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कर्णन का क्रंदन

कलकत्ता हाईकोर्ट के चर्चित पूर्व जस्टिस सीएस कर्णन का गुनाह किसी को समझ नहीं आ रहा कि वह आखिर था क्या? लेकिन गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें अलीपुर स्थित जेल, जिसे प्रैसिडैंसी करैक्शन होम भी कहा जाता है, में ले जाया गया तो उन के दिल का गुबार आंखों के रास्ते बह निकला, जिसे बोलचाल की भाषा में रोना कहा जाता है.

जिस शख्स ने इंसाफ के लिए लाखों को जेल का रास्ता दिखाया हो उसे जेल जाना पड़े, इस से ज्यादा जलालत की बात कोई और हो भी नहीं सकती. उम्मीद है इस कांड के बाद कोई जज अपने साथियों पर भ्रष्ट्राचारी होने का आरोप नहीं लगाएगा और न ही खुद के दलित होने की दुहाई देगा. सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायालय की प्रतिष्ठा रखी है या अन्याय के विरुद्ध आवाज को कुचला है, अभी नहीं कहा जा सकता. हां, दलितों को यह विश्वास होता जा रहा है कि उन का इस देश में अभी दिखावे भर का वजूद है.

इन्हें आजमाइए

– अगर किसी खास मौके पर आप अपने ब्रैस्ट्स को थोड़ा कम कर के दिखाना चाहती हैं, तो मिनिमाइजर ब्रा आप के लिए बैस्ट है. यह ब्रा कप साइज को थोड़ा कम कर के आप को बेहतर फिट और लुक देगा.

– अगर आप सारे तरीके आजमाने के बावजूद अपनी गर्लफ्रैंड को प्रभावित नहीं कर पाए हैं, तो उस से दूर हो जाइए. हो सकता है आप की यही बात उसे प्रभावित कर दे.

– उन लोगों से दूर रहिए जो हमेशा आप की तारीफ करते रहते हैं क्योंकि ऐसे लोग आप के गलत होने पर भी आप की चापलूसी करते रहते हैं.

– नया बिजनैस शुरू करने के पहले एक बैकअप प्लान बना लीजिए कि अगर आप का बिजनैस सफल नहीं हुआ तो उस परिस्थिति में आप क्या करेंगे.

– वही व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है जो सुबह जल्दी उठता हो. अगर आप को देर से उठने की आदत है तो जल्द ही अपनी इस आदत को बदल डालिए.

– महिलाओं को पीरियड में व्यायाम नहीं करना चाहिए, यह एक मिथक है. वे सामान्य व्यायाम कर सकती हैं, इस से कोई परेशानी नहीं होगी.

 

हमारी बेड़ियां

एक दिन मेरी सहेली अनु अपनी सास के साथ गोपाष्टमी की पूजा करने गई थी. कहते हैं कि गोपाष्टमी के दिन गाय की पूजा करनी चाहिए. उन के घर के नीचे ही गाय चरते हुए मिल जाती थी. सामने गाय को देख कर सास पूजा के लिए आगे बढ़ीं.अनु को गाय की हरकत कुछ ठीक नहीं लगी. वह बारबार अपनी पूंछ हिला रही थी और गरदन भी झटका रही थी. अनु को डर लगा. उस ने गाय को खाना दिया और सास से वापस चलने के लिए बोलने लगी पर सास नहीं मानी.

सास ने कहा, ‘‘जब तक गाय को रोली से टीका न लगा दें, पूजा अधूरी रहेगी. सास ने आगे बढ़ कर ज्योंही गाय को टीका लगाना चाहा, गाय ने तेजी से गरदन झटक दी. फलस्वरूप, सास नीचे गिर पड़ी? और उन के पांव की हड्डी टूट गई. बड़ी मुश्किल से उन्हें अस्पताल ले जाया गया. हमारे घर के सामने किराए पर रहने वाले एक सज्जन के छोटे बेटे ने कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली. वह अपने पीछे अपनी पत्नी व 2 साल का एक बच्चा छोड़ गया. ऐसा सुनने में आया कि वह काफी दिनों से मानसिक तनाव में था. वह परिवार 5-6 महीने पहले ही यहां रहने आया था. इसी वजह से हमारी उन से अधिक पहचान नहीं थी. उस को अंतिमक्रिया पर ले जाने से पहले रीतिरिवाजों के नाम पर किए गए ढकोसलों ने मन को बहुत आहत किया.

लोगों की भारी भीड़ के सामने बाहर ही उस की पत्नी को लंबे घूंघट में बुला कर पति के पैरों के पास बिठा कर जाने क्याक्या रीतियां करवाई गईं. पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. परंतु समाज के ठेकेदार, उन के रिश्तेदार बड़ी ही निर्दयता से उस से सभी रीतियां निबटाने को कह रहे थे. मानो, उस का विधवा हो जाना कोई अपराध हो या उस की वजह से ही उस के पति ने जान दी हो. उस के दुख व संवेदनाओं से किसी को कोई मतलब ही न था. पूरे समाज के सामने निर्ममता से उस के हाथों की चूडि़यां तुड़वाना बेवजह दी गई किसी सजा से कम नहीं लग रहा था. उस के प्रति संवेदना व्यक्त करने के बजाय, उसे ढांढ़स बंधाने के बजाय वे लोग अपनी कुरीतियों को पूरा करवाने में लगे थे. मानो, वह इंसान न हो कर कोई मशीन हो.

अपने भाई के सीने से लगी वह दुखियारी जारजार रो रही थी. मगर किसी को उस के दुख की परवा न थी. परवा थी तो बस रीतिरिवाजों की. रीतिरिवाजों के नाम पर इंसान का इस तरह मानसिक व शारीरिक शोषण होते देख मानवता वाकई शर्मसार हो गई.

पूनम पाठक

बच्चों के मुख से

मेरा भतीजा मनू, जो 11 महीने का मात्र है, घुटनों के बल चलता है पर उस का दिमाग बहुत तेज है. उस को घर वालों ने शरीर के अंगों के बारे में बता रखा है. मनू से पूछो, नोज कहां है? तो नाक के ऊपर उंगली रखता है. टीथ कहां है, तो दांत के ऊपर उंगली रखता है और आई, तो पलकों को हिलाता है. वह अभी बोल नहीं पाता.

एक दिन वह आंगन में अकेले खेल रहा था. हम ने देखा कि वह मुंह में कुछ चबा रहा है. हम ने उस से थूकने के लिए कहा, ‘‘थूको, थूको, मुंह में क्या है?’’ उस ने तुरंत अपनी उंगली मुंह में डाली, कंकड़ को बाहर निकाला और थूक दिया. फिर उस के बाद उंगली में पकड़ा हुआ कंकड़ दोबारा मुंह में डाल लिया. हम ने सोचा, मनू ने बात को वकील की तरह पकड़ा. मैं ने उसे थूकने के लिए कहा, कंकड़ फेंकने के लिए नहीं.        

सूर्य प्रकाश गुप्ता

*

मेरी 3 वर्षीय बेटी बड़ी ही नटखट व हाजिरजबाब है. एक बार मैं ने उस से पड़ोस से हिंदी का अखबार मंगवाया. उस में वह खबर, जो हमें चाहिए थी, न मिलने पर मैं ने उस से अंगरेजी का अखबार लाने को कहा. इस पर वह तपाक से बोली, ‘‘अब, पहले ही बता दो, कहीं मैथ्स का अखबार भी तो नहीं लाना है. मैं तीसरी बार नहीं जाऊंगी.’’

उस की यह बात सुन कर हम लोग हंसे बिना न रह सके.   

ऋचा सिंघल

*

गरमी में मेरी बेटी कुछ दिनों के लिए अपने बच्चों के साथ आई थी. उस का साढ़े 3 साल का बेटा, जिसे हम लोग ‘अभि’ बुलाते हैं, बड़ा ही चंचल व बातूनी है.

एक दिन सुबह हम सब घर के बाहर लौन में बैठे चाय पी रहे थे और ताजी हवा का आनंद ले रहे थे. बच्चे अंदर कमरे में सो रहे थे. अचानक मेरा नाती आंखें मलते हुए उनींदा सा आया और लौन में बैठ गया.

मेरे पति ने उस से कहा, ‘‘गुडमौर्निंग, अभि, रात में क्या सपना देखा?’’ उस ने बहुत ही भोलेपन से उत्तर दिया, ‘‘नानाजी, मैं तो सो रहा था, मैं कैसे देखता? मुझे गोदी में ले कर दिखाइए न.’’

उस की बात सुन कर हम लोग हंसी से लोटपोट हो गए. चाय का मजा दोगुना हो गया.     

स्वर्ण लता लाल

डायन हत्या कब तक?

डायन बता कर महिलाओं की हत्या का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है. ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां तो जरूर बनती हैं लेकिन बात आईगई हो जाती है. इस कुसंस्कारी प्रथा की आड़ में गंभीर अपराधों को अंजाम दिया जाता है. गांवदेहात या छोटे कसबों में रसूखदार, धनीमानी लोग ओझा, गुनीन, गुनिया, भोपा और तांत्रिकों के जरिए अनपढ़ व निरक्षर लोगों को उकसा कर महिलाओंपुरुषों को डायन, डाकन, डकनी, टोनही करार दे कर अपने स्वार्थ को साध लेते हैं.

ऐसा नहीं है कि डायन होने का आरोप केवल महिलाओं पर लगाया जाता है, कहींकहीं पुरुषों को भी इसी आरोप में प्रताडि़त किया जाता है. कुछ महीने पहले मेघालय के एक गांव में जब 4 लड़कियां एक अनजाने किस्म की बीमारी की चपेट में आ गईं और डाक्टर के इलाज का कोई फायदा नजर नहीं आया तो शामत आ गई गांव के एक बुजुर्ग पर. उस बुजुर्ग को बीमारी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया और उसे पाखाना खाने को मजबूर किया गया. विडंबना यह है कि पाखाना खिलाने का फैसला गांव की पंचायत में लिया गया था. इस के बाद दावा किया गया कि बुजुर्ग के पाखाना खाने के बाद ही चारों लड़कियों की सेहत में सुधार होना शुरू हुआ.

पश्चिम बंगाल के मालदह, दिनाजपुर, बीरभूम, बांकुड़ा, पुरुलिया और बंगलादेश की सीमा से सटे पश्चिम सिंहभूम व छोटानागपुर में डायन बता कर हत्या की घटनाएं आएदिन घटती रहती हैं. देखने में आया है कि डायन हत्या के पीछे केवल अंधविश्वास नहीं होता, बल्कि ज्यादातर मामलों के पीछे संपत्ति विवाद, जातिगत द्वेष या फिर राजनीतिक उद्देश्य होता है.

दरअसल, डायन की हवा फैला कर निहित स्वार्थ वाले तत्त्व अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं. आदिवासी समाज में डायन हत्या पर लंबे समय से शोध कर रहे सुतीर्थ चक्रवर्ती का कहना है, ‘‘ऐसी हत्याओं की पुलिस फाइल बेशक तैयार होती है, जांच होती है और मामला अदालत तक भी पहुंचता है, लेकिन जितनी घटनाओं की पुलिस फाइल तैयार होती है, उन से कहीं ज्यादा तादाद में इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है और इन सब के पीछे कोई न कोई स्वार्थ होता है. जाहिर है पुलिस फाइल में जगह बनने से पहले ही ज्यादातर मामलों को दबा दिया जाता है.’’

दरअसल, आदिवासी बहुल क्षेत्र के दूरदराज के गांवों में फैली गरीबी, अशिक्षा और इन के बीच फैले कुसंस्कार का फायदा उठा कर निहित स्वार्थ वाले तत्त्व अपना उल्लू सीधा करते हैं. डायन के संदेह में जितनी भी हत्याएं होती हैं, उन में से ज्यादातर मामलों में अकेली और निरीह ऐसी महिला की हत्या होती है जिस के पास जमीन, खेत या गाय होती है. उन की न केवल संपत्ति पर कब्जा करने के उद्देश्य से पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है, बल्कि कई मामलों में तो हत्या से पहले बलात्कार भी किया जाता है और कुछ मामलों में सिर मुंडा कर निर्वस्त्र कर महिला को पूरे गांव में घुमाया भी जाता है.

संथालों में डायन मान्यता

भारतीय समाज में डायन प्रथा की शुरुआत किस तरह हुई, इस का कोई प्रमाणित तथ्य नहीं है. बंगाल में आईपीएस अधिकारी के रूप में असित वरण चौधुरी लंबे समय तक आदिवासी क्षेत्र में कार्यरत रहे हैं. इस दौरान उन्होंने आदिवासी समाज, विशेषरूप से संथालों को बहुत करीब से देखा. वे बताते हैं, ‘‘संथालों में मान्यता है कि उम्र बढ़ने के साथ जीवन की असफलता के मद्देनजर मन में ईर्ष्या और लालच का भाव पैदा होता है. इस से कुछ महिलाएं अपने तमाम दुर्गुणों के साथ अपदेवताओं की अलौकिक कृपा से डायन में परिवर्तित हो जाती हैं. विरासत के तौर पर ये तमाम मान्यताएं पीढ़ीदरपीढ़ी आदिवासी समाज में पोषित होती हैं.’’

डायनप्र्रथा को ले कर संथाल समुदाय के बीच एक कहानी बहुत प्रचलित है. इस कहानी का जिक्र असित वरण चौधुरी ने अपनी किताब ‘संथाल समाज में डायनप्रथा और वर्तमान संकट’ में किया है. उन का कहना है, ‘‘संथालों के समाज में पारिवारिक देवता को खुश करने के लिए मुरगी की बलि चढ़ा कर प्रसाद के रूप में उस का मांस खाने का चलन बहुत पुराना है. लेकिन यह प्रसाद महिलाओं को खाने की मनाही है. एक संथाल परिवार की एक बच्ची ने चोरीछिपे अपने भाई और पिता के प्रसाद के जूठन से थोड़ा सा मांस खा लिया. इस के बाद बच्ची बीचबीच में मुरगी का मांस खाने की जिद करने लगी.

‘‘अपनी जिद में वह न दिन देखती, न रात. आखिरकार यह जिद बाकायदा कुहराम में बदल गई. परिवार ने उस के इस कुहराम को देवता का बच्ची के शरीर में प्रवेश मान लिया. लेकिन रोजरोज के इस कुहराम से तंग आ कर बच्ची की मां आत्महत्या करने पर उतारू हो गई.

‘‘मान्यता है कि रात के अंधेरे में आत्महत्या के लिए गई मां के सामने देवता प्रकट होते हैं. देवता ने मां को अपने सोए हुए पति के नितंब का एक टुकड़ा बेटी को खिला कर खाने का निर्देश दिया और अंतर्धान हो गए. मां ने देवता के निर्देश का पालन किया. इस के बाद तो आएदिन देवता के आदेशनिर्देश पर मांबेटी मांस उड़ाने लगीं. इस के बाद मांबेटी को आदिवासी समाज ने डायन करार दिया.’’

विदेशों में भी यह प्रथा

ग्रीस, रोम, जरमनी, इंगलैंड, अमेरिका और अफ्रीका में विच यानी डायनप्रथा रही है. इस के अलावा इटली, मिस्र, बेबीलोन, थाईलैंड में भी जादूटोना और डायन प्र्रथा का बोलबाला रहा है. पश्चिम में इस को विचक्राफ्ट का नाम दिया गया. ग्रीक लेखक डिमोस्थेनिस ने ऐथेंस में ईसापूर्व 350 में थियोरिन लेमैंस नामक एक डायन का जिक्र किया था, जिसे जिंदा जला कर मार डाला गया था. लेकिन ग्रीस की सब से चर्चित डायन एरिकाहो रही है. रोमन कवि लुकान ने भी अपनी कविता में डायन का जिक्र किया है. यहां तक कि शेक्सपियर के मैकबेथ में डायन है.

16वीं से 17वीं सदी में जरमनी में डायन के नाम पर बहुत सारी हत्याएं की गई हैं. 16वीं सदी में अकाल के लिए डायनों को जिम्मेदार ठहराया गया था.

सुतीर्थ चक्रवर्ती का कहना है,

‘‘यह प्रथा, दरअसल, मानव समाज में सामंतवादी की देन है. इसीलिए औद्योगिक क्रांति के बाद जब सामंतवाद की जगह पूंजीवाद ने ले ली, तब पश्चिमी देशों में डायनप्रथा खत्म होने लगी.

कालाजादू की परंपरा

 भारत, खासतौर से बंगाल, में काला जादू की परंपरा रही है. बंगाल के काला जादू की चर्चा पूरी दुनिया में है. बंग भंग से पहले पूर्वी बंगाल के मैमन सिंह, फरीदपुर, पावना और पश्चिम बंगाल में मेदिनीपुर, बीरभूम, बांकुड़ा, पुरुलिया, दिनाजपुर, मालदह के अलावा पूर्वोत्तर में असम के कामाख्या, गोयालपुर, कामरूप, दरंग, कोकड़ाझाड़ जिलों में डायन हत्या की वारदातें अकसर होती हैं. इस के अलावा मणिपुर, त्रिपुरा के साथ अंडमान निकोबार में भी काला जादू व डायनप्रथा है. लेकिन बंगाल के अलावा देश के विभिन्न राज्यों में आज भी डायन, भूतप्रेत, जादूटोने का चलन है.

मजे की बात यह है कि इस कुसंस्कार को बाकायदा विद्या का नाम दिया गया है. इस के कई नाम हैं. यह विद्या तंत्रविद्या, गुप्तविद्या या पिशाचविद्या के नाम से जानी जाती है. पिशाचविद्या में पारंगत होने के लिए बिलकुल सुनसान जगह में रात के अंधेरे में निर्वस्त्र हो कर तरहतरह की प्रक्रियाएं संपन्न की जाती हैं. इसलिए आमतौर पर विद्या में दीक्षित करने का काम श्मशान में होता है.

दरअसल, जिन चीजों से इंसान भय खाता है, उन तमाम चीजों का प्रयोग इस विद्या में किया जाता है. इस विद्या के साधक तांत्रिक और अघोड़ी श्मशान में अधजली लाश का मांस खाने से ले कर देशीविदेशी शराब तक पीते हैं. इस साधना में काली बिल्ली, खोपड़ी, हड्डियों का खूब इस्तेमाल होता है.

ओझा पर भरोसा

देश के कई राज्यों में केवल डायन का कुसंस्कार ही नहीं है, बल्कि ओझा या गुनीन से झाड़फूंक कराने का भी चलन है. देश के बहुत सारे इलाके ऐसे हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं. बीमारी का समुचित इलाज नहीं हो पाता है. ऐसे में निरक्षर व देहाती लोग ओझा के फेर में पड़ ही जाते हैं. दूरदराज के गांवों के लोग सामान्य बुखार से ले कर हर तरह की बीमारी, यहां तक कि चोरीचकारी, बाढ़, अकाल, सूखा के लिए भी इन्हीं पर निर्भर हैं. दिलचस्प बात यह है कि ओझाओं का एक दूसरा नाम ज्ञानगुरु भी है. इस के पीछे मान्यता यह है कि डायन लोगों को नुकसान पहुंचाती हैं, जबकि ओझा समाज का भला करता है.

गांवों में डायन की पहचान आमतौर पर यही ओझा ही करता है. ओझा पर लोगों के भरोसे का फायदा गांव के ताकतवर लोग बखूबी उठाते हैं. चूंकि ओझा की मदद से गांव वालों को शीशे में उतारना सहज हो जाता है, इसलिए ओझा को पैसों का लालच दे कर किसी को भी डायन करार दे दिया जाता है. दरअसल, गांव में आदिवासी महिला का यौनशोषण से ले कर उस की जमीनजायदाद हड़पने का काम होता है. यहां तक कि आपसी रंजिश के चलते हत्या करवाने के मकसद से डायन बता कर पूरे परिवार का भी सफाया कर दिया जाता है और फिर उन की संपत्ति हड़प ली जाती है.

सुतीर्थ चक्रवर्ती कहते हैं कि एक तरफ गांव के गैर आदिवासी धनीमानी या बड़े रसूखवाले आदिवासियों की जमीन हड़पने की ताक में रहते हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज में भी एक शोषक श्रेणी का उद्भव हुआ है जो गांव में अनजाने बुखार, अचानक हुई मौतों की ताक में रहते हैं. किसी कमजोर परिवार या अकेली महिला की जमीनजायदाद हड़पने की फिराक में उसे डायन बता कर निशाना साधते हैं. गांव में हुई ऐसी मौतों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा कर गांव वालों की अशिक्षा और कुसंस्कार का फायदा उठा कर उन्हें भड़काया जाता है और फिर उन के गुस्से का फायदा उठा कर हत्या करवा दी जाती है.

समाज को शर्मसार करते आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 1991 से ले कर 2010 तक देशभर में लगभग 1,700 महिलाओं को डायन घोषित कर उन की हत्या कर दी गई थी. हालांकि राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से ले कर 2014 तक देश में 2,290 महिलाओं की हत्या डायन बता कर कर दी गई है. 2001 से 2014 तक डायन हत्या के मामलों में 464 हत्याओं में झारखंड अव्वल रहा तो ओडिशा 415 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है. वहीं 383 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर साल कम से कम 100 से ले कर 240 महिलाएं डायन बता कर मार दी जाती हैं. इन में ज्यादातर मामलों के पीछे संपत्ति विवाद होता है या फिर ऐसी हत्या के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य साधा जाता है.

डायन बता कर सब से ज्यादा हत्याएं 2011 में हुईं. उस साल पूरे देश में कुल 240 हत्याएं हुईं. उस साल का रिकौर्ड बनाया ओडिशा ने, जहां 39 महिलाओं की हत्या डायन बता कर की गई. 36 हत्याओं के साथ दूसरे नंबर पर झारखंड रहा. 28 हत्याओं को अंजाम दे कर आंध्र प्रदेश ने तीसरा स्थान बनाया. 2007 में 177 हत्याओं में अकेले झारखंड में 50 हत्याएं हुईं. 2010 में पूरे देश में 178 महिलाओं को डायन बता कर मौत की नींद सुलाया गया. 2013 में एक बार फिर से झारखंड में 54 महिलाओं को डायन बता कर मार डाला गया. 2015 में झारखंड में 47 महिलाओं और 2016 के सितंबर तक 33 महिलाओं की डायन बता कर हत्या कर दी गई. कुल मिला कर 2001 से ले कर 2014 तक के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उन के आधार पर कहा जा सकता है कि डायन हत्या के मामले में ओडिशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश ने अपना नाम खराब किया है.

जहां तक हरियाणा का सवाल है, तो 2011 में 5 मामलों के बाद यह राज्य पिछले 3-4 सालों से डायन हत्या के मामले में नामजद नहीं हुआ है. वहीं, पूर्वोत्तर भारत में असम डायन हत्या के लिए बड़ा बदनाम रहा है. असम सरकार के आंकड़ों की मानें तो 2006 से ले कर 2012 तक 105 हत्याएं डायन के बहाने हो चुकी हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, 1987 से ले कर 2003 तक 2,556 महिलाओं की हत्या डायन के शक पर कर दी गई है.

क्या कहता है कानून

अब अगर कानून की बात करें तो डायन हत्या का मामला गैरजमानती, संज्ञेय और समाधेय है. इस की सजा 3 साल से ले कर आजीवन कारावास या 5 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकती है. किसी को डायन ठहराया जाना अपराध है और इस के लिए कम से 3 साल और अधिकतम 7 साल की सजा हो सकती है. वहीं, डायन बता कर किसी पर अत्याचार करने की सजा 5-10 साल तक की है. किसी को डायन बता कर बदनाम कर दिए जाने के कारण अगर कोई आत्महत्या कर लेता है तो आरोपी का जुर्म साबित होने पर 7 साल से ले कर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है. किसी को डायन बता कर उस के कपडे़ उतरवाने की सजा 5-10 साल की कैद तय की गई है. किसी बदनीयती से डायन करार दिए जाने की सजा 3-7 साल और डायन बता कर गांव से निष्कासित किए जाने की सजा 5-10 साल की तय की गई है.

बंगाल, महाराष्ट्र में अभी तक इस संबंध में कोई पुख्ता कानून नहीं है. अभी तक इन दोनों ही राज्यों में कानून का मसौदा ही तैयार हो रहा है. कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां डायन हत्या की रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाया गया है. ऐसे राज्यों में राजस्थान, झारखंड,  छत्तीसगढ़ और असम के नाम आते हैं. छत्तीसगढ़ में 2005 में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम बनाया गया, जिस के तहत डायन बताने वाले शख्स को 3 से ले कर 5 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है. राजस्थान सरकार ने महिला अत्याचार रोकथाम और संरक्षण कानून 2011 में डायन हत्या के लिए अलग से धारा 4 को जोड़ा है. इस धारा के तहत किसी महिला को डायन, डाकिन, डाकन, भूतनी बताने वाले को 3-7 साल की सजा और 5-20 हजार रुपए के जुर्माने को भरने का प्रावधान किया गया है.

अगस्त 2015 में असम विधानसभा ने डायन हत्या निवारक कानून पारित किया, क्योंकि इस राज्य में डायन हत्या एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रही थी. वहीं, बिहार में 1999 और झारखंड में 2001 में डायनप्रथा रोकथाम अधिनियम आया. खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ.

शबाब पर चांद

आज फिर

चांद शबाब पर है

भीगेगी रात और

रुसवा होगी

महकेंगे इश्क में तारे

खुशबुओं से

शमा खफा होगी

आज फिर

घटाएं करेंगी अठखेलियां

महबूब चांद संग

बिखरेंगे रात के आंचल पर

चांदी से रंग

चांदनी किसी के

जलाएगी अंग

आज फिर

सदी से लंबी गुजरेगी रात

सीलासीला हुआ

दिल का मौसम

होगी दर्द की बरसात

फैलेगी आंखों से नीर

यहां वहां

अक्स झलकेगा

उस में भी इश्क का

चांद को सताए बिना

चैन कहां.

– पारुल ‘पंखुरी’

मीना कुमारी : एक अधूरी दास्तां

हर कोई मीना कुमारी को मुसलिम समझता है, मगर हकीकत यह है कि मीना कुमारी का संबंध एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से था. अभिनेत्री मीना कुमारी की मां प्रभावती का संबंध बंगाली ब्राह्मण परिवार के साथसाथ रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार से भी था. प्रभावती का परिवार पश्चिम बंगाल में बोलपुर रेलवेस्टेशन के पास रहा करता था. प्रभावती वहीं से जुड़े शांतिनिकेतन कैंपस में नृत्य व ड्रामा से जुड़ी थीं. इसी ग्रुप से जुड़े तबलची अली बख्श से प्रभावती को इश्क हो गया था और उन से निकाह करने के बाद वे इकबाल बेगम बन गईं.

विवाह के बाद बोलपुर में रहना उन के लिए मुनासिब न था. इसलिए वे दोनों मुंबई चले आए थे. मुंबई के एक अस्पताल में इकबाल बेगम ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिसे पहले अली बख्श ने कूड़ेदान में फेंक दिया था. फिर उसे उठा कर ले आए थे. वह बच्ची महजबी थी, जो बड़ी हो कर मशहूर अदाकारा मीना कुमारी बनी. मीना कुमारी की मां प्रभावती और रांची निवासी हरिहर प्रसाद के बीच भी कोई संबंध था. पर यह किस तरह का संबंध था, यह आज तक राज बना हुआ है. मगर हरिहर प्रसाद ने 1935 में मीना कुमारी की मां प्रभावती को रांची (मौजा मोहराबाद) में 3 एकड़ 60 डैसिमल (खाता नंबर 133, प्लौट नंबर 62) रकबा जमीन दी थी. प्रभावती के कहने पर यह जमीन अली बख्श के नाम लिखी गई थी. 1971 में मीना कुमारी ने एक वकील के माध्यम से हरिहर प्रसाद की बेटी के बेटे और रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. रतन प्रकाश के पास 20 हजार रुपए भेजे थे कि वे इस जमीन के चारों तरफ दीवार खड़ी करा दें.

एक दौर वह भी आया था जब फिल्मनगरी और अपने अभिनय जीवन से ऊब कर मीना कुमारी ने रांची की इसी जमीन पर रहने का मन बनाया था. पर उन का विचार कैसे बदला, यह आज तक रहस्य है. मगर सच यह है कि डा. रतन प्रकाश अकसर अपनी पढ़ाई अथवा मकान के नाम पर मुंबई आ कर मीना कुमारी से पैसे ले जाते थे. इस बात को डा. रतन प्रकाश ने अपनी स्वयंलिखित पुस्तक में स्वीकार भी किया है. लोग मीना कुमारी को ट्रैजिडी क्वीन मानते हैं. लोगों को मीना कुमारी की शराब की लत व कई पुरुषों के  साथ अफेयर की बात पता है. पर किसी को भी इस की वजह पता नहीं है. किसी ने उन के दर्द को नहीं जाना. निजी जीवन की तमाम समस्याओं ने उन्हें ऐसा बनाया था. जिन समस्याओं से मीना कुमारी अपनी निजी जिंदगी में जूझ रही थीं उन समस्याओं से आज की भारतीय नारी भी जूझ रही है.

मीना कुमारी के पास सुंदरता, धन, मानसम्मान, शोहरत सबकुछ थी. उन के प्रशंसकों की कमी नहीं थी. लेकिन उन की कोख सूनी थी. उन्हें अपने पति,  निर्देशक कमाल अमरोही से अपेक्षित प्यार नहीं मिला. मीना कुमारी, कमाल अमरोही की तीसरी पत्नी थीं और कहा जाता है कि कमाल खुद भी नहीं चाहते थे कि मीना कुमारी उन के बेटे की मां बनें. अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही अपने पिता कमाल अमरोही को विलेन मानने के लिए तैयार नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘‘मुझे पता है कि किसी ने एक नाटक ‘एक तनहा चांद’ में मेरे पिता कमाल अमरोही को मेरी छोटी मम्मी मीना कुमारी की जिंदगी में विलेन की तरह पेश किया है. पर सच यह नहीं है.

‘‘लोग कहते हैं कि मेरे पिता ने उन्हें मां नहीं बनने दिया. यह सच नहीं है. हकीकत यह है कि वे 2 बार गर्भवती हुईं और दोनों बार उन्होंने स्वयं ही गर्भपात करवा लिया था. इसी तरह की कई हकीकतों से लोगों को रूबरू कराने के लिए मैं ने अपनी छोटी मम्मी मीना कुमारी की जिंदगी पर एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है और अब हम इस पर फिल्म बनाने जा रहे हैं.’’ जब मीना कुमारी जिंदा थीं, तब डा. रतन प्रकाश ने मीना कुमारी के नाम का सहारा ले कर बौलीवुड में बतौर लेखक स्थापित होने का असफल प्रयास किया. डा. रतन प्रकाश लिखित कहानी ‘फिर मिलेंगे’ मीना कुमारी को बहुत पसंद आई थी. वे इस कहानी पर बनने वाली फिल्म में अभिनय भी करना चाहती थीं, पर यह कभी हो ही नहीं पाया. मीना कुमारी की मौत के बाद 1985 में डा. रतन प्रकाश ने इस लंबी कहानी को ‘फिर मिलेंगे’ नामक उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया था और उपन्यास के कवरपेज पर मीना कुमारी की ही तसवीर लगाई थी.

मीना कुमारी ने दिलीप कुमार के साथ ‘कोहिनूर,’ ‘यहूदी’ और ‘आजाद’ सहित कई फिल्मों में अभिनय किया था पर दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी के संबंध कुछ ऐसे थे कि मीना कुमारी ने हमेशा यही कहा कि वे दिलीप कुमार से परिचित ही नहीं हैं. मीना कुमारी की अभिनेत्री साधना से कभी नहीं बनी. पर जब तक मीना कुमारी जिंदा रहीं, तब तक वे साधना के संबंध में पलपल की खबर रखती थीं. अभिनय के क्षेत्र में सफलता की बुलंदियों को छू रही मीना कुमारी ने एक स्ट्रगल कर रहे निर्देशक कमाल अमरोही के साथ शादी क्यों की? यों तो इस सवाल का सही जवाब मीना कुमारी की मौत के साथ ही दफन हो गया मगर इस सवाल को मीना कुमारी की प्रशंसक और मीना कुमारी के जीवन पर आधारित म्यूजिकल नाटक ‘एक तनहा चांद’ की लेखिका, निर्देशिका व नाटक में मीना कुमारी का किरदार निभाने वाली रूबी एस सैनी ने अपने नाटक में बखूबी उठाया है.

वे कहती हैं, ‘‘नाटक में हम ने इस बात को स्थापित किया है कि एक स्थापित अभिनेत्री का एक स्ट्रगल फिल्मकार कमाल अमरोही से शादी करने का फैसला प्यार पाने का सपना था. मगर कमाल उन्हें अपनी पत्नी के बदले एक सफल हीरोइन के रूप में देखते थे, जो उन्हें सफल निर्देशक बना सकती थी. कहा भी गया कि मीना साहिबान (पाकीजा) नहीं होती, तो कमाल अमरोही इतिहास के पन्नों में नहीं होते.’’ मीना कुमारी ने बतौर अदाकारा फिल्मी दुनिया को बहुतकुछ दिया, पर इंडस्ट्री सहित हर किसी ने उन्हें सिर्फ अपने लाभ के लिए उपयोग किया. मीना कुमारी को उन के अपनों ने ही छोड़ दिया था. मीना कुमारी को शराब की जो लत लगी, उन के परपुरुषों के साथ जो अफेयर थे, वह कहीं न कहीं फिल्मों के प्रति उन का पैशन, प्यार की भूख थी. वे अपना दर्द लोगों से बांटना चाहती थीं. पर लोग उन्हें दर्द पर दर्द देते चले जा रहे थे.

कमाल अमरोही अकसर मीना कुमारी के साथ मारपीट किया करते थे. शायद यही वजह है कि एक जगह मीना कुमारी ने कमाल अमरोही के संबंध में लिखा था, ‘दिल सा जब साथी पाया, बेचैनी भी वह साथ ले आया.’एक पार्टी में जब पार्टी के और्गेनाइजर ने लोगों से कमाल अमरोही का परिचय यह कह कर कराया कि ये हैं मीना कुमारी के पति और निर्देशक कमाल अमरोही तो कमाल अमरोही को गुस्सा आ गया. कहा जाता है कि उसी दिन घर पहुंचते ही  कमाल अमरोही ने गुस्से में मीना कुमारी को चांटा जड़ा था. उस के बाद कमाल अमरोही और मीना कुमारी दोनों एकसाथ किसी पार्टी में नहीं देखे गए.

वहीं, शादी के महज 3 सालों बाद ही 1955 में फिल्म ‘परिणीता’ के लिए मीना कुमारी को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. कमाल अमरोही और मीना कुमारी अगलबगल की कुरसियों पर बैठे हुए थे. मीना कुमारी स्टेज पर अवार्ड लेने गईं और फिर वापस घर की तरफ रवाना हो गईं. मीना कुमारी अपना सुनहरे रंग का पर्स वहीं कुरसी पर भूल गई थीं, जिसे कमाल अमरोही ने नहीं उठाया, बल्कि अभिनेत्री निम्मी ने पर्स को उठाया और मीना कुमारी को ला कर दिया. तब मीना ने कमाल से पूछा कि आप को मेरा पर्स नजर नहीं आया था? इस पर कमाल अमरोही ने कहा था, ‘‘मैं ने पर्स देखा था, पर उठाया नहीं. आज मैं तुम्हारा पर्स उठाता, तो कल को तुम्हारे जूते उठाता.’’ उस के बाद ही कमाल व मीना कुमारी के संबंध बिगड़ने लगे थे. इस पर आग में घी का काम किया 1959 में मीना कुमारी के दिए इंटरव्यू ने. इस इंटरव्यू में मीना कुमारी ने कहा था, ‘‘हम किसी इंसान को उस के साथ कुछ समय बिताए बगैर सही मानो में नहीं समझ सकते. यहां ऐसे लोग ज्यादा हैं जो मेरी सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं. इसलिए वे मेरी राहों में कांटे बो रहे हैं.’’

कमाल अमरोही के संदर्भ में मीना कुमारी ने लिखा था-

‘‘तुम क्या करोगे सुन कर मुझ से मेरी कहानी,

बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीकेफीके…’’

इतना ही नहीं, जब 1964 में कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को तलाक दिया, तब मीना ने लिखा था-

‘‘तलाक तो दे रहे हो नजर ए कहर के साथ,

जवानी भी मेरी लौटा दो मेरे मेहर के साथ.’’

कमाल अमरोही से तलाक हो जाने के बाद मीना कुमारी की जिंदगी में सावन कुमार टाक, धर्मेंद्र और गुलजार जैसे लोग भी आए. पर ठहरावभरा रिश्ता उन का किसी के साथ भी कायम नहीं रह सका. हर तरफ से परेशान मीना कुमारी की रातों की नींद गायब हो गई थी. तब उन के निजी चिकित्सक डा. सई तिमुर्जा ने उन्हें रात में सोने से पहले एक पैग ब्रैंडी दवा की तरह लेने की सलाह दी थी. पर धीरेधीरे मीना कुमारी ने ब्रैंडी की पूरी बोतल पीनी शुरू कर दी थी. उन दिनों चर्चाएं थीं कि धर्मेंद्र भी जानकी कुटीर में मीना कुमारी के साथ बैठ कर पीते थे.

माना जाता है कि कमाल अमरोही से तलाक के बाद मीना कुमारी के रिश्ते कईर् पुरुषों से रहे. मीना कुमारी हर बार उस पुरुष के साथ प्यार में ईमानदार रहीं, मगर वे सभी पुरुष महज उन की शोहरत और उन के धन का फायदा ही उठाते रहे. फिर वह दिन भी आ गया जब मीना कुमारी उस इंसान को खाना, धन, शराब सहित सबकुछ देने को तैयार रहतीं जो उन की कविताएं सुनने को तैयार रहता. गुलजार साहब तो अकसर मीना कुमारी की गजलें, नज्म व कविताएं सुना करते थे. मीना कुमारी को गजल, नज्म और कविताएं लिखने का शौक था तो वहीं उन्हें कार खरीदने का भी शौक था. उन के पास पहली कार मर्सडीज थी.

मौत को गले लगाने से पहले मीना कुमारी अपनी गजल व नज्म की ढाई सौ डायरियां गीतकार गुलजार के नाम वसीयत कर के गईं. ये सभी डायरियां गुलजार साहब के पास आज भी मौजूद हैं.मीना कुमारी हमेशा कमाल अमरोही को चंदन के नाम से पुकारा करती थीं, जबकि कमाल अमरोही, मीना कुमारी को मंजू कह कर बुलाते थे. 

पर अफसोस मीना कुमारी की जब मौत हुई, उस समय उन के पास अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे तक नहीं थे. इतनी कामयाब व बड़े सितारे का यों तनहा चांद की तरह जाना अखरता है.

कीमती सामान की सुरक्षा के लिए क्या है बेहतर

कई बैंकों का कहना होता है कि लॉकर में रखे गए सामान कि जिम्‍मेदारी ग्राहक पर होगी. ऐसे में सवाल यह है कि अगर बैंक लॉकर में रखे गए सामान की जिम्‍मेदारी लेने को तैयार नहीं है तो लॉकर लेने का कोई फायदा है क्‍या? लॉकर के लिए 1000 रुपये से 8000 रुपये तक की सालाना फीस देनी पड़ती है. बिना सुरक्षा के यह फीस क्‍यों दी जाए? यहां पर आप जानेंगे कि लॉकर में और घर में कीमती सामान रखना कितना सुरक्षित है.

लॉकर है एक बेहतर विकल्प

कीमती सामान जैसे कि गोल्‍ड और डॉयमेंड की ज्‍वेलरी घर में रखना समझदारी नहीं है. खासतौर पर उन लोगों के लिए जिनके पास कीमती चीजों की मात्रा थोड़ा ज्‍यादा हो. भले बैंक कह रहे हैं कि रखे गए सामान की जिम्‍मेदारी उनकी नहीं है लेकिन वे सुरक्षा के सारे उपाय करते हैं. बैंकों के मजबूत कमरों में लॉकर रखे जाते हैं. यहां पर किसी को जाने की इजाजत नहीं होती. इसमें आने-जाने वालों पर कड़ी नजर रखी जाती है. सिक्‍योरिटी गार्डस तैनात किए जाते हैं. साथ ही हाई लेवल का इलेक्‍ट्रॉनिक सर्विलेंस होता है. इसलिए घर में रखे सेफ की तुलना में बैंक लॉकर सुरक्षित हैं.

कितना सुरक्षित है आपका बैंक

ग्राहकों को बैंक से उसके सिक्‍योरिटी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के बारे में सवाल करने का अधिकार है. ग्राहक यह पूछ सकता है कि कीमती सामान की रक्षा के लिए बैंक ने क्‍या इंतजाम किए हैं. बैंक से पूछिए कि आखिरी बार उसने अपना सिक्‍योरिटी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कब अपडेट किया था? अगर बैंक से इस बारे में आपको उचित जबाब नहीं मिलता है तो कस्‍टमर किसी और बैंक में लॉकर हायर करने पर विचार कर सकता है.

कितनी सुरक्षित है आपके घर की तिजोरी

मार्केट में कई तरह के होम सेफ यानी कि तिजोरी मिलती हैं. आप जो सेफ खरीदने वाले हैं उसकी क्‍वॉलिटी चेक करिए. सही सर्टिफिकेशन वाला होम सेफ खरीदिए इससे आपको क्‍वालिटी की गारंटी मिलती है. घर में रखा कीमती सामान रखने का खर्च सिर्फ सेफ से खत्‍म नहीं हो जाता है. आपको सीसीटीवी कैमरा और बर्गलर अलार्म इंस्‍टॉल करना पड़ सकता है. एक सिंपल सिक्‍योरिटी के लिए आपका खर्च 10,000 रुपये से लेकर लाखों रुपए तक हो सकता है.

इंश्‍योरेंस है जरुरी

आपके कीमती सामान को चोरी और डैमेज से बचाने के लिए बीमा पॉलिसी लेनी चाहिए. जनरल इंश्‍योरेंस कंपनियां होम इंश्‍यारेंस कवर के तहत ज्‍वेलरी का भी बीमा करती हैं. लेकिन इसमें कई प्रकार की शर्तें भी होती हैं. जैसे कि कैश का बीमा नहीं किया जाता है और ज्‍वैलरी की कीमत पता की जाती है. इसलिए ज्‍वेलरी चाहे घर की तिजोरी में हो या फिर बैंक लॉकर में उसका बीमा अवश्‍य करवाना चाहिए.

हैं कई अन्‍य विकल्‍प

अगर आपको अपना बैंक सुरक्षित नहीं लगता है और होम सेफ से भी आप संतुष्‍ठ नहीं हैं तो प्राइवेट लॉकर सर्विस पर विचार कर सकते हैं. इसका किराया 4,500 से 30,000 रुपए सालाना हो सकता है. प्राइवेट बैंक को एक्‍सेस करना आसान है क्‍योंकि ये सप्‍ताह में सातों दिन खुले रहते हैं.

प्यार के बारे में अभी सोचा तक नहीं : शिवानी तोमर

लव और रोमांस से भरपूर टीवी सीरियलों से अपनी पहचान बनाने वाली दिल्ली की शिवानी तोमर ने अपने प्यार के बारें में अभी सोचा तक नहीं है. वह कहती हैं, अभी तो मैं अपने नये सीरियल इस प्यार को क्या नाम दूं में व्यस्त हूं. उनकी व्यस्तता का अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि जिस समय लखनऊ में वह अपने सीरियल का प्रचार कर रही थीं उस समय मुम्बई में उनका एक डायलॉग एडिट हो रहा था. मुम्बई से संदेश आया कि यह डायलॉग वाट्सएप पर रिकॉर्ड कर भेजो.

शिवानी ने अपना डायलाग मेरी बात सुन के जानाबोल कर लखनऊ से मुम्बई भेज दिया. दिल्ली की रहने वाली शिवानी तोमर ने आर्ट कोर्स करने के बाद ग्राफिग डिजाइनर की नौकरी की. शिवानी को स्कूल के ही दिनों से एक्टिंग का शौक था. ऐसे में वह अपने जॉब के सिलसिले में मुम्बई गईं तो वहां एक्टिंग में अपने करियर के ऑप्शन देखने लगीं.

वह कहती हैं, करियर के रूप में देखें तो सीरियलों में काम करना फिल्मों में काम करने से अलग है. यहां बाहरी कलाकारों को लेकर किसी तरह की अलग सोच नहीं होती है. ऑडिशन देते समय अगर आप अपने हुनर का कमाल दिखा लें तो काम मिलना सरल हो जाता है.

शिवानी ने 6 साल बहुत स्ट्रगल किया. इस दौरान कई टीवी शो में काम करने का मौका मिला इनमें क्रेजी स्टूपिड इश्क’, ‘हम आपके घर में रहते हैं’, ‘कसम तेरे प्यार कीऔर गुमराहप्रमुख है. स्टार प्लस के सीरियल इस प्यार को क्या नाम दूं’  में वह अपनी भूमिका के बारे में बताती हैं, यह मेरे लिये सबसे अहम रोल है. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर की पृष्ठभूमि पर यह बना है. इसके लिये मैंने इलाहाबाद के लोगों के बारे में पढा. यहां की बातचीत के अंदाज को सीखा’.

दिल्ली और मुम्बई में क्या अंतर देखती हैं? इस पर शिवानी कहती हैं, दोनो ही शहर अलग पहचान के हैं. इनकी आपस में तुलना करना सही नहीं होगा. मुम्बई में काम को महत्व मिलता है. ज्यादा सुरक्षित शहर है. दिल्ली में अभी फ्लैटस के मुकाबले घर ज्यादा है. मुम्बई में घर बहुत कम हैं. मेरे लिये एक शहर मेरे सपनों को पूरा कर रहा है तो दूसरा मेरा अपना शहर रहा है.

शुद्ध शाकाहारी भोजन करने वाली शिवानी कहती हैं, एक्टिंग में करियर बनाने के लिये धैर्य बहुत होना चाहिये. कई बार निराशा बहुत होती है. ऐसे में बहुत परेशानी होती है. धैर्य होने और परिवार का सपोर्ट मिलने से बहुत मदद मिलती है.

मैं पिछले 4 सालों से एक शादीशुदा औरत से प्यार करता हूं. हम ने कई बार हमबिस्तरी भी की है. क्या ऐसा करना ठीक है.

सवाल

मैं पिछले तकरीबन 4 सालों से एक शादीशुदा औरत से प्यार करता हूं. हम ने कई बार हमबिस्तरी भी की है. क्या ऐसा करना ठीक है?

जवाब

अगर औरत राजी हो तो ठीक है, पर उस के पति को पता चल गया तो जनाब बुरी तरह पिटोगे. अच्छा है साथ छोड़ दें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

 

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