शुरूशुरू में तो वाकई लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात मन लगा कर सुनी थी पर धीरेधीरे वह टीवी धारावाहिकों जैसी उबाऊ होती चली गई. ऐसे में अब लोगों ने अपने कान रेडियो से हटाने शुरू कर दिए. हालत यह है कि ‘मन की बात’ सुनी नहीं, बल्कि प्रसारण के दूसरे दिन अखबारों में सरसरी तौर पर पढ़ ली जाती है.

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