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धर्म के नहीं समाज के हैं त्योहार, इसलिए इन्हें खुशी से मनाएं

रोजमर्रा के आम जीवन में त्योहार सुखद परिवर्तन लाते हैं. आने वाले त्योहार को सोच कर ही मन में हर्षोल्लास तथा स्फूर्ति का संचार होने लगता है. परंपराओं व संस्कारों से घिरा हर त्योहार समाज और राष्ट्र के लिए कोई न कोई संदेश देता है, जैसे विजयदशमी असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है, रक्षाबंधन का पावन पर्व भाईबहन के प्रेम और भाई का बहन की आजीवन रक्षा करने के संकल्प को याद करता है, ईद भाईचारे का संदेश देती है, रंगों का त्योहार होली हमें संदेश देता है कि हम आपसी कटुता व वैमनस्य को भूल कर अपने शत्रुओं से भी प्रेम करें और क्रिसमस संसार से अपराधों के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है.

त्योहार का विचार मन में आते ही उत्सव का सा माहौल छा जाता है. किसी धर्म विशेष से जोड़ कर नहीं, बल्कि त्योहार को एक खुशी के रूप में मनाए जाने से सामाजिक एकता बढ़ती है. क्यों न ऐसे प्रयास किए जाएं जिन से त्योहारों का पर्याय केवल धूमधाम और प्रसन्नता हो, न कि धर्म की परिछाया.

सामुदायिक त्योहारों से रंगा विश्व :

विश्व में कई जगह त्योहारों को धर्म से अलग कर, सामुदायिक तरीके से मनाने का रिवाज है. ब्राजील का कार्निवल जहां अनगिनत सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते चलते हुए परेड निकालते हैं. स्पेन के ला टोमाटीना फैस्टिवल में सैकड़ों की आबादी में लोग एकदूसरे पर टमाटरों से वार कर खेलते हैं. कनाडा का हैलोवीन जिस में बच्चे आड़ेटेढ़े रूप धर कर घरघर जा कर ट्रिक या ट्रीट कहते हैं तो घर वाले उन्हें कुछ खाने के पकवान, चौकलेट आदि दे देते हैं वरना बच्चे दरवाजे पर खड़े हो, कुछ करतब दिखाते रहते हैं. आजकल तो बड़े भी भूतभूतनीचुड़ैल आदि बन हैलोवीन पार्टियां करते हैं. दक्षिण कोरिया में आयोजित मड फैस्टिवल में भाग लेने वाले सभी लोग कीचड़ में खेलते हैं. अमेरिका की थैंक्सगिविंग जहां सभी पारिवारिक सदस्य व मित्र किसी एक के घर पर एकत्रित होते हैं और साथ मिल कर भोजन करते हैं खासतौर पर अमेरिकी चिडि़या ‘टर्की’ का पकवान. लंदन में नौटिंगहिल कार्निवल, जो कि ब्राजील के कार्निवल की तरह का होता है, जहां सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते हुए परेड निकालते हैं. थाईलैंड में सोंगक्रान के दौरान लोग पानी के गुब्बारों और फौआरों से खेलते हैं इत्यादि.

ये सभी त्योहार सामुदायिक ढंग से मनाए जाते हैं जहां पूरा ध्यान त्योहार की मस्ती पर होता है. मानने वाला किस धर्म को मानता है, या ईश्वर में विश्वास रखता है या नहीं, इन बातों से त्योहार के उल्लास पर कोई असर नहीं होता. बस, हर कोई हंसता है, नाचतागाता है, धूम मचाता है. लोग तैयार हो कर घरों से बाहर निकलते हैं, आपस में एकदूसरे को बधाइयां देते हैं, खातेपीते हैं, सड़कों पर नाचतेगाते हैं और त्योहार का भरपूर मजा लेते हैं.

विदेशों में सामुदायिक त्योहार आयोजित करने हेतु शहरविशेष की सरकारी संस्थाएं, गैरसरकारी संस्थाएं तथा महल्ला समितियां आपस में साझेदारी करती हैं. पूरे समाज में एकता की भावना प्रगाढ़ रहती है, अपने महल्ले, अपने शहर, अपने देश के प्रति गर्व और राष्ट्रभक्ति पनपती है. एक और बड़ा फायदा यह होता है कि वहां के पर्यटन में वृद्धि होती है जिस से आर्थिक लाभ होता है. सैलानी स्पेन जा कर ला टोमाटीना फैस्टिवल या बुलफाइट देखना चाहते हैं. दक्षिण कोरिया में मड फैस्टिवल और थाईलैंड में सोंगक्रान के कारण सैलानियों की भीड़ इन उत्सवों के दैरान काफी बढ़ जाती है.

त्योहारों को धर्म की जकड़ से मुक्त करना :

क्रिसमस व अन्य ईसाई त्योहारों के अलावा लंदन में फरवरी माह में चीन का नववर्ष, मार्च में भारत की होली, जुलाई में ईद उल फितर पूरे हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं. और इन्हें केवल धर्मविशेष के लोग ही नहीं, बल्कि पूरा शहर वहां हो रही मस्ती, मुफ्त प्रदर्शन, सड़कों पर नाचगाना आदि का लुत्फ उठाता है. ऐसे ही चीनी त्योहारों के साथसाथ चीन में भी हैलोवीन, वैलेंटाइन डे, थैंक्सगिविंग और क्रिसमस जैसे पश्चिमी त्योहार एकता के साथ मनाए जाते हैं. जापान में भी क्रिसमस पूरे जोशोखरोश से मनाया जाता है जबकि वहां ईसाइयों की संख्या बेहद कम है.
भारत के रोशनीभरे त्योहार दीवाली की भांति कई देशों में अलगअलग मौकों पर आतिशबाजी की जाती है. किंतु जहां हमारे समाज में यह आतिशबाजी हर परिवार अलग रूप से करता है जिस का नतीजा अधिक गंदगी, अधिक प्रदूषण और आपसी होड़ बन कर रह जाता है, वहीं दूसरे देशों में यह आतिशबाजी सामुदायिक तौर पर की जाती है जिस का सभी वर्ग के लोग साथ में आनंद उठाते हैं.

भारत में भी हैं सामुदायिक त्योहारों के उदाहरण :

हमारे समाज में भी कई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हम छोटेमोटे त्योहारों के रूप में देख सकते हैं- ओलिंपिक खेल, क्रिकेट या फुटबाल का मैच, कुश्ती, दंगल, दिल्ली में हाल ही में शुरू हुई नई संकल्पना ‘राहगीरी’ जिस में बहुत सुबह लोग सड़कों पर पहुंच कर भिन्न प्रकार के खेल खेलते हैं, नाटक देखते हैं, धुनों पर नाचते हैं. हमारे राष्ट्रीय पर्व जैसे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती, शिक्षक दिवस, बाल दिवस आदि को सभी धर्मों, जातियों व संप्रदायों के लोग मिलजुल कर खुशी के साथ मनाते हैं.

त्योहारों को समाज के सभी वर्गों के साथ मनाने से सामाजिक एकता में प्रगाढ़ता आती है. जिन त्योहारों में किसी धर्म का हस्तक्षेप नहीं होता उन्हें मनाने में सभी भारतीयों में कितनी राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार होता है. लगभग हर कोई अपने फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप पर राष्ट्रीय ध्वज की तसवीर लगा देता है और अपने अंदर भारतीय होने पर गर्व अनुभव करता है. ऐसे उत्सवों में पंडा, मुल्ला, पादरी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, इसलिए ये धर्म की दृष्टि से समाज को विभाजित करने में अक्षम हैं.

धर्म और त्योहार का संबंध :

प्रकृति है तो इंसान, पशु, पक्षी, जलप्राणी सभी उसी की देन हैं. तो कोई जानवर त्योहार क्यों नहीं मनाता, पंछी उत्सव क्यों नहीं मनाते? त्योहार मनाने का सिद्धांत केवल मनुष्य में ही क्यों है? त्योहार खुशी और उल्लास के लिए हमारे जीवन में आते हैं. यदि हम ये मानते हैं कि त्योहार इंसान ने स्वयं बनाए हैं तो त्योहार में खुशी, उल्लास, जोश से अधिक धर्म की भावना क्यों? आखिर त्योहारों का धर्म से इतना गहरा नाता क्यों है?

इस का सीधा सा उत्तर है कि धर्म के ठेकेदारों ने अपनी दुकान चलाए रखने हेतु पूरे वर्ष कोई न कोई त्योहार बना दिए? एक न एक त्योहार आते रहें जिन्हें मनाने के लिए आम आदमी को पंडेपुजारी, पादरीमौलवी की जरूरत पड़ती रहे. हर त्योहार में उल्लास से अधिक जोर उसे मनाने की जटिल प्रक्रिया पर हो ताकि आम आदमी स्वयं ही आसानी से त्योहार न मना पाए, बल्कि उस के रीतिरिवाजों में उलझ कर पंडे, मुल्ला व पादरी का रास्ता देखता रहे. त्योहार हमारे लिए खुशियां लाता है, आने वाले समय में हमें उन से लाभ मिले, ऐसे प्रलोभन दे कर पंडे, पुजारी, पादरी व मौलवी भिन्न प्रकार के पूजापाठ करवा कर अपनी जेबें भरते रहते हैं.

हर धर्म ने अंधविश्वास फैला कर टोनेटोटकों के सहारे प्राइवेट जिंदगी में घुसपैठ कर रखी है. मुसलमानों में गंडातावीज में विश्वास, हिंदुओं में नजर से बचने के लिए काला टीका लगाना, ईसाइयों में होली वाटर में विश्वास आदि रोजमर्रा की कुछ बातों से अंधविश्वास का हमारे जीवन में कितना असर है, यह आसानी से पता चलता है. मुसलमानों में बीमारी में झाड़फूंक करवाना, हिंदुओं में कालसर्प योग की लंबीचौड़ी पूजा इत्यादि से धर्म के पुरोहितों का धंधा चलता रहता है.

धर्म से जुड़ाव के कारण सामाजिक एकता को खतरा :

त्योहारों के साथ किसी न किसी धर्म के जुड़े होने से भारत में कितनी बार सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं. फिर चाहे मार्च 2015 में मथुरा-वृंदावन-बरसाना की गलियों में होली के त्योहार के दौरान दंगे और झड़पें हों या गोरखपुर के रसूलपुर में जुमे की नमाज और होली का त्योहार एक ही समय पर मनाए जाने पर हिंदूमुसलमानों में टकराव हो, या फिर जून 2016 में हिंदूमुसलमान दंगे भड़काने की नीयत से रमजान के पावन महीने में हैदराबाद की चारमीनार के बगल में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में गोमांस रखने की साजिश.

हमारे भारतीय त्योहार जैसे रक्षाबंधन जिस की शुरुआत हिंदूमुसलमान भाईबहन की एकता से हुई, या फिर दीवाली के मेले, या होली का रंगभरा त्योहार सामुदायिक तरीके से मनाए जा सकते हैं. ईद की खीर साथ मिल कर खानी हो या क्रिसमस का केक, सामुदायिक तरीके से किसी भी त्योहार को देखने में जो आनंद है वह धर्म के चश्मे के पीछे से देखने में नहीं. त्योहारों के पीछे की मूल भावना को जो समझ सकेगा, वो यही कहेगा कि त्योहार समाज के हैं, धर्म के नही.

पेइंग गैस्ट : अनजान शहर में दिक्कतों से जूझती युवतियां

नीना जब नई नई दिल्ली आई तो शुरू के दिनों में अपनी एक सहेली के साथ होस्टल में बतौर गैस्ट रही. पर इसी के साथ उस ने अपने लिए एक किराए का घर ढूंढ़ना भी शुरू कर दिया. वह किसी को जानती तो थी नहीं और न ही उस की सहेली के पास अपनी नौकरी के चलते इतना समय था कि वह उस के साथ किराए का घर ढूंढे़, इसलिए नीना ने इस सिलसिले में एक प्रौपर्टी डीलर से बात की और उसे अपना बजट बताते हुए किस तरह का किराए का घर उसे चाहिए, यह भी बता दिया. नीना छोटे शहर से आई थी और उस ने दिल्ली में आएदिन लड़कियों के साथ होने वाले हादसों के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. जब प्रौपर्टी डीलर के साथ उसी की गाड़ी में घर देखने जाने की बात आई तो उस का मन तमाम तरह की शंकाओं से भर उठा. जैसेतैसे हिम्मत कर वह प्रौपर्टी डीलर की गाड़ी में बैठ कर घर देखने गई और उसे जगह पसंद आ गई लेकिन यह जान कर उसे हैरानी हुई कि मकानमालिक 3 महीने का किराया एडवांस मांग रहा है, साथ ही, डीलर को भी 1 महीने के किराए के बराबर की रकम बतौर कमीशन देनी पड़ेगी. खैर, उस के पास कोई चारा नहीं था.

दिल्ली जैसे महानगर में आने वाली हर नई युवती या युवक को इसी तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है. नए शहर में नए लोगों के बीच तालमेल बैठाने के साथसाथ रहने के लिए अच्छी जगह ढूंढ़ना भी बहुत जरूरी हो जाता है. लड़कों के मुकाबले लड़कियों के लिए एक ढंग का कमरा ढूंढ़ना तो और भी मुश्किल काम है. दिल्ली में 6 साल से रह रही कविता का कहना है कि यहां का एक प्रौपर्टी डीलर मेरा जानकार है और उसे यह भी पता है कि मुझे किस तरह का मकान चाहिए और किस तरह की जगह व लोगों के बीच चाहिए, फिर भी उस ने ऐसी गंदी जगह में ले जा कर गाड़ी रोकी जहां उस की गाड़ी भी बड़ी मुश्किल से पहुंच पाई. इस के बाद भी वह मुझ से कहता है कि मैडम, थोड़ा ऐडजस्ट तो आप को करना ही पड़ेगा.

कविता बताती है कि दिल्ली के अधिकांश प्रौपर्टी डीलरों की मकानमालिकों के साथ सांठगांठ होती है जो किराएदारों का साथ देने के बजाय मकानमालिकों का साथ देते हैं. इन लोगों का आपस में एक जाल सा है. सपना की कहानी कुछ अलग है. वह बताती है, ‘‘मैं ने एक प्रौपर्टी डीलर के जरिए कमरा लिया था, इसलिए कोई खास परेशानी नहीं हुई. कमरा दिलाते समय प्रौपर्टी डीलर ने यह भी कहा था कि यदि आप को कोई परेशानी हो तो आप मुझ से कह सकती हैं. बाद में मकानमालिक के साथ मेरी कुछ कहासुनी हो गई और जब मैं ने डीलर से संपर्क करना चाहा तो उस का न ही.फोन मिलता, न ही वह कभी औफिस में मिला.’’ सपना आगे कहती है, ‘‘एक बार इन प्रौपर्टी डीलरों को अपना पैसा मिल जाए तो उस के बाद ये किसी को याद नहीं रखते.’’

होशियारी से काम लें

सपना की बातों से तो यही लगता है कि प्रौपर्टी डीलर के जरिए घर लेना किसी दुकानदार से कोई चीज खरीदने के समान है. एक बार आप खरीदा हुआ सामान ले कर उस की दुकान से निकल गए और रास्ते में या घर जा कर आप को पता चला कि चीज में कुछ कमी है, जाहिर है आप उस चीज को बदलने के लिए दुकान पर जाएंगे तो वह दुकानदार आप को पहचानेगा ही नहीं. ठीक इसी तरह का धंधा लगभग सभी प्रौपर्टी डीलर करते हैं. एक बार इन के हाथ में पैसे आ जाएं, फिर न तो इन का फोन मिलता है न ही वे खुद मिलते हैं. इसीलिए जरूरी है कि मकान लेते समय इन से सारी बातें स्पष्ट कर ली जाएं.

अब साक्षी के मामले को देखिए. वह जब यहां आई तो सिर्फ 20 हजार रुपए अपने साथ लाई थी. उस की नौकरी लग चुकी थी. उस ने सोचा कि कुछ दिनों तक किसी गैस्ट हाउस में रह लेगी और इस बीच अपने लिए कोई रहने का ठिकाना ढूंढ़ ही लेगी. साक्षी बताती है, ‘‘मुझे नए शहर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. न ही मेरी जानपहचान का यहां कोई रहता था, इसलिए मैं ने 3 प्रौपर्टी डीलरों से बात की. पहले डीलर ने जो घर दिखाया वह मुझे अच्छा नहीं लगा. दूसरे डीलर के साथ घर देखने जाने के लिए मैं उस के औफिस पहुंची. वह मुझ से बातें करने लगा. बातें करतेकरते उस ने अटपटा सा मजाक किया. मुझे उस का व्यवहार बड़ा अजीब लगा था. तीसरे डीलर ने जो घर दिखाया वह मुझे अच्छा लगा, मैं ने वहां रहना शुरू कर दिया.’’

वह आगे बताती है, ‘‘एक महीने तक तो मुझे वहां कोई परेशानी नहीं हुई पर दूसरे महीने में मकानमालिक ने तंग करना शुरू कर दिया. इस बीच मुझे यह भी पता चला कि मुझ से पहले इसी घर में उसी प्रौपर्टी डीलर ने, जिस ने मुझे यह घर दिलाया था, 3 अलगअलग लड़कियों को एकएक कर के ठहराया था जिन में से कोई 15 दिन तो कोई एक महीना रह कर चली गई.’’ रितिका और शिवांगी को बतौर पेइंग गैस्ट मकान लेने में इस तरह की कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि उन्होंने घर अपने रिश्तेदारों के माध्यम से लिए थे.

किसी अन्य शहर से आई नई युवतियों को कोशिश करनी चाहिए कि अगर वे किसी प्रौपर्टी डीलर के पास जाएं तो अकेली न जाएं, किसी सहेली या जानकार को अपने साथ ले कर ही जाएं. नए शहर में अनजान लोगों पर विश्वास कर के उन के साथ कहीं भी चल पड़ना खतरे से खाली नहीं है. डीलर को पहले ही बता दें कि कम आबादी वाली जगह में आप को घर नहीं चाहिए. इस बात का वह ध्यान रखे. किसी भी अजनबी को यह न महसूस होने दें कि यह शहर या आप इस शहर के लिए नए हैं. इन सभी बातों का ध्यान रखें तो शहर में आएदिन नई आई युवतियों के साथ हो रही घटनाओं में कमी लाई जा सकती है.

राघव जी भाई : फैसले से पहले की इस सजा को भी समझिए

यकीन नहीं होता, पर करना पड़ता है कि ये वही राघव जी भाई हैं, जिनके आगे पीछे 4 साल पहले तक समर्थकों, अधिकारियों और आम जनता की फौज हुआ करती थी, पर एक गलती उनसे क्या हुई कि अब अपने भी साथ नहीं दिखते. मध्य प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री राघव जी भाई का अपना एक अलग सियासी रुतबा  हुआ करता था. आरएसएस में भी उनकी गहरी पैठ थी, भाजपा संगठन का कोई भी अहम फैसला बिना उनकी सहमति के नहीं होता था.

राघव जी बहुत शांत और सहनशील नेता माने जाते थे पर एक दिन 5 जुलाई 2013 को उनसे इंद्रियों का दबाव सहन नहीं हुआ और फिर शुरू हुआ जिल्लत और ज़लालत का सिलसिला जो थमने का नाम नहीं ले रहा. इस दिन उनका घरेलू नौकर राजकुमार सहमा सहमा सा भोपाल के हबीबगंज थाने मे दाखिल हुआ तब उसके हाथ में एक सीडी थी. राजकुमार ने मौजूदा पुलिस अधिकारियों को अपना परिचय देकर बताया था कि राघव जी भाई उसके साथ दुष्कर्म यानि अप्राकृतिक मेथुन करते हैं तो पुलिस वालों को यह शख्स खब्त लगा था, पर जब सीडी देखी गई तो पुलिस वालों के होश फाख्ता हो गए थे, वजह जो स्क्रीन पर दिख रहा था वह झूठ या गलत नहीं था. बात उजागर हुई तो हल्ला मच गया.

किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि 80 साल के राघव जी भाई ऐसे शौक भी रखते हैं. फिर एक के बाद एक 22 सीडियां सार्वजनिक हुईं, जिनमे राघव जी भाई राजकुमार को लिटाकर वह सब कर रहे हैं जिसे आईपीसी की धारा 377 के तहत पुरुष का पुरुष के साथ दुष्कर्म कहा जाता है. खूब थू थू हुई और राघव जी भाई को मंत्री और दूसरे तमाम पदों से हाथ धोना पड़ा. अब मुकदमा चलते 4 साल से भी ज्यादा का वक्त होने आ रहा है, जिसमे पेशे से वकील भी रहे राघव जी भाई सजा से बच पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा, क्योंकि अदालत उन पर आरोप तय कर चुकी है.

10 अगस्त को जब इसी पेशी के  सिलसिले में वे अदालत आए तो तन्हा थे लेकिन प्रसन्नचित दिख रहे थे मानों कुछ हुआ ही नहीं था और जो हुआ भी था उसका कोई मलाल उन्हे नहीं. इस सीडी कांड के उजागर होने के बाद लोग चटखारे ले लेकर उनका मजाक बनाते रहे और आज भी बनाते हैं, पर किसी को उनकी मुस्कुराहट के पीछे छिपा दर्द नहीं दिख रहा और  न ही कोई उसे महसूस कर सकता है.

इस में कोई शक नहीं कि राघव जी ने गलती की है पर कोई बूढ़ा क्यों ऐसा करने मजबूर होता है, यह सोचने वालों की तादाद न के बराबर है. उनके गृहनगर विदिशा के सूत्र बताते हैं कि श्वेतांबर जैनी राघव जी भाई की पत्नी ने ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था, जिसके चलते राघव जी अपने भरोसे के नौकर राजकुमार की तरफ मुड़े थे और सेक्स की अपनी भूख शांत करते थे.

लंबे समय तक राजकुमार उनकी भूख मिटाता रहा, पर बात जब बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसे पुलिस और कानून की शरण लेना पड़ी. अब बातें हैं बातों का क्या, की तर्ज पर कहा सुना यह भी गया कि वह राघव जी की इस कमजोरी का जरूरत से ज्यादा फायदा उन्हें ब्लेकमेल करते उठाने लगा था जिससे परेशान होकर राघव जी ने खुद की इज्जत की परवाह करना छोड़ भी दिया था. राघव जी अपने बचाव में इसे खुद के खिलाफ सियासी साजिश बताते रहे थे जो उनकी खिसियाहट ही मानी गई थी, लेकिन गांव के रहने वाले राजकुमार को रिकार्डिंग के बाबत भाजपा के ही एक नेता शिवशंकर पटेरिया ने पेन वाले कैमरे मुहैया कराये थे, यह बात भी उजागर हुई थी. बाद में इस नेता को भी भाजपा ने चलता कर दिया था.

अब क्या होगा

राघव जी के बचाव की कोई संभावना कानूनी तौर पर दिख नहीं रही है, वजह धारा 377 यह नहीं देखती कि संबंध सहमति से बने थे या फिर बलात और असहमति से. उसके मुताबिक सहमति कोई माने नहीं रखती, हालांकि बाद मे कुछ फैसले समलैंगिकों को राहत देने वाले आए हैं, जो उसी सूरत में राघव जी को कुछ राहत दे सकते हैं, जब राजकुमार यह मान ले कि इस सब में उसकी सहमति थी. सीडियां फर्जी नहीं हैं, यह सीएफएसएल यानि सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री की जांच रिपोर्ट से साबित हो चुका है.

अब अगर राघव जी अपराध नहीं स्वीकारते हैं, तो जिरह में सहमति पर जोर देंगे, जबकि राजकुमार को यह साबित करने में पसीने छूट जाने हैं कि उसके साथ हिंसा या जोर जबरदस्ती की गई थी. एक सीडी में वह अपने हाथों से राघव जी भाई का हस्तमैथुन करते दिख रहा है, इसमे राघव जी तो आन्दातिरेक में नजर आ ही रहे हैं लेकिन राजकुमार भी पूरी लगन से यह सब करते दिख रहा है.

वैसे भी 80 साल का एक बुजुर्ग जो दिल और डाईबीटीज का मरीज है में इतनी ताकत नहीं हो सकती कि वह एक जवान आदमी के संग बल पूर्वक दुष्कर्म कर सके. इस पूरे मामले में राघव जी की लापरवाही उन्हें मंहगी साबित हुई है जिसकी सजा वे मानसिक तौर पर भुगत ही रहे हैं. अभी कोई यह पहल नहीं कर रहा कि उम्र और सेहत का हवाला देकर राघव जी के हक में मुहिम छेड़े जो हर्ज की बात नहीं. यह अपराध उतना घृणित है नहीं जितना इसे नैतिकता की स्केल पर मान लिया गया है. जाहिर है राजकुमार अपने किए की पूरी कीमत वसूल रहा था, लेकिन आनंद वह भी नहीं उठा रहा था यह भी नहीं कहा जा सकता.

किसके डर से अक्षय ने शुक्रवार को रखा ‘टायलेट..’ का प्रेस शो

अक्षय कुमार का दावा है कि उन्हें जो सफलता मिली है, उसमें उनकी मेहनत से ज्यादा योगदान किस्मत का है. अक्षय कुमार मानते हैं कि फिल्में किस्मत से चलती हैं. तो वहीं कुछ दिन पहले वह कह चुके हैं कि उन्हें अपनी फिल्म ‘‘टायलेट : एक प्रेम कथा’’ के बाक्स आफिस कमाई की चिंता नहीं है. वह चाहते हैं कि उनकी यह फिल्म ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचे और शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित हों.

मगर उन्होंने अपनी इस फिल्म को लेकर जो कदम उठाया है, उससे बौलीवुड और मीडिया में यही संदेश जा रहा है कि अक्षय कुमार डरे हुए हैं और उन्हें अपनी फिल्म ‘‘ट्वायलेट : एक प्रेम कथा’’ की गुणवत्ता पर यकीन नहीं है. इसी के चलते अक्षय कुमार ने अपनी इस फिल्म का प्रेस शो फिल्म के प्रदर्शन के दिन यानीकि शुक्रवार को सुबह दस बजे रखा है. इसके पीछे इस फिल्म से जुड़े अक्षय कुमार व सह निर्माताओं की सोच यही है कि तब तक दर्शक एडवांस बुकिंग या शुक्रवार की सुबह के शो में फिल्म देखने के लिए पैसे देकर फंस चुके होंगे.

यूं तो बौलीवुड में सभी को पता है कि हर फिल्मकार अपनी फिल्म मुंबई के फिल्म पत्रकारों और फिल्म आलोचकों को सोमवार से गुरूवार के बीच ‘प्रेस शो’ रखकर दिखा देता है. अब तक जिन फिल्मकारों ने अपनी फिल्म का प्रेस शो सीधे शुक्रवार की सुबह रखा, उनकी वह फिल्में बाक्स आफिस पर पूरी तरह से डूबती रही हैं.

इसका सबसे ज्यादा ताजातरीन उदाहरण गत सप्ताह प्रदर्शित शाहरुख खान की फिल्म ‘‘जब हैरी मेट सेजल’’ रही. ‘जब हैरी मेट सेजल’ जैसी घटिया फिल्म के साथ ही शाहरुख खान की अभिनय प्रतिभा पर सवालिया निशान लग चुके हैं. इस फिल्म की बाक्स आफिस पर ‘ट्यूब लाइट’ से भी ज्यादा बुरी दुर्गति हुई है.

वैसे बौलीवुड में आम धारणा यही बनी हुई है कि जब निर्माता को अपनी फिल्म के अच्छी बनी होने पर संदेह होता है, तब वह अपनी फिल्म का ‘प्रेस शो’ शुक्रवार की सुबह रखता है. इस कसौटी पर यदि फिल्म ‘ट्वायलेट : एक प्रेम कथा’ को कसा जाए, तो यही बात उभर कर आती है कि अक्षय कुमार अपनी इस फिल्म के भविष्य को लेकर हार मान चुके हैं.

मजेदार बात यह है कि अक्षय कुमार ने अपनी इस फिल्म को बहुत बेहतरीन तरीके से प्रचारित किया है. वह अपनी इस फिल्म को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल चुके हैं. कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत कर चुके हैं. वह स्वच्छता अभियान से जुड़कर काम कर रहे हैं.

इतना ही नहीं सूत्र बता रहे हैं कि फिल्म ‘‘टायलेट : एक प्रेम कथा’’ को उत्तर प्रदेशसरकार ने कर मुक्त कर दिया है. हो सकता है कि दूसरे राज्यों में भी यह फिल्म टैक्स फ्री हो जाए. इसके बावजूद अक्षय कुमार अपनी इस फिल्म को लेकर क्यों डरे हुए हैं? यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. खैर, कल शुक्रवार को सच सामने आ जाएगा कि फिल्म कितनी गुणवत्ता वाली है.

ना युवराज ना कैफ ये हैं भारतीय टीम के नंबर एक फील्डर

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व क्रिकेटर जोंटी रोड्स ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा है कि भारतीय कप्तान विराट कोहली की तुलना सचिन तेंदुलकर से करना गलत है. उन्होंने कहा कि दोनों अपनी-अपनी तरीके से महान है. आगे रोड्स ने कहा वह रिकार्ड पर विश्वास नहीं करते हैं. दोनों ने अलग-अलग दौर में क्रिकेट खेला है.

अपने समय के सबसे बेहतरीन क्षेत्ररक्षक रहे रोड्स से भारतीय टीम में उनके पसंदीदा क्षेत्ररक्षक के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ भारत के बेहतरीन क्षेत्ररक्षक रहे हैं. उन्होंने कहा कि कोहली भी ठीक-ठाक हैं लेकिन मेरे मुताबिक सुरेश रैना अभी भारतीय टीम के सबसे अच्छे क्षेत्ररक्षक हैं. रैना हमेशा गेंद तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. वह मुझे अपने क्रिकेट के दिनों की याद दिलाते हैं.

यह पूछे जाने पर कि क्या कोहली तेंदुलकर के रिकार्ड को तोड़ सकते हैं पर रोड्स ने कहा, तेंदुलकर ने करियर का आगाज महज 16 वर्ष की उम्र में किया था और वह 40 साल की उम्र तक खेले. 24 वर्षों के लंबे करियर में उन्होंने कई कीर्तमिान अपने नाम किए. आज के दौर में जितना क्रिकेट खेला जा रहा है मुझे नहीं पता कोहली कितने लंबे समय तक खेल पाएंगे.

कोहली की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि विराट ने अपनी करियर का आगाज शानदार तरीके से किया है. जिस तरह से वह रन बना रहे हैं वह अपने आप में अद्भुत है, कम उम्र में उन्होंने रनों का अंबार लगाया है. उन्होंने कहा कि कोहली को कोहली ही रहने दो और तेंदुलकर से उनकी तुलना नहीं की जानी चाहिए.

गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज हैं क्रिकेट के ये रिकार्ड

आप सभी जानते होंगे कि गिनिज बुक में अनोखे रिकार्ड्स को दर्ज किया जाता है. क्रिकेट के खेल भी में रिकार्ड बनते और टूटते रहते हैं लेकिन कुछ रिकार्ड ऐसे भी होते हैं जिनको विशेष रिकार्ड का दर्जा दिया जाता है. क्रिकेट में ऐसे बहुत से रिकार्ड हैं जो विशेष की कैटेगरी में आते हैं या अपने आप में अनोखे हैं. कुछ ऐसे ही रिकार्ड्स को गिनिज बुक में दर्ज किया गया है. तो आइए जानते हैं क्रिकेट के कुछ ऐसे रिकार्ड्स के बारे में जिन्होंने गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में जगह बनाई.

सबसे बड़ा क्रिकेट टूर्नामेंट

क्रिकेट का सबसे बड़ा टूर्नामेंट ईनाडू क्रिकेट चैंपियन कप 2013 है. इस टूर्नामेंट में कुल 16,215 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. इस टूर्नामेंट का आयोजन भारत के अलग-अलग हिस्सों में 30 दिसंबर 2013 से 20 फरवरी 2014 के बीच आयोजित किया गया.

विश्व कप में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकार्ड

क्रिकेट विश्व कप में सबसे ज्यादा रन बनाने का कीर्तिमान गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है. भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के नाम ये रिकार्ड दर्ज है. सचिन तेंदुलकर ने 6 विश्व कप में हिस्सा लेते हुए कुल 45 मैचों में 57 की शानदार औसत से 2278 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होने 6 शतक और 15 अर्धशतक भी बनाए.

सबसे महंगा बल्ला

2011 विश्व कप फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने जिस बल्ले से छक्का लगाकर भारत को विश्व चैंपियन बनाया था, वो बल्ला क्रिकेट इतिहास का सबसे महंगा बल्ला है. इस बल्ले को भारत की एक कंपनी आर के ग्लोबल शेयर एंड सिक्योरिटी लिमिटेड ने 161,295 डालर की भारी कीमत देकर खरीदा था.

सबसे ज्यादा उम्र में फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलने का रिकार्ड

सबसे ज्यादा उम्र में फर्स्ट क्लास मैच खेलने का रिकार्ड बंबई के गवर्नर राजा महाराज सिंह के नाम दर्ज है. उन्होंने 72 साल 192 दिन की उम्र में अपना फर्स्ट क्लास मैच खेला. इस मैच में उन्होंने सिर्फ 4 रन की पारी खेली.

ब्लाइंड वर्ल्ड कप में एक पारी में सबसे ज्यादा रन

1998 में पहला ब्लाइंड वर्ल्ड कप खेला गया. इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान के बल्लेबाज मसूद जन ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ नाबाद 262 रन बनाकर विश्व रिकार्ड बनाया. इस रिकार्ड को गिनिज बुक में भी दर्ज किया गया.

सबसे महंगा क्रिकेट सामान जो नीलामी में बिका

महान आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज सर डोनाल्ड ब्रेडमैन की 1948 की कैप क्रिकेट इतिहास की सबसे महंगी चीज के रूप में नीलाम हुई. जून 2003 टिम सिरिसर जिन्होंने ‘हू वांट्स टू बी ए मिलिनियर’ शो जीता ने ब्रेडमैन की इस टोपी को 283,000 यूएस डालर की बोली लगाकर खरीदा. ब्रेडमैन ने इस कैप को 1948 में इंग्लैंड के अपने अंतिम दौरे पर पहना था. इस कैप को पहन कर अपना अंतिम शतक बनाने वाले ब्रेडमैन अंतिम पारी में शून्य पर आउट हुए थे.

कप्तान के रूप में सबसे ज्यादा टेस्ट खेलने का रिकार्ड

एक कप्तान के रूप में सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने का रिकार्ड साउथ अफ्रीका के पूर्व कप्तान ग्रीम स्मिथ के नाम दर्ज है. ग्रीम स्मिथ ने साउथ अफ्रीका की कप्तानी करते हुए 100 टेस्ट मैच खेले. 24 अप्रैल 2003 को साउथ अफ्रीका की कप्तानी संभालने वाले ग्रीम स्मिथ ने 1 फरवरी 2013 को सौंवे टेस्ट में कप्तानी करते हुए ये रिकार्ड हासिल किया.

क्रिकेट इतिहास की सबसे तेज गेंद

क्रिकेट इतिहास की सबसे तेज गेंद फेंकने का विश्व रिकार्ड पाकिस्तान के तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के नाम दर्ज है. शोएब अख्तर ने 2003 विश्व कप में इंग्लैंड के बल्लेबाज निक नाइट को एक गेंद फेंकी जिसकी गति 161.3 किमी प्रति घंटा थी, यानी गेंद की रफ्तार 100 मील प्रति घंटे के पार थी. इस रिकार्ड को भी गिनिज बुक में दर्ज किया गया.

सबसे ज्यादा देर तक नेट पर बल्लेबाजी करने का रिकार्ड

नेट पर सबसे ज्यादा देर तक बल्लेबाजी का रिकार्ड विशाखापत्तनम के नागराजू बुदुमुरू के नाम दर्ज है. नागराजू बुदुमुरू ने 82 घंटे तक नेट पर बल्लेबाजी कर ये रिकार्ड अपने नाम किया.

खुशखबरी : अगले 5 साल में यहां मिलेंगे रोजगार के ढेरों मौके

अगले पांच वर्षों में में एक करोड़ रोजगार सृजन करने की संभावना है. साथ ही राज्य में 10 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जा सकता है.

देश की प्रमुख वाणिज्यिक संस्था दी एसोसिएटेड चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने बंगाल में नई उम्मीद जगाई है. उनका मानना है कि सरकार को राज्य में व्यवसायिक क्षेत्र में कुछ और सुधार करने पड़ेंगे.

एसोचैम के अध्यक्ष सुनील कानोड़िया ने बताया कि राज्य में जमीन की समस्या नहीं है. सरकार ने इस विषय पर कई बार अवगत कराया है. लैंड बैंक सहित इंडस्ट्रीयल पार्क है. जहां पर निवेश किए जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि एसईजेड सिर्फ राज्य का नहीं देश का मुद्दा है.

लेकिन इससे निवेश पर कोई असर नहीं पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता नहीं है. इस स्थिति का लाभ उठाते हुए सरकार को वाणिज्य व व्यवसाय में कुछ और सुधार करने होंगे. राज्य सरकार ने पहले भी कई सुधार किए हैं. अब और भी कुछ करने की जरूरत है. उन्होंने राज्य सरकार को राज्य में व्यवसाय करने की प्रक्रिया या तरीके को और भी सहज करने, उद्यमियों को बढ़ावा देने तथा नए -नए अवसर तलाशने के सुझाव दिए. उन्होंने कहा कि राज्य में बुनियादी क्षेत्र और कृषि में प्रचुर संभावनाएं है. बंगाल कृषि प्रधान राज्य है.

एमएसएमई में रोजगार बढ़े हैं, लेकिन बंगाल को बड़े उद्योग की जरूरत है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को एसोचैम की ओर से एक्शन एजेंडा दिया जा रहा है. सरकार से उम्मीद की जाती है कि वो हमारे सुझावों को अमल में लाएगी. राज्य में निवेशकों को आकर्षित करेगी.

इस मौके पर उपस्थित एसोचैम के पूर्व व उत्तर पूर्व क्षेत्र विकास काउंसिल के चेयरमैन संजय झुनझुनवाला ने बताया कि एसोचैम की ओर से पिछले बार भी सुझाव दिए गए थे जिनमें से कई सुझावों को सरकार ने अपनाया. इनमें से टाउनशिप प्रमुख है. उन्होंने उम्मीद जताई कि टाउनशिप में 15000 से 20 हजार रुपए तक निवेश होंगे.

ये 5 टेक टिप्स आपकी जिंदगी आसान कर देंगे, एक बार आजमा कर देखें

तकनीक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं. बिना इसके हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते. पेश हैं कुछ ऐसे टेक टिप्स, जो आपके लिए बहुत काम के साबित होंगे…

ऑफलाइन विडियो

क्या अपने पसंदीदा यूट्यूब विडियो को बार-बार देखने से आपको डेटा खर्च होने का डर रहता है? अगर हां तो विडियो को अपने कंप्यूटर में डाउनलोड कर लें और उन्हें ऑफलाइन देखें. इसके लिए आपको यूट्यूब के URL में थोड़ा सा बदलाव करना होगा. उसमें ss जोड़ दें. उदाहरण के लिए अगर आपके विडियो का URL है: youtube.com/watch/v=R9xoj0E3ZOo तो आपको इसमें बदलाव करके ऐसा बना देना है: ssyoutube.com/watch/v=R9xoj0E3ZOo इसके बाद आपके सामने ऑप्शंस की लिस्ट खुल जाएगी और आप जिस फॉर्मेट में विडियो डाउनलोड करना चाहेंगे, कर सकेंगे.

पॉप-अप से छुटकारा

क्या आप वेबसाइट्स पर चिड़चिड़ाहट पैदा करने वाले चमकीले पॉप-अप विज्ञापनों से परेशान हैं? क्रोम और फायरफॉक्स ब्राउजर्स में इसका हल है प्लग-इन के रूप में जिसका नाम है Adblock Plus इसे इंस्टॉल करें और विज्ञापनों को सदा के लिए भूल जाएं. इसे इंस्टॉल करने के लिए आप क्रोम वेब स्टोर (chrome web store) में जाएं. क्रोम वेब स्टोर के लिए लिंक है: chrome.google.com/webstore/category/extensions/hl=hi सर्च बॉक्स के जरिये Adblock Plus को ढूंढें और फिर इंस्टॉल कर लें.

incognito विंडो

अगर आप किसी और शख्स के कंप्यूटर का इस्तेमाल ब्राउजिंग के लिए करते हैं तो incognito विंडो में ही करें. incognito विंडो आपका पासवर्ड, कुकीज और हिस्ट्री सेव नहीं करता. इसका इस्तेमाल करने से एक तो आपको प्राइवेट डेटा को डिलीट करने की जरूरत नहीं रहेगी और दूसरे निजी जानकारी की चोरी की आशंका खत्म होगी. इस विंडो को क्रोम और फायरफॉक्स में खोलने के लिए Ctrl+Shift+N दबाएं.

दिल्ली में मुंबई का रेडियो

आप मुंबई में हैं और दिल्ली के किसी एफएम को मिस कर रहे हैं या आप किसी ऐसे शहर में रहते हैं जहां एफएम रेडियो की सुविधा उपलब्ध नहीं है तो आप onlineradios.in या onlinefmradio.in पर जाकर ऑनलाइन ही भारत भर में कहीं भी उपलब्ध कोई भी एफएम रेडियो सुन सकते हैं.

ब्राउजर होगा तेज

अक्सर वेब ब्राउजर स्लो होने लगते हैं क्योंकि आपके ब्राउजर में बहुत सारा वेब डेटा भर जाता है और उसकी स्पीड को प्रभावित करने लगता है. आप Ctrl+Shift+Del प्रेस करके एक निश्चित समय तक के स्टोर्ड किए गए वेब डेटा मसलन कुकीज, पासवर्ड्स, केश मेमरी को साफ कर सकते हैं और इस तरह आपका ब्राउजर फिर से सही स्पीड में काम करने लगेगा.

कहीं आपके लिए महंगा न पड़ जाए असलियत छिपाना

गृहस्थ जीवन में पदार्पण यानी शादी के बंधन में बंध जाने का फैसला स्त्रीपुरुष दोनों ही यह सोचसमझ कर करते हैं कि यह बंधन उम्र भर का है और यह अटूट बना रहे. स्त्रियों के लिए तो शादी का बंधन खास माने रखता है क्योंकि आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा उन के लिए अति महत्त्वपूर्ण है. आज के युग में भले ही स्त्री आर्थिक तौर पर स्वयं को सुरक्षित कर ले, सामाजिक तौर पर सुरक्षा के लिए उसे पुरुष पर ही निर्भर रहना पड़ता है. फिर वह चाहे पिता हो, भाई हो या पति. शादी से पहले वह अपने पिता के घर में सुरक्षित होती है, शादी के बाद पति के घर में सुरक्षित रहने की मनोकामना ले कर ही वह ससुराल जाती है.

आजकल शादी के समय वरवधू की उम्र आमतौर पर 22-23 साल से ज्यादा ही होती है, इसलिए शिक्षा और अर्थोपार्जन वगैरह की समस्याएं काफी हद तक हल हो चुकी होती हैं. फिर चाहे लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज, शादी को एक पवित्र बंधन माना जाता है. 2 परिवारों को एकसूत्र में बांधने का नेक कार्य भी शादी के बंधन में बंधने वाले लड़कालड़की करते हैं.

छिपाना महंगा पड़ा

जिस के साथ उम्र भर रहना हो, उस साथी की योग्यता भी परखी जाती है. लड़की की योग्यता में देखा जाता है कि वह सुंदर, सुशील हो, उस का स्वास्थ्य अच्छा हो. वह पढ़ीलिखी तो हो, मगर खाना बनाने से ले कर गृहस्थी के सभी कार्यों में ससुराल वालों की मरजी पर निर्भर करे. स्वतंत्र हो कर किसी भी मामले में निर्णय लेने से पहले पति या ससुराल वालों की अनुमति जरूर ले, यह पति और ससुराल वालों को इज्जत देने के लिए अपेक्षित माना जाता है.

शादी के बंधन में बंधने जा रही लड़की की तरह, कुछ जांचपड़ताल लड़के के बारे में भी की जाती है. जैसे उस का शैक्षणिक स्तर क्या है, उस की नौकरी या बिजनैस से होने वाली कमाई कितनी है, उस के ऊपर निर्भर रहने वाले परिवारजनों की संख्या कितनी है इत्यादि. जब लड़की वालों को वह अपने स्टेटस के अनुकूल जान पड़ता है, तभी विवाह के लिए उन की तरफ से रजामंदी मिलती है. लड़की या लड़के बारे में जो जानकारी आपस में दी जाती है, उस की सचाई पर विश्वास करने के बाद ही विवाह संपन्न होता है. यहां विश्वास एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है, इसलिए किसी बात को छिपाना अच्छा नहीं होता, जैसा कविता ने किया.

कविता वैसे दिखने में सुंदर है और उस ने बी.कौम. तक पढ़ाई की हुई है. उस की शादी मयंक के साथ बड़ी धूमधाम से हुई. मयंक इंजीनियर है और एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत है. कविता के मामाजी उस के पड़ोसी हैं. उन की तरफ से प्रस्ताव आया तो उन पर विश्वास कर और कविता को देख कर मयंक ने शादी के लिए हामी भर दी. उस के मातापिता को भी यह रिश्ता अच्छा लगा.

बिखराव के कगार पर शादी

लेकिन शादी के बाद सुहागरात को ही मंयक को पता चला कि कविता की पीठ और जांघों पर सफेद दाग हैं. यह तथ्य मयंक से छिपाया गया था. कविता ने उसे समझाने की लाख कोशिश की कि इलाज चल रहा है और डाक्टर ने यह बीमारी ठीक हो जाने की गारंटी दी है, लेकिन मयंक माना नहीं. उस का कहना था कि इस बीमारी की बात छिपाई क्यों गई? यह विश्वासघात है. अब कविता मायके में ही रह रही है और मयंक उस से डिवोर्स लेने पर आमादा है. कविता और उस के मामाजी ने, उस की बीमारी की बात छिपा कर गलत काम किया. अब वह जमाना नहीं रहा कि ‘भाग्य में जो था वही हुआ’ सोच कर लोग अपनी आंखें मूंद लें. भुगतना तो कविता को ही पड़ रहा है.

टूट गया भरोसा

राकेश लगभग 10 साल से अमेरिका में रह रहा है. उस की पहली शादी अमेरिकन युवती से हुई थी, जिस से उस का एक बेटा हुआ था. लेकिन यह शादी ज्यादा चली नहीं. पतिपत्नी में अनबन हो गई. परिणामस्वरूप डिवोर्स हो गया. अपने 6 साल के बेटे को राकेश ने अपने पास ही रख लिया और बाद में अपनी बहन के घर रहने के लिए भेज दिया. राकेश ने भारत आ कर दोबारा शादी की. पत्नी सुजाता को पहले डिवोर्स के बारे में तो बताया, लेकिन संतान होने की बात छिपा गया. डिवोर्स के कुछ ऐसे पेपर भी दिखा दिए जिस में उस के बेटे के बारे में कोई उल्लेख नहीं था. सुजाता और उस के परिवार को राकेश योग्य लगा और शादी हो गई. शादी के बाद सुजाता अमेरिका  चली गई. उस के जाने के 2 महीने बाद ही राकेश की बहन राकेश के बेटे को ले कर उस के घर आ धमकी. उस ने उस के बेटे को अपने साथ अपने घर पर रखने से साफ मना कर दिया. सुजाता के सामने भेद खुल गया कि राकेश का पहली शादी से एक बेटा भी है.

सुजाता के साथ विश्वासघात हुआ था, इसलिए सुजाता को बहुत दुख हुआ. राकेश ने जो भी कहा था उस पर विश्वास कर के उस ने शादी रचाई थी. मगर अब वह राकेश से डिवोर्स लेने के लिए मन बना चुकी है. हालांकि भारत में रहने वाले उस के मातापिता उसे ऐसा न करने की सलाह दे रहे हैं मगर अब यह शादी बनी रहेगी या डिवोर्स में बदल जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता.

विश्वास कायम रखना जरूरी

शादी के बाद आपसी विश्वास कायम रखना बेहद जरूरी है. शादी के बाद स्नेहा एक अच्छी पत्नी साबित हुई. औफिस जाने से पहले सुबह उठ कर घर के काम अच्छे से निबटाना और शाम को औफिस से आने के बाद भी घर संभालने का काम वह बखूबी करती थी. उस का पति अश्विन तो उस की प्रशंसा करते अघाता नहीं था. अपनी मित्रमंडली और रिश्तेदारों के सामने वह स्नेहा को ले कर गर्व महसूस करता था कि उसे स्नेहा जैसी नेक और सुशील पत्नी मिली है. लेकिन स्नेहा के साथ कालेज में पढ़ने वाला और उस का प्रेमी रह चुका निकुंज उस के नए बौस के तौर पर नियुक्त हुआ तो उन दोनों की नजदीकियां फिर बढ़ती गईं.

बात ज्यादा दिनों तक छिपी न रह सकी. अश्विन ने उन दोनों को एक सिनेमा हौल में एकसाथ फिल्म देखते हुए पाया. अश्विन के पूछने पर स्नेहा ने सफाई देने की बहुत कोशिश की कि उस दिन औफिस के बहुत से कर्मचारी छुट्टी पर थे इस वजह से काम कम था, इसलिए मैं निकुंज के साथ फिल्म देखने चली गई. लेकिन अश्विन के ज्यादा जोर दे कर पूछने पर स्नेहा ने बताया कि निकुंज से उस का प्रेम संबंध कालेज के जमाने से ही था. एक बार वह निकुंज के साथ घर से भाग भी चुकी थी. लेकिन उस के परिवार वालों ने निकुंज के विजातीय होने की वजह से उस से शादी नहीं होने दी. अश्विन का अब स्नेहा पर से विश्वास उठ चुका था, क्योंकि उस ने अपने पहले प्रेम संबंध को न सिर्फ छिपाया था, बल्कि पहले प्रेमी के साथ फिर से संबंध बना लिए थे.

अब अश्विन ने अपना तबादला दूसरे शहर में करवा लिया है और स्नेहा से बोलचाल बंद है. स्नेहा अकेली रह गई है. उस की शादी टूटने की कगार पर है. अपने जीवनसाथी के साथ धोखाधड़ी करना और असलियत को छिपाना शादी के लिए घातक है. डिवोर्स होना जीवन की एक बेहद दुखद घटना है.

सावधान, आपकी खबर रखने के लिए ये है श्रीमतियों का नया हथियार

यह लेख उन तमाम स्मार्टफोनधारक पतियों को समर्पित है, जिन्हें वह उपहारस्वरूप मिला है. जब हमारी श्रीमतीजी ने एक स्मार्टफोन ले कर देने की इच्छा जताई थी तब से हम 7वें आसमान पर थे और यह सोचसोच कर अपनी श्रीमतीजी पर कुरबान हुए जा रहे थे कि कितना प्यार करती हैं हमें और दिल से चाहती हैं कि हम स्मार्ट बंदे बनें. स्मार्ट तो पता नहीं पर हां, बंदा हम जरूर बन गए हैं. और देखते ही देखते आईफोन हमारे हाथ में थमा दिया. ऐनिवर्सरी गिफ्ट के रूप में.

हम पंछी बन कभी फेसबुक पर तो कभी व्हाट्सऐप पर डोलने लगे. दोस्तों में शेखी बघारते हुए अपनी श्रीमतीजी का गुणगान कर अपनी किस्मत और उन की लाचारी पर इतारने लगे. अब उन की किस्मत में ऐसी स्मार्ट श्रीमतीजी नहीं आईं तो हम क्या करें?

जिस दिन फोन घर आया, हमारी टेकसेवी श्रीमतीजी ने पूरा 1 दिन लगा कर उसे हमारे इस्तेमाल के लायक बनाया. हम मन ही मन खुश होते रहे कि कितना खयाल रखती हैं हमारा. हमें सीधा फर्श से अर्श पर चढ़ा दिया. हमारे सैमसंग गुरु को सीधा आईफोन 5एस से अपगे्रड कर दिया.

वह और बात है कि जब दाम सुना तो लगा शायद किडनी बेच कर लेना पड़ेगा पर इस की नौबत नहीं आई. श्रीमतीजी ने सलाहमशवरा कर के हमारी 1 साल की कमाई दांव पर लगा दी. जब राजा दशरथ 4 श्रीमतियों के होते अपनी 1 श्रीमतीजी को न टाल सका तो हम तो अदद 1 श्रीमतीजी वाले पति हैं. अब हमारी क्या बिसात कि उन के कहे को नकार सकें.

उन्हें हम अकेले अपने साथ बाजार ले जाने से डरते हैं कि कहीं कोई उन्हें चुरा न ले या फिर हमें लोग ऐसी नजरों से न देखें कि ऐसे लोगों के पास भी आईफोन होता है. श्रीमतीजी का मानआदरसम्मान रखने के लिए फोन तो ले लिया पर अब वह हमारे मुंह में रखे उस गरमगरम पकौड़े की तरह हो गया है, जो न निगलते बनता और न उगलते. पहले हमारी दिनचर्या श्रीमतीजी की रिचार्ज चाय से शुरू होती थी और अब उस के साथ फोन का रिचार्ज भी जुड़ गया. इतने फीचर्स हैं कि देखतेदेखते बैटरी खत्म हो जाती है. यह फोन न हुआ मुआ हमारी जिंदगी का ऐक्सरे हो गया. शायद ही किसी ने इतनी बड़ी कीमत चुकाई होगी ऐक्सरे की. सारे मेल, चैट्स बौक्स, मैसेज, खुले रहते हैं और कुछ भी आने पर खतरे के लालनिशान उसे नैनाविराम बनाए रहते हैं.

जब मरजी हमारी श्रीमतीजी उस में झांक कर हमारे दांत तोड़ फोटो खींच कर फेसबुक और व्हाट्सऐप पर डाल सकती हैं. और हम अपनी सफाई में कुछ भी कहने में असमर्थ हैं. अब प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? पहले महंगाई, फिर महंगी श्रीमतीजी और अब महंगा फोन. तीनों ने मिल कर हमारी लुटिया डुबोई. जैसे श्रीमतीजी का रखरखाव महंगा वैसे ही फोन का. 1 महीने की तनख्वाह उस के स्क्रीनगार्ड और कवर की भेंट चढ़ाई. स्मार्टफोन अपनेआप में स्टेटस सिंबल है, जो खुद में पंप भर देता है. फोनधारक कुछ भी करने और खरीदने से पहले अपनेआप से कहता है कि आईफोन पर इतने पैसे खर्च कर दिए और अब सब्जी वाले से फ्री धनिया और मिर्ची के लिए लड़ रहा है. यहां तक कि डाक्टर से भी डिस्काउंट देने को नहीं कह सकता.

महंगे फोन के चक्कर में महंगा खाना, महंगे कपड़े, महंगी गाड़ी और महंगा डाक्टर. अब आईफोन ले कर सड़क किनारे लगे तंबू में तो जा कर इलाज कराने से रहा. अगर रेहड़ी वाले से सब्जी लेते किसी ने देख लिया तो कहीं यह न कह दे कि देखो, आईफोन वाला रेहड़ी वाले से सब्जी ले रहा है. फोन क्या लिया मुसीबत मोल ले ली. जसतस निभ रहा था पर उस की कारस्तानी पर हमारा ध्यान ही नहीं गया, जो हमारी रगरग से वाकिफ हो रहा था और हमारे अंदर के शरारती तत्त्व का बैंड बजा रहा था. व्हाट्सऐप पर हम ने अपना टाइमपास करने के लिए 2-4 लड़कियों के नंबर लड़कों के नाम से सेव किए हैं पर स्मार्टफोन हमारी यह कारस्तानी ठीक वैसे ही पकड़ता है जैसे हमारी श्रीमतीजी हमारे कान.

हम न रजनी को राजीव, मिनी को मनीष और कमला को कमल नाम से सेव किया है पर जब इन में से किसी का भी मैसेज आता है, तो इन के असली नाम से आता है यानी जो मरजी फर्जी नाम सेव कर लो मैसेज असली नाम से ही आएगा. हम खुश थे कि इतने स्मार्ट हैं कि ऐसा कर के सब की आंखों में धूल झोंक देंगे पर फोन तो हम से भी स्मार्ट निकला. मैसेज के साथ नोटिफिकेशन की आवाज से हमारी श्रीमतीजी के कान और आंखें खुली जाती हैं और हम अपने स्मार्टफोनधारक होने पर पछता कर रह जाते हैं. एक दिन तो हमारी विवाहनैया तब डूबतेडूबते बची जब उस का फोन आ गया. उस का यानी जिस का वजूद दूरदूर तक मोबाइल की लिस्ट में नहीं, जिस का नंबर हम ने कहीं सेव नहीं किया. बस दिल में बसा रखा है. फोन की घंटी उस के नाम के साथ जोरजोर से उछलने लगी. हमारी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. हम ने झट से फोन बंद कर दिया.

बहुत सोचा पर समझ नहीं पाए कि यह कैसे हो गया? वह तो बाद में पता चला कि जो हमारी टेकसेवी स्मार्ट श्रीमतीजी ने एक शाम इस के साथ बिताई थी, उस दिन उन्होंने हम पर नजर रखने के लिए कौलर आईडी भी डाउनलोड कर दी थी. हम मासूम, निरीह पति को इस बात का पता ही नहीं था. अब तो झूठ बोल कर कहीं इधरउधर मटरगश्ती भी नहीं कर सकते. हमारी श्रीमतीजी झट से फेसबुक पर मैसेज कर के हमारी लोकेशन का पता लगा लेती हैं और व्हाट्सऐप पर लास्ट सीन देख कर हमारे काम की मसरूफियत का.

उस का एक फीचर ‘सिरी’ है, जो आप की आवाज पहचान कर सवालों के जवाब नैट पर सर्च कर के देता है. अपनी बढ़ती तोंद देख कर हम ने सोचा चलो कोई जिम जौइन कर लिया जाए.हम ने सिरी से कहा, ‘‘घर के नजदीकी जिम सैंटर का पता बताना.’’

सिरी बोली, ‘‘4 पते मिले हैं.’’

‘‘पास वाला जिम सैंटर बताओ. हम ने जौइन करना है.’’

तो पता है उस ने क्या जवाब दिया, ‘‘आप? आप ने तो 10 पिज्जा सैंटर, 8 ढाबे और 20 आइसक्रीम पार्लर अपने स्पीड डायल पर रखे हुए हैं.’’

अर्थात स्मार्टफोन सिर्फ फोन ही नहीं है, अपितु ऐसा रिमोट है जिस का कंट्रोल श्रीमतीजी के हाथ में रहता है और वे मंदमंद मुसकराते हुए तिरछी निगाहों से अपनी सहेलियों से कहती हैं कि गर हो पति से सच्चा प्यार तो उन्हें दो स्मार्टफोन का उपहार.

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