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नकारात्मक विचारों को कहें बाय

अमेरिकी लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर जिम रौन ने कहा है कि आप वास्तव में जो चाहते हैं, आप का मस्तिष्क खुद ही आप को उस ओर खींच लेता है. इसलिए नकारात्मकता के अंधेरे से आप सकारात्मकता के उजाले में आसानी से आ सकते हैं. बस, आप को अपने मस्तिष्क में बने दृष्टिकोण और उस की शब्दावली में थोड़ा हेरफेर करना होगा. आइए जानें कैसे करें :

नैगेटिव थिंकिंग वाले लोगों से रहें दूर

कुछ लोग इतने नैगेटिव होते हैं कि उन के साथ रह कर पौजिटिव सोच वाला व्यक्ति भी बदलने लगता है. ऐसे लोग हर समय नकारात्मक माहौल बनाए रखते हैं, ऐसे लोगों से बचें, क्योंकि उन के साथ रह कर जीवन में कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि अन्य लोग भी आप से दूरी बनाने लगेंगे.

बहाने बनाने से बचें

जो भी काम आप ने अपने हाथ में लिया है, उसे समय पर पूरा करें. आलस में आ कर उसे न करने के बहाने मारने से नुकसान आप का ही होगा, अगर एक बार आप ने बहाना छोड़ कर यह काम कर लिया तो आप को कभी जिंदगी में इस तरह के नकारात्मक विचार तंग नहीं करेंगे.

तुलना न करें

अगर आप के किसी दोस्त को किसी कंपीटिशन ऐग्जाम में सफलता मिली है तो उस की तुलना खुद से कर रोना न रोएं कि आप को इतने प्रयासों के बाद भी सफलता नहीं मिली. ऐसा करना बेवकूफी है बल्कि ऐसे में आप को चाहिए कि दोस्त की खुशी में शामिल हों और उस से सलाह लें कि सफलता के लिए उस ने क्या किया और अपनी कमियों को ढूंढ़ कर दूर करने का प्रयास करें.

सफलताअसफलता एक सिक्के के 2 पहलू हैं

इस बात को हमेशा ध्यान रखें कि यदि आप सफल नहीं होते और डिप्रैशन में जा कर सब से बोलचाल बंद कर खुद को अलगथलग कर लेते हैं, तो यह कोई हल नहीं है.

अगर असफलता मिली है तो उस से सीख कर आगे बढ़ते हुए ही कामयाबी के शिखर पर पहुंचेंगे.

म्यूजिक सुनें

जब भी आप तनाव या नकारात्मकता से घिरे हुए हों तो इस सिचुएशन से खुद को बाहर निकालने के लिए संगीत का सहारा लें. इस से आप का तनमन दोनों प्रसन्न होंगे और आप परेशानी को भूल कर आगे बढ़ पाएंगे.

खुद को प्रोत्साहित करें

जब भी आप को लगे कि आप विफल होने लगे हैं तो खुद को समझाने का प्रयास करें और कहें कि हमें नहीं हारना. जब आप खुद से इस तरह की बातें करेंगे तो निराशा कम होगी और हिम्मत मिलेगी जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी.

आज में जीएं

वर्तमान में रहने की कोशिश करें. जो बीत गया है उस के बारे में विचार कर दुखी न हों और जो होने वाला है उस की सोच में डूबने के बजाय जो आज है उसे ऐंजौय करें.

खुश रहें

आज क्या अच्छा हुआ है उस पर विचार करें. यह कुछ भी हो सकता है सुबह नाश्ते का स्वादिष्ठ परांठा, किसी दोस्त की फोन कौल या फिर रास्ते में देखा कोई सुंदर बच्चा. इस से तनाव कम होगा और आप अच्छे काम के लिए प्रेरित होंगे. आप दूसरों को खुशी तभी दे पाएंगे जब आप खुद खुश रहें. इसलिए अपने मन को प्रसन्नचित्त रखें. जिन कामों को करने में आप को खुशी महसूस होती है. उन के लिए वक्त निकालें.

शराब न पीएं

शराब नकारात्मक विचारों को जन्म देती है और इस के इस्तेमाल से मनुष्य जानवरों की तरह बरताव करने लगता है. उस का अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं रहता. इसलिए शराब का सेवन न करें.

हंसने की आदत डालें

यह एक तरह की थेरैपी है. बिना किसी कारण के रोजाना 5-10 मिनट जोर से ठहाके लगा कर हंसें. इस से ब्लडप्रैशर कंट्रोल रहता है और विचारों में सकारात्मकता आती है. हंसने के लिए मौके न तलाशें. हर रोज ऐक्सरसाइज की तरह कुछ देर हंसने की आदत डालें.

बच्चों के साथ समय बिताएं

बच्चों के साथ खेलें, उन के साथ बातें करें, चीजों को उन के नजरिए से देखें, सुनें. तब आप को एहसास होगा कि दुनिया में कितना भोलापन है और आप का चीजों को देखने का नजरिया ही बदल जाएगा. बच्चों के साथ आप का जिस तरह से मन चाहे उस तरह से खेलें. लोग क्या कहेंगे इस बात की परवा न करें.

सहज रहना सीखें

दुखद परिस्थिति में भी सहज रहना सीखें. जटिल समय में उन लोगों के बारे में सोचें, जिन्होंने खुद को मुश्किल स्थितियों से बाहर निकाला. वर्तमान में आप क्या अच्छा कर सकते हैं. इस बारे में सोचें.

खुद के साथ समय बिताएं

सुबह पार्क में टहलें, छुट्टियों में घूमने जाएं, प्रकृति के बीच समय बिताएं, अपने फोटो खींचें, अपने लिए शौपिंग करें, अपना मनपसंद खाना खाने रैस्टोरैंट जाएं, फिल्म देखें. इस तरह खुद से प्यार करना भी जीवन में अच्छाई की ओर ले जाता है.                                    

नैगेटिविटी क्या है

–       दूसरों के कार्यों में हमेशा कमी निकालना.

–       अपने काम से संतुष्ट न होना. हमेशा काम में मन न लगने का रोना रोते रहना, लेकिन उसे अच्छा बनाने के लिए कोई खास प्रयास न करना.

–       छोटी सी बात पर हायतोबा मचाना और अपने साथ दूसरों को भी परेशान करना.

–       दूसरों को आगे बढ़ता और खुश देख कर जलन महसूस करना.

–       अपने से अमीर या संपन्न लोगों को देख कर खुद को हीन समझना.

–       खुद पर विश्वास न होना.

–       किसी भी काम को ट्राई करने से पहले ही उस का नतीजा सुना देना, ‘वह काम मुझ से नहीं होगा, मुझे नहीं आता,’ वगैरावगैरा.

नैगेटिव थिंकिंग को पौजिटिव थिंकिंग में कैसे बदलें

–       यदि किसी खास परिस्थिति को ले कर आप के मन में नकारात्मक विचार हैं और आप गुस्से में हैं तो कुछ देर शांत रहें और उस परिस्थिति को किसी दूसरे नजरिए से देखें. खुद ब खुद आप के मन में सकारात्मक विचार आ जाएंगे.

–       आज नियमित काम से कुछ अलग हट कर करें. वह आप की कोई हौबी या फिर ऐसा गुण भी हो सकता है जिसे आप भूल गए थे. ऐसा करने पर आप को खुद से प्यार होगा और लगेगा कि आप भी लीक से हट कर कुछ नया और अच्छा करने की काबिलीयत रखते हैं, इस से अपने प्रति आप का नजरिया पौजिटिव हो जाएगा.

–       यदि शारीरिक रूप से सौंदर्य के मामले में आप में कोई कमी है तो उसे सहज स्वीकार करें. अगर उस कमी के बारे आप हीनभावना के शिकार होते हैं तो ऐसे में उन्हें न देखें, जिन में कोई कमी नहीं है बल्कि ऐसे लोगों को देखें जिन में आप से भी ज्यादा कमी है और वे खुशहाल जीवन जी रहे हैं. ऐसे लोगों से प्रेरणा लें.

–       किसी फैमिली फंक्शन में जाएं तो वहां कमियां न निकालें. ऐसा करने से खुद को रोकें और अच्छा देखने का प्रयास करें. वहां आप कमियां निकालने नहीं बल्कि ऐंजौय करने आए हैं.

–       नकारात्मकता से व्यक्ति गुस्सैल हो जाता है इसलिए किसी भी बात पर तुरंत रिऐक्ट करने से पहले एक बार अवश्य सोचें कि जो आप कहने जा रहे हैं वह सही है या आप के बेवजह के गुस्से का परिणाम है. जवाब आप को मिल जाएगा और उस के साथ आप का गुस्सा भी शांत हो जाएगा व पौजिटिव सोच भी आ जाएगी.

नई बाजार संस्कृति में फंसते युवा

आज एक नई बाजार संस्कृति का प्रसार तेजी से हो रहा है. हर शहर में मौल्स खुल रहे हैं. साथ ही मल्टीप्लैक्स भी हैं, जहां खरीदारी से पहले या बाद में फिल्म देखी जा सकती है. हां, यह बात अलग है कि इस के लिए आप को काफी महंगा टिकट खरीदना पड़ता है. इतना ही नहीं, अब तो महंगे रैस्टोरैंट और बार की सुविधाएं भी इस नई बाजार संस्कृति का हिस्सा बन रही हैं.

युवाओं के मन में हमेशा यह चाह रहती है कि वे स्मार्ट बनें. इस चक्कर में वे बाइक से जगहजगह घूमते हैं. मौल्स में जा कर कम कीमत की चीजें खरीदते नजर आते हैं, लेकिन सचाई कुछ और ही होती है.

यह बात जरूर है कि इस संस्कृति के चलते सभी चीजें एक छत के नीचे उपलब्ध हो जाती हैं, लेकिन साथ ही कुसंस्कृति को भी बढ़ावा मिल रहा है और आगे चल कर यह युवाओं को कहां ले जाएगी, कहा नहीं जा सकता. भारतीय युवाओं पर इस के दुष्परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं. यह संस्कृति जीवनयापन की नई समस्या ले कर आई है. हमारा देश सभ्यता और संस्कृति के लिए विख्यात है. आज अमेरिका और इंगलैंड जैसे देश भी हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं, लेकिन हमारी युवापीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति दीवानी है.

नई बाजार संस्कृति युवाओं को अपने कब्जे में ले रही है. बड़ी कंपनियां औफर्स दे कर युवाओं को आकर्षित कर रही हैं. ये दूसरी चीजों पर खुले बाजार से अधिक कीमत वसूल कर बड़ी चालाकी से उस की भरपाई कर लेती हैं. युवा आसानी से इन के जाल में फंस जाते हैं. उन्हें लगता है कि बाजार से कम कीमत पर चीजें खरीद कर उन्होंने अच्छा सौदा किया है, लेकिन सचाई कुछ और ही है.

इस बाजार में अब तो बार चलाने के लाइसैंस भी दिए जा रहे हैं. हुक्का बार तक खुल गए हैं, जहां किसी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं होती. महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी में नशे की पार्टियां चल रही हैं. यह खबर चौंकाने वाली है कि मौल के बार में नाबालिगों की पार्टियां होने लगी हैं. मौल के ये बार ऐसी पार्टियों के लिए अलग से सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं. इस गु्रप को पार्टी के लिए अलग से कैबिन की सुविधा दी जाती है. नाचनेगाने का मन करे तो इन के लिए डांस फ्लोर भी हैं.

नई पीढ़ी की मौजमस्ती का नया साधन उपलब्ध करा कर ये आर्थिक दोहन ही नहीं कर रहे बल्कि युवाओं को राह से भी भटका रहे हैं. ऐसे ही एक बार में किशोरों की पार्टी हुई, जिस में नामचीन निजी स्कूलों के छात्र शामिल थे. एक बार से देर रात को एक छात्रा को भी नशे की हालत में बाहर निकलते हुए देखा गया. आखिर यह संस्कृति युवाओं को किस ओर ले जाएगी, इस का किसी को अंदाजा नहीं है  

प्रशासनिक अधिकारी यह कह कर इस कुसंस्कृति को बढ़ाने के मामले से खुद को अलग कर लेते हैं कि उन का काम लाइसैंस की शर्तों के उल्लंघन के मामले देखने का है. उलटे वे सवाल भी करते हैं कि यदि युवा ऐसे बारों में जा रहे हैं तो उन के अभिभावक क्या कर रहे हैं  हालत यह है कि यह कुसंस्कृति पारिवारिक विघटन का कारण बन रही है.

दाढ़ी बढ़ाने की संस्कृति

क्लीनशेव का जमाना अब चला गया. अब हलकीहलकी दाढ़ी रखने का चलन है. जिन किशोरों की अभी दाढ़ी नहीं आई है वे भी इस के लिए परेशान दिखते हैं. उन में जल्द दाढ़ी आने की चाह रहती है. फिल्मों और धारावाहिकों से यह दाढ़ी का चलन आया है. इस नए लुक को युवक खूब पसंद कर रहे हैं. उन का कहना है कि हलकी दाढ़ी में वे हौट लगते हैं. दाढ़ी सैट करवाने के लिए महंगे हेयर ड्रैसर के पास जाते हैं. वहां उन से मनमाना पैसा वसूला जाता है. यहां भी वे बाजार की गिरफ्त में आ जाते हैं.

अब मर्दाना ब्यूटी सैलून भी खुलने लगे हैं. वहां आप का फेस देख कर दाढ़ी की कटिंग की जाती है. आज युवकों द्वारा बनाए गए तमाम ऐसे हेयरस्टाइल्स आप को दिख जाएंगे, जिन्हें आप ने पहले कभी नहीं देखा होगा. कान के दोनों तरफ बाल साफ, केवल फ्रंट के बाल, वह भी सीधे खड़े हुए. 

आजकल हेयरस्टाइल में शौर्ट, जिगजैग, क्रूकट और रेजर कट फैशन में हैं. बालों का स्टाइल आप की पर्सनैलिटी को खिला देता है. रेजर कट बाल सिर्फ ब्लेड से ही काटे जाते हैं. आज युवक इसे खूब पसंद कर रहे हैं. युवतियों को भी ऐसे ही युवक पसंद आते हैं.

बढ़ती रफ्तार के सौदागर

यह स्टाइल का जमाना है. फैशन के इस दौर में बाइक का शौक युवाओं के सिर चढ़ कर बोल रहा है. बाइक राइडिंग आजकल युवकयुवतियों का शौक बन चुका है. तेज रफ्तार बाइक चलाना स्टाइल में है. बाइक पर स्टंट दिखाना युवाओं के लिए आम हो गया है, लेकिन इस में छोटी सी लापरवाही से उन की जान पर आ बनती है. बाइक चलाने के लिए केवल ड्राइविंग लाइसैंस की ही नहीं, बल्कि उस के साथ जरूरी दस्तावेजों का होना भी जरूरी होता है.

आज युवक अकसर दस्तावेजों को ले कर नहीं चलते. जब चैकिंग होती है तो वे तेजरफ्तार से बाइक चला कर भागने की कोशिश करते हैं. ये दस्तावेज सरकार की ओर से निर्देशित होते हैं. किसी भी दुर्घटना के बाद पहचान आदि में ये काम आते हैं. लेकिन युवकयुवतियां ऐसा नहीं करते. वे अकसर इन्हें घर पर ही भूल जाते हैं. कोई भी वाहन चलाते समय पौल्यूशन अंडरकंट्रोल सर्टिफिकेट का साथ होना बेहद जरूरी है. इस के न होने पर आप का चालान हो सकता है. इस प्रमाणपत्र को हर 3 महीने में रिन्यू कराना पड़ता है.

राज्य सरकार ड्राइविंग लाइसैंस 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को ही जारी करती है, लेकिन कुछ कम उम्र के किशोर भी इसे फर्जी सर्टिफिकेट या पैसा दे कर प्राप्त कर लेते हैं. आप की बाइक की चोरी या दुर्घटना होने पर ये जरूरी कागजात आप की बहुत मदद करते हैं. ऐसी स्थिति में इंश्योरैंस  कंपनी आप की चोरी हुई बाइक की कीमत या दुर्घटना क्लेम की रकम अदा कर देती है, लेकिन कुछ मनचले युवक इस सर्टिफिकेट को नहीं बनवाते और हादसे का शिकार हो जाते हैं.

दुर्घटनाओं का लाइसैंस जारी है

देश में हर साल करीब 1 लाख से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इस में युवकों की संख्या ज्यादा होती है. उत्तर प्रदेश में खौफनाक आंकड़ा सालाना 15 हजार के आंकड़़े को पार कर जाता है. दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं में यह सब से ज्यादा है. इस का मुख्य कारण है आंख मूंद कर ड्राइविंग लाइसैंस जारी करना. दरअसल, ड्राइविंग लाइसैंस नहीं, यह तो मौत के परवान हैं.

कभीकभी तो ड्राइविंग लाइसैंस देते समय इस बात की पुष्टि भी नहीं की जाती कि लाइसैंस लेने वाले को वाकई वाहन चलाना आता भी है या नहीं.

प्रदेश के आरटीओ दफ्तरों का हाल यह है कि वहां न तो इतनी जगह है और न ही इतना स्टाफ कि ड्राइवरों की नियमानुसार जांच की जा सके, तिस पर दलालों की भरमार है, फाइलों का अंबार है. ये पैसा उगाही का अड्डा हैं, यहां नियमों के पालन करने का किसी के पास वक्त नहीं है.

दिल्ली से सटे गाजियाबाद की हालत और भी नाजुक है. गाजियाबाद के आरटीओ दफ्तर का हाल यह है कि यहां ड्राइविंग लाइसैंस बनवाने के लिए रोज करीब 200-300 आवेदन आते हैं. उन में से करीब 100-125 लोगों को बिना वाहन चलवाए ही लाइसैंस जारी कर दिए जाते हैं. यहां दफ्तर में ड्राइविंग टैस्ट लेने के लिए कोई जगह नहीं है.

यह सिर्फ एक दफ्तर की बात नहीं बल्कि अन्य जगह भी ऐसा ही हाल है. कुछ आरटीओ के पास तो दफ्तर के लिए अपनी इमारत तक नहीं है. यहां तो सिर्फ चेहरा देख कर लाइसैंस जारी कर दिया जाता है. यहां भी वाहन चला कर देखने का कोई इंतजाम नहीं है.

हर किसी की जान प्यारी

दूर  का सफर तय करने के लिए बाइक राइडिंग का टशन तो फैशन बन चुका है. इस टशन और जरूरत में सामंजस्य की आवश्यकता है. हम बाइक या कार तो अपने आराम के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कभीकभी ये हमारे आराम को हराम कर देते हैं.

हमारी जान कितनी कीमती है, शायद आज के युवा नहीं समझते. आज हालत यह है कि किसी की जेब में ड्राइविंग लाइसैंस है तो यह जरूरी नहीं कि वह ड्राइवर होगा ही. ऐसा अनुमान है कि देश में बिना जांच के हर साल करीब 10 लाख लाइसैंस जारी हो जाते हैं. ऐसे ड्राइवर बनेंगे तो दुर्घटनाएं ही होंगी.

देश की जनसंख्या वृद्धि भी दुर्घटनाओं का बहुत बड़ा कारण है, जिस दिन हम जनसंख्या पर काबू पा लेंगे, उस दिन इस में बहुतकुछ सुधार हो सकता है.

जनसंख्या वृद्धि भी रोड पर भीड़ का कारण है. वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है. रोड पर घंटों जाम लग जाता है. जाम खत्म होते ही लोग तेज रफ्तार से अपने गंतव्य की ओर भागते हैं, जिस से दुर्घटनाएं होती हैं. रोड पर भीड़ ज्यादा होने के कारण दुर्घटना की चपेट में निर्दोष लोग आ जाते हैं. इन में युवाओं की संख्या ज्यादा है.

बाइक पर रोमांस

अब पहले वाला रोमांस नहीं रहा. आज युवा बाइक पर रोमांस करते हैं. उन के प्रेम की शुरुआत बाइक पर होती है. बाइक पर ही तो साथी का पूरा स्पर्श मिलता है. पुरानी फिल्मों में बैलगाड़ी पर रोमांस हुआ करता था. इस रोमांस की रफ्तार बड़ी धीमी होती थी, लेकिन आज हवा से बातें करता रोमांस सब को ओवरटेक कर रहा है.

आज के युवा राइडर्स भी हैं और प्रेमी भी. रोमांस के भी अब पर निकल आए हैं. युवतियों को एक अच्छे राइडर की तलाश रहती है. युवतियां भी राइडिंग में पीछे नहीं हैं. आज हर किसी को रफ्तार से प्यार हो गया है. ऐसे में भला रोमांस को भी रफ्तार पकड़ने में देर कैसी

दरअसल, आज के युवाओं में राइडिंग का जनून है. अपनी गर्लफ्रैंड को बाइक की पिछली सीट पर बैठा कर हवा से बातें करना उन्हें बेहद पसंद है. आज के राइडर्स एकांत में रोमांस का मजा लेना चाहते हैं. वे ऐसी जगह रोमांस करना चाहते हैं, जहां उन्हें ब्रेक लगाने की जरूरत न पड़े, लेकिन कभीकभी इस रोमांस का खतरा भी उन्हें झेलना पड़ता है.

इसलिए युवकों को चाहिए कि बाइक पर रोमांस करते समय बाइक को धीरे चलाएं, बातें कम करें. रैडलाइट और रेलवे क्रौसिंग का खास ध्यान रखें.

अगर आप नौसिखिए हैं तो बाइक पर रोमांस कदापि न करें. ग्रुप के साथ हों तो एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ न मचाएं. हमारी संस्कृति धीरे और सुरक्षित चलने की है.                                 

हिंदी मीडियम : मूल मुद्दे के साथ घोर अन्याय

यूं तो ‘‘हिंदी मीडियम’’ एक रोमांटिक कामेडी फिल्म है. मगर इस फिल्म का मूल मकसद अपने ही देश में अंग्रेजी भाषा के सामने राष्ट्रभाषा व मातृभाषा हिंदी को कमतर आंकना तथा शिक्षा का जो व्यापारीकरण हो गया है, उस पर चोट करना है. मगर अफसोस की बात यही है कि इन दोनों ही मुद्दों पर यह फिल्म बुरी तरह से असफल रहती है. ऐसा कहानीकार व पटकथा लेखक की कमजोरी का परिणाम है. इन मुद्दों पर बहुत बेहतरीन फिल्म व दर्शकों के दिलों को छू लेने वाली फिल्म का निर्माण किया जा सकता था.

फिल्म में सब कुछ बहुत ही उपरी सतह पर तमाम कमियों के साथ कहने की कोशिश की गयी है. कहानी व पटकथा लिखते समय फिल्म के लेखक शायद अंदर ही अंदर डरे हुए थे अथवा विषयवस्तु के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे. तभी तो फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में इस बात को उकेरा गया है कि एक सर्वश्रेष्ठ व उच्च कोटि के अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में डोनेशन लेकर बच्चे को प्रवेश नहीं दिया जाता है. खुद को पाक साफ और ईमानदार बताने वाली स्कूल की प्रिंसिपल जब पिया का नाम गरीब कोटे से हटाकर जनरल कोटे में कर देती है, तब वह गरीब कोटे की खाली हुई इस सीट पर मोहन को प्रवेश न देकर क्या करना चाहती हैं, इस पर फिल्म कोई रोशनी नहीं डालती.

रोमांटिक कामेडी फिल्म ‘‘हिंदी मीडियम’’ की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक में रहने वाले दंपति राज बत्रा (इरफान खान) और मीता (सबा करीम) के इर्द गिर्द घूमती है. राज बत्रा चांदनी चौक में कपड़े का व्यापारी है. पत्नी मीता के प्यार व अच्छा पति बनने के चक्कर में राज अपनी पत्नी मीता की इस बात को स्वीकार कर लेता है कि उन्हें अपनी बेटी पिया की शिक्षा दिल्ली में अंग्रेजी माध्यम के उच्च कोटि के स्कूल में करवानी हैं, न कि सरकारी स्कूल में. इसी के चलते वह चांदनी चौक छोड़कर वसंत विहार की पाश कालोनी में रहने पहुंच जाते हैं. वहां पड़ोसियों के बीच वह खुद को हाई फाई और अंग्रेजी के ज्ञाता के रूप में स्थापित करने का असफल प्रयास करते हैं. राज व मीता अपनी बेटी पिया को दिल्ली के अति सर्वश्रेष्ठ गिने जाने वले पांच स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए एक कंसल्टेंट की मदद लेते हैं, जो कि इन्हे ट्रेनिंग देती है. कई तरह की मुसीबतें झेलने के बावजूद इनकी बेटी को प्रवेश नहीं मिल पाता है.

तभी इन्हें पता चलता है कि अपने पसंदीदा स्कूल में बेटी को प्रवेश दिलाने के लिए उन्हे ‘राइट टू एज्यूकेशन’ के तहत हर स्कूल में तय पच्चीस प्रतिशत गरीओं के कोटे का सहारा लेना चाहिए. इसके लिए राज एक इंसान से मिलकर सारे गलत कागज बनवाता है. जांच होने पर पकडे़ न जाने के लिए एक माह के लिए एक गरीब बस्ती में पूरे परिवार के साथ जाकर रहना शुरू करते हैं. जहां उनका पड़ोसी श्याम प्रकाश (दीपक डोबरियाल), उसकी पत्नी व बेटा मोहन रह रहा है. मोहन व पिया के बीच अच्छी दोस्ती हो जाती है. श्याम प्रकाश अपनी तरफ से राज की मदद करने का पूरा प्रयास करता है.

जब 24 हजार जमा करने का वक्त आता है, तो श्याम प्रकाश खुद की जिंदगी खतरे में डालकर राज को पैसा देता है. पर जब गरीब कोटे की लाटरी निकलती है, तो मोहन को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, पर पिया को मिल जाता है. फिर राज व मीता अपनी बेटी पिया के साथ वापस अपने पाश मकान में रहने चले जाते हैं. मगर अपराध बोध से ग्रसित राज एक सरकारी स्कूल को पैसे देकर उसके हालात सुधारते हैं. मगर एक वक्त वह आता है, जब राज अपनी बेटी पिया को उसी अंग्रेजी स्कूल से निकाल कर मोहन के साथ सरकारी स्कूल में प्रवेश दिला देते हैं.

फिल्म का गीत संगीत अति साधारण है. फिल्म की लोकेशन व कैमरामैन के काम की प्रशंसा की जा सकती है.

इरफान खान, सबा करीम और दीपक डोबरियाल के बेहतरीन अभिनय के बावजूद यह फिल्म अपनी छाप छोड़ने में असफल रहती है. फिल्म में जिस करोड़पति और हाई फाई सोसायटी की बात की गयी है, उससे आम दर्शक रिलेट नहीं कर सकता. फिल्म की कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, वह कहीं से भी सहज व स्वाभाविक नहीं लगती. बल्कि शुरू से अंत तक सब कुछ अति बनावटी ही लगता है. इंटरवल के बाद फिल्म पूरी तरह से पटरी पर से उतर जाती है. फिल्म के क्लायमेक्स से चंद मिनट पहले हिंदी भाषा को लेकर राज बत्रा यानी कि इरफान का लंबा चौड़ा भाषण है, मगर उस सभाग्रह में मौजूद माता पिता पर कोई असर न होना बड़ा अजीब सा लगता है. स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिलाने में सरकारी तंत्र के अलावा स्कूल मैनेजमेंट की जो भूमिका होती है, जिस तरह के नाटक होते हैं, उस पर भी रोशनी डालने से लेखक व निर्देशक ने बचने का पूरा प्रयास किया है. जबकि सर्वविदित है कि हर स्कूल व कालेज में मैनेजमेंट कोटा, माइनारिटी कोटा आदि के नाम पर क्या खेल होता है. मगर फिल्मकार ने इन सारे पहलुओं को अनदेखा कर दिया. ऐसा करने के पीछे फिल्मकार की मंशा, फिल्मकार ही जाने. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत घटिया है. फिल्म में संजय सूरी और नेहा धूपिया जैसे कलाकारों को जाया किया गया है.

फिल्म में बात बात पर मीता अपने पति राज से कहती है कि फिर उनकी बेटी पिया सरकारी स्कूल में पढ़ेगी, फिर वह ड्रग्स लेगी..वगैरह..यह संवाद पूर्णरूपेण गलत है. ड्रग्स का सेवन या ड्रथ्स के व्यापार को हिंदी भाषा की शिक्षा के साथ जोड़कर देखना अपराध ही कहा जाना चाहिए. क्या अंग्रेजी माध्यम से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लोग ड्रग्स या शराब में लिप्त नहीं हैं?

शिक्षा के बाजारीकरण, अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ाने के मुद्दे व इसकी परेशानी से देश के हर शहर का आम इंसान जूझ रहा है. हर माता पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की बजाय अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं. मगर इन आम लोगों की इस इच्छा के चलते इन्हे जिस तरह रोजमर्रा की जिंदगी में समस्याओं से जूझना पड़ता है, डोनेशन ने जो विकराल रूप ले रखा है, उस पर यह फिल्म चुप्पी साध लेती है. इसके क्या मायने निकाले जाएं?

हकीकत में पटकथा लेखक द्वय व निर्देशक ने फिल्म में इतनी बड़ी बड़ी गलतियां की हैं कि उन्हें गिनाने में कई पन्ने भर जाएंगे. पूरे माह गरीब की जिंदगी जीने वाले राज के कपड़े के व्यापार का क्या हुआ? फेसबुक पर राज व मीता की प्रोफाइल चेक कर सच का पता लगाने की बजाय स्कूल की प्रिंसिपल एक इंसान को गरीब बस्ती में राज से मिलने भेजती हैं..वगैरह..वगैरह कई गलतियां है.

दो घंटे 12 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हिंदी मीडियम’’ का निर्माण भूषण कुमार व दिनेश वीजन, निर्देशन साकेत चौधरी, कहानी व पटकथा लेखकद्वय जीनत लखानी व साकेत चौधरी, संगीतकार सचिन जिगर, पार्श्वसंगीतकार अमर मोहिले तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – इरफान खान, सबा करीम, दीपक डोबरियाल, स्वाती दास, दिशिता सहगल, डेलजाद हिवाले, जसपाल शर्मा, विजय कुमार डोगरा, रोहित तन्नन व अन्य.

यहां की मूंग में शराब है

भारतीय किसान की प्रयोग धर्मिता किसी सबूत की मोहताज कभी नहीं रही, यह दीगर बात है कि वह वैज्ञानिक कम जुगाड़ू ज्यादा होती है. नवाचारी किसानों को प्रोत्साहन देने सरकार उन्हें समारोह पूर्वक सम्मानित भी करती है जिससे सम्मानित किसान का रुतबा देश भर में बढ़ जाता है, अपने इलाके के किसानों का तो वह रोल मॉडल हो जाता है.

मध्य प्रदेश का इटारसी कस्बा पश्चिम मध्य रेलवे का प्रमुख जंक्शन है जो मुमकिन है जल्द ही शराब वाली मूंग के लिए जाना जाने लगे. इटारसी के तीन गांवों सोमलवाड़ा, चांदौन और घाटली में इन दिनों शराब की नदियां बह रहीं हैं. किसान खुद भले ही न पिएं, पर खेतों में लहलहा रही अपनी मूंग की फसल को जरूर शराब पिला रहे हैं. इन गांवों के किसानों का मानना है कि ग्रीष्म कालीन मूंग में शराब से सिंचाई करने से फसल की बढ़वार और पैदावार दोनों में इजाफा होता है, इसके लिए वे देसी शराब का एक पौव्वा लेकर उसे सिंचाई के पानी में मिलाते हैं और एक एकड़ रकबे में उसे छोड़ देते हैं इसमे वे थोड़ी सी मात्रा में कोई कीटनाशक दवा भी घोलते हैं.

इस नए फार्मूले की लागत 75 रुपये भर आती है, सस्ता होने के चलते इसे अब बड़े पैमाने पर आसपास के गांवों के किसान भी आजमा रहे हैं और पूरे आत्मविश्वास से कह भी रहे हैं कि इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक मिल रहे हैं. इस प्रयोग या टोटके का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी यह खूब फल फूल रहा है जिस पर खेती किसानी महकमे ने चुप्पी साध रखी है. पिछले साल कुछ किसानों ने इस नुस्खे को ईजाद करते आजमाया था, इत्तफाक से फसल अच्छी हुई तो दूसरे किसानों को भी ज्ञान प्राप्त हुआ कि इसमे हर्ज क्या है, क्योंकि कीटनाशक, उर्वरक इस्तेमाल किए जाएं तो उनके मंहगे होने के कारण लागत बढ़ती है और मुनाफा कम हो जाता है.

इस खब्तपन में मुमकिन है शराब विक्रेताओं का हाथ हो, मुमकिन यह भी है कि यह गणेश जी के दूध पीने जैसी अफवाह हो, लेकिन जो भी हो, है तो और सभी की दिलचस्पी इस में बढ़ रही है. एल्कोहल का फसलों पर कोई फर्क पड़ता है, इस पर अभी तक वैज्ञानिक कुछ खास नहीं बोले हैं. अब मुमकिन यह भी है कि इस मूंग की मांग बढ़े, क्योंकि इसमें शराब जो मिली है.

वैज्ञानिकों के पास मौका है कि वे इस का अध्ययन करें और इस शराबी मूंग का सेवन करने वालों से पूछें कि क्या इससे नशे जैसा कुछ महसूस होता है, अगर जबाब हां में मिले तो तय है मदिरा प्रेमी इस मूंग पर टूट पड़ेंगे और किसी भी भाव में इसे खरीदेंगे. दूसरी फसलों की सिंचाई भी शराब से की जाने लगे, तो बात कतई हैरत की नहीं होगी, रही बात बाद की दिक्कतों के तो उनकी परवाह प्रयोगवदी किसान करते ही नहीं. यदाकदा फसलों की सिंचाई कोल्ड ड्रिंक्स से करने की खबरें आई थीं पर उनसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे, जो अब शराब से मिल रहे हैं तो तय है मजा तो आएगा. फिल वक्त तो इन गांवों की मूंग वाकई खेतों मे झूम रही है.

एसआईपी: छोटी बचत को बनाए बड़ा

हर महीने आप खुद से एक वादा करती हैं अपने जरूरी खर्चों से कुछ पैसे बचा कर बचत करने का. लेकिन महीने गुजरते जाते हैं और आप का वादा अधूरा ही रह जाता है. इस के अतिरिक्त कामकाजी महिलाएं जो अपने वेतन में से कुछ पैसे बचा कर बचत करती भी हैं, तो उन का तरीका बहुत प्रभावशाली नहीं होता यानी बचत के लिए वे आवर्ती जमा खाता (आरडी) चुनती हैं, जो उन्हें उन के लक्ष्य को पूरा करने हेतु जरूरी धनराशि जुटा पाने की सुविधा नहीं देता.

मसलन, बच्चे की उच्च शिक्षा हेतु या फिर बेटी के विवाह के लिए जितने धन की आवश्यकता भविष्य में पड़ सकते है, उसे आवर्ती जमा खाते के लाभ से पूरा नहीं किया जा सकता.

एसआईपी क्यों जरूरी

मान लीजिए आप का लक्ष्य अपनी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए पैसे की बचत करना है. पहले से ही महंगी उच्च शिक्षा हर वर्ष 10-12% की दर से और भी महंगी होती जा रही है. ऐसे में यदि आप अपनी 2 वर्ष की बेटी को 18 वर्ष बाद एमबीए कराना चाहती हैं तो आप को फीस के लिए उस वक्त क्व80 लाख की आवश्यकता पड़ सकते है जबकि वर्तमान में इस कोर्स की फीस लगभग क्व15 लाख ही है.

व्यावहारिक रूप से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सिर्फ बैंक खाते में पैसे की बचत या आवर्ती जमा खाते के माध्यम से 8-9% का लाभ पाने के लिए निवेश काफी नहीं है, बल्कि इस के लिए आप को 12% या इस से भी अधिक ब्याज दर से रिटर्न प्रदान करने वाले निवेश की आवश्यकता है. यहां म्यूचुअल फंड लक्ष्य को प्राप्त करने में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं.

हो सकता है कि गृहिणियों और कामकाजी महिलाओं को म्यूचुअल फंड में निवेश करना थोड़ा जोखिम भरा लगेगा, लेकिन सिप (सिस्टमैटिक इनवैस्टमैंट प्लानिंग) के माध्यम से म्यूचुअल फंड में निवेश करने में जोखिम की संभावना कम होती है. एसआईपी निवेश का एक ऐसा विकल्प है, जो एक समय अवधि में केवल प्रति माह क्व1000 की राशि निवेश कर के धन बढ़ाने में मदद करता है.

कैसे तय करें वित्तीय लक्ष्य

आप इन 5 सिद्धांतों पर अमल कर के अपने वित्तीय लक्ष्य तय कर सकते हैं.

– जिस दिन से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास शुरू करने जा रही हैं, वह दिन तय कर लें.

– अपने वित्तीय लक्ष्यों की वर्तमान लागत का मूल्यांकन करें.

– मुद्रास्फीति सहित अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए तय की गई धनराशि का मूल्यांकन करें.

– निवेश के विकल्प का चुनाव और उस से मिलने वाले रिटर्न का मूल्यांकन करें.

– निवेश की अपनी मासिक किस्त तय करें.

एसआईपी की शुरुआत

निवेश हमारे लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करता है. हर किसी के अपनेअपने लक्ष्य मसलन रिटायरमैंट, बच्चों की शादी, शिक्षा, नई कार खरीदना, छुट्टियां बिताने विदेश जाना आदि होते हैं. सही रिटर्न पाने के लिए निवेश के सही उद्देश्य का पता लगाना जरूरी है. आप म्यूचुअल फंड की विभिन्न योजनाओं में से किसी का भी चयन कर सकते हैं. लार्ज कैप, स्मौल कैप, मिड कैप, फ्लैक्सी कैप आदि ऐसी ही कुछ योजनाएं हैं.

म्यूचुअल फंड खरीदने के लिए आप औनलाइन आवेदन करने के साथसाथ यह सुविधा देने वाले बैंक इत्यादि से भी संपर्क कर सकते हैं.

एसआईपी की मासिक किस्त जमा करने के लिए कोई भी विभिन्न तारीखों का चयन कर सकते हैं. हर म्यूचुअल फंड कंपनी की अपनी तारीखें होती हैं. ज्यादातर कंपनियों में हर माह 1 से 5 तारीख किस्त जमा करने के लिए तय होती हैं. दूसरे निवेशों की तुलना में एसआईपी की सब से अच्छी बात यह होती है कि आप म्यूचुअल फंड की किस्त के भुगतान को अपने बचत खाते से ईसीएस द्वारा कटवा सकते हैं.

एसआईपी में निवेश के समय क्या करें

– अपने लक्ष्यों की योजना पहले से बनाएं और उसी के आधार पर एसआईपी लें.

– आप को अपने पेशे में जैसेजैसे प्रोमोशन मिलती जाए वैसेवैसे आप एसआईपी की राशि को अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बढ़ा सकते हैं.

– जैसे जैसे आप अपने वित्तीय लक्ष्यों के करीब आती जाएं, वैसेवैसे अपने पैसे को सुरक्षित निवेश विकल्पों में हस्तांतरित करती जाएं.

क्या न करें

– सारे पैसे एक ही म्युचूअल फंड में निवेश न करें, बल्कि 3-4 स्कीमों में मसलन लार्ज कैप, मिड कैप, स्मौल कैप, फ्लैक्सी कैप में लगाएं.

– अपनी एसआईपी स्कीम की रोज निगरानी न करें, बल्कि निवेश के बाद जब तक आप अपने वित्तीय लक्ष्य के नजदीक न पहुंचें तब तक के लिए अपने निवेश को भूल जाएं.

– बाजार के उतारचढ़ावों से परेशान न हों. अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लेने के बाद ही कोई फैसला लें.

जब सचिन की गेंद पर युवराज ने जड़ा छक्का

क्रिकेट में रोज नए रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते हैं. इसलिए तो इसे अनिश्चिताओं का खेल कहा गया है. इस खेल में कब क्या हो दाए कोई नहीं जानता. कई टूर्मामेंट में तो अपने ही टीम का खिलाड़ी आपका प्रतिद्वंद्वी बन जाता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है आईपीएल.

ऐसे टूर्नामेंट में कई रोचक घटनाएं देखने को मिलती है. कुछ ऐसा ही हुआ एक मैच में जब युवराज सिंह नें सचिन तेंदुलकर की गेंद पर छक्का जड़ दिया और फिर बाद में उनके पैर छू लिए.

दरअसल बात ये थी कि सचिन तेंदुलकर मेलबर्न क्रिकेट क्लब की कप्तानी कर रहे थें तो युवराज, शेन वॉर्न की कप्तानी में रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड टीम के लिए खेल रहे थें. उस वक्त युवराज सिंह 124 रन बनाकर खेल रहे थें.

पारी का 49वां ओवर डालने के लिए सचिन क्रीच पर आएं. सचिन की तीसरी बॉल पर युवराज ने दो रन के लिए दौड़ लगाई और चौथी बॉल पर युवराज ने सचिन के सिर के ऊपर से सिक्स लगाया. युवराज इस दौरान कुछ पशोपेश में भी नजर आ रहे थें. शायद उनको ये लग रहा था कि जिनकी गेंद पर उन्होंने सिक्स लगाया है उन्हीं को वह अपना गुरु भी मानते हैं लेकिन ये बल्लेबाज उस वक्त मैदान पर था और रन बनाना ही उनका कर्म था लेकिन युवराज ने पांचवी गेंद पर एक हल्का शॉट लगाया और वो रेनेशॉ के हाथों 132 रन पर कैच आउट हो गए.

युवराज ने पवेलियन लौटने से पहले सचिन के पैर छुए. इस दौरान लॉर्डस के मैदान में खड़ा हर एक शख्स जोर-जोर से तालियां बजा रहा था. ये पल बेहद भावुक कर देने वाला था.

बता दें कि 2016 में मुंबई इंडियंस और सनराइजर्स हैदराबाद के बीच हुए आईपीएल मैच के दौरान भी युवी ने सचिन तेंदुलकर के पैर छू लिए थे.

हालांकि एक इंटरव्यू के दौरान सचिन तेंदुलकर ने कहा था कि वह युवराज सिंह को अपने छोटे भाई की तरह मानते हैं.

बिल्डरों को करें मजबूर

अपना मकान हो, यह सपना सब देखते हैं पर देशभर में बिल्डरों से मकान खरीदना जोखिमभरा काम है. यह लौटरी के महंगे टिकट लेने की तरह का कदम हो गया है जिस में पैसे तो लगाने पड़ते हैं पर मकान मिले या न मिले, कुछ नहीं कहा जा सकता. दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम आदि में सैकड़ों बिल्डरों ने मकान बनाने के वादे कर पैसे तो ले लिए पर जो काम 2 वर्षों में होना चाहिए था, 5-7 वर्षों में भी नहीं किया.

बहुत से लोगों ने इस लालच में अपनी जमापूंजी लगाई कि बाद में या तो रहने को मिलेगा या महंगे में बेच कर मोटा पैसा मिलेगा. बहुतों ने कर्ज भी लिया और वे किस्तें भी भर रहे हैं और किराए के मकान में भी रह रहे हैं. अदालतें आजकल बिल्डरों पर सख्त हो रही हैं पर सच यह है कि न केवल बिल्डर, सरकारें और जनता भी दोषी हैं.

कई मामलों में सरकार द्वारा किसानों की अधिग्रहित जमीन पर मकान बन रहे हैं जिसे बिल्डरों ने महंगे दामों पर लिया था. पर किसानों ने मुआवजों आदि पर मुकदमा किया तो मकान बनाने का काम रुक गया. कुछ मामलों में फ्लैट या प्लौट खरीदार मुकदमे ठोक देते हैं कि जो वादा किया था उस से ज्यादा फ्लैटप्लौट बन रहे हैं और काम रुक जाता है. कई दफा पर्यावरण वाले अनुमति नहीं देते.

कई बार आसपड़ोस के रहने वाले बिल्डर का काम रोक देते हैं इसलिए कि उन के नए प्लौटोंफ्लैटों से उन की सुविधाएं कम हो जाएंगी. जिन्होंने फ्लैटप्लौट बुक कराए थे, उन में से कुछ पूरा पैसा एडवांस न दें तो बिल्डरों के पास पैसे की कमी हो जाती है और काम रुक जाता है. एक बिल्डर एक जगह गंभीर रूप से फंस जाए तो नई जगह उस का काम चल भी रहा हो तो वह धीमा हो जाता है या रुक जाता है. मुकदमों के निबटने में लगने वाले समय व पैसे के कारण भी काम रुक जाता है. आजकल अदालतें मामले हाथ में तो ले लेती हैं पर व्यावहारिकता को ताक पर रख कर आदेश जारी कर देती हैं. लेकिन आदेशों से फ्लैट तो नहीं उपज सकते.

बिल्डरों की जमात दूध की धुली नहीं है पर वह उतनी ही बेईमान है जितने नेता, अफसर, पंडे, शिक्षक, दुकानदार, उत्पादक या आम कामगार हैं. बेईमानी हमारी रगरग में भरी है. पर हर किसी ने सफेद कपड़े पहन कर मानो दूसरों की कालिख की बातें करने के ठेके लिए हों. ऐसे माहौल में बिल्डरों को जेल में भेजने या उन पर मोटा फाइन लगाने की धमकी देना निरर्थक है. यह काउंटर प्रोडक्टिव है. या तो इस से लोग उस क्षेत्र में आएंगे ही नहीं या फिर इस जोखिम की कीमत फ्लैटोंप्लौटों की कीमत में जोड़ देंगे. अच्छी बात तो यह होगी कि बिल्डरों को मजबूर किया जाए कि वे सपने न बेचें, बनेबनाए मकान बेचें. केवल नक्शों पर बेचने की जो परंपरा चली है, उसे बंद कर दिया जाए ताकि तैयार मकान बिकें और पूरा पैसा उसी समय लिया जाए जब रहने योग्य फ्लैट या मकान का निर्माण करने योग्य प्लौट दिया जा रहा हो. इस से उस क्षेत्र की बहुत सी तकलीफें कम हो जाएंगी.

रूस, सोशल मीडिया और बच्चे

रूस की सरकार सोशल मीडिया की बहुत समर्थक नहीं है क्योंकि उसे डर लगता है कि इस के माध्यम से व्लादिमीर पुतिन की अर्धतानाशाही पर कहीं आंच न आ जाए पर फिर भी बहुत हद तक जनता के दबाव के कारण उस को इस की इजाजत देनी ही पड़ती है. अब वह एक अच्छा कदम उठा रही है कि 14 साल के कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित कर दिया जाए.

लेकिन इस के लिए यह जरूरी होगा कि हर यूजर के सोशल मीडिया पर आने से पहले उसे अपने पासपोर्ट की जानकारियां देनी होंगी ताकि यह पता रहे कि आवेदक 14 साल से कम आयु का तो नहीं है. अगर इस जानकारी के लिए बिना किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर किसी को भी जुड़ने की इजाजत दे दी गई तो उस पर 1 लाख से 3 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा. जाहिर बात है कि सोशल मीडिया पर जुड़ने वाले हर व्यक्ति का कच्चा चिट्ठा कहीं मौजूद होगा और रूसी सरकार जब चाहे उसे खंगाल सकेगी.

एक अच्छे काम के पीछे किस तरह की दुर्भावना छिपी रहती है, यह हर तानाशाह और धर्मशाह जानता है. हर क्रूर शासक भी कुछ अच्छे काम करता है तो बहुत से मनमाने. लेकिन वह अपने अच्छे कामों का खुला प्रचार करता रहता है और अंधभक्त उसी को सत्य मान लेते हैं. 14 साल से कम आयु के बच्चे सोशल मीडिया पर न आएं, यह अच्छी बात है पर इस के पीछे छिपी मंशा कि सोशल मीडिया पर आने वाले हर यूजर को अपने माथे पर अपना आधार नंबर लगा कर चलना पड़े, गलत होगा. भारत सरकार ने कालेधन के समाप्त करने के नाम पर इसी तरह का नाटक खेला था. कालाधन समाप्त तो हुआ नहीं, हां, वह अमीरों के हाथ से निकल कर शायद बैंकरों, अफसरों, पुलिस वालों के पास चला गया. रूसी सरकार के पदचिह्नों पर चलते हुए भारत में भी बच्चों को बचाने के नाम पर ऐसा ही कुछ होने लगे, तो आश्चर्य नहीं.

मेरा कैनवास अभी खत्म नहीं हुआ है : काजोल

फिल्मी परिवार में पलीबढ़ी अभिनेत्री काजोल देवगन ने फिल्म ‘बेखुदी’ से अपने कैरियर की शुरुआत की थी, लेकिन उन की सफल फिल्म ‘बाजीगर’ थी. बचपन से ही काजोल को कविताएं  लिखना और डरावने उपन्यास पढ़ना पसंद था. आज भी जब समय मिलता है तो वे किताबें पढ़ती हैं.

काजोल और शाहरुख खान की जोड़ी आज भी दर्शकों में लोकप्रिय है. वे स्पष्टभाषी हैं. इसी बात से अभिनेता अजय देवगन प्रभावित हुए और उन्हें अपना जीवनसाथी बना लिया. फिल्म जगत में बेहतरीन परफौर्मैंस के लिए वे पद्मश्री अवार्ड से भी सम्मानित की जा चुकी हैं. काजोल एक सफल अभिनेत्री, पत्नी और मां हैं. मां बनने के बाद उन्होंने अपने अभिनय की दूसरी पारी शुरू की. वे विज्ञापनों में भी देखी जाती हैं. पेश हैं, उन से हुए कुछ सवालजवाब:

दूसरी पारी की शुरुआत का श्रेय किसे देती हैं?

सब से पहले पति अजय देवगन को जिन्होंने मेरे हर काम में हमेशा मेरा साथ दिया. बेटी न्यासा के होने के बाद वे हमेशा कहते रहे कि मुझे काम शुरू कर देना चाहिए. इस के बाद मैं ने ‘फना’, ‘यू मी और हम’, ‘माई नेम इज खान’, ‘वी आर फैमिली’ आदि फिल्में कीं. लेकिन जब बेटा युग हुआ तो मैं ने फिर मदरहुड को अहमियत दी. युग के बाद मेरी बेटी ने मुझे फिर से फिल्मों में जाने की प्रेरणा दी.

क्या कभी लगा कि मां बनने से कैरियर प्रभावित हुआ?

नहीं, बचपन में मैं ने अपनी मां को हमेशा काम करते देखा है. मां ने हमेशा समझाया कि  काम करना जरूरी है. आजकल के बच्चे तो इतने प्रतिभावान हैं कि उन्हें अधिक समझाना नहीं पड़ता. मेरे बच्चे खुश होते हैं कि मैं काम कर रही हूं. जब मैं मां बनी, तो जिम्मेदारी अधिक बढ़ गई थी, इसलिए मैं ने थोड़े दिनों के लिए काम से बे्रक ले लिया था. मेरे लिए केवल बच्चों को जन्म देना ही काफी नहीं, बल्कि उन की परवरिश भी मेरी जिम्मेदारी है और मैं ने उसे पूरी तरह निभाया.

अपने इस सफर को कैसे देखती हैं?

मैं ने फिल्में भी बहुत की हैं. बच्चों को भी अच्छी तरह संभाला और खुद पर भी ध्यान दिया. अभी और बहुत सारे काम करने बाकी हैं. मेरा कैनवास अभी खत्म नहीं हुआ है.

बच्चों को कितनी आजादी देती हैं?

मैं बहुत स्ट्रौंग मदर हूं. उन्हें आजादी कम ही मिलती है. मैं हमेशा लाइफ की प्रायौरिटी समझाने की कोशिश करती हूं. अगर वे बचपन से इस बात को समझ लेंगे तो बड़ा होने पर उन्हें कोई समस्या नहीं आएगी. अपने बच्चों से हमेशा यही कहती हूं कि चाहे स्कूल की परीक्षा हो या लाइफ की कोई भी चुनौती, तब तक सामना करें जब तक उस में सफल नहीं हो जाते.

व्यस्त दिनचर्या में परिवार के लिए समय कैसे निकालती हैं?

समय हम सभी निकालते हैं. बच्चों की छुट्टियां होने पर समय के अनुसार घूमने निकल जाते हैं यानी उन की छुट्टियों के हिसाब से हौलिडे प्लानिंग करते हैं. हम ने

साफ रेखा खींच ली है कि दीवाली, क्रिसमस की छुट्टियों में हम सब साथ रह कर ऐंजौय करेंगे. यह हमारे और हमारे बच्चों  सब के लिए बहुत जरूरी है.

आज की लड़कियां शादी करने और मां बनने से घबराती हैं. आप ने सब कुछ समय

से कर लिया. ऐसे में उन्हें क्या मैसेज देना चाहती हैं?

आज बहुत सारी चौइसेज हैं. अगर आप को सही इनसान मिले, तो कभी यह न सोचें कि आप उसे मैनेज नहीं कर सकतीं. जहां चाह होती है वहीं राह मिल जाती है. जीवन का जो अगला पड़ाव है उसे किसी के लिए भी सैक्रिफाइस न करें, फिर चाहे वह कैरियर हो या पैसा. सही समय पर सही निर्णय न लेने से बाद में मुश्किलें आती हैं.                         

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बच्चों के अनुसार अपना शैड्यूल बनाती हूं : रवीना टंडन

करीब 25 साल इंडस्ट्री में बिता चुकीं अभिनेत्री रवीना टंडन 90 के दशक की मशहूर अभिनेत्री रही हैं. फिल्मी माहौल में जन्मी रवीना को बचपन से ही अभिनय का शौक था. कालेज की पढ़ाई के दौरान उन्हें ‘पत्थर के फूल’ फिल्म का औफर मिला तो खुद को पहली फिल्म से ही स्थापित कर लिया. इस के बाद कई सफल फिल्में कीं, जिन में फिल्म ‘मोहरा’ और ‘दिलवाले’ बौक्स औफिस पर सुपरहिट हुईं. रवीना ने हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्में भी की हैं. रवीना ने अक्षय कुमार, गोविंदा, अजय देवगन, सुनील शेट्टी आदि अभिनेताओं के साथ काम किया है, पर उन की और गोविंदा की जोड़ी को कौमेडी फिल्मों में काफी सफलता मिली. कई बार रवीना और अक्षय के रोमांस के चर्चे भी सुने गए, पर कोई अंजाम नहीं निकला.

रवीना स्पष्टभाषी हैं. हर बात सामने कहना बेहतर समझती हैं. शादी से पहले ही उन्होंने 2 लड़कियों पूजा और छाया को अडौप्ट किया था. फिल्म ‘स्टंप्ड’ के दौरान रवीना का परिचय फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर अनिल थडानी से हुआ और फिर दोनों ने शादी कर ली. दोनों के 2 बच्चे राशा और रणवीर हैं.

रवीना आज एक सफल अभिनेत्री, पत्नी और मां हैं. अपने सभी दायित्वों को वे बखूबी निभा रही हैं. सोनी टीवी के रिऐलिटी शो ‘सब से बड़ा कलाकार’ की वे जज हैं. उन से मिल कर बात करना रोचक रहा:

इस रिऐलिटी शो से जुड़ने की खास वजह क्या है?

इस में सारे प्रतिभावान बच्चे हैं और बच्चों के साथ कुछ भी करना मुझे पसंद है, क्योंकि वे मासूम और साफ दिल के होते हैं. एडल्ट्स के साथ काम करना मुश्किल होता है, क्योंकि उन में ईगो होता है.

क्या कभी अपना बचपन याद आता है?

मेरा बचपन तो ऐसा था ही नहीं. मैं बहुत शाय नेचर की थी. 4 साल की उम्र में केवल अपना नाम लिखना जानती थी. ये बच्चे इतने बड़ेबड़े संवाद कैसे बोलते हैं, ऐक्शन, कौमेडी कैसे कर लेते हैं, मैं देख कर हैरान होती हूं. मैं आज भी आसानी से रिऐलिटी शोज में अभिनय नहीं कर सकती.

अपने बच्चों में क्या प्रतिभा देखती हैं?

मेरा बेटा पूरी तरह से स्पोर्ट्स पर्सन है, तो बेटी डांस और सिंगिंग पसंद करती है. वह शास्त्रीय संगीत सीख रही है.

अपने काम के बीच परिवार को कैसे संभालती हैं?

मैं ने हमेशा परिवार को प्राथमिकता दी है. इसीलिए तो बच्चों के हिसाब से काम चुनती हूं. मैं बच्चों के हर विकास को देखना और ऐंजौय करना चाहती हूं. फिल्में या काम मेरी लाइफ नहीं, बल्कि लाइफ का एक हिस्सा है. फिल्में तो मैं बाद में भी कर लूंगी, पर बच्चों का बचपना लौट कर नहीं आ सकता. उन के शैड्यूल के अनुसार में अपनेआप को ऐडजस्ट करती हूं. बच्चों की छुट्टियों में मैं कोई काम नहीं करती, क्योंकि वह समय उन के लिए होता है. इसीलिए मैं टीवी के किसी फिक्शन शो में काम नहीं करती.

आप किस तरह की मां हैं और बच्चों को कितनी आजादी देती हैं?

मैं एक नौर्मल मां हूं. बच्चों को अच्छी परवरिश देने की कोशिश कर रही हूं. उन्हें पूरी आजादी देती हूं. लेकिन वे जो भी करते हैं मुझ से डिस्कस अवश्य कर लेते हैं. इस से मुझे उन की सोच के बारे में पता चलता है. अगर कुछ समझाने की जरूरत होती है, तो बैठ कर समझा देती हूं.

बच्चों की ग्रोथ में किस बात का अधिक ध्यान रखती हैं?

मैं उन की उन के सपनों को पूरा करने में मदद करती हूं. अपने सपनों को उन पर नहीं थोपना चाहती. वे उसे चुनें जिसे बेहतर समझते हैं और अगर वे ऐसा कर पाए तो यकीनन सफल होंगे. इस के अलावा हमेशा यह कोशिश करती हूं कि वे सभी की इज्जत करना सीखें.           

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