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हाफ गर्ल फ्रेंड : कमजोर पटकथा व निर्देशन

भाजपा समर्थक मशहूर उपन्यासकार चेतन भगत के कई उपन्यासों पर कई सफल फिल्में बन चुकी हैं, पर इसके यह मायने नहीं होते कि उनके हर उपन्यास पर एक अच्छी फिल्म का निर्माण किया जा सकता है. इस बार चेतन भगत के उपन्यास ‘हाफ गर्ल फ्रेंड’ पर बनी इसी नाम की यह फिल्म इस बात को साबित करती है कि हर कहानी को आप दृश्य श्रव्य माध्यम में नहीं बदल सकते. मजेदार बात यह है कि अपने हर उपन्यास पर बनी सफल फिल्मों से निर्माताओं को कमाई करते देख इस बार इस फिल्म का सह निर्माण कर चेतन भगत अपना हाथ जला बैठे हैं. अब उनकी समझ में आ जाएगा कि हर चमकने वाली पीले रंग की वस्तु सोना नहीं होती.

फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ यह साबित करती है कि हर किताब पर एक अच्छी फिल्म नहीं बनायी जा सकती. माना कि चेतन भगत के उपन्यास पर ही ‘काई पे चे’, ‘टू स्टेट्स’ व ‘थ्री ईडियट्स’ जैसी सफल फिल्में बनी हैं. पर निर्माण के क्षेत्र में उतरते हुए चेतन भगत यह कैसे भूल गए कि अतीत में भी उनके एक उपन्यास पर बनी फिल्म ‘हेलो’ का क्या हश्र हुआ था.

फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ की शुरुआत होती है माधव झा (अर्जुन कपूर) से अनबन के बाद रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) का टूटे दिल के साथ पटना छोड़ने से. उसके बाद माधव अतीत में खो जाता है, जब वह पहली बार दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज में रिया सोमानी से मिला था.

बिहार के बक्सर जिले के डुमराव गांव के रहने वाले माधव झा अंग्रेजी की पढ़ाई कर अपने गांव को सुधारने के लिए पहले पटना और फिर दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज पढ़ने पहुंचते हैं. उन्हे बास्केटबाल खिलाड़ी होने के चलते ही कालेज में प्रवेश मिला था. दिल्ली में रिया से मुलाकात होने पर दोनों की दोस्ती खिलाड़ी होने के कारण हो जाती है. रिया भी फुटबाल खिलाड़ी है. वैसे रिया अति अमीर परिवार से है और बड़ी गाड़ी में कालेज आती है. रिया को पहली बारिश में भीगते देख माधव उसे अपना दिल दे बैठता है. यानी कि एक अमीर लड़की और गरीब लड़के के रोमांस की शुरुआत. पता चलता है कि रिया सोमानी अपने घर पर हर दिन अपने पिता द्वारा अपनी मां को पिटते हुए देखती रहती है. इसलिए उसे भोला भाला माधव अच्छा लगता है. पर वह साफ कर देती है कि वह उसकी प्रेमिका नहीं हाफ गर्ल फ्रेंड है. और गिटार बजाती है. उसका सपना न्यूयार्क के क्लब में जैज सिंगर के रूप में काम करना है. उधर माधव अंग्रेजी नही आती की हीनग्रंथि से उबरने का प्रयास कर रहा है. माधव का दोस्त शैलेष (विक्रांत मैसे) उसकी मदद करता रहता है.

रिया व माधव का रिश्ता आगे बढ़ता है, मगर माधव की बेवकूफी के चलते दोनों के रिश्तों में दरार आ जाती है. रिया कहीं दूर चली जाती है. माधव वापस अपने गांव आकर गांव के अपने पारिवारिक स्कूल को विस्तार देने के अलावा लड़कियों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करने का काम शुरू करता है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. एक बार फिर माधव और रिया की मुलाकात न्यूयार्क में होती है.

फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ की कमजोर कड़ी इसकी कहानी व पटकथा है. कहानी को जब आप किसी मकसद के अंदर पिरोने की कोशिश करते हैं, तो सब कुछ बिखर जाता है. कहानीकार व पटकथा लेखक ने इस फिल्म में अंग्रेजी व हिंदी भाषा के बीच के भेदभाव, महिला सशक्तिकरण, महिलाओं के साथ हिंसा, सेक्सुल अब्यूज, लड़कियों की शिक्षा सहित कई मुद्दों को फिल्म में पिरोन का प्रयास करते करते पूरी कहानी व फिल्म को तहस नहस कर दिया.

यह फिल्म न मुद्दों पर आधारित फिल्म रही और न ही प्रेम कहानी वाली फिल्म रही. फिल्म में रोमांस है ही नहीं. फिल्म के सभी किरदार बिखरे हुए नजर आते हैं. आखिर यह किरदार कहना क्या चाहते हैं, इसे फिल्मकार ठीक से बता ही नहीं पाता. इंटरवल से पहले की फिल्म और इंटरवल के बाद की फिल्म के बीच सामंजस्य ही नहीं बैठ पाता है. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत घटिया है. इस फिल्म की मजेदार बात है कि दर्शक को लगता है कि फिल्म खत्म हो गई, पर पता चलता है कि अभी तक खत्म ही नहीं हुई. यह स्थिति भी पटकथा लेखक व निर्देशक की कमजोरी की ओर इशारा करती है. दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या कई सफल फिल्म दे चुके निर्देशक मोहित सूरी ही इस फिल्म के निर्देशक हैं?

फिल्म में इमोशंस का घोर अभाव है, जिसके चलते दर्शक किरदारों के साथ जुड़ ही नहीं पाता. निर्देशकीय कमजोरी के चलते जब तक दर्शक रिया व माधव की प्रेम कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता, तभी दोनों के बीच समस्याएं आती हैं और दोनों अलग हो जाते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इस फिल्म में अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर की केमिस्ट्री नहीं जमी. दोनों का अभिनय भी औसत दर्जे का ही रहा है. विक्रांत मैसे भी ठीक ठाक रहे. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. फिल्म के संवाद बचकाने हैं.

दो घंटे 15 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ का निर्माण शोभा कपूर, एकता कपूर, मोहित सूरी व चेतन भगत तथा निर्देशन मोहित सूरी ने किया है. फिल्म की संवाद लेखक इशिता मोएत्रा, पटकथा लेखक तुषार हिरानंदानी, संगीतकार मिठुन, तनिष्क बागची, अमि मिश्रा, राहुल मिश्रा, कैमरामैन विष्णु राव व कलाकार हैं – अर्जुन कपूर, श्रद्धा कपूर, विकारंत मैसे, सीमा विश्वास व अन्य.

रेल गांव : गाड़ी बुला रही है..

‘रेलगाड़ी छुक छुक छुक छुक छुक छुक….बीच वाली स्टेशन वोले रूक रूक रूक रूक रूक रूक…’ कई सालों पहले फल्म आशीर्वाद में अशोक कुमार ने यह गाना गाया था. बिहार में एक ऐसा गांव है, जिसके लोगों के जीवन की धड़कन रेलगाड़ी की छुक-छुक से जुड़ी हुई है. रेल और उस गांव के लोगों का लगाव और जुड़ाव ऐसा है कि दोनों एक दूसरे के बगैर अधूरा महसूस करते हैं. साल 1910 से गांव के हर घर का कोई न कोई लोग रेलवे में नौकरी करता आ रहा है. गांव का नाम है तेज पांडेपुर, लेकिन वह ‘रेल गांव’ के नाम से ज्यादा मशहूर है. बिहार के बक्सर जिला के रघुनाथपुर रेलवे स्टेशन से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर बसा है यह अनोखा गांव. इस गांव के लोग न खेती करते हैं, न गाय-भैंस पालते हैं, न ही किसी दूसरे महकमों में नौकरी करते हैं. 4 पीढ़ियों से समूचे गांव के लोगों के दिलों- दिमाग में रेल और सिर्फ रेल ही बसा है. हर नई पीढ़ी का बस एक ही ललक और सपना होता है- रेलवे में नौकरी.

साल 1910 में गांव के रामरेखा पांडे ने रेलवे में चीपफ कंट्रोलर की नौकरी शुरू की तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि पीढ़ी दर पीढ़ी पूरा गांव उनके दिखाए राह पर चल पड़ेगा और गांव की पहचान ‘रेल गांव’ के रूप में हो जाएगी. उन्होंने अपने गांव के कई लोगों को रेलवे में नौकरी लगवाई, उसके बाद तो मानो हरेक का जूनून ही बन गया रेलवे की नौकरी पाना. 300 एकड़ जमीन पर बसे इस गांव की आबादी एक हजार के करीब है. इस गांव में ज्यादातर घरों में ताला लटका हुआ रहता है क्योंकि रेलवे में नौकरी मिलने के बाद लोग गांव बाहर ही रहते हैं. रेलवे के सभी 13 जोनों में तेज पांडेपुर का कोई न कोई आदमी पोस्टेड है.

गांव के रहने वाले उमाशंकर दूबे बताते हैं कि पिछले 100 सालों से गांव के लोगों में रेलवे में नौकरी करने की दीवानगी सवार है. सरकार चाहे किसी की हो या रेल मंत्री चाहे कोई भी हो इस गांव के लोगों को रेलवे में नौकरी मिलने में कोई दिक्कतें नहीं आई. रेलवे की बहाली के लिए होने वाले हर ग्रेड के इम्तिहानों में लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और बाकायदा इसके लिए जी तोड़ तैयारी भी करते हैं. रेलवे की नौकरी की तैयारियों में लगा दिलीप बताता हैं कि गांव के युवा बैंक, यूपीएससी, बीपीएससी आदि के इम्तिहानों में शामिल ही नहीं होते हैं. वह भी रेलवे में नौकरी पाने की तैयारियों में लए हुए हैं और इसके लिए कोचिंग ले रहे हैं.

साल 1930 में आरपी दूबे रेलवे में केबिन मैन के पद पर बहाल हुए थे आज उनकी तीसरी पीढ़ी भी रेलवे में नौकरी कर रही है. दूबे के भाई अवधेश ने भी रेलवे सुरक्षा बल में नौकरी की. उनके बेटे तारकेश्वर और वेंकटेश आरपीएफ में इंस्पेक्टर बने. उस परिवार की तीसरी पीढ़ी के कृष्ण कुमार भी गार्ड के पद पर बहाल होकर रेलवे की सेवा में लगे हुए हैं. कैलाश पांडे की भी तीसरी पीढ़ी रेलगाड़ियों की छुक छुक को रफ्तार देने में लगी हुई है. गांव के लोगों को पूरा भरोसा है कि आगे भी इस गांव के लोगों को रेलगाड़ी बुलाती रहेंगी और उसकी सीटियां उन्हें लुभाती रहेंगी.

                               

          

दूसरों की भूल से लें सबक

जयपुर, राजस्थान के मालवीय नगर में रहने वाली 20 साला निधि कोचिंग के लिए टोंक फाटक जाती थी और वहां से ही अपने बौयफ्रैंड के साथ नारायण सिंह सर्किल के पास बने सैंट्रल पार्क की झाडि़यों में जिस्मानी संबंध बना कर उस से बाजार में खूब खरीदारी कराती थी. यही हाल कुछ समय पहले तक उस की बड़ी बहन कीर्ति का था. उस के भी कई बौयफ्रैंड थे. एक बार जब वह एक बौयफ्रैंड के साथ एक पार्क में संबंध बना रही थी कि तभी वहां 5-6 कालेज के दादा किस्म के लड़के आ गए.

उन लड़कों को देख कीर्ति का बौयफ्रैंड वहां से भाग गया, मगर उन लड़कों ने कीर्ति को दबोच लिया और 3-4 घंटे तक उस का बलात्कार किया. जब कीर्ति को होश आया, तो वह गिरतेपड़ते अपने घर पहुंची. उस के बाद उस ने अपने सभी बौयफ्रैंडों से दोस्ती खत्म कर ली और अपना ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया. वह आज एक बड़ी सरकारी अफसर है. कई साल पहले राजस्थान के धौलपुर जिले के बसेड़ी कसबे में जाटव जाति का एक गरीब परिवार का लड़का चंद्रपाल जब पटवारी की नौकरी पर लगा था, तब उस के मांबाप ने उसे समझाया था कि वह अपनी नौकरी ईमानदारी से करे. अपने मांबाप की इन बातों को सुन कर चंद्रपाल ने अपना काम ईमानदारी से करना शुरू कर दिया था. पटवारी की नौकरी करते हुए वह कुछ सालों बाद भूअभिलेख निरीक्षक बन गया और उस के बाद नायब तहसीलदार और अब तहसीलदार बन कर ईमानदारी से अपना काम कर रहा है.

30 साला मनोज एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क है. कमाऊ महकमे में होने के चलते वह हजार दो हजार रुपए रोजाना ऊपर की कमाई कर लेता है. वह जयपुर के प्रताप नगर हाउसिंग बोर्ड में अपनी 23 साला बीवी सुप्रिया के साथ रहता है. जब मनोज की बीवी 3 बच्चों की मां बन गई, तो उस का झुकाव अपनी 20 साला कालेज में पढ़ने वाली साली नेहा की ओर हो गया. वह उसे अपने पास ही रखने लगा. उस ने अपनी साली को पैसे और महंगेमहंगे तोहफे दे कर पटा लिया था. बीवी के सो जाने पर वह अपनी साली के कमरे में चला जाता था.

एक रात को अचानक नींद खुल जाने से जब मनोज की बीवी सुप्रिया ने उसे अपने बैड पर नहीं देखा, तो वह अपनी छोटी बहन नेहा के कमरे में चली गई. वहां पर उन दोनों को साथ देख वह गुस्से में आगबबूला हो उठी. कुछ दिनों तक तो वे दोनों एकदूसरे से दूर रहे, मगर फिर होटल में मिलने लगे. एक दिन जब वे होटल में पुलिस द्वारा पकड़े गए, तो उन के मांबाप को बहुत दुख हुआ. वे दोनों जीजासाली सोच रहे थे कि अगर सुप्रिया उन के बीच रोड़ा नहीं बनती, तो उन्हें होटल में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. लिहाजा, उन्होंने सुप्रिया की गला घोंट कर हत्या कर दी.

हत्या के बाद वे दोनों वहां से फरार हो गए. दूसरे दिन जब पड़ोस के लोगों को मालूम हुआ, तो उन्होंने पुलिस को बुला लिया. कई दिनों के बाद सुप्रिया की हत्या के जुर्म में मनोज और नेहा को गिरफ्तार कर लिया गया.

दूसरों की ऐसी भूल से सबक ले कर जो लोग इन्हें अपनी जिंदगी में शामिल नहीं करते हैं, वे सुख भरी जिंदगी बिताते हैं.                       

गिवअप के लिए खुद को राजी नहीं कर पाई : जूही चावला

1984 की मिस इंडिया जूही चावला 16 साल की बेटी जाह्नवी और 14 साल के बेटे अर्जुन की मां होने के बावजूद आज भी बेहद खूबसूरत और जवां नजर आती हैं और इस की सब से बड़ी वजह है उन की मुसकान. यह तब भी थी और अब भी है. अपनी इसी मुसकान की वजह से जूही फिल्म इंडस्ट्री की चुलबुली अभिनेत्री का खिताब भी पा चुकी हैं.

मौडल से ऐक्ट्रैस और ऐक्ट्रैस से प्रोड्यूसर बनीं जूही उम्र के इस पड़ाव में भी अपने स्टारडम को संभालने के साथसाथ पर्सनल लाइफ में भी अपनी भूमिकाएं कैसे निभा रही हैं, चलिए जानते हैं उन्हीं से:

अपनी पर्सनल और प्रोफैशनल लाइफ को एकसाथ कैसे मैनेज करती हैं?

इस के लिए मैं तहेदिल से अपने परिवार की आभारी हूं. अगर परिवार का साथ न होता, तो मेरे लिए प्रोफैशनल लाइफ में आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता. मुझे याद है जब बच्चे छोटे थे, तब उन्हें मेरे इनलाज संभालते थे और मैं शूट पर जाती थी, तो कई बार मेरे बीमार पड़ने पर भी परिवार वाले ही मेरी देखभाल करते थे. मैं हमेशा से परिवार पर आश्रित रही हूं. घर वालों के सहयोग के बिना ये सब मुमकिन नहीं था. मेरा मानना है कि आप अपने जीवन में अपने प्रिय और करीबी लोगों की सहायता से ही आगे बढ़ पाते हैं. मैं ने अकेले सब कुछ मैनेज नहीं किया है, परिवार के सहयोग से किया है, जिस के लिए मैं उन का आभार भी प्रकट करती आई हूं. मुझे हमेशा मेरे परिवार का सहयोग मिला है.

किन पेरैंटिंग रूल्स को ध्यान में रख कर आप ने अपने बच्चों की परवरिश की?

अच्छी परवरिश के लिए कई पेरैंटिंग रूल्स जरूरी हैं, लेकिन जब मुझे किसी खास रूल की जरूरत होती है तब वह मेरे दिमाग से निकल जाता है. ऐसे में मैं बस एक बात का ध्यान रखती हूं कि मुझे कभी बच्चों पर अपने विचार नहीं थोपने हैं, उन पर कभी हावी नहीं होना है, खासकर तब जब बात कैरियर की हो. मैं अपने बच्चों से कभी नहीं कहती कि तुम्हें अभिनेत्री या अभिनेता ही बनना है. वे जो चाहें बन सकते हैं.

अपनी मां की कौन सी खूबी खुद में चाहती हैं?

मेरी मां वर्किंग वूमन थीं. उन की ड्रैसिंग सैंस कमाल की थी. वे बहुत ही खूबसूरत थीं. घर और बाहर दोनों को सहजता से मैनेज कर लेती थीं. उन्हें देख कर मैं हमेशा सोचती थी कि बड़ी हो कर मैं भी उन की तरह बनूंगी. मुझे अफसोस है कि आज वे हमारे बीच नहीं हैं.

चूंकि आप के बच्चे स्टार किड हैं. ऐसे में आप उन्हें किस बात का एहसास दिलाती रहती हैं?

मैं जानती हूं मेरे बच्चों का दिल सच्चा है. वे कभी ऐसा काम नहीं करते जिस से मुझे तकलीफ हो. हां, लेकिन जहां जरूरत होती है मैं उन्हें गाइड करती रहती हूं जैसे मैं उन्हें हमेशा छोटीबड़ी हर चीज की कद्र करने को कहती हूं.

अपने परिवार के साथ क्वालिटी टाइम किस तरह बिताती हैं?

मेरे लिए जब भी संभव होता है अपने परिवार और बच्चों के साथ समय बिताने की कोशिश करती हूं. जब मैं घर पर होती हूं बच्चे भी आसपास होते हैं, तो काफी अच्छी लगता है. मुझे उम्मीद है बच्चों को भी मेरी मौजूदगी खुशी का एहसास दिलाती है. मैं ने अपने घर में एक रूल बना रखा है कि जब भी हम सब एकसाथ डाइनिंग टेबल पर लंच या डिनर के लिए इकट्ठा  होंगे हमारे आसपास न तो मोबाइल फोन होगा और न ही कोई किताब. जब कभी मेरा या जय (पति) का फोन डाइनिंग टेबल के पास होता है, तो बच्चे हमें तुरंत टोकते हैं. यह देख कर अच्छा लगता है.

मां बनने के बाद प्रोफैशन को अलविदा कहने वाली महिलाओं से क्या कहेंगी?

मैं उन की हिम्मत की दाद दूंगी कि उन्होंने यह फैसला लिया, क्योंकि मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाई. मैं ने हमेशा अपने काम को जारी रखना चाहा. मैं गिवअप के लिए खुद को राजी नहीं कर पाई.                        

‘मेवा’ खा कर फरार मेवालाल

बिहार कृषि विश्वविद्यालय में हुए बहाली घोटाले में कुलपति रह चुके और जनता दल (यू) से बाहर निकाले गए विधायक मेवालाल चौधरी पर एफआईआर दर्ज होने के बाद रोज नएनए खुलासे हो रहे हैं. पटना हाईकोर्ट के जस्टिस रह चुके एसएम आलम की एकल जांच कमेटी के सामने मेवालाल चौधरी को दोषी पाया गया.

जांच रिपोर्ट के मुताबिक, मेवालाल चौधरी ने माना कि पावर प्रैजेंटेशन के अलावा रीमार्क्स, इंटरव्यू और एग्रीमैंट कालम उस ने खुद भरे थे. इस से यह बात साफ हो गई कि ऐक्सपर्टों ने उम्मीदवारों को जो नंबर दिए थे, उन के लिफाफों को खोला भी नहीं गया. असिस्टैंट प्रोफैसरों की बहाली में चहेतों को दिल खोल कर नंबर दिए गए. नियमों को ताक पर रख कर बाहर से ऐक्सपर्टों को बुलाया गया.

नैट में फेल

40 उम्मीदवारों को चुना गया. बहाल हुए प्रोफैसरों में से ज्यादातर का संबंध पश्चिम बंगाल के कृषि विश्वविद्यालय से रहा है. रिपोर्ट में पक्षपात, जोड़तोड़ और घपले करने का जिक्र किया गया है.

कई नाकाबिल उम्मीदवारों से टैस्ट लिए बगैर ही अच्छे नंबर दे दिए गए, वहीं काबिल उम्मीदवारों को 10 में से 0.1 नंबर दिए गए.

22 फरवरी, 2017 को सबौर थाने में मेवालाल चौधरी के खिलाफ दर्ज एफआईआर में कहा गया है कि साल 2011 में सबौर के बिहार कृषि विश्वविद्यालय में तकरीबन 161 प्रोफैसरों व जूनियर साइंटिस्टों की बहाली में जम कर हेराफेरी की गई.

कृषि विश्वविद्यालय के कुलसचिव अशोक कुमार की अर्जी पर मेवालाल चौधरी को आरोपी बनाया गया. नौकरी देने के लिए 15 से 20 लाख रुपए तक की बोली लगाई गई थी.

जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मेवालाल चौधरी को पार्टी से निकाल दिया है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय से रिटायर होने के बाद साल 2015 में मेवालाल चौधरी ने जद (यू) के टिकट पर मुंगेर जिले की तारापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गया था. मेवालाल चौधरी का कहना है कि उसे राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया है. जिस ऐक्सपर्ट कमेटी ने बहाली की थी, वह उस कमेटी का अध्यक्ष तो था, लेकिन बहाली में उस का कोई लेनादेना नहीं था, इसलिए उसे कोई जानकारी नहीं है.

भागलपुर के एसएसपी मनोज कुमार ने बताया कि मेवालाल चौधरी का पासपोर्ट जब्त करने की कार्यवाही शुरू की गई है. कोर्ट के बारबार बुलाने के बाद भी वह हाजिर नहीं हो रहा है. पुलिस ने धारा-164 के तहत 5 गवाहों के बयान दर्ज किए और मेवालाल चौधरी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को पुख्ता सुबूत मिल चुके हैं. रिटायर्ड जज और पुलिस की जांच रिपोर्ट, केस डायरी और गवाहों के बयान पूरी तरह से मेवालाल चौधरी के खिलाफ हैं. सभी गवाहों के बयान फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए जा चुके हैं.

साल 2010 में जब भागलपुर कृषि कालेज को नीतीश कुमार की सरकार ने विश्वविद्यालय का दर्जा दिया था, तो मेवालाल चौधरी को ही उस का पहला कुलपति बनाया गया था.

मेवालाल चौधरी नीतीश कुमार का इतना भरोसेमंद था कि जब वह रिटायर हुआ, तो उसे विधानसभा चुनाव में तारापुर सीट से चुनाव लड़ने के लिए जद (यू) का टिकट दे दिया. उस से पहले जब वह कुलपति था, तो साल 2010 के चुनाव में उस की बीवी नीता चौधरी तारापुर से विधायक बनी थी 

चुनौती स्वीकारें, श्रेष्ठ बनें

जीवन में हर व्यक्ति का उद्देश्य शिखर तक पहुंचना होता है. युवावस्था में सभी अपना लक्ष्य निर्धारित ही नहीं करते बल्कि उसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्न भी करते हैं. यह उम्र अनेक सपने संजोने की होती है. कोई ऐक्टर बनना चाहता है तो कोई लेखक, कोई डाक्टर तो कोई सिंगर. युवा ऐसे ही न जाने कितने सपने देखते हैं. परंतु समय बीतने के साथसाथ उन के ये सपने धुंधले हो जाते हैं और कुछ साल बाद समय के साथ समझौता करते हुए वे अपना लक्ष्य भूल जाते हैं.

जीवन के अगले पड़ाव पर वे परिस्थितियों तथा लोगों पर दोषारोपण कर के अपनी नाकामी स्वीकार करते हैं. वास्तव में यदि हम विचार करें तो हमें जीवन में जो भी उपलब्धि हासिल होती है उस का सारा श्रेय हमें ही जाता है. यदि हम सफल हैं तो उस में भी हमारा दृढ़ निश्चय और इच्छाशक्ति का ही हाथ होता है और यदि हम असफल रहते हैं तो भी इस का कारण हम में आत्मविश्वास तथा सतत प्रयास की कमी ही होता है.

सुखदुख, उतारचढ़ाव, आर्थिक कठिनाइयां, स्वास्थ्य व पारिवारिक समस्याएं सभी के जीवन में आती हैं, लेकिन वे व्यक्ति ही श्रेष्ठ होते हैं जो चुनौतियों से हार न मान कर उन्हें स्वीकार कर आगे बढ़ते हैं. आइए, ऐसे ही कुछ उदाहरण हम देखते हैं :

विश्व प्रसिद्ध लेखिका हेलन केलर 2 वर्ष की भी नहीं थीं कि उन की सुनने की क्षमता तथा आंखों की रोशनी चली गई, लेकिन हेलन ने परिस्थितियों को दोष देने के बजाय चुनौतियों को स्वीकारा. उन्होंने बधिर और दृष्टिहीन होते हुए भी स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने न केवल खुद शिक्षा प्राप्त की बल्कि श्रमिकों और महिला मताधिकार के लिए भी अभियान चलाया. हेलन ने अनेक पुस्तकें भी लिखीं. इन्हीं चुनौतियों ने उन्हें श्रेष्ठ बना दिया.

पूरी दुनिया को रोशन करने वाले एडिसन को उन के विद्यालय से मंदबुद्धि कह कर निकाल दिया गया था, पर उन की मां ने इस चुनौती को स्वीकारा और वे एक महान वैज्ञानिक बने.

बिल गेट्स का नाम कौन नहीं जानता. माइक्रोसौफ्ट की सफलता से पहले उन का व्यवसाय पूरी तरह असफल रहा था. यदि वे वहीं हार मान जाते तो क्या आज विश्व के सामने आते. मिकी माउस नाम का कार्टून कैरेक्टर बनाने वाले वाल्ट डिजनी को नौकरी से इसलिए निकाल दिया गया था कि उन में क्रिएटिविटी की कमी है.

फिजिक्स के क्षेत्र में नोबेल सम्मान प्राप्त करने वाले आइंस्टाइन 7 साल की उम्र तक पढ़ना नहीं जानते थे. उन के अध्यापक तथा परिवार के लोग उन्हें मंदबुद्धि मानते थे. ब्रिटेन के 2 बार प्रधानमंत्री रह चुके चर्चिल 62 साल की उम्र तक हर चुनाव में हारते रहे यदि वे प्रयास छोड़ देते तो क्या ऐसी प्रसिद्धि पाते?

प्रसिद्ध लेखिका जे के रौलिंग की कृति हैरी पौटर 12 पब्लिशिंग हाउस द्वारा लौटा दी गई थी. यदि वे बारबार प्रयास न करतीं तो हैरी पौटर जैसी कृति विश्व को न दे पातीं.                                

जाति ने ली जान

बिहार के गया जिले के एक गांव में एक दलित बूढ़े जोड़े को पीटपीट कर मार डाला, क्योंकि उन का 20 साल का नाती एक पिछड़ी जाति की लड़की के साथ भाग गया था. जाहिर है कि मामला प्रेम का है, पर चूंकि पिछड़ी जाति की लड़की अछूत के लड़के के साथ भाग जाए, यह आज भी गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी सहन नहीं होता. जाति का जहर इस कदर रगरग में भरा है कि चाहे दलित और पिछड़े दोनों ही जाति के कहर के शिकार क्यों न रहे हों, पिछड़ों को आज भी यह मंजूर नहीं कि कोई दलित उन की बराबरी करे या उन से रोटीबेटी का नाता जोड़े.

शहरों में यह बात गुपचुप होती है. यदि लड़की को दलित लड़के से प्यार हो जाए, तो उस के घर वाले मारने की नहीं तो मरने की धमकी दे कर लड़की को मजबूर कर देते हैं कि वह नाता तोड़ दे.

यह तो पक्का है कि जब दलित और उस से ऊंची जाति वालों में प्यार होता है, तो दोनों का रहनेखाने का तरीका एक सा होगा. कम ही मामलों में बहुत गरीब का बहुत अमीर से प्यार फलता है. अगर ऐसे में दोस्ती हो भी जाए, तो उसे टूटते देर नहीं लगती. लड़की और लड़के के दोस्त ही पहले दोनों को अपनीअपनी जातियां बता देते हैं और आमतौर पर ऊंची जाति वाले दोस्त नीची जाति वाले लड़के या लड़की से दोस्ती तोड़ लेते हैं.

अगर दोस्तों की अड़चन पार कर के प्यार करने वाले आगे बढ़ जाएं, तो भी मुसीबतें कम नहीं होतीं. अगर दोनों कमाऊ हों तो ही वे अपने फैसले पर टिक सकते हैं. मातापिता के बलबूते तो इस तरह का प्यार टिक ही नहीं पाता.

परिवार के लोग इस तरह के प्यार पर नाकभौं चढ़ाते हैं. अगर लड़की दलित हो तो लड़की के मातापिता को डर लगता है कि उसे प्यार करने वाला पेट से कर के छोड़ न जाए, क्योंकि इस तरह के सैकड़ों मामले हर दलित 40-50 साल का होतेहोते देख चुका होता है. वह जानता है कि ऊंची जाति के लड़के शादी का झांसा दे कर लड़की की इज्जत से खेलते हैं.

अगर उलट होता है तो लड़के के दलित मातापिता खौफ में जीते हैं कि ऊंची जाति वाले उन्हें जीने न देंगे. आज 2017 में भी भारत में कुछ ज्यादा नहीं बदला है और यह दलित अच्छी तरह जानते हैं. पिछड़े भी अगर दलितों पर जोरआजमाइश करते हैं, तो उन के मन में बैठा सवर्णों का खौफ बोल रहा होता है. वे सवर्णों को बताना चाहते हैं कि देखो, हम भी दलितों से कोई नाता नहीं रख रहे, जैसे आप नहीं रखते. सवर्ण उन से खुश हों या न हों, पिछड़ों को एहसास होता है कि उन का कद बढ़ गया है.

पूरे देश में यह बीमारी बराबर सी फैली हुई है. दलितों में आपस में भी ऊंचनीच की तेज सोच रहती है. सरकार की तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी है ही नहीं, पर अब ऐसे सामाजिक नेता भी नहीं रह गए जो जाति के जहर की दवा बता सकें. टीवी, इंटरनैट, अखबार सब जातियों का गुणगान करते हैं. 80 साल के सुखदेव रविदास और उस की बूढ़ी पत्नी ने नाती भी खोया और अपनी जिंदगी भी, पर शायद ही कहीं किसी को अफसोस होगा.                  

 

 

ऐक्टिंग की राह में बड़े धोखे हैं : प्रियंका महाराज

फिल्मों में काम कर के बड़ा कलाकार बनने का सपना तमाम लड़केलड़कियां देखते हैं. कई कलाकारों का शुरुआती सफर बहुत ही मुश्किल भरा होता है, जिस से आने वाले लोगों को सीख भी मिल सकती है. इस के जरीए वे तमाम तरह की परेशानियों से बच सकते हैं.

बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली प्रियंका महाराज के फिल्मी सफर की कहानी काफी मुश्किलों भरी रही, पर अब वे कामयाबी की राह पर हैं. जद्दोजेहद के उस दौर में वे काफी परेशान थीं. उन्हें लग ही नहीं रहा था कि कामयाबी मिलेगी.

प्रियंका महाराज की मां टीचर थीं. अब वे नौकरी छोड़ कर बेटी के साथ रहती हैं. प्रियंका के पिता इंस्पैक्टर हैं. पहले वे बेटी को फिल्म लाइन में नहीं भेजना चाहते थे, पर जब बेटी की जद्दोजेहद को देखा, तो मदद के लिए आगे बढ़े. आज वे भी खुश हैं.

अपने मुश्किल दिनों की यादें प्रियंका महाराज ने बातचीत में बताईं. पेश हैं, उस के खास अंश:

पटना से मुंबई का सफर कैसा रहा?

पटना से मैं सब से पहले दिल्ली पहुंची थी. मुझे ‘मिस इंडिया’ बनना था. डांस और मौडलिंग मेरी हौबी थी. घर में किसी का कोई सहयोग नहीं था. पापा तो कतई नहीं चाहते थे कि मैं फिल्म या मौडलिंग लाइन में काम करूं. ऐसे में मैं पापा से छिप कर डांस सीखती थी.

मैं ने कभी हार नहीं मानी. मैं अपनी कोशिश में लगी रही. ऐक्टिंग सीखने के लिए मैं ने थिएटर किया, फिर टैलीविजन पर ‘बिग मैजिक’ पर ‘पुलिस फाइल’ सीरियल में काम करने का औफर मिल गया. इस के बाद ‘दूरदर्शन’ पर भी एक सीरियल किया. मौडलिंग भी शुरू कर दी. सब ठीकठाक चल रहा था. थोड़ा सा मम्मी का सहयोग मिलने लगा. बाद में पापा ने भी विरोध करना बंद कर दिया.

जद्दोजेहद का दौर कब आया?

शुरुआती कामयाबी के बाद ऐसा लगा कि सब ठीक है. बिहार में भोजपुरी फिल्में बहुत चलती हैं. ‘निरहुआ’ का हीरो के रूप में बड़ा नाम है. फेसबुक पर एक लड़के से संपर्क हुआ. उस ने खुद को ‘निरहुआ’ का भांजा बताया और मुझ से बोला कि वह सीरियल और फिल्म दोनों में काम दिला देगा. उस ने मुझे दिल्ली बुलाया.

मैं अपनी मां के साथ उस की बात को सच मान कर दिल्ली चली आई. इस के पहले मुझे बिराज भट्ट के साथ फिल्म ‘जिद्दी’ का औफर मिला था. शूटिंग शुरू नहीं हो रही थी. पूरा एक महीना मैं अपनी मां के साथ दिल्ली में ही रही.

वह लड़का आया और बोला कि दिनेशजी ने मुझे भेजा है. उन के पास समय नहीं है. उस ने आर्टिस्ट कार्ड बनाने के लिए 60 हजार रुपए मांगे. हम लोगों ने दे दिए. हमें लगा कि जब सीरियल में काम मिल जाएगा, तो यह पैसा वापस आ जाएगा.

फिर सच कैसे सामने आया?

हम लोग एक महीने तक वहां रहे, पर कोई सीरियल नहीं मिला. तब हम ने सच पता करने की कोशिश शुरू की, तो पता चला कि वह लड़का दिनेशजी का भांजा नहीं है. मैं झांसे में आ गई थी.

मेरी मां की तबीयत खराब हो गई. मैं बहुत डर गई. फिर मुंबई में फिल्म करने का एक औफर मिला. हम लोग वहां से मुंबई चले आए, जोगेश्वरी इलाके में होटल में रहने लगे.

वहां भोजपुरी के कुछ कलाकारों, प्रोड्यूसरों व डायरैक्टरों से मिली. ऐसे में 20 दिन बीत गए. हमारे पास पैसे खत्म हो गए थे. होटल वाले ने हमें निकाल दिया. वहां रहनेखाने को पैसा नहीं था.

हम स्टेशन पर निराश बैठे थे. वहां पर कुछ लोगों से बात हुई. बड़ी मुश्किल से रहने के लिए होटल मिला. वहां रहते हुए मैं छोटे काम कर के पैसा कमाने लगी. इस बीच फिल्म ‘जिद्दी’ की शूटिंग शुरू हो गई. तब पैसा मिला.

यह सब पापा को कब पता चला?

फिल्म ‘जिद्दी’ की शूटिंग के बाद पापा को सबकुछ बताया. तब से वे हमारा सहयोग करने लगे. फिर मुझे कई फिल्में मिलने लगीं. मैं फिल्मों के साथ डांस शो भी करने लगी

मेरी आने वाली फिल्मों में ‘नसीब’, ‘जान तोह पे लुटाइब’, ‘बनारसी बबुआ’, ‘इश्कवाले’ और ‘घूंघट में के बा’ खास हैं.

भोजपुरी फिल्में खुलेपन के लिए मशहूर हैं. आप पर किसी तरह के समझौते का दबाव तो नहीं पड़ा?

मैं पैसे के लिए नहीं अच्छे काम के लिए फिल्में करती हूं. अपनी पसंद की फिल्में करती हूं. इसी वजह से फिल्म ‘जिद्दी’ के बाद दूसरी फिल्मों के बीच समय भी लिया.

मेरा मानना है कि हम लोग जो दिखाएंगे, वही लोग देखेंगे. ज्यादा गंदा दिखाने से कामयाबी नहीं मिलती. थोड़ीबहुत तड़कभड़क तो ठीक है, पर फूहड़ता ठीक नहीं.                      

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बड़े काम के हैं ये 8 मेकअप सीक्रेट्स

ऐसी कौन सी युवती होगी जो रूपमती नहीं दिखना चाहेगी. इसी प्रयत्न में युवतियां मेकअप करती हैं, लेकिन क्या आप ने कभी सोचा है कि कुछ युवतियां इतनी आकर्षक क्यों लगती हैं जबकि कुछ को देख कर लगता है मानो काजलपाउडर की दुकान चली आ रही हो. मनमोहक मेकअप के कुछ राज आप भी जानिए :

1. पंखड़ी से होंठ : होंठों पर शुगर स्क्रब (एक चम्मच चीनी, शहद और जैतून का तेल) रगड़ने से उन में खून का संचार बढ़ता है और होंठ मुलायम व गुलाबी हो उठते हैं. फिर आप लिपस्टिक लगाएंगी तो लगेगा मानो मक्खन लगा रही हों. इस से लिपस्टिक अधिक देर तक टिकेगी.

2. उजला, चमकता रूप : चेहरे के जिन भागों पर रोशनी पड़ती है, उन को हाईलाइट करें, जिस से आप का रूप दमक उठेगा. इसे हैलो हाईलाइट तकनीक कहा जाता है. गालों के ऊपर, भवों के सहारे और नाक के सिरे पर हाईलाइटर पाउडर लगा कर उंगलियों को गोलाकार तरीके से घुमाते हुए फैलाएं.

3. सजग नयन : आंखों को बड़ी, जानदार व चमकदार दिखाने के लिए बाजार में उपलब्ध सफेद काजल आंखों की निचली पलकों तथा कोरों पर लगाएं. ऊपरी पलकों पर गहरे रंग का काला काजल या फिर आप की पोशाक से मेल खाता रंग जैसे हरा, नीला, सुनहरा काजल या आईलाइनर लगाएं और अंत में पलकों पर मसकारा लगाएं.

4. फोकस : आप को अपने कजरारे नयनों की ओर ध्यान आकर्षित करना है या रसीले होंठों की ओर, इस बात का निर्णय कर लें. किंतु मेकअप ऐसा हो कि इन दोनों में से किसी एक को अधिक बोल्ड बनाएं. इस के लिए आप को अपनी पोशाक का भी ध्यान रखना होगा. उदाहरणस्वरूप, यदि आप ने साधारण जींस व टौप पहना है तो होंठों को गहरा बरगेंडी रंग दें या अगर आप ने अपनी पसंदीदा काली ड्रैस पहनी है तो आंखों को काजल मसकारे से उभार लें.

5. चमकदार पोशाक तो मैट मेकअप : यदि आप की ड्रैस अधिक चमकदमक वाली है तो ऐसे में मेकअप को मैट फिनिश रखें. कपड़ों और मेकअप दोनों को ही चमचमाचम रखने से आप डिस्को बौल दिख सकती हैं. इसलिए चमकदार पोशाक के साथ मैट आईलाइनर और मैट लिपस्टिक का प्रयोग करें. इस से आप सजीली व फैशनपरस्त दिखेंगी.

6. सिंडरेला इफैक्ट का इलाज : जब पार्टी देर तक चलती हो तो मेकअप का खास खयाल रखें. आप जानती ही होंगी कि मेकअप कितना भी बढि़या हो कुछ घंटे बाद स्वयं ही गायब हो जाता है. इसी को सिंडरेला इफैक्ट कहते हैं. इस का हल भी है. गीले मेकअप के ऊपर सूखे मेकअप की तह चढ़ा लें. जैसे, आईलाइनर के ऊपर आई शैडो की लेयर, फाउंडेशन के ऊपर सूखा कौंपैक्ट तथा हाईलाइटर के ऊपर चमकदार पाउडर फिरा लें.

7. गाढ़े फाउंडेशन का खूबसूरत हल : अकसर फाउंडेशन गाढ़े होते हैं. उन के इस्तेमाल से आप का चेहरा पैन केक सा दिखने का डर रहता है. अपने फाउंडेशन को लगाने से पूर्व आप अपनी हथेलियों को सौंदर्य तेल (जैतून, लैवेंडर, लैमन आदि) की 2 बूदों से हलका गीला कर लें. सौंदर्य तेल मिलने से फाउंडेशन का गाढ़ापन कम हो जाएगा और तेल की चिकनाई से आप की त्वचा भी चमक उठेगी.

8. ब्रश भी उतने ही जरूरी : मेकअप करने के लिए सही प्रकार के ब्रश पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है जितना सही मेकअप प्रोडक्ट्स पर. ब्रश चुनने के लिए आप को थोड़ी समझदारी चाहिए, केवल महंगे ब्रश खरीदने से काम नहीं चलेगा बल्कि आप को यह जान कर खुशी होगी कि सस्ते ब्रश भी उतना ही बेहतर काम कर सकते हैं. फाउंडेशन को चेहरे पर एकसार लगाने के लिए मोटा, बढि़या स्पंज इस्तेमाल करें, चेहरे पर पाउडर लगाने के लिए मोटे ब्रश व हाईलाइटर लगाने के लिए कोणीय ब्रश लें.

तो देखा आप ने, कैसे छोटीछोटी सावधानियां साधारण से रंगरूप को उभार कर रमणीय बना सकती हैं. तो रखिए खयाल, बनिए खूबसूरत.                  

आबरू की खातिर बन गई कातिल

उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में ग्रीन पार्क कालोनी का रहने वाला 50 साला सोमपाल एक कालेज में गणित का टीचर था. उस के पास शिक्षा व गृहस्थी दोनों का तजरबा था. बाहरी तौर पर वह अच्छा दिखता था और लोगों से कम ही वास्ता रखता था. परिवार में पत्नी के अलावा 3 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां व सब से छोटा बेटा था. इन बच्चों में 16 साला रीना (बदला नाम) बड़ी थी.11वीं क्लास में पढ़ने वाली रीना पढ़ाई में बेहद होशियार थी. क्लास में उस की अच्छी पोजीशन आती थी. उस का सपना आईएएस बनने का था. सोमपाल खुद तो आसपड़ोस में कम ही रिश्ता रखता था, साथ ही उसे यह भी पसंद नहीं था कि उस की पत्नी या बच्चे किसी से ज्यादा वास्ता रखें. सोमपाल की ससुराल पक्ष से भी नहीं बनती थी. पत्नी के वहां जाने पर वह उस से झगड़ा किया करता था.

नहीं थे नेक इरादे

बेटी रीना को ले कर पिता सोमपाल के इरादे नेक नहीं थे. वह बहाने से उसे छूने की कोशिश करता था. जवान होती बेटी के जिस्म पर उस की नजरें अकसर फिसलती थीं. जब बेटी बाथरूम आतीजाती थी, तो वह उसे अजीब नजरों से देखता था. कभी रात में वह जागता, तो भी रीना को अजीब नजरों से घूरता. रीना ने शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन पिता का बरताव उसे समय के साथ खटकने लगा. वह उम्र के उस पायदान पर थी, जहां मर्द की घूरती नजरों का मतलब समझने लगी थी.

कई दिन सोचनेसमझने के बाद उस ने अपनी मां से दबी जबान से पिता की इन आदतों की शिकायत की, लेकिन मां ने इसे बेटी की गलतफहमी समझा और उसे भी भविष्य में चुप रहने की हिदायत दी.जनवरी महीने में एक दिन रीना की मां ने मायके जाने की बात कही, तो सोमपाल ने उसे इस की इजाजत दे दी. वह 2 बच्चों के साथ कुछ दिनों के लिए उत्तराखंड के पंतनगर में अपने मायके चली गई. रीना भी मां के साथ जाना चाहती थी, लेकिन सोमपाल ने पढ़ाई का वास्ता दे कर उसे भेजने से मना कर दिया.

कत्ल की रात…

वाकिआ 2 जनवरी, 2017 की रात को हुआ. रात में दोनों ने साथ खाना खाया. तकरीबन 10 बजे दोनों सोने चले गए. पिता के कमरे में ही रीना दूसरे पलंग पर लेट गई. रीना को पता नहीं था कि उस रात सोमपाल की नीयत में पूरी तरह से खोट आ चुका था. सोमपाल ने पहले तो बेटी रीना से इधरउधर की बातें कीं, फिर उस से अपने ही बैड पर आ कर सोने को कहा. वह सहज भाव से वहां आ कर सो गई. रात के तकरीबन 2 बजे उस की आंख खुली, तो उस ने सोमपाल का हाथ अपने ऊपर रखा पाया. उस ने सोचा कि पिता का हाथ करवट लेते वक्त धोखे से उस के ऊपर आ गया होगा. उस ने हाथ हटा दिया, लेकिन कुछ देर बाद ही सोमपाल की हरकतें बढ़ती गईं. वह उस के नाजुक अंगों पर हाथ लगा कर सहलाने लगा.

रीना ने विरोध कर के बचने की कोशिश की, तो वह जबरन कब्जा कर उस से गलत काम करने की कोशिश करने लगा. रीना ने अपनी इज्जत बचाने की ठान ली. वह उस के चंगुल से छूट कर बैड से उतरी, तो सोमपाल ने उसे फिर से दबोच लिया. छ नहीं सूझा, तो रीना इस बार उस से छूट कर ड्राइंगरूम में पहले से रखी लोहे की छड़ निकाल लाई और सोमपाल के सिर पर 2-3 वार कर दिए. सोमपाल लहूलुहान हो कर गिर पड़ा. रीना सिर थाम कर बैठ गई. बाद में उस ने अपनी मां को फोन से इस की सूचना दी.

सुबह की सनसनी

सोमपाल के ससुर ने तड़के पुलिस कंट्रोल को सूचना दी और तकरीबन 6 बजे खुद भी पहुंच गए. बैडरूम के दरवाजे पर सोमपाल की लाश पड़ी थी. बिस्तर पर खून के निशान थे. कमरे से बह कर खून बरामदे तक फैला हुआ था. पुलिस ने खून से सनी हत्या में इस्तेमाल की गई छड़ बरामद कर ली. फोरैंसिक ऐक्सपर्ट टीम को भी मौके पर बुला लिया गया, जिस ने फिंगर प्रिंट व फुट प्रिंट समेत कई सुबूत इकट्ठा किए. मौके का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. शक यह भी था कि रीना ने मनगढ़ंत कहानी न बनाई हो. पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल भी निकलवाई. उस के बयानों को सच की कसौटी पर परखा गया. परिवार वालों से भी गहन पूछताछ की गई. रीना ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. उस के मुताबिक, पिता की हरकतों से घर उस के लिए कैदखाना बन गया था. वह सनकी इनसान था. वह छड़ से पिता को डरा कर अपनी इज्जत बचाना चाहती थी.

अगर रीना ऐसा नहीं करती, तो खुद मारी जाती, क्योंकि सोमपाल ने उस के हाथ से छड़ छीन कर उस पर ही वार करने की कोशिश की, जिस के बाद हाथापाई कर के रीना ने छड़ छीन कर पिता पर ही वार कर दिया. सोमपाल के परिवार वाले को रीना की कहानी पर भरोसा नहीं था, लेकिन उस की पत्नी ने स्वीकार किया कि रीना ने कई बार पिता की शिकायत उस से की थी. उस ने सोचा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. शिकायत को गंभीरता से लिया होता, तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता.

रिश्ते को बदनाम करती इस वारदात ने समाज के सामने अहम सवाल छोड़ दिया. मनोवैज्ञानिक डाक्टर सुविधा शर्मा कहती हैं, ‘‘यह कोई साधारण बात नहीं है. डाक्टरी भाषा में इसे टास्क ओरिएंटिड रिऐक्शन कहा जाता है और इस में भी यह अटैक रिऐक्शन है. लड़की को फैमिली सपोर्ट की जरूरत थी. पिता परेशान कर रहा था और मां मदद नहीं कर रही थी. समझदारी वाला कोई कदम उठाया गया होता, तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती.’’ पिता के कत्ल की आरोपी रीना अब नारी सुधारगृह में है. उस के पक्ष में सामाजिक संगठन भी उतरे हैं.

लड़की का कहना था कि उस का इरादा हत्या करना नहीं था. बचाव में उस ने हमला किया, जिस से पिता की मौत हो गई. इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था. लड़की के बयान और हालात के हिसाब से पुलिस ने जांच की. बकौल एसपी समीर सौरभ, ‘‘लड़की ने सैल्फ डिफैंस में पिता पर हमला किया, इसलिए गैरइरादतन हत्या के मद्देनजर जांचपड़ताल आगे बढ़ाई.’’ दूसरी तरफ कानून के जानकारों का यह मानना है कि रीना ने अपनी आबरू बचाने के लिए ऐसा सख्त कदम उठाया. उसे कानून की हमदर्दी तो मिलेगी ही, बशर्ते उसे यह साबित करना होगा कि यह हत्या उस ने सैल्फ डिफैंस में की थी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाई, तो उस को सजा भी हो सकती है.

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