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महिलाएं फिल्में बनाना जानती हैं : माधुरी दीक्षित

80 और 90 के दशक में हिंदी सिनेमाजगत में अपनी अलग पहचान बनाने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को आज भी दर्शक फिल्मों में देखना पसंद करते हैं. वे सिर्फ एक अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि डांसिंग दीवा भी हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में दी हैं, जिन में ‘तेजाब’, ‘रामलखन’, ‘त्रिदेव’, ‘बेटा’, ‘खलनायक’, ‘कोयला’, ‘देवदास’, ‘मृत्युदंड’, ‘डेढ़ इश्किया’, ‘गुलाब गैंग’ आदि प्रमुख हैं. उन्होंने बचपन से कत्थक डांस सीखा है और आज भी कई फिल्मों और डांस रिऐलिटी शोज में परफौर्म करती देखी जाती हैं.

जब माधुरी कैरियर के शिखर पर थीं, तब उन्होंने अमेरिका में रहने वाले डा. श्रीराम माधव नेने से शादी की और वहां चली गईं. फिर 2 बच्चों आरिन और रयान की मां बनीं. करीब 10 साल साधारण गृहिणी की तरह जीवन बिताया. फिर 2011 में माधुरी मुंबई आ गईं. फिल्म ‘आ जा नच ले’ से दूसरी पारी शुरू की, जो अधिक सफल नहीं रही. फिल्मों से अधिक वे विज्ञापनों और रिऐलिटी शोज में देखी जाती हैं.

हंसमुख और नम्र स्वभाव की माधुरी कभी तनाव नहीं लेतीं. फिर से अभिनय के क्षेत्र में आने का श्रेय वे अपने पति को देती हैं, जो हमेशा उन का साथ देते हैं. माधुरी को जब भी समय मिलता है, बच्चों के साथ बिताती हैं. यही वजह है कि आज वे एक सफल अभिनेत्री होने के साथसाथ एक सफल पत्नी और मां भी हैं. उन से हुई बातचीत इस प्रकार है:

आजकल फिल्मों में अधिक न दिखने की क्या वजह है  क्या महिलाओं को आज भी फिल्मों में काम मिलना मुश्किल हो रहा है?

मैं 2 सालों से स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं. अभी तक कोई पसंद नहीं आई है. मैं खुश हूं कि आजकल महिलाओं को केंद्र मान कर फिल्में बनाई जा रही हैं. दर्शक भी उन्हें पसंद कर रहे हैं. पहले महिलाओं को केवल ऐक्टिंग और मेकअप के काम में देखा जाता था. आज की महिलाएं फिल्में लिखना और बनाना दोनों काम कर रही हैं, जो अच्छी बात है. आज की महिला कोई विक्टिम नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में आगे है.

परिवार के साथ काम कैसे संभालती हैं?

शादी से पहले जिंदगी अलग थी. तब मैं केवल अपनेआप तक ही सीमित थी. लेकिन जब शादी हुई और बच्चे हुए तो जिंदगी ने अलग करवट ली. असल में मेरा एक सपना था, जिस में पति और बच्चे शामिल थे. जब वह पूरा हुआ तो आगे सोचने वाली कोई बात नहीं रही. जब मैं अमेरिका में थी, तो घरेलू महिला की तरह सब काम किया करती थी. जब मुंबई आई, तो बच्चे थोड़े बड़े हो चुके थे. ऐसे में पति का साथ सब से अधिक मिला. पहले तो मुझे डर था कि पता नहीं बच्चे यहां के माहौल में ऐडजस्ट कर पाएंगे या नहीं, क्योंकि वहां का रहनसहन और स्कूल सब अलग थे. पहले तो बच्चे घर से निकलना नहीं चाहते थे, पर धीरेधीरे उन्होंने तालमेल बैठा लिया. अभी हम दोनों ने अपना काम बांट लिया है. जिसे जब समय मिलता है बच्चों को संभाल लेता है.

क्या आप के बच्चे आप की फिल्में देखते हैं?

उन्हें मेरी फिल्में पसंद नहीं आतीं. एक बार मेरा एक बेटा ‘कोयला’ फिल्म देख रहा था. उसे मेरा अभिनय जरा भी पसंद नहीं आया. अत: उस ने नोट लिख छोड़ा था कि आप इतना खराब अभिनय क्यों करती हैं  लेकिन उन्हें मेरे डांस के कार्यक्रम बहुत पसंद हैं.

आप बच्चों के साथ कितना समय बिता पाती हैं?

बच्चे मेरी खुशी हैं. उन के साथ जब भी समय मिलता है हंसती हूं, बातें करती हूं, खेलती हूं. कब कैसे करती हूं, पता नहीं चलता. घर पहुंच कर जैसे ऐनर्जी दोगुनी हो जाती है.

बच्चों की ग्रोथ में किस बात का ध्यान रखती हैं?

अभी तो वे छोटे हैं, पर इतना ध्यान जरूर रखती हूं कि उन्हें जो अच्छा लगे वह करें. मुझ पर कभी कोई पाबंदी नहीं थी, इसलिए मैं भी उन्हें पूरी आजादी देती हूं.

अब हुआ रैंसमवेयर ‘वानाक्राई’ से भी बड़ा अटैक

पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाले रैंसमवेयर 'वानाक्राई' के बाद अब एक नए वाइरस का पता चला है. एक ग्लोबल साइबरसिक्यॉरिटी फर्म ने दावा किया है कि एक और साइबर अटैक हुआ है और इसका प्रभाव वानाक्राई से भी ज्यादा है. सिक्यॉरिटी फर्म का कहना है कि यह नया वाइरस उन्हीं खामियों का फायदा उठाता है जिनके जरिए वानाक्राई रैनसमवेयर अटैक कर रहा है.

शुक्रवार को वानाक्राई अटैक का पता चलने के बाद 'प्रूफपॉइंट' के रिसर्चर्स ने पाया कि इसके साथ एक और वाइरस अटैक हुआ है. इस कंप्यूटर सिक्यॉरिटी फर्म में रिसर्चर निकलस गोडियर ने कहा कि इस वाइरस का नाम Adylkuzz है. उन्होंने कहा कि NSA ने जिन हैकिंग टूल्स की पहचान की है, यह वाइरस उन्हीं को इस्तेमाल करता है. नया वाइरस न सिर्फ खामोशी से काम करता है बल्कि इसे बनाने का मकसद भी अलग है.

रिसर्चर्स का कहना है कि यह वाइरस इन्फेक्टेड कंप्यूटर को पूरी तरह से डिसेबल करने या फिर डेटा को एनक्रिप्ट करके फिरौती मांगने के बजाय वर्चुअल करंसी 'Monero' की 'माइन' को इन्फेक्ट करता है और सारी करंसी को वाइरस बनाने वालों के पास ट्रांसफर कर देता है.

Monero और Bitcoin जैसी वर्चुअल करंसीज ट्रांजैक्शंस को रिकॉर्ड करने के लिए वॉलन्टियर्स के कंप्यूटर्स को इस्तेमाल करती हैं. इन कंप्यूटर्स को करंसी के लिए 'mine' कहा जाता है और कई बार इन ट्रांजैक्शंस के बदले वॉलंटियर्स को कुछ हिस्सा ईनाम के तौर पर दिया जाता है. यह वाइरस रिवॉर्ड के रूप में मिली इसी वर्चुअल करंसी को उड़ा रहा है.

प्रूफप्वॉइंट (Proofpoint) ने ब्लॉग में लिखा है कि इस वाइरस का अटैक होने पर विंडोज रिसोर्सेज को ऐक्सेस करने में दिक्कत आती है, साथ ही सर्वर और कंप्यूटर की परफॉर्मेंस घट जाती है. इन संकेतों को बहुत से कंप्यूटर यूजर्स तुरंत नोटिस कर सकते हैं. ब्लॉग में कहा गया है कि चूंकि यह चुपके से काम करता है, इसलिए Adylkuzz अटैक साइबर क्रिमिनल्स के लिए बहुत फायदेमंद है. यह इन्फेक्टेड यूजर से चुपके से पैसे कमाता रहता है.'

प्रूफप्वॉइंट का कहना है कि उसने ऐसी मशीनों की पहचान की है जिनसे हजारों डॉलर्स के Monero इस वाइरस को बनाने वालों के पास भेजे गए हैं. फर्म का मानना है कि यह वाइरस 2 मई से ऐक्टिव है या शायद 24 अप्रैल से, मगर चुपके से काम करने की वजह से इसके बारे में पता नहीं चला. प्रूफपॉइंट के ईमेल प्रॉडक्ट्स के वाइस प्रेजिडेंट का कहना है, 'हमें नहीं पता कि इस वाइरस ने कितने लोगों को प्रभावित किया है मगर इसका प्रभाव वानाक्राई से तो ज्यादा ही है. हमने ऐसे मामले पहले भी देखे हैं कि मगर इतने बड़े पैमाने पर कभी नहीं.'

गौलतलब है कि वानाक्राई रैंसमवेयर विंडोज की जिन खामियों का फायदा उठाकर लोगों को टारगेट कर रहा था, उन खामियों को दूर करने के लिए माइक्रोसॉफ्ट ने सिक्यॉरिटी पैच जारी किए हैं. विंडोज एक्सपी, 7 और 8 यूजर्स को तुरंत अपना सिस्टम अपडेट करना चाहिए या फिर माइक्रोसॉफ्ट के सपॉर्ट पेज पर जाकर सिक्यॉरिटी पैच डाउनलोड करके इंस्टॉल कर लेना चाहिए. साथ ही ध्यान रखना चाहिए कि संदिग्ध ईमेल्स या अटैचमेंट्स को ओपन करना खतरनाक हो सकता है.

योगी सरकार की गायब हुई ‘हनक’

उत्तर प्रदेश में अपराध हर सरकार के लिये बडा मुद्दा रहा है. भाजपा ने भी ‘कानून के राज’ के नाम पर विधानसभा का चुनाव लड़ा. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने अपराध कम करने का पहला वादा किया था. बहुत सारे बदलाव के बाद भी जब योगी सरकार की ‘हनक’ कायम होती नहीं दिखी, तो जनता सड़कों पर उतर कर अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है. जनता में फैलता यह संदेश योगी सरकार के खिलाफ जा रहा है. इससे योगी की छवि को धूमिल करने की कोशिश भी हो रही है. राजधानी लखनऊ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी और कृष्ण की नगरी मथुरा सभी अपराध के दर्द से कराह रहे हैं.

राजधानी लखनऊ में पावर विंग ने तमाम संगठनों और लोगों के साथ मिलकर 1090 चैराहे पर प्रदर्शन किया. पावर विंग की अध्यक्ष सुमन रावत ने कहा कि ‘अपराध पर रोक लगनी ही चाहिये. जिस तरह से हत्या, बलात्कार, लूट और चोरी की घटनाओं का खुलासा नहीं हो रहा और घटनायें बढ़ रही हैं, इससे जनता में योगी सरकार के खिलाफ गलत मैसेज जा रहा है’ चैतन्य वेलफेयर फांउडेशन की ओम कुमारी सिंह ने कहा कि अपराध करने वालों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कड़ी कानूनी सजा दी जाये. इन प्रदर्शन करने वालों का मानना था कि महिला अपराधों के खिलाफ त्वरित कार्यवाई की जाये.

अप्रैल माह में प्रधानमंत्री की लोकसभा सीट वाराणसी में सीताराम सर्राफ के यहां शहर की सबसे बड़ी चोरी हुई. इसमें 12 किलो सोना चोरी चला गया. पुलिस पर मामलें को खोलने का दवाब पड़ने लगा. पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा, उनसे मात्र 1 किलो सोना ही मिला. सीताराम सर्राफ के परिजन इस खुलासे से संतुष्ट नहीं हैं. ऐसे में वह पुलिस के हर अफसर तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं. सीताराम सर्राफ के परिजनो में नुपूर अग्रवाल कहती है ‘पुलिस ने जिस तरह से मामले को खोला है अब उस पर यकीन करना संभव नहीं है. अगर सही लोग पकड़े गये होते तो पूरा माल बरामद हो जाता. पुलिस अब सीताराम सर्राफ के परिजनों को ही गलत तहरीर देने की बात कह रही है. पुलिस का मानना है के सीताराम सर्राफ के परिजनों ने ज्यादा सोना चोरी होने की बात लिखवाई थी.

सर्राफा दुकानों पर चोरी की यह पहली घटना नहीं है. लखनऊ और मथुरा में भी इस तरह की घटनाये घट चुकी हैं. सर्राफा कारोबारियों पर हो रहे जानलेवा हमलों, लूट और चोरी की घटनाओं के विरोध में 19 मई को सर्राफा बाजार बंद रहेंगे. लखनऊ सर्राफा एसोसिएशन के वरिष्ठ महामंत्री प्रदीप कुमार अग्रवाल ने बताया कि मथुरा में हुई सर्राफा कारोबारी के साथ लूट और हत्या को लेकर पूरे समाज में गुस्सा है. पुलिस लूट और चोरी की घटनाओ को दबाने का काम कर रही है. जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं और उनका साहस बढ़ कर हत्या तक पहुंच जा रहा है. सर्राफा कारोबारी विनोद माहेश्वरी ने कहा कि सरकार ने प्रदेश में कानून का राज कायम करने की जो बात कही थी उसमें वह असफल हो रही है.  

              

आईपीएल 10 के 5 पांच सबसे बेहतरीन युवा बल्लेबाज

आईपीएल 10 अपने अंतिम पड़ाव पर है. टीम राइजिंग पुणे सुपरजायंट्स फाइनल में पहुंच चुकी है. एलिमिनेटर मैच भी हो चुका है. अब 19 मई को कोलकाता नाइटराइडर्स और मुंबई इंडियंस के बीच दूसरा क्वालिफायर होने वाला है. 21 मई को आईपीएल 10 का विनर घोषित किया जाएगा.

अगर इन्हीं क्वालिफायर के बीच हम टूर्नामेंट में पीछे मुड़कर देखें तो पता चलता है कि कई भारतीय युवाओं ने इस टूर्नामेंट में कमाल दिखाया. तो आइए आपको आईपीएल 2017 के सबसे बेहतरीन युवाओं से रूबरू कराते हैं.

ऋषभ पंत

मौजूदा टूर्नामेंट के शुरुआत के पहले ऋषभ पंत के पिता का निधन हो गया लेकिन इसके बावजूद पंत ने अंतिम संस्कार करने के एक दिन बाद ही टीम (दिल्ली डेयरडेविल्स) में वापसी की और पहले ही मैच में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के खिलाफ अर्धशतक जड़ दिया.

इस दौरान वह सकारात्मक रवैए में आतिशी बल्लेबाजी के पूरे मूड में नजर आए और दर्शकों को अपनी बेहतरीन बल्लेबाजी से इंटरटेन करने में उन्होंने कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी. इस दौरान उन्होंने केकेआर के अनुभवी गेंदबाज उमेश यादव के ओवर में 26 रन ठोंके और जिस तरह के उन्होंने स्ट्रोक जड़े उसको लेकर खूब तारीफ बटोरी.

हालांकि, पंत इस दौरान खराब फॉर्म से भी गुजरे. वह तीन बार शून्य और दो बार छोटे स्कोर पर आउट हुए लेकिन जिस अंदाज में उन्होंने बैटिंग की उन्होंने जता दिया कि भविष्य में वह टीम इंडिया के स्टार बनने वाले हैं.

उनकी सबसे बेहतरीन पारी गुजरात लायंस के खिलाफ आई जब उन्होंने 43 गेंदों में 97 रन ठोंक डाले. इस दौरान उन्हें मैन ऑफ द मैच ही नहीं मिला बल्कि सचिन तेंदुलकर ने ये तक कह डाला कि ये उनके हिसाब से यह अबतक कि आईपीएल की सबसे बेहतरीन पारी है.

संजू सैमसन

22 साल के संजू सैमसन के पास पहले से ही थोड़ा आईपीएल का अनुभव था. पहले राजस्थान के लिए खेलने के बाद बाद में साल 2016 में दिल्ली डेयरडेविल्स से जुड़ने वाले संजू सैमसन ने मौजूदा सीजन में दिल्ली की और से खेलते हुए अपनी कुछ बेहतरीन पारियों की बदौलत सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा. भले ही उन्हें उभरता हुआ सितारा न कहा जाए लेकिन उन्होंने अपनी निरंतरता पर काम जरूर किया है.

सैमसन ने मौजूदा सीजन में कुछ बढ़िया पारी खेली हैं और पहले सीजनों के उलट उन्होंने निरंतरता दिखाई जो उनकी बल्लेबाजी में एक अच्छा परिवर्तन है. टूर्नामेंट में 386 रन (1 शतक और दो अर्धशतक), 141.39 के स्ट्राइक रेट के साथ सैमसन टूर्नामेंट में एक बड़े बल्लेबाज के रूप में निखरे हैं.

श्रेयस अय्यर

दिल्ली डेयरडेविल्स भले ही प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई न कर पाई हो लेकिन उनके युवा खिलाड़ी खूब चमके हैं. ऋषभ और सैमसन की ही तरह अय्यर ने भी दिल्ली डेयरडेविल्स टीम में अपना चुनाव सही ठहराया है. साल 2015 में वह डीडी की ओर से सर्वोच्च रन बनाने वाले खिलाड़ी रहे थे. इस सीजन में भी अय्यर खूब चमके.

33.8 के औसत के साथ अय्यर ने दो अर्धशतक जमाए और अपने विश्वास वाले शॉट्स से विपक्षी टीम को भौंचक्का छोड़ दिया. उन्होंने जिस तरह से गुजरात लायंस के खिलाफ 57 गेंदों में 96 रन ठोंके वह गजब का प्रदर्शन था. उन्होंने कई मैचों में मध्यक्रम से लेकर अंतिम ओवर तक बल्लेबाजी की. राहुल द्रविड़ की भी युवाओं को निखारने के लिए तारीफ की जानी चाहिए.

राहुल त्रिपाठी

महाराष्ट्र के बल्लेबाज राहुल त्रिपाठी को इस सीजन के पहले कोई नहीं जानता था. लेकिन जैसे ही उन्होंने आईपीएल 10 में राइजिंग पुणे सुपरजायंट्स की टीम में एंट्री की वैसे ही इस दाहिने हाथ के बल्लेबाज की बेहतरीन बल्लेबाजी का असर चारों तरफ देखने को मिला. उन्होंने लगातार मैचों में रनों का अंबार लगाया और पावरप्ले में तेजी से रन बनाए. अब तक उनके नाम चार बार 30 से ज्यादा और एक बार 40 से ज्यादा का स्कोर है. इस दौरान उन्होंने कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ शानदार 95 रनों की पारी खेली.

जिस तरह से उन्होंने कदमों का इस्तेमाल किया और गेंदबाजों की लेंथ को पहचाना उस से उन्होंने सभी का अपना ध्यान अपनी ओर खींचा. वह अपनी पारी के दौरान अक्सर बेहतरीन टाइमिंग वाले कट, पुल और कवर ड्राइव लगाते हैं. यही कारण है कि जबसे वह टीम में आए हैं आरपीएस एक अच्छा स्कोर खड़ा करने में कामयाब हो जाती है.

ईशान किशन

टीम इंडिया की अंडर-19 टीम के कप्तान रहे ईशान किशन इस साल भी गुजरात लायंस की ओर से खेले. 11 मैचों में विकेटकीपर बल्लेबाज ने 134.46 के स्ट्राइक रेट से 277 रन बनाए. किशन की बल्लेबाजी की सबसे बेहतरीन बात यह रही कि उन्होंने अपनी टीम को अच्छी शुरुआत दिलवाई.

किशन ब्रैंडन मैक्कलम और ड्वेन स्मिथ जैसे बड़े बल्लेबाजों के साथ खेले और इस दौरान उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले. इस दौरान उनका सर्वोच्च स्कोर 61 का रहा लेकिन जिस अंदाज में उन्होंने पुल स्ट्रोक खेले वह जबरदस्त रहा.

गायब हुए असली मुद्दे

सरकारें अब एक नया रास्ता अपना रही हैं, दिल्ली की केंद्र सरकार भी और राज्यों की सरकारें भी. अब गरीबों की कोई बात नहीं हो रही है. अब नौकरियों की बात नहीं हो रही है. अब ऊंचनीच के भेदभाव को खत्म करने की बात परदों के पीछे चली गई है. किसानों के लिए नहरों को बनवाने की योजनाओं को शुरू करने के पत्थर नहीं रखे जा रहे हैं. औरतों को मर्दों के जुल्मों से बचाने की बातें सरकारें नहीं कर रही हैं, महिला आयोग की 5-10 औरतों पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी गई है.

अब तो हल्ला मच रहा है देशभक्ति का. वंदेमातरम गाओ, शायद पेट भर जाए. योग करो, ताकि टूटी झुग्गी बन जाए. तिरंगा लहराओगे तो नहर में पानी आ जाएगा. गंगा में डुबकी लगाओगे, तो नौकरी लग जाएगी. गाय को लाने व ले जाने वालों की जीभर के पिटाई कर दो, तो भूखे नहीं रहना पड़ेगा.

अब बड़ेबड़े इश्तिहार छप रहे हैं कि देखो धर्म की जगह को पांचसितारा होटल की तरह का बना दिया गया है. अब गरीब बीमार ही नहीं पड़ेंगे. अब मंचों से पिछली सरकारों को कोसा जाता है कि शायद इस से चमत्कार हो जाएगा और बस्ती की बदबू भी विरोधी दलों की तरह गायब हो जाएगी.

इस बदलती तसवीर से देश की 49 फीसदी भूखी जनता के पेट भरेंगे. दुनिया के सब से ज्यादा गरीब यहीं हैं और इसी देश में आजादी के 70 साल बाद भी वैसे से ही हालात हैं और बातें हो रही हैं देशभक्ति की, मंदिर की, मसजिद की. विकास की बातें हो रही हैं, पर उस में बड़े हवाईअड्डों की बातें होती हैं. रेल में भी ह्वाट्सऐप से खाना बुक करने की बात करते हैं. गंगा मंत्री नदियों के घाटों को बनवाने की बातें करती हैं. वित्त मंत्री टैक्स का फंदा हर गले में डालने के नए कानून की बात करते हैं.

हल्ला मचाया जा रहा है कि काला धन हटाएंगे मानो गरीबों के पास, जो 2-4 हजार रुपए पड़े हैं, वे काले हैं. सरकारों को फिक्र पड़ी है कि कोई भी टैक्स देने से छूट न जाए. वह यह नहीं बता सकती कि आए टैक्स का होता क्या है?

हां, पिछले 70 सालों में बहुत बदलाव आया है. पर यह बदलाव तो उस से पहले के 70 सालों में भी आया था, जब अंगरेजों के राज में रेलें चलीं, डाक सेवा चली, सड़कें बनीं, बसें चलीं, स्कूल खुले, अस्पताल खुले, कारखाने खुले. इन 70 सालों में और पहले के 70 सालों में जो हुआ, वह सरकार की मेहरबानी से नहीं, तकनीकी ईजाद से हुआ.

आज हर घर में टैलीविजन है और हर हाथ में मोबाइल है तो इसलिए कि यह तकनीक बनी, पर यह इस देश की सरकारों की उपज नहीं है. हमारी सरकारें तो कभी समाजवाद लाओ, गरीबी हटाओ की बातें करती रहीं, तो कभी मंदिर बनाओ, गौ बचाओ की. देश बनाना है तो मेहनत करनी होगी और मेहनती को मौका देना होगा. पर सरकारों को नारों से फुरसत हो तो न.

हमेशा मुस्कुराने वाली रीमा लागू नहीं रहीं

बॉलीवुड और टीवी जगत की मशहूर अदाकारा और सेल्यूलाइड के परदे की लोकप्रिय प्यारी मां का किरदार निभा चुकी रीमा लागू अब इस दुनिया में नहीं रहीं. सेल्यूलाइड के परदे की सलमान खान की मां के रूप में जाने जानी वाली रीमा लागू का 59 वर्ष की उम्र में आज तड़के 3 बजकर 15 मिनट पर हृदयाघात (हार्ट अटैक) के चलते मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में देहांत हो गया. आज दोपहर 2 बजे मुंबई के ओशिवरा शमशान भूमि में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

मूलतः महाराष्ट्रियन यानी मराठी भाषी रीमा लागू ने मराठी व हिंदी दोनो ही भाषाओं की फिल्मों में अभिनय कर अपनी एक अलग पहचान बनायी थी. सलमान खान की कई फिल्मों में उनकी मां का किरदार निभा चुकी रीमा लागू ‘मैंने प्यार किया’, ‘आशिकी’, ‘साजन’,‘हम आपके हैं कौन’, ‘वास्तव’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘हम साथ साथ हैं’, ‘जिस देश मे गंगा रहता है’, जैसी कई फिल्मों में यादगार अभिनय के कारण सदैव याद की जाती रहेंगी.

रीमा लागू ने यूं तो टीवी पर भी काफी काम किया था. मगर सचिन पिलगांवकर निर्देशित टीवी पर सीरियल ‘‘तू तू मैं मैं’’ में सास बहू की लड़ाई लोगों को बहुत पसंद आती थी. इसमें रीमा लागू ने सास की भूमिका निभायी थी, जबकि बहू के किरदार में सुप्रिया पिलगांवकर थी.

रीमा लागू को अभिनय विरासत में मिला था. 1958 को मुंबई में जन्मी रीमा लागू की मां मंदाकिनी भड़भड़े थिएटर की अति मशहूर अभिनेत्री थीं. पुणे के एचएचसीपी हाई स्कूल से हाईस्कूल तक की पढ़ाई करने बाद ही अभिनय के फितूर के चलते पढ़ाई छोड़ कर रीमा लागू ने स्टेज पर अभिनय करना शुरू कर दिया था.

80 के दशक की शुरुआत में उन्होंने हिंदी व मराठी फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया था. अब तक वह 90 फिल्मों में अभिनय कर चुकी थीं. 1980 में फिल्म ‘आक्रोश’ में उन्होंने डांसर का किरदार निभाया था. जबकि 1984 में ‘ये दिल्लगी’ में एक बिजनेस वुमन के किरदार में उन्हें काफी शोहरत मिली. रीमा लागू ने मराठी भाषी अभिनेता विवेक लागू के साथ शादी की थी. पर यह विवाह ज्यादा समय तक टिका नहीं. रीमा लागू की अपनी एक बेटी मृणमयी लागू है, जो कि मशहूर थिएटर निर्देशक हैं.  

1988 में फिल्म ‘‘कयामत से कयामत तक’’ में जुही चावला की मां का किरदार निभाकर वह चर्चा में आयी थीं. 1988 में ही अरूणा राजे निर्देशित फिल्म ‘रिहाई’ में उन्होंने अति विवादास्पद किरदार भी निभाया था. इसके दूसरे वर्ष 1989 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘मैंने प्यार किया’’ में सलमान खान की मां का किरदार निभाकर वह रातों रात छा गयी थीं. इस फिल्म ने उन्हें जो शोहरत दिलायी, वह बिरले चरित्र अभिनेता को ही नसीब हो पाती है. इस फिल्म के कारण वह आज भी याद की जाती हैं.

वैसे तो उन्होंने 1993 में प्रदर्शित फिल्म ‘गुमराह’ में श्री देवी तथा 1994 में प्रदर्शित ‘जयकिशन’ में अक्षय कुमार की मां, 1999 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘वास्तव’’ में संजय दत्त की मां के भी किरदार निभाकर शोहरत बटोरी, पर सलमान खान की मां के रूप में उनकी एक पहचान बन गयी थी. उन्होंने सेल्यूलाइड के परदे पर निःस्वार्थ प्यार व ममतामयी मां, त्याग की मूर्ति मां, संघर्ष करने वाली मां के किरदारों को अपने अभिनय से एक पहचान दी.

रीमा लागू ने कई बेहतरीन मराठी फिल्में भी की. इनमें से फिल्म ‘‘बिनधास्त’’ से उन्हें काफी शोहरत मिली.

रीमा लागू के निधन पर फिल्म व टीवी कलाकार अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं. फिल्म अभिनेता रिषि कपूर ने ट्वीटर पर लिखा है कि, ‘वह मेरी अच्छी दोस्त थी. हमने एक साथ कुछ फिल्में की थीं. मेरी हार्दिक संवेदना..’’

टीवी कलाकारों में से सचिन श्राफ, निवेदिता बसु, कीथ सिक्वेरिया, श्रुति सेठ, अनूप सोनी, मानसी सालवी, मनीष पॉल, रागिनी खन्ना, दिव्यंका त्रिपाठी दहिया, विवेक दहिया आदि ने भी ट्वीटर प अपना दुःख व्यक्त किया है.

वह लगातार काम कर रही थीं. हार्ट अटैक आने से पहले तक वह पूर्णरूपेण स्वस्थ थीं. काफी लंबे समय बाद रीमा लागू ने टीवी पर वापसी करते हुए सितंबर 2016 से ‘स्टार प्लस’ पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘नामकरण’’ में दयावंती का किरदार निभाती आ रही थीं. यह सीरियल अभी भी प्रसारित हो रहा है. मगर अब अचानक रीमा लागू के निधन के बाद ‘नामकरण’ में दयावंती के किरदार को निभाने के लिए अन्य अदाकारा की तलाश शुरू होगी. अब तक वह नौ टीवी सीरियलो में नजर आयीं.

इन दिनों ‘‘स्टार प्लस’’ पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘नामकरण’’ में सवाल उठाया गया है कि हर महिला की पहचान पहले उसके पिता, फिर उसके पति के नाम के साथ ही होती है. एक स्त्री अपने नाम से क्यों नहीं पहचानी जाती. आखिर इसमें बदलाव कैसे आएगा. इस पर बात करते हुए रीमा लागू ने कहा था, ‘‘इसके लिए पहले महिलाओं को ही पहल करनी होगी. उसके बाद परिवार व समाज को उनका साथ देना होगा. तभी हर स्त्री को उनके अपने नाम के साथ पहचान मिल सकेगी.’’

गुलाब से दिखें गुलाबी

प्यार का प्रतीक माने जाने वाले गुलाब से न सिर्फ आप अपने प्रियतम को प्रपोज कर सकती हैं बल्कि आप इस से अपना रंगरूप भी निखार सकती हैं. इस संबंध में जानें एल्पस ब्यूटी क्लीनिक ऐंड एकैडमी की डायरैक्टर भारती तनेजा से.

–       गुलाब की पत्तियों को कुछ घंटे तक धूप में सुखा कर पानी में उबाल लें. जब पानी आधा रह जाए तब इसे छान कर एक बोतल में रख लें. इस प्राकृतिक टोनर को फ्रिज में रखें और दिन में 2 बार रूई की मदद से स्किन टोन करें.

–       होंठों की रंगत को गुलाबी करने के लिए मलाई में गुलाब की पंखडियां मिलाएं और इस पेस्ट को लिप पैक की तरह अपने होंठों पर रात में सोने से पहले लगाएं. सुबह उठ कर लिप्स को पानी की मदद से साफ करें. इस पैक में शामिल मलाई से लिप्स पोषित होंगे तो वहीं गुलाब की लालिमा से खिल भी उठेंगे.

–       गुलाब की पत्तियों का प्रयोग नहाने के पानी में भी किया जा सकता है. इस के लिए नहाने के पानी में रात भर गुलाब की पत्तियां डाल दें और सुबह इस से एरोमैटिक बाथ करें. ऐसा करने से पूरा दिन फ्रैशनैस बनी रहेगी और आप से भीनीभीनी खुशबू भी आती रहेगी. 

–       पानी में गुलाब की पंखडि़यां डाल कर उस में अपने पैरों को डाल कर भिगो दें. इस से पैरों को न केवल आराम मिलता है बल्कि उन की सुंदरता में भी निखार आता है.

–       आंखों को चमकदार बनाने और उन की थकान दूर करने के लिए आप रूई को गुलाबजल में भिगो कर उस का प्रयोग आंखों के ऊपर भी कर सकती हैं. यह आंखों की सूजन को कम करने में मदद करता है.

–       गुलाब में मौजूद ऐंटीबैक्टीरियल गुण एक्ने को दूर करने में लाभदायक होते हैं. इन पत्तियों से त्वचा की जलन दूर होती है और रैडनैस भी कम होती है. इस की पत्तियों को पानी में भिगोएं और पेस्ट बना कर चेहरे पर लगाएं. 15 मिनट के लिए छोड़ दें और फिर सादे पानी से मुंह धो लें. बेहतर परिणाम के लिए ऐसा हफ्ते में 3 बार करें.

–       ड्राई स्किन है तो गुलाब की पत्तियों को दूध में भिगो कर पेस्ट बनाएं. फिर इस में थोड़ा सा शहद मिला कर फेस पर लगाएं. कुछ देर बाद कुनकुने पानी से फेसवाश कर लें.

–       गुलाब जल की खासीयत है कि इस का प्रयोग हर प्रकार की स्किन यहां तक कि सैंसेटिव स्किन पर भी किया जा सकता है.

औवरनाइट मेकअप के बैड इफैक्ट्स

मेकअप को युवतियों की सैकंड स्किन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. हर उम्र की युवती या महिला ग्लैमरस, यंग, सैक्सी नजर आने के लिए मेकअप करती है, लेकिन इस बात से अनजान रहती है कि दिनभर किए मेकअप को हटाना भी बहुत जरूरी है वरना इस से स्किन को नुकसान पहुंच सकता है. अगर आप भी मेकअप रिमूव करने में कोताही बरतती हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि इस से आप को नुकसान हो सकता है, आइए जानें :

ओवरनाइट मेकअप हेयर फौलिकल्स को कर सकता है ब्लौक

अगर बिना मेकअप हटाए सो जाना आप की आदत है तो आप अपनी पलकों की हेयर फौलिकल्स व औयल ग्लैंड्स को ब्लौक करने का पूरा इंतजाम कर रही हैं.

जब आंखों या पलकों का एरिया बंद हो जाता है तब बैक्टीरिया पनपते हैं और सूजन व जलन का कारण बनते हैं. परिणामस्वरूप स्मौल बंपस बन जाते हैं.

हालांकि इन से छुटकारा मिल सकता है मगर इस के लिए ऐक्सपर्ट डाक्टर से ट्रीटमैंट लेने की जरूरत होती है, लेकिन कहते हैं न कि प्रिवैंशन इज बैटर दैन क्योर, तो आप भी वही करिए न.

ओवरनाइट मेकअप से पड़ सकते हैं रिंकल्स

उम्रदराज नजर आना एक निश्चित अवश्यंभावी प्रक्रिया है, लेकिन फिर भी आप उन फैक्टर्स को टालना जरूर चाहेंगी जिन की मौजूदगी ऐजिंग प्रोसैस को बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाती हो. बिना प्रौपर मेकअप रिमूवल के सो जाना ऐसा ही उत्प्रेरक है.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट्स के मुताबिक जब आप मेकअप नहीं हटाते तो दिनभर के प्रदूषित वातावरण में मौजूद फ्री रैडिकल्स आप की स्किन पर ही रह जाते हैं. ये फ्री रैडिकल्स कोलेजन बे्रकडाउन का कारण बनते हैं और इन सब का मिलाजुला असर प्रीमैच्योर एजिंग स्किन और आंखों और होंठों के आसपास फाइन लाइंस के बढ़ते जमावड़े का कारण बनता है.

आंखों पर बुरा असर

मसकारा, आईलाइनर, आईशैडो और काजल का नियमित प्रयोग और हमेशा रात को आई मेकअप को हटाए बिना सो जाना आंखों की सेहत के साथ खिलवाड़ साबित हो सकता है. वैसे तो सभी मेकअप प्रोडक्ट्स में कैमिकल्स होते हैं पर आई मेकअप में मौजूद कैमिकल्स ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं, क्योंकि ये आंखों के डायरैक्ट टच में आते हैं. आई मेकअप लगाए रखने से आंखों में सिस्ट भी बन सकती है, इसलिए सावधान हो जाएं.

एक्ने, ब्लैकहैड्स, स्किन डलनैस

हम अपनी स्किन प्रौब्लम्स को दूर करने के लिए अपना काफी समय व पैसा खर्च करते हैं किंतु प्रौपर केयर न करने की वजह से हमारे सारे प्रयास असफल हो जाते हैं. रातभर मेकअप लगाए रखने से कई सारी स्किन प्रौब्लम्स होती हैं जैसे रोमछिद्रों का बंद हो जाना, जिस की वजह से ‘माइक्रोकोमेडान’ का बनना जो एक्ने के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया को आकर्षित करता है.

 फाउंडेशन और औयल बेस्ड प्राइमर की चेहरे पर रातभर मौजूदगी से स्किन रिजुविनेटिंग की प्रक्रिया में बाधा आती है.

अन्य समस्याएं

मेकअप किए चेहरे के साथ रात गुजारने का बुरा प्रभाव हमारी स्किन पर पड़ता है. अगर हम मसकारा की थिक कोटिंग को सही तरीके से नहीं हटाते तो आईलैशेज ड्राई हो जाती हैं व ज्यादा तेजी से टूटती हैं और हलकी रह जाती हैं.

बिलकुल ऐसा ही असर लिप्स की स्किन पर भी पड़ता है. लिपस्टिक में मौजूद हानिकारक रसायन लिप्स की नमी को सोख लेते हैं, जिस से होंठ रूखे,  दरारयुक्त हो जाते हैं. साथ ही एलर्जी भी हो सकती है.            

देखें कैसे ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज करने लगे अंडरआर्म गेंदबाजी

जेंटलमैन गेम के नाम से मशहूर खेल क्रिकेट का अपना ही रोमांच व मजा है. क्रिकेट के खेल में खेल भावना होना बेहद जरुरी है. जीत हो या हार खिलाड़ियों को अपना खेल पूरी ईमानदारी से खेलना चाहिए.

लेकिन कभी-कभी कुछ क्रिकेटरों के शर्मनाक हरकतों के कारण इस खेल को शर्मिंदा होना पड़ता है. अपनी हरकतों के कारण इन्हें पुरे क्रिकेट जगत में शर्मिंदा होना पड़ता है और इन्हीं हरकतों के कारण ये हमेशा याद भी किये जाते हैं.

कुछ ऐसा ही हुआ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए मैच में. दरअसल 1 फरवरी 1981 को बेंसन हेजेस सीरीज का तीसरा फाइनल मैच चल रहा था. सीरीज में पहला मैच न्यूजीलैंड के नाम रहा था तो वहीं दूसरा ऑस्ट्रेलिया के नाम.

ग्रेग चैपल ऑस्ट्रेलिया के कप्तान थे और उन्होंने इस मैच में 90 रनों की पारी खेलकर अपनी टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाया था. पहले बैटिंग कर ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड के सामने 236 रनों का लक्ष्य रखा. जवाब में उतरे कीवी ओपनर ब्रूस एडगर ने शतक लगाया और अकेले अपने दम पर टीम को जीत की दहलीज तक ले गए.

बस यहीं पर ग्रेग चैपल ने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी वजह से वो आज भी इस मैच के विलेन के तौर पर याद किए जाते हैं. इस मैच में चैपल बंधु खेल रहे थे. ग्रेग के साथ उनके भाई ट्रेवर चैपल, ग्रेग खुद 10 ओवर फेंक कर तीन विकेटें झटक चुके थे और ट्रेवर अंतिम ओवर फेंक रहे थे.

मैच की अंतिम बॉल पर न्यूजीलैंड को जीतने के लिए सात रन चाहिए थे. ग्रेग ने ट्रेवर को सलाह दी कि वो इस बॉल को अंडरआर्म फेंके. अपने बड़े भाई की बात मानते हुए ट्रेवर ने ऐसा ही किया. ट्रेवर ने बॉल को पिच पर लुढ़काते हुए बैट्समैन ब्रायन मेक्नी की तरफ फेंका ब्रायन अवाक रह गए और सीधा खेलते हुए अपने गुस्से को मैदान पर दिखाते हुए बल्ले को जमीन पर फेंक दिया और ट्रेवर के इस तरह की गेंदबाजी को खेल भावना के विरुद्ध बताया.

वैसे न्यूजीलैंड के बैट्समैन के पास छक्का लगाकर मैच बराबर (टाइ) करने का मौका था जो चैपल की इस विवादास्पद अंडरआर्म बॉलिंग ने छीन लिया. फिलहाल इस मैच को ऑस्ट्रेलिया ने 6 रनों से जीत लिया.

इसके बाद चौथा फाइनल जीत कर ऑस्ट्रेलिया ने इस सीरीज को अपने नाम कर लिया. ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल टूर्नामेंट के ‘मैन ऑफ द मैच’ रहे.

इस मैच के बाद इन दोनों खिलाड़ियों की पूरे क्रिकेट जगत में जमकर भर्त्सना हुई थी. क्रिकेट प्रेमियों में उनके खिलाफ नाराजगी थी. चैपल की इस हरकत को क्रिकेट जगत में शर्मनाक घटना के तौर पर देखा जाता है और न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया दोनों के ही प्रधानमंत्री ने इसे खेल भावना के विरूद्ध बताया था. बाद में इस घटना के लिए चैपल बंधुओं ने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी थी.

जब बौस धमकाए…

आज युवाओं की सब से बड़ी समस्या यह है कि वे किसी की नहीं सुनते, उन्हें किसी का ऊंची आवाज में बोलना बरदाश्त नहीं होता. औफिस हो या घर उन्हें तो बस अपने स्टाइल में जीना पसंद है तभी तो यदि बौस उन्हें जरा सी भी कड़क आवाज में कुछ कह देता है तो वे गुस्से से तमतमा जाते हैं. ऐसे में वे बौस को खरीखोटी सुनाने से भी गुरेज नहीं करते. मन ही मन वे जौब छोड़ने तक का फैसला कर बैठते हैं.

लेकिन क्या कभी जब आप को बौस ने धमकाया तब आप ने खुद का आकलन किया कि आखिर बौस ने आप को धमकाया क्यों  क्या वास्तव में आप की गलती थी या फिर मामूली सी बात पर आप को झाड़ दिया. कई बार बौस आप को आगे बढ़ाने के लिए या आप की ग्रोथ के लिए भी डांटते हैं, लेकिन गुस्से में होने के कारण आप उन के भीतर छिपी भावना को नहीं पहचान पाते और इसे बौस की दादागीरी या हुक्म चलाना समझ बैठते हैं.

इसलिए जब भी बौस आप को किसी बात के लिए डांटें तो खुद में तो सुधार लाएं ही साथ ही निम्न बातों को भी नजरअंदाज न करें :

गलती न दोहराएं

एक बार जिस बात के लिए आप को बौस से डांट पड़ी हो अगली बार उस गलती को दोहराने की कोशिश न करें, क्योंकि बारबार गलती करने पर माफी मिले, यह जरूरी नहीं.

यदि बौस ने आप को किसी काम को करने की डैडलाइन दे रखी है तो आप कोशिश करें कि डैडलाइन से पहले ही उस काम को पूरा कर लें, क्योंकि इस से एक तो आप को बौस की नाराजगी नहीं झेलनी पड़ेगी साथ ही आप काम के प्रति सीरियस हैं, यह भी पता चलेगा.

एक बात और, जब हम किसी काम को दबाव या हड़बड़ी में करते हैं तो उस में गलती के चांसेज ज्यादा होते हैं. इस से अच्छा है कि समय पर और सही ढंग से काम पूरा करें.

इस का एक फायदा और भी है कि अगर कभी अचानक किसी जरूरी काम से आप को बाहर जाना पड़े तो आप अपने बौस से काम पूरा होने के कारण छुट्टी मांगने का हक भी रख पाएंगे.

बौस से पड़े डांट तो न करें डिस्कस

गलती होने पर तो बौस की डांट खानी ही पड़ती है, लेकिन कई बार बेवजह डांट भी पड़ती है, जो सहन करनी पड़ती है, इस डांट का हर जगह ढिंढोरा पीटना कि पता नहीं खुद को क्या समझते हैं, मेरी इन्सल्ट कर दी, खुद को तो कुछ आताजाता नहीं वगैरावगैरा कह कर जब आप इस तरह की बातें ग्रुप में शेयर करते हैं तो भले ही उस समय आप के साथ काम करने वाले आप की हां में हां मिला कर आप को सही ठहराएं, लेकिन हो सकता है कि उन में से कोई बौस का खास हो, जो आप से मीठीमीठी बातें कर के सब उगलवा ले, लेकिन बाद में उन्हीं बातों को बौस के सामने मिर्चमसाला लगा कर पेश कर दे जिस से आप की इमेज और खराब हो जाए.

जब बौस भी अपनी ऐसी आलोचना सुनेंगे तो हो सकता है कि आप को सबक सिखाने के लिए किसी ऐसे कार्य में उलझा दें कि उस के बाद आप खुद ही जौब छोड़ने पर मजबूर हो जाएं. इसलिए अच्छा यही है कि बौस की डांट व बात को अपने तक ही सीमित रखें.

काम में परफैक्शन लाएं

टैक्नोलौजी के इस युग में हमें सबकुछ रैडीमेड मिल जाता है यानी सारा मैटर नैट से पकापकाया मात्र एक क्लिक से ले सकते हैं, लेकिन उस से काम में परफैक्शन नहीं आएगा और हो सकता है कि आप की चोरी भी पकड़ी जाए, तो ऐसे में बैस्ट तरीका यही है कि आप अपने काम में क्वालिटी लाने के लिए रिसर्च वर्क करें न कि डैस्क वर्क. जब आप किसी एक टौपिक पर कई जगह से कलैक्शन करेंगे तो रिजल्ट तो बैस्ट निकलेगा ही और बौस चाह कर भी आप के काम में कमी नहीं निकाल पाएंगे.

कायदेकानून न तोड़ें

औफिस में एकजैसा काम करतेकरते हम बोरिंग सा फील करने लगते हैं. ऐसे में रीफ्रैश होने के लिए इधरउधर जा कर एकदूसरे की सीट पर खडे़ हो जाते हैं, जिस से हम दूसरों का समय तो खराब करते ही हैं साथ ही कुछ की नजरों में भी खटकने लगते हैं. फोन पर लाउडली बात करना, पूरा दिन व्हाट्सऐप पर लगे रहना, औफिस आवर्स में फेसबुक पर चैट करने में व्यस्त रहना, यदि औफिस में पंचिंग मशीन नहीं है तो रजिस्टर में गलत टाइम ऐंटर करना, बीचबीच में बिना बताए कई बार औफिस से बाहर जाना जैसी बातें औफिस रूल्स का खुलेआम उल्लंघन हैं.

ऐसे कर्मचारी को देख कर बाकी स्टाफ का भी गलत काम करने का हौसला बढ़ता है. इस से बेहतर है कि लंच टाइम व टी ब्रेक में ही मौजमस्ती करें, जिस से कोई आप को टोकने न पाए और आप की गुडविल भी बनी रहे.

कूल माइंड से हैंडिल करें सिचुएशन

ह्यूमन नेचर ऐसा होता है कि जब कोई धो रहा होता है तब गुस्सा आना स्वाभाविक है. ऐसे में हम गलत भी बोल जाते हैं लेकिन ठीक उसी तरह अगर बौस आप पर झल्ला रहे हों तो आप उस समय शांत रहें.

भले ही आप तब मन ही मन किलसें कि मुझे जिस बात के लिए डांट पड़ी वह गलती तो मैं ने की ही नहीं और अगर मैं ने इस समय अपना पक्ष रखा तो बौस वाट लगा देंगे, ऐसे में आप भड़ास निकालने के लिए उलटासीधा बोलना शुरू कर देते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि उस वक्त शांत रहें और समय अनुकूल होने पर अपनी बात रखें.

चेहरे को मन का दर्पण न बनने दें

कहते हैं चेहरा मन का दर्पण होता है, क्योंकि मन के भाव चेहरे पर साफ दिखाई देते हैं, लेकिन जब आप बौस के सामने खड़े हों और किसी बात पर बौस आप को डांटें, चाहे वह बात गलत हो और आप को सुन कर गुस्सा भी आ रहा हो, तब भी चेहरे पर गुस्से वाले ऐक्सप्रैशन न आने दें और नौर्मल रहने का प्रयास करें.

तुरंत जौब बदलने की न सोचें

जब तक चैलेंज को ऐक्सैप्ट नहीं करेंगे तब तक आगे कैसे बढ़ पाएंगे. मुश्किल से मुश्किल सिचुऐशन बिना भयभीत हुए हैंडिल करें. यह नहीं कि चैलेंज मिलते ही या बौस की डांट पड़ते ही जौब छोड़ने का मन बना लें. हां, बेहतर जौब जरूर सर्च करते रहें.

फैमिली लाइफ प्रभावित न हो

जब कभी हमें औफिस में डांट पड़ती है तो हम उस का गुस्सा घर पर उतारते हैं. कभी खाना नहीं खाते, तो कभी घर वालों से भी ऊंची आवाज में बात करते हैं, अकेले गुमसुम बैठे रहते हैं जिसे देख कर घर वाले परेशान होते हैं. इसलिए औफिस की बातों को औफिस में ही छोड़ने की कोशिश करें, क्योंकि कभीकभार आप उदास होंगे तब आप को अवश्य ही घर से सहानुभूति भी मिल जाएगी, लेकिन अगर आप उसे रूटीन बना लेंगे तब आप को वहां से भी सपोर्ट मिलना बंद हो जाएगा.

एचआर से शेयर करें प्रौब्लम

यदि आप को अपने बौस से कोई प्रौब्लम है और वे भी आप की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं तो सीधे औनर के पास जाने से अच्छा है कि एचआर को बताएं कि आप को अपने बौस से तालमेल बैठाने में दिक्कत हो रही है, खुल कर अपनी बात रखें. अवश्य आप को सही राह मिलेगी.

लेकिन यदि आप सीधे ओनर के पास पहुंच जाएंगे तो बात बजाय संभलने के और बिगड़ेगी और ऐसे में आप का अपने हैड के साथ काम करना भी मुश्किल हो जाएगा. इसलिए गुस्से से अच्छा है कि सोचसमझ कर फैसला लें.

शोषण न सहें

बौस यदि आप पर काम का ज्यादा बोझ डालें, आप की जरा सी गलती पर अपशब्द कहने लगें, ड्यूटी आवर्स में काम न दे कर छुट्टी के वक्त ढेर सारे काम थमा दें और उन्हें आज ही खत्म करने की बात कहें या फिर लेटनाइट काम करवाने के बावजूद ड्रौपिंग सर्विस न दें व छुट्टी देने से मना करें, तो ऐसे में आप पहले तो उन के सामने अपनी बात रखें, लेकिन फिर भी यदि आप को लगे कि उन से कहने का कोई फायदा नहीं, तो आप जौब चेंज करने के बारे में सोचें.

नौकरी में बौस की थोड़ीबहुत तो सुननी ही पड़ती है, लेकिन अगर काम के नाम पर शोषण हो तो उस औफिस को बाय कहने में ही भलाई होगी. यह सोच कर न घबराएं कि कैसे ऐडजस्ट करेंगे नई जगह पर, क्योंकि अगर आप में काबिलीयत है तो आप को ऐडजस्टमैंट में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा.

जब बौस कराएं पर्सनल काम

यदि बौस आप को काम के बीच में बारबार डिस्टर्ब करें जैसे कि नैट से मूवी टिकट बुक करवा दो, मेरे बेटे या बेटी का होमवर्क कर दो, प्रोजैक्ट पूरा कर दो वगैरावगैरा, जिस से आप अपना औफिस वर्क समय पर न कर पाएं तो आप एकाध बार तो खुशीखुशी इस काम को कर दें, लेकिन अगर आप को लगता है कि बौस ने इसे रूटीन बना लिया है तो उन्हें नम्रता से निवेदन कर कहें कि आप के पर्सनल कार्य करने से मेरी क्रिएटिविटी प्रभावित हो रही है.

आप की यह बात सुन कर बौस भी समझ जाएंगे कि अगर मैं ने अपने पर्सनल कार्य करवाने जारी रखे तो बात ओनर तक पहुंच सकती है. आप का इतना कहना ही उन में डर पैदा कर देगा, क्योंकि इस के कारण आप की प्रोफैशनल लाइफ प्रभावित हो तो यह सही नहीं है.

बौस भी इन बातों का रखें खयाल

–       कर्मचारियों को प्रैशर में न रखें.

–       अगर किसी कर्मचारी ने गलत काम भी किया है तो पहले उसे आराम से समझाएं, यदि मिस्टेक रिपीट हो तब सख्ती बरतें.

–       सिर्फ एक कर्मचारी की बात सुन कर बाकी कर्मचारियों के प्रति अपनी राय न बनाएं. अपनी सुनी व देखी बात पर ही विश्वास करें.

–       कर्मचारियों की प्रौब्लम को नजरअंदाज न करें.

–       अगर किसी कर्मचारी ने कोई आइडिया दिया है तो यह कह कर उस की इंसल्ट न करें कि तुम से तो मुझे ऐसे ही बकवास आइडिया की उम्मीद थी बल्कि उसे मोटीवेट करें कि तुम ने अच्छा सोचा है, लेकिन इस से और बेहतर सोचो, जिस से कंपनी को फायदा हो. आप की ऐसी बात सुन कर वह अपना बैस्ट देने की कोशिश करेगा.

–       बौस का मतलब आप दादागीरी न समझें वरना कर्मचारी आप की रिस्पैक्ट करना छोड़ देंगे.

–       सब के साथ एकजैसा व्यवहार करें.

–       अगर आप ने किसी काम को करने के लिए डैडलाइन दे रखी है तो उस से पहले कर्मचारियों को नौक न करें, क्योंकि इस से वे खुद को ज्यादा प्रैशर में फील करने के कारण काम में मन नहीं लगा पाएंगे.

–       अपनी बौस वाली पर्सनैलिटी मैंटेन कर के र

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