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जैनरिक दवा जनता से दूर क्यों

हमारे देश में आबादी के मुकाबले डाक्टरों की कमी है, जरूरत के अनुसार अस्पताल नहीं हैं और दवाएं बेहद महंगी हैं. ऐसे में यदि मध्यवर्गीय या गरीब परिवार में एक व्यक्ति बीमार पड़ता है तो उस का इलाज कराने में पूरे परिवार की कमर टूट जाती है. इस की एक बड़ी वजह है डाक्टरों का फार्मा कंपनियों व टैस्ट लैब्स के बीच कायम गठजोड़, जो मरीज को ठीक करने के बजाय उस की आर्थिक तबाही में लगा रहता है.

डाक्टर मरीजों के इलाज में काम आने वाली सस्ती जैनरिक दवाएं लिख सकते हैं, पर कमीशन और फार्मा कंपनियों से मिलने वाले महंगे उपहारों व मोटे कमीशन के लालच में वे उन्हीं ब्रैंडों की दवाएं लिखते हैं. अकसर ऐसी ब्रैंडेड दवा सामान्य जैनरिक दवाओं की तुलना में कई गुना महंगी होती है.

पिछले दिनों  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या की नब्ज पर उंगली रखते हुए कहा था कि उन की सरकार एक लीगल फ्रेमवर्क के तहत यह सुनिश्चित करेगी कि डाक्टर सिर्फ जैनरिक दवाएं ही लिखें जो सस्ती होने के कारण मरीजों पर बोझ नहीं बनती.

एक आकलन है कि ब्रैंडेड और जैनरिक दवाओं की कीमत में 90 प्रतिशत तक का अंतर होता है. जैनरिक दवाएं ब्रैंडेड दवाओं के मुकाबले कितनी सस्ती हो सकती हैं, इस का एक अंदाजा ब्लड कैंसर की दवा ग्लिवेक नामक ब्रैंडेड दवा की एक महीने की खुराक से लगाया जा सकता है.

ब्रैंडेड दवा की एक महीने की डोज की कीमत तकरीबन 1.14 लाख रुपए की होती है, जबकि इस की जैनरिक दवा का महीनेभर का खर्च करीब 11 हजार रुपए ही पड़ता है. ऐसा ही अंतर बहुत सी ब्रैंडेड और जैनरिक दवाओं की कीमतों में है. आम लोग इस मामले में ज्यादा जानकारी नहीं रखते. लिहाजा डाक्टर्स व फार्मा कंपनियां महंगी ब्रैंडेड दवा का ही विकल्प सब के आगे रखती हैं ताकि मरीज किसी ब्रैंडेड दवा लेने को मजबूर हो.

ब्रैंडेड बनाम जैनरिक

आमतौर पर सभी एलोपैथिक दवाएं एक खास तरह का कैमिकल सौल्ट होती हैं. लंबे अरसे तक शोध और जीवोंइंसानों पर परीक्षण के बाद उन्हें अलगअलग बीमारियों के लिए पृथक कर के बनाया जाता है. दवाओं के शोध और निर्माण की सामान्य प्रक्रिया यह है कि कोई फार्मा कंपनी वर्षों के शोध के बाद किसी बीमारी की दवा का विकास करती है तो वह उस का पेटेंट कराती है.

पेटेंट कराने का अर्थ यह है कि कोई अन्य कंपनी उस की नकल नहीं कर सकती और न ही उसे बेच सकती है. ऐसी पेटेंटेड दवाएं ब्रैंडेड दवाएं कहलाती हैं. चूंकि इन दवाओं के शोध, निर्माण व क्लीनिकल ट्रायल पर काफी पैसा और समय खर्र्च होता है, इसलिए कंपनियां लागत और मुनाफा वसूलने के लिए ब्रैंडेड दवाओं को ऊंची कीमत पर बेचती हैं. लेकिन एक अवधि के बाद ब्रैंडेड दवाओं का पेटेंट खत्म हो जाता है.

हमारे देश में पेटेंट की यह अवधि 20 साल है. इस दौरान पेटेंटधारी कंपनी ही इन्हें बना कर बेच सकती है. 20 साल के बाद यह सौल्ट पेटेंट-फ्री हो जाता है. तब इसे जैनरिक कहा जाने लगता है. ऐसा होने पर दूसरी कंपनियां जरूरत के हिसाब से उन्हीं के समान नुस्खे (फौर्मुलेशन) वाली दवाएं बनाने लगती हैं. चूंकि ऐसी दवाओं पर नए सिरे से शोध और क्लीनिकल ट्रायल करने की जरूरत नहीं होती, इसलिए उन की लागत बढ़ने का कोई दबाव नहीं होता. उन्हें जो रजिस्टर्ड कंपनी चाहे, बना सकती है और बाजार में बेच सकती है. ऐसी दवाएं जैनरिक दवाएं कहलाती हैं और इन की कीमतें भी काफी कम होती हैं.

डाक्टरों का परहेज

मरीजों से बीमारी का इलाज कराते समय तमाम परहेज बरतने की सलाह देने वाले डाक्टर खुद भी एक चीज से परहेज करते हैं, यह है जैनरिक दवाएं लिखने का परहेज. इलाज के लिए दिए वाले परचे पर वे ज्यादातर ब्रैंडेड दवाएं लिखते हैं, न कि जैनरिक. उन का आग्रह यह भी रहता है कि रोगी के मर्ज से संबंधित जांचें (मैडिकल लैब टैस्ट) उन की सुझाई पैथलैब में कराईर् जाएं और जो दवाएं उन्होंने परचे में लिखी हैं, वे या तो

उन्हीं के क्लीनिक या अस्पताल से जुड़े मैडिकल स्टोर से खरीदी जाएं या फिर उन के आसपास के ऐसे मैडिकल स्टोर से जहां से उन्हें नियमित कमीशन मिलता है.

आज डाक्टर परामर्श की ऊंची फीस भी लेते हैं. शहरों में तो यह फीस अकसर 500 रुपए से ले कर 1,500 रुपए तक होती है. इस कीमत में वे चाहें तो अपने पास से जैनरिक दवाएं मुफ्त दे सकते हैं, पर कमीशन के लालच में वे मरीजों को ब्रैंडेड दवाएं लेने को मजबूर करते हैं. अपनी बीमारी और जान की जरा सी भी फिक्र करने वाला मरीज इस मामले में डाक्टरों से कोई बहस नहीं कर पाता है.

यही नहीं, अगर कोई डाक्टर जैनरिक दवा लिख दे, तो मैडिकल स्टोर वाले वे दवाएं मरीजों को इसलिए नहीं देते क्योंकि उन पर उन्हें ज्यादा कमीशन नहीं मिलता. ऐसे में मरीज मजबूर हो कर महंगी दवा ही खरीदता है. पर ऐसा करना यानी डाक्टरों को कानूनन जैनरिक दवाएं लिखने को बाध्य करना और मैडिकल स्टोर्स पर जैनरिक दवा बेचना कानूनन जरूरी किया जा सकता था, पर अफसोस कि पिछली सरकारें यह काम नहीं कर पाईं.

यह सवाल अकसर उठाया जाता रहा है कि जब दूसरे देशों में डाक्टरों के लिए जैनरिक दवाएं लिखना कानूनन अनिवार्य है तो भारत में क्यों नहीं? हाल के अरसे में वर्ष 2013 में मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ने भी डाक्टरों से जैनरिक दवाएं लिखने को कहा था और यह ताकीद की थी कि ब्रैंडेड दवा सिर्फ उसी केस

में लिखी जानी चाहिए जब उस का जैनरिक विकल्प मौजूद न हो. इस बारे में संसद की एक स्थायी स्टैंडिंग कमेटी शांता कुमार की अध्यक्षता में बनाई गई थी, जिस ने सरकार से कहा था कि वह डाक्टरों के लिए केवल जैनरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करे और इस के लिए जल्द से जल्द कानून बनाए. उस का यह भी कहना था कि देश में पहले से स्थापित दवा कंपनियों में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जानी चाहिए.

आम आदमी की सेहत पर भारी

असल में, वाणिज्य विभाग की इस स्थायी संसदीय कमेटी ने दवा निर्माण (फार्मास्युटिकल) सैक्टर में एफडीआई के मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट पेश की थी, जिस में उस ने कहा था कि डाक्टरों के एक बड़े तबके का अलगअलग वजहों से जैनरिक दवाएं लिखने से परहेज करना आम आदमी की सेहत पर भारी पड़ रहा है.

कमेटी की रिपोर्ट में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई थी कि हाल के वर्षों में बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों ने एक के बाद कई नामी भारतीय दवा कंपनियों का अधिग्रहण किया है, जिस का असर दवाओं की महंगाई के रूप में दिखाई पड़ रहा है. इसलिए जरूरी है कि देश में पहले से स्थापित फार्मा कंपनियों में विदेशी निवेश पर पूरी तरह से पाबंदी लगाई जानी चाहिए.

इस बारे में कमेटी के चेयरमैन शांता कुमार ने आंकड़े पेश करते हुए बताया था कि हाल के वर्षों में देश के फार्मा सैक्टर में 67 विदेशी निवेश हुए. इन में से ज्यादातर मामलों में भारतीय दवा कंपनियों को बाजार रेट से 8-9 गुना ज्यादा दाम पर खरीदा गया था. शांता कुमार ने तब कहा था कि देश के मरीजों को मिल रही सस्ती दवाओं के खिलाफ यह एक बहुत बड़ी साजिश है. इसी वजह से देश की जनता को दवाओं की भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

रिपोर्ट में इस तथ्य की तरफ भी इशारा किया गया था कि विदेशी दवा कंपनियों की भारत में नई दवाएं खोजने में कोई दिलचस्पी नहीं होती. वे यहां महज ऐसी दवाएं बनाना चाहती हैं, जिन से उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिल सके. इस का सुबूत यह है कि जिस फार्मा सैक्टर में पिछले कुछ अरसे में 18,678 करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हुआ, वहां रिसर्च के नाम पर महज 524 करोड़ रुपए रखे गए.

सवाल जैनरिक दवाओं की क्वालिटी का

जैनरिक दवाओं के मामले में भारत की गिनती दुनिया के बेहतरीन देशों में होती है. फिलहाल, हमारा देश दुनिया का तीसरा सब से बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है. यह हर साल 42 हजार करोड़ रुपए की जैनरिक दवाएं एक्सपोर्ट करता है.

जैनरिक दवाओं के मामले में भारत की प्रतिष्ठा इस से साबित होती है कि यूनिसेफ अपनी जरूरत की 50 फीसदी दवाएं भारत से खरीदता है. भारत कई अफ्रीकी देशों में सस्ती जैनरिक दवाइयां भेजता आ रहा है. इस से स्पष्ट है कि भारत में आम जनता के लिए सस्ती जैनरिक दवाइयां आसानी से बनाई व बेची जा सकती हैं.

चूंकि भारतीय दवा कानून के तहत प्रिस्क्राइब की जाने वाली दवाओं के विज्ञापन की इजाजत नहीं है, इसलिए फार्मा कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए मैडिकल रिप्रेजैंटेटिव का सहारा

लेती हैं, जो डाक्टरों, मैडिकल स्टोर चलाने वालों को कमीशन व गिफ्ट का लालच दे कर बेहद महंगी ब्रैंडेड और ब्रैंडेड जैनरिक दवाओं की बिक्री करवाते हैं.

ऐसा कहने वाले विशेषज्ञों और डाक्टरों की कमी नहीं है जिन की राय में ब्रैंडेड दवाओं की गुणवत्ता भी अच्छी होती है. पर वे भी इस से इनकार नहीं करते हैं कि अगर कीमत को देखें, तो जैनरिक दवाओं से कराया जाने वाला इलाज किसी से कमतर नहीं होता. हालांकि ब्रैंडेड और जैनरिक की बहस में वे इतना अवश्य कहते हैं कि कहीं इस से फोकस दवा की गुणवत्ता के बजाय उस के मूल्य पर ही न चला जाए.

मुनाफे का द्वंद्व और जनऔषधि स्टोर

अगर सवाल मुनाफे का हो, तो कैमिस्ट यानी दवा बेचने वाला दुकानदार वही दवा बेचेगा, जिस में उसे ज्यादा मुनाफा हो. ऐसे में लोगों को जैनरिक दवाएं दिलाने का एक उपाय यह है कि सरकारी अस्पताल ये दवाएं अपने मरीजों को मुफ्त में दें, जैसे कि राजस्थान के हर सरकारी अस्पताल से मुफ्त दवाइयां दी जाती हैं. करीब 400-500 करोड़ रुपए की योजना के तहत मरीजों को दी जाने वाली ये सारी दवाएं जैनरिक होती हैं.

यही फार्मूला अगर देश के हर राज्य में लागू कर दिया जाए, तो ब्रैंडेड बनाम जैनरिक का आधे से ज्यादा मर्ज यों ही खत्म हो जाए. हालांकि जब तक ऐसा नहीं होता, डाक्टरों को इस के लिए बाध्य करना जरूरी है कि वे मरीजों के परचे पर दवाओं के ब्रैंड के बजाय उन के जैनरिक नाम ही लिखें.                        

दुष्चक्र दवा की महंगाई का

सरकार को भी इस का अंदाजा है कि कैंसर, दिल के रोगों, किडनी और लिवर आदि से जुड़ी जीवनरक्षक दवाओं को कैमिस्ट व डिस्ट्रीब्यूटर उन की लागत की 11 गुना ज्यादा कीमत पर बेचते हैं. लेकिन अफसोस कि उन पर नियंत्रण की कोई कोशिश सिरे नहीं चढ़ पाती है.

फार्मा कंपनियां क्रोसिन, डिस्प्रिन जैसी आम जैनरिक दवाओं की कीमतें नहीं बढ़ा पाती हैं क्योंकि इन में भारी प्रतिस्पर्धा है, लेकिन कैंसर, हार्ट, एचआईवी और किडनी, लिवर आदि बीमारियों के इलाज में काम आने वाली दवाओं को मनमानी कीमतों पर बेचा जाता है.

भारत सरकार के 2013 के आदेश के मुताबिक, 10 मिलीग्राम के डोक्सोरुबिसिन हाइड्रोक्लोराइड इंजैक्शन की कीमत 217 रुपए होनी चाहिए, लेकिन बिहार में एक फार्मा कंपनी का यह इंजैक्शन 9 हजार रुपए पर बिकता पाया गया. इसी तरह 50 मिलीग्राम का कैंसररोधी इंजैक्शन आईडौक्स 4,313 रुपए पर बेचा जा रहा था, जबकि इस की अधिकतम कीमत 1,085 रुपए होनी चाहिए.

जीवनरक्षक दवाएं 2 कारणों से महंगी हैं. एक तो उन्हें बनाने वाली फार्मा कंपनियां ही उन्हें महंगा बेचती हैं क्योंकि उन्हें उन पर पेटेंट हासिल है और वे एकाधिकार वाली स्थिति में हैं. दूसरे, कैमिस्ट और डिस्टीब्यूटर्स का गठजोड़ है जो अस्पतालों में डाक्टरों से मिलीभगत कर के उन्हीं कंपनियों की दवाओं को परचे पर लिखवाता है जो आम मैडिकल स्टोरों पर बेची जाती हैं.

 

हर कंपनी की दवा एक ही कीमत पर मिले

डा. के के अग्रवाल, अध्यक्ष, इंडियन मैडिकल एसोसिएशन

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल से यह पूछा गया कि जैनरिक दवा आम आदमी से दूर क्यों है? तो उन का कहना था, ‘‘इस समय इंडियन मैडिकल एसोसिएशन की पौलिसी है कि दवाइयां वे लिखनी चाहिए जो सस्ती और क्वालिटी की हों. आज जन औषधि की जैनरिक दवाइयां सरकार ले कर आ रही है, डाक्टर्स को उन्हें लिखना चाहिए.

‘‘सरकार को एक ही दवा की अलगअलग नाम व कीमत की अनुमति नहीं देनी चाहिए. हर कंपनी की दवा एक ही कीमत पर हो. आज के समय में कानून यह कहता है कि आप एक दवा को 3 नामों से अलगअलग कीमत पर बेच सकते हो.

‘‘पौलिसी यह होनी चाहिए कि सरकार की तरफ से एक कीमत तय हो. यदि कोई कंपनी एक दवा ला रही है तो उस में प्राइस वैरिएशन न हो. जैनरिक हो या ब्रैंडेड हो, उस से फर्क नहीं पड़ता.

‘‘एक तरफ सरकार कहती है कि जैनरिक दवा सस्ती है और ब्रैंडेड दवा महंगी है जबकि दोनों दवा एकजैसी हैं तो यह किया किस ने? यह सरकार ने ही किया है. आप अलगअलग कीमतों पर बेचने की अनुमति ही क्यों देते हैं. आप कीमत एक कर दीजिए, सारा विवाद ही खत्म हो जाएगा और लोग लुटने से बच जाएंगे.’’

फार्मा कंपनियों की मनमानी

फार्मा कंपनियां किस प्रकार दवाओं को महंगा कर रही हैं, इस की एक बड़ी मिसाल कुछ ही समय पहले एड्स, कैंसर व अन्य जीवाणुजनित बीमारियों की रोकथाम में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाली दवा डाराप्रिम के रूप में मिल चुकी है. साल 2015 में महीनेभर की इस दवा की खुराक की कीमत साढ़े 13 डौलर से रातोंरात 5 हजार प्रतिशत बढ़ा कर 750 डौलर कर दी गई. इस के लिए डाराप्रिम को बनाने व पूरी दुनिया में बेचने का अधिकार हासिल करने वाली अमेरिकी कंपनी ट्यूरिंग फार्मास्युटिकल ने इस के महंगे पेटेंट का हवाला दिया था. लेकिन जब पूरी दुनिया से इस पर दवा की कीमत घटाने का दबाव पड़ा, तो इस के अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि कीमत में 10 फीसदी तक की कमी कर दी जाएगी.

डाराप्रिम की तरह ही टीबी के उपचार की अहम दवा साइक्लोसेराइन की 30 गोलियों की कीमत भी चंद दिनों के भीतर 500 डौलर से बढ़ा कर 10,800 डौलर कर दी गई और लोग उसे खरीदने को मजबूर हुए.

दवाओं की कीमत बढ़ाने के लिए फार्मा कंपनियां 2 तर्क देती हैं. एक तो यह कि उन्हें चूंकि प्रमुख दवाओं के पेटेंट ऊंची कीमत के बदले में मिलते हैं, जिस की भरपाई वे इसी तरह कीमतें बढ़ा कर कर सकती हैं. दूसरे, नई दवाओं के विकास पर उन्हें आरऐंडडी यानी शोध व विकास पर भारी पूंजी लगानी लड़ती है. लेकिन ये सिर्फ बाहरी कारण हैं. सचाई यह है कि दवा कंपनियां इस के पीछे की असली वजहों को छिपाती हैं, जैसे यदि मामले में अमेरिका का उदाहरण लिया जाए, तो वहां की फार्मा कंपनियां अमेरिकी राजनीतिक सिस्टम में भारी पैसा इसी मकसद से झोंकती हैं कि उन की इच्छित पार्टी की सरकार के सत्ता में आने पर उन्हें मनमानी कीमतों पर दवाएं बेचने की छूट मिल जाएगी. कोई संदेह नहीं है कि दवा कंपनियां सारे खर्च की भरपाई आखिरकार आम मरीजों से ही करती हैं और उन्हें ऐसा करने की छूट सरकारें ही देती हैं.

उल्लेखनीय है कि फिलहाल दवा बेचने वाले थोक व खुदरा कैमिस्ट दवाओं की बिक्री पर तगड़ा मुनाफा कमाते हैं. मोटेतौर पर देश में 8 लाख खुदरा दवा विक्रेता हैं, जिन का सालाना कारोबार 80 हजार करोड़ रुपयों का है. फिलहाल जिन दवाओं की कीमत पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, उन की बिक्री पर उन की कमाई का न्यूनतम मार्जिन 30 फीसदी और इस से भी ज्यादा होता है, जिस में से 20 फीसदी मुनाफा तो अकेले रिटेलर का होता है. मूल्य निमंत्रण वाली दवाओं पर भी यह मुनाफा न्यूनतम 24 फीसदी होता है, जिस में 16 फीसदी मुनाफा रिटेलर का और 8 फीसदी मुनाफा होलसैलर कैमिस्ट का होता है.        

कुछ ऐसा होगा आईपीएल-10 के प्लेऑफ का रोमांच

इंडियन प्रीमियर लीग का 10वां सीजन अपने अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है. और इसके साथ ही आईपीएल का रोमांच अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है. लीग मैच खत्म हो गए हैं और प्लेऑफ की तस्वीर, तारीख और टीम साफ हो गई है. 21 मई को हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में आईपीएल का फाइनल खेला जाएगा. इसके अलावा टॉप चार टीमों को क्वालिफायर और एलिमिनेटर से गुजरना होगा.

इन टॉप 4 टीमों में मुंबई इंडियंस, राइजिंग पुणे सुपरजायंट, सनराइजर्स हैदराबाद और कोलकाता नाइट राइडर्स शामिल है. 14 मैचों में से 10 मैच में जीत हासिल करते हुए 20 अंकों के साथ मुंबई इंडियंस पहले पायदान पर है. तो 14 मैचों में 9 जीत और 18 अंकों के साथ राइजिंग पुणे सुपरजायंट दूसरे स्थान पर है. वहीं 17 अंको के साथ हैदराबाद तीसरे और 16 अंकों के साथ कोलकाता नाइटराइडर्स चौथे स्थान पर है.

पहला क्वालिफायर 16 मई को मुबंई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. मुंबई और पुणे के बीच होने वाले इस मैच में जीतन वाली टीम सीधे फाइनल में पहुंचेगी और हारने वाली टीम को एक और मौका मिलेगा.

17 मई को हैदराबाद और कोलकाता बेंगलूरू के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में भिड़ेंगी. हारने वाली टीम का इस टूर्नामेंट से पत्ता साफ हो जाएगा और जीतने वाली टीम को क्वालिफायर-1 में हारने वाली टीम के साथ दूसरे क्वालिफायर में खेलना होगा. दूसरा क्वालिफायर भी एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में ही खेला जाएगा. यह मैच 19 मई को होगा. अब देखना दिलचस्प होगा कि रोहित शर्मा, स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर या गौतम गंभीर में से कौन आईपीएल की ट्रॉफी जीतता है.

कुछ ऐसा होगा आईपीएल के प्लेऑफ का रोमांच..

16 मई : राइजिंग पुणे सुपरजाएंट-मुंबई इंडियंस, मुंबई

17 मई : कोलकाता नाइटराइडर्स-सनराइजर्स हैदराबाद, बेंगलुरु

19 मई : दूसरा क्वालिफायर, बेंगलुरु

21 मई : फाइनल, हैदराबाद

अपनी ही दुश्मन: भाग 3

अब उस के पुराने आशिकों ने आना कम कर दिया था. एक अखिलेंद्र ही ऐसा था, जो अभी तक उस की जरूरतों को पूरा कर रहा था. लेकिन वह भी अब कम ही आता था. फोन पर जरूर बराबर बातें करता रहता था. अलबत्ता इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि वह कब तक साथ निभाएगा.

इस बीच कविता की सहेली सुनीता अपनी दोनों बेटियों को ले कर मुंबई शिफ्ट हो गई थी. वह अपनी बेटियों को मौडलिंग के क्षेत्र में उतारना चाहती थी. उस ने अपना मकान 75 लाख में बेच दिया था.

जो परिवार कविता का पड़ौसी बन कर सुनीता के मकान में आया, उस में मुकुल का ही हमउम्र लड़का सौम्य और उस से एक साल छोटी बेटी सांभवी थी. परिवार के मुखिया सूरज बेहद व्यवहारकुशल थे. उन की पत्नी सरला भी बहुत सौम्य स्वभाव की थीं. पतिपत्नी में तालमेल भी खूब बैठता था. सूरज सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर तैनात थे.

पतिपत्नी ने अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी थी. उन के घर रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों का आनाजाना लगा रहता था. सरला सब की आवभगत करती थी. अब उस घर में खूब रौनक रहने लगी थी. घर में खूब ठहाके गूंजते थे.

कविता कभीकभी मन ही मन अपनी तुलना सरला से करती तो उसे अपने हाथ खाली और जिंदगी सुनसान नजर आती. उसे लगता कि वह जिंदगी भर अंधी दौड़ में दौड़ती रही, लेकिन मिला क्या? सुरेश के साथ रहती तो बेटे को भी पिता का साया मिल जाता और उस की जिंदगी भी आराम से कट जाती.

वह सोचती कितना अभागा है मुकुल, जो पिता के संसार में होते हुए भी उस से दूर है. यह तक नहीं जानता कि उस के पिता कौन हैं और कहां हैं? वह तो सब से यही कहती आई थी कि मुकुल के पिता हमें छोड़ कर विदेश चले गऐ हैं और वहीं बस गए हैं. वह अखिलेंद्र को ही मुकुल का पिता साबित करने की कोशिश करती, क्योंकि वह ज्यादातर विदेश में ही रहता था और साल में एकदो बार आया करता था.

कालोनी में किसी को भी कविता का सच मालूम नहीं था. कोई जानना भी नहीं चाहता था. देखतेदेखते 2 साल और बीत गए. पड़ोसन की बिटिया की शादी थी. तमाम मेहमान आए हुए थे. सरला विशेष आग्रह कर के कविता को सभी रस्मों में शामिल होने का निमंत्रण दे गई. कविता इस बात को ले कर बेचैन थी. वह खुद को सब के बीच जाने लायक नहीं समझ रही थी. इसलिए चुपचाप लेटी रही.

अखिलेंद्र विदेश से आ रहा था. एयरपोर्ट से उसे सीधे उसी के घर आना था. मुकुल उसे लेने एयरपोर्ट गया हुआ था.

पड़ोस में मंगल गीत गाए जा रहे थे, बड़े ही हृदयस्पर्शी. सुन कर कविता की आंखें भर आईं. उस की शादी भी भला कोई शादी थी. सच तो यह था कि शादी के नाम पर उसे उस की गलतियों की सजा सुनाई गई थी. जिस सुरेश को कभी वह मोतीचूर का लड्डू समझ रही थी, उस के हिसाब से वह गुड़ की ढेली भर नहीं निकला था.

‘‘मां कहां हो तुम, देखो हम आ गए.’’ मुकुल की आवाज सुन कर वह चौंकी. मुकुल अखिलेंद्र को एयरपोर्ट से ले आया था. कैसा अभागा लड़का था यह, लोगों के सामने अखिलेंद्र को न पापा कह सकता था, न अंकल. हां, उस के समझाने पर घर में वह जरूर उन्हें पापा कह कर पुकार लेता था.

कविता अनायास आंखों में उतर आए आंसू पोंछ कर अखिलेंद्र के सामने आ बैठी. ऐसा पहली बार हुआ था, जब वह अखिलेंद्र को देख कर खुश नहीं हुई थी. अखिलेंद्र और कविता की उम्र में काफी बड़ा अंतर था. फिर भी सालों से साथ निभता रहा था.

‘‘क्या बात है, बीमार हो क्या कविता?’’ अखिलेंद्र ने पूछा तो कविता धीरे से बोली, ‘‘नहीं, बीमार तो नहीं हूं, टूट जरूर गई हूं भीतर से. ये झूठी दोहरी जिंदगी अब जी नहीं पा रही हूं. सोचती हूं, हम दोनों के संबंध भी कब तक चल पाएंगे.’’

‘‘हूं, तो ये बात है.’’ अखिलेंद्र ने गहरी सांस ली.

कविता अपनी धुन में कहे जा रही थी, ‘‘मैं भी औरतों के बीच बैठ कर मंगल गीत गाना चाहती हूं. अपने पति के बारे में दूसरी औरतों को बताना चाहती हूं. चाहती हूं कि कोई मेरे बेटे का मार्गदर्शन करे, उसे सही राह दिखाए. पर हम दोनों की किस्मत ही खोटी है.’’

‘‘और…?’’

‘‘एक दिन उस का भी घर बनेगा. कोई तो आएगी उस की जिंदगी में. फिर मैं रह जाऊंगी अकेली. क्या किस्मत है मेरी, लेकिन इस सब में दोष तो मेरा ही है.’’

तब तक मुकुल चाय बना लाया था. ट्रे से चाय के कप रख कर वह जाने लगा तो अखिलेंद्र ने उसे टोका, ‘‘यहीं बैठो बेटा, तुम्हारी मां और तुम से कुछ बातें करनी हैं. पहले मेरी बात सुनो, फिर जवाब देना.’’

कविता और मुकुल चाय पीते हुए अखिलेंद्र के चेहरे को गौर से देखने लगे. अखिलेंद्र ने कहना शुरू किया, ‘‘मेरी पत्नी पिछले 15 सालों से कैंसर से जूझ रही थी. मैं उसे भी संभालता था, बिजनैस को भी और दोनों बच्चों को भी. भागमभाग की इस नीरस जिंदगी में कविता का साथ मिला. सुकून की तलाश में मैं यहां आने लगा. मेरी वजह से मुकुल के सिर से पिता का साया छिन गया और कविता का पति. मैं जब भी आता, मुझे तुम दोनों की आंखों में दरजनों सवाल तैरते नजर आते, जो लंदन तक मेरा पीछा नहीं छोड़ते. इसीलिए मैं बीचबीच में फोन कर के तुम लोगों के हालचाल लेता रहता था.’’

अखिलेंद्र चाय खत्म कर के प्याला एक ओर रखते हुए बोला, ‘‘6 महीने पहले मेरी पत्नी का देहांत हो गया. उस के बाद मैं ने धीरेधीरे सारा बिजनैस दोनों बेटों को सौंप दिया. दोनों की शादियां पहले ही हो गई थीं और दोनों अलगअलग रहते थे. धीरेधीरे उन का मेरे घर आनाजाना भी बंद हो गया. फिर एक दिन मैं ने उन्हें अपना फैसला सुना दिया, जिसे उन्होंने खुशीखुशी मान भी लिया.’’

‘‘कैसा फैसला?’’ कविता और मुकुल ने एक साथ पूछा.

‘‘यही कि मैं तुम से शादी कर के अब यहीं रहूंगा.’’ अखिलेंद्र ने कविता की ओर देख कर एक झटके में कह दिया.

मुकुल का मुंह खुला का खुला रह गया. उसे लगा कि मां के दोस्त के रूप में जो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी, अब वह सिर पर आ बैठेगी. पक्की बात है कि अगर अखिलेंद्र घर में रहेगा तो मां को और मर्दों से नहीं मिलने देगा और उन लोगों से जो पैसा मिलता था, वह भी मिलना बंद हो जाएगा.

मुकुल को नेतागिरी में आड़ेटेढे़ हाथ आजमाने आ गए थे. वह रसोई से लंबे फल का चाकू उठा लाया और पीछे से अखिलेंद्र की गरदन पर जोरों से वार कर दिया. जरा सी देर में खून का फव्वारा फूट निकला और वह वहीं ढेर हो गया. कविता आंखें फाड़े देखती रह गई. जब उसे होश आया तो देखा, मुकुल लाश को उठा कर बाहर ले जा रहा था.

मुकुल ने पता नहीं ऐसा क्या किया कि वह तो बच गया, लेकिन कविता फंस गई. पुलिस ने मुकुल से पूछताछ की और घर की तलाशी भी ली, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुकुल के प्रयासों से 4-5 महीने बाद कविता को जमानत मिल गई. कविता और मुकुल फिर से एक छत के नीचे रहने लगे, लेकिन दोनों ही एकदूसरे को दोषी मानते रहे?

बड़े शहरों में घर खरीदने की होड़ पर लगाम

बड़े शहरों में लोग अकसर घर खरीदने की दौड़ में शामिल नजर आते रहे हैं. लेकिन पिछले वर्ष नवंबर में नोटबंदी के बाद से इस दौड़ पर मानो लगाम लग गई है. लोग घर या घर बनाने के लिए प्लौट खरीदने के बजाय पैसा बैंकों में जमा कर रहे हैं. इस से प्रौपर्टी के छोटेमोटे कारोबारी चुप बैठ गए हैं और उन के समक्ष रोटी का संकट खड़ा हो गया है. पहले प्रौपर्टी को खरीद और बेच कर मोटी कमाई करने और अपनेअपने खर्च बढ़ाने के आदी हो चुके ये प्रौपर्टी डीलर अब अपनी दुकानें बंद कर रहे हैं. बाजार में खरीदार ही नहीं हैं. बिल्डरों की हालत भी पतली हो चुकी है.

रियल एस्टेट क्षेत्र में डाटा और विश्लेषण तथा शोध करने वाली मशहूर कंपनी डाटा प्रोपइक्विटी ने हाल में समाप्त वित्तवर्ष की आखिरी तिमाही में घरों की बिक्री संबंधी एक डाटा पेश किया था जिस के अनुसार, पिछले वित्तवर्ष की तीसरी में घरों की बिक्री घटी है. कंपनी ने नोएडा, गुड़गांव, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और पुणे में भवनों की बिक्री को ले कर रिपोर्ट दी थी जिस में कहा गया कि इन सभी शहरों में खरीदारों की संख्या में गिरावट आई है. बिल्डर नए मकान नहीं बना रहे हैं और जो मकान तैयार हैं, उन्हें वे पहले बेचना चाहते हैं.

इस बीच सरकार ने 2 लाख रुपए से अधिक की नकद लेनदेन पर भी रोक लगा दी है जिस का सीधा असर रियल एस्टेट के कारोबार पर पड़ा है. रियल एस्टेट के लिए सरकार ने एक नया कानून भी बनाया है जो बिल्डरों की मनमानी पर नकेल कसने वाला है. इस से इस कारोबार में कालाबाजारी पर रोक लगेगी और बिल्डरों की मनमानी रुकेगी.सरकार का यह कदम महानगरों में अपना घर होने की उम्मीद पाले लोगों के लिए राहत देने वाला है. पहले के हालात में शायद ही कोई यह कह सकता था कि प्रौपर्टी की खरीद में वह धांधली का शिकार नहीं हुआ.

खिलाड़ियों की सरकारी खोज

भारतीय खेल मंत्रालय देश के गांवों, शहरों और कसबों के अलावा अब संसद भवन में भी खिलाड़ी ढूंढ़ने में जुट गया है. खेल मंत्री विजय गोयल ने सांसदों को पत्र लिख कर पूछा है कि आप किस खेल को पसंद करते हैं. इस के जवाब सांसदों ने देने शुरू भी कर दिए हैं. इस के बाद उन खेलों की अलगअलग टीमें बना कर आपस में मैच कराए जाएंगे.

इस से पहले मंत्री महोदय संसद भवन में सांसदों को फुटबौल भी बांट चुके हैं. मंत्री महोदय का मानना है कि अंडर-17 फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत कर रहा है और ऐसे में फीफा वर्ल्ड कप में जोश बना रहे.

गांव, स्कूल से ले कर बड़ी प्रतियोगिताओं तक में खिलाड़ी उपेक्षा और भेदभाव के शिकार हैं. सुविधाओं का अभाव है क्योंकि खेलों के लिए आवंटित पैसे का बड़ा हिस्सा संगठनों के मुंह में चला जाता है और खिलाड़ी मुंह ताकते रह जाते हैं.

सांसद खेलें, यह हर्ज की बात नहीं है पर पहले ध्यान इस बात पर दिया जाना चाहिए कि संसद में वे नियमित आएं और खेलों व खिलाडि़यों से जुड़ी समस्याओं को उठाएं. अभी तक राजनीतिक दल खिलाडि़यों की लोकप्रियता का फायदा ही उठाने का प्रयास करते आए हैं.

माननीयों को खेलते देखना शायद ही लोग पसंद करें पर उन्हें क्षेत्र के लिए काम करते देख जनता खुश जरूर होगी जिस के लिए वह उन्हें चुनती है.

ब्रिटिश हुकूमत में क्रिकेट खूब खेला जाता था पर अब लोकतंत्र है और देश गुलाम नहीं है, इसलिए कोई नया प्रयोग करने से पहले जनता का मन जरूर खेल मंत्री को टटोल लेना चाहिए.

सांसद कोई सैलिब्रिटी नहीं होते जो उन्हें खेलते देख लोगों की दिलचस्पी खेलों में पैदा होगी. आदर्श ग्राम योजना औंधेमुंह लटकी पड़ी है. सांसदों के जरिए खेलों को प्रोत्साहन देने से पहले उन से यह हिसाब लिया जाना चाहिए कि उन्होंने कितने गांव गोद लिए और उन के लिए क्याक्या विकास कार्य किए.

संसद को फुटबौल का मैदान बना देने वाले माननीयों आप शायद ही वार्मअप शब्द से परिचित होंगे जिस में खिलाड़ी को मैदान में खूब दौड़ाया जाता है. आरामतलब हो चले सांसद चुनाव के वक्त ही सक्रिय दिखते हैं. उन्हें खिलाने की मंशा का मतलब सिर्फ मनोरंजन और पैसा बरबाद करने वाली बात साबित होगी.

मजा तो तब आता जब और लोग दिलचस्पी भी लेते, गांवदेहातों से लोगों को खेलने के लिए आमंत्रित किया जाता और सभी सांसदों को दर्शक बन खेल देखने को मजबूर किया जाता.

महिलाओं का शोषण घर से शुरू होता है : रवीना टंडन

90 की दशक की मशहूर अभिनेत्रियों में एक नाम अभिनेत्री रवीना टंडन का भी है. ‘पत्थर के फूल’ फिल्म से उन्होंने सलमान खान के साथ अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा. फिल्म काफी सराही गई और उन्हें काम मिलने लगा. वे हमेशा अलगअलग किरदार निभाना पसंद करती हैं और ऐसी फिल्मों को ही चुनती हैं, जिन में कुछ चुनौती हो. यही वजह है कि फिल्म चाहे रोमांटिक हो या कौमेडी, हर फिल्म में उन्होंने अपनी अलग छवि स्थापित की है. स्पष्टभाषी रवीना बहुत कम उम्र में (1995 में) 2 बेटियों को गोद ले कर मां बनीं और अब नानी भी बन चुकी हैं. रवीना ने फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर अनिल थडानी के साथ शादी की और 2 बच्चों की मां बनीं. रवीना को लड़कियों से बहुत प्यार है. उन्हें वे मानव जगत की सब से अच्छी रचना मानती हैं. लड़कियों के साथ दुराचार, कन्याभ्रूण हत्या सुन कर वे कांप उठती हैं. उन की फिल्म ‘मातृ-द मदर’ भी एक संवेदनशील विषय पर बनी है.

इस तरह के संवेदनशील विषय चुनने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया, ‘‘बेटियों को ले कर मैं हमेशा चिंतित रहती हूं. जब भी वे कहीं जाती हैं, तो जब तक न लौटें, चिंता बनी रहती है. ऐसे माहौल में आज हर बेटी के मातापिता चिंतित रहते हैं. अपराध करने वाले को कानून का डर नहीं. ऐसे में मुझे एक मौका मिला है कि मैं अपने अभिनय से लोगों को आत्मचिंतन करने पर मजबूर करूं. इस फिल्म की कहानी हमारे आसपास घटित होने वाली है, जिस के बारे में हम तब तक नहीं सोचते जब तक कि हमारे साथ कुछ हुआ न हो. अभी तक इस विषय पर शुगर कोटेड फिल्में दिखाई गई हैं, यह हार्डकोर फिल्म है.’’ इस तरह की सीरियस कहानी से आप पर किस तरह का दबाव रहा, इस पर रवीना कहती हैं, ‘‘दबाव तो रहा, लेकिन यह हकीकत भी तो है. यह फिल्म एक पारिवारिक फिक्शन ड्रामा है जिस में एक मध्वर्गीय स्कूलटीचर का रेप होता है. इस के बाद निराशा जो एक साधारण इंसान की होती है उसे फिल्म में ही दिखाने की कोशिश की गई है.

यह स्टोरी सुन कर मैं दंग रह गई थी, आज भी ऐसा हो रहा है. महिलाओं के साथ अपराध लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं और यह कब तक चलेगा? लोग चुपचाप बैठ कर तब तक तमाशा देखते हैं जब तक कि ऐसी दूसरी घटना न घट जाए.’’ रवीना सामाजिक कार्यों में उतनी ही सक्रिय रहती हैं जितना अभिनय में. इस क्षेत्र में काम करने से जुड़े अनुभवों पर उन का कहना है, ‘‘मैं ने स्ट्रीट चिल्ड्रैन और महिलाओं के लिए काफी काम किया है. पर सबकुछ सुधरने में अभी 10 साल शायद और लगेंगे. निराशा, लोगों का रवैया और ला मेकर्स की अनदेखी इस के लिए जिम्मेदार हैं.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘‘मातृ-द मदर’ फिक्शन फिल्म होने के बावजूद अगर किसी को कुछ हौसला देती है, तो मेरे लिए सब से बड़ी सफलता होगी. निर्भया केस की ओर इशारा करते हुए वे कहती हैं कि एक जघन्य अपराध करने वाला व्यक्ति नाबालिग नहीं होता. वह बीमार इंसान है और सारी जिंदगी जेल में रख कर मनोचिकित्सक की सहायता से उस की चिकित्सा करवानी चाहिए.

‘‘यह फिल्म डार्क है. सैंसर बोर्ड क्या करेगा, पता नहीं. कठिन चीजें दिखाने की जरूरत है. दक्षिण में हाई प्रोफाइल ऐक्ट्रैस भी दुराचार की शिकार हुईं. कर्नाटक के मिनिस्टर ने कहा था कि ऐक्शन लिया जाएगा. लेकिन कुछ नहीं हुआ.’’

क्या आप के साथ कभी कुछ इस तरह की घटनाएं घटने की स्थिति आई है, इस सवाल पर रवीना बताती हैं, ‘‘मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ. कई बार ऐसा होता है कि कुछ फोटोग्राफर्स लो ऐंगल से तसवीरें लेने लगते हैं, कितनों को मैं ने खुद मना किया है. वे ऐसे मौके ढूंढ़ते हैं. ऐसी गंदी सोच और दिमाग की खोट को बदलने की जरूरत है.’’ महिलाओं को ले कर वे कहती हैं, ‘‘महिलाओं को सर्तक  रहने की जरूरत है. महिलाओं का शोषण घर से ही शुरू होता है. मां को सब से पहले सम्मान मिलना चाहिए. शोध बताते हैं कि महिलाओं के साथ अपराध करने वाले बच्चे बचपन से निर्दयी होते हैं. उन्हें किसी का दर्द अच्छा लगता है, तभी से उन का इलाज होना जरूरी है. मैं अपने बेटे को समझाती हूं कि आप अपने क्लास की लड़कियों को सम्मान दें.’’

अपने 25 साल के फिल्मी सफर के अनुभवों और फिल्म जगत में आए बदलावों को ले कर वे कहती हैं, ‘‘25 साल में फिल्म इंडस्ट्री काफी बदली है. हर तरह की फिल्में आज बन रही हैं. लेकिन मैं ने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया है. अभी मेरी सोच बदली है. फिल्में कई बार सफल होती हैं, कई बार नहीं. पर मैं ने इस बात कभी को गंभीरता से नहीं लिया. शादी के बाद लोग मैच्योर होते हैं, मुझे भी अपने व्यक्तित्व के हिसाब से ग्रेसफुल किरदार मिले और मैं ने किए. मैं ने कभी अपनी उम्र को छिपाया नहीं.’’ रवीना की बेबाक छवि और सामाजिक सरोकार से जुड़े नजरिए को देखते हुए कहना मुश्किल नहीं होता कि अपनी इस दूसरी पारी में वे न सिर्फ अर्थपूर्ण व संजीदा अभिनय करती नजर आएंगी बल्कि सामाजिक मसलों पर अपनी स्पष्ट राय भी रखेंगी.

ऐसा भी होता है

हम लोग सपरिवार दिल्ली गए थे. एक दिन सुबह ही हमारे पति के मोबाइल फोन पर 30 रुपए के रिचार्ज का मैसेज आया जो हम ने नहीं कराया था. शायद किसी ने गलती से उन के फोन का रिचार्ज करा दिया था.

थोड़ी देर बाद उन के फोन पर किसी अनजान नंबर से मिस्डकौल आई. चूंकि फोन रोमिंग पर था, इसलिए नजरअंदाज कर दिया गया. लेकिन जब 3-4 बार लगातार उसी नंबर से कौल आई तो पति को उत्सुकता होने लगी. उन्होंने बेटे से उस नंबर पर कौल कर के देख लेने को कहा.

बेटे ने उस नंबर पर कौल कर के बात की. उस ने बताया कि एक आदमी अपने 30 रुपए वापस मांग रहा था जो उस ने गलती से हमारे फोन को रिचार्ज करा दिया था. उस की बात सुन कर हम सब को हंसी आई.         

नीता वर्मा

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बात 29 अगस्त, 2007 की है. सुबह 10 बज कर 9 मिनट और 49 सैकंड पर मेरे मोबाइल फोन पर मेरे 23 वर्षीय पुत्र लैफ्टिनैंट यश आदित्य का एक संदेश मिलता है, ट्रेन हैज स्टार्टेड मूविंग यानी  ट्रेन चल दी है. संदेश पा कर घर वालों को सुखद एहसास होता है कि 2 वर्षों की लेह की कठिन पोस्ंिटग के बाद बेटा घर आ रहा है.

मेरे बेटे की पलटन को रेलवे ने मिलिटरी स्पैशल ट्रेन उपलब्ध करा दी थी और इसे अपने गंतव्य बबीना रेलवे स्टेशन जानी थी. लुधियाना में सामान की चैकिंग के लिए गाड़ी को यार्ड में ले जाया गया. बेटे को ट्रेन की सुरक्षा का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा गया था, सो ट्रेन पर लदे अत्याधुनिक टैंकों की जांच करने के लिए वह जब बोगी पर चढ़ने लगा तो अचानक ऊपर से गुजर रहे हाईटैंशन तार की चपेट में आ गया. उसे 60 प्रतिशत बर्न इंजरी हुई थी.

शाम 3 बज कर 15 पर मेरे मोबाइल फोन पर उस के सीओ कर्नल शर्मा का संदेश मिला, तुरंत चल दीजिए. यह दुर्घटना काल बन कर मेरे परिवार पर आई थी और आखिरकार 5 सितंबर को मेरे सैन्य कर्तव्यपरायण पुत्र के जीवन की ट्रेन अपने अंतिम पग की ओर रवाना हो गई.

जी हां, जीवन का ऐसा भी रंग होता है कि कुछ ही घंटे पहले हर्ष और उल्लास का आमंत्रण मिलता है तो कुछ ही घंटों बाद वह शोक, बेचैनी और संत्रास की पीड़ा में बदल जाता है.     

प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी

यह भी खूब रही

गरमी की छुट्टियों में मैं अपने पति और 3 वर्षीय बेटे राहुल के साथ चंडीगढ़ जा रही थी. मेरे बेटे को दालचावल बहुत प्रिय हैं. मैं यात्रा में भी उस के लिए दालचावल घर से बना कर ले जाती हूं. ट्रेन में जब राहुल को भूख लगी तो मैं उसे अपने हाथ से दालचावल खिलाने लगी. मेरे दूसरे हाथ में उपन्यास था जो काफी रोचक था और मैं पढ़ती जा रही थी.

कुछ क्षणों बाद मैं ने जैसे ही दालचावल का निवाला आगे बढ़ाया तो अचानक मुझे किसी पुरुष का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘मैडम, यह क्या कर रही हैं, आप?’’

मैं ने उपन्यास से नजर हटा कर देखा तो वस्तुस्थिति समझ कर शर्म से लाल हो गई. दरअसल, मेरा पूरा ध्यान अपने उपन्यास पर था, इसीलिए मुझे पता ही नहीं चला कि राहुल कब उठ कर दूसरी बर्थ पर बैठे अपने पापा के पास चला गया और उस के स्थान पर पास ही खड़े सज्जन बैठ गए. जिन्हें राहुल समझ कर मैं दालचावल खिलाने जा रही थी.  

यशोदा अग्रवाल

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मेरी पड़ोसिन जब कोई सब्जी बनाती, कटोरी भर कर हमें देने आ जाती. फिर हम से भी वही उम्मीद रखती. यह लेनदेन के शौक से मैं परेशान हो चुकी थी.

एक बार मैं ने अपने 8 साल के बेटे को समझा दिया कि जब आंटी आएं तब क्या बोलना है. एक दिन जैसे ही वह सब्जी ले कर आई और दरवाजे से बाहर गई ही थी कि मेरा बेटा जोर से बोला, ‘‘मम्मी, जब हमारे घर में आंटी की दी हुई सब्जी कोई खाता नहीं है तो क्यों लेती हो?’’ उस ने सुन लिया पर कुछ बोली नहीं. लेकिन उस दिन के  बाद उस की देने की आदत जरूर छूट गई.       

हेमलता चौहान

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मेरे बैंक में एक वर्माजी हैं. वे अपनी बातचीत में अकसर अपनी जाति को बड़े गर्व से जताया करते हैं और कहते हैं कि वे जाट हैं. कुछ दिनों बाद, हमारे विभाग में एक शर्माजी का पदार्पण हुआ. बातचीत में वे भी कम तेजतर्रार नहीं हैं. एक दिन वर्माजी और शर्माजी में किसी बात पर थोड़ी सी बहस हो गई. वर्माजी अपनी आदत के अनुसार अपनी जाति को बीच में ले आए. शर्माजी ने कहा कि जातपात बीच में क्यों लाते हो? लेकिन वर्मा साहब न माने और बोले, ‘‘बामन दबे मिठाई से.’’ अब भला, शर्माजी भी पीछे क्यों रहते? वे तपाक से बोले, ‘‘और जाट दबे जूते से.’’ अब, वर्माजी का चेहरा देखने लायक था. उस दिन के बाद वर्मा साहब ने फिर कभी अपनी बातचीत में जाति का हवाला नहीं दिया.  

प्रभाशंकर उपाध्याय

आसान नहीं वापसी

रूसी टैनिस स्टार मारिया शरापोवा 15 महीने के बाद अपने कैरियर की सब से मुश्किल चुनौती का सामना करने के लिए टैनिस कोर्ट में लौट आई हैं. मुश्किल चुनौती इसलिए है क्योंकि वर्ष 2016 में शरापोवा ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने साल के पहले ग्रैंड स्लैम टूर्नामैंट में प्रतिबंधित दवा का इस्तेमाल किया था. तब से उन पर 3 साल के लिए बैन लगा दिया गया लेकिन अपील में इसे कम कर के15 महीने कर दिया गया. शरापोवा के सामने सब से बड़ी चुनौती स्पौंसर्स की है. इतने महीने खेल के मैदान से बाहर रहने के बाद क्या वे अपने स्पौंसर्स से पहले की तरह कमाई कर पाएंगी? क्या टैनिस की दुनिया में वे दोबारा अपने रैकेट से सनसनी मचा पाएंगी? ऐसे अनेक सवाल हैं जो शरापोवा के लिए चुनौती हैं.

फिलहाल शरापोवा को पांव जमाने के लिए मौका अच्छा है क्योंकि उन की सब से बड़ी प्रतिद्वंद्वी सेरेना विलियम्स मां बनने वाली हैं और वे खेल से फिलहाल दूर हैं. शरापोवा की वापसी से टैनिस के कुछ खिलाडि़यों में नाराजगी है. स्वाभाविक है शरापोवा एक समय वरीयता में नंबर वन रैंक पर थीं और अपने खेल की बदौलत वे अच्छेअच्छे खिलाडि़यों को पछाड़ कर टैनिस जगत में नाम कमा चुकी हैं पर डोपिंग मामले में प्रतिबंध से टैनिस जगत का नाम तो खराब हुआ ही, साथ ही युवा खिलाडि़यों में भी इस का गलत मैसेज जाने की उम्मीद है. डोपिंग का डंक खेल जगत को खोखला बना रहा है. कड़े नियमों के बावजूद आएदिन खिलाड़ी डोपिंग मामले में फंस रहे हैं. यह देशदुनिया के खेलप्रेमियों के लिए चिंता का विषय है.

लोन वुल्फ : आतंक का नया चेहरा

9 अप्रैल, 2017 : मिस्र के अलैक्जैंड्रिया और तांता शहरों के गिरजाघरों में हुए धमाकों के बाद राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल सीसी ने देश में 3 महीने के आपातकाल की घोषणा कर दी. इन धमाकों में 45 लोगों की मौत हो गई जबकि सैकड़ों घायल हो गए. 2 गिरजाघरों में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन आईएस ने ली है. अलैक्जैंड्रिया के सैंट मार्क्स चर्च में शक होने पर सुरक्षा बलों ने चर्च के मुख्यद्वार पर ही आत्मघाती हमलावर को रोक लिया था, जहां उस ने खुद को उड़ा लिया.

3 अप्रैल, 2017 : रूस में सैंट पीट्सबर्ग के मैट्रो स्टेशन पर 3 धमाकों में 10 लोगों की मौत हो गई जबकि 50 से अधिक लोग घायल हो गए. बम विस्फोट करने वाले संदिग्ध व्यक्ति की पहचान को प्रारंभिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया है. यह संदिग्ध व्यक्ति मध्य एशियाई है, जिस के सीरियाई आतंकवादियों से संबंध हैं. विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया है कि यह हमलावर खुद के बनाए हुए बम को ले कर मैट्रो में गया था. वह डब्बे में बीच वाली जगह पर खड़ा हुआ था. मैट्रो टे्रन के चलने के दौरान उस ने विस्फोट कर दिया.

7 अप्रैल, 2017 : स्वीडन की राजधानी स्टौकहोम में एक ट्रक भीड़भाड़ वाले शौपिंग इलाके में घुस गया और लोगों को रौंदते हुए निकल गया, जिस में 5 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. यह घटना स्टौकहोम के ड्रोटिनिंगटन क्वीन स्ट्रीट पर हुई. अधिकारियों के मुताबिक यह घटना आतंकी हमलों की ओर इशारा करती है.

7 मार्च, 2017 : भारत में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में करीब 12 घंटे चली मुठभेड़ के बाद सैफुल्लाह मारा गया. यह भारत पर आईएस का पहला हमला था. शुरुआती जांच के हिसाब से यह स्वघोषित कट्टरपंथी या लोन वुल्फ था जो खुद को आईएसआईएस खुरासान गु्रप के तौर पर प्रचारित कर रहा था. जरमनी की राजधानी बर्लिन के क्रिसमस मार्केट में हुए ट्रक हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस ने ली. उस से जुड़ी एक एजेंसी अमाक ने हमले के दूसरे दिन बयान जारी कर के हमले की जिम्मेदारी ली. बयान में कहा गया है कि गठबंधन देशों को निशाना बनाने की अपील के बाद आईएस के एक लड़ाके ने हमला किया. हमले में

12 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से ज्यादा घायल हुए थे. आतंकी वारदात को अंजाम देने के बाद यह आतंकी बच कर भाग निकलने में भी सफल रहा. इसलिए जरमनी में इस बात का खौफ था कि वह दूसरा हमला कर सकता है लेकिन वह 2 दिनों बाद इटली पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया. इसे लोन वुल्फ या अकेले भेडि़ए का हमला माना जा रहा है.

क्या बला है लोन वुल्फ

मौजूदा दौर में लोन वुल्फ हमले का मतलब है बिना किसी नेतृत्व के अपने धार्मिक, सांप्रदायिक और कट्टर विचारधारा के नाम पर अकेले हथियार ले कर आम लोगों व सुरक्षाबल पर हिंसक हमले करना. इस सिलसिले में जो शोध हुए हैं, वे बताते हैं कि ऐसे लोन वुल्फ अकसर किसी छोटे से नैटवर्क का हिस्सा होते हैं. कुछ तो सिर्फ परिवार के सदस्यों व दोस्तों से मदद लेते हैं. या उन की असलियत बहुत नजदीकी लोगों को ही पता होती है. बोस्टन में बम धमाका करने वाले दोनों लोग भाई थे, जबकि सैन बै्रंडिनो में हमला करने वाले पतिपत्नी थे. यूरोप में पिछले 9 महीनों में इस तरह के जो हमले हुए हैं वे नौजवानों के छोटे से नैटवर्क की करतूतें थीं. वे एकदूसरे को जानते थे, दोस्त थे या पासपड़ोस के ही लड़के थे. खुफिया एजेंसी के लिए इस तरह के हमलावरों को ढूंढ़ना टेढ़ी खीर होता है.

पुलिस व सुरक्षा एजेंसियां पस्त

आधुनिक युग में आतंकवाद का चेहरा कोई खास अलग नहीं है, लेकिन जैसे ही इस पर आईएसआईएस की मुहर लगती है, हमारी रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी छूट जाती है. यह हमें ज्यादा डराता है. आईएसआईएस महज हत्याएं नहीं करता, बल्कि सभ्य समाज और बर्बरता के बीच का फासला कम करता हुआ ऐसे कृत्य को न्यायसंगत व सही भी ठहराता है. वह यह भी समझाता है कि ऐसा करने में गई उस के सदस्यों की जानें दरअसल शौर्य का प्रतीक हैं. आईएसआईएस एक ऐसी फ्रैंचाइज है जो कोई भी हथिया सकता है बिना उस की इजाजत के. सिर्फ इतना भर करना होता है कि हमला करो, हिंसा फैलाओ, बेगुनाह और मासूम लोगों की जानें लो और हमले से ठीक पहले एक संदेश जारी कर दो कि इस हमले का रिश्ता आईएसआईएस से है. आईएसआईएस को बुरा नहीं लगता, वह भी तुरतफुरत ऐसे हमलों की जिम्मेदारी या कहें कि श्रेय लेने में पीछे नहीं रहता.

जब आतंक का रूप ऐसा हो जाए तो चुनौती यह है कि इस से निबटा कैसे जाए. तमाम देशों की सुरक्षा एजेंसियां इस तरह को हमलों को कैसे रोकें, जहां न तो कोई गुट काम कर रहा है, न कोई ट्रेनिंग या उकसावे के कैंप चल रहे हैं, न कोई बड़ा हथियारों का जखीरा जमा किया जा रहा है. अलकायदा के जमाने में तो यही होता रहा है कि एजेंसिया ऐसे लोगों पर नजर रखती थीं जो अपने देश से बाहर जाते थे. फ्रांस के आतंकी और मतीन में काफी समानताएं हैं. फ्रांस का हमलावर भी पुलिस की नजर में था और मतीन भी. दोनों ही के बारे में पुलिस को लगता था कि वे नाराज युवक हैं, और हिंसा की इस पराकाष्ठा तक नहीं पहुंच सकते. दोनों ही मामलों में पुलिस और एजेंसियां गलत साबित हुई हैं.

लोन वुल्फ का हाइटैक हथियार

‘लोन वुल्फ टैररिज्म : अंडरस्टैडिंग द ग्रोइंग थ्रेट’ पुस्तक के लेखक जैफ्री सिमोन आतंकवाद की इस नई प्रवृत्ति के बारे में कहते हैं – ‘‘मेरी पुस्तक लोन वुल्फ आतंकवाद की बढ़ती समस्या के बारे में है जो संगठित आतंकवाद से अलग तरह की है जिस के हम सातवें, आठवें और नवें दशक और 21वीं सदी के पहले 5 सालों में आदी रहे हैं. बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ एक व्यक्ति होता है, वह 2 व्यक्ति भी हो सकते हैं, वे बाहरी लौजिस्टिक और आर्थिक सहायता के बिना काम करते हैं. ‘‘दरअसल वे अपने लिए काम कर रहे होते हैं. उन की पहचान कर पाना या उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है क्योंकि उन की किसी से बातचीत नहीं होती, न गु्रप के कोर सदस्य पकडे़ जाते हैं.

अपनी पुस्तक में मैं ने कहा है कि इंटरनैट ने इस खेल को बदल दिया है.  इंटरनैट ने इन आतंकवादियों को यह अवसर दिया है कि आतंकवादी संगठन के वैब पेजेज, ट्वीट्स और ब्लौग पढ़ कर स्वयंमेव उग्रवादी बन सकते हैं. लेकिन इस से अधिकारियों को लोन वुल्फ के बारे में जानने का मौका मिल सकता है क्योंकि कई वुल्फ हमले से पहले संदेश भेजते हैं. हाल ही में लोन वुल्फ की संख्या भी बढ़ती जा रही है और उन के द्वारा की जानेवाली तबाही भी. ‘‘परंपरागत आतंकवादी और लोन वुल्फ आतंकवादियों में एक फर्क यह है कि लोन वुल्फ आतंकवादी नएनए तरीके अपनाते हैं. बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ बहुत खतरनाक होते हैं और बहुत रचनात्मक भी. चूंकि उन के पीछे कोई सामूहिक निर्णय प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए वे अपनी पसंद का तरीका या रणनीति चुन सकते हैं. इस कारण लोन वुल्फ की संख्या बढ़ती जा रही है. यह एक ट्रैंड बन सकता है.’’

आईएसआईएस आतंकवाद के इतिहास में सब से ज्यादा तकनीक और मीडियापसंद गुट है. इस ने इंटरनैट के इस्तेमाल में महारत हासिल की हुई है. अलकायदा ने भी उस का इस्तेमाल किया मगर आईएसआईएस इसे और ऊंचे स्तर तक ले गया. इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में क्या नई बात निकल कर आती है. हमें यह जरूर जानना चाहिए कि आईएसआईएस इराक और सीरिया में घिर चुका है. हो सकता है निकट भविष्य में यह देखने को मिले कि वह हार चुका है मगर वह विकेंद्रित वैश्विक ताकत के रूप में बना रहेगा. इंटरनैट और सोशल मीडिया का उपयोग कर लोगों को आत्मघाती हमले करने को प्रेरित करता रहेगा.

रहना होगा सावधान

फ्रांस के एक शिक्षाविद के मुताबिक, ये वो लोग हैं जो किसी भी समाज में ऐडजस्ट नहीं हो सकते. ये लोग एक काल्पनिक दुनिया में रहते हैं और ये इसलाम के कट्टरपंथ से नहीं, बल्कि अपने ही मन के कट्टरपंथ से प्रभावित हैं. हमलों में आईएसआईएस का नाम लेना इन्हें अच्छा लगता है क्योंकि वह एकमात्र समाजविरोधी और विश्वविरोधी संस्था है. आईएसआईएस आधुनिकता के खिलाफ है और दुनिया को इसलाम के शुरुआती दौर में ले जाना चाहता है. दरअसल, इसलाम का कट्टरपंथी रूप नहीं है यह, वास्तविकता यह है कि यह कट्टरपंथ का इसलामीकरण है.

आतंक के इस नए हाइटैक व धार्मिक हथियारों से घिरे रूप से पूरी दुनिया परेशान है. आज भले ही लोन वुल्फ के निशाने पर फ्रांस, अमेरिका जैसे यूरोपीय देश हों लेकिन जिस तरह से एशिया, खासकर भारत, पिछले कई सालों से आतंक के निशाने पर रहा है उस से यहां भी लोन वुल्फ की क्रूर करतूतों की गुंजाइश और बढ़ जाती है. जाहिर है आने वाले खतरे से चारकदम आगे चलने व निबटने के लिए कमर कसने में ही समझदारी है.        

लोन वुल्फ का आईएसआईएस कनैक्शन

आईएसआईएस की लोन वुल्फ आतंकी हमले की सोच काफी पुरानी है. सितंबर 2014 में आईएसआईएस ने अपने एक सरगना का औडियोटेप जारी किया था. उस टेप में इराक पर हवाई हमला करने वाले अमेरिका और उसके सहयोगियों पर लोन वुल्फ के ढंग के हमले करने का आह्वान किया गया था. अकेले आतंकी हमला करने वालों को पश्चिमी देशों में लोन वुल्फ कहा जाता है.  पहले हमले छोटे स्तर पर ही होते थे, अब ये बड़ा रूप लेते जा रहे हैं. इस हमले का यूरोप में नतीजा यह हुआ है कि सभी मुसलमान और मध्यपूर्व से आए मुसलिम शरणार्थी संभावित आतंकवादी के कठघरे में खड़े कर दिए गए हैं.

 अमेरिका के ओरलैंडो के गे क्लब में उस रात ऐसा ही खौफनाक वाकेआ हुआ था. अंधाधुंध फायरिंग कर के 50 से ज्यादा लोगों की जान लेने वाले उमर मतीन के बारे में अभी तक इतना ही पता चल सका है कि वह इसलामिक स्टेट यानी आईएस से प्रभावित था, लेकिन यह हत्याकांड उस ने इसलामिक स्टेट के किसी निर्देश पर नहीं किया था. लेकिन कई अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मतीन ने हमले से पहले और हमले के दौरान इमरजैंसी सर्विस को फोन कर के यह स्वीकार किया था कि वह इसलामिक स्टेट के लिए प्रतिबद्ध है. इस घटना से 2015 में कैलिफोर्निया के सैन ब्रैंडिनों में हुई शूटिंग याद आती है, जहां हमलावर ने एक क्लिनिक में गोलीबारी कर के 14 लोगों की जान ले ली थी और हमले से पहले सोशल मीडिया में स्वीकार किया था कि वह आईएसआईएस के प्रति आस्था रखता है. इस के बाद आईएस ने भी न सिर्फ उस की प्रतिबद्धता को स्वीकार किया, बल्कि हमले की जिम्मेदारी भी ली थी.

अकेले भेडि़यों की फौज

यह भी एक तरह से आईएस की रणनीति का ही हिस्सा है. वह लगातार ऐसे समर्थक तैयार करने की कोशिश करता रहता है, जो जहां कहीं भी हैं, जैसे भी हैं, अपनी तरह से उस के लिए कुछ करते रहें. खासकर अगर वे खिलाफत वाले क्षेत्र में जा बसने की हिजरत की अपनी जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में नहीं हैं. पिछले कुछ समय से इसलामिक स्टेट अपने दुश्मनों से घिर गया है. रूस, पश्चिमी सैनिक गठबंधन और अरब देशों की आसमान से बरसती हजारों मिसाइलों के कारण इराक और सीरिया की अपनी जमीन पर उस की हालत खस्ता है. वह इराक में 45 प्रतिशत और सीरिया की 20 प्रतिशत जमीन खो चुका है मगर इस का बदला चुकाने के लिए वह दुनियाभर में आतंकवादी वारदातों को अंजाम दे कर कई देशों को दहला रहा है.

आईएस ने ओरलैंडो के हमले की जिम्मेदारी ली, और कहा कि इस काम को इसलामिक स्टेट के एक लड़ाके ने अंजाम दिया. लेकिन यह बयान जिस तरह संक्षिप्त है, उस से यही लगता है कि संगठन को इस हमले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी और यह किसी अकेले सिरफिरे की हरकत है. इस के विपरीत पेरिस हमले के दौरान जो जिम्मेदारी ली गई थी, उस में जिस तरह का ब्योरा दिया गया था, वह बता रहा था कि बयान देने वाला हमले की साजिश में शामिल था.

निशाने पर फ्रांस, अमेरिका और…

फ्रांस में भी लोन वुल्फ का हमला हो चुका है जिस में केवल ट्रक के जरिए आतंकी हमला किया गया. वह महज 30 साल का नौजवान था ट्यूनीशिया से आ कर फ्रांस में बसे समुदाय का. पुलिस उसे शातिर अपराधी के तौर पर जानती थी, वह अकसर हथियारों का इस्तेमाल किया करता था. पुलिस की उस पर नजर रहती थी, लेकिन कभी भी उस के बारे में यह शक तक नहीं हुआ कि वह किसी कट्टरपंथी इसलामी संगठन से जुड़ा हुआ है. जब वह फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस का उत्सव मना रहे लोगों की भीड़ में ट्रक ले कर उन्हें कुचलता हुआ बढ़ा तो उस के पास एक पिस्टल और एक अन्य गन थी. उस ने इसी गन से फायरिंग भी की. उस के ट्रक से कुछ हथगोले और अन्य हथियार मिले, लेकिन जांच में पता चला कि वे नकली थे. इस हमले में 77 लोगों की मौत हुई जबकि 50 से ज्यादा लोग जख्मी हुए. इतना क्रूर कदम उठाने की उसे प्रेरणा या ट्रेनिंग कहां से मिली, यह पता नहीं चल पाया .

 फ्रांस में पिछले 10 महीनों में दूसरा बड़ा हमला था. हमले के तुरंत बाद पुलिस ने ट्रक के ड्राइवर को मार गिराया. 2015 में 13 नवंबर को हुए हमले से उबर ही रहा था फ्रांस, जिसमें करीब 130 लोग मारे गए थे, कि यह हमला हो गया.  अमेरिका में भी लोन वुल्फ हमले की कई वारदातें हुई हैं. ओरलैंडो के गे क्लब का हमला हो या फिर सिनेमाघर में अंधाधुंध गोलियां बरसाने वाली घटना, दोनों ही मामलों में हमलावर अकेले थे और लोन वुल्फ की तरह घटना को अंजाम दे रहे थे. उन का किसी आतंकी संगठन से संबंध भी नहीं पाया गया.

आतंक की सिरफिरी ब्रैंडिंग

लोन वुल्फ सिर्फ हमले ही नहीं करता बल्कि कभी उन के हमले बहुत छोटे स्तर के भी होते हैं. दक्षिण जरमनी में एक सिरफिरे शख्स ने 4 लोगों को ट्रेन में कुल्हाड़ी मार कर जख्मी कर दिया. हमलावर की कुल्हाड़ी का शिकार हुए 3 लोग गंभीररूप से घायल हुए, जबकि एक को हलकी चोट आई. यह घटना बवेरिया में वुर्जबर्ग और ट्रेचलिंगन के बीच एक लोकल ट्रेन में हुई. हमलावर को पुलिस ने ढेर कर दिया. चाकू और कुल्हाड़ी से लैस इस हमलावर की पहचान 17 साल के अफगानी युवक के रूप में हुई. ये सभी ऐसे आतंकी थे जिन्हें आज की भाषा में लोन वुल्फ यानी अकेला भेडि़या या अकेला हमलावर कहा जाता है. ये आईएसआईएस की रणनीति थी जो जहां है वहीं रहे और हमले का मौका तलाशता रहे, जब मौका मिले अपने निशाने पर हमला बोल दे. पहली बार किसी आतंकवादी संगठन ने लोन वुल्फ का फंडा अपनाया है. यह बेहद खतरनाक है क्योंकि इस के लिए किसी खास ट्रेनिंग या पैसे की जरूरत पडती है, सिर्फ दिमागी ब्रेन वौश चाहिए.

लोन वुल्फ की ये आतंकी घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि इसलामिक स्टेट एक स्थायी मानसिक अवस्था बन चुका है. दरअसल इस मामले में आईएसआईएस अलकायदा से बहुत आगे है. अलकायदा महज आतंक फैलाने का काम कर रहा था तो आईएसआईएस वैचारिक आतंकवाद का एक ऐसा विचार, जो आम से दिखने वाले साधारण लोगों को हिंसक तरीके अपनाने के लिए उकसाता है. जिस तरह देसी उत्पाद ग्लोबल ब्र्रैंड का ठप्पा लगते ही आकर्षण का केंद्र बन जाता है वैसे ही किसी भी तरह की हिंसा में आईएसआईएस का ठप्पा लगते ही वह वैश्विक घटना में बदल जाती है. उन के पीछे बड़ी संगठित ताकत सक्रिय रहती थी.

आतंक की आर्थिक रणनीति

अब आतंकवाद के नए रूप में किसी संगठन को लंबे अरसे तक योजना बना कर करोड़ों रुपए खर्च कर हमले करवाने की जरूरत नहीं, बल्कि कोई भी अकेला इंसान इन्हें अंजाम दे कर दुनियाभर में दहशत फैला सकता है. लेकिन अब दुनियाभर में ऐसी ही दहशत पैदा करने के लिए 1 या 2 लोग ही काफी होंगे. वह किसी एक जीप या कार पर सवार हो किसी भीड़ को कुचलता हुआ निकल सकता है या फिर रसोई में काम आने वाले चाकू की मदद से ही किसी भीड़ वाले इलाके में एकसाथ दसों लोगों का कत्ल कर सकता है. ऐसी हरकत चीन के शिनच्यांग में देखी गई है. ऐसे इंसान के लिए कोई धार्मिक आतंकवादी या अलगाववादी संगठन प्रेरणा का स्रोत बनता है. उसे संगठन से मदद की कोई जरूरत नहीं होती और न ही उस के निर्देशों की जरूरत होती है.  ऐसे लोग कई देशों के लिए एक बड़ी परेशानी बने हुए हैं.

बहरहाल, लोन वुल्फ जिस तरह पनप रहे हैं उन से निबटने के लिए सैन्य या पुलिस ताकत से काम नहीं चलेगा. ऐसे तत्त्व अब हर समाज में नजर आ रहे हैं. 

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