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जीएसटी के असर से शेयर बाजार में तेजी

देश में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी एक जुलाई से लागू हो गया. 30 जून को आधी रात में संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कर व्यवस्था की शुरुआत की. नई कर प्रणाली को समझने में अभी कारोबारियों को दिक्कत हो रही है और इस का नकारात्मक असर दिख रहा है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख ज्यादा देर तक नहीं चलेगा.

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई में इस का अच्छा रुख देखने को मिल रहा है. जुलाई के पहले सप्ताह में बाजार में तेजी रही और सूचकांक 439 अंक बढ़ कर 31,361.41 अंक पर बंद हुआ. नैशनल स्टौक एक्सचेंज भी 145 अंक चढ़ गया. इस से पहले सप्ताह यानी जून के आखिर में बाजार 4 दिन खुला और वैश्विक संकेतों के कारण 2 सत्रों में गिरावट पर रहा और सूचकांक 31 हजार अंक से नीचे चला गया. इन विपरीत स्थितियों के बावजूद बाजार जीएसटी के मद्देनजर तेज रफ्तार पकड़ सकता है.

इंडिगो की अंतर्राष्ट्रीय मार्ग पर सस्ती सेवा देने की तैयारी

देश में निजी क्षेत्र की सब से बड़ी विमानन कंपनी तथा सस्ती दर पर हवाई सेवा देने वाली इंडिगो ने अब दुनिया के आकाश पर नजर टिका दी है. अब वह अंतर्राष्ट्रीय मार्गों पर भी सस्ती दर से विमान सेवा उपलब्ध कराने की क्रांतिकारी योजना पर विचार कर रही है. इस के लिए कंपनी ने देश की सब से बड़ी विमानन कंपनी एयर इंडिया के शेयर खरीदने की पहल शुरू कर दी है.

करोड़ों के घाटे में चल रही एयर इंडिया को सरकार ने निजी हाथों में बेचने का फैसला किया है. इंडिगो ने इस कंपनी को अपने बेड़े में शामिल करने की जरूरी कार्यवाही शुरू कर दी है. हालांकि, कंपनी प्रबंधन का कहना है कि वह एयर इंडिया को पूरी तरह से अधिग्रहीत नहीं करेगी. इस सौदे की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनी अंतर्राष्ट्रीय मार्गों पर भी कम दाम पर हवाई सेवा देगी.

इंडिगो का भारतीय वायुमार्ग सेवा पर करीब 40 प्रतिशत हिस्सा है जबकि अंतर्राष्ट्रीय मार्ग पर उस की हिस्सेदारी सिर्फ 3 प्रतिशत है. एयर इंडिया का देश में 14 प्रतिशत तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 17 प्रतिशत कब्जा है. सवाल है कि इंडिगो सस्ती दर पर सेवा देने के बावजूद फायदे में है जबकि सारी सुविधाओं से संपन्न एयर इंडिया घाटे में है और निजी हाथों को सौंपा जा रहा है. दरअसल, एयर इंडिया एक दर्पण है जो बताता है कि  हमारी सरकारी मशीनरी कितनी खराब हो चुकी है. उस की लगभग सारी सार्वजनिक सेवाएं नुकसान में हैं जबकि निजी क्षेत्र फलफूल रहा है.

सस्ते गल्ले की दुकानों में ढाई करोड़ फर्जी राशनकार्ड

सरकार का हाल का एक आंकड़ा चौंकने वाला है. इस में कहा गया है कि देश में राशनकार्ड को आधार से जोड़ने से पता चला है कि करीब ढाई करोड़ राशनकार्ड फर्जी थे. अब तक 77 फीसदी राशनकार्ड ही आधार से जोड़े गए हैं. सरकार को 14 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की बचत हुई है.

रियायती दर पर सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों पर लोगों की लाइन अचानक कम हो गई है. सरकार ने सभी फर्जी राशनकार्ड बंद कर दिए हैं.

राशन प्रणाली को सरकार डिजिटल कर चुकी है और अब सही लोगों को सस्ता राशन मिल रहा है. सरकार की योजना पूरे मूल्य पर राशन दे कर रसोई गैस की तरह सब्सिडी उपभोक्ता के खाते में भेजने की है. यह लंबी प्रक्रिया है और इसे शुरू करने में अभी समय लगेगा लेकिन इस के शुरू होने से गोलमाल करने वाले राशन विक्रेताओं पर पूरी तरह से लगाम लग जाएगी.

बड़ा प्रश्न यह है कि जिस समाज में सरकारी सुविधा के लिए संपन्न लोग भी चोर बन रहे हैं और गरीबों का हक छीनने से संकोच नहीं करते हैं, वह समाज किस कदर भ्रष्ट हो चुका है, सरकार का यह आंकड़ा उसी तसवीर का खुलासा करता है.

घुन की तरह सामाजिक व्यवस्था को खोखला कर रही भ्रष्टाचार की इस प्रवृत्ति को सरकार रोकने का प्रयास तो कर रही है लेकिन यह काम आसान नहीं है. खुद धनवान बनने वालों में चोर शामिल हैं. फर्जी राशनकार्ड वालों पर अगर कार्यवाही होती तो क्या फर्जीवाड़ा करने वाले दहशत में नहीं होते.

दो हजार रुपए के नोट भी अब होने लगे हैं डंप

सब को याद है पिछले वर्ष 8 नवंबर, रात 8 बजे की घटना, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि देश में नकली नोटों का प्रचलन बढ़ गया है और बड़े स्तर पर भ्रष्टाचारियों के पास काली कमाई का पैसा जमा हो गया है. इस पर रोक लगाने के लिए 1,000 और 500 के वे नोट तत्काल प्रभाव से बंद किए जाते हैं और जिन के पास खूनपसीने का पैसा है उन्हें 31 दिसंबर, 2016 तक बदलने का समय दिया जाता है. उस के बाद देश की जनता को जबरदस्त किल्लत हुई थी और बैंकों में कई माह तक लंबीलंबी लाइनें देखी गईं. इस का फायदा बैंक के  अधिकारियों ने खूब उठाया और भारी कमीशन पर लोगों को नए नोट दिए.

वहीं, भाजपा नेता रेड्डी बंधु संकट के इस दौर में भी बच्चे की शादी पर 5 हजार करोड़ रुपए खर्च कर गए और राजनीतिक दलों के नेता चुनाव में भारी खर्च करते रहे. लोगों ने काली कमाई का पैसा कबाड़खाने में और नालों में बहा दिया. तब लगा था कि काली कमाई वालों को सबक मिलेगा.

लेकिन इधर रिजर्व बैंक ने कहा है कि 2,000 रुपए के नोट को भी डंप किया जाने लगा है. उस के पास बड़े नोटों की मांग करीब 10 फीसदी बढ़ गई है. मतलब यह है कि काली कमाई वाले फिर सक्रिय हो गए हैं. सरकार ने दूसरा तोड़ निकालने के लिए 100 रुपए के नोटों की छपाई बढ़ा दी है और अब 200 रुपए का नया नोट भी बाजार में लाए जाने की तैयारी है. 500 रुपए के नोट कुछ नियंत्रित रहेंगे. साफ है कि कालाबाजारी को नियंत्रित करना आसान नहीं है.

 

मुझ से खड़ा रहने को मत कहो, थक गई हूं मैं

दर्द की तपती दोपहरी का

मरुस्थली रेतीला पहाड़

मुझ से अब नहीं चढ़ा जाता

यहां कोई जीवित पेड़ नहीं है

और मैं भी एक ठूंठ बन गई हूं

मुझ से खड़ा रहने को मत कहो

मैं थक गई हूं

रिक्तता के अंधकार का बीहड़

मुझ से अब नहीं चला जाता

यहां सब शून्य ही शून्य हो गया है

मैं भी बुझी हुई रोशनी रह गई हूं

मुझ से जलने को मत कहो

मैं थक गई हूं

अपार पारापार आस्था का

ये ऊंचानीचा समुद्र

मुझ से नहीं तरा जाता

यहां सब ब्रह्म ही ब्रह्म हो गए हैं

मैं भी शून्य बन गई हूं

मुझ से पूजने को मत कहो

मैं थक गई हूं.

– डा. लक्ष्मी शर्मा

जब सना खान हुईं उप्स मूवमैंट का शिकार

बौलीवुड के स्टार्स पर मीडिया की पैनी नजर होती है. लोग अपने पसंदीदा अभिनेता अभिनेत्रियों के बारे में सबकुछ जानना चाहते हैं. लेकिन इस के कुछ नुकसान भी हैं.

अकसर मीडिया में अभिनेत्रियों के वार्डरोब मालफंक्शन के शिकार होने की खबरें सामने आती रहती हैं. अभिनेत्री सना खान भी उप्स मूवमैंट का शिकार हो गई हैं. सना खान सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ में भी नजर आई थीं. फिल्म ‘वजह तुम हो’ में सना खान ने गुरमीत चौधरी के साथ कई बोल्ड सीन दिए थे.

जब सना खान उप्स मूवमैंट का शिकार हुईं तब उन्होंने गुलाबी रंग की एक साड़ी पहन रखी थी जिस में वे काफी खूबसूरत नजर आ रही थीं. उन्होंने इस मौके पर पोज देते हुए कई फोटोज खिंचवाए.

इस दौरान सना के साथ कुछ ऐसा हो गया जो नहीं होना चाहिए था. यह पहली बार नहीं है जब सना खान उप्स मूवमैंट का शिकार हुई हैं. उन के साथ पहले भी ऐसा हो चुका है. सिर्फ औफ स्क्रीन ही नहीं, बल्कि औन स्क्रीन भी सना ऐसी घटनाओं का शिकार हो चुकी हैं. इस पर कई लोग यह भी कहते हैं कि मीडिया अभिनत्रियों के पहनावे में हुई गलतियों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है.

गणेश आचार्या ने घटाया 85 किलो वजन

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गणेश आचार्या की लेटेस्ट तसवीरें सभी लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच रही हैं. उन के अगर हालिया अपियरैंस को देखा जाए तो आप पाएंगे कि वे अपने वजन के आधे हो गए हैं. इस की वजह है उन का 85 किलो वजन घटाना. अपने वजन घटाने के बारे में उन्होंने कहा, ‘‘यह मेरे लिए कठिन था. मैं पिछले डेढ़ साल से अपने शरीर पर काम कर रहा था. 2015 में आई अपनी फिल्म ‘हे ब्रो’ के लिए मैं ने 30-40 किलो वजन बढ़ाया था और इस के बाद मेरा वजन 200 किलो पर पहुंच गया. अब वही वजन कम कर रहा हूं.

2013 में आई फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ के गाने ‘मस्तों का झुंड’ को कोरियोग्राफ करने के लिए गणेश आचार्य को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्होंने कहा कि वजन घटाने की प्रेरणा मुझे इस बात से मिली कि इस के जरिए मैं लोगों के सामने अपना एक अलग वर्जन दिखाऊंगा. मैं ने अभी तक लगभग 85 किलो वजन कम कर लिया है. इस से मेरी डांस करने की ऊर्जा अब डबल हो गई है.

शूजित सरकार की मांग, बच्चों के रिऐलिटी शो बंद करो

मशहूर फिल्मकार शूजित सरकार बच्चों के रिऐलिटी शो को बंद किए जाने के सपोर्ट में हैं. वे कहते हैं, ‘‘संबंधित अधिकारियों से विनम्र निवेदन है कि वे तुरंत सभी टीवी चैनलों के रिऐलिटी शोज पर बैन लगाएं. ये शोज बच्चों को भावनात्मक स्तर पर बरबाद कर रहे हैं.’’

शूजित सरकार की मांग जायज नजर आती है. वास्तव में टीवी के रिऐलिटी शो में विजेता बनने के लिए हर बच्चे के ऊपर कई तरह के दबाव होते हैं. इन में से एक ही विजेता बनता है, पर विजेता बनने के बावजूद उसे फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलने की कोई गारंटी नहीं होती. इस से उन के कैरियर, उन की सेहत पर जबरदस्त असर होता है. वे रिऐलिटी शो का हिस्सा बन स्टारडम की हवा में बह रहे होते हैं, इस से उन के अंदर भटकाव आता है.

ऋतिक रोशन के साले को अब आप देखेंगे टीवी पर

बौलीवुड के सुपरस्टार ऋतिक रोशन को कौन नहीं जानता और उन की एक्स वाइफ सुजैन भी एक जानापहचाना चेहरा हैं. लेकिन सुजैन के भाई, जायद खान जो कि बौलीवुड में एक असफल नाम साबित हुए हैं, फिल्मों में कोई कमाल न दिखा पाने के बाद अब टीवी का रुख कर रहे हैं.

जायद खान ने फिल्म ‘मैं हूं न’ और ‘शब्द’ जैसी फिल्मों में काम किया था. पर उन्हें कैरियर में कोई खास सफलता अब तक नहीं मिल सकी है. तो फिल्मों में कामयाबी न मिलती देख जायद ने छोटे परदे की तरफ रुख करने का फैसला ले ही लिया है. वे अब बहुत जल्द टीवी इंडस्ट्री में एक नए शो से डैब्यू करने जा रहे हैं.

निर्मातानिर्देशक सिद्धार्थ पी मल्होत्रा के आने वाले शो में जायद बिजनैस टाइकून का रोल निभाने वाले हैं. यह टैलीविजन शो एक सस्पैंस थ्रिलर है.

टाइम जोन : वक्त बदलने की जरूरत अब हमें भी है

एक ही देश में क्या घड़ी की सूइयां अलग अलग वक्त बता सकती हैं? यह एक मुश्किल सवाल है क्योंकि भारत में फिलहाल लोगों को इस की आदत नहीं है कि कश्मीर में अगर किसी दिन सुबह के 11 बजे हों, तो उसी समय अरुणाचल प्रदेश में घड़ी की सूइयां 12 बजे का वक्त दिखा रही हों. हालांकि, ऐसा देश में काफी पहले हो चुका है. 1880 के दशक में मद्रास टाइम 2 टाइम जोनों के बीच अलग से प्रचलन में था और इस के अलावा पोर्ट ब्लेयर मीन टाइम भी अलग से तय किया जाता था. लेकिन अब एक बार फिर देश में 2 टाइम जोन बनाने की मांग उठ रही है.

इस बार अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू अपने राज्य की जरूरतों के मद्देनजर केंद्र सरकार से इस की पहल करने को कह रहे हैं. बिजली बचाने और सड़क दुर्घटनाएं रोकने के मकसद से वहां यह मांग की जा रही है. पर इस के कई अन्य पहलू भी हैं, जो 2 साल पहले 2015 में महाराष्ट्र में उजागर हुए थे. तब बौंबे हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से उपनगरीय लोकल ट्रेनों में ज्यादा भीड़भाड़ पर रोक लगाने के लिए दफ्तरों के समय में तबदीली करने के बारे में सुझाव दिया था. अदालत ने कहा था कि अगर आधे या कुछ प्रतिशत दफ्तरों का समय थोड़ा परिवर्तित कर दिया जाए तो इस से सड़कों, बसों और रेलमार्गों पर ट्रेनों में भीड़ का दबाव और ट्रैफिक समस्या का मसला काफी कम हो जाएगा.

इस अनोखी पेशकश को सिर्फ मुंबई के नजरिए से नहीं, बल्कि देश के अन्य महानगरों और कई बड़े शहरों के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है जहां दफ्तरों का एक निश्चित समय पर खुलना और बंद होना ट्रैफिक के अलावा कई अन्य समस्याएं पैदा कर रहा है. इस से दफ्तरों और कामकाज के लिए एक ही समय पर निकलने वाले युवाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. असल में यह एक बड़ी पहलकदमी की मांग है, जिस के बारे में कई अन्य कारणों से भी देश में पहले भी मांगें उठती रही हैं.

पूर्वोत्तर की पुरानी मांग

देश के पूर्वोत्तर राज्यों के लोग अकसर यह बात कहते हैं कि अगर वहां सूरज उगने और दिन ढलने के हिसाब से घडि़यों को सैट कर दिया जाए तो दफ्तर देश के अन्य इलाकों के मुकाबले जल्दी खुलेंगे और जल्दी बंद होंगे. इस से आम जनता को भी काफी सहूलियत हो जाएगी क्योंकि तब लोग शाम को अंधेरा घिरने से पहले घर पहुंच सकेंगे. इसी जरूरत के तहत वर्ष 2013 में भी पूर्वोत्तर राज्य असम में घड़ी की सुइयों को 1 घंटा आगे खिसकाने का विचार किया गया था और 2014 में नया समय लागू करने की कोशिश की गई थी. भारतीय मानक समय से अलग ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग अरसे से पूर्वोत्तर के लोग करते रहे हैं क्योंकि वहां सूर्योदय और सूर्यास्त का समय शेष देश से काफी अलग होता है. गरमी में (जून में) वहां सुबह 4 बजे सूरज निकल आता है और सर्दी में (दिसंबर में) शाम 5 बजे ही सूर्यास्त हो जाता है. वर्ष 2014 की पहली जनवरी से वहां जो नया समय लागू करने की कोशिश की गई थी, उस व्यवस्था को ब्रिटिश शासनकाल में चाय बागान में काम करने वाले श्रमिकों की दिनचर्या के हिसाब से बनाया गया था. उसे ‘चाय बागान टाइम’ भी कहा जाता है.

पहले असम, फिर महाराष्ट्र और अब अरुणाचल प्रदेश में उठ रही मांगों के आधार पर देश में दफ्तरों की समयसारणी बदलने पर विचार करने की जरूरत बनती है. वर्ष 2013 में असम कांग्रेस और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट औफ असम (उल्फा) ने एक स्वर में यह मांग उठाते हुए कहा था कि दफ्तरों का समय बदलने के बारे में अविलंब फैसला होना चाहिए क्योंकि इस से पूर्वोत्तर का विकास बाधित हो रहा है. जानेमाने फिल्म निर्माता और इसरो के पूर्व वैज्ञानिक जे बरुआ ने बाकायदा आकलन कर के बताया कि पूरे देश के लिए निर्धारित टाइम जोन का पालन करने की मजबूरी में बिजली की खपत आदि मदों में ज्यादा खर्च करने के कारण पूर्वोत्तर क्षेत्र को सालाना 94,900 करोड़ रुपए का भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है.

कैसे बनेगा नया टाइम जोन

यह मामला कुल मिला कर नया टाइम जोन बनाने जैसा है. दुनिया के कई हिस्सों में स्थानीय जरूरतों के हिसाब से एक ही देश में अलगअलग टाइम जोन या तो पहले से ही हैं या फिर इन्हें ले कर मांग उठती रही है. वर्ष 2013 में ऐसी ही एक मांग स्पेन से उठी थी.

स्पेन में घडि़यों को 1 घंटा खिसकाने के लिए वहां की संसद में एक कानून का प्रस्ताव लाया गया था जिस के अंतर्गत देश के मानक समय में 1 घंटे के बदलाव का सुझाव दिया गया था. वहां घडि़यों का वक्त बदलने की यह कोशिश एक रिपोर्ट के बाद की गई, जिस में दावा किया गया था कि पिछले 71 वर्षों से स्पेन सही टाइम जोन में नहीं है. असल में, वर्ष 1942 में स्पेन के तानाशाह जनरल फ्रांको ने स्पेन को केंद्रीय यूरोपीय समय (सीईटी) टाइम जोन में शामिल कर दिया था ताकि स्पेन नाजी जरमनी का अनुसरण कर सके. लेकिन देखा गया कि इस से स्पेन के लोगों के खाने, सोने और काम से जुड़ी आदतों में अंतर आ गया.

स्पेन की संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, गलत टाइम जोन अपनाने की वजह से स्पेन के लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए मानकों के विरुद्घ न्यूनतम 1 घंटा कम सो पाते हैं, जिस का असर उत्पादकता पर पड़ता है और इस से दफ्तरों में कर्मचारियों की अनुपस्थिति, तनाव, दुर्घटनाएं व बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर भी बढ़ती है क्योंकि तब मांबाप बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं. रिपोर्ट का कहना है कि यूरोप के पश्चिमी छोर पर बसे स्पेन को कायदे से ब्रिटेन और पुर्तगाल के टाइम जोन का अनुसरण करना चाहिए जो यहां सूरज के उगने और अस्त होने के वक्त के हिसाब से ज्यादा सटीक है. इस टाइम जोन के अनुसार, स्पेन की घडि़यों को मौजूदा समय से 1 घंटा पीछे करने से यह देश कई मानों में यूरोप के अनुरूप हो जाएगा और इस से स्पेन के लोगों की दिनचर्या सुधर जाएगी.

भारत का मामला

एक विस्तृत भूभाग वाले देश में यह जरूरत तो बनती ही है कि स्थानीय जरूरतों के हिसाब से या तो उस के एक से ज्यादा टाइम जोन हों या फिर बड़े शहरों में कुछ दफ्तरों के खुलनेबंद होने के समय बदले जाएं. इस जरूरत की एक स्पष्ट वजह तो यह है कि हमारे देश भारत के कई हिस्सों में सूर्य दूसरे इलाकों के मुकाबले पहले उगता और अस्त होता है.

देश के पूर्वोत्तर इलाकों में सुबह और रात देश के बाकी हिस्सों से जल्दी होती हैं. इस कारण एक निश्चित समयसारणी के अनुसार खुलने वाले दफ्तरों में काम करने, वायुयानों की उड़ानों आदि के संचालन में असुविधा पैदा होती है. केंद्र सरकार के कार्यालयों के खुलनेबंद होने का समय सुबह 9 से शाम 5 बजे है. ऐसी स्थिति में पूर्वोत्तर में सुबह 9 बजे तक दिन का लंबा अरसा बीत चुका होता है. वहां शाम 5 बजे तक अंधेरा होने को होता है. इस असंतुलन को साधने के लिए दफ्तरों और सभी संबंधित क्रियाकलापों में बिजली की अधिक खपत होती है, जिस का संकेत जे बरुआ ने भी किया था. ऐसी जरूरतों के मद्देनजर ही विस्तृत भूभाग वाले कई देशों में एक से ज्यादा टाइम जोन की व्यवस्था की गई है, जैसे रूस में 11 टाइम जोन हैं, अमेरिका में 9 अलगअलग टाइम जोन हैं और कनाडा में 6 टाइम जोन प्रचलन में हैं.

हालांकि, भारत की तरह ही विशाल क्षेत्रफल वाला देश चीन सिर्फ एक ही टाइम जोन से काम चला रहा है. भारत में 2 टाइम जोनों की जरूरत का एक स्पष्ट उदाहरण मिलता है. वर्ष 1999 में गुवाहाटी में जब भारत और न्यूजीलैंड के बीच एकदिवसीय क्रिकेट मैच का आयोजन हुआ, तो खेल मान्य समय से 15 मिनट पहले शुरू किया गया, ताकि मैच शाम को अंधेरा होने से पहले खत्म हो सके. इस मांग पर पहले भी विचारविमर्श  हुआ है. वर्ष 2001 में विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय के अधीन सरकार ने 4 सदस्यीय समिति बना कर कर इस जरूरत को समझने की कोशिश भी की थी. हालांकि इस समिति के नतीजे पेश करते हुए 2004 में कपिल सिब्बल ने कहा था कि भारत इतना बड़ा देश नहीं है कि वहां 2 टाइम जोनों के बारे में सोचा जाए.

सच यह है कि पूर्व और पश्चिम में 2 हजार किलोमीटर की दूरी वाले देश भारत में समय अंतरों की बेहद जरूरत है. इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पूर्वोत्तर में सूर्य के उगने और अस्त होने का समय पश्चिम के कच्छ के मुकाबले 2 घंटे पहले है. नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में तो सूरज गरमी में सुबह 4.30 बजे ही उग आता है, इसलिए सरकारी कर्मचारियों को 8 या 9 बजे दफ्तर जाने से पहले काफी लंबा इंतजार करना होता है. वहां शाम चूंकि जल्दी होती है, इस कारण ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ने के साथसाथ दफ्तरों के संचालन में होने वाले खर्च में भी बढ़ोतरी होती है. यह भी गौरतलब है कि 1980 के दशक में कुछ शोधकर्ताओं ने देश को 2 या 3 टाइम जोन्स में बांटने का प्रस्ताव रखा था, ताकि ऊर्जा संरक्षण के काम में तेजी लाई जा सके. यह कुल मिला कर एक सामाजिक व आर्थिक समस्या है और इस का निदान देश को 2 टाइम जोन्स में बांटने से आसानी से संभव है.

बिजली की बचत, जाम से बचाव

मामला सिर्फ बिजली के इस्तेमाल में बढ़ोतरी का नहीं है, बल्कि दफ्तरों के संचालन में होने वाले खर्च और सड़कों पर बसों व ट्रेनों में भीड़ का भी है. आबादी के साथसाथ शहरों की सड़कों, रेलमार्गों से ले कर हर चीज पर दबाव बढ़ा है. शहरों में एक तय वक्त पर दफ्तरों में कामकाज शुरू हो कर खत्म होने का अनुशासन सड़कों पर अराजकता पैदा कर देता है. सुबह 8 से 10 बजे तक और शाम 5 से 7 बजे तक न तो सड़कें खाली मिलती हैं, न ही लोकल ट्रेनों या मैट्रो में पैर रखने की जगह मिलती है.

यह एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है, जिस के निदान के लिए स्थानीय जरूरतों के मुताबिक टाइम जोन अलग करने व दफ्तरों की समयसारणी में तबदीली किए जाने की जरूरत है ताकि देश में तेज होते शहरीकरण के सामने पेश होने वाली दिक्कतों के हल समय रहते निकाले जा सके.

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