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ऐम्यूजमैंट पार्क में मस्ती नहीं सस्ती

विदेशी फिल्मों, टीवी शो और पर्यटन के लायक जगहों में आज ऐम्यूजमैंट पार्क सब से अधिक आकर्षण का केंद्र बन गया है और किशोरों को यह खूब भाने लगा है. बड़े शहरों की तर्ज पर अब छोटे शहरों में भी ऐम्यूजमैंट पार्क बनने लगे हैं. महंगा होने के कारण यहां आना भारी पड़ता है. कारोबारी मुकाबले के चलते कुछ ऐम्यूजमैंट पार्क अब सस्ते भी हो रहे हैं.

किशोरों के लिए ऐम्यूजमैंट पार्क सब से अधिक मस्ती का स्थान होता है. यहां उन्हें सब से अधिक पसंद आने वाली चीजों में झूले और तरहतरह के गेम्स होते हैं. ऐम्यूजमैंट पार्क एक तरह से ऐडवैंचर से भरा होता है. इस में तरहतरह की राइड्स होती हैं. कुछ इस तरह से होती हैं कि छोटेबड़े हर एक को पसंद आएं. राइड्स के साथ यहां तरहतरह के झूले भी होते हैं. इस तरह के पार्कों में कुछ क्षेत्र ऐसा होता है, जो आर्मी के ट्रेनिंग कैंप जैसा होता है. यहां आ कर लगता है कि किशोर जैसे किसी आर्मी ट्रेनिंग कैंप में आ गए हों.

ऐम्यूजमैंट पार्क को बेहतर बनाने के लिए यहां पर वाटर पार्क और टौय ट्रेन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं. खानेपीने की दुकानों के साथसाथ यहां म्यूजिक और डांस का भी भरपूर इंतजाम होता है.

ऐम्यूजमैंट पार्क की सब से खास बात है कि यह काफी बड़े क्षेत्र में फैला होता है जहां पर किशोर अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती करते हैं. बड़ेबड़े शहरों में तो ऐसे पार्क बहुत पहले से चल रहे हैं लेकिन अब छोटे शहरों में भी ऐम्यूजमैंट पार्क खुलने लगे हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ड्रीम वर्ल्ड ऐम्यूजमैंट पार्क आशियाना इलाके में करीब 6 एकड़ एरिया में बना है. इस में 22 राइड्स हैं. सितंबर 2016 में खुला यह पार्क लोगों को काफी पसंद आ रहा है. अब इस में एक छोटा वाटर पार्क भी है, जिस में बड़े और बच्चे सभी मौजमस्ती कर सकते हैं. ड्रीम वर्ल्ड ऐम्यूजमैंट पार्क के डायरैक्टर मनीष वर्मा का कहना है कि हम ने इस पार्क के रेट भी अन्य ऐम्यूजमैंट पार्कों से कम रखे हैं.

बड़े शहरों में महंगे हैं ऐम्यूजमैंट पार्क

बड़े शहरों में खुले ऐम्यूजमैंट पार्क बहुत महंगे होते हैं. इस कारण यहां जाना किशोरों की जेब पर भारी पड़ता है. सामान्यतौर पर ऐम्यूजमैंट पार्क में हर राइड का अलगअलग रेट होता है. यह 100 रुपए से ले कर 500 रुपए तक हो सकता है. यह जेब पर काफी भारी पड़ता है. किशोरों में ऐम्यूजमैंट पार्क बहुत फेमस हैं. दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में लोग घूमने जाते हैं तो ऐम्यूजमैंट पार्क जरूर जाते हैं.

ज्यादातर किशोरों को ऊंची राइड्स पसंद आती हैं. इस के अलावा आर्मी के ट्रेनिंग कैंप जैसी राइड्स भी उन्हें खूब भाती हैं. स्कूल की तरफ से किशोरों को कई बार ऐसे पार्क में ले जाया जाता है. इस का कारण यह होता है कि बच्चों को यहां बहुतकुछ सीखने को मिलता है. इसलिए बच्चे यहां आना पसंद करते हैं, लेकिन महंगा होने के कारण बच्चे यहां बारबार नहीं आ पाते. पैरेंट्स भी ऐम्यूजमैंट पार्क में बच्चों को कभीकभी ही ले जाते हैं.

अपने बच्चों के साथ ऐम्यूजमैंट पार्क जाने वाली देविका कहती हैं कि बच्चे ऐसे पार्क में जा कर हर खेलने वाली वस्तु का प्रयोग करना चाहते हैं. सभी पार्कों में सब के अलग रेट होते हैं. अच्छी बात यह है कि ऐम्यूजमैंट पार्क आ कर बच्चों को बहुतकुछ सीखनेसमझने को मिलता है.

हर सुविधा से युक्त ऐम्यूजमैंट पार्क

आमतौर पर हर पार्क कुछ ही सुविधाओं से लैस होता है लेकिन ऐम्यूजमैंट पार्क में हर तरह के फन को करने का मौका मिलता है. यहां झूले, राइड्स, ट्रेन और भी तरहतरह के ऐडवैंचर से भरपूर चीजें होती हैं. अब वाटर पार्क और कई जगहों पर चिडि़याघर भी इस का हिस्सा हो गए हैं.

ऐम्यूजमैंट पार्क में जाने के शौकीन विपुल अग्रवाल कहते हैं, ‘‘मुझे यहां आ कर अलग सा लगता है पर परेशानी की बात यह है कि यहां बारबार आना काफी खर्चीला साबित होता है. यहां हर सुविधा की अलग कीमत देनी पड़ती है. ज्यादातर पार्कों में ऐंट्री फीस कम होती है बाकी खर्चे ज्यादा होते हैं. ये बाकी खर्चे ही सब से अधिक जेब पर भारी पड़ते हैं.’’

ऐम्यूजमैंट पार्क प्रबंधन से जुड़े लोग कहते हैं कि ऐसे पार्कों में रखरखाव बहुत जरूरी होता है. यह महंगा होता है. इस के अलावा यहां पर नएनए किस्म के झूले लगे होते हैं. जो महंगे होते हैं. ऐसे में इन की फीस ज्यादा हो जाती है, लेकिन हर राइड्स की फीस अलग होने से लाभ यह होता है कि जो पसंद हो वही प्रयोग किया जाए.

उदाहरण के लिए जब वाटर पार्क में जाना होता है तो वहां ऐंट्री फीस में ही सबकुछ शामिल होता है. ऐसे में किसी का प्रयोग न भी करना हो तो पैसा देना ही पड़ता है. ऐम्यूजमैंट पार्क में जितना इस्तेमाल करो उतने का ही भुगतान करना पड़ता है. इस से जेब ज्यादा भार नहीं पड़ता.

ऐम्यूजमैंट पार्क में बच्चों के साथ बड़ों की भी ऐक्सरसाइज हो जाती है, जिस से आज के दौड़तेभागते शहरी जीवन में कुछ नया मिलता है. आमतौर पर बच्चे आज के खुले माहौल से दूर होते जा रहे हैं, जिस से उन्हें तरहतरह के रोग लग रहे हैं. ऐम्यूजमैंट पार्क बच्चों को वापस अपनी ओर मोड़ने में सफल हो रहे हैं, यही वजह है कि अब बच्चों को ये बहुत पसंद आने लगे हैं और किशोरों के आकर्षण का सब से बड़ा केंद्र बन गए हैं.                                       

बेईमानी की चाहत का नतीजा

5 नवंबर, 2017 की सुबह 9 बजे नवी मुंबई के उपनगर एवं थाना खांदेश्वर में ड्यूटी पर तैनात एआई गजानंद घाड़गे को बालासाहेब माने ने फोन कर के बताया कि साईंलीला हाउसिंग सोसायटी की इमारत के कमरा नंबर 12 से बहुत तेज दुर्गंध आ रही है. कमरे में बाहर से ताला बंद है. दुर्गंध से लगता है कि अंदर कोई लाश सड़ रही है.

गजानंद घाड़गे ने यह बात थानाप्रभारी अमर देसाई और इंसपेक्टर विजय वाघमारे को बताई. उन्होंने तत्काल इस मामले की डायरी तैयार कराई और एआई संतोष जाधव, गजानंद घाड़गे, सिपाही पांडुरंग सूर्यवंशी, अबू जाधव, सोमनाथ रणदिवे, संजय पाटिल और अभय जाधव को साथ ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

जिस कमरे से दुर्गंध आ रही थी, उस के सामने भीड़ लगी थी. पुलिस को देखते ही भीड़ एक किनारे हो गई. कमरे के सामने पहुंच कर पुलिस ने सूचना देने वाले उस कमरे के मालिक बालासाहब माने से पूछताछ की. पता चला कि उस कमरे में अंजलि पवार रहती थी. वह 5 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. उसे यह कमरा उस की सहेली माया ने एक प्रौपर्टी डीलर के मार्फत दिलाया था. माया उस के सामने वाले 10 नंबर के कमरे में अपने एक पुरुष मित्र के साथ रहती थी. लेकिन वह 3-4 दिन से बाहर गई हुई थी.

चूंकि उस कमरे की चाबी किसी के पास नहीं थी. इसलिए मजबूर हो कर दरवाजा तोड़ा गया. दरवाजा टूटते ही अंदर से बदबू का ऐसा झोंका आया, जिस से वहां खड़े लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया. पुलिस कमरे में घुसी तो फर्श पर जगहजगह खून के धब्बे नजर आए. बाथरूम का दरवाजा खुला था. उसी में बैडशीट में लपेट कर लाश रखी थी, जो कमरे के अंदर आते ही दिखाई दे गई थी. उसे कमरे में ला कर खोला गया तो उस में जो लाश निकली, वह उस कमरे में रहने वाली अंजलि पवार की थी. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. शरीर पर कई गहरे घाव थे, दोनों हाथों की नसें भी कटी थीं.

लाश देख कर यही लगता था कि मृतका की हत्या 3-4 दिन पहले की गई थी. मामला हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी अमर देसाई ने इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को देने के साथसाथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी सूचना दी गई. सूचना पा कर थोड़ी ही देर में क्राइम टीम के साथ नवी मुंबई के डीसीपी विश्वास पांढरे और एसीपी प्रकाश निलेवाड़ घटनास्थल पर पहुंच गए.

क्राइम टीम का काम निपट गया तो अमर देसाई ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए पनवेल के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर हत्या के इस मामले की जांच इंसपेक्टर विजय वाघमारे को सौंप दी.

विजय वाघमारे ने थानाप्रभारी अमर देसाई से सलाहमशविरा कर के जांच की रूपरेखा तैयार की और अपनी एक टीम बना कर हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश शुरू कर दी. दूसरी ओर नवी मुंबई के सीपी हेमंत नगराले और जौइंट सीपी मधुकर पांडेय के निर्देश पर नवी मुंबई क्राइम ब्रांच-2 की टीम भी हत्या के इस मामले की जांच में लग गई.

जांच का निर्देश मिलते ही क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर एस.पी. कोल्हटकर ने भी घटनास्थल का निरीक्षण कर के मामले की जानकारियां जुटाईं. कोल्हटकर की नजर मृतका की सहेली माया पर थी, इसलिए माया को क्राइम ब्रांच ने अपने औफिस बुला लिया. उस से की गई पूछताछ में जो पता चला, उस से क्राइम ब्रांच को उस के प्रेमी राजकुमार उर्फ राज पर शक हुआ. क्योंकि पुलिस को माया की बातों से राजकुमार शातिर प्रवृत्ति का लगा था. शंका की एक वजह यह भी थी कि वह उसी दिन से गायब था, जिस दिन अंजलि की हत्या हुई थी.

पुलिस ने माया से राजकुमार का मोबाइल नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया. इस का परिणाम भी मनचाहा मिला. सर्विलांस की मदद से राजकुमार को 14 नवंबर, 2016 को तलौजा के नावड़ा फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.

28 साल का राजकुमार उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के रहने वाले आदिनाथ पांडेय का बेटा था. आदिनाथ पांडेय काफी पहले रोजीरोटी के चक्कर में महाराष्ट्र के जिला रायपुर आ कर वहां की तहसील खालापुर के गांव शिवनगर में रहने लगे थे. गुजरबसर के लिए उन्होंने शिवनगर के बसस्टौप पर पान का खोखा रख लिया था. राजकुमार उन की एकलौती संतान था.

अधिक लाड़प्यार की वजह से वह बिगड़ गया था. आदिनाथ घर से सुबह जल्दी निकल जाते थे और देर रात लौटते थे, इसलिए वह बेटे पर ध्यान नहीं दे पाते थे. यही वजह थी कि जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, वैसेवैसे उस की आदतें बिगड़ती गईं. पिता को समय नहीं मिलता था, मां कुछ कह नहीं पाती थी, इसलिए उसे न किसी का डर था न लिहाज. वह अपनी मनमरजी करने लगा. उस ने दोस्ती भी अपने जैसे लड़कों से कर ली, जिन्होंने उसे और बिगाड़ दिया.

कमउम्र में ही वह शराब के साथसाथ शबाब का भी शौकीन हो गया. बाप की इतनी कमाई नहीं थी कि वह उस के जायजनाजायज खर्च पूरे करते, इसलिए अपने नाजायज खर्चे पूरे करने के लिए वह चोरियां और लूट करने लगा. लड़कियों के शौक ने ही उस की मुलाकात माया से करा दी. माया उस अड्डे की सब से खूबसूरत युवती थी, इसलिए उस की कीमत भी सब से ज्यादा थी. वह कभीकभी ही धंधे के लिए अड्डे पर आती थी. उस की ज्यादातर बुकिंग उन ग्राहकों के साथ ही होती थी, जो उसे होटल या गेस्टहाउस ले जाते थे.

माया का भाव बहुत ज्यादा था, जिसे अदा करना राजकुमार के वश में नहीं था. माया उसे भा जरूर गई थी, पर उस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उस के पास जा पाता. ऐसे में उस की दाल कहां गलने वाली थी. पर उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि एक न एक दिन वह माया को अपनी बना कर रहेगा.

समय अपनी गति से चलता रहा. राजकुमार ने जब से माया को देखा था, तब से उस का दीवाना हो चुका था. माया उस के दिमाग में कुछ इस तरह छा गई थी कि सोतेजागते वह उसी के बारे में सोचा करता था. इस बीच उस ने कई बार माया के पास जाने की कोशिश की, लेकिन माया ने बिना पैसे के उसे भाव नहीं दिया, क्योंकि वह आदमी की नहीं, पैसों की कद्र करती थी.

राजकुमार को जब लगा कि बिना पैसों के वह माया तक नहीं पहुंच सकता तो पैसों के लिए उस ने एक बड़ी योजना बनाई. उस ने ज्वैलथीफ विनोद सिंह की तरह काम किया, जिस में वह सफल भी रहा. विनोद ने अकेले ही मुंबई और बंगलुरु की गहनों की कई दुकानों में सेंधमारी की थी. आजकल वह जेल में बंद है.

विनोद सिंह की तर्ज पर राजकुमार के पास पैसा आया तो उसे माया के पास पहुंचने में देर नहीं लगी. वह आए दिन माया के पास जाने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच की दूरियां खत्म हुईं तो दोनों एकदूसरे से अपना दुखदर्द बांटने लगे. राजकुमार माया को पहले से प्यार करता था, अब वह उस से विवाह के बारे में सोचने लगा. माया जिस मजबूरी के तहत उस अंधेरी गली में आई थी, उस मजबूरी को हल कर के वह उसे उजाले में लाने की कोशिश करने लगा.

दरअसल, माया यवतमाल के एक छोटे से गांव की रहने वाली थी. उस की पारिवारिक स्थिति काफी खराब थी. भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. उस के पिता को टीबी हो गई थी, जिस के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. वह जिस के भी पास नौकरी या पैसों के लिए गई, उसी ने उसे काम देने के बजाय उस की सुंदरता पर ज्यादा ध्यान दिया.

मजबूर हो कर उस ने सोचा कि लोग उस की सुंदरता का फ्री में लाभ उठाएं, उस से अच्छा है कि वही क्यों न अपनी सुंदरता का लाभ उठाए. इस के बाद माया गांव के बिगड़े शरीफजादों के पास खुद ही जाने लगी. उन्हें वह अपना तन सौंपती और बदले में उन से अच्छा पैसा लेती. धीरेधीरे उस के देहव्यापार की बात गांव में फैलने लगी तो वह गांव छोड़ कर मुंबई आ गई.

माया खुद अपनी मरजी से देहव्यापार में आई थी, इसलिए कोठा मालकिन ने उसे अपना धंधा स्वतंत्र रूप से करने की इजाजत दे दी. उस से वह सिर्फ अपने कोठे का किराया लिया करती थी. पहले तो माया ने राजकुमार की ओर ध्यान नहीं दिया. वह उसे अपना शरीर सौंप कर बदले में उस से कीमत लेती रही. लेकिन जब उसे लगा कि राजकुमार उसे सचमुच प्यार करता है तो उस का भी झुकाव उस की ओर होने लगा. वह भी उस से प्यार करने लगी.

अब दोनों के बीच शरीर और पैसों की बात खत्म हो गई. उन्हें जब भी मौका मिलता, वे शहर से बाहर घूमने निकल जाते, राजकुमार चोरी के पैसे से माया की जरूरतें पूरी कर रहा था.

जब राजकुमार को विश्वास हो गया कि माया भी उस से प्यार करने लगी है तो उस ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. लेकिन यह बात माया को उचित नहीं लगी, इसलिए उस ने इंतजार करने को कहा.

माया ने राजकुमार को शादी के लिए भले ही इंतजार करने के लिए कहा था, लेकिन वह उस के साथ लिवइन में रहने लगी. रहते भले ही दोनों साथ थे, लेकिन दोनों किसी के काम में हस्तक्षेप नहीं करते थे. जबकि दोनों को परिणामों के बारे में अच्छी तरह पता था.

आखिर एक दिन मुंबई क्राइम ब्रांच ने राजकुमार को सेंधमारी की योजना बनाते हुए पकड़ लिया. इस मामले में उसे 6 महीने की सजा हुई. कुछ दिनों जेल में रहने के बाद 28 अक्तूबर, 2016 को वह पैरोल पर बाहर आया तो फिर लौट कर जेल नहीं गया. अंजलि और माया सहेलियां थीं. माया की तरह वह भी देह के धंधे में लिप्त थी. राजकुमार के जेल जाने के बाद अंजलि की माया से मुलाकात एक पिकनिक पौइंट पर हुई तो जल्दी ही दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

27 साल की स्वस्थ और सुंदर अंजलि अतिमहत्त्वाकांक्षी युवती थी. वह गुजरात के जिला बलसाड़ की रहने वाली थी. साधारण परिवार में जन्मी अंजलि के सपने काफी बड़े थे. लेकिन उस की शादी एक औटोचालक विपिन पवार से हो गई थी. वह नवी मुंबई के उपनगर खांदेश्वर में किराए पर औटो ले कर चलाता था.

इसे अपनी बदनसीबी समझ कर अंजलि विपिन के साथ रह रही थी. लेकिन उस की कमाई से वह खुश नहीं थी. क्योंकि आधी से अधिक कमाई की तो वह शराब ही पी जाता था, जो बचता था, उस से  घर का खर्च चलाना मुश्किल था.

कुछ दिनों तक तो अंजलि यह सब झेलती रही, लेकिन जब उस ने देखा कि अगर वह पति के सहारे रही तो इसी तरह घुटघुट कर मर जाएगी. इसलिए उस ने कुछ करने का विचार किया.

वह जिस बस्ती में रहती थी, वहां की कई लड़कियां और महिलाएं बीयरबारों में काम करती थीं. वे काफी सुखी थीं. अंजलि ने उन से बात की और उन के साथ जाने लगी.

बीयरबार में काम करतेकरते वह अधिक कमाई के लिए देहव्यापार भी करने लगी. इस काम में उसे अच्छी कमाई होने लगी. साथ ही वह ग्राहकों के साथ घूमने भी जाने लगी. ऐसे में ही उस की मुलाकात माया से हुई तो एक ही राह की राही होने की वजह से दोनों में दोस्ती हो गई. दोस्ती इतनी गहरी थी कि वे एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगी थीं. पैसा आने लगा तो अंजलि के रहनसहन में पूरी तरह बदलाव आ गया. इस बदलाव की असलियत की जानकारी उस के पति विपिन को हुई तो उस ने अंजलि को समझाने के साथसाथ धमकाया भी, पर अंजलि को जो सुख इस काम में मिल रहा था, वह भला उसे कैसे छोड़ती.

घर में लड़ाईझगड़ा शुरू हुआ तो रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर उस ने पति को ही छोड़ दिया. पति को छोड़ कर वह माया द्वारा दिलाए गए किराए के मकान में रहने लगी.

पैरोल पर जेल से छूट कर आया राजकुमार माया के पास पहुंचा तो अंजलि को देख कर उस पर मर मिटा. जब उसे पता चला कि अंजलि भी माया की तरह देहधंधा करती है तो उसे अपनी राह आसान नजर आई. उस ने सोचा कि वह जब चाहेगा, पैसे के बल पर या ऐसे ही उसे पा लेगा. अब वह उसे पाने का मौका ढूंढने लगा.

3 नवंबर, 2016 को माया अपने किसी ग्राहक के साथ गोवा चली गई. उसे बस पर बैठा कर राजकुमार लौट रहा था तो अपना खाना और शराब की बोतल साथ ले आया. शराब पीने के बाद उसे नशा चढ़ा तो उसे अंजलि की याद आई. उस की याद में वह खाना भूल गया.

उस समय तक रात के 12 बज चुके थे. सोसाइटी के लगभग सभी लोग सो चुके थे. धीरे से माया के घर से निकल कर उस ने अंजलि का दरवाजा खटखटाया तो उस ने दरवाजा खोल दिया. अंजलि के दरवाजा खोलते ही राजकुमार उस के कमरे में आ गया. अंजलि उस समय रात वाले आरामदायक कपड़ों में थी.

उसे उन कपड़ों में देख कर राजकुमार उत्तेजित हो उठा. उस ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘अंजलि, तुम्हारी सहेली मुझे अकेला छोड़ कर गोवा चली गई, जबकि इस समय मुझे उस की सख्त जरूरत महसूस हो रही है. सोचा, माया नहीं है तो उस की सहेली ही सही. तुम उस की कमी पूरी कर दो.’’

राजकुमार की मंशा भांप कर अंजलि ने उसे अपने कमरे में जाने को कहा तो वापस जाने के बजाए राजकुमार अंदर से दरवाजा बंद कर के उस के साथ जबरदस्ती करने लगा. अंजलि ने खुद को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन हट्टेकट्टे राजकुमार से वह खुद को बचा नहीं सकी. आखिर राजकुमार मनमानी कर के ही माना.

मनमानी कर के राजकुमार जाने लगा तो अंजलि ने कहा, ‘‘तुम ने मेरे साथ जो किया है, ठीक नहीं किया. आने दो माया को, मैं उसी से नहीं, पुलिस से भी तुम्हारी शिकायत करूंगी.’’

अंजलि की इस धमकी से राजकुमार डर गया. नशे में वह था ही, फलस्वरूप अच्छाबुरा नहीं सोच सका. वह एक खतरनाक फैसला ले कर किचन में गया और वहां से सब्जी काटने वाली छुरी ला कर यह सोच कर अंजलि पर हमला कर दिया कि न यह रहेगी और न शिकायत करेगी.

अंजलि की हत्या कर के वह बाहर आया और दरवाजे पर ताला लगा कर माया के कमरे पर आ गया. अगले दिन वह तलौजा में रहने वाले अपने एक पुराने दोस्त के यहां चला गया, जहां से क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच पुलिस ने राजकुमार को थाना खांदेश्वर पुलिस के हवाले कर दिया, जहां इंसपेक्टर विजय वाघमारे ने उस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रंगीन शौक पड़ा भारी

राजस्थान में आम लोगों के होली खेलने के अगले दिन पुलिस वाले होली खेलते हैं. इस की वजह यह है कि होली पर पुलिस वाले आम लोगों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ड्यूटी पर तैनात रहते हैं. इसलिए पुलिस विभाग अगले दिन होली खेलता है. उस दिन पुलिस वाले पूरी मस्ती में होते हैं. पुलिस अधिकारियों के घरों और रिजर्व पुलिस लाइनों में दोपहर तक यही सिलसिला चलता रहता है.

इस बार 13 मार्च को आम लोगों ने होली खेली थी, इसलिए पुलिस वालों ने 14 मार्च को होली खेली. दोपहर तक चली पुलिस वालों की होली की मस्ती की खुमारी शाम तक उतरने लगी थी. जयपुर के थाना मानसरोवर के ज्यादातर पुलिस वाले वरदी पहन कर अपनी ड्यूटी पर आ गए थे. 1-2 ही थे, जो किसी वजह से नहीं आए थे, इस से कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

शाम 6-7 बजे के बीच थाना मानसरोवर के लैंडलाइन फोन की घंटी बजी तो ड्यूटी अफसर ने रिसीवर कान से लगा कर कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘सर, आप थाना मानसरोवर से बोल रहे हैं न?’’ दूसरी ओर से पूछा गया.

‘‘जी कहिए, मैं थाना मानसरोवर से ही बोल रहा हूं?’’ ड्यूटी अफसर ने कहा.

‘‘सर, मैं हीरापथ से बोल रहा हूं.’’ दूसरी ओर से किसी आदमी की घबराई हुई सी आवाज आई, ‘‘सर, हीरापथ के मकान नंबर 55/31 से बहुत तेज दुर्गंध आ रही है. इस मकान में रहने वाले बापबेटे भी नजर नहीं आ रहे हैं. सर, मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है.’’

‘‘मकान से दुर्गंध कब से आ रही है?’’ ड्यूटी अफसर ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, दुर्गंध तो होली के बाद से ही आ रही है, लेकिन अब असहनीय हो गई है.’’ फोन करने वाले ने कहा और फोन काट दिया.

फोन कटने के तुरंत बाद ड्यूटी अफसर ने फोन द्वारा मिली सूचना थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह राणावत को दे दी. सूचना की सच्चाई का पता करने के लिए थानाप्रभारी ने एक सबइंसपेक्टर और 4 सिपाहियों को हीरापथ पर भेज दिया. मानसरोवर जयपुर महानगर की सब से बड़ी आवासीय कालोनी है. मुख्य मार्ग को क्रौस करते हुए मुख्य सड़कों के नाम स्वर्णपथ, रजतपथ, किरणपथ, कावेरीपथ आदि हैं.

पुलिस को हीरापथ पर स्थित उस मकान को खोजने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. हीरापथ पर आईसीआईसीआई बैंक के सामने 5 मंजिला एक निर्माणाधीन होटल के पास बहुत सारे लोग खड़े बातें कर रहे थे. पुलिस समझ गई कि घटना उसी मकान में घटी है.

पुलिस ने गाड़ी वहां जा कर रोक दी. सबइंसपेक्टर ने वहां खड़े लोगों से पूछा कि क्या बात है तो भीड़ में से एक अधेड़ ने आगे आ कर कहा, ‘‘साहब, आप यह जो होटल देख रहे हैं, यह मकान नंबर 55/31 पर बना हुआ है. इसी मकान से तेज दुर्गंध आ रही है. इस मकान में रहने वाले बापबेटे का भी कुछ अतापता नहीं है.’’

‘‘इस मकान में बापबेटे ही रहते थे?’’ सबइंसपेक्टर ने पूछा.

‘‘सर, हमें ज्यादा कुछ पता नहीं है. बस इतना पता है कि यहां कोई सक्सेना साहब रहते थे, साथ में उन का बेटा रहता था. परिवार में शायद कोई महिला नहीं है.’’ अधेड़ ने कहा.

‘‘आप को इन सक्सेना साहब के बारे में ज्यादा क्यों नहीं पता?’’

‘‘साहब, वह झगड़ालू किस्म के आदमी थे, इसलिए उन की किसी से ज्यादा पटती नहीं थी.’’ अधेड़ ने कहा.

‘‘ठीक है, चलो देखते हैं.’’ सबइंसपेक्टर ने कहा.

सबइंसपेक्टर होटल की ओर बढ़े तो दुर्गंध की वजह से उन्हें नाक पर रूमाल रखनी पड़ी. मकान में बने होटल का गेट धक्का देते ही खुल गया. शायद वह खुला ही पड़ा था. पुलिस होटल के अंदर घुसी तो सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. होटल निर्माण का भी कुछ सामान पड़ा था. इधरउधर पड़े सामान से सहज ही अंदाजा लग गया कि इस घर को होटल में तब्दील किया जा रहा था और इन दिनों निर्माणकार्य चल रहा था.

पुलिस ने मकान की तलाशी ली तो ग्राउंड फ्लोर पर पीछे के कमरे में एक बुजुर्ग का शव पड़ा मिला. शव के सीने पर पानी की टंकी का ढक्कन रखा था. वहीं एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था. पत्थर पर खून के निशान थे. इस से लगा कि बुजुर्ग की हत्या सिर पर पत्थर मार कर की गई थी.

इस के बाद पुलिस पहली मंजिल पर पहुंची तो वहां एक युवक का शव पड़ा मिला. युवक के हाथ कपड़े से आगे की ओर बंधे थे. उस के कपड़े खुले थे. दोनों शवों से तेज बदबू आ रही थी. सबइंसपेक्टर ने आसपास के लोगों से शवों की शिनाख्त कराई. लोगों ने उन की शिनाख्त राजनारायण सक्सेना और उन के बेटे सौरभ सक्सेना के रूप में की.

सबइंसपेक्टर ने यह सूचना थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह राणावत को दी तो उन्होंने उच्चाधिकारियों को इस जानकारी से अवगत करा दिया. इस के बाद थानाप्रभारी सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. डौग स्क्वायड और फोरैंसिक एक्सपर्ट को भी बुला लिया गया.

फोरैंसिक एक्सपर्ट ने तो साक्ष्य जुटा लिए, पर डौग स्क्वायड से पुलिस को कोई खास मदद नहीं मिली. लाशों को देख कर ही लग रहा था कि ये हत्याएं 3-4 दिन पहले की गई थीं. स्थितियों से यही लग रहा था कि बदमाशों ने सौरभ को बंधक बना कर राजनारायण सक्सेना से कोई सौदा करने या लूटपाट की कोशिश की थी. सौरभ को चोट लगने पर राजनारायण ने भागने की कोशिश की होगी तो बदमाशों ने उन्हें मार दिया. उस के बाद सौरभ को भी मार डाला.

इस बात पर भी विचार किया गया कि पितापुत्र का अपने किसी परिचित या रिश्तेदार से प्रौपर्टी को ले कर कोई विवाद तो नहीं चल रहा था, तमाम कोणों पर विचार किए गए, लेकिन पुलिस को हत्या की वजह पता नहीं लग सकी. उसी दिन थाना मानसरोवर में इस दोहरे हत्याकांड का केस दर्ज कर लिया गया.

पुलिस आयुक्त ने अधिकारियों के साथ मीटिंग कर हत्या के इस मामले पर व्यापक विचारविमर्श किया. इस के बाद पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) मनीष अग्रवाल और अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) योगेश गोयल ने सहायक पुलिस आयुक्त देशराज यादव के निर्देशन में थानाप्रभारी सुरेंद्र सिंह राणावत के नेतृत्व में 3 टीमें गठित कर दीं, जिस में थाना शिप्रापथ और मानसरोवर के तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

पुलिस टीमों ने आसपास के लोगों से पूछताछ कर राजनारायण सक्सेना और उन के बेटे सौरभ के बारे में जानकारी जुटाई. पता चला कि करीब 73 साल के राजनारायण सक्सेना कृषि विभाग में उपनिदेशक के पद से रिटायर हुए थे. करीब 43 साल के उन के बेटे सौरभ सक्सेना ने मुंबई से इलैक्ट्रिकल में इंजीनियरिंग की थी.

करीब 6 साल पहले उस की शादी हुई थी, लेकिन उस का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा. शादी के 4-5 साल बाद ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. राजनारायण सक्सेना की पत्नी इंद्रा की डेढ़ साल पहले मौत हो गई थी. उस के बाद घर में बापबेटे ही रह गए थे.

राजनारायण सक्सेना ने 3 साल पहले अपने मकान को होटल में तब्दील करने का फैसला लिया और उसे तोड़वा कर होटल का रूप देने लगे थे. पत्नी की मौत के बाद काम रोक दिया गया था. इधर कुछ महीने पहले फिर से निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया था. अब तक निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका था. कमरों में पीओपी करवाई जा रही थी. फिनिशिंग और सजावट का पूरा काम बाकी था.

जांच में पता चला कि सौरभ सक्सेना के पास कई मोबाइल फोन थे. जो पुलिस को मिल गए थे. उन की काल डिटेल्स की जांच की गई तो पता चला उस के पास गोवा, मुंबई, असम और कोलकाता से फोन आते थे. इस से पुलिस को शक हुआ कि सौरभ कहीं किसी तरह की सट्टेबाजी का काम तो नहीं करता था?

पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि 10 मार्च की रात करीब साढ़े 10 बजे सौरभ ने अपने घर के पास ही एक मोबाइल फोन की दुकान से अपने एक मोबाइल में बैलेंस डलवाया था, उस समय उस के साथ एक आदमी और था. इस से अंदाजा लगाया गया कि सौरभ की हत्या 10 मार्च की रात साढ़े 10 बजे के बाद की गई थी. सक्सेना के घर के आंगन में 12 मार्च के अखबार पड़े थे, जिन्हें खोला नहीं गया था.

जांच में एक बात यह भी सामने आई कि 14 मार्च की रात करीब 8 बजे के बाद पितापुत्र की हत्या का पता चला था, उस से करीब 4 घंटे पहले शाम 4 बजे के करीब एक महिला सक्सेना के घर से लैपटौप वाला बैग और एकदूसरे अन्य बैग में कुछ सामान ले कर निकली थी. वह महिला साड़ी पहने थी और उस की उम्र 30-35 साल थी.

एक पड़ोसी ने जब उसे टोका तो उस ने कहा था कि सौरभ भैया ने बुलाया था. सौरभ के पास कभीकभी महिलाएं आतीजाती रहती थीं. इसलिए उस पड़ोसी ने महिला पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

 पड़ोसियों से पता चला था कि सौरभ रात को अपने घर के अंदर और बाहर की सभी लाइटें जला कर रखता था, लेकिन होली की रात को उन के घर में अंधेरा छाया था. इस से पड़ोसियों ने अनुमान लगाया था कि दोनों बापबेटे कहीं गए हैं. चूंकि वे दोनों झगड़ालू थे और पड़ोसियों से बिना बात झगड़ा कर लेते थे, इसलिए किसी ने सक्सेना के घर की ओर ज्यादा ताकझांक नहीं की. जांच में पता चला था कि सौरभ ने घटना से कुछ दिनों पहले अपने घर के ग्राउंडफ्लोर पर सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की तलाश की तो वह घर में बने पानी के टैंक में टूटे हुए मिले. इन कैमरों का रिकौर्डर भी नहीं मिला. इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे को सक्सेना के घर की पूरी जानकारी थी.

यह भी पता चला था कि निर्माणकार्य के दौरान मेहनतमजदूरी को ले कर बापबेटे का कई बार मजदूरों और मिस्त्रियों से झगड़ा हुआ था. सौरभ की मजदूरों से मारपीट भी हुई थी. इस से यह भी सोचा गया कि रुपयों के लेनदेन को ले कर किसी मजदूर या मिस्त्री ने तो इन बापबेटे की हत्या नहीं कर दी?

पुलिस को राजनारायण सक्सेना के कुछ रिश्तेदारों का पता चला तो उन से भी बात की गई. लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस की जांच ज्योंज्यों आगे बढ़ रही थी, बापबेटों के बारे में नईनई बातें सामने आ रही थीं. लेकिन हत्या के बारे में कोई सुराग नहीं मिल रहा था.

तमाम लोगों से पूछताछ और जांच के बाद पुलिस को यह अंदाजा जरूर हो गया कि हत्यारों का सुराग निर्माणकार्य में लगे मजदूरों और मिस्त्रियों से ही मिल सकता है. इस के बाद पुलिस ने मानसरोवर इलाके में वीटी रोड की चौखटी पर बैठने वाले मिस्त्रियों, मजदूरों और ठेकेदारों से पूछताछ शुरू की. कुछ महिलाओं से भी पूछताछ की गई.

इस काररवाई के बाद पुलिस ने 19 मार्च को 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इन में टोंक जिले के उनियारा के लतीफगंज पायगा गांव का रहने वाला राकेश मीणा, उस के साथ 5 साल से लिवइनरिलेशन में रह रही करौली निवासी गीता उर्फ पूजा मीणा तथा करौली के गुणेसरा का रहने वाला रमेश सैनी था.

पुलिस ने तीनों से पूछताछ की तो इस दोहरे हत्याकांड का खुलासा हो गया. पता चला कि सौरभ सक्सेना के शराब और शबाब के शौक ने ही उस की और उस के पिता की जान ली थी. पुलिस द्वारा तीनों से की गई पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

राजनारायण सक्सेना और उन के बेटे सौरभ 3 साल से अपने मकान को होटल बनवा रहे थे. इस के लिए वे मानसरोवर के वीटी रोड की चौखटी से खुद ही मिस्त्री और मजदूर लाते थे. इसलिए उस इलाके के ज्यादातर मजदूरों और मिस्त्रियों को इस बात का पता था कि सौरभ की मां की मौत के बाद से घर में बापबेटे ही रहते हैं.

राकेश मीणा मकानों में मार्बल और टाइल्स लगाने का काम करता था. रमेश सैनी मार्बल घिसाई का काम करता था. मकान का काम करने के दौरान ही राजनारायण और सौरभ से इन की जानपहचान हुई थी. तभी उन्हें बापबेटों की कमजोरियों का पता चल गया था.

सौरभ के कहने पर ही कुछ दिनों पहले राकेश और रमेश ने उसे एक महिला उपलब्ध कराने की बात कही. उस के हां करने पर राकेश ने अपने साथ लिवइन रिलेशन में रह रही गीता उर्फ पूजा को इस के लिए तैयार कर लिया.

करीब 2 महीने पहले राकेश ने रमेश और गीता के साथ मिल कर योजना बनाई कि सक्सेना के घर शराब की पार्टी की जाए. जब दोनों नशे में हो जाएं तो एकएक कर उन्हें मार कर उन के घर रखी नकदी और ज्वैलरी लूट ली जाए.

इस के बाद राकेश अपने साथियों के साथ अकसर सौरभ के यहां आने लगा और रात में शराब की पार्टी करने लगा. उसी बीच उस ने सौरभ की तमाम व्यक्तिगत जानकारियां जुटाने के साथ यह भी जान लिया कि घर में नकदी व गहने कहां रखे हैं. सारी जानकारी जुटा कर राकेश रमेश और गीता उर्फ पूजा के अलावा 6 साल की बेटी को ले कर 10 मार्च की रात सौरभ के घर पहुंचा.

उस ने कहा कि एक दिन बाद होली है, इसलिए होली से पहले वे शराब की पार्टी करना चाहते हैं. इसी के साथ राकेश ने गीता की ओर आंख मार कर सौरभ से कहा कि अगर वह चाहे तो इस के साथ मौजमस्ती भी कर सकता है. गीता की गदराई जवानी को देख कर सौरभ का मन मचल उठा और वह शराब की पार्टी करने को तैयार हो गया.

इस के बाद राकेश और रमेश ने सौरभ के साथ शराब पी. इस बीच गीता और राकेश की बेटी उसी कमरे में एक कोने में बैठ कर नमकीन और स्नैक्स खाती रहीं. सौरभ को जब नशा चढ़ा तो वह गीता को ले कर मकान की पहली मंजिल पर चला गया. कुछ देर बाद गीता और सौरभ नीचे आ गए.

सौरभ ने एक पैग शराब और पी और नशे में झूमने लगा. वह एक ओर चला गया तो कुछ देर बाद राकेश ने उधर देखा, जहां उस की बेटी बैठी थी. वहां उसे बेटी दिखाई नहीं दी तो वह बेटी को ढूंढता हुआ पहली मंजिल पर पहुंचा.

वहां उस ने देखा कि सौरभ उस मासूम बच्ची के साथ गलत हरकतें कर रहा था. यह देख कर उस का सारा नशा उतर गया. उस की आंखों से अंगारे बरसने लगे. उस ने सौरभ को पकड़ कर उस का गला दबा दिया. सौरभ बेहोश हो गया. शोरशराबा सुन कर नीचे से रमेश और गीता भी पहली मंजिल पर आ गए. तीनों ने उस के हाथपैर बांध दिए और उस का गला दबा कर मार डाला.

सौरभ की हत्या कर सभी नीचे उतर रहे थे, तभी शोरशराबा सुन कर ग्राउंड फ्लोर से राजनारायण सक्सेना चिल्लाने लगे. राकेश ने पानी के टैंक का ढक्कन उठा कर उन के सिर पर दे मारा. बुजुर्ग राजनारायण गिर पड़े तो सभी ने उन का भी गला दबा दिया. उन की भी सांसें थम गईं.

बापबेटे को मौत की नींद सुला कर रमेश सक्सेना के घर से करीब 2 लाख रुपए के गहने और नकदी के अलावा मोबाइल फोन आदि ले कर साथियों के साथ चला गया. ये सभी पुलिस की गतिविधियों पर पूरी तरह नजर रखे हुए थे, साथ ही दिन में 1-2 चक्कर सक्सेना के घर के लगा लेते थे, ताकि पता चलता रहे कि पुलिस क्या कर रही है?

3-4 दिनों तक कोई हलचल नहीं हुई तो ये लोग निश्ंिचत हो गए कि बापबेटे अकेले ही रहते थे, इसलिए उन के मरने का किसी को पता नहीं चलेगा. इस के बाद 14 मार्च की दोपहर को राकेश और गीता सक्सेना के घर गए और वहां से एलईडी टीवी, सीपीयू, कंप्यूटर मौनिटर, प्रोजेक्टर और वीडियो कैमरा उठा लाए.

उसी दिन शाम को राकेश गीता के साथ उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा चला गया, जहां उन्होंने गोवर्धन परिक्रमा की. 16 मार्च को वह वहां से रमेश सैनी के घर करौली चला गया. एक दिन बाद गीता के साथ मेंहदीपुर बालाजी के दर्शन कर के जयपुर लौट आया. पुलिस ने 19 मार्च को उसे और गीता को जयपुर से और रमेश सैनी को करौली रामपुर गांव से गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में राकेश ने अपने गांव का पता गलत बताने के साथ कहा कि उस के मातापिता भी नहीं हैं. लेकिन जांच में उस का गांव टोंक जिले का लतीफगंज पाया गया. उस के मातापिता भी जीवित मिले.

10 साल से वह मोहिनी देवी उर्फ गीता के साथ लिवइन रिलेशन में रहता था, जिस के तथा मिल कर उस ने दोनों बापबेटों की हत्या की थी. गीता को पूर्व पति धनराज मीणा से एक बेटा और एक बेटी है. राकेश ने सौरभ की हत्या की वजह बेटी से गलत हरकत करना बताया है, लेकिन पुलिस का मानना है कि राकेश ने अपने बचाव के लिए यह बयान दिया है. पुलिस ने बच्ची का मैडिकल करवाया है, जिस से ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

राकेश और उस के साथियों ने अगर अपराध किया है तो कानून उन्हें सजा देगा, लेकिन सौरभ के शराब और शबाब के शौक ने उस की तो जान ले ही ली, बूढे़ पिता को भी जान से हाथ धोना पड़ा.

जयपुर महानगर की सब से बड़ी और व्यस्त कालोनी में शिक्षित लोगों के साथ ऐसी वारदात होगी, किसी ने सोचा भी नहीं था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तुरंत तलाक क्यों नहीं

दिल्ली के विशाल ने 1995 में आशा के साथ लव मैरिज की. शुरूशुरू में सब अच्छा रहा. उन की एक बेटी भी हुई, मगर बाद में समस्याएं सामने आने लगीं.

एक दुर्घटना में आशा के भाई की मृत्यु हो गई. उस के मातापिता अकेले रह गए. बेटे के गम में आशा के पिता की तबीयत खराब रहने लगी. इस वजह से वह अकसर मायके जाने लगी ताकि पिता की देखभाल कर सके. विशाल ने आशा से कहा कि वह अपने मातापिता को यहीं बुला ले पर आशा की मां ने यह स्वीकार नहीं किया. आशा मायके आतीजाती रही. इसी बात को ले कर दंपती के बीच तनाव बढ़ा और 2010 में दोनों अलग हो गए.

वूमंस सैल की तरफ से आशा ने अपने पति को नोटिस भिजवाया. घरेलू हिंसा का केस किया और मुआवजे की मांग भी की. 2011 में विशाल ने दिल्ली के साकेत कोर्ट में तलाक के लिए याचिका दायर की. तब से आज 2017 तक अदालत में मामला चल रहा है पर कोई फैसला नहीं आया. इस दौरान भरणपोषण का मामला भी साथसाथ चलता रहा.

2013 में अदालत ने विशाल को आदेश दिया कि वह आशा को हर महीने क्व25 हजार भरणपोषण के लिए दे. यह आदेश डेट औफ ऐप्लिकेशन के समय से लागू होना था.

विशाल ने इस के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की मगर हाई कोर्ट ने भी इसी आदेश को माना और 3 महीने के अंदर सारा मुआवजा चुकाने का फैसला सुनाया. इस फैसले को चुनौती देने के लिए विशाल ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई. मगर वहां भी निराशा ही हाथ लगी. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया. अंत में विशाल को पूरे रुपए देने पड़े.

पिछले 7 सालों में विशाल के 16-17 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर चुके हैं. रोजरोज की दौड़भाग और मानसिक तनाव अलग झेलना पड़ रहा है. वे 45 साल के हो चुके हैं. यदि कुछ साल और मामला लंबित रहा तो दूसरी शादी भी मुमकिन नहीं हो पाएगी.

विशाल का कहना है, ‘‘1 साल में बमुश्किल 2 डेट मिलती हैं. उस में भी कभी जज मौजूद नहीं होते तो कभी वकील छुट्टी पर होते हैं. कभी दोनों में से कोई पार्टी नहीं आ पाती. कई दफा वकील जानबूझ कर मामले को आगे बढ़ाता जाता है ताकि उसे फीस मिलती रहे. मैं अब तक 4 वकील बदल चुका हूं मगर कोई परिणाम नहीं निकला.’’

तलाक में देरी से पस्त होते लोग

भारत में कईकई सालों तक चलने वाले इस तरह के मामलों की संख्या हजारों में नहीं, बल्कि करोड़ों में है. 1 जुलाई, 2015 से 30 जून, 2016 के बीच कुल 2,81,25,066 सिविल और क्रिमिनल मामले लंबित थे.

तलाक के हर मामले में मुख्य रूप से 2 जिंदगियां और कई परिवार जुड़े होते हैं और उन 2 जिंदगियों के साथ बहुत सी दूसरी जिंदगियों का भविष्य भी जुड़ा होता है. भारत में दूसरे मामलों के साथ तलाक और बच्चों की कस्टडी के मामले भी सालों चलते रहते हैं. इस से लोग कई तरह से प्रभावित होते हैं.

दिल्ली के रहने वाले रवि के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. उन की शादी श्रुति के साथ 2001 में हुई. रवि की मां सरकारी टीचर और पिता एमसीडी में विजिलैंस औफिसर थे.

रवि बताते हैं, ‘‘शादी के 3 माह बाद से ही हमारे बीच तनाव शुरू हो गया. श्रुति मेरे मातापिता के साथ रहना नहीं चाहती थी और बारबार मायके चली जाती. उस के कहने पर मैं ने घर का पार्टीशन भी किया पर अपने भाई की सगाई के समय वह गई तो लौट कर नहीं आई.

‘‘वूमंस सैल की तरफ से श्रुति ने हमारे पास नोटिस भेजा. हम पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 406 और 34 के तहत आरोप लगाए गए.

‘‘30 मई, 2002 को मैं ने पटियाला हाउस कोर्ट में बेल मैटर लगाया. कुछ समय बाद हमें जमानत मिल गई. मगर इस बीच श्रुति ने तीसहजारी कोर्ट में तलाक की अर्जी दे दी. तलाक और मुआवजे का मामला साथ में चलता रहा. कई सालों तक मामला चलने के बावजूद कोई परिणाम निकलता न देख हम ने समझौते का मन बनाया. 2009 में क्व2 लाख नकद दे कर मैं ने पत्नी के साथ फुल और फाइनल सैटलमैंट कर लिया.

‘‘इतनी लंबी अवधि तक चलने वाले इस केस की दौड़भाग में मेरे 15-16 लाख रुपए खर्च हो गए. मानसिक रूप से भी मैं पूरी तरह पस्त हो गया हूं. तलाक लिए हुए 8 साल बीत चुके हैं पर अब तक मेरी दोबारा शादी नहीं हो सकी. मेरे मातापिता भी इस गम में चल बसे.’’

कई दफा अदालतों के मामले इतने लंबे खिंच जाते हैं कि व्यक्ति का सब्र टूटने लगता है और ऊपर से जब सालों केस लड़ने के बाद फैसला भी अपने हक में न आए तो व्यक्ति की मनोदशा का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है.

26 फरवरी, 1999 को संजय की शादी सुमन के साथ दिल्ली में हुई. संजय दिल्ली प्रशासन में केयर टेकर के पद पर हैं और सुमन हाउसवाइफ. 2002 में इन की पहली बेटी और 2006 में दूसरी बेटी का जन्म हुआ. शादी के बाद से ही उन के बीच तनाव रहने लगा. 11 जुलाई, 2010 को संजय ने रोहिणी के फैमिली कोर्ट में हिंदू मैरिज ऐक्ट, 1955 के सैक्शन 13 के तहत क्रूरता के आधार पर विवाह खत्म करने की याचिका दायर की. संजय ने सुमन के द्वारा किए गए ऐसे 9 व्यवहारों का जिक्र किया, जो क्रूरता के तहत आते हैं.

सुमन ने लिखित बयान दे कर इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 9 के तहत अपनी शादी बचाने और वैवाहिक हक कायम रखने की याचिका डाली.

14 फरवरी, 2012 को फैमिली कोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आधार पर इस तलाक को मंजूरी दे दी.

सुमन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील की, मगर हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए सुमन की अपील खारिज कर दी. इस के बाद सुमन सुप्रीम कोर्ट गई.

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2017 को अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा कि डिवोर्स पेटिशन दायर करने से 8-10 साल पहले हुई कुछ घटनाएं, जो दोबारा नहीं घटीं, के आधार पर मानसिक क्रूरता का केस नहीं बनता. सुमन के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाह और पत्नी के रूप में सुमन के वैवाहिक अधिकारों को बरकरार रखा.

इस मामले में भी फौरी तौर पर भले ही सुमन को न्याय मिल गया, मगर क्या अदालत उस के 7 साल वापस लौटा सकती है, जो उस ने गहरी मानसिक वेदना और तनाव में गुजारे? तलाक चाहने वाले संजय को भी 7 सालों तक फैसले का इंतजार करना पड़ा, जो उन के हक में नहीं रहा.

कस्टडी वार में पिसता बचपन

वैशाली एक 15 साल की लड़की है. फिलहाल वह पिता के साथ रह रही है. उस की मां, जो पिता से अलग हो चुकी हैं, इंगलैंड में रहती हैं. वे बेटी को अपने साथ इंगलैंड ले जाना चाहती हैं पर वैशाली भारत में पिता के साथ रहना चाहती है. करीब 8 सालों तक मामला चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2017 को अंतिम फैसला सुनाते हुए वैशाली की कस्टडी पिता को सौंप दी.

तलाक के बाद अकसर चाइल्ड कस्टडी से जुड़े इस तरह के मामले देखने में आते हैं. भारत में 5 साल से छोटे बच्चों की कस्टडी मां को सौंपी जाती है, जबकि बड़े बच्चों की कस्टडी देते समय उन की बेहतर जिंदगी और इच्छा पर भी विचार किया जाता है.

सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों की कस्टडी के मामलों में उन की सुरक्षा और इच्छा के साथसाथ उन की मानसिक शांति और बेहतर जिंदगी को ध्यान में रखते हुए फैसले नहीं लिए जाने चाहिए? क्या बच्चों की कस्टडी से जुड़े कानूनी फैसले एक नियमित समय के अंदर किए जाने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए?

उदाहरण के लिए वैशाली का ही मामला लें. 1999 में वैशाली के मांबाप की शादी फरीदाबाद में हुई. 2000 तक दोनों वहीं रहे. फिर मार्च, 2000 में वे यूके शिफ्ट हो गए. जनवरी, 2002 में वैशाली का जन्म दिल्ली में हुआ. जन्म के कुछ माह बाद दंपती फिर यूके लौट गया. 2007 में वैशाली की छोटी बहन पैदा हुई. इस दौरान वैशाली के मातापिता के रिश्ते में कड़वाहट आने लगी. दोनों के बीच आई दरार इतनी गहरी हो गई कि नवंबर, 2009 में उस की मां ने यूके की एक कोर्ट में तलाक की अर्जी दे दी.

तब उस के पिता उसे ले कर भारत आ गए. 2010 में वैशाली की मां ने पंजाब की एक कोर्ट में बेटी की कस्टडी के लिए याचिका दायर की, जिस के आधार पर हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि वैशाली मां को सौंप दी जाए. इस आदेश के विरुद्ध वैशाली के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर स्टे और्डर लगा दिया और वैशाली को पिता के साथ ही रहने की मंजूरी दी, जबकि उस की मां को समयसमय पर बेटी से मिलने आने का हक दिया. मां के लाख समझाने के बावजूद वैशाली यूके जाने को तैयार नहीं हुई.

8 साल की बेटी के 7 साल मांपिता के बीच पिस गए. मां बीचबीच में बेटी से मिलने आती रही और उस का विश्वास जीतने का प्रयास करती रही पर यह संभव नहीं हो सका.

उधर कोर्ट वैशाली की इच्छा के विरुद्ध उसे विदेश भेजने का रिस्क उठाना नहीं चाहती थी. इस पूरे घटनाक्रम में एक लंबे वक्त तक असमंजस बना रहा. 7 साल की बच्ची वैशाली आज 15 साल की हो चुकी है. अब वह मानसिक रूप से इतनी परिपक्व है कि अपना भलाबुरा समझ सके. 3 साल बाद वह वयस्क हो जाएगी और कस्टडी का मामला वैसे भी खारिज हो जाएगा.

सवाल यह है कि अंतिम फैसला आने में इतना वक्त क्यों लगता है?

असर बच्चों के मन पर

वैसे तो चाइल्ड कस्टडी और तलाक से जुड़े मामले अकसर कड़वे अनुभवों से भरे होते हैं. मगर जब मामला लंबा खिंचता है, तो बच्चों पर असर और भी गहरा होता है.

करीब 10% मामलों में तलाक ले रहे दंपती आपस में इतनी बुरी लड़ाई लड़ते हैं और एकदूसरे के खिलाफ जहर उगलते हैं कि इस का खराब असर लंबे समय तक बच्चे पर रहता है. मैसाचुसेट्स जनरल हौस्पिटल में की गई एक रिसर्च के अनुसार, गंभीर विवाद वाले कस्टडी के मामलों में शामिल करीब 65% बच्चों में चिंता, गुस्सा, अनिद्रा, अवसाद, बिस्तर पर पेशाब करना, समय से पहले सैक्सुअली ऐक्टिव होना जैसी समस्याएं नजर आने लगती हैं.

यही नहीं, 56% गंभीर विवाद वाले कस्टडी केसेज से जुड़े बच्चों में अटैचमैंट डिसऔर्डर देखा जाता है. इस की वजह से उन के मन में अपने प्रिय का साथ छूट जाने का डर इतना ज्यादा होता है कि वे किसी से दोस्ती करने से भी घबराते हैं.

तलाक और कस्टडी वार का असर सभी बच्चों पर एक सा नहीं होता. ज्यादा संवेदनशील बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं. स्कूल में उन की परफौर्मैंस खराब होने लगती है. वे किसी भी काम में रुचि नहीं लेते, अपने दोस्तों से भी कटने लगते हैं.

इस दौरान दोनों ही अभिभावक बच्चे से जी भर कर एकदूसरे की बुराई करते हैं. एकदूसरे की बुरी तसवीर बच्चे के आगे रखते हैं.

तलाक के मामले ज्यादा समय तक लंबित रहने के संदर्भ में दिल्ली के सीनियर ऐडवोकेट ऋषि अवस्थी कहते हैं, ‘‘अदालत की इच्छा यही रहती है कि तलाक का केस खारिज हो जाए, क्योंकि अदालत शादी को एक संस्था मानती है और नहीं चाहती कि रिश्ता टूटे. यही नहीं, तलाक के साथसाथ भरणपोषण, दहेज, घरेलू हिंसा, 498ए जैसे कई मामले एकसाथ चलते हैं. इस वजह से भी अंतिम फैसला आने में वक्त लगता है.’’

वजहें चाहे जो भी हों, आम जनता की तकलीफें समझते हुए जल्द से जल्द मामले निबटाने का प्रयास जरूरी है. ज्यादा संख्या में जजों की नियुक्ति के साथसाथ कार्यव्यवस्था में सुधार और लोगों की मानसिकता में बदलाव भी आवश्यक है. आपसी रजामंदी से तलाक भी एक विकल्प हो सकता है.         

क्यों होती है देरी

भारत में तलाक और चाइल्ड कस्टडी के मामले लंबे समय तक खिंचने और फैसलों में देरी होने की एक वजह भारतीय न्याय व्यवस्था की कुछ आधारभूत कमियां और देश में जजों की पर्याप्त संख्या का न होना भी है.

नैशनल ज्यूडिशल डाटा ग्रिड और डिपार्टमैंट औफ जस्टिस डाटा के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई, 2016 तक भारत के अधीनस्थ न्यायालयों में 16,438 जज, उच्च न्यायालयों में 621 जज और उच्चतम न्यायालय में 29 जज ही थे, जबकि देश में बकाया केसों की संख्या बहुत ज्यादा है. जनवरी, 2017 में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स में करीब 2.81 करोड़ से ज्यादा मामले बकाया थे.

जुलाई, 2014 से जुलाई, 2015 के बीच अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 15,500 से 15,600 तक जज थे जिन्होंने 1,87,30,046 मामले निबटाए. जबकि इसी अवधि में दर्ज किए गए नए मामलों की संख्या करीब 1,86,25,038 थी.

जाहिर है कि लंबित मामलों की तुलना में जज पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. इस विषय पर जुलाई, 2016 में चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने न्यायिक फैसलों में देरी की समस्या सुलझाने के लिए देश में करीब 70 हजार जजों की आवश्यकता पर बल दिया.

मई, 2016 तक हमारे देश की जनसंख्या करीब 120 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है. इस तुलना में जजों की संख्या बहुत कम है. कम से कम 5 करोड़ की आबादी पर 1 जज की आवश्यकता पर बल दिया जाता है. ऐसे में इंडियन ज्यूडिशल स्ट्रैंथ बढ़ाना बहुत जरूरी हो गया है.

भारतीय न्यायिक वार्षिक रिपोर्ट 2015-16 के मुताबिक जुडिशल मैनपावर कम से कम 7 गुना ज्यादा बढ़ायी जाए, तभी इस समस्या पर काबू पाया जा सकेगा.      

नीतीश का दांव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आया राम गया राम साबित हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की घोषणा के बाद उन को समर्थन दे कर उन्होंने पाला बदल लिया है और एक बार फिर भाजपा की गोद में बैठने की तैयारी शुरू कर दी है.

नीतीश कुमार की छवि सभ्य, सौम्य नेता की है पर मुख्यमंत्री पद पर रह कर उन्होंने बिहार का लंबाचौड़ा उद्धार किया हो, ऐसा लगता नहीं. वे पहले से भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं और मूलतया समाजवादी विचारधारा के हैं. 1996 में उन्होंने जब देखा कि लालू यादव के सामने उन की दाल न गलेगी तो वे अटल बिहारी वाजपेयी की गोद में जा बैठे और जोड़तोड़ कर मुख्यमंत्री पद पा लिया.

जब नरेंद्र मोदी का उदय हुआ तो उन्हें लगा कि बिहार के मुसलिम वोट तो भारतीय जनता पार्टी समर्थक को नहीं मिलेंगे तो वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े हो गए. इस तरह जोड़तोड़ से वे लगातार मुख्यमंत्री बने हुए हैं. अब जब भाजपा की धौंस कुछ ज्यादा ही चल रही है तो वे उस की ओर खिसकने लगे हैं और उन्होंने बिहार के गवर्नर रहे रामनाथ कोविंद के सहारे अपनी निष्ठा स्पष्ट कर दी है.

नीतीश कुमार भी पिछड़ों के वैसे ही नेता साबित हुए हैं जैसे देश के दलितों व पिछड़ों के आम नेता रहे हैं. शूद्रों और दलितों का सदियों से जो दमन होता रहा है उस का कारण यह रहा है कि यहां के चतुर सवर्ण इन सताएदबाए वर्णों के नेताओं को खरीद लेते हैं. फटेहाल अपने समाज के लिए कुछ करने में असमर्थ ये नेता ऊंची जमातों में बैठने का अवसर खोना नहीं चाहते. आज कितने ही दलित व पिछड़े नेता भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी आदि में दूसरे दरजे की घुटनभरी बस में सवारी करते हुए दूसरे नंगे पैर चल रहे अपने वर्ग के दूसरी पार्टियों के नेताओं से अपने को श्रेष्ठ मान कर खुश हो रहे हैं.

नीतीश कुमार ऐसे पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों और अछूतों के हितों को बेचा है, भारतीय समाज तो हिंदू पौराणिक काल से ही ऐसा चलता आ रहा है.

 

मैंने पहले अपने प्रेमी के साथ और फिर अपने होने वाले पति के साथ शादी से पहले हमबिस्तरी की. क्या मैंने कुछ गलत किया.

सवाल

मेरी सगाई हो चुकी है. पहले मेरा एक प्रेमी था, जिस ने मेरे साथ हमबिस्तरी की थी, पर बाद में उस ने मुझे धोखा दे दिया. जिस से मेरी सगाई हुई, उस के साथ भी शादी से पहले मेरा जिस्मानी संबंध हुआ, पर जब खून नहीं आया तो उसे शक हुआ.

पूछने पर मैं ने मना कर दिया कि मैं ने पहले ऐसा नहीं किया था, मगर ज्यादा जोर देने पर मैं ने कह दिया कि मेरे साथ रेप हुआ था और वह लड़का कई साल तक मुझ से जबरदस्ती करता रहा, अब नहीं करता. बाद में मैं ने कहा कि मैं तो मजाक कर रही थी.

अब मंगेतर मेरा यकीन नहीं करता और पूछता है कि उस का नाम तो बता दो और यह भी कि कितने सालों तक किया. मैं अपने मंगेतर से बहुत प्यार करती हूं, पर समझ नहीं पा रही हूं कि उसे कैसे समझाऊं?

जवाब

आप ने गलत काम भी किया और खुद अपनी इमेज बिगाड़ ली. बारबार झूठ बोल कर आप ने अपने मंगेतर का भरोसा भी खो दिया. न तो आप को उस धोखेबाज प्रेमी से संबंध बनाना चाहिए था, न ही मंगेतर से.

शायद आप की जिस्मानी भूख ही ज्यादा थी, फिर भी मंगेतर से रेप की बात कर के आप ने खुद ही बात बिगाड़ ली. अगर मंगेतर शक्की है, तो अपनी मंगनी तोड़ दें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

अपना आखिरी वर्ल्ड कप खेल रही हैं मिताली राज!

महिला विश्व कप-2017 में न्यूजीलैंड के खिलाफ शतक जड़कर टीम इंडिया को सेमीफाइनल में पहुंचाने वाली कप्तान मिताली राज अपना आखिरी वर्ल्ड कप खेल रही हैं. इस बात पर खुद मिताली ने मुहर लगा दी है.

न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार शतक जमाने वाली मिताली राज ने एक प्रेसवार्ता में कहा, "मैं इस जीत से बहुत खुश हूं. शायद यह मेरे लिए आखिरी विश्व कप हो सकता है. इसलिए हमारा सबसे पहला लक्ष्य सेमी फाइनल में प्रवेश करना था. महिला साथी खिलाड़ियों ने शानदार खेल की मिसाल पेश की, जिसकी बदौलत हम मुकाबले को जीतने में कामयाब हो सके."

मिताली राज ने 184 वनडे मैचों की 165 पारियों में 47 बार नाबाद रहते हुए 6137 रन बनाए हैं. इस दौरान उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 114 (नाबाद) रहा. मिताली ने 52.00 की औसत से 49 अर्धशतक और 6 शतक जड़े हैं. भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज ने लगातार 7 अर्धशतक जड़कर रिकॉर्ड कायम किया है. सबसे अधिक रन बनाने के मामले में मिताली पहले स्थान पर हैं.

आईसीसी महिला विश्व कप में 1000 रन पूरा करने वाली पांचवीं बल्लेबाज बन गई हैं. अब तक केवल पांच बल्लेबाज ही महिला विश्व कप में 1000 रन का आंकड़ा छू पाई हैं, जिसमें न्यूजीलैंड की डेबी हेकले (1501), इंग्लैंड की जेनेट ब्रिटिन (1299), चार्लोट एडवर्ड्स (1231) और ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क (1151) शामिल हैं.

बता दें कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपने हरफनमौला प्रदर्शन के दम पर न्यूजीलैंड को 186 रनों से हराकर विश्व कप के सेमीफाइनल में जगह बना ली है, जहां उसका सामना आस्ट्रेलिया से होगा. भारत ने पहले शानदार फॉर्म में चल रही कप्तान मिताली राज (109) के बेहतरीन शतक की मदद से न्यूजीलैंड के सामने 266 रनों की चुनौती रखी और फिर अपने गेंदबाजों के उम्दा खेल की बदौलत कीवी महिलाओं को 25.3 ओवरों में 79 रनों पर ढेर कर दिया. अब टीम इंडिया का 20 जुलाई को सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया से सामना होगा.

आयकर रिटर्न फॉर्म भरने जा रहे हैं तो ध्यान दें

आयकर जमा करने का समय शुरू हो चुका है और आयकर के दायरे में आने वाले सभी लोगों ने इसे भरने की शुरूआत कर भी दी है. हालांकि, इसके लिए 31 जुलाई तक का समय दिया गया है, तब तक आप अपना रिटर्न दाखिल कर सकते हैं. अगर आपका आधार कार्ड लिंक्‍ड नहीं है और आपको अपना आईटीआर वी फॉर्म भेजने की आवश्‍यकता है तो आपके यह खबर आपके लिए उपयोगी साबित हो सकती है.

हमारे साथ जानिए आयकर रिटर्न फॅार्म भेजने से पहले से कुछ जरूरी बातें…

डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर का उपयोग न करें

फॉर्म के लिए कभी भी डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर का उपयोग न करें. आपको इंक जेट/लेज़र प्रिंटर से ही प्रिंट करना चाहिए. साथ ही इसे प्रिंट करने के लिए ब्‍लैक इंक का इस्‍तेमाल करें. प्रिंटआउट पढ़ने योग्‍य होना चाहिए आप जो भी प्रिंटआउट लें, वह पढ़ने योग्‍य होना चाहिए अन्‍यथा उस फॉर्म को भेजने का मतलब ही नहीं रह जाएगा क्‍योंकि वो पठनीय ही नहीं होगा.

वॉटरमार्क्‍स पर प्रिंट न करें

आयकर विभाग, प्रत्‍येक आईटीआर-वी को स्‍वचालित रूप से मुद्रित करता है जिस पर अनुमत वॉटरमार्क होता है. उस पर ही प्रिंट न करें.

नीली इंक से हस्‍ताक्षर करें

सीपीसी को मेल किया जाने वाला दस्‍जावेज, नीली इंक वाले पेन से साइन किया हुआ होना चाहिए. हस्‍ताक्षर की फोटोकॉपी, स्‍वीकृत नहीं की जाएगी. हस्‍ताक्षर को बारकोड के ऊपर नहीं किया जाना चाहिए. बार कोड और नम्‍बर, स्‍पष्‍ट प्रदर्शित होने चाहिए.

A4 साइज पेपर का इस्‍तेमाल करें

प्रिंट आउट लेने के लिए ए4 साइज पेपर का ही इस्‍तेमाल करें. पेज के पीछे कुछ लिखने से बचें. आईवीआर पावना पर स्‍टेपलर भी न करें.

बैक-टू-बैक प्रिंट न करें

यह महत्‍वपूर्ण है कि आपको प्रिंट आउट बैक-टू-बैक नहीं लेना चाहिए और न ही ऐसे सबमिट करना चाहिए. यह मायने नहीं रखता है कि यह ओरिजनल है या रिवाइज रिटर्न है.

क्या एक से अधिक व्यक्ति के लिए ITR-V भेज सकते हैं?

अगर आप एक से अधिक व्‍यक्ति के लिए आईटीआर रिटर्न दाखिल करते हैं तो क्‍या करें, आप उसी लिफाफे में एक से अधिक आईटीआर-वी भेज सकते हैं. यानि आपको इसे अलग-अलग भेजने की आवश्‍यकता नहीं है. आयकर जमा करने की अंतिम तिथि अंतिम तिथि: 2017 में अंतिम तिथि, 31 जुलाई है. समय रहते रिटर्न दाखिल कर दें अन्‍यथा अंतिम क्षणों में हड़बड़ी हो सकती है.

ये फंक्शन जोड़कर गैजट्स को बनाइए बेहतर

आप अपने पास मौजूद कई गैजट्स जैसे कि स्मार्टफोन, टैबलट, वाई-फाई राउटर, कैमरे आदि में ऐसे फीचर्स जोड़ सकते हैं, जिनकी सुविधा कंपनी ने नहीं दी है. इसके लिए बस आपको थोड़ा सा दिमाग लगाने की जरूरत होती है. बाकि हम आपको बताएंगे कि ऐसा आप कैसे कर सकते हैं.

मल्टिफंक्शनल स्मार्टफोन

क्या आपके लैपटॉप में वेबकैम नहीं है? तो आपको फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है. फ्री ऐंड्रॉयड ऐप ड्रॉइडकैम के जरिए आप फोन के कैमरे और माइक्रोफोन का इस्तेमाल कर स्काइप, गूगल हैंगआउट और बाकी प्लैटफॉर्म पर दोस्तों से बात कर सकते हैं. इसके लिए फ्री ऐप और फ्री विंडोज़, लाइनक्स सर्वर सॉफ्टवेयर चाहिए. इसके बारे में आपको विस्तार से जानकारी http:www.dev47apps.com पर मिल सकती है.

दुगनी-तिगुनी करिए वाई-फाई रेंज

वाई-फाई एक अजीब साइंस है. आप ठीक-ठीक नहीं पता लगा सकते कि आपका वाई-फाई कहीं पर क्यों कमजोर होता है, लेकिन आप कुछ गाइडलाइंस के मुताबिक काम करके वाई-फाई की रेंज बढ़ा सकते हैं. बेहतर कवरेज के लिए राउटर को घर के बीचो-बीच रखिए और इसे 6 फीट या इससे ज्यादा की ऊंचाई पर रखिए. ऐसा इस वजह से क्योंकि वाई-फाई सिग्नल ओमनी-डायरेक्शनल होते हैं और वे ऊपर जाने की जगह नीचे की तरफ आते हैं. अगर आपके पास दो ऐंटेना वाला राउटर है, तो एक को वर्टिकल रखिए, दूसरे को हॉरिजनटल.

अगर आप ये न कर सकें या इन तरीकों से फायदा न हो, तो रेंज बढ़ाने के लिए पुराने राउटर्स को वाई-फाई सिग्नल रिपीटर्स के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं या आप किसी इलेक्ट्रिकल आउटलेट में सीधे लगाने के लिए डीलिंक और नेटगियर जैसे ब्रैंड्स के छोटे रिपीटर्स (कीमत करीब 1500 रुपए) खरीद सकते हैं. रिपीटर अपने नेटवर्क की सीमा पर लगाएं, जिससे वह वहां से सिग्नल को आगे भेज सके. इसे लगाना बहुत आसान होता है. इसमें रिपीटर मोड चुनिए, अपने वाई-फाई नाम और पासवर्ड को डालिए, बस हो गया. आप दुगना या तिगुना या आउटडोर तक सिग्नल पहुंचाने के लिए और रिपीटर्स का इस्तेमाल कर सकते हैं.

अपने कैमरे की क्षमता बढ़ाएं

किसी कैमरे से RAW फॉर्मैट की इमेज उस तस्वीर का डिजिटल नेगेटिव होता है. सही सॉफ्टवेयर की मदद से आप RAW इमेज को बेहतर प्रोसेस कर सकते हैं, ताकि आपको अच्छी तस्वीर मिल सके. आम तौर पर डीएसएलआर कैमरों में RAW का ऑप्शन होता है. कई मिड-रेंज और एंट्री लेवल कैमरों में यह नहीं होता, जबकि कई बार उनका हार्डवेयर इसे सपॉर्ट करता है. आप एक टेंपररी फर्मवेयर (एक तरह का सॉफ्टवेयर) की मदद से आप अपने कैमरे को ऐसा ऐसा बना सकते हैं कि वह RAW इमेज ले सके और आपको कुछ अतिरिक्त सेटिंग्स दे सके. कैनन के कैमरे रखने वाले लोग http://chdk.wikia.com/wiki/CHDK से फ्री CHDK (Canon Hack Development Kit) ले सकते हैं. आप अपने कैमरा मॉडल को सर्च करिए और सही फर्मवेयर डाउनलोड कर लीजिए. इसमें स्टेप-बाई-स्टेप बताया गया है कि कैमरे में फर्मवेयर कैसे लोड करें. एक बार फर्मवेयर अपडेट होने के बाद आप RAW ऑप्शन के अलावा कई और सेटिंग्स देख सकेंगे. यह ध्यान रखिएगा कि RAW इमेज सेव करने में ज्यादा वक्त और ज्यादा जगह लगती है. कैनन डीएसएलआर यूज़र मैजिक लैंटर्न नाम का फर्मवेयर ले सकते हैं. इससे वे अपने EOS कैमरे में और फंक्शनैलिटी डाल सकते हैं. इससे लाइव हिस्टोग्राम, फोकस पीकिंग, स्पॉटमीटर, एचडीआर विडियो, अनकम्प्रेस्ड रॉ विडियो सपॉर्ट, मोशन डिटेक्शन जैसे कई फीचर मिलेंगे. सपोर्टेड डीएसएलआर कैमरों की लिस्ट के लिए www.magiclantern.fm पर जा सकते हैं.

वायरलेस हार्ड ड्राइव और प्रिंटर

वाई-फाई शेयर करने का शानदार जरिया है. लिहाजा आपके पास मौजूदा प्रिंटर (नॉन-वायरलेस) या एक्सटर्नल हार्ड ड्राइव है, तो आपको इन बिल्ट यूएसबी पोर्ट और प्रिंट सर्वर से लैस राउटर लेना चाहिए. मिसाल के तौर पर बेल्किन का प्लेमैक्स एन600 (8,000 रुपए) वाई-फाई एन सर्टिफाइड राउटर है और ड्यूल यूएसबी पोर्ट भी है. साथ ही, इसे परंपरागत वायरलेस राउटर की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है. आप इसमें एक साथ यूएसबी हार्ड ड्राइवर और यूएसबी प्रिंटर कनेक्ट कर सकते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि इस नेटवर्क पर कोई भी कंप्यूटर घर में किसी जगह से प्रिंट करने में सक्षम होगा. साथ ही, हार्ड ड्राइव में मौजूद कॉन्टेंट का भी ऐक्सेस मुमकिन होगा.

टीवी का वायरलेस विडियो सिग्नल

अगर आपको अपने स्टाइलिश एलईडी-एलसीडी टीवी के केबल के कारण आने वाली खड़खड़ाहट पसंद नहीं है, तो आप अपने टीवी को वायरलेस बना सकते हैं. आपको अपनी मौजूदा डिवाइसेज़ (मसलन केबल सेट टॉप बॉक्स, डीवीडी प्लेयर और गेम कंसोल) के लिए वायरलेस एडीएमआई अडॉप्टर खरीदना होगा. इसके बाद टीवी के एचडीएमआई पोर्ट में रिसीवर और बाकी डिवाइस में ट्रांसमीटर लगाना होगा. वायरलेस एवी ट्रांसमीटर और रिसीवर की कॉस्ट 4,000 लेकर 65,000 रुपए तक बैठती है. कॉन्टेंट (फोटो, म्यूजिक, विडियो) की स्ट्रीमिंग के लिए मौजूदा वाई-फाई कनेक्शन का इस्तेमाल करते हुए स्मार्टफोन या टैबलट जैसी डिवाइस से टीवी को जोड़ने के लिए डीएलएनए टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया जा सकता है.

आईपैड को बनाइए दूसरा डिस्प्ले

आईपैड का डिस्प्ले काफी शानदार है. चाहे आप आईपैड 2 इस्तेमाल करें या फर्स्ट जेनरेशन आईपैड मिनी, डिस्प्ले की क्वॉलिटी काफी बेहतरीन है. इस वजह से आपको इसे अपने कंप्यूटर के लिए दूसरे डिस्प्ले की तरह इस्तेमाल करना चाहिए. यह ट्रिक विंडोज़ और मैक दोनों पर काम करती है. इसके लिए सबसे पहले यह पक्का करें कि कंप्यूटर और आईपैड दोनों एक ही वाई-फाई नेटवर्क से जुड़े हों. साथ ही, एयर डिस्प्ले 2 (9.99 डॉलर) या डिस्प्लेपैड (2.99 डॉलर) और कंप्यूटर के लिए संबंधित सर्वर ऐप लेना होगा. यह ऐप आपके आईपैड को वायरलेस सेकंड डिस्प्ले में बदल देगा, जो एक्सटेंडेड डिस्प्ले हो सकता है.

बड़ी खबर : खत्म होने वाले हैं फ्री डेटा के दिन

आने वाले वक्त में फ्री डेटा मिलना बंद हो सकता है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण 21 जुलाई को सभी दूरसंचार कंपनियों के साथ वायस और डाटा शुल्कों के लिए ‘न्यूनतम मूल्य’ पर चर्चा करेगा. कुछ कंपनियां इसकी मांग कर रही हैं.

खत्म हो जाएंगी मुफ्त सेवाएं

मौजूदा दूरसंचार कंपनियों का एक वर्ग डाटा और वॉयस कॉल्स के लिए ‘न्यूनतम कीमत’ निर्धारित करने की मांग कर रहा है लेकिन क्रियान्वित करने का मतलब होगा कि बाजार में मुफ्त में दी जा रही सेवाएं समाप्त हो जाएंगी.

न्यूनतम मूल्य को लेकर पूछी जाएगी राय

इसके अलावा अभी तक ऑपरेटरों को दरें तय करने की आजादी है और उन्हें किसी प्लान की जानकारी ट्राई को उसे पेश करने से सात दिन पहले देनी होती है. ऐसे में न्यूनतम मूल्य तय होता है तो इस व्यवस्था में भी बदलाव होगा. नियामक ऑपरेटरों से दरों पर न्यूनतम फ्लोर मूल्य को लेकर उनकी राय पूछेगा और साथ ही ऑपरेटरों से इस तरह की दर तय करने का गणित भी पूछा जाएगा.

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