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सेफ XXX मनोरंजन के लिए ये तरीके हैं आसान

दुनियाभर में बहुत से लोग पॉर्न देखते है. और आज के समय को देखते हुए सेक्स एजुकेशन को महत्व भी दिया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक पॉप्युलर पॉर्न साइट पॉर्नहब का ने दावा किया है कि लोगों ने 2016 में कुल 4,392,486,580 घंटे साइट पर पॉर्न देखा. यह तो एक वेबसाइट का आंकड़ा है, ऐसी बहुत सी वेबसाइट्स इंटरनेट पर है जहां लोग पॉर्न देखते हैं. भले ही लोग गुपचुप यह काम करते हैं मगर यह बात पूरी तरह से गुप्त नहीं रहती.

आमतौर पर लोग इनकॉग्निटो मोड पर पॉर्न देखते हैं. मगर इससे इतना ही होता है कि पॉर्न साइट्स का लिंक ब्राउजिंग हिस्ट्री में नहीं आता. पॉर्न देखने में कई तरह के रिस्क हैं और खासकर स्मार्टफोन से पॉर्न देखने पर. विशेषज्ञों की सलाह पर अब ऐसे तरीके अपनाए जा रहे हैं जिससे पॉर्न देखने की रिस्क कम हो जाती है. अब वर्तमान समय में प्राइवेट एंटरटेनमंट को सेफ बनाने के लिए क्या कर रहे हैं लोग.

पॉर्न के लिए अलग ब्राउजर

ज्यादातर ब्राउजर आपकी ब्राउजिंग हिस्ट्री नोट करते हैं और फिर बाद में उससे संबंधित विज्ञापन दिखाने लगते हैं. जिस ब्राउजर पर आप सामान्य काम करते हैं, उसी पर पॉर्न देखेंगे तो हो सकता है कि बाद में कुछ वैसे वाले विज्ञापन दिखने लगें. इससे कभी आप दूसरों के सामने शर्मिंदा भी हो सकते हैं. क्लाउड से सिंक होने की वजह से मोबाइल की ब्राउजिंग हिस्ट्री से रिलेटेड ऐड आपको डेस्कटॉप पर भी दिख सकते हैं.

इसकी काट निकालते हुए अब लोग अक्सर पॉर्न देखने के लिए अलग ब्राउजर इस्तेमाल करने लगे हैं. इनको वे पॉर्न देखने के लिए इस्तेमाल करते हैं और दूसरे को अन्य कामों में. जैसे कि मुख्य कामों के लिए वे क्रोम इस्तेमाल करते हैं और प्राइवेट एंटरटेनमेंट के लिए iOS पर Firefox और ऐंड्रॉयड पर Krypton Web Browser इस्तेमाल करते हैं.

ऐप्स के बजाय वेबसाइट्स पर करते हैं ब्राउज

आजकल हर जरूरत के लिए ऐप उपलब्ध है और पॉर्न भी उनमें से एक है. iOS यूजर्स को तो टेंशन लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐप स्टोर को लेकर ऐपल ने बहुत कड़े नियम बनाए हैं. मगर गूगल प्ले स्टोर पर ऐसे कई ऐप्स मिल जाते हैं जो पॉर्न दिखाने का दावा करते हैं. ये ऐप्स न सिर्फ घटिया कन्टेंट देते हैं बल्कि इनमें वाइरस भी हो सकता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स सलाह की सलाह पर लोग इस तरह के संदिग्ध ऐप्स पर जाने के बजाय ब्राउजर के जरिए सुरक्षित वेबसाइट्स पर जा रहे हैं.

ऐंटी-वाइरस ऐप के बिना नहीं लेते रिस्क

सिक्यॉरिटी ऐप्स वैसे तो स्मार्टफोन्स वगैरह को थोड़ा स्लो कर देते हैं मगर पॉर्न देखने वालों के लिए जरूरी है कि वे अपने फोन में इन्हें रखें. क्योंकि यह नहीं पता होता कि कौन सी पॉर्न साइट बैकग्राउंड पर वाइरस की चपेट में ले सकती है. एक तरफ कोई पॉर्न देख रहा होगा और पीछे से कोई वाइरस उसकी पर्सनल जानकारी चुरा रहा होगा. पॉर्न देखने वाले इस स्थिति से बचने में ऐंटी वाइरस ऐप्स की मदद लेते हैं.

वीपीएन से करते हैं सिक्यॉर ब्राउजिंग

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क(VPN) बहुत से लोग पॉर्न देखने के लिए VPN इस्तेमाल करते हैं क्योंकि अगर कोई वेबसाइट यूजर का आईपी ट्रैक करने की कोशिश करेगी तो उसे सही अड्रेस नहीं मिलेगा. वीपीएन की मदद से किसी और नेटवर्क लोकेशन के जरिए सुरक्षित सर्फिंग की जा सकती है. ऐंड्रॉयड और iOS दोनों के ऐप स्टोर्स पर बहुत से VPN ऐप्स उपलब्ध हैं. पॉर्न देखने वालों के लिए ये ऐप्स इसलिए भी फायदेमंदर हैं क्योंकि वे उन वेबसाइट्स को भी ऐक्सेस कर सकते हैं, जो उनकी देश में ब्लॉक हैं.

विकल्प बनकर उभरा Reddit

रेडिट पॉर्न लवर्स के बीच भी लोकप्रिय है. इसमें अडल्ट कम्यूनिटी में कुछ ऐसे थ्रेड्स होते हैं जहां पर लोग पर लोग लेटेस्ट पॉर्न देखने जाते हैं. इसमें हर तरह की कैटिगरी का पॉर्न देखा जा सकता है. लोग इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे अपनी रेग्युलर आईडी यूज करने के बजाय गुप्त रहकर भी प्राइवेट एंटरटेनमंट हासिल कर लेते हैं.

फोन पर डाउनलोड करना खतरनाक

अगर कोई पॉर्न देखने वाला ऐसी जगह रहता है जहां इंटरनेट कवरेज कमजोर है तो अक्सर वह कोशिश करता है कि फास्ट इंटरनेट मिलने पर विभिन्न वेबसाइट्स से फ्री कन्टेंट डाउनलोड कर ले. मगर ऐसा करना कभी-कभी मुश्किल में भी फंसा सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि कन्टेंट को डाउनलोड करना खतरनाक है क्योंकि विडियो फाइल के नाम पर खतरनाक मैलवेयर भी इंस्टॉल हो सकता है. यह मैलवेयर पासवर्ड्स या अन्य संवेदनशील जानकारियों को चुरा सकता है. इसलिए अब पॉर्न लवर्स कन्टेंट को डाउनलोड करने के बजाय स्ट्रीमिंग करने को प्राथमिकता दे रहे हैं.

पॉप्युलर साइट्स पर भरोसा

लोग अब पर्नसल एंटरटेनमेंट के लिए पॉप्युलर वेबसाइट्स को ही ब्राउज करने लगे हैं. ये वेबसाइट्स अपने ग्राहकों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हैं और HTML5 टेक्नॉलजी इस्तेमाल करती हैं. इससे फोन पर मैलवेयर या कूकीज नहीं जाते. अन्य वेबसाइट्स पर खतरा इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि वे हैकर्स का बिछाया हुआ जाल हो सकती हैं.

पढ़कर भी किया जा रहा है मनोरंजन

एक दौर था जब पॉर्न नहीं होता था तो लोग उत्तेजक साहित्य पढ़ा करते थे. अब भी बहुत सारे नॉवल्स ऐसे आते हैं जो रोमांस से भरपूर होते हैं. इसलिए डिजिटल टाइम से कुछ वक्त तक दूर होकर लोग इस तरह का कन्टेंट पढ़ना पसंद कर रहे हैं. इसीलिए पिछले कुछ वक्त से इस तरह का कन्टेंट देने वाली वेबसाइट्स तेजी से ग्रो कर रही हैं. इसका फायदा यह भी है कि यूजर्स भीड़ में भी मजेदार कन्टेंट पढ़कर अपना मनोरंजन कर सकते हैं और कोई शक भी नहीं कर सकता.

मेंथा किसानों के हक की आवाज उठाएंगी प्रियंका रावत

मेंथा यानि पिपरमिंट की खेती बड़े पैमाने पर किसान कर रहे हैं. यह कैश क्राप है. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से शुरू हुई मेंथा की खेती अब आसपास के किसानों को बड़ी तेजी से पसंद आती जा रही है. जैसे जैसे किसान मेंथा की तरफ बढ़ रहे हैं मेंथा की कीमत भी घटती जा रही है. मेंथा की खेती में पानी और मेहनत की बड़ी जरूरत होती है. पिछली कुछ फसलों से मेंथा की कीमत अपनी जगह स्थिर हो गई है. ऐसे में अब मेंथा के किसान भी परेशान है. बाराबंकी की सांसद प्रियंका सिंह रावत अब इन किसानों के मुद्दों को पूरे तथ्यों के साथ संसद में उठाने की तैयारी में है. जिससे मेंथा किसानों को उनकी मेहनत का लाभ मिल सके.

मेंथा किसानों की मांग है कि मेंथा को भी खेती की परिधि में शामिल करके उसका समर्थन मूल्य तय हो. गेहूं और धान जैसी फसलों की तरह इसकी भी सरकारी खरीद हो. इससे मेंथा की खेती फिर से लाभकारी हो सकेगी. बाराबंकी में पहले अफीम की खेती होती थी. पिछले एक दशक से अब यहां के किसान अफीम की खेती छोड़कर मेंथा, आलू, केला और टमाटर की खेती करने लगे हैं. किसानों को सबसे अधिक लाभ मेंथा की खेती से हुआ. एक को देखकर दूसरे किसान ने भी मेंथा की खेती को अपना जरीया बना लिया.

एक समय मेंथा की कीमत 3 हजार रूपये लीटर तक पहुंच गई. मेंथा की कीमत का अंदाजा इस बात से लग सकता है कि इसकी लूट और चोरी की घटनायें होने लगी. परेशानी का विषय यह है कि मेंथा की कीमत घटकर 8 सौ से 9 सौ रुपये लीटर तक आकर पहुंच गई है. जिससे किसान को मुनाफा नहीं हो पा रहा है. बाराबंकी सांसद को किसानों का यह दर्द समझ आया. वह अपने क्षेत्र के किसानों की परेशानियों, उनकी जरूरतों को लेकर एक रोडमैप तैयार कर रही हैं. जिसके बाद वह प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार के दूसरे मंत्रियों से बात कर ठोस कदम उठाने की मांग करेंगी.

वह कहती है कि हमारा प्रयास होगा कि हम खेती को लाभ का जरीया बना सके. जिससे प्रधानमंत्री का वह सपना पूरा हो सके कि किसान की आय दोगुनी हो जाये. किसानों की फसल की सही कीमत मिले. इसके लिये फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगे और किसान उसका लाभ लें. खेती के साथ ही साथ बागवानी को भी बढ़ावा देने का काम हो, जिससे किसानों का और भला हो सकता है. सरकार के साथ ही साथ किसानों को भी जागरूक करने का काम करेंगे.      

चित नरेंद्र मोदी की, पट भाजपा की

वे लोग वाकई अति दूरदर्शी और ज्ञानी हैं जो यह कह रहे हैं कि लाल कृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन सहित 13 लोगों पर साजिश का मुकदमा चलाने का फैसला दिया है. इनमे एक और अहम नाम साध्वी उमा भारती का भी है, जिन्होंने उम्मीद के मुताबिक बड़ी मासूमियत से कहा कि जो था खुल्लम खुल्ला था, कोई साजिश नहीं थी. अव्वल तो उमा का सार्वजनिक रूप से दिया गया यह बयान ही यह जताने काफी है कि सचमुच उस दिन अयोध्या में कोई साजिश नहीं हुई थी, अब यह तो अदालत की दरियादिली या मजबूरी है कि वह किसी फैसले पर पहुंचने के लिए चार्ज शीट, गवाह और सबूतों वाला नाटक खेले और इस ऐतिहासिक मुकदमे का अंत करे.

आमतौर पर भाजपाई जब खुश होते हैं तो आतिशबाजी जरूर चलाते हैं, जो इस फैसले पर नहीं चलाई गईं तो आम लोगों को लगा कि ऐसा होना भाजपा अफोर्ड नहीं कर सकती जबकि हकीकत यह है कि केसरिया मनों में लड्डू फूट रहे हैं.  2019 की इन्हीं गर्मियों तक फैसला आ पाया तो चित नरेंद्र मोदी की और पट भाजपा की होगी. अगर मुलजिम साहेबान बरी हुये और न हुये तो भी एक और मंदिर निर्माण की पटकथा तो लिखाना शुरू हो ही गई है.

बकौल विनय कटियार और उमा भारती जान देना पड़े या फांसी हो मंदिर तो वहीं बनाएंगे. देश का माहौल धार्मिक कट्टरवाद की इतनी गिरफ्त में शायद 90 के दशक में भी नहीं था, जब भज भज मंडली राम के नाम पर घर घर से चंदा इकट्ठा करते मंदिर निर्माण के लिए इसी आस्था के की दुहाई देते प्राणों की आहुति देने आमादा थी. अब तस्वीर यह है कि मुसलमानों का टेंटुआ हिंदुवादियों के पंजे में है, अजान से किसी गवैये की नींद खुलती है तो वह झट से ट्वीट कर देता है और देखते ही देखते हल्ला मच जाता है. मोदी, योगी को मुस्लिम महिलाओं पर दया आ रही है, क्योंकि उन्हे झट से तलाक मिल जाता है, हिन्दू दंपत्तियों की तरह सालों साल अदालत की चौखट पर नाक रगड़ते एक उम्र जाया नहीं करना पड़ती.

इस पर भी मिसाल द्रौपदी के चीर हरण की दी जाती है सीता की अग्नि परीक्षा की नहीं. सार ये कि अपने दामन के दाग नहीं देखना है बस जैसे भी हो 2 साल इसी तरह गुजार देना है. इसके बाद आएगा अदालती फैसला जो भाजपा का अगला मुद्दा हो जाएगा कि बस अब बहुत हो गया, बात आस्था और करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की है, इसलिए सारे झंझटे और मुद्दे ( अगर कोई बचें तो ) डालो डस्टबिन में और चलो अयोध्या नहीं तो विश्व गुरु बनने का सपना मिट्टी में मिल जाएगा.

लोग तो धर्म के अंधे हमेशा से ही हैं, लिहाजा भगवा ध्वज लेकर कूच करते रेडी मेड पुण्य कमाने से चूकेंगे ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. भाजपा ने कभी नहीं  कहा कि आडवाणी या जोशी राष्ट्रपति होंगे, न ही कभी ऐसा कहेगी, ये तो बलि के बकरे बन गए हैं जो 2 साल तक रोज अपनी ईद मनते देखने विवश हैं. कर्म फल के सिद्धांतो की बात करें तो अपने किए की सजा भुगतेंगे. यह राजनीति में ही हो सकता है कि प्यादे वजीर और वजीर प्यादे बन जाएं, इस बिसात के दोनों तरफ से चालें चलने वाला आरएसएस तय करेगा कि राष्ट्रपति किसे बनाया जाये.

मुमकिन है इस दफा मंदिर निर्माण के लिए दलितों का सहयोग बाकायदा घोषित तौर पर लिया जाये और उन्हे मौजूदा लोकतान्त्रिक वर्ण व्यवस्था में हनुमान और जामवंत बनाकर चतुर्थ श्रेणी का हिन्दू घोषित कर दिया जाये. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लग यह रहा है कि अब मोदी सरकार के पांच साल का काम काज मुद्दा नहीं होगा बल्कि कोई रथ यात्रा निकाली जा सकती है, कोई भी मुहिम मंदिर के नाम पर  छेड़ी जा सकती है, जिससे नए नए आडवाणी, जोशी, उमा, विनय, कल्याण और ऋतंभरा पैदा किए जा सकें इससे लोगों को अपनी परेशानियां और दुख भुलाने में सहूलियत रहेगी. एक बार मंदिर बन भर पाये, फिर तो सारे कष्ट राम जी हर ही लेंगे, जिन्होंने अपने भक्तों को इस फैसले की शक्ल में  संजीवनी दिला दी है.        

शर्त अभी अधूरी है

अव्वल तो हिंदुओं में शोक स्वरूप ही सर मुड़ाया जाता है, पर इन दिनों भीषण गर्मी के कहर से भी बचने लोग सर पर उस्तरा चलवा रहे हैं. गायक सोनू निगम ने दस लाख रुपये के लालच में अपने सर के रेशम से बाल मुंबई में मीडिया के सामने कुतरवाकर अपने ताजे ताजे टकले पर हाथ फेरते कहा कि अब उस मौलवी को दस लाख रुपये इस नाई को देना चाहिए जिसने उनके सर की फसल काटी. हुआ यूं था कि फुर्सत में बैठे सोनू को इस चिंता में नींद नहीं आ रही थी कि गाने बजाने का कारोबार अब पहले सा नहीं चल रहा. सोचते सोचते सुबह हो गई और इसी वक्त घर के नजदीक की मस्जिद से अजान की आवाज ब-जरिए लाउड स्पीकर आई तो उन्हें बुद्ध सरीखा ज्ञान प्राप्त हो गया कि हो न हो यही वह वजह है जिसके चलते लोग उनके गाने नहीं सुन रहे, सो उन्होंने ट्वीट कर अपने दुख के दोने में से व्यथा का रायता बघरा दिया कि लाउड स्पीकर पर अजान बंद होना चाहिए.

सोनू निगम जब  जागे तो मुकम्मल हल्ला उम्मीद के मुताबिक मच चुका था, जिससे कई बातों के साथ एक बात यह भी साबित हुई कि न्यूटन ने गलत नहीं कहा था कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. अधिकांश प्रतिक्रियाएं बड़ी अपेक्षित थीं कि सोनू को मुसलमानों के धार्मिक मामलों मे टांग नहीं फसाना चाहिए. हिंदुओं के शोर शराबे से हैरान परेशान लोगों को भी अपना रायता फैलाने का मौका मिल गया कि मुसलमान ही क्यों हिंदुओं के धार्मिक जलसों पर रोक लगनी चाहिए. इधर मोदी सरकार की निगाहों में चढ़ने की सोनू मंशा पूरी हो गई थी, लिहाजा बाकी शोर शराबे का कोई मतलब नहीं रह गया था.

रायता बंगाल तरफ भी बहा, तो वहां के एक मुस्लिम संगठन वेस्ट बंगाल माइनर्टी यूनाइटेड काउंसिल के उपाध्यक्ष सैयद अतेफ अली अल कादरी ने एक मिनी फतवा जारी कर दिया कि जो भी सोनू निगम का सर गंजा कर, उसके गले में फटे पुराने जूते चप्पलों की माला पहनाकर उसे देश भर में घुमाएगा उसे इनाम में 10 लाख रुपये दिये जाएंगे. प्रस्ताव चूंकि आकर्षक था और सरकार की तरफ से कोई प्रोत्साहन या राहत सोनू को नहीं मिले थे, इसलिए वे घबरा गए कि कहीं ऐसा न हो कि 10 लाख के लालच में कोई सिरफिरा उनकी फजीहत कर दे. इसलिए उन्होंने शर्त का पूर्वार्ध ठीक वैसे ही पूरा कर दिया जैसे कोई शर्मीला नया नवेला दामाद ससुराल मे पहली होली पर सालियों के सामने आत्म समर्पण कर देता है कि लो लगा लो जितना रंग लगाना है.

अब फटे जूते चप्पलों की माला वे पहनें तो ही शर्त पूरी हुई मानी जाएगी, इसलिए सोनू चाहें तो कादरी से पांच लाख तो मांग ही सकते हैं, वजह अब कोई भी यह शर्त पूरी नहीं कर सकता. माला कोई पहना भी दे तो इनाम देने वाला कहेगा कि सर तुमने कहां मूडा वह तो पहले से ही खुद सोनू ने सरेआम मुड़वा लिया था. डर और चालाकी के चलते सोनू निगम बच तो गए पर बेवजह का एक बवाल जरूर खड़ा कर गए. ऐसे कट्टरवादी उकसाने वाले मामले और बढ़ने का अंदेशा है इसलिए अदालतों को खुद इन पर संज्ञान लेते हुये कारवाई करनी चाहिए, जिससे अमन चैन कायम रहे, साथ ही सख्ती से सोनू निगम से इत्तफाक रखते हुये सभी धर्मो के स्थलों से लाउड स्पीकर भी हटवाने की पहल करनी चाहिए जिनके कानफाड़ू शोर से लोग चैन से रह नहीं पाते और छात्र पढ़ नहीं पाते.       

नारीत्व के कई पहलुओं पर केंद्रित ‘सोनाटा’

'36 चौरंगी लेन' और 'मिस्टर एंड मिसेज अय्यर' जैसी लीक से हटकर फिल्मों का निर्माण करने वाली हिन्दी एवं बांगला सिनेमा की सफल अभिनेत्रियों में शामिल अपर्णा सेन की अंग्रेजी फिल्म ‘सोनाटा’ आज रिलीज हो रही है. फिल्म महेश एलकुंचवर के मराठी नाटक पर आधारित है. यह फिल्म जीवन के मध्य पड़ाव का सामना कर रही तीन कामकाजी और अविवाहित महिलाओं की मनोदशा पर आधारित है.

फिल्म में अपर्णा के साथ शबाना आजमी और लिलिट दुबे मुख्य भूमिका में हैं. फिल्म दोस्ती के अलावा नारीत्व के भी कई पहलुओं पर केंद्रित है. फिल्म में तीनों दोस्तों की पसंद, रहन सहन का तरीका और सोच एक दूसरे से बिल्कुल अलग है. फिल्म में जहां अभिनेत्री शबाना आजमी मुखर और बिंदास महिला के किदार में नजर आएंगी वहीं अपर्णा सेन एक पारंपरिक महिला और लिलिट दुबे एक एब्युसिव रिलेशनशिप में इन्वोल्व दिखाई देंगी जो अपने दोस्तों से अपने जख्म छुपाने की कोशिश करती है.

फिल्म में शबाना आजमी आपको गाना गाते हुए भी दिखेंगी. सोनाटा के ट्रेलर का अंत तीनों की बातचीत से होता है, जिसमें वे कह रही हैं, "हम बड़ी अजीब हैं, कोई कमिटमेंट नहीं, कोई लक्ष्य नहीं, कोई अपनी सोच नहीं. हम तो फेमिनिस्ट भी नहीं हैं." उम्मीद है नारीपरक विषयों में रूचि रखने वाले लोगों को यह फिल्म पसंद आएगी.

 

प्रॉपर्टी खरीदने से पहले जरूर समझें इन बातों को

घर खरीदना हर किसी का सपना होता है. अगर आप कोई प्रॉपर्टी खरीदने का मन बना रहे हैं तो प्रॉपर्टी खरीदने से जुड़ी कुछ बातें जरूर जान लें. इन बातों को समझने के बाद आप कभी भी प्रॉपर्टी खरीदते वक्त धोखा नहीं खाएंगे.

जमीन की रजिस्ट्री जरूर मांगे

अगर आप घर खरीद रहे हैं तो बिल्डर और डेवलपर से सबसे पहले रजिस्ट्री मांगनी चाहिए. ऐसा कर आप यह जान पाएंगे कि जिस जमीन पर आपका मकान या फ्लैट बना है उसपर कोई कानूनी विवाद तो नहीं चल रहा है. बैंक सिर्फ उन्हीं जमीनों पर लोन देता है जिसपर किसी भी तरह का कोई विवाद नहीं है.

प्रोजेक्ट के अप्रूव्ड लेआउट मैप को देखें

किसी बिल्डर को किसी भी प्रोजेक्ट में कितने टावर, फ्लैट और मंजिल बनाने की मंजूरी मिली है यह बात अथॉरिटी की ओर से अप्रूव्ड लेआउट मैप को देखकर साफ पता चल जाती है. इसमें किसी फ्लैट या प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली कुल जगह का स्पष्ट ब्यौरा होता है. ये सारी बातें कंपनी के ब्रॉशर में साफ नहीं हो पाती हैं.

लोकेशन और वास्तविक फ्लैट पर विजिट करें

ब्रॉशर में दिए गए फ्लैट के एरिया पर भरोसा नहीं करना चाहिए. जिस जगह प्रोजेक्ट बन रहा है वहां खुद जाकर विजिट करना जरूरी होता है. ऐसा करने से आप अपने फ्लैट में इस्तेमाल होने वाले रॉ मैटेरियल (कच्चे माल) को देख पाएंगे. साथ ही आपको आस-पास की लोकेशन के बारे में भी जानकारी मिलेगी. जैसे घर से अस्पताल, स्कूल, बाजार, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड जैसी जगहों की दूरी कितनी है इत्यादि. केवल ब्रॉशर के भरोसे रहने से आप गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं.

बिल्ट-अप एरिया, सुपर एरिया और कार्पेट एरिया को समझें

खरीदार कई बार फ्लैट में लिखे सुपर एरिया को अपने फ्लैट का साइज मानकर फ्लैट की बुकिंग कर देते हैं. जबकि असल फ्लैट इससे काफी कम होता है. ऐसे में ग्राहकों को बिल्ट-अप, सुपर और कार्पेट एरिया के सही मायने समझ लेने चाहिए. कार्पेट एरिया उस एरिया को कहते है जहां आप कार्पेट बिछा सकें. इस एरिया में फ्लैट की दीवारें शामिल नहीं होती हैं. यह फ्लैट के अंदर का खाली स्थान होता है.

बिल्ट-अप एरिया में फ्लैट की दीवारों को लेकर मापा जाता है, यानि इसमें कार्पेट एरिया के साथ-साथ पिलर, दीवारें और बालकनी जैसी जगह शामिल होती हैं. वहीं सुपर एरिया उस एरिया को कहते हैं, जिसमें उस प्रोजेक्ट के अंदर कॉमन यूज की चीजें को शामिल किया जाता है जैसे जेनरेटर रूम, पार्क, जिम, स्वीमिंग पूल, लॉबी, टेनिस कोर्ट आदि. आमतौर पर सभी बिल्डर्स फ्लैट को सुपर एरिया के आधार पर बेचते हैं.

अपने पजेशन टाइम का रखें विशेष ध्यान

अधिकांश बिल्डर्स और डेवलपर प्रोजेक्ट के पजेशन टाइम में 6 महीने का ग्रेस पीरियड भी जोड़ देते हैं. ऐसे में किसी भी ग्राहक का पजेशन टाइम दो साल की जगह 30 महीने हो जाता है. पजेशन डेट से 6 महीने देरी से पजेशन देने के बाद डेवलपर्स इसको लेट प्रोजेक्ट की श्रेणी में नहीं डालते हैं. ऐसे में ग्राहक बिल्डर या डेवलपर्स से लेट पजेशन की पेनल्टी भी चार्ज नहीं कर पाते हैं.

पेनल्टी क्लॉज को जरूर पढ़ें

तय समय तक प्रोजेक्ट पर पजेशन न दे पाने पर डेवलपर्स ग्राहकों को पेनल्टी देने का प्रावधान रखते हैं. अधिकांश डेवलपर्स पजेशन तक ग्राहकों की ओर से भुगतान की जाने वाली किसी एक भी किश्त में देरी होने पर पनेल्टी न देने की शर्त रखते हैं. पूरे 2 साल के दौरान ग्राहकों के पास कई बार डिमांड ऑर्डर आते हैं. अगर ग्राहक किसी एक भी पेमेंट डेट से चूक जाता है तो डेवलपर्स पेनल्टी देने में तरह-तरह के बहाने बनाते हैं.

पेमेंट स्कीम को समझें

डेवलपर्स बड़े-बड़े ब्रैंड एंबेसडर और ईजी पेमेंट प्लान की मदद से ग्राहकों को आकर्षित करने कोशिश करते हैं. इनमें 10 फीसदी बुकिंग अमाउंट बाकी पजेशन पर, 12/24/42 महीनों के लिए ब्याज छूट, 20:80 स्कीम (बिना बैंक फंडिंग के), 20:80’ / ‘10:90’ / ‘8:92’ / ‘5:95’ जैसी स्कींम्स काफी लोकप्रिय हैं.

इन सभी स्कीमों की अपनी-अपनी महत्ता होती है. इससे फ्लैट के बुकिंग रेट और प्रोजेक्ट की कीमत पर भी काफी असर पड़ता है. इसलिए ग्राहकों को प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इन सभी बारीकियों को सही से समझकर अपने लिए उचित पेमेंट स्कीम का चयन करना चाहिए.

हिडन चार्जेज पर दे विशेष ध्यान

बुकिंग करते समय कई तरह के चार्जेज का जिक्र बुकिंग एजेंट नहीं करता है. हिडन चार्जेज में पार्किंग चार्ज, सोसाइटी चार्ज, पावर बैक-अप जैसे चार्जेज को शामिल किया जाता है. इन सभी चार्जेज के बारे में बुकिंग के समय ही डेवलपर से सवाल कर समझ लें.

डेवलपर की पिछली हिस्ट्री के बारे में करें पता

जिस डेवलपर या बिल्डर के साथ आप अपना फ्लैट बुक करने जा रहे हैं उसकी ओर से पहले दिए जा चुके प्रोजेक्ट्स को जरुर देखें. इससे आपको कंस्ट्रक्शन क्वॉलिटी, समय से पजेशन देना, बिल्डर का प्रदर्शन जैसी चीजों को समझने में मदद मिल जाती है.

सुनिश्चित करें कि एक्सक्लेशन फ्री हों

कई बार डेवलपर प्रोजेक्ट पर एक्सक्लेशन चार्जेज लगा देते हैं. जैसे सीमेंट, सरिया आदि कच्चे माल के दाम बढ़ने पर डेवलपर ग्राहकों के लिए फ्लैट की कीमत को बढ़ा देते हैं. ऐसे में ग्राहकों को बुकिंग के समय इस बात को स्पष्ट कर लेना चाहिए कि फ्लैट पर किसी भी तरह के एक्सक्लेशन चार्जेज नहीं हैं.

मातृ : जघन्य अपराध पर स्तरहीन फिल्म

भारत में बढ़ रहे बलात्कार की घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘‘मातृ’’ एक बोल्ड फिल्म होनी चाहिए थी, मगर यह फिल्म पूर्णरूपेण बदले की कहानी बन कर रह गयी है. लड़की व उसकी मां के साथ सामूहिक बलात्कार और लड़की की हत्या होती है, मगर इस जघन्य अपराध करने वालों के प्रति घृणा व पीड़िता के प्रति हमदर्दी भी नहीं उपजती.

फिल्म ‘‘मातृ’’ की कहानी दिल्ली के एक स्कूल शिक्षक विद्या चैहाण (रवीना टंडन) की जिंदगी में आने वाले उतार चढ़ाव की कहानी है. विद्या अपने स्कूल के समारोह से अपनी बेटी टिया (अलीशा खान) के साथ वापस अपने घर आ रही होती है, पर घर पहुंचने की जल्दी में वह रास्ता बदलती है और एक फार्म हाउस पहुंच जाती है.

यह फार्म हाउस मुख्यमंत्री गोवर्धन मलिक (शैलेंद्र गोयल) का है. जहां मां व बेटी दोनों का सामूहिक बलात्कार मुख्यमंत्री के बेटे अपूर्व मलिक (मधुर मित्तल), अपूर्व के मामा व उसके पांच दोस्त करते हैं. फिर इन दोनों को बीच सड़क पर फेंक दिया जाता है. इस हादसे में विद्या जीवित बच जाती है. इस घटना व टिया की मौत के लिए विद्या के पति रवि (रूशद राणा) विद्या को गुनाहगार मानकर तलाक दे देते हैं. विद्या अपनी सहेली रितु (दिव्या जगदाले) के यहां रहने लगती है.

इस सामूहिक बलात्कार से मुख्यमंत्री के बेटे के जुड़े होने के कारण पुलिस इंस्पेक्टर जयंत श्रॉफ (अनराग अरोड़ा) मामले को रफादफा कर उन्हें चुप रह जाने की सलाह देता है. पर विद्या अपनी बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ना शुरू करती है. मगर कानून भी उसके साथ निष्पक्ष नहीं रहता है. उस वक्त विद्या के अंदर का गुस्सा बहुत कुछ कह जाता है, मगर जैसे ही फिल्म आगे बढ़ती है, सब कुछ बेमानी हो जाता है.

इसलिए वह खुद ही अपराधियों का खात्मा करना शुरू करती है. हर हत्या के बाद पुलिस इंस्पेक्टर जयंत श्रॉफ को अहसास होता है कि यह काम विद्या ने किया है, मगर सबूत नहीं है. हर हत्या एक दुर्घटना नजर आती है. होली के अवसर पर मुख्यमंत्री व उनका बेटे को उन्हीं के घर में मार कर आग लगा देती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो एक बलात्कार पीड़िता मां के किरदार को निभाते हुए रवीना टंडन ने कुछ दृश्यों में बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है. पर पूरी फिल्म के स्तर पर देखें, तो रवीना टंडन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हैं. इसके लिए पटकथा लेखक को दोष दिया जा सकता है.

बलात्कारी व हत्यारे खलनायक की भूमिका में मधुर मित्तल ने अपनी तरफ से अच्छा काम करने की कोशिश की है, पर उनका चरित्र भी ठीक से उभरा नहीं है. विद्या चैहाण की दोस्त रितु के किरदार में विद्या जगदाले तथा पुलिस इंस्पेक्टर जयंत श्रॉफ के किरदार में अनुराग अरोड़ा ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

फिल्म कहानी व पटकथा के स्तर पर काफी कमजोर है. कुछ भावनात्मक दृश्यों को नजरंदाज कर दें, तो फिल्म ‘‘मातृ’’ महज कई फिल्मों के कथानक का दोहराव मात्र है. निर्देशक अश्तर सय्यद की निर्देशकीय कमजोरी के चलते फिल्म अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है. यह फिल्म एक जघन्य अपराध के उपर नाटकीय ढंग से लिखा गया एक लेख नजर आती है.

विद्या जिस तरह से बदले की भावना के साथ एक के बाद एक हत्याएं करना शुरू करती है, उससे विद्या के प्रति उपजा हमदर्दी का भाव खत्म होने के साथ ही बलात्कार की वजह से पैदा होने वाली घृणा व दर्द का अहसास भी खत्म हो जाता है. बलात्कार जैसा जघन्य अपराध महत्वहीन हो जाता है. पूरी फिल्म बदले की भावना के तहत हत्याओं वाली फिल्म बनकर रह जाती है.

क्या बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए हर मां के पास यही एकमात्र रास्ता होता है? क्या यही सभ्य समाज है? विद्या का हिंसात्मक स्वरुप दर्शक को परेशान करता है. पूरी फिल्म में जिस तरह से हत्याएं होती है, उससे सवाल उठता है कि वास्तव में बुरा क्या है? यह हत्याएं या बलात्कार? यानी कि बलात्कार जैसा जघन्य अपराध बेमानी हो जाता है. फिल्म खत्म होने पर दर्शकों के दिमाग में बलात्कार व उसकी पीड़ा की बजाय यह सवाल परेशान करता है कि क्या इस तरह हत्याएं करना जायज है?

विद्या और उनकी बेटी टिया का खलनायक के घर पहुंचना और फिर दिल्ली के निर्भया कांड की तरह सड़क पर कार से फेंका जाना, सब कुछ अंदर से गुस्सा दिलाता है, पर फिल्म में बहुत अस्वाभाविक तरीके से दिखाया गया है. फिल्म का कथानक ही अविश्वसनीय व अवास्तविक नजर आता है.

सच तो यह है कि पटकथा के साथ हर चरित्र का चित्रण भी अति घटिया है. फिल्म का एक भी पात्र ठीक से नहीं उभरता. विद्या के पति अपनी बेटी के साथ हुए बलात्कार व हत्या के बाद विद्या को तलाक देने की बात करते हैं, इससे पूरा मुद्दा ही महत्वहीन हो जाता है और फिल्म वहीं चारो खाने चित हो जाती है. पटकथा लेखक ने विद्या के पति के किरदार को बहुत गलत ढंग से लिखा है. कोई भी पिता इस तरह से अपनी बेटी को लेकर बात नहीं करेगा.

यदि लेखक व निर्देशक ने जानबूझकर पिता के किरदार को इस तरह से लिखा व चित्रित किया है, क्योंकि वह पुरुष है, तो यह उसकी मूर्खता ही कही जाएगी. भारत में माता पिता के रिश्ते बहुत ही संवेदनशील होते हैं. हर पिता के लिए अपनी बेटी या बेटे दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं और यदि उसकी बेटी के साथ बलात्कार या बेटी हत्या हो जाए, तो पिता विचलित या परेशान नहीं होगा, यह सोच ही गलत है.

इतना ही नही फिल्म के दो दृष्यों के बीच कोई तारतम्य नजर नहीं आता. इससे फिल्म के पटकथा लेखक व निर्देशक की कमजोरी उभर कर आती है. फिल्म की एडीटिंग भी बहुत घटिया है. इसे रोमांचक फिल्म के रूप में प्रचारित किया गया, मगर फिल्म के एक भी दृष्य से रोमांच पैदा नहीं होता है. फिल्म में इमोशन का भी घोर अभाव है. फिल्म में प्रभावशाली संवादो का घोर अभाव है.

जहां तक गीत संगीत का सवाल है, तो फिल्म में बेवजह एक गाना रखा गया है और वह भी बेवजह दो बार फिल्म में आता है. यह गाना फिल्म को नष्ट करने का ही काम करता है.

एक घंटे 52 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मातृ’’ के निर्माता अंजुम रिजवी, निर्देशक अश्तर सय्यद, लेखक मिचेल पेलिको तथा कलाकार हैं रवीना टंडन, अलीशा खान, मधुर मित्तल, दिव्या जगदाले, अनुराग अरोड़ा, रूशद राणा, सलीम खान, शैलेंद्र गोयल.

ये ऑफिसर है दिन में सेना का जवान और रात में पोर्नस्टार

देश की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले सेना के जवानों का सबसे बड़ा मकसद यही होता है कि वो बाहरी मुल्क के दुश्मनों से अपने देश की हर हाल में रक्षा कर सके. सेना के जवानों के लिए देश और उसकी जनता के दिल में काफी सम्मान होता है क्योंकि वो अपना घर-परिवार छोड़कर बस अपने देश की सेवा में डटे रहते हैं.

लेकिन आज हम बात करेंगे अमेरिका के एक ऐसे नेवी ऑफिसर की, जो दिन में जवान और रात में पोर्न स्टार बन जाता है, दिन में तन-मन से देश की सेवा करता है लेकिन जैसे ही रात होती है वैसे ही वो तन और मन से बन जाता है एक पोर्नस्टार.

दरअसल हाल ही में अंग्रेजी अखबार सैन डिएगो के हवाल से यह खबर आई है कि अमेरिकी नेवी ऑफिसर स्मिट जे वूम दिन में तो नेवी में काम करते हैं लेकिन रात होते ही वो पोर्न स्टार बन जाते हैं. इस अखबार ने स्मिट जे वूम की निजी जिंदगी को लेकर और भी कई चौंकानेवाले खुलासे किए हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो स्मिट अब तक कुल 29 पोर्न फिल्मों में काम कर चुके हैं. इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि इस काम में उनकी पत्नी जेविल जेड भी उनका साथ देती हैं. आपको बता दें कि 42 साल के स्मिट जे वूम पिछले 23 सालों से सेना में हैं और इस वक्त वो कोरनैडो में तैनात हैं. स्मिट ने कई मेडल्स भी हांसिल किए हैं और सेना भर्ती कैंपेन में भी अपनी सेवा दे चुके हैं.

हालांकि इस कथित मामले के उजागर होने के बाद अब इस बात की जांच की जा रही हैं कि नेवी के इस ऑफिसर ने अपनी पोर्न इंडस्ट्री के इस प्रोफेशन की जानकारी आर्मी को दी है या नहीं.

बताया जाता है कि स्मिट की पत्नी ने साल 2001 में पहली बार पोर्न फिल्म में काम किया था. लेकिन शादी करने के लिए उसने साल 2003 में इस काम को छोड़ दिया. साल 2005 में दोनों पति पत्नी ने मिलकर एक रियल इस्टेट का बिजनेस शुरू किया लेकिन बिजनेस ठप्प हो गया और भारी कर्ज के चलते दोनों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया.

बिजनेस में हुए नुकसान और कर्ज की भरपाई करने के लिए दोनों ने पोर्न इंडस्ट्री में काम करना शुरू कर दिया. स्मिट की पत्नी की मानें तो पोर्न इंडस्ट्री से जुड़ने के बाद उनके घर की माली हालत में सुधार हुआ है और यहां से हुई आमदनी से ही दोनों ने अपने सारे कर्जे भी उतार दिए हैं.

बहरहाल अखबार के हवाले से इस मामले के उजागर होने के बाद आर्मी की ओर से इसकी तफ्तीश की जा रही है और जांच के बाद ही यह तय होगा कि इस ऑफिसर पर कोई एक्शन लिया जाएगा या नहीं.

मातृत्व को पराकाष्ठा पर ले जाती फिल्म ‘मातृ-द मदर’

मां आखिर मां ही होती है, उसकी जगह शायद कोई नहीं ले सकता. और अगर उसे अपनी बेटी को एक हादसे की वजह से खोना पड़े, तो शायद वह किसी भी हद तक जा सकती है. ऐसी ही संवेदनशील विषय पर आधारित फिल्म मातृ-द मदर एक ‘रेप रिवेंज थ्रिलर’ फिल्म है. जिसे रेप की राजधानी दिल्ली से प्रेरित होकर बनाया गया है. इसके निर्देशक अश्तर सईद है.

फिल्म में मुख्य भूमिका अभिनेत्री रवीना टंडन ने निभाया है. पूरी फिल्म में रवीना शुरू से लेकर अंत तक छाई रहीं. उनके साथ एक हादसा हो जाने के बाद किस तरह वह अपने आप को सम्हालती है और कैसे पति का सहयोग न होने के बावजूद बदला लेती है, उसे बहुत ही बारीकी से दर्शाया है. यह फिल्म पुरुष मानसिकता की ओर भी इशारा करती है, जो हर समस्या का जिम्मेदार महिला को ही मानता है. पूरी फिल्म में रवीना के इस मानसिक आघात को जिसमें गुस्सा, दुःख, दर्द, आंसू आदि सभी भाव को बहुत ही सरीके से दिखया गया है.

रवीना की अब तक की सभी फिल्मों में शायद ये एक अलग और खास फिल्म है. जिसे सजीव करने के लिए उन्होंने खूब मेहनत की है. फिल्म के सभी पात्र किसी न किसी रूप में कहानी को सपोर्ट करते हुए दिखे. खासकर उनकी सहेली की भूमिका निभा रही दिव्या जगदाले ने खूब अभिनय किया है.

कहानी

दिल्ली में रहने वाली विद्या चौहान (रवीना टंडन) एक स्कूल टीचर है, जिसकी एक टीनएजर बेटी टिया (अलीशा खान) है. स्कूल में वार्षिक उत्सव होता है, जिसका उद्घाटन मुख्य मंत्री गोवर्धन मलिक (शैलेन्द्र गोयल) करता है और टिया को बेहतरीन प्रदर्शन के लिए अवॉर्ड देता है. जहां उसका बेटा अपनी दोस्तों के साथ दर्शकों के बीच में होता है. स्कूल के वार्षिक उत्सव खत्म होने के बाद आनंदित टिया और उसकी  मां गाड़ी से घर लौट रहे होते हैं, वे सड़क जाम में फंस कर रास्ता बदल लेते हैं. ऐसे में मुख्य मंत्री का बेटा अपूर्वा मलिक (मधुर मित्तल) अपने दोस्तों के साथ उनका पीछा करता है.

गलत, अनजान रास्ता और इन लड़कों को देखकर विद्या घबरा जाती है और एक दुर्घटना की शिकार हो जाती है. ऐसे में वे लड़के उन्हें उठाकर ले जाते हैं और गैंग रेप होता है. जिसमें टिया का मर्डर भी हो जाता है. सभी लड़के उन्हें लेकर मरा हुआ समझ कर सुनसान जगह पर फेंक देते हैं, लेकिन विद्या बच जाती है. उसका पति रवि चौहान (रुशद राणा) उसे ही दोषी मान उसे छोड़ देता है.

विद्या अपनी सहेली का सहारा लेती है. उसकी सहेली और विद्या कानून का सहारा लेकर अपराधी को सजा देने की कोशिश करते है, पर मुख्या मंत्री का बेटा होने की वजह से वह भी पीछे हट जाता है. ऐसे में विद्या खुद बदला ऐसे लेती है कि पुलिस जानकर भी उसे पकड़ नहीं पाती. इस तरह कहानी काफी उतार चढ़ाव के बाद अंजाम तक पहुंचती है.

शुरुआत में फिल्म की रफ्तार कुछ धीमी थी, बाद में अच्छी लगी. विलेन के किरदार में अपूर्वा मलिक ने अच्छा अभिनय किया है. फिल्मो में गाने कुछ खास नहीं हैं, क्योंकि उसकी कोई जरुरत भी नहीं थी. निर्देशक फिल्म की स्क्रिप्ट को थोड़ी और ‘क्रिस्पी’ बनाते तो शायद ये और अच्छी फिल्म बन सकती थी. बहरहाल रवीना को इस ‘स्ट्रॉन्ग’ भूमिका में देखा जा सकता है. इसे ‘थ्री स्टार’ दिया जा सकता है.

फिल्म से पहले लॉन्च की गई बाहुबली एनिमेशन सीरीज

पिछले दिनों खबर आई थी की डायरेक्टर एस.एस राजामौली की फिल्म बाहुबली से प्रेरित एक एनिमेशन सीरीज लॉन्च की जानी है. वह एनिमेशन सीरीज लॉन्च हो गई है. यह सीरीज “बाहुबली: द लॉस्ट लीजेंड्स” नाम से आई है. इस वीडियो को इंटरनेट वीडियो ऑन डिमांड सर्विस अमेजन प्राइम वीडियो ने लॉन्च किया. इस कंपनी ने प्राइम वीडियो पर दो नए टाइटल और रिलीज किए.

“बाहुबली: द लॉस्ट लीजेंड्स” को राजामौली ने ग्राफिक इंडिया और अर्का मीडिया वर्क्स के साथ मिलकर बानाया है. दर्शक अब इस सीरीज का पहला एपिसोड देख सकते हैं. इसके दूसरे एपिसोड 19 मई के बाद रिलीज किए जाएंगे. इस सीरीज पर कहा गया है कि, फिल्म में केवल बर्फ के पहाड़ की चोटी दिखाने की कोशिश की है. बाहुबली एक ऐसी फिल्म थी जिसे एक या दो फिल्मों में समेटा नहीं जा सकता. इसके बारे में बताने के लिए कई और भी बातें और कहानियां थी इसी के चलते एनिमेशन सीरीज को बनाया है, एनिमेशन यह बताने का दूसरा तरीका है.

इस एनिमेटेड सीरीज में फिल्म के किरदारों से जुड़ी दूसरी कहानियों के बारे में बात की गई है. बाहुबली, भल्लालदेव, कटप्पा, शिवगामी के अलावा इसमें कई दूसरे किरदारों के बारे में भी बताया गया है.

बता दें कि बाहुबली-2 28 अप्रैल को रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में प्रभास ट्रिपल रोल में नजर आने वाले हैं. प्रभास इस फिल्म में अमरेंद्र बाहुबली, महेंद्र बाहुबली और विक्रमदेव के किरदार में नजर आएंगे. फिल्म को लेकर फैन्स में गजब का क्रेज है. इसे देखते हुए फिल्म रिलीज से पहले 7 अप्रैल को बाहुबली का पहला हिस्सा रिलीज किया गया था. बाहुबली फिल्म तीन घंटे से ज्यादा लंबी है.

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