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एंड्रॉयड फोन से आसानी से हटाएं वायरस

आमतौर पर एंड्रॉयड  स्मार्टफोन वायरस की चपेट में नहीं आते हैं. कुछ ऐसे विज्ञापन होते हैं, जो आपको गलत जानकारी देते हैं कि आपके फोन में वायरस है और इसे ठीक करने के लिए हमारा ऐप डाउनलोड कर लीजिए. इसके अलावा कई बार फोन में अन्य तरह की गड़बड़ियां भी आ जाती हैं, जिससे वह ठीक से काम नहीं करता. मगर इसका मतलब यह नहीं कि एंड्रॉयड फोन एकदम सेफ होते हैं. इनमें भी वायरस आ ही जाते हैं.

अगर आपके स्मार्टफोन में भी कोई वायरस आ गया है तो आप उसे बहुत आसान तरीके से हटा सकते हैं.

कहीं से भी ऐप डाउनलोड क न करें

वायरस कैसा भी हो, एंड्रॉयड मोबाइल में वह ऐप्स की मदद से घुसपैठ करता है. आपके फोन या टैब में वायरस हो तो सबसे पहले ऐप्स चेक करें. गूगल प्ले स्टोर से बाहर का कोई भी ऐप डाउनलोड नहीं करना चाहिए. मेसेज वगैरह से आए किसी लिंक से भी ऐप डाउनलोड न करें. हाल ही में गूगल प्ले स्टोर में भी कुछ खतरनाक ऐप्स की जानकारी मिली है. इसलिए ध्यान दें कि कहीं से भी ऐप डाउनलोड करना हो, पहले उसके बारे में पूरी जानकारी जुटा लें. अगर कोई ऐप खोलने पर फोन हैंग हो रहा हो तो वायरस की संभावना हो सकती है. उसे हटाने की कोशिश करें, अगर कोई दिक्कत आए तो समझ जाइए कि यह मैलवेयर है.

फैक्टरी रीसेट करें

अपने​ स्मार्टफोन की सेटिंग्स में जाएं और सिक्यॉरिटी ऑप्शन में जाकर अज्ञात स्रोत (Unknow Sources) को डिसेबल रखें. डिसेबल नहीं है तो डिसेबल कर दें. आप ऐंटीवायरस ऐप भी इंस्टॉल कर सकते हैं. अगर कोई ऐसा वायरस ऐप आ गया है और वह अनइंस्टॉल ही नहीं हो रहा तो फैक्टरी रीसेट करें, यह हट जाएगा. लेकिन इसके साथ ही अन्य डेटा और ऐप्स भी साफ हो जाएंगे. फोन वैसा हो जाएगा, जैसा यह खरीदने पर मिला था.

डेटा खोए बिना ऐसे हटाएं वायरस

​अपने फोन या टैबलेट को सेफ मोड पर डालें. इस मोड में थर्ड पार्टी ऐप्स और वायरस रन नहीं कर पाते. सेफ मोड में फोन कैसे डालना है, इसके लिए गूगल पर How to put into safe mode सर्च करें और इंस्ट्रक्शन फॉलो करें. सेफ मोड में जाने के बाद आपको स्क्रीन के लेफ्ट बॉटम पर Safe Mode लिखा मिलेगा.

अब मोबाइल सेटिंग में जाकर ऐप्स पर जाएं और डाउनलोड टैब खोलें. यहां चेक करें कि कौन से ऐप को आपने इंस्टॉल नहीं किया है. या फिर जो ऐप हट नहीं रहा हो, उसे तलाशें. उस ऐप पर टैप करें और उसे अनइंस्टॉल कर दें. आमतौर पर यहीं से ज्यादातर वायरस हट जाते हैं. मगर कई बार ऐसे ऐप्स का अनइंस्टॉल बटन ग्रे नजर आता हो. ऐसा तब होता है, जब वायरस ने खुद को ऐडमिन स्टेटस दे दिया हो.

ऐडमिन स्टेटस वाले वायरस को हटाएं

सेफ मोड में जिस ऐप का अनइंस्टॉल बटन न दिख रहा हो, उसे हटाने के लिए ऐप्स को एग्जिट करें और सेटिंग्स में Security > Device Administrators में जाएं. यहां पर उन ऐप्स की लिस्ट मिल जाएगी, जिन्हें ऐडमिनिस्ट्रेटर स्टेटस मिला है. जिन ऐप्स को हटाना है, उनका यह स्टेटस टैप करके हटा दें. इसके बाद आप वापस ऐप्स मेन्यु में जाएं और अनइंस्टॉल पर टैप करके उस संदिग्ध ऐप को हटा दें. अब सेफ मोड से बाहर जाने के लिए फोन को फिर से रिस्टार्ट कर दें.

इस तरह की प्रक्रिया अगर आपको जटिल लगती है तो हमेशा सावधानी बरतें. कभी भी इधर-उधर से कोई ऐप डाउनलोड न करें. साथ ही कोई ऐंटी-वायरस इंस्टॉल करके रखें.

म्यूजिक के शौकीन हैं तो ये ऐप है आपके लिए

गानें सुनना तो हर किसी को पसंद होता है. आपके लिए गानें तब और अहम हो जाते हैं, जब आप कहीं ट्रैवल कर रहें हो या घर पर फ्री बैठे हों, क्योंकि जब म्यूजिक सुनना आप और भी ज्यादा पसंद करते हैं.

संगीत एक ऐसी भाषा है, जो किसी के भी दिल को छू सकती है. जिन लोगों को संगीत सुनना पसंद होता है, वे हमेशा नए गानों से अप टू डेट रहना चाहते हैं. जब भी कोई नया गाना रिलीज होता है, तो आप उन्हें समझने या उनके लिरिक्स को याद करने की कोशिश करते हैं. अगर गाने के साथ लिरिक्स भी हों, तो इन्हें समझना काफी आसान हो जाता है. लेकिन एंड्रायड फोन में मौजूदा म्यूजिक प्लेयर से ऐसा संभव नहीं है.

इसी वजह से आज हम आपको एक म्यूजिक प्लेयर ऐप के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप गाने तो सुन ही सकते हैं साथ ही गाने की लिरिक्स भी साथ साथ गुनगुना सकते हैं.

तो जानिए कैसे आप एक साथ मजा ले सकते हैं गाने और उसकी लिरिक्स का…

1. इसके लिए आपको सबसे पहले अपने एंड्रायड स्मार्टफोन में म्यूजिक्समैच (Musixmatch) ऐप डाउनलोड इंस्टॉल करनी होगी.

2. इस ऐप को अपने फोन में इंस्टॉल करने के बाद आपको इसमें लिरिक्स के फीचर को इनेबल या चालू करना होगा. यहां आपको इनेबल नाओ (Enable Now) ऑप्शन पर क्लिक करके इसे शुरु करना होगा.

3. इतना करने के बाद आपसे नोटिफिकेशन एक्सेस की अनुमति मांगी जाएगी, जिसे आपको OK बटन पर क्लिक करके शुरु कर देना होगा.

4. इसके बाद अब आपको, इस ऐप को अपनी म्यूजिक लाइब्रेरी एक्सेस करने की परमीशन देनी होगी और अगर आप इसे OK कर देते हैं, तो आपको इस ऐप के जरिए अब अपनी म्यूजिक लिस्ट देखने को मिलेगी.

5. अब आप जब भी इस ऐप के जरिए आपके फोन में मौजूद गाने प्ले करेंगे, तो आपको गानों के साथ साथ उसकी लिरिक्स भी दिखाई देंगी.

शिवराज को भारी पड़ सकता है सिंधियाओं से बैर

बात अब से कोई छह महीने पहले की है. मध्य प्रदेश की वरिष्ठ और कद्दावर मंत्री यशोदाराजे सिंधिया मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह नगर विदिशा एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंची थीं. इस कार्यक्रम में विदिशा नगर पालिका अध्यक्ष मुकेश टंडन को उन्होंने लगभग अपमानित करते चलता कर दिया था. मुकेश टंडन कभी विदिशा की सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाते थे. अपनों को उपकृत करने में कंजूसी बरतने बाले शिवराज सिंह चौहान उन पर इस कदर मेहरबान हुये कि आज विदिशा में टंडन के नाम का सिक्का चलता है.

अपने कुछ वफ़ादारों को उपकृत कर उनकी लाइफ बना देने का रिवाज अब भारतीय राजनीति में मान्य हो चला है पर यशोधरा ने जो सुलूक शिवराज सिंह के इस चेले के साथ किया उसे शिवराज सिंह ने इस हद तक आहत किया कि भिंड जिले की अटेर विधानसभा उप चुनाव के प्रचार  में उन्होने सिंधिया खानदान के भारतीय स्वतन्त्र्ता संग्राम आंदोलन में योगदान के बारे में जो ताना कसा उससे सियासी गलियारों में क्रिकेट के एक दिवसीय मैच के आखिरी ओवरों सा रोमांच है और किसी बड़ी टूट फूट से इंकार करने की स्थिति में कोई नहीं.

कडवे बोल और इतिहास

अटेर की एक चुनावी मीटिंग को संबोधित करते शिवराज सिंह ने कहा, 1857 की क्रांति में अटेर इलाका महारानी लक्ष्मीबाई के साथ खड़ा रहा था, अंग्रेजों का साथ इस इलाके ने कभी नहीं दिया. मैं यह भी जानता हूं कि यहां अंग्रेजों के साथ मिलकर सिंधिया (राजघराने) ने बड़े जुल्म ढाए, पर लोगों ने बहादुरी के साथ इनका मुक़ाबला किया. दरअसल में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना राज बढ़ाने और बनाए रखने देसी रियासतों से एक करार किया था जिसे सहायक संधि के नाम से जाना गया. इस संधि का  प्रमुख बिन्दु यह था कि रियासतें अंग्रेजी सेना का खर्च उठाएंगी, जिसके एवज में अंग्रेज उस रियासत के दुश्मनों से निबटने में उसकी मदद करेंगे.

जिन रियासतों ने इस संधि को माना वहां अंग्रेजों ने अपना एक अफसर निगरानी के लिए तैनात कर दिया. चूंकि साल 1804 में ग्वालियर के सिंधिया राज घराने ने भी इस संधि को माना था, इसलिए कालांतर में उसका नाम भी गद्दारों की सूची में शुमार हो गया जो आज तक कायम है. इस लिहाज से शिवराज सिंह ने नया कुछ नहीं कहा बस एक ऐतिहासिक सच को दोहराकर अटेर का कड़ा मुकाबला अपने पक्ष में करने की कोशिश की जो किसी भी लिहाज से गलत या नाजायज बात नहीं कही जा सकती.

पर यह भूल गए

जैसे एक दिवसीय मैच में बहुत देर से डटा बल्लेबाज बॉलर की खूबी से नहीं, बल्कि अपनी गलती या लापरवाही से आउट होता है वैसा ही इस मामले में हुआ. शिवराज सिंह ने तीर तो ठीक चलाया था, लेकिन वह गलत जगह जाकर लगा. मुकेश टंडन के अपमान के बाद यशोधरा राजे को उस कार्यक्रम में जानबूझ कर नहीं बुलाया गया जिसमे उनकी मौजूदगी जरूरी थी.  यशोधरा एक मामूली से प्यादे की वजह से हुई अपनी अनदेखी हजम नहीं कर पा रहीं थीं, लिहाजा वे बेहद भावुक पर हमलावर अंदाज में पलटवार करते बोलीं, यह किस तरह की राजनीति है, मैं समझ नहीं पा रही हूं. जो लोग सिंधिया परिवार की देशभक्ति पर सवाल खड़े कर रहे हैं वे शायद भूल गए हैं कि यह भाजपा आज जहां खड़ी है उसका रोड मेप मेरी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तैयार किया था.

मीडिया के सामने लगभग रोते हुये यशोधरा ने यह भी गिनाया कि भाजपा को खड़ा करने राजमाता ने न केवल खुद के बल्कि हम बहनों (बड़ी बहन वसुंधरा राजे, मुख्य मंत्री राजस्थान ) तक के हिस्से के गहने बेचकर चुनाव के लिए गाड़ियों का इंतजाम किया और पार्टी को चंदा भी दिया. केवल आर्थिक योगदान की चर्चा कर वे चुप नहीं हो गईं. बकौल यशोधरा,  जब हम लोग छोटे थे तब अम्मा से मिलने तरस जाते थे क्योकि वे देशसेवा के काम में लगी होतीं थीं. आज जब अपने ही लोग सिंधिया उपनाम लेकर आरोप लगा रहे हैं तो इसे किस तरह बर्दाश्त किया जा सकता है? यशोधरा राजे मानती हैं कि पार्टी बदल गई है उसके लोग भी बदल गए हैं, वे सब कुछ भूल गए हैं और मैं जब भी इस तरह की बातों का विरोध करती हूं तो लोग मुझे कहते हैं कि आपको क्या लेना देना. असल में लोग मुझे दबाने कि कोशिश करते हैं क्योकि मैं एक महिला हूं.

इस तरह की लंबी चौड़ी बयानबाजी के बाद उपसंहार या इति के रूप में यशोधरा ने कहा, सीएम सब जानते हैं, उन्होंने राजमाता से सीखा है, इसलिए मैं उम्मीद करती हूं कि वे गलत नहीं बोलेंगे. आमतौर पर सधे बयानों और संतुलित राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले शिवराज सिंह यशोधरा राजे के इस भावुक आक्रमण पर घबराए हुये हैं कि अब क्या करें? बिलाशक विजयराजे सिंधिया के योगदान को भाजपा में कोई नकार नहीं सकता, जिनहोने पहले जनसंघ और फिर भाजपा के लिए जो किया वह वाकई एक मिसाल है. इन्दिरा गांधी से खुला बैर रखने वाली विजयराजे सिंधिया की यह राजनैतिक प्रतिबद्धता ही थी कि उन्होंने आखिरी सांस तक अपने इकलौते बेटे कांग्रेसी खेमे के माधवराव सिंधिया से बात तक नहीं की थी.

सिंधिया राजघराना आज भी भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ है. माधवराव के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस कभी भी सीएम प्रोजेक्ट कर सकती है, इसलिए कांग्रेसी खेमे ने कैच लपकते राजमाता को बीच में ला खड़ा किया, जिससे तिलमिलाई यशोधरा राजे ने शिवराज सिंह सहित पूरी भाजपा को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अब भाजपा जो भी जबाब दे या न भी दे तो उसकी छीछलेदार होना तय है. अपनी मां और पूर्वजों के बाबत यशोधरा ने अपनी बहन वसुंधरा राजे से भी चर्चा की है जो खुद राजस्थान में कई दिक्कतों से घिरी हुई हैं. तय यह भी है कि अगर कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया को बतौर सीएम पेश कर मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ती है, तो शिवराज सिंह की राह आसान नहीं रह जाएगी, क्योंकि सिंधिया की साफ सुथरी छवि और लोकप्रियता का कोई तोड़ मजबूत दिख रही भाजपा के पास है नहीं.

दूसरी दिक्कत भाजपा में ही शिवराज सिंह का बढ़ता विरोध है. दो दिग्गजों रघुनंदन शर्मा और बाबूलाल गौर ने देर न करते शिवराज सिंह को घेरा तो आला कमान और उसमे भी साध्वी उमा भारती की प्रतिक्रिया का लोग बैचनी से इंतजार कर रहे हैं जो राजमाता विजयराजे सिंधिया को अपने आदर्श मानती हैं, क्योंकि वे ही उन्हे राजनीति में लाईं थीं. अपनी बुआओं वसुंधरा और यशोधरा से तयशुदा दूरी पर चलते रहने बाले ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश हैं, जो यशोधरा–शिवराज सिंह विवाद में अपनी संभावनाएं देख रहे हैं लेकिन वे ज्यादा देर चुप रहेंगे ऐसा लग नहीं रहा. ग्वालियर में चर्चा है कि वे अपने एक चहेते पत्रकार की किताब के विमोचन के वक्त इस मुद्दे पर बोलेंगे, क्योकि देश भर के लेखक पत्रकार इस आयोजन में शिरकत करने आ रहे हैं. यह ज्योतिरादित्य के लिए मुफीद मौका अपने खानदान और पूर्वजों पर बोलने का होगा.

कहा यह भी जा रहा है कि अगर शिवराज सिंह अपने किसी चहेते के अपमान को अगर सहन नहीं कर पाये और इस तरह उसे भुनाया, तो ये उनके लड़खड़ाने के भी संकेत हैं. दूसरे अगर सिंधिया परिवार में कोई अंदरूनी संधि हो गई तो भी नुकसान भाजपा का ही होगा, कांग्रेस के पास तो खोने को अब कुछ बचा ही नहीं है.       

एंटी रोमियो स्क्वाड विधान मंडल में भी..!

भाजपा विधान पार्षद लालबाबू प्रसाद अपने ही सहयोगी दल लोजपा की महिला विधान पार्षद से छेड़खानी के आरोप में फंस गए तो बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया. पिछले महीने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सरकार बना कर गुब्बारे की तरह फूल चुकी भाजपा के उमंग पर उसके ही एक एमएलसी ने कालिख पोत डाला. उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव चुटकी लेते हुए कहते हैं कि भाजपा नेता सुशील मोदी समेत सभी भाजपाई मामले पर परदा डालने की कोशिशों में लगे हुए हैं. इसके साथ ही तेजस्वी यह सवाल दागते हैं कि क्या विधान मंडल में भी एंटी रोमियो स्क्वाड तैनात करना जरूरी हो गया है?

29 मार्च को महिला विधान पार्षद नूतन सिंह ने भाजपा के विधान पार्षद लालबाबू प्रसाद पर पर गलत तरीके से छूने और अश्लील हरकत करने का आरोप लगाया. उसके बाद महिला पार्षद के पति और बीजेपी के विधायक नीरज कुमार बबलू (सुपौल विधान सभा सीट) ने लालबाबू पर अपना गुस्सा भी निकाला. विधान परिषद के कैंपस में ही बबलू ने लालबाबू को जोरदार तमाचा जड़ दिया. उसके बाद जब लालबाबू तैश में आए तो बबलू ने उनकी जम कर धुनाई कर डाली. उसके बाद ही बिहार के राजनीतिक गलियारों में महिला पार्षद से छेड़खानी के मामले ने इस कदर तूल पकड़ लिया कि विधान सभा और विधान परिषद में 2 दिनों तक हंगामा होता रहा और भाजपाई अपने नेता के काले करतूत पर परदा डालने की मुहिम में लगे रहे. लालबाबू को विधान पार्षद से निकालने की पुरजोर मांग उठने लगी.

इस मसले को लेकर 30 मार्च को विधान परिषद में जम कर हंगामा हुआ. महागठबंध में शामिल जदयू, राजद और कांग्रेस की मांग पर सभापति अवधेश नारायण सिंह ने लालबाबू के खिलाफ कड़ी कारवाई करने का भरोसा दिया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस मसले को लेकर सभापति से बात की.

बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी राबड़ी देवी कहती हैं कि महिला सदस्य के साथ छेड़खानी करने वाले सदस्य पर ऐसी कारवाई होनी चाहिए कि देश भर में उसका संदेश जाए और दुबारा ऐसी शर्मनाक हरकत करने की कोई हिम्मत न कर सके. भाजपा के सदस्य अपने ही गठबंधन के साथियों के साथ छेड़खानी कर रहे हैं तो दूसरे दलों के सदस्यों के साथ वह क्या करते होंगे? विधान परिषद के सौ साल के इतिहास में इस तरह की पहली वारदात है.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने बताया के पार्टी के सीनियर नेताओं की बैठक में लालबाबू के मामले पर फैसला लेने की बात कही और उसके बाद 31 मार्च को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया. लालबाबू सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्होंने किसी के साथ कोई गलत हरकत नहीं की है. वह पिछले 35 सालों से राजनीति में हैं और कभी भी किसी ने उनके ऊपर इस तरह का आरोप नहीं लगाया है. उन्हें बदनाम करने के लिए साजिश रची गई है.

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने 30 मार्च को कहा कि छेड़खानी के मामले में दोनों पक्षों ने ऐसी किसी वारदात होने से इंकार किया है. मोदी ने दावा था कि उन्होंने दोनों पक्षों से बात की तो किसी ने छेड़खानी होने की बात ही नहीं की, वैसे विधान परिषद के सभापति को इस मामले की जांच का अधिकार है.

आखिरकार काफी छीछालेदर और हंगामे के बाद 31 मार्च की शाम को भाजपा ने लालबाबू को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से हटा दिया. वहीं विधान परिषद के सभापति ने खुद ही संज्ञान लेते हुए मामले को परिषद की आचार संहिता समिति को सौंप दिया है. लालबाबू को प्रदूषण और पर्यावरण कमिटी के अध्यक्ष पद से भी बर्खास्त कर दिया गया है.

विधान परिषद के मुलाजिमों ने बताया कि लालबाबू ने काली करतूत की और उसके बाद महिला एमएलसी के विधायक पति से पिटाई भी खाई और उसके बाद विधान परिषद में पहुंच कर ऐसे बैठे रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. विधायक नीरज ने उन्हें सबके सामने पीटा और परिषद के मुलाजिमों ने बीच-बचाव कर छुड़ाया था.

फिल्म और टेलीविजन देखने के शौकीन 54 साल के लालबाबू बिहार के बेतिया के रहने वाले हैं और 1978 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नगर मंत्री बने थे. 1990 में भाजपा के टिकट पर वह चनपटिया से विधानसभा के उम्मीदवार बनाए गए, पर जीत नहीं सके. 2004 से पिछले 31 मार्च तक वह प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष रहे. राजद सुप्रीमो लालू यादव ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए कहा कि भाजपाई इतने मवाली हैं कि सदन में भी महिला जनप्रतिनिधियों को छेड़ने से बाज नहीं आते.

बचत खाते पर न्यूनतम राशि 5 हजार करना अन्याय

नए वित्त वर्ष पर देश का सब से बड़ा भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई अपने ग्राहकों की जेब पर डाका डालने की तैयारी में है. सरकारी क्षेत्र का यह सब से बड़ा बैंक बचत खातों के जरिए लोगों के खातों में सेंध लगा रहा है. एसबीआई ने अपने खाताधारकों को खातों में न्यूनतम जमा राशि 5 हजार रुपए कर दी है और इस से कम रकम जमा रहने पर जुर्माना लगाने का फैसला किया है. महानगरों में बचत खाते में न्यूनतम राशि 5 हजार रुपए होनी जरूरी है जबकि शहरी इलाकों में यह राशि 3 हजार रुपए रखी गई है. छोटे शहरों के उपभोक्ताओं के लिए 2 हजार रुपए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम राशि 1 हजार रुपए की जा रही है.

सरकार इस तरह का शुल्क लगा कर मनमानी पर उतर आई है जबकि आम जनता से जुड़े इस मुद्दे को ले कर विपक्ष उस पर दबाव बनाने में असफल साबित हो रहा है. बैंक को इस तरह से जनता पर कर लगाने की आजादी नहीं होनी चाहिए. सरकार लोगों को उन के  ही पैसे को ले कर उन्हें तनाव में डाल रही है.

स्टेट बैंक के इस फैसले का विरोध होना स्वाभाविक है. बैंक सेवा देने के लिए हैं और इस के बदले वे ग्राहकों से कई तरह से पैसा लेते हैं लेकिन न्यूनतम राशि के नाम पर ग्राहकों को लूटने का काम ठीक नहीं है. उपभोक्ता का पैसे इस तरह से बंधक नहीं बनाया जा सकता. यह बैंक की मनमानी है और इसे रोकने के लिए सरकार पर दबाव बनाना जरूरी हो गया है. बैंक को न्यूनतम राशि 5 सौ रुपए से ज्यादा नहीं रखनी चाहिए. वैसे, उसे न्यूनतम राशि की सीमा बांधने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

गरीब आदमी के लिए 5 हजार रुपए की रकम बहुत बड़ी होती है और बैंकों को समझना चाहिए कि शहरों में भी गरीब रहते हैं. उन की गरीबी का इस तरह से मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंक के इस फैसले के खिलाफ सब मिल कर सरकार पर दबाव बनाएंगे.

भीम के जरिए डिजिटल लेनदेन बढ़ाने की योजना

नोटबंदी के बाद देश में लेनदेन के लिए डिजिटल का सहारा लिया गया और इस में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई. लोगों ने पेटीएम जैसे डिजिटल भुगतान के तरीके को अपनाया और दुकानों, यहां तक कि चाय की दुकानों पर डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकदी की कमी के बीच लोगों को इलैट्रौनिक्स लेनदेन के लिए प्रोत्साहित किया और एक साल से सफेद हाथी बना सरकारी क्षेत्र का लेनदेन का संस्थान नैशनल पेमैंट कौपोर्रेशन औफ इंडिया यानी एनपीसीआई सक्रिय हुआ और वह भीम तथा रुपे कार्ड जैसे डिजिटल उत्पाद ले कर सामने आया. खुद प्रधानमंत्री ने पिछले साल भीम ऐप की शुरुआत की और इसे इतना सरल बनाने का आह्वान किया कि अशिक्षित व गरीब आदमी तक इस का आसानी से इस्तेमाल कर सकें. उन्होंने युवाओं से कहा कि वे अपने परिजनों को डिजिटल लेनदेन करने के बारे में सिखाएं. लेकिन बाजार में जब नकदी का प्रवाह बढ़ा तो डिजिटल लेनदेन का काम घटने लगा.

एक आंकड़े के अनुसार, पिछले वर्ष दिसंबर में 31 करोड़ से ज्यादा लोगों ने क्रैडिट कार्ड का इस्तेमाल किया, जो फरवरी में महज 21 करोड़ रह गया. मोबाइल बैंकिंग में इस दौरान जबरदस्त गिरावट आई है. सरकार इस आंकड़े से परेशान है, इसलिए उस ने भीम तथा यूपीआई जैसे अपने उत्पादों पर लोगों को आकर्षित करने के लिए निशुल्क बीमा जैसा उपहार देना शुरू कर दिया.

भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट रूप से बैंकों से कह दिया है कि नए वित्तवर्ष पर शिविर लगा कर लोगों को डिजिटल लेनदेन के बारे में बताएं. बैंक दूरदराज के क्षेत्रों में शिविर लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं. शिविर में भीम जैसे ऐप को ही महत्त्व दिया जाना है. इस में ऐसे फीचर हैं जिन का इस्तेमाल फ्रौड लोग नहीं कर सकते हैं. इस का फीचर गांव में साक्षरता के स्तर को देखते हुए तैयार किया गया है.

खजुराहो पुकारे चले आओ

केवल एक किलोमीटर के दायरे में फैले खजुराहो के कसबे में खुद को ले कर कभी यह गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक बात है कि हम विदेश के किसी देसी महल्ले में हैं. वजह, खजुराहो में देसी कम, विदेशी पर्यटक ज्यादा नजर आते हैं. मुंबई और दिल्ली के बाद सब से ज्यादा पर्यटक आगरा, बनारस और जयपुर से हो कर खजुराहो आते हैं. इसलिए भारत घूमने आए पर्यटकों की प्राथमिकता खजुराहो होती है तो बात कतई हैरत की नहीं है क्योंकि मैथुनरत मूर्तियां वह भी तरहतरह की मुद्राओं में, यहां के मंदिरों की दीवारों में उकेरी गई हैं जो जिज्ञासा के साथसाथ उत्तेजना भी पैदा करती हैं.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के जिले छतरपुर का कसबा खजुराहो वाकई अद्भुत है. पिछड़ेपन का दर्द बयां करती खजुराहो की सुबह विदेशी सैलानियों के दर्शन से शुरू होती है. दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जहां से यहां पर्यटक न आते हों. जान कर हैरानी होती है कि कई पर्यटक तो यहां नियमित अंतराल से आते हैं और सालोंसाल यहीं रहना पसंद  करते हैं. अपनी हैसियत और बजट के मुताबिक, पर्यटकों को यहां 300 से ले कर 30,000 रुपए तक का कमरा होटलों में मिल जाता है. जाहिर है जो लंबे वक्त रुकते हैं, वे सस्ते होटल में ठहरते हैं, वह भी मासिक किराया दे कर.

इन विदेशी पर्यटकों के यहां रुकने का कोई तयशुदा मकसद नहीं होता है. चूंकि खजुराहो रहने और खानेपीने के मामले में सस्ता पड़ता है, इसलिए विदेशी पर्यटक यहां लंबे समय तक डेरा डाले रहते हैं. कई विदेशियों ने यहां के लोगों से शादियां तक की हैं जिन की आएदिन चर्चा होती रहती है. खजुराहो के मंदिर घूमने के बाद विदेशी जब नजदीक के गांव घूमते हैं तो उन्हें असली भारत के दर्शन होते हैं जहां अभाव, भूख और जीवनयापन का निचला स्तर है. इसी अभाव ने पैदा कर दिए हैं थोक में गाइड, जो अपनेआप को बड़े गर्व से लपका कहते हैं. ये लपके एयरपोर्ट से बसस्टैंड और रेलवेस्टेशन पर मंडराते दिख जाते हैं. 14-16 से ले कर 20-30 साल तक की उम्र के लपकों की चपलता और व्यावहारिकता देख आप दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो सकते हैं. टूरिस्ट के उतरते ही ये उस की राष्ट्रीयता सैकंडों में भांप जाते हैं और उसे ऐसे घेरते हैं कि पर्यटक इन का मुहताज हो कर रह जाता है.

इन अप्रशिक्षित गाइडों से कम से कम विदेशी तो कोई भेदभाव और ज्यादा मोलभाव नहीं करते, जो देखते ही देखते उन के दोस्त और लोकल गार्जियन बन जाते हैं. ये लपके तमाम विदेशी भाषाएं फर्राटे से बोलते हैं, फिर भले ही वे 8वीं पास भी न हों. सैकड़ों लपके विदेशी युवक या युवतियों से शादी कर विदेश में बस चुके हैं और हजारों ने खासा पैसा बना लिया है. लपके विदेशियों की हर स्तर पर जरूरत पूरी करते हैं और उन्हें अपनी बदहाली दिखा कर खासा पैसा भी ऐंठ लेते हैं.

इस और ऐसी कई दिलचस्प हकीकतों से परे खजुराहो का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है जो यहां बने कई मंदिरों की दीवारों पर मैथुनरत मूर्तियों से सहज समझ आता है. इन मंदिरों की भीतरी और बाहरी दीवारों पर वात्स्यायन का कामसूत्र कुछ इस तरह चित्रित है कि यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि सहवास की ये अकल्पनीय मुद्राएं कामोत्तेजना भड़का रही हैं या फिर उसे शांत कर रही हैं. सहवास के चौरासी आसनों के दृश्य दीवारों पर दिखते हैं. इस के अलावा शृंगाररत नायिकाओं के सौंदर्य का वर्णनचित्रण तो अच्छेअच्छे लोग नहीं कर पाते क्योंकि वे इन्हें देखते भर हैं, समझने की कोशिश नहीं करते. वैसे भी सैक्स में जो समझने लायक जिज्ञासाएं होती हैं वे इन्हें देखनेभर से दूर हो जाती हैं.

यह बात जरूर हर किसी के मन में आती है कि ऐसा आखिर क्यों किया गया होगा? भारत धर्मप्रधान देश है जिस की संस्कृति में सैक्स और धार्मिक आस्थाएं ऐसी समानांतर रेखाएं हैं जो कहीं जा कर नहीं मिलतीं, लेकिन खजुराहो में मिलती हैं तो इस की कोई वजह भी होनी चाहिए. 9वीं से ले कर 11वीं सदी तक चंदेल शासकों द्वारा बनवाए गए ये मंदिर दरअसल एक खास मकसद से बनवाए गए थे. एक किस्सा यह प्रचलित है कि एक वक्त में बौद्घ और जैन धर्मों के बढ़ते प्रभाव के चलते यहां के युवा ब्रह्मचारी और संन्यासी बनने लगे थे, जिन का ध्यान और मन दुनियादारी में लगाने के लिए चंदेल शासकों ने इस तरह की मैथुनरत मूर्तियां बनवाईं. एक किस्सा यह भी प्रचलित है कि चंदेल वंश का संस्थापक चंद्रवर्धन अवैध संतान था जिस से उसे काफी आलोचना व उपेक्षा मिलती रहती थी. सैक्स कोई गलत काम नहीं है, यह सलाह उसे अपनी मां से मिली थी. लिहाजा, इस का महत्त्व बताने के लिए उस ने ये मूर्तियां बनवाईं. यह सिलसिला चंदेल वंश के अस्तित्व तक कायम रहा और एक जिद या जनून में उन्होंने हजारों कारीगर बाहर से बुलवाए और विभिन्न शैलियों में मंदिर बनवाए. वास्तु और स्थापत्य के लिहाज से पुरातत्ववेत्ता आज भी इन की मिसाल देते हैं.

विदेशी पर्यटक जितनी दिलचस्पी इन वर्जनारहित चित्रों में लेते हैं, देशी पर्यटक उतना ही इन से हिचकते हैं. वे मंदिर के भीतर जा कर पूजापाठ तो करते हैं पर दीवारों को घंटों निहारते नहीं, बल्कि चोर निगाहों से देखते हैं मानो वहां सांपबिच्छू लटक रहे हों. खजुराहो में देशी पर्यटकों के कम जाने की एक वजह यह भी है कि ये चित्र परिवार के साथ नहीं देखे जा सकते, हालांकि अब बड़ी तादाद में नवविवाहित यहां आने लगे हैं.

खजुराहो की रंगीन शाम

ऐसा भी नहीं है कि खजुराहो में सिवा मंदिरों और मूर्तियों के वक्त गुजारने को कुछ और न हो. सूरज ढलने के बाद मंदिर बंद हो जाते हैं तो पर्यटकों की चहलपहल सड़कों पर नजर आती है. यहां हर तरह का अंतर्राष्ट्रीय खाना होटलों में मिलता है. यहां स्थित शिल्पग्राम में कोई न कोई सांस्कृतिक आयोजन होता रहता है और लाइट एवं साउंड शो होते हैं. खजुराहो में वक्त गुजारने का अपना एक अलग मजा है. घूमने के लिए यहां साइकिल और मोटरसाइकिल किराए पर मिलती हैं. रात में सड़कों पर बैडमिंटन खेलते पर्यटकों को देख लगता है कि कैसे बुंदेलखंडी अनौपचारिकता और सहजता पर्यटकों को अपने रंग में रंग लेती है. उन्मुक्त घूमते विदेशी पर्यटकों, खासतौर से युवतियों को देख स्थानीय लोगों को हो न हो, पर दूसरे पर्यटकों को जरूर हैरत होती है. गरमी के दिनों में यहां पारा 48.2 डिग्री तक पहुंच जाता है तो जाड़ों में 4 डिग्री तक उतर भी जाता है. लेकिन मौसम का एहसास यहां नहीं होता. वजह, जाहिर है ये मूर्तियां हैं, जो दुनियाभर के लोगों को खजुराहो खींच लाती हैं.

मनमोहक दक्षिण कोरिया

मैं ने मुंबई से दक्षिण कोरिया के लिए प्रस्थान किया और इंचिओन एयरपोर्ट पर पहुंच गई. एयरपोर्ट के बाहर सेना के सैकड़ों फौजियों को देख कर स्तब्ध रह गई. मैं ने सोचा, यहां युद्ध तो नहीं छिड़ने वाला. किंतु शीघ्र ही मुझे पता चला कि इधर अमेरिका के फौजी तैनात रहते हैं क्योंकि यह देश अमेरिका द्वारा सुरक्षित आरक्षित है. सेना का हर सैनिक बंदूक लिए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे दुकान में गुड्डे सजा कर रख दिए गए हों. एयरपोर्ट से बस ले कर मैं गंतव्य स्थल डेजोन के लिए चल पड़ी. यहां बहुत ही आकर्षक बसें हैं जो हीटिंग, एयरकंडीशनर की सुविधाओं से लैस हैं. सीटें बहुत ही गद्दीदार और पूरी तरह खुलने वाली आरामदायक हैं. सब देख मन गदगद हो गया और इंचिओन से डेजोन का 3 घंटे का सफर इतना सुविधाजनक था कि मालूम ही नहीं पड़ा.

साफ और काफी चौड़ी सड़कें दिखीं. खास बात यह कि हाईवे पर जो लेन बसों के लिए बनी है और जो लेन कारों के लिए बनी है, उन पर सिर्फ उसी तरह के वाहन चल रहे थे, फिर चाहे कोई लेन खाली ही क्यों न हो. यहां प्रदूषण नाममात्र को भी नहीं दिखाई दिया.

गंतव्य पर पहुंची तो मालूम पड़ा 2 दिनों बाद यहां की एक मैगजीन वाले साक्षात्कार लेने के लिए आने वाले हैं. वे लोग आए और उन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में पूछा कि भारत के लोग कैसे कपड़े पहनते हैं, और क्या खाना बनाते हैं? मैं ने उन्हें साड़ी पहन कर व सलवार सूट आदि दिखाए, चपाती बना कर दिखाई. जैसे ही चपाती फूली, वे आश्चर्यचकित रह गए. थाली में कैसे परोसा जाता है और अतिथिसत्कार कैसे किया जाता है आदि के बारे में अनेक बातें बताईं.

भारत की विविध भाषाओं के बारे में बताया तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ. साथ ही, मैं ने बताया कि भारत में इतनी भाषाओं के बावजूद आपस में, व्यवहार में हिंदी या अंगरेजी से काम चलता है.

कोरिया में तो ज्यादातर एक ही भाषा कोरियन बोली जाती है, इसलिए वे समझ नहीं पा रहे थे. मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेज में भी कोरियाई भाषा ही शिक्षा का माध्यम है. लेकिन मिडिल स्कूल से अंगरेजी साथ में पढ़ना अनिवार्य होता है. पर उन का उच्चारण थोड़ा अमेरिकन होता है.

कोरिया में पढ़ेलिखे लोग अंगरेजी समझ जाते हैं किंतु जनसामान्य कोरियन भाषा ही समझ पाते हैं. इस बात का मुझे तब अनुभव हुआ जब एक बार हम लोग यहां के डाउनटाउन में गए और उधर मुझे शौच जाना था. कई लोगों से पूछा कि इधर आसपास रैस्टरूम कहां है, टौयलेट कहां है, बाथरूम कहां है? पर कोई नहीं बता पा रहा था. उन्हें इशारे से, चित्र बना कर भी बताने की कोशिश की किंतु निराशा ही हाथ लगी.

लेकिन अचानक हम लोगों को टौयलेट दिख गया तो राहत मिली. उसी क्षण सोचा कि आज ही घर पहुंच कर सब से पहले इस का कोरियन शब्द इंटरनैट पर ढूंढें़गे, साथ ही दैनिक प्रयोग के कुछकुछ अन्य शब्द भी. दूसरे ही दिन कुछ आवश्यक शब्द याद कर लिए और फिर उन लोगों से बात करने में सहूलियत हो गई.

डेजोन में, भारतीय लोगों का मिलनसार समुदाय है. वे लोग एकत्रित हो कर भारतीय त्योहारों को बड़े उल्लास से मनाते हैं, खासकर 15 अगस्त पर ध्वजारोहण करना, होलीदीवाली मनाना व आसपास के स्थानों पर पिकनिक पर जाना. एक बार हम सब लोग जिरिसिंग गए, जहां बरसात के दिनों में बड़ा ही आकर्षक दृश्य देखने को मिला.

पहाड़ों से झरने गिर रहे थे और ऐसा लगता था बादल जैसे पहाड़ पर ही रखे हैं. चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी. एक तरफ ऊंचे पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाड़ी और रास्ता बेहद घुमावदार. रास्ते में अनेक कोरियन मंदिर, मठ और महल देखने को मिले. हम लोग मठ के मोंक से भी मिले, उन की दिनचर्या के बारे में पूछा, वे लोग लकड़ी के तख्ते या लकड़ी के फ्लोर पर कपड़ा बिछा कर सोते हैं.

उन्होंने बताया कि मोंक मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह के हो सकते हैं. इस बात का कोई प्रतिबंध नहीं है कि सिर्फ शाकाहारी ही खाएं. रास्ते में कई गांव दिखे. गांव और शहरों की स्वच्छता व चौड़ी सड़कों के होने में फर्क नहीं दिखता.

यहां ज्यादातर लोग तो बौद्ध धर्म को मानते हैं, ईसाई धर्म का प्रचार भी बहुतायत से फैला हुआ है. पर आधे से अधिक लोग ऐसे हैं जो किसी भी धर्र्म को नहीं मानते.

कोरिया में एक और अजीब बात देखने को मिली.  यहां सैमसियोंग डोंग और कई जगहों पर तो हर बिल्ंिडग के नीचे रैस्टोरैंट्स हैं जिन्हें ज्यादातर महिलाएं ही चलाती हैं. कोरियाई लोगों का मुख्य भोजन मांसाहार ही है. ताजी मछली को उबलते पानी में काट कर डालते या भूनते हैं और उन्हें सौस के साथ खाते हैं. बीफ, पिग, मछली व अन्य किसी भी जानवर का मांस खाते हैं, जैसे औक्टोपस. कुछ छोटे जानवर तो वे जिंदा खाते हैं. इधर चावल कुछ अलग तरह का मिलता है, बनने के बाद चिपका हुआ सा होता है. पर उस से ये लोग अनेक स्वादिष्ठ पकवान बना कर खाते हैं.

कोरिया में, विदेश से आए शाकाहारी लोगों के लिए भोजन करना थोड़ा मुश्किल तो होता है, पर जिम्बाप, गिम्बाप (चावल सूप और नूडल्स का मिश्रण) और सलाद में तरहतरह के पत्ते खाने के लिए मिल जाते हैं.

आजकल तो जगहजगह इंडियन रैस्टोरैंट भी खुल गए हैं पर वे काफी महंगे हैं. कोरियन ट्रेडिशनल रैस्टोरैंट में तो जमीन पर गद्दी डाल कर बैठते हैं और छोटे स्टूल, मेज पर भोजन रख कर खाते हैं. यहां के लोग अनेक प्रकार के पत्ते खाते हैं और विशेष कर कद्दू का सूप पीते हैं.

कोरियंस अपने स्वास्थ्य का बहुत ही ध्यान रखते हैं. वे बहुत व्यायाम करते हैं और बिना तला, बिना मसाले का भोजन करते हैं. इन लोगों की पोशाक अलग तरह की होती है जिसे ‘हंबोक’ कहते हैं.

‘ब्रेनपूल’ में चयनित लोगों का, यहां की सरकार की तरफ से, प्रतिवर्ष टूर होता है. जिस में इन चयनित लोगों को कोरिया के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में, जो उन की संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं, ले जाया जाता है. हम लोग भी इस टूर में गए थे. अति खास मठों को, गांवों को दिखाया गया. उन की संस्कृति के अनुसार भोजन कराया गया. इन के लकड़ी के मठों की छतों का आकार आगे की तरफ झुकावदार होता है. उस पर सुंदर कारीगरी व खुदाई कर के विविध रंग भरे होते हैं. कुछ मठ तो बहुत ही ऊंचे पहाड़ों पर होते हैं, हम उधर भी गए.

‘उल्सान’ और ‘पोहांग’ में शिपिंग कंपनी और कार कंपनी हैं. ये लोग शिप व कार कैसे बनाते हैं, दिखाया. ये लोग ‘हुंडई’ तथा ‘किया’ कार, मोटर्स बनाते हैं. काफी मात्रा में मोटर्स, कारों व शिपों का निर्यात भी करते हैं.

उन लोगों ने, सम्मान में एक छोटी सी टौय मौडल कार भेंट भी की, जो हम लोगों को आज भी उन सुखद क्षणों की याद दिलाती है. हम लोग समूह में थे, सब ने मिल कर उन पलों का भरपूर आनंद उठाया.

आसपास के गांवों में छोटेछोटे टीले भी देखे, जिन का प्रारंभ में तो मतलब समझ में नहीं आया, बाद में पता चला कि मरने के बाद ये शरीर को जमीन के अंदर गाड़ देते हैं, और फिर ऊपर टीला सा बना देते हैं. जो जितना धनवान होता है उस का टीला उतना ऊंचा होता है. शाही लोगों के गहनेकपड़े आदि भी उसी में सुरक्षित रख देते हैं. गाड़ते समय मुर्दे का पैर जापान की तरफ कर के रखा जाता है. ये लोग जापानियों से बहुत डरते हैं क्योंकि उन्होंने कई बार कोरिया पर राज किया.

आज यह देश ओलिंपिक खेलों की प्रतिस्पर्धाओं में श्रेष्ठ स्थान रखता है. बचपन से ही बच्चों को तरहतरह की ट्रेनिंग्स दी जाती हैं. यहां की फुटबौल टीम विश्वविख्यात है. तैराकी और निशानेबाजी में कोरियंस सराहनीय स्थान प्राप्त करते हैं. व्यापारिक दृष्टि से भी ये किसी से पीछे नहीं हैं. दक्षिण कोरिया के लोगों ने अपने अथक परिश्रम से विश्व में अपनी साख बना ली है.

9 राज्यों और 5 प्रमुख शहरों वाला यह देश विकास की चरम सीमा पर है. सियोल, डेजोन, इंचिओन, बूसान कहीं भी जाइए, एक से बढ़ कर एक सुंदर शहर बसे हुए हैं.

जब हम लोग बूसान गए तो वहां समुद्र पर 4-5 मील लंबा पुल, रंगबिरंगी लाइट से जगमगाते हुए देखा. खास बात यह थी कि इस में एक लेयर में बसें, दूसरे पर कारें और तीसरे पर ट्रेन की आवाजाही चल रही थी. सियोल में तो अनेक गगनचुंबी इमारतें, रंगबिरंगी लाइट से प्रकाशित अनेक महल जैसे स्थान देखे.

सियोल में कई कंपनियों के कार्यालय हैं, विधानसभा भी यहीं है. यह दक्षिण कोरिया की राजधानी है. सियोल के इतेवान में भारतीय लोगों की जरूरत का सामान भी मिल जाता है. इधर कई भारतीय रैस्टोरैंट भी हैं.

इंचिओन में तो अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट भी बना हुआ है. यह 3 तरफ से घिरा हुआ टापू है. ऐसा लगता है जैसे प्लेन समुद्र में उतर रहा हो. एयरपोर्ट से बाहर आतेजाते समय तो समुद्र पर बने एक बहुत ही लंबे पुल से हो कर जाना पड़ता है.

डेजोन के तो कहने ही क्या, यहां अनेक अनुसंधान करने वाली संस्थाएं हैं, जैसे कोरिया एटौमिक एनर्जी अनुसंधान आदि. अनेक शैक्षणिक संस्थान हैं, जैसे चुनगधाम यूनिवर्सिटी. सैमसंग और एलजी जैसी प्रसिद्ध कई कंपनियों के कार्यालय हैं. बच्चों के लिए यहां साइंस सैंटर, एक्सपो पार्क और वर्ल्ड कप स्टेडियम ‘ओ वर्ल्ड’ भी है.

हम लोगों को एक और बहुत अच्छा अनुभव मिला, जब हम लोग जेजू आइलैंड गए. उधर पनडुब्बी में जाने का सुनहरा अवसर मिला. जेजू आइलैंड जाने के लिए मात्र हवाईमार्ग ही है. यह चारों तरफ समुद्र से घिरा हुआ है. यहां का मौसम सदा ही बहुत अच्छा, घूमनेफिरने लायक होता है. संतरे बहुतायत से पैदा होते हैं. एकदो भारतीय खाने के रैस्टोरैंट भी हैं.

जिंजू शहर जाने का अवसर भी अविस्मरणीय है. यहां एक नदी है, उस के बारे में एक कहानी प्रचलित है कि एक जापानी सेना औफिसर ने किसी कोरियन लड़की को बंदी बना रखा था. जब वह उस लड़की के साथ इस नदी में नाव पर घूमने आया तो उस लड़की ने जैसे ही गहरा पानी देखा, मौका पा कर उस मेजर को बोट से धक्का दे कर नीचे गिरा दिया और वह बच गई.

कोरिया का इतिहास बहुत रोचक है. यहां भी बौद्धिज्म भारत से ही आया है. कोरिया पर जापानी पाइरेट्स ने करीब 529 बार समुद्रमार्ग से आक्रमण किया. अमेरिकी सुरक्षा में आने के बाद से कोरियन लोगों ने अपनी अथक मेहनत से देश को बहुत ही सुंदर बना लिया है.

यहां जनता के लिए सामान्य यातायात की बसें भी बड़ी आरामदायक हैं. बस का चालक, बस में प्रवेश करते समय आप का अभिवादन करेगा. सब से बड़ी बात तो यह है कि हर बसस्टौप पर डिस्प्ले बोर्ड लगा हुआ है जिस में सदैव ही दिखता रहता है कि अभी बस कौन से स्टौप पर पहुंची है और आप के स्टौप तक कितने देर में पहुंचेगी.

अपाहिज लोगों के लिए बसचालक एक बोर्ड खोल कर नीचा कर देता है, फिर उन की व्हीलचेयर वह स्वयं उतर कर एक सीट से लौक कर देता है. पैसे की अदायगी के लिए बसचालक की साइड में एक बौक्स लगा होता है. उसी में सब लोग पैसे डाल देते हैं और कार्ड डिस्प्ले का बोर्ड लगा होता है. जिसे कार्ड से पैसा देना होता है वह उस बोर्ड पर कार्ड रख देता है और उस के अकाउंट से पैसा कट जाता है. बसकंडक्टर की जरूरत ही नहीं होती, सब लोग ईमानदारी से पैसे देते हैं. अदायगी में कुछ गड़बड़ या प्रौब्लम हो तो चालक को तुरंत मालूम हो जाता है.

दक्षिण कोरिया के लोग मजबूत बिल्ंिडग्स और पुल आदि बनाने में महारत रखते हैं. भव्य इमारतें और लंबे, मजबूत पुल कुछ ही महीनों में बना देते हैं. फ्लोर के नीचे ऐसे पाइप बिछाते हैं जिन में गरम पानी प्रवाहित कर घर को ठंड के दिनों में गरम कर सकें. इस माध्यम से वे घर के तापमान पर नियंत्रण रखते हैं. फ्लोर के नीचे से घर गरम करना, यह इन का एक अनोखा और अच्छा तरीका है.

यहां जगहजगह पदयात्रियों के चलने के लिए कोर्क या रबर के फुटपाथ बने हुए हैं ताकि वे सुविधापूर्वक उन पर चल सकें.

कोरियन लोग अपने देश में आए विदेशियों की विशेषतौर से काफी मदद, अपनी समझ के अनुसार करते हैं. मिस्टर लिम नेरे ने भी हम लोगों की हमेशा ही बहुत मदद की. ऐसे कई लोग अकसर इधर मिल जाते हैं. यहां एक किस्सा आप को बताना चाहूंगी, एक भारतीय था. उसे कहीं जाना था पर उसे मालूम नहीं पड़ रहा था कैसे जाएं. उस के पास खड़े हुए व्यक्ति ने टूटीफूटी भाषा में पूछा, किधर जाना है?

फिर वह व्यक्ति बोला, अगर कल सुबह 9 बजे आप इधर खड़े हुए मिले, तो मैं आप को कार से पहुंचा दूंगा. भारतीय व्यक्ति ने सोचा, चलो, आजमा कर देखते हैं कितना सच बोल रहा है. दूसरे दिन 9 बजे वह नियत स्थान पर खड़ा हो गया और ठीक उसी समय वह कोरियन व्यक्ति कार से आया और उसे उस के गंतव्य स्थल तक छोड़ कर आया.

दक्षिण कोरिया की कुछ बातें और परंपराएं भारत से मिलतीजुलती हैं. भारत में 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है. वैसे ही इधर भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं. इन लोगों को भी 15 अगस्त के दिन ही पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी.

नवंबर माह से तो दक्षिण कोरिया में सड़कों पर बर्फ की चादर सी तन जाती है. पेड़ों पर सिर्फ लकडि़यां रह जाती हैं, उन पर हर डाल पर बर्फ छाई हुई दिखाई देती है. सड़क, फुटपाथ सब के सब बर्फ से आच्छादित होते हैं. बच्चे बर्फ से इग्लू, गुड्डेगुडि़या और स्नोमैन बनाते हैं, बर्फ पर खेलते हैं, स्कैटिंग करते हैं. नदियां बर्फ की चादर जैसी सड़क हो जाती हैं. तापमान 20 से 25 डिगरी तक चला जाता है. इस से भी सब लोग खूब एंजौय करते हैं. इस प्रकार की ठंड नवंबर से अप्रैल तक रहती है.

स्प्रिंग यानी वसंत का मौसम मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू हो जाता है. चैरी ब्लौसम आदि के सुंदरसुंदर, रंगबिरंगे फूल शहर की सुंदरता बढ़ाने लगते हैं. जब पेड़ ठूंठ से होते हैं तब शहर की सारी ऐक्टिविटीज साफसाफ दिखती हैं पर जब हरेहरे पत्ते छा जाते हैं, दूर का दृश्य नहीं दिखता. तब ऐसा लगता है पेड़ कह रहा हो कि अब सब मेरी हरियाली ही देखो. कहां औटम यानी पतझड़ के दौरान पेड़ों पर एक भी पत्ता नहीं, सब के सब ठूंठ और कहां हरियाली का यह आलम.

सुंदरतम दृश्यों को अपने में समेटे यह देश अति सुंदर है. अगर भाषा की समस्या न हो तो यह देश और ज्यादा तरक्की कर सकता है. उत्तरी कोरिया उग्रवादी है, किंतु दक्षिण कोरिया एकदम शांतिप्रिय है. यह पूर्वजों की धरोहर को अच्छी तरह से संभाले हुए है. यहां के पर्यटन स्थल साफ और सुरक्षित है. यहां के निवासियों को मानवतापूर्ण व्यवहार करना अच्छी तरह से आता है. ऐसे देश को मेरा सलाम.  

राजनीतिक खरीदफरोख्त

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में अपने बलबूते पर सरकार बना कर भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को बड़ा झटका दिया है. लेकिन गोआ और मणिपुर में खरीदफरोख्त कर सरकारें बना कर उस ने अपनी प्रतिष्ठा पर नाहक दाग लगवाया है. रातोंरात विधायकों या छोटे दलों को फुसलाया न जाता तो भी वहां भाजपा की ही सरकारें बनतीं और मामला लोकतांत्रिक ही लगता. जब एक पार्टी की नदी बड़ी बन रही होती है तो छोटे नालों और नदियों से पार्टियां या इक्केदुक्के विधायक अपनेआप उस में आ मिलते हैं. कांग्रेस में टूट का इंतजार कर भाजपा आराम से सरकार बना सकती थी. उत्तराखंड में भाजपा एक बार ऐसी गलती कर चुकी है जिस से उस की किरकिरी हुई थी. पर उस ने बाद में समझौता कर लिया था. अब, उस का अच्छा परिणाम मिला.

भारतीय जनता पार्टी की आंधी अब उस तेजी से बढ़ रही है कि दूसरे दल उस के साथ बहने को ही सही समझेंगे. देश में कुछ साल एक ही पार्टी का राज रहेगा, यह पक्का है. 60, 70 व 80 के दशकों में जो बुद्धिजीवी गैरकांग्रेसवाद का झंडा उठाते थे, उन्हें अब गैरभाजपावाद के झंडे को उठाने का मौका मिल रहा है. राजनीति में यह चलता है और दुनिया के सब देशों में ऐसा होता रहता है.

छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश में भाजपा ने संदेश दिया है कि वह किसी भी कीमत पर एकछत्र राज चाहती है. हालांकि, यह नीति बहुत कामयाब नहीं रहती क्योंकि एकछत्र राज में दंभ और निरंकुशता दिमाग पर हावी हो जाती है. फिर गुस्सा कहीं, किसी और रूप में फूटता है, तब उसे संभालना कठिन हो जाता है जैसा इंदिरा गांधी के साथ 1973-1974 में होने लगा था.

सेक्स की चाहत में पत्नी बनी पति की दुश्मन

भागदौड़ भरी जिंदगी में सड़कों पर बढ़ती वाहनों की भीड़, उन से होने वाली दुर्घटनाएं और आए दिन होने वाले अपराधों को देखते हुए अगर घर से निकला कोई आदमी वापस न आए तो घर वाले परेशान हो उठते हैं. नेकीराम का परिवार भी बेटे को ले कर कुछ इसी तरह परेशान था. अध्यापक नेकीराम का परिवार उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के मोहल्ला आनंद विहार में रहता था. उन का एकलौता बेटा अमन परिवार से अलग रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनुराधा के अलावा 5 साल का एक बेटा कृष और 4 साल की बेटी अनन्या थी.

नेकीराम को बेटे के लापता होने का उस समय पता चला, जब 28 दिसंबर, 2016 की रात करीब साढ़े 9 बजे उन की बहू अनुराधा का फोन आया. उस ने जो कुछ बताया था, उस के अनुसार रात में उस की तबीयत खराब हो गई तो उस ने अमन से दवा लाने को कहा. वह मोटरसाइकिल से दवा लेने गया तो लौट कर नहीं आया.

अनुराधा ने अमन को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच औफ बता रहा था. इस से वह परेशान हो उठी थी और उस ने सभी को इस बारे में बता दिया था. जब अमन का कुछ पता नहीं चला तो नेकीराम और उन के भतीजे रात में ही स्थानीय थाना सदर बाजार पहुंचे और पुलिस को सूचना दे दी थी.

पुलिस ने उन्हें सुबह तक इंतजार करने को कहा था. पुलिस का अनुमान था कि अमन कहीं अपने यारदोस्तों के पास न चला गया हो. पुलिस ने भले ही सुबह तक इंतजार करने को कहा था, लेकिन घर वाले अपने स्तर से उस की तलाश करते रहे.

इसी का नतीजा था कि आधी रात को शहर के रेलवे स्टेशन परिसर में रेलिंग के पास उस की मोटरसाइकिल खड़ी मिल गई थी. लेकिन अमन का कुछ अतापता नहीं था. घर वालों की रात चिंता में बीती. सुबह शहर से लगे गांव फतेहपुर वालों ने नजर की पुलिया के नीचे किसी युवक का शव पड़ा देखा तो इस की सूचना थाना पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी मुनेंद्र सिंह मौके पर पहुंच गए. सूचना पा कर सीओ अब्दुल कादिर भी घटनास्थल पर आ गए. मृतक की गरदन पर चोट के निशान थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी. मौके पर मौजूद लोग उस की शिनाख्त नहीं कर सके. शव लापता युवक अमन का हो सकता है, यह सोच कर पुलिस ने उस के घर वालों को वहां बुलवा लिया.

घर वालों ने शव की पहचान अमन की लाश के रूप में कर दी. मामला हत्या का था, इसलिए पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. साफ था, अमन की हत्या सुनियोजित तरीके से की गई थी, क्योंकि उस की मोटरसाइकिल रेलवे स्टेशन पर खड़ी मिली थी. घटनास्थल और रेलवे स्टेशन के बीच 4 किलोमीटर का फासला था. अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे हत्या करने के बाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचे होंगे और मोटरसाइकिल खड़ी कर के फरार हो गए होंगे. पुलिस ने अमन के ताऊ के बेटे मुकेश कुमार की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ अपराध संख्या 549/2016 पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने अमन के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी अपनी रंजिश होने से इनकार कर दिया. उस के घर कोहराम मचा था. उस की पत्नी अनुराधा का रोरो कर बुरा हाल था. वह बदहवाश सी हो चुकी थी. वह इतनी दुखी थी कि बारबार बेहोश हो पा रही थी. पुलिस के सामने बड़ा सवाल यह था कि अमन की हत्या क्यों और किस ने की? इस से भी बड़ा सवाल यह था कि हत्यारों को उस के घर से निकलने की जानकारी किस तरह हुई?

एसएसपी उमेश कुमार श्रीवास्तव ने हत्याकांड का जल्द खुलासा करने का आदेश दिया. एसपी सिटी संजय सिंह ने इस मामले की जांच में अभिसूचना विंग के इंचार्ज पवन शर्मा को भी लगा दिया. उन्हें लगा कि हत्यारों ने अमन से तब संपर्क किया होगा, जब वह घर से निकला होगा. पुलिस ने अमन, उस की पत्नी अनुराधा और अन्य घर वालों के मोबाइल नंबर ले कर सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. एसपी सिटी के निर्देशन में हत्याकांड के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में क्राइम ब्रांच के अलावा थानाप्रभारी मुनेंद्र सिंह, एसआई मनीष बिष्ट, जर्रार हुसैन, हैडकांस्टेबल विकास शर्मा, कांस्टेबल नेत्रपाल, अरुण राणा और मोहित को शामिल किया गया था.

सभी नंबरों की काल डिटेल्स की जांच की गई तो पता चला कि अनुराधा की एक नंबर पर बहुत ज्यादा बातें होती थीं. घटना वाली रात भी उस की उस नंबर पर बातें हुई थीं. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर अंकित का निकला. उस के मोबाइल की लोकेशन पता की गई तो अमन के घर और घटनास्थल की पाई गई.

पुलिस को मामला प्रेम संबंधों का लगा और साथ ही अमन की पत्नी अनुराधा संदेह के दायरे में आ गई. 31 दिसंबर को अनुराधा को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई तो जो सच्चाई समने आई, जान कर पुलिस हैरान रह गई, क्योंकि अमन की असली दुश्मन कोई और नहीं, उस की अपनी पत्नी ही थी. प्रेमी से अवैधसंबंधों को बनाए रखने के लिए प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने पति की हत्या की योजना बनाई थी. पुलिस ने अनुराधा के प्रेमी अंकित और उस के दोस्त टीनू को गिरफ्तार कर लिया. तीनों से विस्तार से पूछताछ की गई तो उन के चरित्र और गुनाह की सारी परतें खुल गईं, जो इस प्रकार थीं—

दरअसल, अनुराधा ने जैसे ही जवानी की दहलीज पर कदम रखा, तभी उस के प्रेमसंबंध कस्बा नागल के रहने वाले विजयपाल के बेटे अंकित से बन गए थे. जवानी के जोश में दोनों ने मर्यादा की दीवार भी गिराई और हमेशा साथ रहने का फैसला भी किया. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. अनुराधा के घर वालों ने उस का विवाह अमन के साथ कर दिया. इस का न तो अनुराधा विरोध कर सकी थी और न ही अंकित. यह बात अलग थी कि अनुराधा अंकित को भूल नहीं सकी. विवाह के कुछ दिनों बाद ही अनुराधा ने अंकित से संपर्क कर लिया था. अंकित इस बात से खुश था कि प्रेमिका अभी भी उसे प्यार करती थी.

दोनों के संबंध गुपचुप चलते रहे. यही नहीं, अंकित अनुराधा से मिलने उस के घर भी आने लगा था. अमन चूंकि ट्रक चलाता था, इसलिए अनुराधा को अपने संबंधों को जारी रखने में परेशानी नहीं हो रही थी. अमन कभी शहर में होता था तो कभी शहर से बाहर. अनुराधा 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, इस के बाद भी उस के अंकित से संबंध बने रहे. शायद अंकित उस की धड़कनों का हिस्सा था. शादी के 4 साल बाद तक अमन अंधेरे में रहा. पति की आड़ में अनुराधा अपने प्यार को गुलजार रखना चाहती थी. इस तरह के संबंध कभी छिपे नहीं रहते. अनुराधा अकसर फोन पर बिजी रहती थी, जिस से अमन को शक तो होता था, लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर उसे बेवकूफ बना देती थी.

किसी के मन में अगर शक घर कर जाए तो उस का निकलना आसान नहीं होता. अमन भी इस का शिकार हो गया था. आसपास के लोगों ने भी उसे बता दिया था कि उस की गैरमौजूदगी में कोई युवक अनुराधा से मिलने आता है. पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो उस ने उसे न सिर्फ जम कर फटकारा, बल्कि उस की पिटाई भी कर दी. करीब 4 महीने पहले एक दिन अमन ट्रक ले कर दूर जाने की बात कह कर घर से निकला जरूर, लेकिन दोपहर में ही वापस आ गया. उस समय अनुराधा अंकित की बांहों में समाई थी. अमन को अचानक सामने पा कर दोनों के होश उड़ गए. अंकित चला गया और अनुराधा ने गलती मान ली. इस के बावजूद उस ने अपनी आदतें नहीं बदलीं.

कुछ दिनों बाद वह फिर अंकित से मिलने लगी. अमन को इस की जानकारी हो गई. इस के बाद अंकित को ले कर घर में आए दिन विवाद होने लगा. एक दिन हद तब हो गई, जब अनुराधा बगावत पर उतर आई. उस ने साफ कर दिया कि वह अंकित से संबंध नहीं तोड़ सकती. पत्नी की बेहयाई से अमन गुस्से में आ गया और उस ने उस की जम कर पिटाई कर दी. अपने साथ होने वाली मारपीट से तंग अनुराधा ने प्रेमी अंकित से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार की खातिर कब तक जुल्म सहती रहूंगी. अगर तुम मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते तो मुझे हमेशा के लिए छोड़ क्यों नहीं देते?’’

‘‘ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘आज फिर उस ने मेरे साथ मारपीट की. क्या मेरी किस्मत में इसी तरह पिटना ही लिखा है? तुम कुछ करो वरना मैं जान दे दूंगी.’’

‘‘क्या चाहती हो तुम?’’

‘‘हमेशा के लिए तुम्हारी होना चाहती हूं.’’

‘‘चाहता तो मैं भी यही हूं.’’

‘‘सिर्फ चाहने से नहीं होगा, इस के लिए कुछ करना होगा. क्योंकि अमन के रहते यह कभी नहीं हो सकेगा. तुम उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा दो, वरना मुझे भूल जाओ.’’ अनुराधा ने यह बात निर्णायक अंदाज में कही तो गलत संबंधों के जाल में उलझा अंकित सोचने को मजबूर हो गया. उस ने उस से थोड़ा इंतजार करने को कहा.

अंकित का एक आपराधिक प्रवृत्ति का दोस्त था टीनू, जो नजदीक के गांव पंडौली निवासी छोटेलाल का बेटा था. अंकित ने उसे सारी बात बताई और दोस्ती का वास्ता दे कर उस से साथ देने को कहा तो वह तैयार हो गया. इस के बाद दोनों अनुराधा से मिलने उस के घर आए तो तीनों ने मिल कर अमन को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. यह दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह की बात थी.

28 दिसंबर की शाम अनुराधा ने अंकित को फोन किया, ‘‘आज तुम आ कर अपना काम कर सकते हो.’’

‘‘ठीक है, मैं समय पर पहुंच जाऊंगा.’’ कह कर अंकित ने फोन काट दिया. इस के बाद वह अपने दोस्त टीनू को ले कर तकरीबन 9 बजे अनुराधा के घर पहुंचा. अनुराधा ने वादे की मुताबिक घर का दरवाजा खुला रखा था. अमन उस वक्त अपने कमरे में था और सोने की तैयारी कर रहा था. तीनों कमरे में दाखिल हुए तो अंकित को वहां देख कर अमन का खून खौल उठा. वह चिल्लाया, ‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’

‘‘अनुराधा से मिलने और तुम्हें जिंदगी से छुटकारा दिलाने.’’ अंकित ने घूरते हुए कहा.

‘‘तेरी इतनी हिम्मत?’’ अमन गुस्से में खड़ा हो गया. वह कुछ कर पाता, उस के पहले ही तीनों उस पर बाज की तरह झपट पड़े. अमन जमीन पर गिर पड़ा. अंकित उस के सीने पर सवार हो गया तो अनुराधा ने उस के हाथों को पकड़ लिया. टीनू ने पैर पकड़ लिए. अमन ने बचाव के लिए संघर्ष करते हुए चिल्लाने की कोशिश की तो अनुराधा ने उस के मुंह को तकिए से दबा दिया, जिस से उस की आवाज दब कर रह गई, साथ ही दम भी घुटने लगा.

तभी अंकित ने वहां पड़ा डंडा उठा कर उस के गले पर रख कर पूरी ताकत से दबा दिया. अमन छटपटाया, लेकिन उस पर किसी को दया नहीं आई. कुछ देर में अमन की सांसों की डोर टूट गई. अपने ही सिंदूर को मिटाने में अनुराधा को जरा भी हिचक नहीं हुई. हत्या के बाद उन्होंने शव ठिकाने लगाने की सोची. अंकित और टीनू ने अमन की ही मोटरसाइकिल ली और कंबल ओढ़ा कर लाश को मोटरसाइकिल से ले जा कर पुलिया के नीचे डाल दिया. इस के बाद मोटरसाइकिल स्टेशन पर लावारिस खड़ी कर के दोनों ट्रेन से नागल तक और फिर वहां से अपने अपने घर चले गए. इस के बाद अनुराधा ने अमन के लापता होने की बात उस के घर वालों को बताई और लाश मिलने पर खूब नौटंकी भी की, लेकिन आखिर उस की पोल खुल ही गई. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त डंडा भी बरामद कर लिया था.

एसपी संजय सिंह ने प्रेसवार्ता कर के हत्याकांड का खुलासा किया. इस के बाद सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अनुराधा ने अपने बहकते कदमों को संभाल कर घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. उस की करतूत से मासूम बच्चे भी मां बाप के प्यार से महरूम हो गए. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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