लाने में आपकी काफी मदद करता है. यह MediaMonkey ऐप आपके सिस्टम में अनचाहे अलबम्स को शुरू होने से रोक तो नहीं सकता है, लेकिन यह फ्री म्यूजिक ऐप अपने तरीके से आपके म्यूजिक को टैग कर देता है. इसके अलावा, यह आपके सिस्टम से एंड्रॉयड और आईपॉड्स समेत डिवाइसेज को लिंक करने और DLNA स्ट्रीमिंग, डीजे मोड में आपके संगीत को चलाने में सक्षम है.

यह ऐप ऑटोमैटिक तरीके से वॉल्यूम्स को सेट करता है, जिससे ट्रैक सुनने में आपको अलग न लगे. इस ऐप के जरिए आप इंटरनेट से सीडी रिकॉर्ड और इसे पूरा का पूरा डाउनलोड कर सकते हैं.

6. व्हीएलसी मीडिया प्लेयर

इस ऐप से तो आप में से बहुत लोग अवगत होंगे ही. यह एक बेहतरीन फ्री म्यूजिक ऐप है. VLC मीडिया प्लेयर केवल एक फाइल या म्यूजिक स्ट्रीम को प्ले कर सकता है. VLC म्यूजिक के बहुत सारे फाइल फॉरमैट्स को सपॉर्ट करता है.

ऐसे करें अपनी डिजिटल लाइफ सुरक्षित

हम कम्यूनिकेशन, बैंकिंग, शॉपिंग, रिसर्च, गेमिंग और समाचार पढ़ने समेत कई सारे काम ऑनलाइन करने लगे हैं. इंटरनेट के बिना जिंदगी की कल्पना करना अब संभव नहीं है. इससे चीजें जितनी सुविधाजनक हुई हैं, खतरे भी उतने ही बढ़ गए हैं.

साइबर ठग आपके क्रेडिट कार्ड या बैंक अकाउंट की जानकारी चुराने की ताक में हमेशा रहते हैं. वे आपकी आइडेंटिटी, पर्सनल डीटेल्स, ईमेल अकाउंट्स और तस्वीरों वगैरह को चुराना चाहते हैं. इन सब से बचना बेहद जरूरी है इन सब से आपको खतरा भी हो सकता है.

1. मेसेज को एनक्रिप्ट करें

एनक्रिप्शन में डेटा को कुछ इस तरह से बदला जाता है बीच में उसे कोई भी ऐक्सेस नहीं कर पाता. सिर्फ रिसीवर ही उसे डीकोड कर पाता है. उदाहरण के लिए वॉट्सऐप एंड-टु-एंड एनक्रिप्शन सपॉर्ट करता है. दो यूजर्स के बीच क्या बात हो रही है, इसे बीच में कोई भी नहीं पढ़ सकता.

2. पीसी हार्ड ड्राइव लॉकर

अगर कोई आपके कंप्यूटर का ऐक्सेस लेता है, वह आराम से उसमें मौजूद फाइल्स को भी ऐक्सेस कर सकता है. अगर फाइल्स एनक्रिप्ट की गई होंगी तो ऐसा नहीं किया जा सकता. आप FileVault या BitLockerLuckily का इस्तेमाल करके अपने पीसी की हार्ड ड्राइव को लॉक कर सकते हैं.

3. पासवर्ड्स का पासवर्ड

नया पासवर्ड सेट करने के लिए कॉम्बिनेशन बनाना बहुत ही असुविधाजनक और परेशान कर देने वाला काम है. पासवर्ड मैनेजर्स की मदद से आप एक मास्टर पासवर्ड के अंदर कई सारे पासवर्ड्स को स्टोर कर सकते हैं. मास्टर पासवर्ड को बदलने रहने के लिए कैलंडर रिमाइंडर सेट किया जा सकता है.

4. टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन

अगर आपके ईमेल अकाउंट को किसी नए डिवाइस से ऐक्सेस किया जाता है तो आप सेकंडरी सिक्यॉरिटी लेयर सेट कर सकते हैं. इससे इनबॉक्स को ऐक्सेस करने के लिए आपको अपने फोन पर एक टेक्स्ट मेसेज मिलेगा, जिसमें कोड होगा. उस कोड को डालने पर ही आप इनबॉक्स ऐक्सेस कर पाएंगे. सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए भी ऐसी सेटिंग्स की जा सकती हैं.

5. ब्राउजर प्लगइन का यूज

यह प्लगइन सुनिश्चित करता है कि आप सुरक्षित ढंग से वेबसाइट्स ब्राउज करें. यह वेबसाइट से आपके कनेक्शन को एनक्रिप्ट कर देता है. इसका मतलब कि कोई हैकिंग या सर्विलांस नहीं कर सकता.

6. प्राइवेट वेब ऐक्टिविटी

अगर आप क्रोम या अन्य किसी ब्राउजर पर इनकॉग्निटो या प्राइवेट मोड ऑन करके कुछ सर्च करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि किसी को कुछ पता नहीं चल रहा. आपकी कंपनी, वेबसाइट्स और इंटरनेट प्रोवाइडर्स भी आपकी ब्राउजिंग पर नजर रख सकते हैं. ऐसे में आप “Tor” नाम का ब्राउजर इस्तेमाल कर सकते हैं, जिस पर प्राइवेट वेब ऐक्टिविटी की जा सकती है.

7. अपने वेबकैम को छुपाएं

जब आप अपने वेबकैम को इस्तेमाल न कर रहे हों, इसे छुपाकर रखें. इस तरह से हैकर्स उस कैमरे को हैक करके आपके ऊपर नजर नहीं रख पाएंगे. माइक को भी ऑफ करने में ही भलाई है. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जब हैकर्स ने वेबकैम या माइक के जरिए जासूसी की है.

पैसा कमाऊ बनी नर्मदा यात्रा

अपनी चर्चित नर्मदा सेवा यात्रा के सौवे दिन मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह ने नया पैंतरा दिखाते बातों ही बातों में नर्मदा कोष की स्थापना कर डाली जिससे श्रद्धालु दान दाता दान देने की अपनी लत पूरी कर सकें. यात्रा के सौवे दिन अपने गृहग्राम जेत में लाखों लोगों की मौजूदगी में शिवराज ने इस कोष की स्थापना की घोषणा की. जेत के धार्मिक शो में शिवराज सिंह ने एक तीर से कई निशाने साधे, जिनमें पहला था अपने बेटे कार्तिकेय सिंह को राजनीति में लांच करना, जिनहोंने जेत में पधारे लाखों लोगों, हजारों अफसरों, सैकड़ों दिग्गज नेताओं और दर्जनों ब्रांडेड बाबाओं का आभार व्यक्त किया.

शो के दूसरे आकर्षण प्रख्यात कथा वाचक मोरारी बापू थे जो फिल्मी गानों की पेरोडी पर भजन गाने के लिए मशहूर हैं. धार्मिक आयोजनों मे तबियत से दान दक्षिणा और चढ़ावा बटोरने बाले मोरारी बापू ने शायद ज़िंदगी में पहली बार दान किया. उन्होंने शिवराज सिंह को आशीर्वाद के साथ साथ ग्यारह हजार रुपये भी भेंट किए तो शिवराज सिंह ने इसे सीड मनी मानते नर्मदा कोष का एलान कर अपना मकसद भी उजागर कर दिया कि जब दान की खाने वाला एक संत भी दान कर सकता है तो आम जनता को तो दिल और जेब खोल कर दान देना चाहिए. यानि नर्मदा यात्रा एक व्यावसायिक इवैंट साबित हो रही है, जिसके जरिये मुख्य मंत्री के एक मुंह लगे नेता की माने तो एक अरब रुपये से कम राशि तो इकट्ठा नहीं की जाएगी.

मालवा इलाके के एक और नामी संत कमल किशोर नागर ने भी नर्मदा के लिए एक करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि देने का एलान किया, तो साफ दिख रहा है कि दान दाताओं की भीड़ उमड़ने वाली है. हैरत की बात शुरुआती दान वे दे रहे हैं जो दान लेते हैं. जाहिर है  यह निवेश है, जिसे फसल की शक्ल में ये और दूसरे बाबा लंबे वक्त तक काटेंगे. इधर कुछ बुद्धिजीवी टाइप के लोग शिवराज सिंह के धरम करम के अलग अलग माने निकाल रहे हैं, जिनमे से पहला यह है कि एक धार्मिक यात्रा के लिए क्या सरकार को इस तरह जनता से पैसा इकट्ठा करने का हक है. इस पर भी तुर्रा ये कि कानूनी बचाव और विवादों से बचने नदी संरक्षण और पौधा रोपण की बात कही जा रही है.

दूसरा वर्ग मानता है कि अब शिवराज सिंह को केंद्र सरकार से पहले सा भाव और फंड नहीं मिल रहा है, इसलिए उन्होंने नर्मदा यात्रा का जरूरत से ज्यादा हल्ला मचा दिया है. हर तीसरे दिन मुख्य मंत्री इस यात्रा में शामिल होते हैं, जिससे ब्यूरोक्रेट्स लापरवाह होते जा रहे हैं. प्रदेश में कानून व्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा रही है,  अपराध बढ़ रहे हैं और सीएम छोटी बच्चयों के प्रति दुष्कर्मों पर सिवाय बयानबाजी के कुछ नहीं कर पा रहे हैं. यह एक दयनीय स्थिति है.

सीएम खुद एक जिद और धार्मिक जुनून में अपनी इमेज बिगाड़ रहे हैं और अब तो वे एक नदी के नाम पर बाबाओं जैसे झोला खोल कर खड़े हो गए हैं लेकिन यह हिसाब नहीं दे रहे कि अब तक नर्मदा यात्रा पर कितने करोड़ रुपये फूंके गए.       

 

कौन किसके चक्रव्यूह में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रात्रि भोज आमंत्रण पर बेरुखी दिखाने बाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कई तरह से जता दिया है कि कुछ भी हो जाये वे भाजपा को हल्के में ही लेते रहेंगे. महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना गठबंधन टूट चुका है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार में इसका बना रहना हैरत की बात है. निकाय चुनाव में शिवसेना का अधिकतम नुकसान भाजपा ने किया, पर मुंबई में पिछड़ गई तो युति बनाए रखने भाजपा ने खामोशी से मेयर पद शिवसेना को तोहफे में दे दिया इसके बाद भी उद्धव की नाराजगी दूर नहीं हो रही है.

शिवसेना सांसद संजय राऊत का यह कहना एक कूटनीति है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए राष्ट्रपति पद के लिए आर एस एस मुखिया शिवसेना की पहली पसंद होंगे और शिवसेना उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित भी कर सकती है. दरअसल में यह उद्धव ठाकरे की लिखी स्क्रिप्ट है जिसे लेकर भाजपा और खासतौर से नरेंद्र मोदी बेक फुट पर जाने मजबूर हो चले हैं.

भागवत की उम्मीदवारी का एक ही शख्स विरोध कर सकता है और वे खुद मोहन भागवत हैं जिनहोने अपने पत्ते अभी खोले नहीं हैं. नरेंद्र मोदी को घेरने का कोई मौका यदि उद्धव चूक नहीं रहे तो बात बेहद साफ है कि वे औरों की तरह उनका रुतबा रसूख और दबदबा नकार रहे हैं. जाहिर है उनकी नजर में मोदी एक भरोसेमंद साथी या सहयोगी नहीं हैं. राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा अपने पितामह लाल कृष्ण आडवाणी का नाम यह कहते उछाल चुकी है कि मोदी उन्हें गुरु दक्षिणा देना चाहते हैं. यह दीगर बात है कि कथित और अपुष्ट सूत्रों के हवाले से आई इस खबर पर कोई आसानी से भरोसा भी नहीं कर रहा.

मुद्दे की बात भाजपा और मोदी को लेकर उद्धव की मंशा है, लगता ऐसा है कि वे अब भाजपा को और ज्यादा झेलने के मूड में नहीं है और बाद के अंजामों की परवाह भी नहीं कर रहे. तो बारी अब भाजपा की है कि वह और कैसे कैसे उन्हें मेनेज करेगी. उद्धव गठबंठन तोड़ने का गुनाह भी अपने सर नहीं लेना चाह रहे. इसलिए भाजपा को उकसा रहे हैं ताकि उसकी छवि खराब की जा सके. महाराष्ट्र निकाय चुनावो में शिवसेना हार कर भी जीती है, उसने साबित कर दिया है कि बगैर भाजपा के भी वह चल सकती है और झुककर तो कतई बात नहीं करेगी.

भाजपा अगर गठबंधन तोड़ती है तो तय है महाराष्ट्र के लिहाज से घाटे का सौदा करेगी. शरद पवार के साथ के बाबत वह आश्वस्त नहीं, वैसे भी एन सी पी का साथ उसके वोटर को बिदकाने बाला ही साबित होगा. अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा क्या करेगी, क्योंकि ज्यादा दिनों तक वह उद्धव को होल्ड पर रखने की स्थिति में भी नहीं है और यह भी समझ रही है कि राष्ट्रपति पद के लिए अब उद्धव उसके साथ नहीं हैं. भागवत देश का यह सर्वोच्च पद लेने में दिलचस्पी लेंगे या नहीं यह भी कम रोमांच की बात नहीं.

अगर लेते हैं तो देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की औपचारिक घोषणा की भी  जरूरत नहीं रह जाएगी और नहीं लेते हैं तो इसे किसी त्याग खासतौर से सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद ठुकराने जैसा कोई नहीं मानेगा. कइयों को अपने चक्रव्यूह में घेर कर उनका हश्र अभिमन्यु सरीखा करने वाले नरेंद्र मोदी खुद एक अभिमन्यु के चक्रव्यूह में फंसते नजर आ रहे हैं, जो डिनर पॉलिटिक्स की झांसे में भी नहीं आ रहा और न ही इस आमंत्रण को अपना सौभाग्य मान रहा.        

पति परदेस में तो डर काहे का: भाग 1

जिला अलीगढ़ मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना गोंडा क्षेत्र में एक गांव है वींजरी. इस गांव में एक किसान परिवार है अतर सिंह का. उस के परिवार में उस की पत्नी कस्तूरी के अलावा 5 बेटे हैं. इन में सब से छोटा है जयकिंदर. अतर सिंह के तीसरे नंबर के बेटे को छोड़ कर सभी बेटों की शादियां हो चुकी हैं. इस के बावजूद पूरा परिवार आज भी एक ही मकान में संगठित रूप से रहता है.

अतर सिंह का सब से छोटा बेटा जयकिंदर आंध्र प्रदेश में रेलवे में नौकरी करता है. डेढ़ साल पहले उस की शादी पुरा स्टेशन, हाथरस निवासी फौजी रमेशचंद्र की बेटी प्रेमलता उर्फ मोना के साथ तय हो गई थी. मोना के पिता के सामने अतर सिंह की कुछ भी हैसियत नहीं थी. यह रिश्ता जयकिंदर की रेलवे में नौकरी लग जाने की वजह से हुआ था.

अतर सिंह ने समझदारी से काम लेते हुए जयकिंदर की शादी से पहले अपने मकान के ऊपरी हिस्से पर एक हालनुमा बड़ा सा कमरा, बरामदा और रसोई बनवा दी थी, ताकि दहेज में मिलने वाला सामान ढंग से रखा जा सके. साथ ही उस में जयकिंदर अपनी पत्नी के साथ रह भी सके. मई 2015 में जयकिंदर और मोना की शादी हुई तो मोना के पिता ने दिल खोल कर दहेज दिया, जिस में घर गृहस्थी का सभी जरूरी सामान था.

मोना जब मायके से विदा हो कर ससुराल आई तो अपने जेठजेठानियों की हालत देख कर परेशान हो उठी. उन की माली हालत ठीक नहीं थी. उस की समझ में नहीं आया कि उस के पिता ने क्या देख कर उस की शादी यहां की. मोना ने अपनी मां को फोन कर के वस्तुस्थिति से अवगत कराया. मां पहले से ही हकीकत जानती थी. इसलिए उस ने मोना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुझे उन सब से क्या लेनादेना. छत पर तेरे लिए अलग मकान बना दिया गया है. तेरा पति भी सरकारी नौकरी में है. तू मौज कर.’’

मोना मां की बात मान गई. उस ने अपने दहेज का सारा सामान ऊपर वाले कमरे में रखवा कर अपना कमरा सजा दिया. उस कमरे को देख कर कोईर् भी कह सकता था कि वह बड़े बाप की बेटी है. उस के हालनुमा कमरे में टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और गैस वगैरह सब कुछ था. सोफा सेट और डबलबैड भी. शादी के बाद करीब 15 दिन बाद जयकिंदर मोना को अपने घर वालों के भरोसे छोड़ कर नौकरी पर चला गया.

पति के जाने के बाद मोना ने ऊपर वाले कमरे में न केवल अकेले रहना शुरू कर दिया, बल्कि पति के परिवार से भी कोई नाता नहीं रखा. अलबत्ता कभीकभार उस की जेठानी के बच्चे ऊपर खेलने आ जाते तो वह उन से जरूर बोलबतिया लेती थी. वरना उस की अपनी दुनिया खुद तक ही सिमटी थी.

उस की जिंदगी में अगर किसी का दखल था तो वह थी दिव्या. जयकिंदर के बड़े भाई की बेटी दिव्या रात को अपनी चाची मोना के पास सोती थी ताकि रात में उसे डर न लगे. इस के लिए जयकिंदर ही कह कर गया था.

देखतेदेखते जयकिंदर और मोना की शादी को एकडेढ़ साल बीत गया. जयकिंदर 10-5 दिन के लिए छुट्टी पर आता और लौट जाता. उस के जाने के बाद मोना को अकेले ही रहना पड़ता था.

मोना को घर की जगह बाजार की चीजें खाने का शौक था. इसी के मद्देनजर उस के पति जयकिंदर ने एकदो बार नौकरी पर जाने से पहले उसे समझा दिया था कि जब उसे किसी चीज की जरूरत हो तो सोनू को बुला कर बाजार से से मंगा लिया करे. सोनू जयकिंदर के पड़ोसी का बेटा था जो किशोरावस्था को पार कर चुका था. वह सालों से जयकिंदर का करीबी दोस्त था. सोनू बिलकुल बराबर वाले मकान में रहता था. मोना को वह भाभी कह कर पुकारता था. मोना ने शादी में सोनू की भूमिका देखी थी. वह तभी समझ गई थी कि वह उस के पति का खास ही होगा.

जयकिंदर के जाने के बाद सोनू जब चाहे मोना के पास चला आता था, नीचे घर की महिलाएं या पुरुष नजर आते तो वह छज्जे से कूद कर आ जाता. दोनों आपस में खूब हंसीमजाक करते थे. मोना तेजतर्रार थी और थोड़ी मुंहफट भी. कई बार वह सोनू से द्विअर्थी शब्दों में भी मजाक कर लेती थी.

एक दिन सोनू जब बाजार से वापस लौटा तो मोना छत पर खड़ी थी. उस ने सोनू को देखते ही आवाज दे कर ऊपर बुला कर पूछा, ‘‘आज सुबह से ही गायब हो? कहां थे?’’

‘‘भाभी, बनियान लेने बाजार गया था.’’ सोनू ने हाथ में थामी बनियान की थैली दिखाते हुए बताया. यह सुन कर मोना बोली, ‘‘अगर गए ही थे तो भाभी से भी पूछ कर जाते कि कुछ मंगाना तो नहीं है.’’

‘‘कल फिर जाऊंगा, बता देना क्या मंगाना है?’’ सोनू ने कहा तो मोना ने पूछा, ‘‘और क्या लाए हो?’’

‘‘बताया तो बनियान लाया हूं.’’ सोनू ने कहा तो मोना बोली, ‘‘मुझे भी बनियान मंगानी है, ला दोगे न?’’

‘‘तुम्हारी बनियान मैं कैसे ला सकता हूं? मुझे नंबर थोड़े ही पता है.’’ सोनू बोला.

‘‘साइज देख कर भी नहीं ला सकते?’’

‘‘बेकार की बातें मत करो, साइज देख कर अंदाजा होता है क्या?’’

‘‘तुम बिलकुल गंवार हो. अंदर आओ साइज दिखाती हूं.’’ कहती हुई मोना कमरे में चली गई. सोनू भी उस के पीछेपीछे कमरे में चला गया.

कमरे में पहुंचते ही मोना ने साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया और सीना फुलाते हुए बोली, ‘‘लो नाप लो साइज. खुद पता चल जाएगा.’’

‘‘मुझ से साइज मत नपवाओ भाभी, वरना बहुत पछताओगी.’’

‘‘पछता तो अब भी रही हूं, तुम्हारे भैया से शादी कर के.’’ मोना ने अंगड़ाई लेते हुए साड़ी का पल्लू सिर पर डालते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ सोनू ने पूछा तो मोना बोली, ‘‘महीने दो महीने बाद घर आते हैं, वह भी 2 दिन रह कर भाग जाते हैं. और मैं ऐसी बदनसीब हूं कि देवर भी साइज नापने से डरता है. कोई और होता तो साइज नापता और…’’ मोना की आंखों में नशा सा उतर आया था. अभी तक सोनू मोना की बातों को केवल मजाक में ले रहा था. उस में उसी हिसाब से कह दिया, ‘‘जब भैया नौकरी से आएं तो उन्हीं को दिखा कर साइज पूछना.’’

‘‘अगर पति बुद्धू हो तो भाभी का काम समझदार देवर को कर देना चाहिए.’’ मोना ने सोनू का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘क्याक्या काम कराओगी देवर से?’’ सोनू ने शरारत से पूछा.

‘‘जो देवर करना चाहे, भाभी मना नहीं करेगी. बस तुम्हारे अंदर हिम्मत होनी चाहिए.’’ मोना हंसी.

‘‘कल बात करेंगे.’’ कहते हुए सोनू वहां से चला गया.

दूसरे दिन सोनू मां की दवाई लेने बाजार जाने के लिए निकला तो मोना के घर जा पहुंचा. उस वक्त मोना खाना बना कर खाली हुई थी. सोनू को देखते ही वह चहक कर बोली, ‘‘बाजार जा रहे हो क्या?’’

‘‘मम्मी की दवाई लेने जा रहा हूं. तुम्हें कुछ मंगाना हो तो बोलो?’’ सोनू ने पूछा. मोना बोली, ‘‘बाजार में मिल जाए तो मेरी भी दवाई ले आना.’’ मोना ने चेहरे पर बनावटी उदासी लाते हुए कहा.

‘‘पर्ची दे दो, तलाश कर लूंगा.’’

‘‘मुंह जुबानी बोल देना कि ‘प्रेमरोग’ है, जो भी दवा मिले, ले आना.’’

‘‘भाभी, तुम्हें ये रोग कब से हो गया?’’ सोनू ने हंसते हुए पूछा.

‘‘ये बीमारी तुम्हारी ही वजह से लगी है.’’ मोना की आंखों में खुला निमंत्रण था.

‘‘फिर तो तुम्हें दवा भी मुझे ही देनी होगी.’’

‘‘एक खुराक अभी दे दो, आराम मिला तो और ले लूंगी.’’ कहते हुए मोना ने अपनी दोनों बांहें उठा कर उस की ओर फैला दीं.

सोनू कोई बच्चा तो था नहीं, न बिलकुल गंवार था, जो मोना के दिल की मंशा न समझ पाता. बिना देर लगाए आगे बढ़ कर उस ने मोना को बांहों में भर लिया. थोड़ी देर में देवरभाभी का रिश्ता ही बदल गया.

सोनू जब वहां से बाजार के लिए निकला तो बहुत खुश था. मन में कई महीनों की पाली उस की मुराद पूरी हो गई थी.

दरअसल, जब से मोना ने उसे इशारोंइशारों में रिझाना शुरू किया था, तभी से वह उसे पाने की कल्पना करने लगा था. उस ने आगे कदम नहीं बढ़ाया था तो केवल करीबी रिश्तों की वजह से. लेकिन आज मोना ने खुद ही सारे बंधन तोड़ डाले थे. धीरेधीरे मोना और सोनू का प्यार परवान चढ़ने लगा. मोना को सासससुर, जेठजेठानी किसी का डर नहीं था. वह परिवार से अलग और अकेली रहती थी. पति परदेश में नौकरी करता था, बालबच्चा कोई था नहीं. बच्चों के नाम पर सब से बड़े जेठ की

14 वर्षीय बेटी दिव्या ही थी जो रात को मोना के साथ सोती थी. वह भी इसलिए क्योंकि जाते वक्त मोना का पति बडे़ भैया से कह कर गया था मोना अकेली है, दिव्या को रात में सोने के लिए मोना के पास भेज दिया करें.

कमरा नंबर 104 का रहस्य

अमृतसर के सिटी सैंटर स्थित होटल सिंह इंटरनेशनल के रिसैप्शन पर बैठे मैनेजर दीपक से आने वाले युवक ने कहा था कि उसे ठहरने के लिए कमरा चाहिए तो उन्होंने रूम बौय को आवाज दे कर उसे कमरा दिखाने भेज दिया था. रूमबौय उस युवक को कमरा दिखाने फर्स्ट फ्लोर पर ले जाने लगा तो उस ने साथ आई युवती को स्वागतकक्ष में ही बैठा दिया था और खुद कमरा देखने चला गया था.

युवक को कमरा पसंद आ गया तो दीपक ने एंट्री रजिस्टर उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सर, इस में आप अपना नामपता और फोन नंबर आदि लिख कर अपनी और मैडम की आईडी दे दीजिए. कमरे का किराया एक हजार रुपए प्रतिदिन होगा और नियम के अनुसार चैकआउट का समय दोपहर 12 बजे होगा.’’

दीपक से एंट्री रजिस्टर ले कर उस ने युवक ने अपना नाम रणवीर सिंह और साथ आई युवती को पत्नी बता कर उस का नाम मोनिका लिख दिया. पता उस ने 26-ए, नियर केवीएस मालवीय रोड, जयपुर, राजस्थान लिखा. मोबाइल नंबर- 8766711800 लिख कर अपनी और पत्नी मोनिका की आईडी दीपक के पास जमा करा दी. इस के बाद रूम बौय ने उन्हें होटल के कमरा नंबर 104 में पहुंचा दिया. यह 12 नवंबर, 2016 की बात है. उस समय शाम के यही कोई साढे़ 4 बज रहे थे.

कुछ देर आराम करने के बाद दोनों ने चायनाश्ता किया और स्वर्णमंदिर श्री हरमिंदर साहिब के दर्शन करने चले गए. लौट कर उन्होंने रात का खाना होटल से ही मंगवा कर खाया. अगले दिन यानी 13 नवंबर को दोनों सुबह 11 बजे घूमने के लिए निकले तो रात करीब साढ़े 8 बजे लौटे. खाना वगैरह खा कर वे सो गए तो अगले दिन यानी 14 नवंबर को दोनों में से न कोई बाहर आया और न चायनाश्ता या खाना मंगाया.

पूरा दिन बीत गया और उस कमरे में कोई हलचल नहीं हुई तो रात 10 बजे के करीब होटल मैनेजर दीपक यह पता करने के लिए कमरा नंबर 104 के सामने जा पहुंचे कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि करीब 30 घंटे से इस कमरे से कोई बाहर नहीं निकला है.

दीपक ने दरवाजा भी खटखटाया और आवाजें भी दीं, लेकिन अंदर किसी तरह की हलचल नहीं हुई. उन्होंने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. अंदर उन्हें जो दिखाई दिया, वह परेशान करने वाला था. वह भाग कर नीचे आए और होटल के मालिक करनदीप सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘सरदारजी, कमरा नंबर 104 में एक लाश पड़ी है.’’

करनदीप सिंह फौरन होटल पहुंचे तो सारा स्टाफ कमरा नंबर 104 के सामने खड़ा था. उन्होंने देखा, कमरे के बैड पर 24-25 साल की एक युवती की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. पूछने पर मैनेजर दीपक ने बताया, ‘‘यह युवती 2 दिनों पहले ही अपने पति रणवीर सिंह के साथ होटल में आई थी.’’

‘‘इस का पति कहां है?’’

‘‘13 नवंबर की रात से वह दिखाई नहीं दिया.’’ दीपक ने कहा.

इस के बाद करनदीप सिंह ने थाना रामबाग की बसअड्डा पुलिस चौकी को फोन कर के मुंशी संजीव कुमार को इस बात की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही चौकीइंचार्ज एएसआई सुशील कुमार पुलिस बल के साथ होटल सिंह इंटरनेशनल आ पहुंचे. होटल में लाश मिलने की सूचना उन्होंने थाना रामबाग के थानाप्रभारी, एसीपी और क्राइम टीम को भी दे दी थी.

उन्हीं की सूचना पर थाना रामबाग के थानाप्रभारी इंसपेक्टर दलविंदर कुमार, एसीपी (ईस्ट) गुरमेल सिंह भी होटल आ पहुंचे थे. पुलिस ने कमरे और लाश का निरीक्षण किया. बैड पर लाश पड़ी थी. उसी के पास रखी टेबल पर खून सनी एक हथौड़ी रखी थी. उसी टेबल पर पानी का जग और 2 गिलास रखे थे.

मृतका के सिर के पिछले हिस्से में गहरे घाव थे. चेहरे पर भी चोटों के गंभीर निशान थे, जो संभवत: हथौड़ी के वार से हुए थे. फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों के अनुसार, हत्यारा इतना चालाक था कि उस ने कमरे की इस तरह सफाई की थी कि कहीं भी उस की अंगुली के निशान नहीं मिले थे. हथौड़ी पर भी अंगुलियों के निशान नहीं थे.

चौकीइंचार्ज ने लाश को कब्जे में ले कर सारी काररवाई निपटाई और पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर अपराध संख्या 460/2016 पर हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

पुलिस ने होटल में लगे सीसीटीवी कैमरों की 12 नवंबर से 15 नवंबर तक की फुटेज कब्जे में ले ली थी. रजिस्टर में दर्ज रणवीर और मोनिका का पता, फोन नंबर नोट कर के रणवीर द्वारा होटल में जमा कराई गई आईडी भी अपने कब्जे में ले ली.

पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या रणवीर ने ही की है, इसलिए चौकीइंचार्ज सुशील कुमार ने उस की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने एएसआई बलदेव सिंह, हैडकांस्टेबल बलविंदर सिंह, हीरा सिंह, बूटा सिंह, गुरचरण सिंह, गुरप्रीत सिंह, हरप्रीत सिंह, हरजिंदर सिंह और कांस्टेबल रणजीत सिंह को शामिल किया.

होटल के रजिस्टर में रणवीर द्वारा लिखवाया गया मोबाइल नंबर चैक किया गया तो वह फरजी पाया गया. जयपुर भेजी गई पुलिस टीम ने लौट कर बताया कि होटल में रणवीर ने जो पता लिखाया था और जो आईडी दी थी, वे सब फरजी थीं. इस के बाद सीसीटीवी फुटेज से मिले रणवीर और मोनिका के फोटो पंजाब और राजस्थान के सभी थानों को भेज कर कहा गया कि अगर इन के बारे में कोई जानकारी मिले तो सूचना दी जाए.

लाश का पोस्टमार्टम होने के बाद शिनाख्त न होने की वजह से चौकीइंचार्ज सुशील कुमार ने अपने खर्चे से उस का अंतिम संस्कार करा दिया. लाख प्रयास के बाद भी रणवीर और मृतका के बारे में कोई जानकारी न मिलने से सुशील कुमार भी शांत हो गए.

लेकिन 8 दिसंबर, 2016 को अचानक बाड़मेर, राजस्थान के पुलिस अधीक्षक गगन सिंगला के औफिस से एक संदेश मिला, जिस में कहा गया था कि अमृतसर के होटल सिंह इंटरनेशनल के कमरा नंबर 104 में पत्नी भावना चौधरी की हत्या कर के फरार हुआ हत्यारा राजेंद्र चौधरी उन की हिरासत में है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए चौकीइंचार्ज सुशील कुमार अपने साथ हैडकांस्टेबल हरप्रीत सिंह, हरजिंदर सिंह और बलविंदर सिंह को ले कर 9 दिसंबर को बाड़मेर पहुंच गए. थाना सदर के थानाप्रभारी जयराम चौधरी के सामने उन्होंने राजेंद्र चौधरी से शुरुआती पूछताछ कर के विस्तारपूर्वक पूछताछ करने एवं सबूत जुटाने के लिए 10 दिसंबर, 2016 को उसे बाड़मेर के जेएमसी अंबिका सोलंकी बल्होत्रा की अदालत में पेश कर के 3 दिनों के ट्रांजिट रिमांड पर ले लिया.

राजेंद्र चौधरी उर्फ रणवीर सिंह को अमृतसर ला कर ड्यूटी मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के रिमांड पर लिया और पुलिस चौकी ला कर पूछताछ की गई तो होटल सिंह इंटरनेशनल के कमरा नंबर 104 में हुई युवती की हत्या के बारे में की गई पूछताछ में उस ने जो कहानी बताई, वह घरेलू कलह और संदेह के घेरे में कैद एक अविवेकी पुरुष की मानसिकता से जुड़ी कहानी थी.

राजेंद्र प्रकाश चौधरी राजस्थान के जिला बाड़मेर के सारणनगर-जालिया के रहने वाले तगाराम का बेटा था. राजेंद्र के अलावा उन की 2 संतानें और थीं, एक बेटा और एक बेटी. 12वीं करने के बाद राजेंद्र डिस्कौम कंपनी में इलैक्ट्रिशियन की नौकरी करने लगा था. पितापुत्र की कमाई से घर के खर्च आराम से चल जाते थे.

राजेंद्र की नौकरी लग गई तो घर वालों ने लड़की देख कर 10 जून, 2014 को भावना से उस की शादी कर दी. भावना बहुत खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन खराब भी नहीं थी. पतिपत्नी दोनों सामान्य शक्लसूरत के थे, इसलिए दोनों ही एकदूसरे को दिल से चाहते थे. पर इस में परेशानी तब खड़ी हुई, जब राजेंद्र पत्नी पर संदेह करने लगा.

दरअसल, भावना का हंसमुख स्वभाव ही उस के लिए दुश्मन बन गया. अपने इसी स्वभाव की वजह से वह हर किसी से हंसहंस कर बातें कर लेती थी. उस के इसी स्वभाव की वजह से घर वाले ही नहीं, बाहर वाले भी उसे पसंद करते थे. लेकिन राजेंद्र को उस का यह स्वभाव यानी हर किसी से हंसनाबोलना जरा भी पसंद नहीं था.

इसी बात को ले कर पहले तो थोड़ीबहुत कहासुनी होती रही, लेकिन धीरेधीरे इस कहासुनी ने झगड़े का रूप ले लिया. जब यह झगड़ा रोजरोज होने लगा तो राजेंद्र की मोहल्ले में बदनामी होने लगी. इस बदनामी से बचने के लिए उस ने घर छोड़ दिया और नेहरूनगर में किराए का मकान ले कर पत्नी के साथ रहने लगा.

राजेंद्र ने घर जरूर बदल लिया था, लेकिन न उस का स्वभाव बदला था और न भावना का. इसलिए घर वालों से अलग होने के बाद पतिपत्नी के बीच होने वाले झगड़े और ज्यादा होने लगे. वह भावना को किसी से बातें करते देख लेता तो उस का खून खौल उठता. भावना लाख सफाई देती, लेकिन वह उस की बातों पर बिलकुल विश्वास नहीं करता था. इसी वजह से वह शराब भी पीने लगा.

एक दिन झगड़ा करने के बाद राजेंद्र ने शराब पी तो उस के दिमाग में आया कि ऐसी बेशर्म और बदचलन औरत को मौत के घाट उतार देना ही ठीक है. यह जब तक जिंदा रहेगी, उसे इसी तरह जिल्लत और बदनामी झेलनी पड़ेगी. बस इसी के बाद वह भावना की हत्या के बारे में सोचने लगा.

वह भावना की हत्या कुछ इस तरीके से करना चाहता था कि किसी भी सूरत में पकड़ा न जाए. इस के लिए वह साइबर कैफे जा कर इंटरनेट पर भावना की हत्या के लिए आइडिया ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे आइडिया मिल गया. इस के बाद उस ने बाजार से एक सर्जिकल ब्लेड और हथौड़ी खरीद कर रख ली.

इस के बाद राजेंद्र ने साइबर कैफे से ही अपने और भावना के फरजी नाम रणवीर और मोनिका के नाम से पहचान पत्र बनाया. योजना के अनुसार, उस ने भावना से लड़ाईझगड़ा बंद कर दिया और उसे विश्वास में लेने के लिए प्यार से बातें करने लगा. फरजी पहचान पत्र से नया सिम खरीद कर उस ने भावना से कहा, ‘‘अब हमारे घर का झगड़ाक्लेश खत्म हो गया है, क्यों न हम कहीं घूमने चलें?’’

भावना को भला इस में क्या ऐतराज हो सकता था. वह तैयार हो गई तो 10 नवंबर, 2016 को फरजी पहचान पत्र से टिकट करा कर वह भावना के साथ अमृतसर आ गया. घर से चलते समय उस ने अपना मोबाइल फोन घर में ही खड़ी मोटरसाइकिल की डिक्की में रख दिया था, जिस से कभी कोई बात हो तो उस के फोन की लोकेशन घर की मिले.

अमृतसर में उस ने होटल सिंह इंटरनेशनल में कमरा नंबर 104 बुक कराया और उसी में भावना के साथ ठहर गया. 13 नवंबर को दिन में उस ने भावना को अमृतसर में घुमाया और रात 9 बजे लौट कर होटल के कमरे में ही शराब पीने बैठ गया. बातोंबातों में प्यार की दुहाई दे कर उस ने भावना को भी शराब पिला दी.

रात के 11 बजे के करीब राजेंद्र ने देखा कि भावना की नशे और नींद की खुमारी में आंखें बंद हो रही हैं तो पहले उस ने उसे पीटपीट कर अधमरा कर दिया. इस के बाद साथ लाई हथौड़ी से उस के सिर और चेहरे पर कई वार किए. वह बेहोश हो गई तो सर्जिकल ब्लेड से श्वांस नली काट दी.

भावना की हत्या करने के बाद उस ने कमरे में मौजूद एकएक चीज से अपनी अंगुलियों के निशान मिटाए. इस के बाद 12 बजे के करीब कमरे का दरवाजा बंद कर के वह होटल के बाहर निकल गया. रेलवे स्टेशन से उस ने ट्रेन पकड़ी और बाड़मेर पहुंच गया.

घर आने पर उसे पता चला कि उस की अनुपस्थिति में उस का साला देवेंद्र भावना के बारे में पता करने आया था. इस के बाद जब उस से भावना के बारे में पूछा गया तो सारी सच्चाई सामने आ गई और भावना की हत्या का राज खुल गया.

सबूत जुटाने के लिए राजेंद्र को 2 दिनों के रिमांड पर और लिया गया. इस बीच उस की निशानदेही पर उस के घर से सर्जिकल ब्लेड बरामद कर ली गई. हथौड़ी होटल के कमरे से बरामद ही हो चुकी थी, इसलिए 2 दिनों का रिमांड समाप्त होने पर उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कपड़ों पर कलह क्यों

कुछ ही समय पहले क्रिकेटर मोहम्मद शमी और उन की पत्नी के साथ एक घटना घटित हुई. मोहम्मद शमी ने अपनी पत्नी हसीन के साथ अपनी कुछ तसवीरें सोशल मीडिया पर डालीं, तो उन पर कलह मच गई. हंगामें की वजह हसीन के कपड़े बताए गए, जो मजहब के मुताबिक न हो कर कुछ ज्यादा आधुनिक और खुले ठहराए गए. अचरज इस बात का था कि फोटो में दिख रहीं हसीन के कपड़ों में ऐसा कुछ भी नहीं था, जो उन्हें एक आम भारतीय महिला के परिधानों से अलग करता हो, लेकिन सोशल मीडिया पर मोहम्मद शमी के प्रशंसकों को भी उन की यह हरकत पसंद नहीं आई. इसलाम और अल्लाह का हवाला दे कर लिखा गया कि अपनी बीवी को कपड़े में रखो और कुछ सीखो अमला अली से और भी बहुत सारों से.

एक ट्विटरबाज ने तो यह नेक सवाल भी पूछ डाला कि आखिर आप को क्या हो गया, जो आलोचकों का जवाब देने के लिए रोज नंगी तसवीरें लगा रहे हो?

मोहम्मद शमी इस टीकाटिप्पणी से घबराए नहीं. उन्होंने जवाब में नए साल पर फेसबुक पर एक और तसवीर अपलोड की और आलोचकों को यह कहते हुए जवाब दिया कि वे अच्छी तरह जानते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं. उन्हें अपने अंदर झांकना चाहिए कि वे कितने अच्छे हैं.

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, लेकिन उस के बाद उसे तमाम बंदिशों में रखो. मजहब, लोकलाज, परंपराओं के नाम पर बेटियों को हाशिए पर धकेलने का हमारा इतिहास रहा है, लेकिन 21वीं सदी में ऐसी सोच शर्मिंदा करती है. अफसोस है कि महिलाओं के कपड़ों पर जम कर टीकाटिप्पणी की जाती है.

दुनिया के कई आधुनिक देशों में भी कार्यस्थलों पर महिलाओं के पहनावे पर बहस हो रही है. हाल ही में ब्रिटेन की संसद ने उन कंपनियों पर जुर्माना लगाने की बात कही है, जिन्होंने महिलाओं के लिए ड्रैस कोड लागू किया है. वहां एक रिसैप्शनिस्ट की ऊंची एड़ी के  सैंडल पहन कर आने पर औफिस से घर भेज दिया गया था. इस ड्रैस कोड को अदालत में चुनौती दी गई तो लंदन की संसद ने कंपनी पर जुर्माना लगा दिया.

स्कूलों और दफ्तरों के ड्रैस कोड का फिर भी एक मतलब हो सकता है, पर शहरों से ले कर गांवों व कसबों तक में सामान्य महिलाओं के खानेपीने, बात करने, हंसीठहाके लगाने, पहननेओढ़ने से ले कर चालढाल आदि पर इतनी गाइडलाइंस हैं कि समझ में ही नहीं आता कि कब किस बात पर कौन नाराज हो जाए और क्या कर बैठे. कपड़ों में जरा सा भी फैशन नजर आएगा, तो वह छेड़छाड़ से ले कर रेप तक का आमंत्रण देते हुए माना जाता है. स्कूलों में ड्रैस तो जरूरी है, लेकिन अगर कोई लड़की गलती से लिपस्टिक लगा कर चली आई, तो कहा जाता है कि यह विशुद्ध रूप से नैतिकता भंग करने का मामला बनता है. दफ्तर में अगर उस ने भारतीय शैली की पोशाकें (साड़ी या सलवारकमीज) न पहन कर जींसटौप जैसी कोई ड्रैस पहन कर आने की कोशिश, तो यह अनुशासनहीनता मानी जाती है. और तो और विदेशी महिला पर्यटकों को भी साफ तौर पर ताकीद की जाती है कि उन्होंने स्कर्ट जैसी पोशाक पहन कर भारत भ्रमण की कोशिश की तो उन के साथ कुछ भी हो सकता है और तब शायद इस की कोई जिम्मेदारी भारत सरकार न ले सके.

पिछले वर्ष केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री महेश शर्मा विदेशी महिला पर्यटकों के लिए यह कह बैठे कि यदि वे इस देश में भ्रमण कर रही हैं, तो स्कर्ट जैसी पोशाक न पहनें. वजह निश्चित यही है कि मंत्री महोदय को देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा नहीं है. ऐसे में वे पर्यटकों को ही दिशानिर्देश दे सकते हैं कि अपना तन जितना हो सके ढक कर रखें तो ही बेहतर, फिर चाहे आप किसी समुद्र तट पर ही क्यों न हों. इस विवाद पर हालांकि मंत्रीजी ने बाद में यह कह कर पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी कि उन का आशय देश के धर्मस्थलों में प्रवेश के वक्त पहनी जानी वाली पोशाकों के संदर्भ में था.

पिछले साल ऐसा ही एक विवाद पटना स्थित एनआईटी में एक छात्रा को दुष्कर्म की नीयत से अगवा कर लेने के संबंध में पैदा हुआ. जब घटना की शिकायत की गई तो एनआईटी के निदेशक ने छात्राओं को सलाह दे डाली कि अगर वे इसी तरह शौर्ट्स पहनेंगी, तो ऐसी घटनाएं होंगी ही. पोशाकों की शालीनता से जुड़े ऐसे निर्देशों की हमारे देश में भरमार है.

कपड़ों पर सरकारी निर्देश: महिलाओं के पहनावे पर सरकारी विभाग भी निर्देश देने से पीछे नहीं रहे हैं. 2016 में हरियाणा सरकार ने सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को जींस पहनने से परहेज बरतने को कहा था. इस के पीछे आशय यह था कि जींस का बच्चों और समाज पर अच्छा असर नहीं पड़ता है. जींस खराब असर क्यों डाल रही है, इस आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया था पर साफ प्रतीत हो रहा था कि इस में सरकार को फैशन का पुट नजर आ रहा था और महिलाओं के संदर्भ में उन की जींस यौन आमंत्रण देते हुए प्रतीत हो रही थी.

हरियाणा में यह काम पहले भी हो चुका है. 2012 में हरियाणा के महिला और बाल विभाग ने एक सरकारी आदेश के तहत कर्मचारियों को शालीन कपड़े पहन कर दफ्तर आने का निर्देश जारी किया था. विभाग की तरफ से जारी सर्कुलर में भारतीय पोशाकों (साड़ी, सलवारकमीज) को शालीन कपड़ों की श्रेणी में रखा गया था और पश्चिमी पोशाकों टीशर्ट, टौप, जींस आदि को भड़काऊ परिधान कहा था.

वैसे ऐसे फरमान जारी करने वाला हरियाणा अकेला राज्य नहीं है. उसी वर्ष एक कोशिश तमिलनाडु के स्कूली शिक्षा विभाग ने की थी, जिस ने स्कूली शिक्षकों से कहा था कि वे ऐसे शालीन कपड़ों में आएं जो उन के पेशे और संस्कृति से मेल खाते हों. 2013 में कर्नाटक सरकार ने सरकारी विभागों में महिला कर्मचारियों के लिए जो ड्रैस कोड लागू किया था, उस के मुताबिक उन्हें ऐसे कपड़े पहनने के लिए कहा गया था जिन से पैरों से ले कर सिर तक पूरा शरीर ढक सके.

जब सरकार ही ऐसे निर्देश दे, तो पंचायतें भला पीछे कैसे रह सकती हैं. मार्च, 2014 में उत्तर प्रदेश के मथुरा के बरसाना में 52 गांवों की एक पंचायत ने महिलाओं के जींस पहनने पर पाबंदी लगा दी थी.

क्या पहनें महिलाएं: कपड़ों के संबंध में नसीहतें देते समय क्या इस बारे में सटीकता से बताया जा सकता है कि आखिर तमीजदार और मजहब के मुताबिक पोशाकें आखिर क्या हैं? हमारे देश में पुरुषों के लिए कुरतापाजामा और महिलाओं के लिए साड़ी को भारतीय पोशाक कहा और माना जाता है, पर कितने महिलापुरुष आज ऐसे हैं, जो घर से बाहर दौड़धूप करते और दफ्तर जाते वक्त ये पोशाकें धारण करते हैं? कामकाज के लिहाज से जो सहूलतें पुरुषों को पैंटशर्ट और महिलाओं को जींसटौप से आज के भारत में मिल रही हैं और जो कायदे से राष्ट्रीय पोशाकें कहलाने की हकदार बन चुकी हैं, वे भारतीय तो नहीं हैं, लेकिन हम ने उन्हें सहूलत के पैमाने पर अपनाया है.

ऐसे में उन फरमानों का कोई मतलब कहां रह जाता है जिन में यह बताया जाता है कि घर में शौहर के साथ तसवीर खिंचवाते वक्त कौन सी पोशाक पहनी जाए, जो तन को इतना ढकती हो, जिस से मजहब आहत न हो. हमारे देश में आम तौर पर जींसशौर्ट्स जैसे कपड़ों को महिलाओं के लिए एक वर्जित पोशाक बताया जाता रहा है. कुछ समय पहले बरसाना की पंचायत में कहा गया था कि ऐसी पोशाकें पहनी किशोरियां और युवा लड़कियां अपनी एक स्वच्छंद छवि पेश करती हैं और गांवों के बंद समाजों के पुरुष उन्हें ऐसी पोशाकों में देख कर यौन आमंत्रण समझ भड़क सकते हैं.

आज के शहरी और कसबाई समाज के निचले और मध्यवर्ग की कामकाजी महिलाओं की बात करें, तो उन के सामने जींसटौप जैसे सस्ते और सुविधाजनक विकल्प नहीं हैं. विचार किया जाना चाहिए कि पुरुषों से अलग आज की स्त्री को आखिर इस की क्या जरूरत पड़ी है कि वे सलवारकमीज और साड़ी जैसे अच्छेभले कपड़ों को छोड़ कर जींसटौप पहनने लगी हैं? इस सवाल का जवाब हमें शिक्षा और उन्नति की उस इच्छा की तरफ ले जाता है जिसे अब गांवदेहात की लड़कियां भी हासिल कर लेना चाहती हैं. स्कूली शिक्षा खत्म कर जब वे शहरों का रुख करती हैं, तो वक्त की चाल से कदम मिलाने और शहरी समाज की मानसिकता से तालमेल बैठाने के लिए सलवारकमीज या साड़ी जैसी भारतीय पोशाकें मिसफिट साबित होती हैं. साड़ी कुछ दफ्तरों में बेहद ऊंचे ओहदे अथवा सरकारी हवाई कंपनी की एअरहोस्टेस जैसे खास पेशों में काम करने वाली और हमेशा कार से चलने वाली महिलाओं की पोशाक तो जरूर हो सकती है, लेकिन बाकियों के लिए तो जींसटौप ही एकसुविधाजनक विकल्प बचता है.

असल में, पहनावे के मामले में कपड़ों की कीमत आज एक बड़ा कारक है. साड़ी या सलवारकमीज के मुकाबले लड़कियों के लिए जींसटौप बेहद सस्ता विकल्प साबित होता है. आमतौर पर जितने में एक साड़ी आती है, उतने में 2 जोड़ी जींसटौप का प्रबंध हो जाता है और उसी 2 जोड़ी पोशाक में किसी कायदे के प्रोफैशनल कोर्स की पढ़ाई का एकाध साल निकल जाता है. गांवदेहात के गरीब मांबाप ही नहीं, बल्कि शहरों के आम मध्यवर्गीय अभिभावक भी अपनी बेटियों को जींसटौप दिलाने की कोशिश करते हैं. एक जींस के साथ

4 टौप ले लिए, तो वही काफी होता है. उन की धुलाई और रखरखाव आदि का खर्चा भी सीमित है. हमें भूलना नहीं चाहिए कि जींस के इस अर्थशास्त्रीय पहलू पर गौर किए बिना जहां कहीं भी उस पर प्रतिबंध लगाए गए वे प्रतिबंध ज्यादा दिन टिक नहीं सके.

संस्कारी जींस: आश्चर्य की बात तो यह है कि यह स्वदेशी का जोरशोर से प्रचार करने वाली बाबा रामदेव की कंपनी (पतंजलि प्रोडक्ट्स) ने भी समझ लिया है कि भले ही जींस पश्चिमी देशों का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करते हुए भारत आई है, पर वक्त और कामकाज की जरूरतों के मद्देनजर यह इतनी सुविधाजनक पोशाक साबित हुई कि यह भारत में रचबस गई है. यह भी कि फिलहाल इस का कोई दूसरा बेहतर विकल्प नहीं है. हालांकि उन की कंपनी स्टाइल, डिजाइन और कपड़े के मामले में जींस का देशी विकल्प पेश करेगी खासतौर से महिलाओं के संदर्भ में यह भारतीय संस्कृति और मर्यादाओं का खयाल रखते हुए ढीलीढाली होगी. जींस के कपड़े का नया विकल्प देना इस अर्थ में सराहनीय है कि इस में सिंथैटिक धागों के स्थान पर सूती धागों का प्रयोग किया जाएगा और विदेशी कंपनियों से देश को नजात दिलाने का एक और प्रयास इस के माध्यम से होगा. लेकिन यह बयान खटकने वाला है कि इस का डिजाइन भारतीय संस्कृति के अनुरूप ढीलाढाला होगा.

जींस के ऐसे महिलाकरण के पीछे का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट है. जिस तरह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के नूडल्स में कुछ समस्या निकलने पर बाबा रामदेव की कंपनी अपने नूडल्स ले कर बाजार में उतर गई थी, उसी तरह विदेशी जींस के बाजार को देखते हुए वे उस का स्वदेशीकरण महिलाकरण करते हुए अपना व्यापारिक हित साध लेना चाहते हैं. खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में यह उन का अधिकार है. इस से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता. लेकिन मूल सवाल ढीलीढाली और भारतीय संस्कारों वाली जींस का है. इस में भरपूर ऐतराज है. इसी बिंदु पर आ कर रामदेव की जींस उसी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त नजर आने लगती है, जिस में वह तन ढकने के सुविधाजनक विकल्प के बजाय पश्चिमी फैशनपरस्ती और देह दिखाऊभड़काऊ पोशाक में तबदील हो जाती है.

इस में कोई समस्या नहीं है कि डैनिम के कपड़े से बनने वाली जींस के सूती विकल्प पेश किए जाएं, लेकिन समस्या तब है जब उसे भारतीय संस्कारों के अनुरूप बनाने की पेशकश के तहत लाया जाए. ऐसी संस्कारी जींस की बात उठाते वक्त उन्हें एकसाथ भारतीय इतिहास और वर्तमान दोनों पर नजर दौड़ानी चाहिए. सौ साल पहले भारतीय महिलाओं की पोशाक इतनी बंदिशों वाली नहीं थी कि उन की सांस ही घुटने लगे. सलीके वाली धोतीचोली ग्रामीण और कसबाई समाज की महिलाओं की दिनचर्या में शामिल थीं, पर उस समय भी वे पाबंदियों वाले ड्रैसकोड के तहत नहीं अपनाई जाती थीं.

अगर जींस के इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो 3 बातें पता चलती हैं- एक यह कि रफटफ होने के कारण यह मजदूर और कामकाजी तबके की पोशाक रही है और दूसरी यह कि फैक्टरियों से ले कर आम दिनचर्या में इसे इस की चुस्त फिटिंग के लिए पसंद किया गया है. मौजूदा भारतीय समाज में इस की स्वीकार्यता के पीछे भी यही अहम कारण हैं. लड़कियों ने जींस को अव्वल तो इस के सस्तेपन की वजह से अपनाया है और इसलिए भी कि सलवारकमीज और साड़ी के मुकाबले इस के रखरखाव में झंझट नहीं है. साथ ही, यह अन्य पोशाकों के मुकाबले ढीलीढाली नहीं होती है, बल्कि चुस्त फिटिंग के कारण इस के हिस्सों के कहीं उलझनेफंसने की समस्या भी नहीं रहती.        

मैं खुद को एक ब्रैंड समझती हूं : पूनम पांडेय

हमेशा सैक्सी फोटोग्राफ्स और सैक्सी बयानों से सुर्खियों में रहने वाली 25 वर्षीय पूनम पांडेय ने अपने कैरियर की शुरुआत मौडलिंग से की. फिर किंगफिशर कैलेंडर के लिए चुनी गईं, जहां हौट और सैक्सी शूट दे कर चर्चा में आईं. 2011 के विश्व कप क्रिकेट के दौरान पूनम ने घोषणा की थी कि अगर इंडिया जीतती है तो वे न्यूड हो जाएंगी. लेकिन बाद में किसी कारणवश वे ऐसा नहीं कर पाईं. मगर बीचबीच में वे ऐसी सैक्सी और बोल्ड तसवीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करती रहती हैं. वे इसे गलत नहीं मानतीं. उन के हिसाब से वे खुद को एक प्रोडक्ट समझती हैं जिस की पब्लिसिटी वे अपने हिसाब से करती हैं. पर रीयल लाइफ में वे एक साधारण लड़की की तरह ही फीलिंग्स रखती हैं.

पूनम ने ‘ब्रैस्ट कैंसर अवेयरनैस’ के लिए एक वीडियो बनाया है. वे चाहती हैं कि हर महिला को कैंसर से बचने के लिए अपनी ब्रैस्ट की नियमित जांच करानी चाहिए. उन से मिल कर बात करना रोचक रहा. पेश हैं, कुछ अंश:

ब्रैस्ट कैंसर अवेयरनैस कैंपेन से कैसे जुड़ीं?

इस कैंपेन के लोग मेरे पास आए. उन्होंने पहले काफी सारी ऐक्ट्रैस के साथ इसे किया था. इस बार उन्होंने मुझे औफर दिया, तो मैं ने सोचा कुछ हैल्दी काम कर लिया जाए.

अभिनय के क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

मैं कोई इत्तफाक से अभिनय में नहीं आई. मुझे बचपन से ही मौडलिंग का शौक था. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सुपरस्टार के चेहरे आप को इस में आने के लिए प्रेरित करते हैं. मैं माधुरी दीक्षित की बहुत बड़ी फैन हूं. मैं हमेशा माधुरी को फौलो करती थी. मेरे परिवार में कोई भी अभिनय के क्षेत्र में नहीं है. मैं मुंबई की हूं. मेरे पिता व्यवसायी हैं और मां हाउसवाइफ हैं. मेरे भाई और बहन सभी सैटल हैं. मैं ने कभी फोटो शूट नहीं कराया. मैं ‘मेगा मौडल कौंटैस्ट’ में चुन ली गई. वहां इतनी सारी लड़कियों में मुझे चुन लेना बहुत बड़ी बात थी. हालांकि परिवार में किसी को उम्मीद नहीं थी कि मैं इस प्रतियोगिता में विजयी हो जाऊंगी. इसीलिए पिताजी ने भी हां कह दी थी. मेगा मौडल बनने के बाद मुझे पता चला कि यह क्षेत्र क्या है. फिर किंगफिशर कैलेंडर में काम करने का मौका मिला. इस के बाद कई औफर्स मिलने लगे. मैं 19 साल की उम्र में लाखों कमाने लगी थी. फिर मैं ने स्नातक करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी और आज पूरी तरह से इस क्षेत्र में आ गई.

आप के काम पर परिवार की प्रतिक्रिया क्या थी?

मेरी अपनी मां को जब मैं ने बिकिनी वाली तसवीर दिखाई तो वे चौंक गईं और पूछने लगीं कि किस ने यह तसवीर खीचीं. उन्होंने उसे मारने की बात कही. पिता भी पहले भड़क उठे कि ये सब बंद करो. मैं ने उन से जब अपनी इच्छा जताई तो वे चुप हो गए. मैं बहुत जिद्दी स्वभाव की हूं. अगर कोई मुझे कुछ करने को मना करे, तो उसे करने की इच्छा और बढ़ जाती है. अब मेरे मातापिता की सोच बदल चुकी है.

कितना संघर्ष रहा?

मैं मेगा मौडल बनी. फिर कुछ काम भी किया तब लगा कि अपनी पहचान कैसे बनाई जाए? मैं ने कुछ बड़ा करने की योजना बनाई और वर्ल्ड कप वाली कंट्रोवर्सी मेरे जीवन में आई और लोगों ने मुझे इसी रूप में पहचाना.

क्या आप काम न मिलने की वजह से इस तरह के हथकंडे अपनाती हैं?

मैं सोशल मीडिया पर काफी ऐक्टिव हूं. मैं बहुत पैसे कमाती हूं. मेरे 1-1 ट्वीट के अच्छे पैसे मिलते हैं. यूट्यूब से पैसा मिलता है. मैं ने हाल ही में इंटरनैशनल रिऐलिटी शो किया है, जिस में मैं ने इंडिया को रिप्रेजैंट किया है. मैं ने हिंदी फिल्म ‘नशा’ फिर एक तेलुगु फिल्म की. अभी भी एक तेलुगु फिल्म में काम कर रही हूं. एक हिंदी फिल्म भी बड़े बैनर में आने वाली है. इसीलिए यह कहना गलत है. मुझे बहुत सारी फिल्मों के औफर आते हैं. लोग कहते हैं कि आप को अंतरंग दृश्य करने पड़ेंगे, पर कहानी नहीं होती. आज के दर्शक बेवकूफ नहीं हैं. वे हर फिल्म में कहानी मांगते हैं. ‘द वीकेंड’ ऐसी ही शौर्ट फिल्म है, जिस की कहानी बहुत अच्छी है, जिस के लिए मुझे अभिनय के लिए तारीफ मिल रही है, स्किन शो के लिए नहीं.

आप ने अभिनय से हट कर बहुत ही अलग तरीके से अपनेआप को पौपुलर किया. इस की वजह क्या है?

मैं अभिनय को अधिक महत्त्व देती हूं, लेकिन मुझे आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था, इसीलिए मैं ने इस रास्ते को चुना. मैं ने वह रूट फौलो नहीं किया, जिसे सब करते हैं. यह मेरी लाइफ है. मैं अपने तरीके से आगे बढ़ना चाहती हूं. मेरे लिए यह सही भी दिख रहा है. मैं ने खुद को सेल किया है. मैं अगर एक नौर्मल इनसान की नजर से देखूं तो मैं ने सारे सिली काम किए हैं और यही बेवकूफी मेरे लिए काम कर गई. मैं खुश हूं कि मैं ने अपने बलबूते अपनी मंजिल पाई है. पहले मुझ पर लोग हंसते थे, पर अब मेरे दिमाग की तारीफ करते हैं.

आप को कभी कास्टिंग काउच का सामना करना पड़ा?

नहीं. मुझे कभी नहीं करना पड़ा, पर जिस के साथ भी ऐसा होता है उस में दोनों की बातें हमें पता नहीं होती. ऐसे में क्या सही है क्या गलत मैं नहीं कह सकती.

अंतरंग दृश्य करने के लिए आप कितनी सहज होती हैं?

किसी भी चीज को दिमाग पर नहीं लेती, क्योंकि यह एक  व्यवसाय है. मैं अपनेआप को एक ब्रैंड समझती हूं. मैं जो भी कर रही होती हूं, उस में एक प्रकार की रणनीति होती है. अपनेआप को लोगों के सामने लाने का यह एक जरीया है.

लव और रिलेशनशिप में किसे आप अधिक महत्त्व देती हैं?

 ‘लव’ को मैं अधिक महत्त्व देती हूं. आजकल लोग इसे भूलने लगे हैं पर मैं अपने मातापिता की लाइफ से बहुत प्रभावित हूं.

आप के सपनों का राजकुमार कैसा होना चाहिए?

जो मुझे ‘ट्रू लव’ दे. मैं ऐसा नहीं चाहती कि कोई मेरी जिंदगी में आए और थोड़े दिनों बाद ब्रेकअप कर चल दे.

प्यार में सैक्स कितना जरूरी है?

आजकल पूरी दुनिया बदल गई है. प्यार से पहले सैक्स आता है, रिश्तों की अहमियत खत्म हो गई है. इसीलिए तलाक के मामलों की संख्या बढ़ रही है. आज ‘वन नाइट स्टैंड’ की अवधारणा है. यूथ इसे कूल मानते हैं. मैं प्यार को महत्त्व देती हूं.

आप कितनी फैशनेबल और फूडी हैं?

मैं बहुत इजी गोइंग हूं. फूडी भी हूं. खूब खाती हूं. मटरपनीर, समोसा, आलू के परांठे आदि सब बना लेती हूं.

कहां घूमने जाना पसंद करती हैं?

मैं बहुत सी जगहें गई हूं. पर मुझे अपना घर और मां के हाथों का बना खाना और उन के पास रहना सब से अधिक पसंद है.

कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है?

मैं अपनेआप को पूरे कपड़ों में देखना चाहती हूं और निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म करना चाहती हूं. मुझे पता है कि मैं ने बहुत सारी बेवकूफी वाले काम किए हैं, पर मैं एक हैल्दी निर्देशक के माइंड को समझ कर फिल्में करना चाहती हूं. विद्युत जामवाल और रणवीर सिंह के साथ फिल्में करना चाहती हूं.     

‘उसने पीछे से आकर मेरे ब्रेस्ट पकड़ लिये और फिर…’

अनिल कपूर की बेटी और जानी मानी अभिनेत्री सोनम कपूर ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि उनका सेक्सुअल ह्रासमेंट हुआ था. सोनम कपूर ने खुलासा किया कि उनके साथ बचपन में गलत हरकत हुई थी. हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में सोनम ने बताया कि थिएटर में पीछे से आकर एक शख्स ने मेरे ब्रेस्ट पकड़ लिए थे. उन्होंने इस बात का खुलासा राजीव मसंद के शो में किया, जिसमें उनके साथ विद्या बालन, अनुष्का शर्मा, आलिया भट्ट और राधिका आप्टे भी थीं. इंटरव्यू में सोनम ने जिस बेबाकी से अपने साथ हुई घटना को बताया, वो काफी चौंकाने वाला है.

सोनम कपूर ने बेहद खुले अंदाज में कहा कि 13-14 साल की उम्र में मेरे साथ यौन यौन शोषण हुआ था. सोनम ने बताया कि किस तरह से एक थियेटर में उनके ब्रेस्ट को गलत तरीके से पकड़ा गया था. सोनम ने बताया कि जब मैं 13 साल की थी तब मैं अपनी दोस्तों के साथ एक बार फिल्म देखने के लिए थियेटर गयी थी. उसी थियेटर में एक शख्स ने मुझे पीछे से पकड़ लिया. सोनम कपूर ने कहा कि जब मैं छोटी थी, मेरा यौन शोषण किया गया था. बचपन में किसी को भी निशाना बनाना काफी आसान होता है.

सोनम ने बताया कि मैं महज 13-14 साल की थी और मैं अक्षय और रवीना की एक फिल्म देखने के लिए थिएटर गयी थी. सोनम ने आगे बताया कि फिल्म के दौरान हमें समोसे खाने का मन हुआ और हम समोसे लेने बाहर स्टॉल पर आए. जब मैं वापस आ रही थी तभी एक शख्स ने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया. उसके दोनों हाथ मेरे स्तनों पर थे. मैं जैसे पत्थर की हो गई थी मेरी आंखों में आंसू थे.

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