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आईपीएल 10 : जब कोहली ने लिया गेल का इंटरव्यू

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और गुजरात लायंस के बीच हुआ मुकाबला क्रिस गेल के लिए बेहद अहम था. बेंगलोर ने गुजरात लायंस को 21 रन से हराया. इस जीत के हीरो रहे क्रिस गेल. जिन्होंने फॉर्म में वापसी करते हुए 38 गेंदों में 77 रन बनाए और साथ ही टी20 क्रिकेट में 10 हजार रन भी पूरे किए.

बैंगलोर टीम का प्रदर्शन कमजोर था. पॉइंट टेबल में सबसे नीचे चल रही थी आरसीबी टीम. ऐसे में क्रिस गेल का चलना उनके और टीम दोनों के लिए बेहद जरूरी था. टीम को इस जीत की जरूरत थी.

गेल बल्लेबाजी करने आए, तो दूसरे छोर पर विराट कोहली थे. कप्तान कोहली के लिए भी ये जरूरी था कि गेल चलें. दोनों के बीच अच्छी साझेदारी हुई. जब गेल ने टी 20 क्रिकेट में दस हजारवां रन लिया, तो विराट भी क्रीज पर थे. वो नॉन स्ट्राइकर छोर पर खड़े गेल की बल्लेबाजी देख रहे थे. बल्कि पूरी साझेदारी के दौरान विराट ने एक तरह से नॉन स्ट्राइकर का ही रोल अदा किया. उन्होंने आक्रामक शॉट जरूर खेले, लेकिन कोशिश की कि ज्यादातर स्ट्राइक गेल के पास हो.

मैच खत्म हुआ तो दोनों खुश थे. टीम दो पायदान ऊपर आ गई थी. ऐसे खुशनुमा माहौल में विराट कोहली ने रिपोर्टर का रोल अदा करने का फैसला किया. उन्होंने क्रिस गेल का इंटरव्यू किया. गेल और कोहली का यह इंटरव्यू बेहद रोचक था.

इंटरव्यू में विराट ने गेल से पूछा, मेरे साथ पारी शुरू करके आपको कैसा लगता है? इसके जवाब में गेल ने कहा आपके साथ पारी शुरू करना बड़ा अच्छा अनुभव है. आप लेजेंड हैं. आपने बहुत रन बनाए हैं. दूसरे छोर पर खड़े होकर आपको इतनी आसानी से रन बनाते देखना भी कमाल का अनुभव होता है. आपने अपने करियर में बहुत ऊंचाइयां छुई हैं. मैं दिल से आपको भविष्य के लिए शुभकामनाएं देता हूं.

यह तो था इन दोनों के बीच हुए बातचीत का पहला सवाल पूरे इंटरव्यू को जानने के लिए देखें यह वीडियो.

पोस्ट ऑफिस की ये स्कीम देती हैं टैक्स सेविंग का फायदा

नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही हर किसी को बेहतर निवेश के साथ-साथ टैक्स बचत की चिंता सताने लगती है. आमतौर पर लोग बचत के लिए सेविंग बैंक अकाउंट का आसान रास्ता चुनते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें न सिर्फ आप जब चाहें पैसा निकाल भी सकते हैं बल्कि इसमें आपको 4 फीसदी की दर से ब्याज भी मिल जाता है. लेकिन पोस्ट ऑफिस दो ऐसी स्कीम लोगों को उपलब्ध करवाता है जो इसके मुकाबले काफी बेहतर है.

1. पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम अकाउंट (MIS)

पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम में अकाउंट खुलवाना आसान होता है लेकिन इसकी भी कुछ न्यूनतम शर्ते होंती हैं, जैसे कि- मिनिमम कितनी राशि पर खुलता है खाता, इत्यादि.

• आप 1500 रुपए के गुणांक में एमआईएस में खाता खुलवा सकते हैं.

• सिंगल अकाउंट होल्डर के लिए निवेश की अधिकतम सीमा 4.5 लाख और ज्वाइंट अकाउंट के लिए यह सीमा 9 लाख रुपए है.

• अकेला व्यक्ति इसमें खाता खुलवा सकता है.

• यह खाता चैक और कैश के माध्यम से खुलवाया जा सकता है.

• खाता खुलवाने के दौरान और खाता खुलवाने के बाद भी नामिनेशन की सुविधा मिलती है.

• खाते में जमा राशि एक पोस्ट ऑफिस से दूसरे पोस्ट ऑफिस में ट्रांसफर की जा सकती है.

• संयुक्त खाता (ज्वाइंट अकाउंट) सिर्फ दो या तीन बालिग लोग ही खुलवा सकते हैं.

• सिंगल अकाउंट को ज्वाइंट अकाउंट और ज्वाइंट अकाउंट को सिंगल अकाउंट में बदला जा सकता है.

• मैच्योरिटी पीरियड 5 साल का होता है.

कितना ब्याज मिलता है

पोस्ट ऑफिस की इस स्कीम में निवेश करने से आपको 7.70 फीसद का सालाना ब्याज मिलता है. इस लिहाज से देखा जाए तो यह सेविंग अकाउंट से बेहतर निवेश विकल्प है.

2. पोस्ट ऑफिस टाइम डिपाजिट अकाउंट (TD)

पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट अकाउंट भी एक बेहतर निवेश विकल्प माना जाता है. कुछ न्यूनतम शर्ते होंती हैं जैसे-

• यह न्यूनतम 200 रुपए या इसके गुणांक में खुलवाया जा सकता है.

• इसमें अकाउंट अकेला व्यक्ति भी खुलवा सकता है.

• अकाउंट चैक या कैश के माध्यम से खुलवाया जा सकता है.

• खाता खुलवाने के दौरान और बाद में नॉमिनेशन की सुविधा मिलती है.

• इस खाते में जमा रकम को एक पोस्ट ऑफिस से दूसरे पोस्ट ऑफिस में ट्रांसफर किया जा सकता है.

• एक पोस्ट ऑफिस में कई सारे अकाउंट खुलवाए जा सकते हैं.

• संयुक्त खाते (ज्वाइंट अकाउंट) के लिए कम से कम दो वयस्क लोग होने चाहिए.

• सिंगल अकाउंट ज्वाइंट अकाउंट में और ज्वाइंट अकाउंट सिंगल अकाउंट में बदलवाया जा सकता है.

• अगर कोई नाबालिग इसमें अपना खाता खुलवाता है तो वो बालिग होने पर इसे अपने नाम दर्ज करा सकता है.

• इसमें भी आप एक साल से लेकर 5 साल तक निवेश कर सकते हैं. 5 साल तक के लिए किया गया निवेश आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत कर छूट प्राप्त करने योग्य होता है.

कितना ब्याज मिलता है

इस स्कीम में निवेश की अवधि के हिसाब से ब्याज दिया जाता है. एक साल की अवधि के लिए 7 फीसद, 2 साल के लिए 7.1 फीसदी, 3 साल के लिए 7.3 फीसद और 5 साल के लिए 7.8 फीसदी ब्याज मिलता है.

79 सालों से नहीं टूटा है क्रिकेट का ये रिकॉर्ड

क्रिकेट खेल है रोमांच का. और अगर हम बात करें छक्कों की तो वह छक्का ही है जो मैच को रोमांच से भर देता है. एक क्रिकेट मैच में छक्कों का अलग ही मजा है. बिन छक्का मैच अधूरा सा लगता है. क्रिकेट में छक्के तो अमूमन हर मैच में जड़े जाते हैं लेकिन उन छक्कों को लेकर चर्चा लंबे समय तक होती है जो लंबे और ऊंचे हों. एक ऐसा ही छक्का है जिसे क्रिकेट प्रेमी आज भी याद करते हैं. इस छक्के का रिकॉर्ड आज तक नहीं टूटा है. तो आईए आपको बताते हैं ऐसे ही कुछ रोमांचक छक्कों के बारे में.

क्रिकेट इतिहास का सबसे लंबा छक्का

अल्बर्ट ट्रॉट एक ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने 1938 में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया दोनों टीमों के लिए खेला. अल्बर्ट ने 1938 में वेस्टइंडीज के खिलाफ एक ऐसा छक्का मारा था जो लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड के पवेलियन को ही पार कर गया था. उनके इस छक्के की लंबाई 164 मीटर थी. यह विश्व क्रिकेट के इतिहास का सबसे लंबा छक्का था. 79 साल बीत जाने के बाद भी इतने लंबे छक्का का रिकॉर्ड अभी तक टूट नहीं पाया है.

बीबीएल के इतिहास का सबसे लंबा छक्का

लंबे छक्के हमेशा ही जहन में रहते हैं. कुछ ऐसा ही छक्का ऑस्ट्रेलिया में खेले जा रहे बीबीएल (बिग बैश लीग) टूर्नामेंट में देखने को मिला. बल्लेबाजी कर रहे थे ब्रिस्बेन हीट के क्रिस लिन और गेंदबाजी आक्रमण पर थे होबार्ट हरीकेन्स के तूफानी गेंदबाज शॉन टैट.

टैट की 147 किमी प्रति घंटा की रफ्तार वाली गेंद पर लिन ने परफेक्ट टाइमिंग के साथ मिड विकेट के ऊपर से गेंद को इतनी लंबी दूरी पर मारा कि गेंद स्टेडियम की छत पर पहुंच गई. इस छक्के की लंबाई 121 मीटर रही और यह बीबीएल के इतिहास का सबसे लंबा छक्का था.

स्टेडियम के बाहर गई गेंद

वनडे क्रिकेट में दूसरा सबसे तेज शतक लगाने का रिकॉर्ड अपने नाम पर रखने वाले कोरी एंडरसन ने साल 2014 में भारत के ईशांत शर्मा की गेंद पर 120 मीटर का लंबा छक्का जड़ा था. ये छक्का इतना लंबा था कि गेंद स्टेडियम के बाहर चली गई थी.

अजब-गजब छक्का

साल 2007 में टी20 विश्व कप में भारत के युवराज सिंह ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली गई 70 रनों की पारी के दौरान ब्रेट ली की गेंद पर 119 मीटर लंबा छक्का जड़ा था. ये छक्का इसलिए भी गजब था क्योंकि इसके लिए उन्होंने सिर्फ अपनी कलाईयों का इस्तेमाल किया था.

117 मीटर लंबा छक्का

डेनियल क्रिस्टियान ने साल 2015 में 117 मीटर लंबा छक्का जड़ा था. इस मैच में हरीकेन्स ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 9 विकेट पर 173 रनों का स्कोर बनाया था. होबार्ट की ओर से कोई बल्लेबाज बड़ा स्कोर नहीं बना सका था और क्रिस्टियान 33 रन बनाकर सर्वोच्च स्कोर बनाने वाले खिलाड़ी रहे थे.

लॉन्ग ऑफ में मारा गया छक्का

यह छक्का धोनी ने साल 2011-12 में सीबी सीरीज में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक मैच में जड़ा था. यह छक्का लॉन्ग ऑफ की दिशा में मारा गया था जो उस स्टेडियम की काफी बड़ी बाऊंड्री थी. लेकिन धोनी के इस छक्के आसानी से उस बाउंड्री को पार करते हुए पूरे 112 मीटर की दूरी तय की थी.

स्टेडियम के पार गई गेंद

एजाज अहमद पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर हैं जो गजब की प्रतिभा के धनी थे, लेकिन दुर्भाग्य के कारण उन्हें क्रिकेट में वह मिल नहीं पाया जिसके वह हकदार थे. यह बात तब की है जब पाकिस्तान इंग्लैंड के खिलाफ साल 1999 में खेल रहा था। स्कोर को चेज करते वक्त एजाज ने एक ऐसा छक्का जड़ा कि गेंद स्टेडियम के पार चली गई जिसके कारण स्टेडियम में नई गेंद लानी पड़ी. इस मैच में पाकिस्तान की ओर से दो छक्के लगाए गए और दोनों ही एजाज ने जड़े थे.

गेल का तूफानी छक्का

छक्के मारने के मामले में क्रिस गेल दुनिया के अन्य बल्लेबाजों से बहुत आगे हैं. साल 2010 विश्व कप टी20 मैच जो बारबोडास में भारत और वेस्टइंडीज के बीच खेला जा रहा था उसमें गेल ने युसुफ पठान की गेंद पर इतना बड़ा छक्का मारा था कि गेंद स्टेडियम के बाहर चली गई थी.

गुम्बद में लगा छक्का

साल 2005 में ऑस्ट्रेलिया के दौरे के दौरान पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी ने पर्थ में एक बड़ा छक्का लगाया था. अफरीदी के इस छक्के की गेंद स्टेडियम में लगे सबसे बड़े गुम्बद से टकराई थी. यह क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े छक्कों में से एक था.

धोनी का हेलीकॉप्टर शॉट

यह बात साल 2009 की है. न्यूजीलैंड के खिलाफ धोनी ने अपने हेलीकॉप्टर शॉट के सहारे डीप मिडविकेट का एक झन्नाटेदार छक्का लगाया था जो दूर जाकर स्टैंड्स में गिरा था.

गेंद हो गई गुम

ऑस्ट्रेलिया के बेहतरीन बल्लेबाजों में से एक रहे मार्क वॉ ने साल 1997 में न्यूजीलैंड के स्पिनर डेनियल वेट्टोरी की गेंद पर स्ट्रेट का लंबा छक्का लगाया था कि गेंद ही खो गई थी. बाद में अंपायरों ने नई गेंद मंगाकर खेल शुरू किया था.

इंसानियत शर्मसार : दो प्यार करने वालों को नंगा कर पीटा, देखिए वीडियो

मानवता को झकझोर के रख देने वाली राजस्थान क्षेत्र की एक घटना सामने आई है. घटना राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के कलिंजरा थाना क्षेत्र की है. एक प्रेमी युगल को बुरी तरह पीटने के बाद पूरे गांव के सामने कपड़े उतारे गए और फिर पूरे गांव के सामने नग्न अवस्था में ही घुमाया गया. इतना ही नहीं पिटाई करने वाले युवकों ने जलील करने की सारी हदें पार करते हुए उसका वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिया. इस घटना का वीडियो आपको आहत कर सकता है.

घटना जितनी भयानक है उतनी ही प्रदेश की महिलाओं को शर्मसार कर देने वाली है. खासतौर पर जब प्रदेश की मुखिया भी महिला हो. जानकारी के अऩुसार यह मामला कलिंजरा थाना इलाके के शंभुपुरा गांव का है. जहां दो दिन पूर्व शंभुपुरा गांव में प्रेमी युगल को निवस्त्र कर गांव में घुमाया गया और बाद में पिटाई भी की गई.

इस पूरे घटनाक्रम की भनक पुलिस को भी मंगलवार रात को लगी. जिसके बाद पुलिस प्रशासन हरकत मे आया और देर रात कलिंजरा थाना पुलिस शंभुपुरा गांव पहुंची. पुलिस ने जब पीड़ित युवक-युवति से मामला जानने की कोशिश की तो दोनों ही सहम गए. लेकिन भरोसे में लेने के बाद डरे हुए युवक ने पुलिस को पुरे घटनाक्रम के बारे में बताया.

पुलिस ने देर रात का युवक का मेडिकल करवाया और पीडित के बयान लिए. बताया जा रहा है कि युवक शंभुपुरा की युवती से प्रेम करता था और करीब 15 दिन पूर्व उसे लेकर भाग गया था. इस बात से खफा लड़की के परिजनों ने उसे गुपचुप अंदाज से गुजरात से पकड़ लिया और गांव लाकर पूरे गांव के सामने निर्वस्त्र कर पीटा. फिलहाल इस मामले में पुलिस ने किसी की गिरफ्तारी नहीं की है.

स्मार्टफोन के लिए 5 बेस्ट हैकिंग ऐप्स

दुनिया की आधी आबादी अपने सारे काम अपने स्मार्टफोन के जरिए पूरा कर लेती है. जो काम आप अपने डेस्कटॉप से करते थे, अब वो सारे काम एंड्रायड स्मार्टफोन्स के जरिए भी किए जा सकते हैं. स्मार्टफोन से केवल कॉलिंग और एसएमएस ही नहीं, बल्कि हैकिंग भी की जा सकती है. ऐसे कुछ हैकिंग ऐप जो आपके एंड्रायड स्मार्टफोन को हैकिंग मशीन या हैक बॉक्स बना सकती हैं.

1. insider:

इस ऐप के जरिए आप अपने क्षेत्र में छुपे वाई-फाई के बारे में जान सकते हैं. अगर आप इस ऐप को डाउनलोड करते हैं, तो आप छुपी हुई एसएसआईडी वाई-फाई के सिग्नल देख सकते हैं और अपने क्षेत्र में कम श्रेणी के वाई-फाई सिग्नल का भी पता कर सकते हैं.

2. Install Backtrack on Android Mobile:

बैकस्ट्रेक ऐप सिक्योरिटी टेस्टिंग के लिए समर्पित है और सिस्टम में कमजोरियों का भी पता लगाता है. आप इस OS ऐप को अपने फोन में डाउनलोड और इंस्टॉल कर सकते हैं.

3. Fing Networks Tools:

फिंग एक दूसरी एंड्रायड ऐप है, इसके जरिए वाई-फाई को खोज सकते हैं. लेकिन यह ऐप दूसरे ऐप से थोड़ा अलग है. आप इस एंड्रायड हैकिंग ऐप के जरिए पूरे नेटवर्क को स्कैन कर सकते हैं. यह ऐप पूरी तरह से मुफ्त है और विज्ञापन के बिना आता है.

4. ZAnti Penetration Testing Android Hacking Toolkit:

यह सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला हैकिंग ऐप है. इस एंड्रायड ऐप में आपको किसी भी वाई-फाई नेटवर्क को हैक करने से संबंधित लगभग सभी सिक्योरिटी टूल्स मिल जाएंगे.

5. WPS Connect:

अगर आप वास्तव में एंड्रायड मोबाइल फोन से किसी वाई-फाई का पासवर्ड हैक करना चाहते हैं, तो आपको डब्ल्यूपीएस कनेक्ट वाई-फाई पासवर्ड हैकिंग एंड्रायड ऐप को डाउनलोड करना होगा. ऐसा करके आप किसी भी वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट कर पाएंगे और आपको इसके लिए पासवर्ड डालने की भी जरूरत नहीं होगी.

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा

30 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले से क्राइम ब्रांच की एक टीम भोपाल आई. 5 सदस्यीय इस टीम का नेतृत्व बांकुरा क्राइम ब्रांच के टीआई अमिताभ कुमार कर रहे थे. उन के साथ सबइंसपेक्टर कौशिक हजरत और संदीप बनर्जी के अलावा एएसआई चंद्रबाला भी थीं. इस टीम के साथ एक स्मार्ट और खूबसूरत युवक आयुष सत्यम भी था, जो काफी परेशान लग रहा था.

भोपाल स्टेशन पर उतर कर यह टीम सीधे गोविंदपुरा इलाके के सीएसपी वीरेंद्र कुमार मिश्रा के पास पहुंची और उन्हें सिलसिलेवार सारी बात बता कर अपने आने का कारण स्पष्ट किया. अमिताभ ने वीरेंद्र मिश्रा को बताया कि एक युवती आकांक्षा शर्मा जोकि उन के साथ आए आयुष सत्यम की बड़ी बहन है, रहस्यमय तरीके से गायब है.

उस के घर वालों ने 5 जनवरी को उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई है. उन लोगों ने उदयन दास नाम के एक युवक पर संदेह व्यक्त किया है. पश्चिम बंगाल की पुलिस टीम ने यह भी बताया कि आकांक्षा का मोबाइल चालू है और उस की लोकेशन भोपाल के साकेतनगर की आ रही है.

अमिताभ कुमार ने यह भी बताया कि 28 वर्षीय आकांक्षा ने जयपुर के नजदीक स्थित वनस्थली से एमएससी इलैक्ट्रौनिक्स से डिग्री ली थी. उस के पिता शिवेंद्र शर्मा यूनाइटेड बैंक औफ इंडिया में चीफ मैनेजर हैं. जून 2016 में आकांक्षा ने घर वालों को बताया था कि अमेरिका में उस की जौब लग गई है और वह अमेरिका जा रही है. पासपोर्ट बनवाने की बात कह कर वह दिल्ली चली गई थी. इस के पहले कुछ दिनों तक वह दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी भी कर चुकी थी.

आजकल के युवाओं के लिए विदेश में नौकरी करना अब कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है. ज्यादातर अभिभावकों की तरफ से उन्हें कैरियर चुनने के मामले में छूट मिली होती है. 24 जून, 2016 को आकांक्षा नौकरी के लिए कथित रूप से न्यूयार्क चली गई थी. जुलाई तक तो वह फोन पर घर वालों से बातें करती रही, लेकिन फिर व्यस्तता का बहाना बना कर उन्हें टालने लगी थी. मोबाइल फोन पर घर वालों से उस की आखिरी बार बात 20 जुलाई को हुई थी.

इस के बाद आकांक्षा ने वायस काल करना बंद कर दिया और मैसेज के जरिए चैट करने लगी थी. इस से शिवेंद्र शर्मा को तसल्ली तो थी लेकिन पूरी तरह नहीं. उन्हें बेटी को ले कर कुछकुछ आशंकाएं भी होने लगी थीं. उन की परेशानी तब बढ़ी जब मैसेज के जरिए भी बात होना बंद हो गया. इस पर उन्होंने 5 जनवरी, 2016 को बांकुरा थाने में आकांक्षा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा दी.

दरअसल, बात उतनी मामूली भी नहीं थी, जितनी दिख रही थी. शिवेंद्र और उन का बेटा अपने स्तर पर आकांक्षा को ढूंढ रहे थे. जब कहीं से कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस ने अपनी साइबर सेल के जरिए आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की. पता चला उस के फोन की लोकेशन भोपाल की आ रही है.

इस के कुछ दिन पहले शिवेंद्र शर्मा एक उम्मीद ले कर भोपाल आए थे. मोबाइल फोन पर हुई बात के आधार पर वह उदयन के घर एमआईजी 62, सेक्टर-3ए, साकेतनगर, भोपाल पहुंचे और उस से आकांक्षा के बारे में पूछताछ की. उदयन को वह पहले से जानते थे क्योंकि वह आकांक्षा का खास दोस्त था.

उदयन ने यह तो नहीं कहा कि वह आकांक्षा को नहीं जानता, लेकिन गोलमोल बातें बना कर वह शिवेंद्र शर्मा को टरकाने में जरूर कामयाब रहा था. शिवेंद्र शर्मा को उदयन की बातों पर पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन वह कर ही क्या सकते थे.

शिवेंद्र शर्मा को मायूस लौटाने के बाद उदयन का माथा ठनकने लगा था. कुछ दिन बाद वह सीधे कोलकाता स्थित शिवेंद्र के घर जा पहुंचा और 2 दिन तक वहीं रुका. आकांक्षा के बारे में शिवेंद्र और उन की पत्नी शशिकला की चिंता का भागीदार बन कर उस ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आकांक्षा चूंकि उस की अच्छी फ्रैंड है, इसलिए वह उसे ढूंढने में उन की हरसंभव मदद करेगा.

उसी दौरान शिवेंद्र ने यह महसूस किया कि उदयन असामान्य व्यवहार कर रहा है और उन के घर आने के बाद ठीक से सोया भी नहीं है. इस से उन का शक यकीन में बदल गया कि जरूर कोई गड़बड़ है. यह उन के लिए एक और संदिग्ध बात थी कि उदयन बेवजह शशिकला से जिद करता रहा था कि किचन में जा कर वह खुद चाय बनाएगा. जाहिर है सहज होने की कोशिश में उदयन कुछ ज्यादा ही असहज हो गया था. यह बात शर्मा दंपति से छिपी नहीं रह सकी थी.

खूबसूरत, बिंदास और महत्त्वाकांक्षी आकांक्षा और उदयन के इस कनेक्शन को ले कर बांकुरा और भोपाल पुलिस के बीच लंबी मंत्रणा हुई, जिस का निष्कर्ष यह निकला कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. इस गड़बड़ का पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने जो योजना तैयार की, उस का पहला चरण उदयन के बारे में खुफिया तरीके से जानकारियां इकट्ठा करने के साथसाथ उस की निगरानी करना भी था.

31 जनवरी और 1 फरवरी को पुलिस टीम ने उदयन की रैकी की. इस कवायद में पुलिस को जो जानकारियां मिलीं, वे चौंका देने वाली थीं. उदयन अड़ोसपड़ोस में किसी से भी मिलताजुलता नहीं था. अलबत्ता वह बेहद विलासी जिंदगी जी रहा था. उस के पास महंगी कारें औडी और मर्सिडीज थीं. पुलिस वालों को उस की जिंदगी और हरकतें हद से ज्यादा रहस्यमय लगीं. साकेतनगर वाला मकान, जिस में वह रहता था, उस का नीचे का हिस्सा उस ने ब्रह्मकुमारी आश्रम को किराए पर दे रखा था.

इन 2 दिनों में वह अपनी एक गर्लफ्रैंड पूजा अटवानी के साथ ‘काबिल’ और ‘रईस’ फिल्में देखने सिनेमा हौल गया था. पुलिस वालों ने दोनों फिल्में उस के पीछे वाली सीट पर बैठ कर देखी थीं, जिस की उसे भनक तक नहीं लगी थी.

2 फरवरी को पुलिस वाले जब उस के घर पहुंचे तो ताला बाहर से बंद था, लेकिन उदयन अंदर मौजूद था. ताला बंद होने के बावजूद पुलिस वालों ने दरवाजा खटखटाया तो अंदर किसी के होने की आहट मिली.

किसी अनहोनी से बचने के लिए बांकुरा पुलिस टीम ने गोविंदपुरा थाने से भी पुलिस बुला ली. उदयन अंदर है, पुलिस यह जान चुकी थी. उसे पकड़ने के लिए गोविंदपुरा थाने के एएसआई सत्येंद्र सिंह कुशवाहा छत के रास्ते से हो कर नीचे गए और उदयन का हाथ पकड़ कर उस से मुख्य दरवाजा खुलवाया.

पुलिस टीम जब अंदर दाखिल हुई तो वहां का नजारा देख चौंकी. कमरों का इंटीरियर बहुत अच्छा था, हर कमरे में एलसीडी लगे थे पर पूरा घर अस्तव्यस्त पड़ा था. ऐसा लग रहा था जैसे वहां मुद्दत से साफसफाई नहीं की गई है. पुलिस ने उदयन से आकांक्षा के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा.

पहली मंजिल पर चबूतरा बना देख पुलिस वालों का चौंकना स्वाभाविक था. कमरों में सिगरेट के टोंटे पड़े थे. साथ ही शराब की खाली बोतलें भी लुढ़की पड़ी थीं. सिगरेट के टोंटों की तादाद हजारों में थी. कुछ प्लेटों में बासी सब्जी व दाल पड़ी थी, जिन से बदबू आ रही थी.

जैसेजैसे पुलिस टीम घर को देख रही थी, वैसेवैसे रोमांच और उत्तेजना दोनों ही बढ़ती जा रही थीं. हर कमरे की दीवार पर लव नोट्स लिखे हुए थे, जिन में आकांक्षा के साथ बिताए लम्हों का जिक्र साफ दिखाई दे रहा था.

कुछ देर घर में घूमने के बाद पुलिस ने जब उदयन से दोबारा पूछा कि आकांक्षा कहां है तो उस ने बेहद सर्द आवाज में जवाब दिया, ‘‘मैं ने उस का कत्ल कर दिया है और वह इस चबूतरे के नीचे है.’’

मकसद में इतनी जल्दी और आसानी से कामयाबी मिल जाएगी, यह बात पुलिस टीम की उम्मीद से बाहर थी. एक बम सा फोड़ कर उदयन खामोश हो गया. उस के चेहरे पर कोई शिकन या घबराहट नहीं थी. आकांक्षा की हत्या कर के उदयन ने उस की लाश दफना दी थी, यह जान कर पुलिस वालों ने उस पर सवालों की झड़ी लगा दी. इस के बदले उदयन ने जो जवाब दिए, उन से सिलसिलेवार यह कहानी सामने आई.

दरअसल, आकांक्षा घर वालों से झूठ बोल कर उदयन के पास भोपाल आ गई थी. उदयन से उस की जानपहचान फेसबुक के जरिए 2007-08 में हुई थी. फेसबुक पर उदयन ने आकांक्षा को बताया था कि वह एक आईएफएस अधिकारी है. उस के पिता भेल भोपाल से रिटायर्ड अधिकारी हैं और इन दिनों वह रायपुर में खुद की फैक्ट्री चलाते हैं. मां रिटायर्ड डीएसपी हैं और अमेरिका में रह रही हैं. उदयन की रईसी, पद और पारिवारिक पृष्ठभूमि का आकांक्षा पर वाजिब असर पड़ा और दोनों की दोस्ती गहराने लगी.

इस के बाद दोनों दिल्ली और भोपाल में मिलने लगे. उदयन ने जो झूठ रौब झाड़ने की गरज से आकांक्षा से बोले थे, उन में से एक यह भी था कि वह भी अमेरिका में रहता है. इसलिए जब भी वे मिलते थे तो उदयन यही बताता था कि वह कुछ समय के लिए अमेरिका से आया है.

इश्क में अंधी आकांक्षा उस की हर बात बच्चों की तरह मान जाती थी. इस दरम्यान दोनों के बीच क्या और कैसी बातें हुईं, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था. अलबत्ता यह जरूर था कि दोनों ही एकदूसरे का पहला प्यार नहीं थे.

बहरहाल, जून में जब आकांक्षा भोपाल आई तो उदयन ने उस से बरखेड़ा स्थित बंगाली समुदाय के मंदिर कालीबाड़ी में शादी कर ली. इस के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह साकेतनगर में रहने लगे. आकांक्षा खुश थी, लेकिन उदयन की हिदायत पर अमल करते हुए वह पड़ोसियों से ज्यादा बातचीत नहीं करती थी. अलबत्ता एकदो धार्मिक आयोजनों में वह जरूर शामिल हुई थी.

यह बात गलत नहीं है कि एक झूठ को ढकने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं. उदयन ने तो आकांक्षा से शायद एक भी सच नहीं बोला था. उस ने आकांक्षा को न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई थी जो वह चाबी वाले खिलौने की तरह उस पर भरोसा किए जा रही थी. लेकिन कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते. जल्द ही आकांक्षा के सामने उदयन की असलियत उजागर होने लगी.

आकांक्षा ने कभी भी उदयन को अपने मांबाप से फोन तक पर बात करते नहीं देखा था. जब भी वह उन के बारे में पूछती थी या उदयन की गुजरी जिंदगी को कुरेदती थी तो वह चालाकी से उसे टाल जाता था. लेकिन उसे यह भी समझ में आने लगा था कि यह सब बहुत ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है. उस ने आकांक्षा से कहा कि अमेरिका में उस का मन नहीं लगता, इसलिए वह उस के साथ भोपाल में ही घर बसाना चाहता है. आकांक्षा इस के लिए भी तैयार हो गई.

दोनों का अफेयर 8 साल पुराना था लेकिन शादी और गृहस्थी की मियाद महीने भर ही रही. तब तक उदयन के काफी झूठ फरेब उजागर हो चुके थे. फिर भी आकांक्षा ने समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लिया था. वह एक भावुक स्वभाव वाली युवती थी, जो अपने प्रेमी की खातिर मांबाप से झूठ बोल कर आई थी.

इसी वजह से वह ज्यादा कलह कर के न तो खुद को जोखिम में डालना चाहती थी और न ही कोई फसाद खड़ा करना चाहती थी. बावजूद इस के दोनों में खटपट तो होने ही लगी थी. लेकिन दोनों ने इस की भनक मोहल्ले वालों को नहीं लगने दी थी.

थाने ला कर पुलिस ने जब उदयन से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उदयन और आकांक्षा के बीच 14 जुलाई, 2016 को जम कर कलह हुई थी, जिस की वजह थी उदयन के कई लड़कियों से जायजनाजायज संबंध.

यहां स्पष्ट कर दें कि दूध की धुली आकांक्षा भी नहीं थी. इस घटना के चंद दिन पहले आकांक्षा के एक पूर्व बौयफ्रैंड, जिस से वह अकसर फोन पर बात किया करती थी, ने उस के कुछ अश्लील फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए थे. इसे ले कर उदयन के तनबदन में आग लग गई थी. उसे रहरह कर लग रहा था कि आकांक्षा के अपने एक्सबौयफ्रैंड से नाजायज संबंध भी थे और वह उस की आर्थिक मदद भी करती थी.

उस रात उदयन सोया नहीं, बल्कि जाग कर आकांक्षा की हत्या की साजिश रचता रहा. जबकि आकांक्षा लड़झगड़ कर सो गई थी. 15 जुलाई की सुबह लगभग 5 बजे एकाएक उदयन के सिर पर एक अजीब सा वहशीपन सवार हो गया. उस ने गहरी नींद में सो रही आकांक्षा का मुंह तकिए से दबा दिया. आकांक्षा कुछ देर छटपटाई और फिर उस का शरीर ढीला पड़ गया. हालांकि उदयन को तसल्ली हो गई थी कि वह मर चुकी है फिर भी उस ने कुछ मिनटों तक उस के चेहरे से तकिया नहीं हटाया.

कुछ देर बाद उदयन ने आकांक्षा के चेहरे से तकिया हटाया और दरिंदों की तरह उस का गला दबाने लगा, जिस से उस के गले की हड्डी टूट गई. आकांक्षा के मरने की पूरी तरह तसल्ली करने के बाद उदयन के सामने समस्या उस की लाश को ठिकाने लगाने की थी. लाश का चेहरा उस ने एक पौलीथिन से ढंक दिया था.

आकांक्षा की लाश को वह दूसरे कमरे में ले गया और उसे एक पुराने बक्से में डाल दिया. एक घंटे सुस्ताने और कुछ सोचने के बाद उदयन बाहर निकला और साकेतनगर की ही एक दुकान से शैलेष नाम के सीमेंट विक्रेता से 14 बोरी सीमेंट खरीद लाया. शैलेष ज्यादा सवाल या शक न करे, इसलिए उस ने उसे बताया था कि नईनई शादी हुई है, पत्नी के लिए बाथटब बनवाना है.

इस के बाद उदयन ने रवि नाम के मिस्त्री को बुलाया, जिस से उस की पुरानी पहचान थी. रवि को उस ने यह कह कर कमरे में चबूतरा बनाने को कहा कि वह उस के ऊपर मंदिर बनवाएगा. चबूतरा बनते समय उदयन ने आधा काम खुद किया. थोड़ी देर के लिए रवि को इधरउधर कर के उस ने लाश वाला बक्सा चबूतरे के नीचे बने गड्ढे में डाला और ऊपर से खुद चिनाई कर दी रवि को इस की भनक भी नहीं लगी. वैसे भी एक मामूली काम के एवज में उसे खासी मजदूरी मिल रही थी, इसलिए उस ने उदयन के इस विचित्र व्यवहार पर गौर नहीं किया.

चबूतरा बना कर उदयन ने उस पर पलस्तर कर दिया और खूबसूरती बढ़ाने के लिए उस पर मार्बल भी लगवा दिया. यह उस के अंदर की ग्लानि थी, डर था या आकांक्षा के प्रति नफरत कि वह अकसर इस चबूतरे पर बैठ कर सुबहसुबह ध्यान लगाता था.

आकांक्षा की लाश निकालने वाली पुलिस टीम ने चबूतरा खोदना शुरू किया तो 7 महीने पुरानी लाश को बाहर निकालने में उसे 7 घंटे पसीना बहाना पड़ा. खुदाई के लिए बाहर से मजदूर बुलाए गए, जिन्होंने सब से पहले मार्बल तोड़ा लेकिन उन के गैंती, फावड़े जैसे मामूली औजार इस चबूतरे को नहीं खोद  पाए तो ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी. चबूतरा इतना मजबूत था कि खुदाई करने के दौरान एक ड्रिल मशीन भी टूट गई. उस की जगह दूसरी ड्रिल मशीन मंगानी पड़ी.

जैसेतैसे आकांक्षा की लाश वाला बक्सा बाहर निकाला गया. जब लाश बाहर निकली तो वहां मौजूद पुलिस वाले फिर सकते में आ गए. संदूक में लाश का अस्थिपंजर मिला, जिन्हें पोस्टमार्टम और फिर डीएनए जांच के लिए भेज दिया गया. प्रतीकात्मक तौर पर आकांक्षा का अंतिम संस्कार आयुष और उस के परिजनों ने भोपाल में ही कर दिया, जिस में शामिल होने के लिए उस के मातापिता नहीं आए.

इस जघन्य हत्याकांड की खबर देश भर में फैल गई. जिस ने भी सुना, उस ने उदयन को साइको कहा. पर उस के चेहरे पर पसरी बेफिक्री और बेशरमी वे पुलिस वाले ही देख पाए जो उसे ट्रांजिट रिमांड के लिए अदालत ले गए थे. इस के बाद रिमांड अवधि में शुरू हुई 32 वर्षीय उदयन दास और उस से जुड़ी दूसरी जानकारियां जुटाने की कवायद, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि उसे साइको किलर बेवजह नहीं कहा जा रहा.

उदयन के पड़ोसियों की नजर में वह अजीबोगरीब यानी असामान्य व्यक्ति था, जो खुद को दुनिया से छिपा कर रखना चाहता था. दरअसल, वह अपनी बुनी एक काल्पनिक दुनिया में रहता था और उसे ही सच मान बैठा था. यानी व्यवहारिकता से उस का कोई सरोकार नहीं रह गया था. सुबहसुबह जब साकेतनगर में रहने वाले संभ्रांत और धनाढ्य लोगों के घरों से नाश्ता बनने की खुशबू आती थी, तब उदयन के घर से गांजे की गंध आ रही होती थी.

 उदयन की कोई नियमित या तयशुदा दिनचर्या नहीं थी. वह अकसर शराब के नशे में धुत रहता था. पड़ोसियों के लिए वह एक रहस्य था. कभीकभार बात भी करता था तो खुद को इंटेलीजेंस ब्यूरो का अफसर बताता था. साथ ही जल्द ही अमेरिका शिफ्ट होने की बात भी करता था.

वह ऐसा शायद इसलिए करता था कि लोग उस की शाही जिंदगी के बारे में ज्यादा सिर न खपाएं. महंगी कारों का मालिक उदयन कभीकभार आटोरिक्शा में भी आताजाता दिखता था और रिक्शाचालक को 25-30 रुपए की जगह 500 रुपए थमा दिया करता था. नजदीक की दुकान से वह मैगी दूध बिस्किट जैसे आइटम लाता रहता था और दुकानदार को एकमुश्त भुगतान करता था.

पुलिस वालों ने जब उस के मांबाप के बारे में पूछा तो वह खामोश रहा. इस खामोशी में एक और तूफान छिपा हुआ था. आकांक्षा के कत्ल और लाश बरामदगी में उलझी पुलिस को इतना ही पता चला था कि उदयन के पिता का नाम बी.के. दास है और वे भोपाल के भेल के रिटायर्ड अफसर हैं और मां इंद्राणी भी सरकारी कर्मचारी रह चुकी हैं.

जब आकांक्षा की लाश बरामद हो गई और उदयन ने जुर्म कबूल लिया तो पुलिस का ध्यान उदयन से जुड़ी दूसरी बातों पर गया. काफी बवंडर मच जाने के बाद भी उस का कोई हमदर्द या दोस्त तो क्या कोई सगासंबंधी भी सामने नहीं आया, यह एक हैरानी की बात थी.

रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने जब सख्ती बरती तो उदयन बारबार बयान बदलता रहा. जब उस के दिल्ली आईआईटी से पढ़ने की बात भी झूठी निकली तो पुलिस वालों का माथा ठनका कि यह हत्यारा पागल ही नहीं बल्कि शातिर भी है. जब उस के मांबाप के फोन नंबर मांगे गए तो पहले तो वह मुकर गया कि उन के नंबर उस के पास नहीं हैं. लेकिन फिर दबाव पड़ने पर उस ने मां इंद्राणी का एक नंबर दिया जो बंद जा रहा था.

2 मकानों के किराए और मां की पेंशन से रईसी से जिंदगी गुजारने वाला उदयन कह रहा था कि उस की मां अमेरिका में है. लेकिन अब उस की बातें बयान और चेहरा साफसाफ चुगली कर रहे थे कि वह झूठ बोल रहा है. लिहाजा पुलिस ने उस के साथ सख्ती की, जो कामयाब रही.

उस की मां इंद्राणी दास डीएसपी नहीं थी, जैसा कि उस ने आकांक्षा और पड़ोसियों को बताया था. उस की मां भोपाल में सांख्यिकी विभाग में अधिकारी थीं और शिवाजीनगर के जी टाइप सरकारी क्वार्टर 122/43 में रहती थीं. पति के रायपुर शिफ्ट होने के बाद वह भी उन के साथ रायपुर चली गई थीं.

दरअसल, उदयन की कोशिश यह थी कि पुलिस वालों का ध्यान और काररवाई आकांक्षा के कत्ल में ही उलझ कर रह जाए. कह सकते हैं कि यह अहसास या उम्मीद इस चालाक कातिल को थी कि उसे आकांक्षा का हत्यारा साबित करना कानूनन उतना आसान काम नहीं है, जितना कि दिख रहा है.

गलत नहीं कहा जाता कि पुलिस की मार पत्थरों से भी मुंह खुलवा देती है, फिर उदयन साइको या शातिर ही सही था तो हाड़मांस का पुतला ही, जो 48 घंटे में ही टूट गया. इस के बाद सामने आई एक और कहानी, जिसे सुन कर पुलिस वालों के भी तिरपन कांप उठे. अब तक देश भर की दिलचस्पी इस साइको किलर में और बढ़ गई थी, जिस के कारनामों से अखबार भरे पड़े थे. जबकि न्यूज चैनल्स का तो वह हीरो बन गया था. 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद यह दूसरी घटना थी, जिस पर आम लोग तरहतरह से अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे.

4 फरवरी को उदयन ने न केवल मान लिया बल्कि बता भी दिया कि उस ने अपने मांबाप की भी हत्या की थी और उन्हें रायपुर वाले घर के लौन में दफना दिया था. यानी रिश्तों की कब्र खोदने की उस की सनक या बीमारी काफी पुरानी थी. बहरहाल, फिर से एक नई कहानी इस तरह उभर कर सामने आई.

उदयन अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. चूंकि मांबाप दोनों कामकाजी थे, इसलिए उसे कम ही वक्त दे पाते थे. बचपन से ही वह उद्दंड प्रवृत्ति का था. शुरुआती पढ़ाई के लिए उसे भोपाल के नामी सेंट जोसेफ को-एड स्कूल में दाखिला दिलाया गया था.

पढ़ाईलिखाई में उस का मन नहीं लगता था और वह अकसर अकेले रहना पसंद करता था. ये वे समस्याएं थीं जो आमतौर पर उन कामकाजी अभिभावकों के बच्चों के सामने पेश आती हैं, जिन्हें पैसों की कोई कमी नहीं होती. उदयन जब सातवीं कक्षा में था तब उस ने स्कूल में दीवार पर मारमार कर एक सहपाठी का सिर फोड़ दिया था, जिस की वजह से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था.

संभ्रांत बंगाली दास परिवार जहांजहां भी रहा, लोगों से कटा ही रहा. इधर उदयन की शैतानियां इतनी बढ़ गई थीं कि मांबाप उसे पारिवारिक समारोहों में भी नहीं ले जाते थे. वे लोग उसे काबू में रखने के लिए बातबात पर डांटतेडपटते रहते थे.

मेरे मांबाप हिटलर सरीखे थे, अपनी कहानी सुनाते हुए उस ने यह बात जोर दे कर पुलिस को बताई. उदयन के हिंसक और असामान्य व्यवहार के बावजूद उस के पिता बी.के. दास की इच्छा थी कि बेटा गणित पढ़े और इंजीनियर बने. लेकिन बेटे की इस मनोदशा को वे नहीं समझ पाए थे कि वह उन से मरनेमारने की हद तक नफरत करने लगा है.

भोपाल से रिटायर होने के बाद बी.के. दास ने रायपुर में अपनी खुद की फैक्ट्री खोल ली थी. अपने सेवाकाल के दौरान दोहरी कमाई के चलते वे खासी जायदाद बना चुके थे. यानी वे एक अच्छे निवेशक जरूर थे पर अच्छे पिता नहीं बन पाए थे. रायपुर के पौश इलाके सुंदरनगर में एनसीसी औफिस के पास भी उन्होंने पत्नी के नाम से एक शानदार मकान बनवाया था और वहीं रहने लगे थे. उदयन का दाखिला भी उन्होंने वहीं के एक स्कूल में करा दिया था. जैसेतैसे 12वीं पास करने के बाद उदयन का दाखिला एक प्राइवेट कालेज में करा दिया गया.

उदयन ने कभी अपने कैरियर और जिंदगी के बारे में नहीं सोचा. उलटे कालेज में आ कर वह नशे का भी आदी हो गया था. यहां भी उस का कोई दोस्त नहीं था और मातापिता भी किसी से संपर्क नहीं रखते थे. यानी पूरा परिवार एकाकी जीवन जीने का आदी हो चला था.

पढ़ाई के बारे में पूछने पर वह मातापिता से साफ झूठ बोल जाता था. जब पढ़ाई खत्म होने का वक्त आया तो उस ने घर में झूठ बोल दिया कि उसे डिग्री मिल गई है. डिग्री मिल गई तो कहीं नौकरी करो, पिता के यह कहने पर उदयन को लगने लगा कि पढ़ाई का झूठ अब छिपने वाला नहीं है. मांबाप नहीं मानेंगे, यह सोच कर उदयन ने एक खतरनाक फैसला ले लिया. उस ने सोच लिया कि क्यों न मांबाप दोनों को ठिकाने लगा दिया जाए, फिर कोई रोकनेटोकने नहीं वाला होगा. करोड़ों की जायदाद व दौलत भी उस की हो जाएगी.

उस ने ऐसा ही किया भी.

मांबाप के कत्ल की ठीक तारीख तो उदयन नहीं बता पाया, पर उस ने बताया कि यह कोई 5-6 साल पहले की बात है. उस दिन बारिश हो रही थी. पापा चिकन लेने बाजार गए थे और मम्मी कमरे में अलमारी में कपड़े रख रही थीं. हत्या के 2 हफ्ते पहले उस ने एक इंगलिश चैनल पर ‘वाकिंग डैथ’ नामक सीरियल देख कर मातापिता की हत्या की योजना बनाई थी. हत्या के दिन उदयन ने सुंदरनगर के ही गायत्री मैडिकल स्टोर्स से नींद की गोलियां खरीद ली थीं.

अलमारी में कपड़े सहेज कर रखती इंद्राणी को उदयन ने धक्का दे कर पलंग पर ढकेल दिया. इंद्राणी की बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं था, वह अपने हट्टेकट्टे बेटे का ज्यादा विरोध नहीं कर पाईं. कुछ ही देर में उदयन ने उन का गला घोंट दिया.

लगभग आधे घंटे बाद बी.के. दास चिकन ले कर घर आए और इंद्राणी के बारे में पूछा तो उदयन ने सहज भाव से उन्हें बताया कि मां ऊपर कपड़े रख रही हैं. इस बात से संतुष्ट हो कर उन्होंने उदयन से चाय बनाने को कहा तो वह चाय बना लाया और उन के कप में नींद की 5 गोलियां मिला दीं.

चाय पीने के बाद बी.के. दास नींद की आगोश में चले गए तो उदयन ने उन की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब समस्या लाशों को ठिकाने लगाने की थी. उन दिनों सुंदरनगर इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम जोरों पर चल रहा था. उदयन ने बगल में काम करने वाले एक मजदूर को बुलाया और लौन के दोनों कोनों में गड्ढे खुदवा लिए. देर रात उस ने अपने जन्मदाताओं की लाशें घसीट कर गड्डों में डालीं और उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया.

इस के बाद किसी ने बी.के. दास और उन की पत्नी इंद्राणी दास को नहीं देखा और न ही उन के बारे में कोई पूछने वाला था. उदयन की मौसी प्रिया चटर्जी ने जरूर एकाध बार उस के घर आ कर पूछा तो उदयन ने उन्हें टरकाऊ जवाब दे दिया.

भोपाल पुलिस उदयन को ले कर राजधानी एक्सप्रैस से 6 फरवरी को करीब 11 बजे रायपुर पहुंची और सुंदरनगर जा कर उस लौन की खुदाई शुरू करवा दी, जहां उदयन ने अपने मांबाप की कब्र बनाई थी. 3 घंटे की खुदाई के बाद लगभग 6 फुट नीचे से दोनों की खोपडि़यां निकलीं. साथ ही इंद्राणी के कपड़े, सोने की 4 चूडि़यां, चेन, एक ताबीज और बी.के. दास की पैंटशर्ट, बेल्ट और ताबीज भी कब्रों से मिले.

इस बंगले के मौजूदा मालिक हरीश पांडेय हैं, जो खुदाई होते वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने यह मकान उदयन से सुरेंद्र दुआ नाम के ब्रोकर के जरिए खरीदा था. 1800 वर्गफीट पर बने इस मकान का सौदा 30 लाख रुपए में हुआ था जोकि उन्हें सस्ता लगा था. हरीश ने जब यह मकान खरीदा था तब यहां बगीचा नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर उन्होंने काली मिट्टी डाल कर गार्डन बनवा लिया था. उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उदयन के मांबाप की कब्रें यहां बनी हुई हैं.

दोपहर ढाई बजे तक खुदाई का काम पूरा हो गया और सारे सबूत मिल गए. रायपुर पुलिस ने उदयन के खिलाफ मांबाप की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. उदयन अब चर्चा के साथसाथ शोध का भी विषय बन गया था. 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या, अपहरण व धोखाधड़ी जैसे दरजन भर मामले दर्ज किए हैं. रायपुर से उसे बांकुरा पुलिस बंगाल ले गई, फिर उसे वापस रायपुर लाया गया. जाहिर है, सब कुछ साफ होने तक उदयन रिमांड पर भोपाल, रायपुर और कोलकाता के बीच झूलता रहेगा.

7 फरवरी को जब उसे बांकुरा पुलिस ने सीजेएम अरुण कुमार नंदी की अदालत में पेश किया गया तो वहां गणतंत्र समनाधिकार नारी मुक्ति ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उस पर पत्थर बरसाए. उदयन की कहानी खत्म सी हो गई है, पर जिज्ञासाएं और सवाल अभी भी बाकी हैं, जिन में से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के मिलना शेष हैं.

अपनी मां इंद्राणी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उस ने 8 फरवरी, 2013 को इटारसी नगर पालिका में रजिस्ट्रेशन फार्म भरा था. इस में उस ने मां की मौत 3 फरवरी, 2013 को 66 वर्ष की उम्र में होना लिखा था. इंद्राणी का स्थाई पता उस ने रायपुर का ही लिखाया था और अस्थाई पता द्वारा हेलिना दास, गांधीनगर, इटारसी लिखवाया था. इस आधार पर उसे इंद्राणी का डेथ सर्टिफिकेट मिल गया था जबकि पिता बी.के. दास का मृत्यु प्रमाणपत्र उस ने इंदौर जा कर बनवाया था.

जल्द ही साबित हो गया कि उदयन अव्वल दरजे का खुराफाती और चालाक शख्स भी था जो संयुक्त खाते से अपनी मां की पेंशन निकाल रहा था. इस बारे में फेडरल बैंक के कुछ अधिकारी शक के दायरे में हैं. इंद्राणी पेंशनभोगी कर्मचारी थीं. हर पेंशनभोगी को साल में एक बार अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को देना होता है. आमतौर पर पेंशनधारी खुद बैंक जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण दे कर आते हैं.

अस्वस्थता, नि:शक्तता या किसी दूसरी वजह से बैंक जाने में असमर्थ पेंशनर्स को डाक्टरी हेल्थ सर्टिफिकेट देना पड़ता है. कैसे हर साल उदयन अपनी मां के जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को दे रहा था, यह गुत्थी अभी पूरी तरह नहीं सुलझी है. लेकिन साफ दिख रहा है कि उदयन से किसी बैंक कर्मचारी की मिलीभगत थी.

हालांकि जनवरी 2012 में उस ने मां के जीवित होने का प्रमाण पत्र डिफेंस कालोनी, दिल्ली के डाक्टर एस.के. सूरी से लिया था, जिस की जांच ये पंक्तियां लिखे जाने तक चल रही थीं. अगर शुरू में ही फेडरल बैंक कर्मचारियों ने सख्ती बरती होती तो इंद्राणी की मौत का राज वक्त रहते खुल जाता.

सब कुछ साफ होने के बाद यह भी उजागर हुआ कि उदयन मांबाप की हत्या के बाद अय्याश हो गया था. नशे के साथसाथ उसे अलगअलग लड़कियों से सैक्स करने की लत भी लग गई थी. अपनी हवस बुझाने के लिए वह कालगर्ल्स के पास भी जाता था या फिर उन्हें होटलों में बुला कर ऐश करता था. फेसबुक पर उस के सौ से भी ज्यादा एकाउंट थे, जिन की प्रोफाइल में खुद को वह बड़ा कारोबारी बता कर लड़कियों को फांसता था.

उदयन की एकदो नहीं, बल्कि 40 गर्लफ्रैंड थीं जो उस की हवस पूरी करने के काम आती थीं. इन में कई अच्छे घरों की लड़कियां भी शामिल थीं.

उदयन का प्यार दिखावा भर होता था. साल छह महीने में ही एक लड़की से उस का जी भर जाता था और उसे वह बासी लगने लगती थी. फिर किसी न किसी बहाने वह उसे छोड़ देता था. अभी तक 14 ऐसी लड़कियों की पहचान हो चुकी है, जिन के उदयन के साथ अंतरंग संबंध थे. 2 गायब युवतियों को पुलिस ढूंढ रही है, शक यह है कि कहीं उदयन ने इसी तर्ज पर और भी कत्ल तो नहीं किए.

शराब और ड्रग्स के आदी उदयन ने मांबाप का पैसा जम कर अय्याशियों में उड़ाया. ऐसा मामला पहले न मनोवैज्ञानिकों ने देखा है, न ही वकीलों ने और न ही उन पुलिस वालों ने जिन का वास्ता कई अनूठे अपराधियों से पड़ता है. सब के सब उदयन दास की हकीकत जान कर हैरान हैं.

दास दंपति ने हाड़तोड़ मेहनत कर के जो पैसा कमाया था. शायद यह सोच कर कि बुढ़ापा आराम से बेटेबहू और पोते के साथ गुजरेगा. लेकिन उसी बेटे ने उन का बेरहमी से अर्पणतर्पण कर डाला और उन की अस्थियां तक लेने से मना कर दिया.

उदयन की परवरिश का मामला एक गंभीर विषय है जिस पर काफी सोचसमझ कर बोलने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि हत्या जैसे संगीन जुर्म की वजह बचपन के एकाकीपन, किशोरावस्था की हिंसा और युवावस्था की क्रूरता को नहीं ठहराया जा सकता.    

गर्मियों की छुट्टियां और वीकेंड की एंटरटेनमेंट डोज

गर्मियों की छुट्टियां यानि बच्चों के लिए मस्ती के वे दिन जिसमें वे कुछ नया सीखना और करना चाहते हैं वरना उनकी बोर होने की शिकायत शुरू हो जाती है. बच्चों की इस शिकायत को दूर करने के लिए ज़ी अनमोल लाया है वीकेंड की एंटरटेनमेंट डोज  ‘किड्स मूवी फेस्टिवल’ के रूप में, जिसमें हर रविवार सुबह 9 बजे और शाम 4 बजे बच्चों की पसंदीदा फिल्में दिखाई जा रही हैं.

16 अप्रैल से इस मूवी फेस्टिवल की शुरुआत हिट एनिमेटेड कॉमेडी फिल्म ‘मैडागास्कर’ से हो चुकी है. अब आने वाले रविवारों में ‘श्रेक’ और ‘स्पाइडरमैन’ के अलावा बच्चों की पसंद की और भी कई फिल्में दिखाई जायेंगी.

तो तैयार हैं न आप इन गर्मियों में ज़ी अनमोल के ‘किड्स मूवी फेस्टिवल’ के साथ संडे के दिन बच्चों के साथ मस्ती और मनोरंजन से भरपूर समय गुजारने के लिए.

रैंप तक पहुंचा गया गोरैया बचाओ अभियान

गरमी के दिनों में सबसे अधिक परेशानी चिड़ियों को होती है.खासतौर पर घरों में रहने वाली गोरैया जैसी चिड़िया परेशान होती है. इनको गरमी में पीने के लिये पानी और खाने के लिये दाना तक नहीं मिलता. यही वजह है कि गोरैया तेजी से खत्म हो रही है. इसको लेकर पूरा देश चिंता में है और गोरैया बचाने के उपाय भी किये जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित अम्बेडकर नगर और कुशीनगर में तीन संस्थायें हमराह फाउडेंशन, उर्मिला द सुमन फाउेशन और ग्रो ग्रीन सेव अर्थ फाउडेंशन प्रमुख है. ग्रो ग्रीन सेव अर्थ फाउडेंशन ने ऐसे पक्षियों के लिये वाटर टू कैंपेनिग हर घर आशियाना अभियान शुरू किया गया.

हर साल 14 अप्रैल से इसकी शुरुआत होती है. इस साल यह अभियान लखनऊ के चिडियाघर से शुरू हुआ. यह अभियान जुलाई माह तक चलता है. जब बरसात होने लगती है तो चिड़ियों को पीने के लिये पानी की जरूरत खत्म हो जाती है. लखनऊ चिड़ियाघर के डायरेक्टर अनुपम गुप्ता और पीयूष श्रीवास्तव ने ग्रो ग्रीन सेव अर्थ फाउडेंशन के विमलेश निगम के साथ मिलकर पेडों में मिट्टी के पौट लगाये. जिसमें पानी रखा जायेगा और चिडिया गरमी से बचने के लिये इस पानी को पी सकेगी.

इस अभियान को और तेज करने के लिये लखनऊ विश्वविद्यालय विधि संकाय के छात्रों ने अपने फेयरवेट पार्टी में रैंप शो किया और मिट्टी के बरतन लेकर लोगों को बताया कि वह अपनी छतों या खाली जगहों पर इसमें पानी भर कर रखें. मौडलों की तरह लड़कियों ने इस अभियान को एक अलग रूप में पेश किया. 

आसानी से करें विदेश यात्रा

जब ऊबर के सीईओ बिना वीजा के भारत आ सकते हैं, तो आप भी बिना वीजा के विदेश जा सकते हैं. अपने देश के बाहर जाना किसे पसंद नहीं है? पर वीजा के चक्कर में हर बार आप का प्लान निरस्त हो जाता है. पर, भारत के आसपास कुछ ऐसे देश हैं जहां जाने के लिए वीजा की जरूरत नहीं है.

भूटान

इस देश में आप खुल कर एंजौय कर सकते हैं. आप को यहां आ कर बहुत खुशी होगी क्योंकि इस देश को हैप्पियेस्ट कंट्री के खिताब से नवाजा गया था. यहां के लोग काफी खुश और हैल्दी रहते हैं. यहां आप अगर एक बार जाएंगे तो लौटते वक्त आप के चेहरे पर मुसकान जरूर होगी.

मालदीव

यह देश शानदार रिजौर्ट्स के लिए जाना जाता है. अपने हमसफर के साथ यहां जाएं और प्यार के कुछ पल बिताएं. यहां के बीच पर घूमने का अलग ही मजा है.

मौरीशस

यहां के सागा डांस को आप अच्छे से एंजौय कर सकते हैं. इस के अलावा यहां के लैंडस्केप्स, एडवैंचरस ठिकाने और सी फूड भी आप को पसंद आएंगे. यहां आप को बहुत से हिंदीभाषी भी मिल जाएंगे.

कंबोडिया

अगर आप को इतिहास में रुचि है तो यह जगह आप को जरूर पसंद आएगी. यहां इतिहास की खूबसूरत यादों को कैमरे में कैद करना न भूलें.

जौर्डन

यह देश बिलकुल आप की सोशल साइंस की बुक जैसा है. इस में आप को हर जगह कुछ नया और अलग मिलेगा. लेकिन यहां घूमने आने से पहले मौसम का हाल जरूर जान लें.

नेपाल

यह देश खूबसूरत लैंडस्केप्स से भरा है. यहां घूमना काफी पौकेटफ्रैंडली भी है. एवरेस्ट बेस कैंप भी नेपाल में ही स्थित है, जहां पर कई लोग माउंटेनियरिंग करने आते हैं.

ट्रंप और प्रैस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को छिन्नभिन्न कर के ही जाएंगे, इस में अब शक नहीं रह गया है. 50 प्रतिशत से कहीं अधिक कौलीजिएट के वोटों से जीतने वाले और गोरे कट्टरपंथियों के लिए मसीहा बन कर उभरे डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक अमेरिका में अब 26 प्रतिशत ही रह गए हैं. उन की पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी भी, उन का अब लंबाचौड़ा साथ नहीं दे रही क्योंकि वे खब्तीनुमा राष्ट्रपति हैं, कब क्या कह दें, इस का पता नहीं.

अमेरिका का प्रैस अभी स्वतंत्र है और उसे राष्ट्रपति के भक्तों का दबाव नहीं सहना पड़ रहा है और इसीलिए वह मुखर है. वह राष्ट्रपति की अनर्गल बातों व बेसिरपैर के फैसलों को आड़ेहाथों ले रहा है.

दुनिया के अधिकांश देशों में जहां प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बहुमत में हैं, इस तरह के अधिकार नहीं रखते. पर जहां भी सरकार चलाने वालों के पास इस तरह के हक हैं, वे उन का कब दुरुपयोग कर लें, पता नहीं.

डोनाल्ड ट्रंप मुसलिम देशों के प्रति घृणा का उन्माद बनाए रख कर अपना काम सफलता से चला रहे हैं. अमेरिका में जनता मुसलिम कट्टरपंथियों से भयभीत है क्योंकि उन्हें उदार, लोकतांत्रिक मुसलमान तो दिखते ही नहीं हैं.

इसलामी देशों ने जिस तरह से आतंकवादियों को पनाह दी है, उस से दुनिया के सारे लोकतंत्र भयभीत हैं और सोच रहे हैं कि आतंकवादी लोकतांत्रिक अधिकारों का नाजायज फायदा उठा रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप व यूरोप में कट्टरपंथी पार्टियों की बढ़ती पैठ के पीछे यही कारण रह गया है.

पर इस का नुकसान न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को चुकाना पड़ रहा है, बल्कि भय के वातावरण ने एक कोहरा सा भी बना दिया है कि कल न जाने क्या हो सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप की जनलोकप्रियता चाहे कम हो गई हो, अभी तो वे राष्ट्रपति हैं ही, ऐसे में संसद के दोनों सदनों को उन का साथ देना ही पड़ेगा. अमेरिका में कट्टरवाद पनपने में कई दशक लगेंगे और फिर उस के दुर्गुण भी कई सालों तक दिखेंगे. उत्तर कोरिया, कंबोडिया, इराक, ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नाइजीरिया, युगांडा आदि इस के सुबूत हैं कि जनता की चाह से जीता डोनाल्ड ट्रंप जैसा व्यक्ति यदि राष्ट्रपति बन जाए तो देश का क्या हो सकता है. अमेरिका में लोकतंत्र को यदि गहरी चोट लगी तो उस का असर दुनियाभर में होगा.  

 

 

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