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‘छद्म हिन्दुत्व’ की राह पर कांग्रेस

मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने जब उत्तर प्रदेश में ‘एंटी रोमियो दल‘ पर टिप्पणी करते उसमें श्रीकृष्ण का नाम लिया तो भाजपा नेताओं की जगह पर कांग्रेस के प्रवक्ता जीशान हैदर ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज थाने में मुकदमा दायर कराया. जीशान हैदर से जब यह पूछा गया कि क्या यह कांग्रेस की तरफ से मुकदमा कायम कराया गया है? इस पर वह बोले कि मैं पार्टी का प्रवक्ता हूं. पार्टी की राय से अलग नहीं हो सकता. मुकदमा कायम होने के 3 दिन बाद तक कांग्रेस ने इस प्रकरण पर कोई दूसरी राय नहीं जाहिर की. जिससे यही साफ है कि यह मुकदमा पार्टी की सहमति से कायम कराया गया है. असल में ऐसे मुकदमों में नया कुछ नहीं है. तमाम बार ऐसे मुकदमें दायर कराये जाते है. इनमें बाद में होता कुछ नहीं है. प्रशांत भूषण खुद बड़े वकील हैं, उहोंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे उनको अदालत में गलत ठहराया जा सके.

इस मुकदमें का सबसे खास प्वाइंट यह है कि पूरे देश में हार से बौखला गई कांग्रेस को अब अपने लिये मुद्दों की तलाश है. ऐेसे में उसे लगता है कि अगर भाजपा की तरह वह भी हिदुत्व की राह पर चलेगी तो उसको जनता का समर्थन मिल सकता है. श्रीकृष्ण के अपमान पर भाजपा या उससे जुड़े संगठनों की जगह पर जब कांग्रेस के प्रवक्ता की तरफ से मुकदमा दायर होता है तो यह साफ हो जाता है कि यह राय पार्टी की राय होगी. कांग्रेस को जिस तरह से एक के बाद एक प्रदेश में हार का सामना करना पड़ रहा है उससे वैचारिक रूप से पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे हैं. ऐसे में पार्टी को जनाधार बढ़ाने के लिये नये मुद्दों की तलाश है. भाजपा ने विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे बड़ी जीत हासिल की. अब कांग्रेस उसी राह पर चलना चाहती है. कांग्रेस को यह सोचना चाहिये कि ऐसे मुद्दे उसे लाभ नहीं देंगे.

अपनी किसान खाट यात्रा के दौरान राहुल गांधी अयोध्या के हनुमानगढी मंदिर जाकर महंत ज्ञानदास से मिले थे. इसके बाद भी वह पार्टी को बचाने में सफल नहीं हुये. समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बाद भी कांग्रेस पिछले चुनाव के बराबर भी सीटे नहीं जीत पाई. राहुल गांधी ने पहले बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ने की बात कह कर खाट यात्रा निकाली, फिर अखिलेश यादव का साथ ले लिया. कांग्रेस खुद यह नहीं समझ पा रही कि वह किस राह पर चले. उहापोह में फंसी भाजपा के मजबूत संगठन और प्रबंधतंत्र का मुकाबला नहीं कर पा रही है. जिस तरह से पार्टी का नेतृत्व सही फैसला नहीं ले पा रहा उससे साफ है कि वह देखादेखी में कदम उठा रही है.

विधानसभा चुनाव में कई कांग्रेस के नेता पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा में गये. यह लोग आरोप लगाते हैं कि पार्टी नेतृत्व खुद सही फैसला नहीं ले पा रहा. विधानसभा चुनाव में प्रदेश से बाहर से नेताओं को लाकर यहां के लोगों की उपेक्षा की गई. युवाओं की बात करते हुये उम्रदराज नेताओं को चुनाव की कमान सौंपी गई. पहले अकेले चुनाव लड़ने की बात हुई, फिर गठबंधन हो गया. ऐसे में साफ है कि कांग्रेस हर तरह से हाशिये पर है. ऐसे में श्रीकृष्ण के अपमान के बहाने वह हिन्दुत्व को संदेश देना चाहती है. भाजपा के शब्दों में यह छद्म हिन्दुत्व है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. प्रदेश के लोग कांग्रेस की हकीकत जानते हैं.                   

चीन को खुला मैदान

अमेरिका के खब्ती नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन को विश्वपटल पर एशियाई आर्थिक साम्राज्य बनाने का आमंत्रण दे रहे हैं. 12वीं सदी में चीन के पड़ोसी मंगोलिया के मंगोलों ने यूरोप के बड़े हिस्से पर राज किया था. अब चीन यही बात दोहरा रहा है. उस ने अपने बंदरगाह भीवू से 8,000 मील का सफर कर, सामान से लदी ट्रेन को लंदन 18 दिनों में पहुंचा कर दर्शा दिया है कि यूरोप चीन के लिए दूर नहीं है. चीन की आर्थिक विकास की दर अब पहले की तरह 12-13 प्रतिशत नहीं है पर ऊंचे स्तर पर 6-7 प्रतिशत की दर भी कम नहीं है क्योंकि यूरोप और अमेरिका में विकास दर 1-2 प्रतिशत है और आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति आय का चीनियों का यूरोपीयों से फासला भी कम होता जा रहा है.

चीन की उन्नति के पीछे उस का इतिहास और परंपराएं भी हैं. चीन हमेशा नई चीजें खोजता रहा है. अंगरेजों ने उसे गुलाम बनाने की कोशिश की और वे बीजिंग तक पहुंच गए पर वे व्यापार का हक पाने से ज्यादा कुछ न कर पाए. चीन मंगोलों से हारा, जापान से हारा पर पश्चिमी देश उस पर हावी न हो पाए क्योंकि चीन में कर्मठता व नई सोच की कमी नहीं रही. चीन ने नई तकनीक को बखूबी समझा और धार्मिक पचड़ों में न पड़ कर विकास की राह पर चला. आज हालत यह है कि भारतीय युवा अमेरिका और यूरोप जा रहे हैं जबकि चीनी अब चीन लौट रहे हैं.

चीन की प्रगति उस तरह की है कि मूर्ख के हाथों में फंसा अमेरिका जल्दी ही उस से पिछड़ जाए और चीन ही विश्व का नेता बन जाए तो बड़ी बात नहीं. यूरोप को एहसास होने लगा है कि यदि रूस ने एक बार फिर यूरोप पर आक्रमण  किया तो उसे अब अमेरिका नहीं, चीन का मुंह देखना होगा क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप और रूसियों की तो चुनावों से पहले ही सांठगांठ शुरू हो गई थी. चीनी आज भी बेहद उत्पादक हैं और वे नई खोजों में बहुत समय व शक्ति लगा रहे हैं. अमेरिका भी चीनियों से डरता है और अमेरिका में दक्षिणी अमेरिकियों, मुसलिमों व भारतीयों के प्रति घृणा का माहौल बना है पर चीनियों के खिलाफ नहीं, क्योंकि चीनी अपनी रक्षा करना अरसे से जानते हैं.

अफसोस यह है कि हमारे देश को उस पाकिस्तान की चिंता ज्यादा है जो असल में कल तक भारत का हिस्सा था और जिस की संस्कृति व रहनसहन नितांत भारतीय ही है. यहां स्पर्धा चीनियों के खिलाफ नहीं, पाकिस्तान के खिलाफ खड़ी की जा रही है जबकि भारत की असल प्रतियोगिता चीन से है. चीन की शक्ति को पहचानने और उसे बढ़ने से रोकने की शक्ति अब किसी में नहीं.

गुरमेहर की अभिव्यक्ति

दिल्ली के एक कालेज की छात्रा गुरमेहर कौर का दिलेरी से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से पंगा लेना भजभज मंडली को पसंद नहीं आया. उस पर देशद्रोही होने का आरोप तो मंडली नहीं लगा सकी क्योंकि वह कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन मंदीप सिंह की बेटी जो है पर उस को बुराभला कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

ऋषियोंमुनियों के चरणस्पर्श कर के धन्य समझने वालों ने उसी भाषा का इस्तेमाल किया जो वे ऋषिमुनि, राजाओं और सामान्य व्यक्तियों से ग्रंथों में कहते पाए जाते हैं, जैसे तरहतरह के श्राप देना. कुछ ने उसे पथभ्रष्ट माना तो कुछ ने उसे नर्क में सड़ने का आदेश दिया. कुछ चार कदम आगे निकल गए और बिना सोचेसमझे उसे वेश्या या बलात्कार का उपयुक्त पात्र मानने लगे. बजाय उस की बात सुनने के, उस की जबान खींचने की कोशिश की गई.

ये उपाय सदियों से किए जा रहे हैं. कितने ही दस्युराजाओं को छलकपट से देवतास्वरूप राजाओं ने ऋषियोंमुनियों से श्राप दिलाने का भय दिखा कर हराया है और एकलव्य व शंबूक जैसों को सीधा किया है.

ईसाई चर्च, इसलामी मुल्लों और हिंदू पंडों ने एकसा व्यवहार किया है इस मामले में. और अगर दूर का भी यह अंदेशा हो कि एक मशाल ऐसी जल रही है जो कागजी महलों को जला सकती है तो उसे बुझा दिया जाता है.

वैसे तो धर्म के नाम पर सदा राजाओं और धर्र्म के दुकानदारों ने शक्ति हासिल कर राज किया है पर अब लोकतांत्रिक अधिकारों के जमाने में हर रोज ऐसे मुद्दे खड़े हो रहे हैं जो धार्मिक साम्राज्य पर हमला करते हैं. इन का मुकाबला करना जरूरी होता जा रहा है. गुरमेहर कौर ने धर्म के खिलाफ कुछ नहीं कहा पर धर्म की रक्षक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चुनौती दे डाली. उस का यही एक बड़ा गुनाह है, शंबूक के वेद पढ़ने और एकलव्य के धनुर्विद्या सीखने की तरह का.

उसे धमकाने को सैकड़ों पंडे और द्रोणाचार्य खड़े हो गए क्योंकि देश की धुरी 1947 के बाद से ही उन के हाथों में है जो पूजापाठ के सहारे शासन करना चाहते हैं और जिन्होंने न जाने कैसे अभिव्यक्ति की आजादी को देने वाला संविधान स्वीकार कर लिया पर अब देशभक्ति के नाम पर अभिव्यक्ति को दिखावटी गहने का सा बनाने की कोशिश की जा रही है. अगर विचारों की अभिव्यक्ति वास्तव में एक स्वतंत्रता होती तो गुरमेहर कौर को शासकों से सीधे गालियां न सुननी पड़तीं और उसे मुंह बंद रखने का फैसला न करना पड़ता.

नैनीताल है बेमिसाल

घूमने फिरने और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद उठाने के लिहाज से नैनीताल हमेशा से ही पर्यटकों की पहली पसंद रहा है. ऊंचे पहाड़ों के साथ ही नैनीताल में कई झीलें भी हैं और इसलिए उसे झीलों का शहर भी कहा जाता है. उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून से नजदीक होने के कारण इस जगह का काफी शहरीकरण हो चुका है. सैलानियों का जमघट नैनीताल को कभी शोरगुल से आजाद नहीं होने देता.

झीलों के इस शहर को पूरा घूमने के लिए मात्र 3 घंटे का समय ही काफी है. इस के लिए 300-500 रुपए में एक किराए की गाड़ी बुक कर के नैनीताल के प्रमुख पर्यटक स्थलों पर जाया जा सकता है, जिन में टिफिन टौप, केव गार्डन, स्नो व्यू, तिब्बती मार्केट, माल रोड और चाइना पीक मुख्य हैं. यदि शौपिंग का मूड है तो नैनीताल का माल रोड, तिब्बत बाजार और बड़ा बाजार, उचित स्थान हैं. यहां से लकड़ी के बने सजावटी सामान सस्ते दामों में खरीदे जा सकते हैं, साथ ही खूबसूरत मोमबत्तियां भी यहां वाजिब दामों में मिल जाएंगी. खानेपीने के लिए भी ये तीनों स्थान काफी अच्छे हैं. उत्तराखंड की प्रमुख बाल मिठाई भी नैनीताल के बड़ा बाजार से आसानी से खरीदी जा सकती है.

भव्य राज भवन

शौपिंग और खानपान के बाद यदि कुछ अलग देखने की ललक है और इतिहास में रुचि रखते हैं तो नैनीताल के राज भवन की ट्रिप मजेदार हो सकती है. वैसे तो इस शहर में अंगरेजी शैली की कई इमारतें हैं मगर विक्टोरियल गौथिक शैली में बने यहां के राज भवन की खूबसूरती की कोई मिसाल नहीं. वर्ष 1897 में गवर्नर एंथोनी पैट्रिक मैक्डोनल द्वारा बनवाई गई इस इमारत का ढांचा मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस का निर्माण करने वाले ब्रिटिश आर्किटैक्ट फैड्रिक विलियम स्टीवैंस ने तैयार किया था.

19वीं सदी की बेमिसाल इमारतों में सब से प्रचलित इस इमारत को लंदन के बकिंघम पैलेस की तर्ज पर बनाया गया था. बाहरी बनावट के साथ ही इस भवन के अंदर की सजावट भी बहुत खूबसूरत है. इस की खूबसूरती का सब से रोचक हिस्सा 10वीं सदी के सब से प्रसिद्ध सुलताना डाकू, जिसे भारत का रौबिनहुड भी कहा गया है, द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियार हैं, जिन्हें भवन की दीवारों पर सुसज्जित किया गया है. बाकी लकड़ी की खूबसूरत नक्काशी से सजी भवन की छतें और ब्रिटिशकाल के एंटीक फर्नीचर भी इस भवन की शोभा में चारचांद लगाते हैं. इमारत से बाहर निकलने पर 160 एकड़ भूमि में फैले घने जंगल और उस के बीचोंबीच 50 एकड़ जमीन पर बने 18 होल्स वाली गोल्फ फील्ड भी काफी आकर्षित करती है. इस गोल्फ फील्ड को भारत की सब से ऊंची गोल्फ फील्ड होने का खिताब भी प्राप्त है. बस, इस इमारत को देखने के साथ ही नैनीताल की सैर यादगार बन जाएगी.

भुवाली जाना मत भूलें

आप को असली प्राकृतिक खूबसूरती का आनंद लेना है तो नैनीताल से लगभग 11 किलोमीटर दूर पहाड़ों की तलहटी में 1,680 मीटर की ऊंचाई में बसी कुमायूं मंडल की शानदार नगरी भुवाली जाना मत भूलें. सेब, आलूबुखारा, खुबानी और काफल जैसे फलों के खूबसूरत बागों के लिए प्रसिद्ध भुवाली बेहद शांत और सुंदर नगर है. यह जगह फलों की मंडी के लिए जानी जाती है. यहां दूरदूर से लोग फलों की खरीदारी के लिए आते हैं. सब से अच्छी बात है कि यहां आने वाले सैलानियों के लिए रहने की अच्छी व्यवस्था है. अच्छे रिजौर्ट्स और होटलों के साथ नगर के स्थानीय निवासियों ने घर पर ही पेइंगगैस्ट की भी सुविधा दे रखी है. भुवाली की सब से खास बात है कि यहां नैनीताल या अन्य हिलस्टेशनों की तरह सैलानियों की भीड़ नहीं होती. ज्यादातर यहां वही सैलानी आते हैं जिन्हें इस जगह के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी होती है या फिर नैनीताल में जब रहने के लिए होटल नहीं मिलता तो लोग भुवाली की ओर रुख करते हैं. यहां रहने के साथ ही खानेपीने का इंतजाम भी काफी अच्छा है. यहां सड़कों के किनारे छोटेछोटे ढाबों में काफी स्वादिष्ठ भोजन मिलता है और यह हैल्थफ्रैंडली होने के साथ ही पौकेटफ्रैंडली भी है.

चाय के बागान

नैनीताल ओर भुवाली के बीच मात्र 1,000 लोगों की जनसंख्या वाला गांव श्यामखेत भी बेहद आकर्षक दिखता है. इस के आकर्षण की बड़ी वजह यहां के हरेभरे चाय के बागान हैं. सीढ़ीनुमा आकार के इन खेतों पर औद्योगिक चाय की पैदावार होती है, जो सभी प्रकार के कृत्रिम रासायनिक अवशेषों से मुक्त होती है. दिलचस्प बात तो यह है कि यहां की चाय विदेशों तक जाती है. चाय के शौकीन लोग सस्ते दामों में यहां से चाय खरीद सकते हैं.

बस, इसी के साथ कुमायूं मंडल के इन 3 खूबसूरत नगरों की सैर 3 दिनों में ही पूरी हो जाती है. यदि आप कम समय और कम बजट में प्राकृतिक खूबसूरती और शांत वातावरण का आनंद उठाना चाहते हैं, तो इन 3 स्थलों की यात्रा आप के लिए एक अच्छी ट्रिप साबित हो सकती है.

प्रकृति प्रेमियों को लुभाता मांडू

चांदनी रात में दूरदूर तक पहाडि़यों और ऐतिहासिक महत्त्व की इमारतों को देखने का आनंद अगर कहीं देखने में आता है तो वह जगह मांडू है. प्रकृतिप्रेमियों को मांडू हमेशा से ही आमंत्रित करता रहा है. अद्भुत शांति के लिए मशहूर मांडू में आ कर लगता है कि शहरों की व्यस्त भागादौड़ी और आपाधापीभरी जिंदगी के मुकाबले एक ऐतिहासिक प्रेमकहानी को गुंजाते इस स्थल की बात ही निराली है.

एक रोचक किस्सा

रूपमती अपने नाम के मुताबिक असाधारण रूप से सुंदर थी. वह एक किसान की बेटी थी. मुगल शासक बाज बहादुर उस के सौंदर्य पर ही नहीं मरमिटा था, बल्कि रूपमती गाती भी बहुत अच्छा थी. धर्म की परवा न करते उस ने रूपमती से शादी की थी. रूपमती के सौंदर्य और गायन के चर्चे जब अकबर तक पहुंचे तो उस ने बाज बहादुर को संदेश पहुंचाया कि रूपमती को उस के पास दिल्ली भिजवा दिया जाए. इस पर पतिधर्म निभाते बाज बहादुर ने जवाब यह दिया कि वे अपनी रानी को मांडू भिजवा दें. इस बात पर तिलमिलाए अकबर ने मांडू पर हमला कर दिया और बाज बहादुर को बंदी बना लिया. वह रूपमती तक पहुंच पाता, इस के पहले ही रूपमती ने हीरा खा कर अपनी जान दे दी थी. इस प्यार और त्याग को अकबर ने समझा तो वह बहुत पछताया और बाज बहादुर को आजाद कर दिया. पर बाज बहादुर रूपमती को इतना चाहता था कि उस ने रूपमती की कब्र पर सिर फोड़फोड़ कर जान दे दी थी. कहा यह भी जाता है कि अकबर का सेनापति आदम खां भी रूपमती पर जान देता था.

मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित मांडू तक पहुंचना थोड़ा तकलीफदेह काम है. हालांकि यह तकलीफ मांडू में दाखिल होने के साथ ही खत्म हो जाती है जब यहां की हरियाली और रमणीयता से पर्यटक रूबरू होते हैं. मांडू की हर इमारत की एक दास्तान है, उस का शिल्प है, इतिहास है और अंजान चुंबकीय खिंचाव है जो बरबस ही पर्यटकों को एहसास कराता है कि वे अगर यहां न आते तो एक यादगार अनुभव से वंचित रह जाते. आदिवासी बाहुल्य जिले धार के इस कसबे की आबोहवा भी पर्यटकों को ताजगी व स्फूर्ति से भर देती है.

जब पर्यटक यहां घूमना शुरू करते हैं तो औसतन हर आधा किलोमीटर पर इमारत में चस्पां एक कहानी उन का इंतजार कर रही होती है. नर्मदा किनारे बसे इस पर्यटन स्थल का सब से बड़ा आकर्षण बाज बहादुर शाह का महल है जिस का निर्माण 15वीं ईसवी में एक मुगल शासक नासिर शाह ने करवाया था. लाल पत्थरों से निर्मित इस महल का भीतरी उत्तरी भाग संगमरमर से बना है. ऐसे ही एक संगमरमरी झरोखे से बाज बहादुर जंगलों को देखता था. मांडू के वैभव का एक दूसरा उदाहरण रूपमती महल है. नासिर शाह द्वारा ही बनवाए इस महल की छत से हरियाली और धुंध का दृश्य पर्यटकों का मन मोह लेता है. ऐसा कहा जाता है कि रानी रूपमती प्रतिदिन इस महल की छत से नर्मदा नदी का दर्शन कर के ही अन्नजल ग्रहण करती थी. बाज बहादुर और रूपमती के प्रेम का साक्षी यह महल 3 मंजिला है और संकरा है जिस की छत तक पहुंचने के लिए झुक कर चढ़ना पड़ता है. बारिश के दिनों में जब नर्मदा नदी उफान पर होती है तब यहां का दृश्य काफी मनोरम हो जाता है. चारों तरफ से धुआं सा उठता दिखता है.

मांडू के महल और इमारत देखने के लिए एक दिन काफी नहीं, हालांकि अधिकांश पर्यटक दिनभर में मांडू घूम लेते हैं क्योंकि वे इंदौर में ठहरते हैं. पर रात में मांडू देखने का लुत्फ कुछ और है, खास कर चांदनी रात में. हिंडोला महल, होशंगशाह का मकबरा, अशरफी महल, जहाज महल, रेवा कुंड, तवेली महल और दाई का महल जैसी दर्जनों इमारतें मांडू की शान बढ़ाती हैं. मांडू छोटा सा कसबा है जिस में रात 8 बजे के बाद चहलपहल खत्म सी हो जाती है. इसलिए घूमने के लिए सुबह जल्द उठ कर जाना बेहतर होता है. किराए की साइकिल से मांडू घूमना किफायत का काम है. यहां स्थानीय वाहन कम ही मिलते हैं और दूरदराज की इमारतों तक जाने से चालक कतराते हैं.

एक मुसलिम शासक बाज बहादुर और हिंदू रानी रूपमती की प्रणय गाथा को उकेरता मांडू वाकई रोमांटिक स्थल भी है जिस पर फिल्म भी बन चुकी है. भ्रमण के दौरान आदिवासी जीवन की सरलता और सहजता भी समझ आती है. आदिवासियों द्वारा निर्मित कई छोटी वस्तुएं यहां मिलती हैं. महेश्वर की मशहूर साडि़यां भी यहीं मिलती हैं.

रुकें ओंकारेश्वर में

इंदौर से मांडू आते वक्त रास्ते में ओंकारेश्वर रुक कर जरूर घूमना चाहिए जहां नर्मदा नदी पूरे वेग से बहती है. ओंकारेश्वर की प्राकृतिक छटा भी दर्शनीय है. कईर् फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है और अभी भी अकसर होती रहती है. मांडू से जब पर्यटक वापस लौटते हैं तो उन के साथ अटूट स्मृतियां होती हैं, जेहन में यहां की हरियाली, अद्भुत शांति, झूमते पेड़ और शानदार भव्य इमारतें होती हैं. इंदौर से मांडू सड़क के रास्ते आना उपयुक्त रहता है. अब पर्यटक वर्षा ऋतु में भी यहां आने लगे हैं क्योंकि उस वक्त यहां की खूबसूरती और लहलहाते जंगल की खूबसूरती शबाब पर होती है. बारिश में ओंकारेश्वर का नजारा निराला होता है.

सिर्फ ताजमहल ही नहीं प्रेम का प्रतीक

जीवनसाथी के प्रति प्रेम को संसार में चिरस्मरणीय बनाए रखने के लिए खूबसूरत महल, ऊंचेऊंचे, बडे़बड़े शानदार किले, आलीशान मकबरों आदि का बनाना नई बात नहीं है. इस का ज्वलंत उदाहरण ‘महलों का ताज’, भारत के आगरा में बना अद्वितीय प्रेम का प्रतीक, ताजमहल, अपनी सुंदरता, भव्यता एवं आकर्षण के कारण विश्व के  ‘नौ वंडर्स’ में एक है. आगरा का ताजमहल अकेला ही एक ऐसे प्रेम का प्रतीक  है जिस का कोई मुकाबला नहीं है. भारत के मुगल बादशाह शाहजहां की पत्नी मुमताज की मृत्यु के बाद शाहजहां ने अपने सच्चे प्यार को अमर करने के लिए दुनिया का सब से सुंदर और सर्वश्रेष्ठ महल बनाने की ठान ली थी और इस तरह एक अत्यंत सुंदर, आलीशान महल बन गया जिसे उस की अद्वितीय सुंदरता एवं भव्यता के कारण ताजमहल का नाम दिया है.

यहां हम विश्व के कुछ और शानदार ताजमहलों की बात करेंगे. प्रेम के प्रतीक कई प्रकार के होते हैं. आगरा के ताजमहल को देखने के बाद ऐसे ही अमरप्रेम के और प्रतीकों को देखने का मुझे अवसर मिला.

बोल्ट कैसल

कनाडा में 1,000 आईलैंड्स पर बोल्ट कैसल महल को जौर्ज बोल्ट ने अपनी प्रिय पत्नी लुईस की याद में बनवाया था. 1851 में जन्मा जौर्ज बोल्ट, अमेरिका का एक अरबपति था. बोल्ट अपनी पत्नी लुईस, जिसे वह ‘ब्यूटीफुल पिं्रसैस’ कह कर पुकारता था, को बहुत प्यार करता था. बोल्ट ने 1,000 आइलैंड्स पर लुईस की याद में एक चिरस्मरर्णीय महल बनाने का निश्चय किया. 1900 में इस प्रेम के प्रतीक का बनना शुरू हुआ. शायद उस ने आगरा के ताजमहल का नाम नहीं सुना था. उस ने उस समय के मशहूर एवं महंगे से महंगे आर्किटैक्ट व करीगरों को इस महत्त्वपूर्ण कार्य में लगाया. बोल्ट ने निश्चय किया कि वैलेंटाइन डे और लुईस के जन्मदिन के अवसर पर उसे इस अपार प्रेम के उपहार को भेंट करेगा. अपने जन्मदिन के ठीक 1 महीने पहले बोल्ट को अकेला छोड़ 42 वर्षीया लुईस अचानक इस संसार को छोड़ कर चली गई. 1904 में बोल्ट कैसल बनाने का काम लुईस की अचानक मृत्यु के कारण बंद कर दिया गया. आज यह 1977 से एक टूरिस्ट केंद्र के रूप में जाना जाता है.

अत्यंत आधुनिक साजसज्जा एवं विश्व के विभिन्न भागों से लाई गई कलाकृतियों से सजा यह कैसल दुनिया के किसी राजमहल से कम नहीं है.

माउसोलस का मकबरा

पतिपत्नी के अमरप्रेम के प्रतीक की एक निशानी हमें 377 बीसी में बने माउसोलस के मकबरे के रूप में मिलती है. इस प्यार की यादगार के पीछे की कहानी थोड़ी अलग है. यहां पर महल या मकबरा पति न बनवा कर पत्नी अपने पति के मरने के बाद उस की याद में बनाती है. जिस की अमरप्रेम को निशानी के रूप में दुनिया के उस समय के सब से शानदार मकबरों में गिनती होती है.  माउसोलस अपनी रानी अर्टमीसिया के साथ हैलीकारनासस और उस के आसपास के क्षेत्रों में 24 साल तक राज करता रहा. अर्टमीसिया और माउसोलस आपस में इतना प्यार करते थे कि माउसोलस कभी भी अर्टमीसिया के बिना रहने की कल्पना नहीं कर सकता था. सन 353 बीसी में माउसोलस की अचानक मृत्यु हो गई. रानी अर्टमीसिया ने अपने पति की याद में दुनिया का सब से बड़ा और शानदार बहुमूल्य मकबरा बनाने का निश्चय किया. कई वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद 125 फुट ऊंचा तीनमंजिला मकबरा बन कर तैयार हुआ.

यह मकबरा अपनी सुंदरता, विशालता तथा अद्वितीय शिल्पकला की कृति के कारण विश्व का प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक मकबरा गिना जाने लगा. अपनी सजावट एवं इस में लगी अति सुंदर मूर्तियों के कारण इस की ख्याति में कई गुना वृद्धि हुई. अर्टमीसिया द्वारा अपने पति राजा माउसोलस के प्रति अमरप्रेम के प्रतीक के रूप में बनाए गए इस मकबरे को एंशिएंट वर्ल्ड के सातवें आश्चर्य में गौरवपूर्ण स्थान मिला. माउसोलस की मृत्यु के 2 वर्ष भी नहीं बीते थे कि अर्टमीसिया की मृत्यु हो गई. पतिपत्नी दोनों के पार्थिव शरीर इसी मकबरे में दफन हैं. अमरप्रेम की निशानी भारत के ताजमहल की तरह दोनों प्रे्रमियों के शरीर अपने बनाए इस शानदार मकबरे के नीचे शांत पड़े हैं.

हुमायूं का मकबरा

दिल्ली में बने हुमायूं के मकबरे की शानोशौकत ताजमहल से कम नहीं है. मुगल बादशाह हुमायूं की मृत्यु के बाद उस की विधवा हमीदा बानो बेगम ने अपने पति की याद में 1565 में दिल्ली में मथुरा रोड के पास एक आलीशान एवं भव्य मकबरा बनाया. इसे देखने से आप को किसी राजा के आलीशान महल की याद आती है. यह मुगल साम्राज्य की अद्वितीय वास्तुकला तथा शिल्कला को भारत में फैलाने वाला प्रथम स्मारक है. जिस में पर्शियन निर्माणशैली की छवि दिखती है जो चारों तरफ सुंदर, हरेभरे बगीचों और क्यारियों से घिरा है. यह मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप में मुगलों द्वारा बना प्रथम औद्योगिक मकबरा है जो आगे चल कर मुगलों के अनेक स्मारकों को बनाने में प्रेरणा बना. ताजमहल उस में से एक है. 15 लाख रुपयों में बनने वाले हुमायूं के इस मकबरे को ‘ताजमहल का दादा’ भी कहते हैं. दिल्ली का यह एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल है.

हैंगिंग गार्डेंस

हैंगिंग गार्डेंस को बने 2,500 वर्ष से अधिक समय बीच चुका है किंतु अपने समय में बने स्मारकों में यह अपनी खूबसूरती और इस के बनने के पीछे जुड़ी कहानी के कारण इसे ताजमहल की श्रेणी में गिना जाता है. बेबीलोन का हैंगिंग गार्डेंस ‘सैवन वंडर्स औफ एंशिएंट वर्ल्ड’ में गिना जाता है. बेबीलोन के बादशाह ने इसे 605 बीसी में अपनी प्रिय पत्नी एमिटिस को खुश रखने के लिए बनवाया था. यह प्यार कुछ गहरा, कुछ अनोखा और कुछ दिल की गहराइयों को छूने वाला था. इतिहास में इस तरह के अनोखे प्यार का दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता. विवाह के पहले एमिटिस हरेभरे मैदान, ऊंचेऊंचे पहाड़, झरने आदि, जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर थे, में रहती थी. शादी के बाद मैसोपोटामिया में राजा का महल और उस के आसपास के नीरस स्पौट्स, जो प्राकृतिक सौंदर्य से दूर थे, उसे रास नहीं आते थे. राजा ने अपने दिल की मल्लिका, सौंदर्य सामाज्ञी तथा गुणों की खान एमिटिस की उदासी दूर करने के लिए और उसे प्रसन्न रखने के लिए उसी तरह के पहाड़, हरेभरे जंगल, हरियाली, बागबगीचे आदि बनाने की योजना बनाई जो अंतिमरूप में हैंगिंग गार्डेंस के रूप में सामने आई.

एक कृत्रिम पहाड़ पर बने बड़ेबड़े खोखले खंभों के ऊपर छत, खंभों के अंदर भरी मिट्टी से निकलते पेड़पौधों और छतों को जोड़ती सुंदर कीमती संगमरमर की सीढि़यां, उस पर हरेभरे बगीचे, क्यारियां, पौधे आदि का यह एक मायावी संसार था. जगहजगह ऊंचेऊंचे फौआरे, वाटर फौल्स, विभिन्न प्रकार के रंगों के कई तरह के पुष्पों से सुसज्जित गमलों की सीढि़यों पर लगी कतारें प्राकृतिक सौंदर्य की कमी को सिर्फ पूरा ही नहीं किया बल्कि एक नई अनूठी, झूलती हुई अविश्वसनीय रचना ने एमिटिस के प्रति उस के प्रेम की निशानी को अमर बना दिया. पति द्वारा पत्नी के प्यार में बनाया यह सुंदर, आकर्षक स्मारक किसी ताजमहल से कम न था. मगर समय के थपेड़ों ने इसे आज एक खंडहर के रूप में परिवर्तित कर दिया है.

इस प्रकार, विश्व के कई कोनों में कई ताजमहल बने, टूटे और इतिहास के पन्नों में गुम हो गए. पर शाहजहां द्वारा मुमताज के प्रति अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में आगरा में बनाया गया ताजमहल आज भी सुंदर एवं कलाकृति के सर्वश्रेष्ठ नमूने के रूप में लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. इस का चिरयौवन सदियों तक लोगों को अपने मोह में बांध कर रखता रहेगा. विश्व के अनेक देशों के राष्ट्रपति, राजनेता, राजा, महाराजा, प्रिंस आदि विश्व की इस बेजोड़ कलाकृति की एक झलक पाने के लिए अनयास ही यहां खिंचे चले आते हैं.

यूं ही नहीं विदेशों में धूम मचा रही हैं ये भारतीय मॉडल

हाल ही में अपनी तस्वीरों के चलते चर्चा में आई मॉडल और अभिनेत्री आशिमा नारवाल अपने हुनर और खूबसूरती के दम पर अपने देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब नाम कमा रही हैं.

हरियाणा के एक छोटे से शहर रोहतक की अदाकारा एवं मॉडल आशिमा नारवाल विदेशों में भी अपनी अदाओं का खूब जलवा बिखेर रही हैं. अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद 18 साल की उम्र में अपनी आगे की पढ़ाई सिडनी के एक अच्छे विश्वविद्यालय से पूरी करने के लिए उन्होंने वहां जाने का फैसला लिया और यहीं से उनके एक सफल करियर की शुरुआत हुई. हम आपको बता दें कि आशिमा नारवाल ने चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी पढ़ाई की है और सिडनी के कई बड़े और अच्छे अस्पतालों में काम किया है.

साल 2015, मार्च में मिस सिडनी ऑस्ट्रेलिया एलिगेंस (Miss Sydney Australia Elegance 2015) का खिताब जीत चुकी आशिमा नारवाल ने उसी साल फिलीपींस में हुए मिस ग्लोबल 2015 में भारत का प्रतिनिधित्व किया और इसकी विजेता भी चुनी गईं.

विदेश में रहकर मॉडलिंग में करियर बनाने और सफलता प्राप्त करने की राह निश्चित ही आसान नहीं रही होगी. आशिमा का सकारात्मक दृष्टिकोण और एक प्यार भरा दिल ही मॉडलिंग में उनकी उपस्थिति को सफल बनाने में सक्षम रहा. फिलीपींस में आयोजित मिस ग्लोबल 2015 में भी उन्होंने अपने देश का प्रतिनिधित्व, महान नम्रता और अभिमान के साथ व यकीनन अपने दिल में भारत के लिए अद्भुत सम्मान लेकर किया.

अब सिडनी बेस्ड कही जाने वाली ये मॉडल या ऐक्ट्रेस, यूं ही नहीं चर्चित हो गई हैं, सात समंदर पार इस मॉडल की कामयाबी की कहानी और उनकी खूबसूरती ने ही मॉडलिंग के क्षेत्र में उनका कीर्तिमान स्थापित किया है. तस्वीरों में आशिमा के लुक्स जितने बोल्ड नजर आते हैं उतनी ही उनके चेहरे पर भारतीयता की झलक भी देखी जा सकती है.

कला के क्षेत्र में आशिमा की बेहद रुचि है. 9 साल की उम्र में ही आशिमा को क्रिएटिव आर्ट के लिए अवॉर्ड मिल गया था. अगर आप इनके सिडनी स्थित घर में जाएंगे तो आपको इनका लॉज रूम पेंटिंग्स से भरा हुआ मिलेगा. दो बेहद ऊंचे स्तर के ब्यूटी कॉम्पिटिशन जीत चुकी आशिमा एक अद्भुत डांसर भी हैं, हालांकि उन्होंने कभी इसकी ट्रेनिंग नहीं ली. अपने मॉडलिंग करियर के अलावा आशिमा को ट्रैवलिंग का भी शौक है.

मेडिकल क्षेत्र से संबंध रखने वाली आशिमा, अपने बेहद छोटे करियर में ही अभी तक ऑस्ट्रेलिया के कई महत्वपूर्ण इवेंट्स में नजर आ चुकी हैं. ये बात तो आप सभी जानते ही हैं कि मॉडलिंग करियर के साथ साथ वे अब अभिनय भी शुरू कर चुकी हैं. कुछ समय पहले आईं खबरों की माने तो अभी अभिनेत्री आशिमा नारवाल, एक तेलुगू हॉरर-थ्रिलर फिल्म में व्यस्त हैं, जिसका निर्देशन, अश्विनी कुमार कर रहे हैं.

आज भी आशिमा के गेटअप्स देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे सिडनी बेस्ड हैं. आशिमा की साड़ी वाली तस्वीरें हमेशा चर्चा में रहती हैं.

अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाते ये सितारे

इंसान का बड़बोलापन कभी-कभी उसे फंसा देता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं की वो लोगो को बुरा-भला कहे बिना रह ही नही पाते हैं. अभी हाल ही में हुई ऐसी ही बड़ेबोलेपन वाली घटना से किसी का अच्छा-खासा करियर बर्बाद हो सकता है.

ऐसे बॉलीवड में बहुत से अभिनेता हैं जो अपने बड़ेबोलेपन की वजह से सुर्खियों में रहे हैं.

राखी सावंत

अपने बड़ेबोलेपन के लिए जानी जाने वाली राखी सावंत ने कुछ समय पहले भगवान वाल्मीकि और उनको मानने वालों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी. जिसके बाद उनके खिलाफ हाल ही में अरेस्ट वारंट जारी हुआ है. लेकिन राखी सावंत एकमात्र ऐसी सेलेब्रिटी नहीं हैं जिनका अपनी जुबान पर काबू नहीं है. और भी स्टार्स ऐसे हैं.

कपिल शर्मा

बड़ेबोलेपन और बदजुबानी किसी को कैसे बुरा फंसा सकती है और कैसे अर्श से फर्श पर ला सकती है इसका ताजा उदाहरण कपिल शर्मा से बेहतर हो ही नहीं सकता.

अभी सुर्खियों में रहे कपिल शर्मा ने अपने सह-कलाकार सुनील ग्रोवर के साथ शराब पीकर जो झगड़ा किया और जूता फेंककर मारा, उससे ना सिर्फ उनकी लोकप्रियता घटी बल्कि उनका नंबर वन कॉमेडी शो भी टीआरपी की रेस से बाहर हो गया. फैंस ने भी सोशल मीडिया पर कपिल शर्मा पर खूब गुस्सा निकाला. नतीजा ये हुआ कि अब कपिल शर्मा अपने स्टारडम को बचाने में लगे हैं.

कमाल आर खान

खुद को नंबर वन क्रिटिक और बाकी लोगों को टू रूपीज पीपल बताने वाले के आर के मतलब कमाल आर खान तो बदजुबानी और अपमानजनक कमेंट करने में माहिर रहे हैं. इस कला में उनकी कोई बरबरी नहीं कर सकता. जब बात किसी पर कटाक्ष करने की हो या मजाक उड़ाने की तो के आर के कोई मौका नहीं छोड़ते. अपनी इसी आदत की वजह से वो कई बार बॉलीवुड स्टार्स का गुस्सा भी झेल चुके हैं. एक बार तो उन्होंने सोनाक्षी सिन्हा और बाकी हीरोइनों के बट को लेकर पोल चलाया जिस पर खूब बवाल हुआ और सोनाक्षी ने भी उन्हें थप्पड़ मारने की बात कह दी थी.

रामगोपाल वर्मा

रामगोपाल वर्मा भी ऐसे ही लोगों में शुमार हैं जिन्होंने ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जब उन्होंने बदजुबानी ना की हो. बॉलीवुड स्टार्स से लेकर सभी का उन्होंने मजाक उड़ाया. बीते दिनों उन्होंने टाइगर श्रॉफ को गे तक कह दिया था. सोशल मीडिया पर लोग रामगोपाल वर्मा को काफी खरी-खोटी सुनाते हैं लेकिन वर्मा जी के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आता.

अभिजीत भट्टाचार्य

एक वक्त था जब सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य के करोड़ों फैंस थे. उन्हें शाहरुख खान की आवाज माना जाता था लेकिन आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि आए दिन वो किसी ना किसी पर कटाक्ष करते रहते हैं और कई बार अपना आपा खो चुके हैं. पिछले साल हिट एंड रन केस में सलमान खान का बचाव करते-करते उन्होंने फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की तुलना कुत्ते से कर डाली थी. वहीं एक बार एक लाइव डिबेट शो के दौरान उन्होंने एक पत्रकार के साथ गाली-गलौच की थी.

जब ऑडिशन के लिए उतरवाए जाते थे लड़कियों के कपड़े

बॉलीवुड को लोग रंगीन दुनिया के नाम से जानतें हैं, यह वो जगह है जहां हर कोई अपनी किस्मत आजमाने पहुंचता है, लेकिन सफल उनमें से कुछ ही हो पाते हैं. हर साल हजारों लड़कियां इंडस्ट्री में एक्ट्रैस बनने की चाह से आतीं हैं. 50 और 60 के दशक में भी कई लड़कियां फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए यहां पहुंचती थीं लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं था, जितना लोग समझते थे.

हाल ही में 1951 के दौरान बंद दरवाजे के पीछे होने वाले बॉलीवुड ऑडिशन की हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आई हैं, जिसे  देख आप चौंक जाएंगे. ये तस्वीरें फोटो जर्नलिस्ट जेम्स बुरके ने तब खींची थीं, जब डायरेक्टर अब्दुल राशिद करदार अपनी फिल्म के लिए एक भारतीय व एक विदेशी लड़की का ऑडिशन ले रहे थे. इस दौरान डायरेक्टर अदाकाराओं को छू छू कर देख रहें थे. वहीं अदाकारा के कपड़े उतरवा रहे डायरेक्टर की ये हरकत काफी शर्मनाक लग रही है.

अब्दुल राशिद करदार का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को लाहौर में हुआ था. उन्हें ए आर करदार के नाम से भी जाना जाता है. उनका उपनाम मियांजी था. करदार को लाहौर के फिल्म उद्योग का जनक भी माना जाता है. बंटवारे के समय वो भारत आ गए और मुंबई में आकर बॉलीवुड से जुड़ गए. करदार ने अपने प्रोडक्शन में 40 से 60 के दशक के बीच कई यादगार फिल्में बनाईं. करदार ने अपने करियर की शुरुआत विदेशी फिल्मों के लिए कैलिग्राफी द्वारा पोस्टर बनाने से की थी.

साल 1928 में करदार ने फिल्म डॉटर्स ऑफ टुडे और 1929 में हीर रांझा में बतौर एक्टर काम किया. करदार ने बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म 1929 में हुस्न का डाकू बनाई थी. करदार ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से कई कलाकारों को इंट्रोड्यूस करवाया. इनमें नौशाद, मजरूह सुल्तानपुरी और सुरैया जैसी हस्तियां शामिल हैं. इंडस्ट्री के मशहूर गायक मोहम्मद रफी को करदार ने ही अपनी फिल्म दुलारी के गीत 'सुहानी रात ढल चुकी' गाने का मौका दिया था.

हम आपको दिखा रहे हैं 1951 की कुछ ऐसी ही अनदेखी तस्वीरें, जो बॉलीवुड ऑडिशन की सच्चाई बयां करती हैं…

उस के लाइक्स मेरे लाइक्स से ज्यादा कैसे

किट्टी पार्टी में मुंह लटकाए बैठी मनीषा से कारण पूछा तो उस की रुलाई फूट पड़ी. बोली, ‘‘क्या बताऊं, मुझे फेसबुक पर 2 साल से ज्यादा हो गए हैं फिर भी न जाने क्यों लाइक्स और कमैंट्स बहुत कम मिलते हैं जबकि अंजु अभी महीना पहले ही फेसबुक से जुड़ी है और उस के लाइक्स की भरमार है. भला उस के लाइक्स मेरे लाइक्स से ज्यादा कैसे?’’ उस की स्थिति देख कर मेरी आंखें भर आईं. मैं फेसबुक की माहिर नहीं थी, अत: मुझे उस का दुख दूर करने का कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था. मैं ने इस समस्या पर सब के साथ चर्चा करने का मन बनाया. सब के आ जाने पर चाय पीते हुए जब प्रदूषण जैसे आम मुद्दे पर बात चल रही थी, तब मैं ने मनीषा की समस्या का जिक्र किया. समस्या सुन सभी को अपनी दुखती रग पर हाथ रखना लगा, क्योंकि उन्हें भी आएदिन इस समस्या से दोचार होना पड़ता था. सभी इस विषय पर चर्चा करने को राजी हो गए. फिर अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर सभी ने कुछ सुझाव पेश किए.

पहला सुझाव था, इस उपदेश पर अमल करना कि व्यक्ति को फल की इच्छा किए बिना कर्म करते रहना चाहिए. लोगों की पोस्ट और फोटो दिल खोल कर सिर्फ लाइक ही न करें बल्कि कमैंट्स भी करें. चाहे कोईर् तसवीर कितनी भी खराब लग रही हो, उस की प्रशंसा के पुल बांध दें. याद रखें कि भलाई कभी बेकार नहीं जाती. ये लाइक्स और कमैंट्स आप के पास कभी न कभी लौट कर अवश्य आएंगे. अगला सुझाव प्रेम में बंधन के महत्त्व से था. जैसे रक्षाबंधन पर भाईबहन का बंधन, फ्रैंडशिप डे के दिन दोस्तों को बांधे जाने वाले फ्रैंडशिप बैंड और इसी प्रकार गठबंधन आदि. आप भी अपने फेसबुक के दोस्तों को ‘टैग’ नामक बंधन में बांधिए. किसी भी पोस्ट को प्रस्तुत करते समय प्रेमपूर्वक कई लोगों को टैग कर दीजिए. फिर देखिए कि प्रेमभाव कैसे उमड़ कर लाइक्स और कमैंट्स में तबदील होता दिखाई देता है. टैग किए गए दोस्तों के वे मित्र जो आप के फ्रैंड नहीं हैं, उन्हें भी आप की पोस्ट दिखाई देगी और वे भी टैग जाल में फंस कर अपने लाइक्स आप को समर्पित करेंगे.

जब आप की पोस्ट पर मित्र लाइक्स और कमैंट्स की अमृतवर्षा करें तो इन अतिथियों का सत्कार करें. सुंदर फूलों का प्रावधान जो फेसबुक ने किया है, वह अपने जवाब में पेश करें. ‘आभार’, ‘हृदयतल से धन्यवाद’ और ‘बंदा नवाजी का शुक्रिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मुसकराता स्टिकर चिपका कर उन्हें विदा कीजिए. आप की इस मेहमाननवाजी से वे फूले नहीं समाएंगे व आप के द्वारा अगली पोस्ट डालने पर अवश्य आप को लाइक्स और कमैंट्स से नवाजेंगे. जो मित्र कभी भी आप की पोस्ट को लाइक नहीं करते उन्हें निमंत्रण देने के उद्देश्य से अपनी पोस्ट को कौपीपेस्ट कर के उन के इनबौक्स में डाल दीजिए. वे खुद को किसी जज से कम नहीं समझेंगे और किसी चीफ गैस्ट की भांति खुद ही आप की वौल पर आ कर लाइक्स और कमैंट्स की ट्रौफियों की वर्षा कर देंगे.

जिस प्रकार स्वस्थ रहने के लिए मौर्निंगवौक और योगा का सहारा लिया जाता है, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य के लिए पीपल यू मे नो और अपने फेसबुक मित्रों की ‘फ्रैंडलिस्ट’ देखते हुए दिमागी कसरत करना आवश्यक है. टहलने और योगा करने से यदि रोग दूर होते हैं और वजन घटता है तो इन लिस्टों की मानसिक कसरत से फेसबुक फ्रैंड्स बढ़ते हैं, जिस से लाइक्स मिलने की आशा का दीया टिमटिमा उठता है. फिर ज्योंज्यों लाइक्स मिलने शुरू होते हैं, त्योंत्यों मानसिक तनाव दूर होता है तथा प्रसिद्धि की प्रसन्नता से चेहरा कांतिमय बनता है.

योगा और टहलने से मिलने वाली औक्सीजन यदि फेफड़ों को गतिशील बनाती है, तो लाइक्स और कमैंट्स मिलने की अपार खुशी से सीना चौड़ा हो जाता है. अत: फेसबुक दोस्त ढूंढ़ने की दिमागी कसरत अपनी दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है. लाइक्स पाने का एक उपाय यह भी है कि अपने दोस्तों की वौल पर जा कर उन की पोस्ट पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए कमैंट्स पढि़ए और कमैंट्स करने वालों में जो आप के मित्र नहीं हैं, उन के कमैंट्स के चरणों में अपने लाइक्स के फूल अर्पित कीजिए. आप की इस अदा से प्रसन्न हो कर वे खुद ही आप को मित्र बना लेंगे तथा आप की पोस्ट पर भी अपने लाइक्स भेजने लगेंगे.

यदि कोई मित्र आप की पोस्ट लाइक करना बंद कर दे या कमैंट्स करने में कंजूसी दिखाए तो ‘जैसे को तैसा’ वाली कहावत पर अमल करते हुए उस का तब तक बायकौट जारी रखें, जब तक उसे अपनी गलती का एहसास न हो जाए. यदि आप की पुरानी पिक्स पर लाइक्स बहुत कम हैं और उन्हें देखदेख कर आप का कलेजा मुंह को आ रहा है तो घबराएं नहीं बल्कि उन पर स्वयं ही कोई टिप्पणी कर दें या खुद ही उसे लाइक कर दें, इस से वे फ्रैंड्स की न्यूजफीड में ऊपर दिखाई देने लगेंगे और आप कई लाइक्स के हकदार बनेंगे. यदि आप का बौयफ्रैंड आप को लाइक्स से वंचित किए हुए है तो किसी दिन उस से जबरदस्ती झगड़ा कर लीजिए, फिर कभी न मिलने की धमकी देने के साथसाथ ‘मैं फेसबुक पर आगे से आप की कोईर् पिक्स लाइक नहीं करूंगी,’ कहते हुए कुछ दिन दूरी बना लीजिए. फिर देखिए कैसे वह आप को लाइक्स और कमैंट्स के तोहफों से नवाजता है.

याद रखिए, फेसबुक सोशल मीडिया है अर्थात जनता द्वारा और जनता के लिए. अत: अपनी प्रोफाइल में तसवीरें, पोस्ट, शेयर आदि पब्लिक कर के रखिए ताकि अधिक से अधिक लोग देख पाएं. केवल मित्रों के लिए रखेंगे तो कम लाइक्स मिलेंगे, सब के लिए रखेंगे तो न जाने कब कौन अपने लाइक्स और कमैंट्स की बारिश कर दे.

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