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आठवीं बार चैंपियन बन कोर्ट पर ही रोने लगे फेडरर

स्विट्जरलैंड के दिग्गज टेनिस स्टार रोजर फेडरर ने क्रोएशिया के मारिन सिलिच को आसानी से हराते हुए साल के तीसरे ग्रैंड स्लैम-विंबलडन का पुरुष एकल खिताब जीत लिया. ऑल इंग्लैंड क्लब में फेडरर की यह रिकॉर्ड आठवीं खिताबी जीत है. अपने दूसरे ग्रैंड स्लैम और पहले विंबलडन खिताब के लिए प्रयासरत सिलिच की फेडरर के सामने एक नहीं चली.

अपने करियर का 19वां ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम करने की दिशा में फेडरर ने 2014 में जापान के केई निशिकोरी को हराकर अमेरिकी ओपन जीत चुके सिलिच को 6-3, 6-1, 6-4 से हराया.

2014 से 16 के बीच तीन बार विंबलडन क्वॉर्टर फाइनल में पहुंचकर हारने वाले सिलिच ने पहली बार इस अग्रणी ग्रास कोर्ट टूर्नामेंट के फाइनल में जगह बनाई थी लेकिन ग्रास कोर्ट का बादशाह कहे जाने वाले फेडरर ने उन्हें पहली बार विंबलडन का बादशाह नहीं बनने दिया.

दूसरी ओर, इस साल ऑस्ट्रेलियन ओपन खिताब जीत चुके फेडरर विंबलडन में अपना 11वां फाइनल खेलते हुए एक बार फिर विजेता बने. वह 2014, 2015 में भी फाइनल में पहुंचे थें लेकिन वह सर्बिया के नोवाक जोकोविक के हाथों हार गए. इसके अलावा 2016 में वह सेमीफाइनल में कनाडा के मिलोस राओनिक के हाथों हार गए थें.

बहरहाल, पहले सेट की शुरुआत में सिलिच ने अपना क्लास दिखाया और एक समय 2-2 की बराबरी पर पहुंच गए लेकिन बाद में वह फेडरर के अद्वितीय क्लास और अनुभव के आगे बेबस नजर आए. फेडरर ने यह सेट 6-3 से अपने नाम कर मैच को दूसरे सेट तक बढ़ाया.

दूसरा सेट सिलिच के लिए और भी निराशाजनक साबित हुआ. वह इस सेट में एक गेम जीत सके. फेडरर ने अपना वर्चस्व कायम करते हुए यह सेट 6-1 से जीता और यह जता दिया कि उनके अनुभव और क्लासिक टेनिस के आगे सिलिच की तेजतर्रार सर्विस की एक नहीं चलने वाली है. तीसरे और निर्णायक सेट में सिलिच ने धमाकेदार शुरुआत करते हुए 2-1 की बढ़त हासिल कर ली. वह इस सेट में पहले से बेहतर नजर आए.

फेडरर ने इसके बाद दो गेम जीतते हुए 3-3 की बराबरी और फिर 5-3 से आगे हो गए लेकिन सिलिच ने स्कोर 4-5 कर मैच को रोमांच देने का प्रयास किया लेकिन फेडरर ने यहां अपने अनुभव का कमाल दिखाते हुए सिलिच को वापसी का मौका नहीं दिया और सेट के साथ मैच भी अपने नाम किया. इस तरह फेडरर ने आठवीं बार ऑल इंग्लैंड क्लब में अपना परचम लहराया.

फेडरर ने इससे पहले 2003, 2004, 2005, 2006, 2007, 2009 और 2012 में चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया था. विंबलडन में आठ खिताब के अलावा फेडरर पांच बार ऑस्ट्रेलियन ओपन, एक बार फ्रेंच ओपन और पांच बार यूएस ओपन खिताब जीत चुके हैं.

आईए एक नजर डालते हैं ग्रैंड स्लैम में फेडरर के रिकॉर्ड्स पर.

दूसरे मेल प्लेयर

इस जीत के साथ फेडरर टेनिस इतिहास के दूसरे मेल प्लेयर बने, जिन्होंने किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट के सिंगल्स खिताब को 8 या इससे ज्यादा बार जीता. राफेल नडाल ने फ्रेंच ओपन 10 बार जीता है.

सबसे ज्यादा विंबलडन खिताब जीतने वाला खिलाड़ी

फेडरर का यह 8वां विंबलडन सिंगल्स खिताब है. सबसे ज्यादा विंबलडन जीतने वाले मेल प्लेयर्स की लिस्ट में पहले नंबर हैं. वहीं दूसरे नंबर पर 7-7 खिताब के साथ विलियम रैनशॉ और पीट सम्प्रास का नाम है.

विंबल्डन में 91वीं जीत

विंबलडन में रोजर फेडरर अब तक कुल 91 सिंगल्स मैच जीत चुके हैं. इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा मैच जीतने वाले मेल प्लेयर्स की लिस्ट में फेडरर पहले, तो अमेरिका जिमी कॉनर्स (84 जीत) दूसरे नंबर पर हैं.

सबसे ज्यादा ग्रैंड स्लैम खिताब

अब फेडरर 19 ग्रैंड स्लैम सिंगल्स खिताब अपने नाम कर चुके हैं. सबसे ज्यादा ग्रैंड स्लैम सिंगल्स खिताब जीतने वाले मेल प्लेयर्स की लिस्ट में पहले नंबर पर हैं, जबकि दूसरे पर 15 खिताब के साथ स्पेन के राफेल नडाल हैं.

यूएस ओपन में हैं 5 खिताब

विंबलडन के बाद इस दिग्गज खिलाड़ी ने यूएस ओपन सिंगल्स के 5 खिताब जीते हैं. ओपन युग में सबसे ज्यादा यूएस ओपन सिंगल्स खिताब जीतने वाले मेल प्लेयर्स की लिस्ट में जिमी कॉनर्स और पीट सम्प्रास के साथ संयुक्त पहले नंबर पर हैं.

फ्रेंच ओपन में सिर्फ 1 खिताब

इस दिग्गज खिलाड़ी ने ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब भी 5 बार अपने नाम किया है. लेकिन फेडरर की छाप फ्रेंच ओपन में थोड़ी फीकी रही है.

तो ये है टाइगर श्रॉफ का आधा सच

टाइगर श्रॉफ व दिशा पटानी के संबंध जग जाहिर हैं. वे खुलेआम दिशा पटानी के साथ घूमते हुए नजर आते रहते हैं. मगर वे बार बार अभिनेत्री दिशा से अपने संबंधों पर इनकार करते हैं.

हाल ही में एक मुलाकात के वक्त दिशा पटानी के साथ अपने संबंधों की चर्चा करते हुए टाइगर श्रॉफ ने कहा कि ‘‘मैं दिशा को डेट नहीं कर रहा हूं. जब मैं ऐसा करुंगा, तो खुलकर सबको बताऊंगा. मगर मैं बस इतना कहला चाहता हूं कि वे मेरी एक अच्छी दोस्त हैं. मुझे उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है. किसी के साथ समय बिताने का अर्थ ये नहीं होता है कि उसके साथ आपका ऐसा ही कोई रिश्ता जुड़ा हो.’’

‘पैडमैन’ में अक्षय-सोनम के बीच हैं अवैध संबंध!

यूं तो सभी जानते हैं कि बंगलुरु के सस्ते दर पर सैनीटरी नैपकीन बनाने वाले पद्मश्री अरूणाचलम मुरूगननाथन की वास्तविक कहानी पर ‘क्रिआज इंटरटनमेंट’ के साथ मिलकर ट्विंकल खन्ना ‘पैडमैन’ नामक फिल्म का निर्माण कर रही हैं.

आर बालकी निर्देशित इस फिल्म में अक्षय कुमार, अमिताभ बच्चन, सोनम कपूर, राधिका आप्टे व सयोनी गुप्ता की अहम भूमिकाएं हैं. सभी को यह तो पता है कि पैडमैन की भूमिका में अक्षय कुमार हैं. मगर अब तक यह राज बना हुआ था कि बाकी कलाकार इसमें क्या कर रहे हैं और कहानी किस तरह से आगे बढ़ती है. पर अब धीरे धीरे कहानी का राज सामने आ चुका है.

सूत्रों पर यकीन किया जाए तो फिल्म ‘पैडमैन’ में अक्षय कुमार पैडमैन की शीर्ष भूमिका में हैं. पैडमैन यानी कि अक्षय कुमार की पत्नी के किरदार में राधिका आप्टे हैं. जबकि पैडमैन का सोनम कपूर के संग एक्स्ट्रा मैरीटल यानी अवैध संबंध है. सोनम कपूर अपने किरदार को लेकर कुछ भी कहने से बच रही हैं.

मगर राधिका आप्टे कहती हैं, ‘‘मैं इसमें पैडमैन की पत्नी का किरदार निभा रही हूं. मैंने किरदार की लंबाई नहीं बल्कि महत्व को देखते हुए यह फिल्म की है.’’ उधर सयोनी गुप्ता का दावा है कि वह एक वास्तविक पात्र को निभा रही हैं, जिसके बारे में उन्हें बताने की इजाजत नहीं है.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसा ही अरूणाचलम मुरूगननाथन की वास्तविक जिंदगी में भी है या फिल्म में इसे नाटकीयता देने के लिए रचा गया है? दूसरी बात कहा जाता है कि अरूणाचलम ने अपनी पत्नी की तकलीफ देखकर सैनीटरी नैपकीन सस्ते दामों में उपलब्ध कराने के बारे में सोचा.

खैर, देखना यह है कि इस फिल्म को लेकर किस तरह के सच सामने आते हैं.

ई-कौमर्स का फैलाव

सरकार जीएसटी यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स, जो बहुत से केंद्रीय व राज्यों के टैक्सों को समाप्त कर देगा, में ई-कौमर्स कंपनियों को काफी छूट दे रही है क्योंकि वे कहां से क्या खरीदती हैं और किस राज्य में बेचती हैं, इस का आकलन सरल नहीं है. पिछले सालों में कंप्यूटरों, मोबाइलों और क्रैडिट कार्डों की वजह से ई-कौमर्स खूब फलाफूला है और 4-5 बड़ी कंपनियां 4-5 हजार करोड़ रुपए की बिक्री करने लगी हैं.

यह उद्योग पनपा जरूर है पर बेहद नुकसान पर. कंपनियां जितने का व्यवसाय करती हैं उस से ज्यादा उन को  नुकसान हो रहा है पर बैंकर और निवेशक इन में पैसा लगाए जा रहे हैं इस उम्मीद के साथ कि कल को ये ईंट, पत्थर, सीमेंट के बने स्टोरों और सुपरबाजारों की जगह ले लेंगी. इन कंपनियों ने जम कर छूट दी है और सामान को घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ली है और उस का खर्च अपने सिर पर ले कर स्टोरों को मात दी है. कंप्यूटर पर आधारित यह व्यापार दिखने में चाहे कितना ही अच्छा लगे, कुल मिला कर यह दुनिया के लिए ठीक साबित नहीं  होगा. इस खरीदारी का एक मानवीय मानसिक दुर्गुण यह है कि यह व्यक्ति को घरघुस्सू बना रही है. लोग समाज में रह कर एकदूसरे को देखने से वंचित होते जा रहे हैं. औल काइंड्स औफ मैन मेक द वर्ल्ड की जगह मैं और मेरा कंप्यूटर ही सिद्धांत बनता जा रहा है.

जहां जरूरी है कि घर से निकलना ही है वहां भी लोग अपने मोबाइलों से चिपके रहते हैं. हर समय लोगों की निगाहें मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीनों पर टिकी रहती हैं और हरेक ने अपने चारों ओर एक किला बना लिया है, अकेलेपन का किला. इस ई-कौमर्स खरीदारी का मतलब भी यही है कि न तो खरीदार को बेचने वाली सेल्सगर्ल की मुसकान के एहसास की जरूरत है न कैशियर की भड़कीली पोशाक देखने की.

ई-कौमर्स तो परिवारों तक को अलगथलग कर रहा है क्योंकि अब घर में एक छत के नीचे रहने वाले भी अपनीअपनी खरीदारी खुद अपनी स्क्रीन से करने लगे हैं. दूसरे की क्या पसंद है, यह जाने बगैर, बराबर सोफे पर बैठे व्यक्ति की जानकारी के बिना सामान सिलैक्ट किया, कार्ड में डाला, क्लिक किया और खरीदारी समाप्त. 2-4 दिनों में कोई अनजाना एक पैकेट थमा कर चला जाएगा तब बाकी घर वालों को पता चलेगा कि क्या खरीदा गया.

स्वयंकेंद्रित होना समाज में एक विष घोल रहा है. हमारी जानकारी भी अब मोबाइलों पर आने वाले संदेशों तक सीमित रह गई है. कारखानों में वर्करों को रोबोटों सी चलने वाली मशीनों पर रोबोटों की तरह काम करना पड़ रहा है. खेतों में मशीनों की सहायता से एक व्यक्ति अकेले एकड़ों जमीन बो लेता है. मशीनों पर सब लोग अलगअलग मशीनों की तरह बिना सोचे, बिना बोले, बिना मुसकराए काम कर रहे हैं और इस तरह के बने एकाकी सामानों की खरीदारी लोग अकेले छोटी स्क्रीनों में कर रहे हैं. हाल तो यह हो गया है कि अब रात को बियर बारों में लोग अकेले पी रहे होते हैं. साथ ही, अकेले कभी एक अनजाने के साथ तो कभी दूसरे अनजाने के साथ नाच रहे होते हैं. जीवन में से सामाजिकता गायब हो गई है और यह वोटिंग पैटर्न में भी दिखने लगी है जिस में विश्व के लोकतंत्रों में ‘मैं’ की भावना उभर रही है, ‘हम’ की नहीं. डोनाल्ड ट्रंप ‘अमेरिका ओनली’ की बात करता है, ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हो रहा है. भारत में हिंदू और हिंदुओं में मेरी जाति की महत्ता बढ़ गई है क्योंकि हर जगह से सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की भावना ही समाप्त हो रही है. और इसी सब का नतीजा है ई-कौमर्स कंपनियां, जो नुकसान के बावजूद पनप रही हैं.

रिश्तों को नकारात्मकता में न लें

जिंदगी बहुत छोटी है उसे खुल कर जिएं. कभीकभी हम स्वयं ही अपनी जिंदगी को उदासीन बना लेते हैं, इस की वजह है हमारी नकारात्मक सोच. यह सोच हमें चैन से जीने नहीं देती. पतिपत्नी के रिश्ते की बात की जाए तो यह एक बेहद खूबसूरत रिश्ता होता है, जिसे हम अकसर अपनी नकारात्मक सोच के कारण दांव पर लगा देते हैं. रिश्ते को बरकरार रखने के लिए व उसे खूबसूरती से जीने के लिए अपने मन से नकारात्मक विचारों को निकाल फेंकें, साथ ही सकारात्मक सोच के साथ खुशहाल जीवन जिएं.

स्वयं को बदलें

हमें हमेशा दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलने के बारे में सोचना चाहिए. दूसरों की सोच के बजाय पहले खुद की सोच को सकारात्मक बनाना होगा. सकारात्मक सोच परिस्थितियों में ही नहीं, दृष्टिकोण में भी बदलाव लाती है.

नकारात्मक सोच कई घरों को बरबाद कर चुकी है. नकारात्मक सोच के कारण हंसतेखेलते वैवाहिक जीवन में दरार पैदा हो जाती है. जब कहीं पर भी कोई भी कुछ भी घटता हो तो उसे अपने साथ जोड़ कर न सोचें, कि आप के परिवार के सदस्य भी ऐसा ही करते हैं.

तनाव दूर रखें

कई बार जिंदगी में बहुतकुछ ऐसा घटित होता है जिस पर हमारा बस नहीं चलता. ऐसे में अपने और अपने जीवनसाथी को नकारात्मक दिशा में सोचने से रोकने के लिए प्रयास करें. यदि आप के पार्टनर का समय सही नहीं चल रहा, तो उसे अपना पूरा सहयोग दें, न कि उसे नकारात्मक बातें बोल कर उस का मनोबल गिराएं.

आरोप प्रत्यारोप से बचें

हमेशा किसी कार्य के सफलतापूर्वक नहीं हो पाने पर पार्टनर पर आरोप न लगाएं कि उस की वजह से कार्य सफलतापूर्वक नहीं हो पाया या हमेशा यह कोसते रहना कि जब से तुम मेरी जिंदगी में आए हो, तभी से ऐसा हो रहा है. ऐसा वही बोलता है जो नकारात्मक सोच रखता है. तो जरूरी है कि एकदूसरे पर आरोप लगाने से बचें. आरोप लगाने से रिश्तों में तनाव के साथ कड़वाहट घुलती जाती है और फिर वे एक समय पर आ कर कमजोर पड़ जाते हैं.

तुरंत प्रतिक्रिया ठीक नहीं

अकसर पतिपत्नी में लड़ाई इसी बात पर होती है कि वे बिना सोचेसमझे किसी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर देते हैं. यह एक तरह की नकारात्मक क्रिया है जिस में आप ने बिना सोचेसमझे अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर दी. इस से तनाव बढ़ता है. ऐसे में जरूरी है कि आप सही से अपने पार्टनर की बात सुन कर और समझ कर ही प्रतिक्रिया दें.

रोकटोक से चिढ़ें नहीं

कई बार ऐसा होता है कि हमारा पार्टनर ज्यादा फिक्र करने की वजह से आप से बारबार सवाल करता है या फोन करता है या पूरे दिन का जायजा लेता है कि  तुम ने पूरे दिन क्या किया, तो उसे नकारात्मकता में न लें.

ऐसे में जरूरी है कि आप उस का सम्मान करें. उस की फिक्र को रोकटोक न समझें. अगर वह आप से कुछ पूछे तो आप के प्रति उस की चिंता को समझें.

निजता भी जरूरी

पतिपत्नी के बीच थोड़े स्पेस की बेहद आवश्यकता होती है. कई बार आप की नकारात्मक सोच आप पर हावी हो जाती है. आप रिश्ते में निजता देने के बजाय जरूरत से ज्यादा रोकटोक करते हैं. इस से रिश्ते में दरारें पैदा हो सकती हैं. खासतौर से, शादीशुदा जिंदगी में इस का होना बहुत जरूरी होता है. एकदूसरे की पसंद, नापसंद और खासकर निजी स्वतंत्रता का खयाल रखना बहुत माने रखता है.

मांगें पूरी न होना

पति और पत्नी के जीवन में नकारात्मकता तब घर करने लगती है जब पत्नी को लगता है कि मेरा पति मेरी खुशियों के बारे में नहीं सोचता है. वहीं, पत्नी का हमेशा नाजायज मांगों के लिए लड़ना पति के मन में नकारात्मक भाव को पनपने देता है जिस के कारण मन में एकदूसरे के प्रति खटास बढ़ती जाती है. ऐसे में जरूरी है कि पत्नी को सकारात्मक सोच रखते हुए कि आज नहीं तो कल सब सही हो जाएगा, पति की सीमित आय में रहना सीखना चाहिए और सुखमय जीवन व्यतीत करना चाहिए.

हमेशा शक करना

पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है. लेकिन पार्टनर पर शक करना आप की नकारात्मक सोच का परिणाम होता है. अकसर महिलाएं अपने पति पर बेवजह शक करती रहती हैं. इसी तरह कई बार पति, जिन की पत्नियां कामकाजी हैं, पर शक करते

हुए नजर आते हैं. जरूरी है कि हमेशा नकारात्मक सोचने के बजाय अपनी सोच में सकारात्मकता लाएं. तभी आप अपनी जिंदगी खुशहाल तरीके से गुजार पाएंगे.

यों बचें नकारात्मकता से

–       अकसर देखने में आता है कि आप पुरानी बातों को ले कर घर में कलेश करते रहते हैं, ऐसे में जरूरी है कि पुरानी बातों को छोड़ कर आज में जिएं.

–       जब आप को लगे कि आप के और आप के पार्टनर के बीच नकारात्मकता घर करती जा रही है तो विषयों को साथ में बैठ कर सुलझाएं जिस से बात और अधिक न बढ़े.

–       औफिस या घर का काम उतना ही करें जितना आप से किया जाए.

–       ऐसे लोगों से दूर रहें जो नकारात्मक सोच रखते हैं, बल्कि हमेशा सकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों को अपना दोस्त बनाएं.

–       आप और आप का पार्टनर रोज साथ में सैर पर जाएं, इस से स्ट्रैस कम होता है, साथ ही मन को शांति मिलती है.

–       अपनेआप को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखें. इस से आप सकारात्मक सोच रख सकेंगे.

–       हमेशा एकदूसरे के बीच विश्वास को बनाए रखने के लिए हर वह कोशिश करें जो एक सफल दांपत्य के लिए जरूरी है.

–       एकदूसरे की पसंद या नापसंद को ध्यान में रखते हुए उन चीजों को नकारात्मक न ले कर, उन पर सकारात्मक तरीके से सोचें.     

अब करोड़ का सैलून क्यों

महामहिम कोई आम आदमी नहीं होता, इसलिए वह कभी ट्रेन में सफर नहीं करता. उस के लिए एक खास तरह की 2 डब्बों वाली ट्रेन अलग से बनाई जाती है जिसे रेलवे सैलून कहता है. 8 करोड़ रुपए की कीमत वाले इस सैलून को चलता फिरता आलीशान महल कहा जा सकता है जिस में आधुनिक तकनीक युक्त तमाम सुविधाएं होती हैं. नए राष्ट्रपति के लिए कीमती सैलून बन रहा है. दोटूक कहा जाए तो करोड़ों रुपए फुजूल खर्च किए जा रहे हैं, क्योंकि इस सैलून का इस्तेमाल यदाकदा ही राष्ट्रपति करते रहे हैं. 1977 में नीलम संजीव रेड्डी के बाद सैलून का उपयेग सादगी और किफायत की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था. अभी तक के राष्ट्रपतियों ने कुल 87 बार ही इस सैलून में सफर किया है. लोकतंत्र और राजशाही की चर्चा से दूर बेहतर होगा कि नए राष्ट्रपति इस फुजूलखर्च से परहेज कर मिसाल कायम करें. 

आईआईटी : दांव पर साख

यह धारणा अब टूट जानी चाहिए कि नौकरियों के लिहाज से देश के आईआईटी संस्थान पढ़ाई की सर्वश्रेष्ठ जगहें हैं. वजह यह है कि इस वर्ष यहां चले कैंपस हायरिंग के लंबे दौर के बाद इन के जरिए मिलने वाली नौकरियों की संख्या और पैकेज, दोनों में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इस दफा 1 करोड़ रुपए से ऊपर के वेतन की नौकरियों के औफर्स पाने वाले छात्रों की संख्या 2014 के मुकाबले 50 फीसदी घट गई है.

बीते वर्षों में महज अमेरिकी कंपनियों के लिए प्रोफैशनल्स तैयार करने वाली फैक्टरियों में तबदील हो चुके आईआईटी संस्थानों के छात्रों के औसत पैकेज में आई कमी से खतरा पैदा हो गया है कि इन की बची प्रतिष्ठा भी धूमिल न हो जाए. सचाई यह है कि इस साल मद्रास, रुड़की, बीएचयू, गुवाहाटी और खड़गपुर आईआईटी में जौब औफर के तहत दी जाने वाली सैलरी में 30-40 फीसदी गिरावट आई. यही नहीं, ऐसे औफर्स पाने वाले छात्रों की संख्या भी घटी है.

इस सत्र में आईआईटी में कैंपस सेलैक्शन शुरू होने से पहले ही गूगल, माइक्रोसौफ्ट, ओरेकल आदि कंपनियों के प्रतिनिधि कह रहे थे कि कैंपस हायरिंग के जरिए बेहतरीन टैलेंट को चुनते हुए वे युवाओं को सवा करोड़ रुपए तक के पैकेज वाली नौकरियां औफर करेंगे. पर एकाध मामलों को छोड़ कर औसत रूप से ऐसा हो न सका. पिछले साल ज्यादातर स्टार्टअप कंपनियों के मंदे हुए बिजनैस और औफर लैटर से मुकरने की घटनाओं के कारण आईआईटी संस्थानों में पहले से ही बेचैनी थी,पर इस साल तो नजारे और भी बुझे हुए रहे.

सवाल है कि अगर नौकरियों के मामले में भी आईआईटी बेनूरी के शिकार हो जाएंगे, तो उन के होने का क्या औचित्य बचेगा? जिन चमकदार नौकरियों के बल पर ये आईआईटी खुद की योग्यता दर्शाने में पिछले कुछ समय से संलग्न थे और जिसेदेख कर देश के मध्यवर्ग का एक बड़ा तबका अपने बच्चों को आईआईटी में पहुंचाने के ख्वाब पाले रहता है, अब वह सपना टूटता लग रहा है. जौब औफर में आई गिरावट के बारे में आईआईटी के प्लेसमैंट विशेषज्ञों का मत है कि इस बार कंपनियों ने ग्लोबल अर्थव्यवस्था में गिरावट को अहम कारण बताया है. इस कारण अंतर्राष्ट्रीय नौकरियों के प्रस्ताव भी घटे हैं. एक वजह विदेशी कंपनियों द्वारा स्टौक औप्शंस में कमी करना भी बताया गया है और गूगल जैसी कुछ कंपनियां कैंपस हायरिंग के बजाय औफ कैंपस मोड से हायरिंग कर रही हैं. यानी अन्य स्रोतों से नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवार तलाश रही हैं.

उतर गई कलई

गौरतलब है कि हाल के दशक में तकरीबन हर साल आईआईटी में हुए कैंपस सेलैक्शन में चयनित छात्रों को औफर किए जाने वाले सालाना पैकेज के नएनए रिकौर्ड की सूचनाएं आती रही थीं. गौरतलब यह भी है कि इन कंपनियों के अलावा खुद आईआईटी संस्थान भी मीडिया में ऐसी खबरों को प्रचारित करवाते हैं कि उन के यहां कैंपस सेलैक्शन में युवाओं का बेहतरीन पैकेज पर चयन हुआ है. मीडिया भी निजी कंपनियों व आईआईटी द्वारा जारी सूचनाओं के प्रवाह में बह जाता है.

शायद ही ऐसा कभी हुआ हो जब ये सूचनाएं आई हों कि कैंपस सेलैक्शन में कितने दर्जन युवा ऐसे रहे, जिन्हें ज्यादा से ज्यादा एक क्लर्क की नौकरी के लायक समझा गया, या उन्हें इतना वेतन औफर किया गया जो उन की सालाना फीस से भी कम था. इन्हीं कारणों से आम लोग यह सोच कर हैरान होते थे कि लाखोंकरोड़ों के पैकेज वाली ये नौकरियां ऐसे देश में कुछ युवाओं को कैसे मिल रही हैं, जहां बेरोजगारी आसमान छू रही है. लेकिन अब यह कलई उतर गई है. इधर नोटबंदी के बाद से बंद हुए कारखानों और निर्माण क्षेत्र के चौपट हुए कामकाज के बाद हजारोंलाखों युवा जहां यह सोच कर परेशान हैं कि उन के परिवार की दो वक्त की रोटी का जुगाड़ अब कैसे हो, वहां अब देसीविदेशी कंपनियों ने आईआईटी के छात्रों को ले कर जो रुख दर्शाया है, उस से इन संस्थानों के भविष्य का खतरा भी पैदा हो गया है.

वैसे तो आज के छात्र आंख मूंद कर सिर्फ आईआईटी के नाम पर किसी संस्थान में नहीं घुस जाना चाहते हैं, पर अभिभावकों में अभी भी यह चाव बचा है कि वे अपने बच्चों को आईआईटी में दाखिला दिलाना चाहते हैं और इस के लिए महंगी कोचिंग दिलाने में परहेज नहीं करते. कई कोचिंग संस्थान उन की इस इच्छा का बुरी तरह आर्थिक दोहन भी करते हैं. पर जहां तक छात्रों का मामला है, वे पहले अपने कैरियर की संभावनाओं को देखते हैं. इसी वजह से कई आईआईटी में उन की दिलचस्पी खत्म होने को है, जैसे माइनिंग के सिकुड़ते फील्ड की वजह से आईआईटी, धनबाद की अब पहले जैसी प्रतिष्ठा नहीं रही. दूसरे, सरकार जनता को संतुष्ट करने के लिए देश की कई जगहों पर आईआईटी खोलती रही है.

सरकार यह मान कर संतुष्ट है कि किसी संस्थान पर आईआईटी का ठप्पा लगाने भर से छात्र उन पर टूट पड़ेंगे. लेकिन उन में न तो ढंग की फैकल्टी है और न ही पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर. हो सकता है कि सरकार उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया करा दे, लेकिन आईआईटी से निकले छात्रों को नौकरी कौन देगा? वही अमेरिकी कंपनियां, जो अब आईआईटी में कैंपस हायरिंग करने के बजाय औफ कैंपस मोड (यानी दूसरे तरीकों से) में जा कर अपने लायक युवाओं को चुन रही हैं.

करोड़ों के पैकेज, लाखों की कुंठा

असल में देश के ज्यादातर आईआईटी अब कई विरोधाभासों के प्रतीक बन गए हैं. वे अपने मूल मकसद से कब के भटक चुके हैं, लेकिन इस की किसी को चिंता नहीं है. देश का मध्यवर्ग इसे मालदार नौकरियों की फैक्टरी समझता रहा है और अपने बच्चों को आईआईटी में सिर्फ इसलिए भेजना चाहता है कि वे वहां जा कर कैंपस सेलैक्शन में कुछ करोड़ की नौकरी पा जाएं.

खुद सरकार भी देश के एक बड़े वर्ग को संतुष्ट करने के लिए आईआईटी में आमूलचूल बदलाव लाने से हिचकती है. लेकिन देखना होगा कि विदेशी कंपनियों के लिए सिर्फ सस्ते प्रोफैशनल तैयार करने के चक्कर में हमारे आईआईटी कहीं अपनी वह चमक भी न खो दें, जिन के लिए वे जाने जाते हैं, और जिन से दुनिया में भारत को एक नौलेज पावर के रूप में थोड़ीबहुत प्रतिष्ठा मिली हुई है.

यही नहीं, आईआईटी की कैंपस हायरिंग से करोड़ों का पैकेज पाने की खबरें महीने में चंद हजार बमुश्किल कमा पाने वाले युवाओं पर क्या असर डालती होंगी, यह भी देखना होगा. ऐसे समाचार पढ़सुन कर देश के लाखों युवा कुंठित न हो जाएं, इस के प्रबंध भी करने होंगे. उन्हें बताना होगा कि आईआईटी की कैंपस हायरिंग का मतलब वहां पढ़ने वाले हरेक युवा का करोड़पति हो जाना नहीं है, बल्कि इसी कैंपस सेलैक्शन में सैकड़ों ऐसे भी होते हैं जो मामूली वेतन पर चुने जाते हैं और अगर किसी मंदी की चपेट में आ जाएं, तो सब से पहले उन्हीं की नौकरी पर आंच आती है.

जबकि आईआईटी का मकसद सिर्फ यह तो नहीं होना चाहिए कि वहां से निकले युवा अपनी प्रतिभा के बजाय लाखोंकरोड़ों के सालाना वेतन की वजह से जाने जाएं? यह विडंबना ही है कि आईआईटी से निकलने वाले ज्यादातर युवा अमेरिकी सौफ्टवेयर कंपनियों की करोड़ की नौकरी के लिए हर जतन करते रहे हैं. अफसोस यह भी है कि आईआईटी जैसा हाल देश की सब से प्रतिष्ठित सेवा आईएएस का हो गया है. यह सेवा देश को काफी सारे नौकरशाह तो दे रही है पर ये ऐसे नौकरशाह हैं, जिन का देश के तकनीकी विकास में रत्तीभर योगदान नहीं होता.

आईआईटी-आईएएस को ले कर जगे मोह का नतीजा है कि देश में इंजीनियरिंग के कई क्षेत्रों में पढ़ाई का सिलसिला ठप होने को है. देश को मकान, सड़कें, फलाईओवर्स और बंदरगाहों की जरूरत है, लेकिन आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग की ज्यादातर सीटें खाली रह जाती हैं. भारत जैसे देश में, जहां उस के प्रतिभावान व उच्च शिक्षित नौजवानों के अपने देश के गरीब व वंचित तबकों के लिए काम करने की जरूरत है, वहां आईआईटी जैसे शिक्षण संस्थानों का ऐसा रवैया किसी भी किस्म के आदर्शवाद को खत्म करने के लिए काफी है. जौब औफर्स में घटती सैलरी को एक सबक मानते हुए आईआईटी संस्थानों को नए सिरे से अपनी उपयोगिता साबित करनी होगी और बताना होगा कि वे हकीकत में छात्रों को काबिल बनाने वाले संस्थान हैं, सस्ते प्रोफैशनल्स सप्लाई करने वाले संस्थान नहीं.     

आईआईटी में लड़कियां कम क्यों?

देश में आईआईटी की घटती चमक का एक कारण इन संस्थानों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व होना भी रहा है. पिछले कुछ वर्षों का ट्रैंड देखें तो 10 फीसदी से भी कम लड़कियां आईआईटी में ऐडमिशन पा रही हैं. वर्ष 2016 में मात्र 8 फीसदी लड़कियां कुल सफल विद्यार्थियों में थीं जिन्हें आईआईटी में दाखिला मिला था. इस से पहले 2015 में यह आंकड़ा 9 फीसदी था जबकि वर्ष 2014 में 8.8 फीसदी लड़कियों को सफलता मिली थी.

लड़कियों की आईआईटी में अनुपस्थिति से चिंतित सरकार ने संकेत दिए हैं कि वह लड़कों के मुकाबले लड़कियों का इन संस्थानों में अनुपात दुरुस्त करने के लिए अगले 3 वर्षों में 20 फीसदी सीटें बढ़ाएगी. इस के लिए जौइंट ऐडमिशन बोर्ड ने एक फैसला लिया है जिस में 3 चरणों में सीटों को 20 फीसदी तक बढ़ाने की बात कही गई है. इस के लिए तैयार रोडमैप के मुताबिक, 2018 में लड़कियों के लिए 14 फीसदी सीटें बढ़ाई जाएंगी, 2019 में 17 फीसदी और 2020 में सीटों की संख्या 20 फीसदी तक बढ़ा दी जाएगी.

अधिकारियों के अनुसार, ये सीटें सिर्फ लड़कियों के लिए ही बढ़ेंगी. 20 फीसदी कोटा तभी लागू होगा जब ऐडमिशन में छात्राओं का अनुपात बहुत कम होगा.

उदाहरण के तौर पर अगर ऐडमिशन टैस्ट के बाद 100 सीटों में सिर्फ 10 लड़कियों को ही ऐडमिशन मिल पाता है तो फिर सिर्फ उन के लिए सीटों में 20 फीसदी की वृद्घि होगी. अगर कोटे सिस्टम से भी कोई नहीं लाभ होता है तो 3 वर्षों के बाद इस सिस्टम की फिर से समीक्षा की जाएगी.

बढ़ रही ड्रौपआउट छात्रों की तादाद

यह तथ्य शायद लोगों को हजम न हो कि जिन संस्थानों में दाखिले को ले कर देश में होड़ मचती है, अब उन्हें बीच में ही छोड़ने का चलन भी बन गया है. पिछले 2 वर्षों में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन से पता चलता है कि देश में आईआईटी और आईआईएम में छात्रों का ड्रौपआउट रेट तेजी से बढ़ रहा है. इन बड़े कालेज, यूनिवर्सिटी ?में प्रवेश पाने के बाद कई छात्र कोर्स को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. इन संस्थानों से वर्ष 2016 में मिले आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में करीब 2,000 छात्रों ने संस्थान छोड़ दिए थे. इसी समयावधि में आईआईटी-खड़गपुर में संस्थान छोड़ने वाले छात्रों की संख्या 544 थी, जबकि आईआईटी बौंबे में 143 छात्रों ने संस्थान छोड़ा था. उस समय आईआईटी बौंबे के डायरैक्टर देवांग खाखर ने मीडिया को संस्थान छोड़ने का कारण भी बताया था. उन के मुताबिक, संस्थान छोड़ने वाले ज्यादातर छात्र पीएचडी करने वाले होते हैं. वे पीएचडी में अपने प्रदर्शन के कारण नहीं, बल्कि इस में लगने वाले लंबे वक्त के कारण अध्ययन बीच में छोड़ देते हैं.

वजह फीस बढ़ोतरी तो नहीं : वर्ष 2016 में आईआईटी की स्थायी समिति ने छात्रों की फीस में 200 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी की सिफारिश की थी. इस सिफारिश को मानने का अर्थ यह था कि फीस 90 हजार रुपए से बढ़ कर 3 लाख रुपए हो जाएगी. आईआईटी प्रबंधन का मानना रहा है कि जहां तक हो सके, आईआईटी को अपना खर्च खुद निकालना चाहिए. फीस 3 लाख रुपए हो जाने पर आईआईटी का लगभग 60 प्रतिशत खर्च फीस से ही निकल आता है. हालांकि इस सिफारिश के साथ ही समिति ने यह भी कहा था कि आईआईटी छात्रों के लिए वजीफे और शिक्षा के लिए कर्ज की इतनी व्यवस्था होगी कि आर्थिक वजह से किसी गरीब छात्र को आईआईटी की पढ़ाई से वंचित नहीं रहना पड़ेगा.

फीस बढ़ोतरी के पीछे तर्क यह दिया गया था कि आईआईटी छात्रों का एक बड़ा प्रतिशत विदेश में जा कर बस जाता है, हालांकि यह संख्या लगातार घट रही है. आज से करीब 3 दशक पहले 70 प्रतिशत तक आईआईटी छात्र विदेश चले जाते थे, लेकिन अब यह 30 प्रतिशत तक आ गया है. चूंकि आईआईटी छात्रों को बैंकों से पढ़ाई के लिए आसानी से कर्ज मिल जाता है, ऐसे में यह विचार एक माने में सही लगता है कि उच्चशिक्षा का खास कर जिस में अच्छे कैरियर और आमदनी की गारंटी हो, खर्च सरकार क्यों उठाए? सरकार अपने साधन बुनियादी स्तर की शिक्षा के ढांचे को मजबूत बनाने में लगाए लेकिन इस से जुड़ा एक सवाल और है. अगर छात्र शिक्षा के लिए इतना खर्च करेगा या कर्ज लेगा, तो उस की यह मजबूरी होगी कि वह ऊंची कमाई वाले रोजगार को ही चुने. भारत जैसे देश में, जहां उस के प्रतिभावान व उच्चशिक्षित नौजवानों के अपने देश के गरीब व वंचित तबकों के लिए काम करने की जरूरत है, वहां शिक्षा का ऐसा व्यवसायीकरण किसी भी किस्म के आदर्शवाद को खत्म कर देगा.

मसलन, जिस छात्र ने डाक्टर बनने के लिए 50 लाख या एक करोड़ रुपए खर्च किए, उस से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह कम खर्च में गरीबों का इलाज करेगा? स्थायी समिति की सिफारिशों के आधार पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में बीटेक कोर्स की फीस 90 हजार रुपए प्रतिवर्ष से बढ़ा कर 2 लाख रुपए कर दी. बढ़ी हुई फीस जुलाई से आरंभ होने वाले सत्र से लागू होगी. लेकिन गरीब विद्यार्थियों को शुल्क से छूट दी गई है. देश में करीब डेढ़ दर्जन आईआईटी संस्थान हैं जिन में 10 हजार छात्र बीटेक कोर्स में हर साल ऐडमिशन लेते हैं. फीस में यह बढ़ोतरी 100 फीसदी से भी ज्यादा है. मोटेतौर पर यह फीस छात्रों पर आने वाली लागत को ध्यान में रख कर तैयार की गई है. प्रतिछात्र ढाई लाख रुपए लागत पढ़ाई का खर्च आईआईटी को बैठता है.

गड़बड़ाए तेज प्रताप

आयकर विभाग द्वारा लालू प्रसाद यादव परिवार की 175 करोड़ रुपए की जायदाद जब्त करने से पहले ही बिहार के स्वास्थ्य मंत्री लालू के बेटे तेज प्रताप यादव की सेहत गड़बड़ा गई थी जिन्होंने अपने फैमिली पंडित, ज्योतिषी या तांत्रिक के कहने पर अपने पटना स्थित आवास 3, देशरत्न मार्ग का दक्षिणी द्वार बंद करवा दिया था.

दिनोंदिन लालू कुनबा घिरता जा रहा है जिस से बचने का इकलौता उपाय कृष्णभक्त तेज प्रताप को तंत्रमंत्र दिखा तो उन्होंने शत्रुनाशक अनुष्ठान भी संपन्न करा डाला. तंत्रमंत्र, अनुष्ठान से बाधाएं दूर हो जाती हैं, ऐसा दावा किया जाता है. इस के बदले में तांत्रिक को लाखों रुपए दिए जाते हैं. तेज प्रताप यादव जैसे होनहार युवा भी ठगों के इस मकड़जाल में घबरा कर फंस गए तो बिहार की सेहत का तो भगवान ही मालिक है.

 

…वरना आपातकाल आ जाएगा

शुरूशुरू में तो वाकई लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात मन लगा कर सुनी थी पर धीरेधीरे वह टीवी धारावाहिकों जैसी उबाऊ होती चली गई. ऐसे में अब लोगों ने अपने कान रेडियो से हटाने शुरू कर दिए. हालत यह है कि ‘मन की बात’ सुनी नहीं, बल्कि प्रसारण के दूसरे दिन अखबारों में सरसरी तौर पर पढ़ ली जाती है.

मन की बात के पिछले एपिसोड में प्रधानमंत्री ने आपातकाल का जिक्र कर डाला तो आम और खास दोनों तरह के लोग चौकन्ने हो उठे. कुछकुछ बुद्धिजीवियों को लगता है कि देश में अभी अघोषित आपातकाल लगा हुआ है, उन की जबान पर पहरेदारी है. देश में भय और आतंक का माहौल है. ऐसे में आपातकाल का स्मरण किया जाना ‘शोले’ फिल्म के उस डायलौग को दोहराने जैसी बात है कि ‘सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा.’ इसी डर के चलते मन की बात के ठीक पहले 5 दर्जन से भी ज्यादा रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस अधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे खुले पत्र को भाव नहीं मिला था जिस में उन्होंने इस कथित आपातकाल का जिक्र किया था.

ये पति

‘‘अरे बाजार आ ही गए हैं तो पूरे हफ्ते की सब्जी खरीद लेते हैं. रोजरोज की खिचखिच खत्म,’’ मैं बोली तो पति ने जवाब दिया, ‘‘दिक्कत क्या है? मैं रोज ताजी सब्जी लाता हूं.’’

मैं चिढ़ कर बोली, ‘‘जब रोजरोज सब्जी ही लानी है तो फ्रिज तो बेकार ही हुआ. फ्रिज तो सभी चीजों को फ्रैश रखता है.’’

मेरी बातों को नजरअंदाज करते हुए पति बोले, ‘‘देखो, मैं रिटायर्ड हूं. रोज सब्जी खरीदने जाता हूं तो 4 लोगों से मिलता हूं, उन के हालचाल पता चलते हैं. किसी को कोई तकलीफ, जरूरत हो तो पता चलता है, जुड़ा रहता हूं समाज से. पैदल जाता हूं, तो इस बहाने मेरी सैर भी हो जाती है. ताजी लाओ, ताजी बनाओ. स्टोर करने का झंझट खत्म.’’

पति की ताजी सब्जी का फंडा मेरी समझ में आ चुका था. ये सब्जी लाने के बहाने समाज से जुड़ कर खुद भी खुश रहते हैं और मैं भी.

रेखा सिंघल

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कुछ महीनों से मैं अमेरिका में हूं. वैसे तो मेरा बेटा या बहू ही दोनों बच्चों को सुबह स्कूल छोड़ते हुए औफिस चले जाते हैं, पर एक दिन बेटा और बहू दोनों को सुबह कुछ पहले ही निकलना था, तो बेटे ने बच्चों से कहा कि आज तुम लोगों को दादाजी स्कूल ड्रौप कर देंगे.

मेरे पति कभीकभी बच्चों को सुबह ड्रौप कर देते हैं या कभी दोपहर बाद उन्हें पिक भी कर लेते हैं. उस दिन नई बीएमडब्लू कार घर पर थी. मौसम अच्छा था, कार की छत खोल कर उसी गाड़ी से निकल पड़े. ये बच्चों को स्कूलगेट तक छोड़ने के लिए उतर गए, गेट बिलकुल पास ही था. पर जब ये लौटे तो कार की छत बंद थी, फोन और चाबी अंदर रह गई, इंजन औन था.

बेटा और बहू के दफ्तर काफी दूर थे और वैसे भी सुबह में वे बौस के साथ मीटिंग में रहते हैं. उन का आना बहुत मुश्किल था. बहुत मुश्किल से एक सज्जन से लिफ्ट ले कर घर आए. गनीमत थी कि मैं घर में थी. डुप्लीकेट चाबी ले कर गए और कार ले आए. बेटे से फोन पर पूछा कि ऐसा क्यों हुआ? बेटे ने कहा, ‘‘कार से निकलते समय गलती से एक बटन पर उंगली पड़ गई होगी, जिस से छत बंद हो गई. आगे से इस कार में यह खयाल रखिएगा.’’

मैं ने इन से कहा, ‘‘अगर मैं घर पर नहीं होती तो आज कितनी मुश्किल होती.’’       

शकुंतला सिन्हा

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