Download App

मर्दों को विश्वास है, छेड़खानियों का आनंद लेती हैं औरतें

महिलाओं के अधिकारों और बराबरी के लिए कार्य कर रही संस्था यूनाइटेड नेशंस वीमन ऐंड प्रोमुंडो ने मिस्र, मोरक्को, लेबनान और फिलिस्तीन में सर्वे कर पाया है कि मर्दों को विश्वास है कि औरतें छेड़खानियों का आनंद लेती हैं. छेड़खानियों में घूरना, ताड़ना, छूना, अंगों को मसलना, सैक्सी कमैंट मारना और बलात्कार तक शामिल हैं. सर्वे में मजेदार बात यह रही कि अशिक्षित और अर्धशिक्षित छेड़खानी कम करते हैं जबकि शिक्षित ज्यादा करते हैं.

पुरुषों को विश्वास है कि औरतें यदि अच्छा पहनती हैं या अच्छा शरीर रखती हैं तो इस का मतलब होता है कि पुरुष उन्हें सराहें और यदि जानपहचान न हो तो सीटियां बजा कर अपनी पसंद प्रदर्शित करें. पुरुषों का यह मानना है कि अगर औरतों को छेड़खानी से डर लगता तो वे इतनी सजधज कर क्यों रहतीं.

औरतों से छेड़खानी के पीछे जहां पुरुषों की कामुकता हो सकती है, वहीं उन की आर्थिक विफलता की खीझ भी है. वे किसी कमजोर पर जोर आजमाना चाहते हैं और जानते हैं कि औरतों को समाज ने नीचा दरजा दे रखा है. ऐसे में वे मानते हैं कि जब कुत्तों को लात मारी जा सकती है तो सड़क पर चलती लड़की को कम से कम छूते हुए तो निकला जा ही सकता है.

भारत के उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम से रोमियो स्क्वैड बनाए गए पर धार्मिक हवन की तरह ये स्क्वैड खबरों में आते तभी, जब जोड़ों को तंग करते हैं. लड़कियों को छेड़ने पर कभी कोई रोकटोक लग पाईर् हो, इस का कोई सुबूत नहीं है.

औरतों को एकतरफ घरों में बंद रखना और दूसरी ओर जो बाहर निकल आएं उन्हें छेड़ने के दोगलेपन की बीमारी भारत ही नहीं, सारे देशों में है. अमेरिका तक इस से आजाद नहीं है. अगर यूरोप की पौर्न इंडस्ट्री जम कर चल रही है तो इसीलिए कि उन फिल्मों में औरतों को गुलामों से भी बदतर दिखाया जाता है. उन्हें कष्ट सहने में आनंद लेती हुई फिल्माया जाता है. यह विकृति गरीब, अमीर, उदार, कट्टर सभी देशों में है. कहीं भी अकेली लड़की को पकड़ कर गाड़ी में या कमरे में खींच लेना आम बात है.

जो लोग औरतों की इज्जत से खेलते हैं, वही उन की इज्जत की रक्षा के नाम पर उन्हें उपदेश देते हैं कि घर से बाहर न निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, पराए मर्दों से बात न करो, यह कैसी नैतिकता है? वास्तव में, इस सर्वे ने कट्टरपंथी देशों के मर्दों की असली सोच की पोल तो खोली ही है, समाज के नियमों की बेतुकी वकालत का भंडाफोड़ भी कर दिया है.

किसानों की कराह को आखिर कब सुनेंगी हमारी सरकारें

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना आदि राज्यों में किसानों का आंदोलन, जो कहीं हिंसक हुआ है तो कहीं थोड़ा शांत है, देश के लिए चुनौती बन सकता है. किसानों को लग रहा था कि उन की जातियों की सरकारें बनेंगी तो उन का उद्धार करेंगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

हरियाणा में देवीलाल और भूपिंदर सिंह हूडा की सरकारें हों या बिहार में लालू प्रसाद यादव व उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की, किसानों की समस्याएं इतनी विकराल हैं कि उन के अपने भी इन को सुलझा नहीं पाए. भारतीय जनता पार्टी ने धर्म के झुनझुने के सहारे किसानों में पैठ बनाई कि वह तो ऊपर वाले की देन है. भाजपा के इस झुनझुने से किसान प्रभावित हुआ और उस ने नरेंद्र मोदी को एक के बाद एक जीतें दिलाईं.

लेकिन किसानों का हाल फिर भी वही रहा. और अब तो खूनी संघर्ष में बदलने लगा है. किसान असल में जो मांग रहे हैं, वह दिया नहीं जा सकता. न कर्ज माफ हो सकते हैं, न उत्पादन का उन्हें इतना मूल्य दिया जा सकता है कि वे आराम से रह सकें.

सदियों से जातिव्यवस्था ने ऐसा तंत्र बुन रखा है कि अनपढ़ किसान यह जान ही नहीं पाते कि उन की कमाई जाती कहां है. रातदिन खेतों में धूप, ठंड, बरसात, कीचड़ में काम करने वाले किसान आज हो सकता है भुखमरी के शिकार न हों पर उन की धनसंपत्ति कुछ हजार की ही है जबकि उन की मेहनत पर पलने वाले नंबरदार, पटवारी, आढ़ती, दलाल, महाजन, तहसीलदार, वकील, फूड कंपनियां, रेस्तरां, होटल अरबों की संपत्ति के मालिक होने लगे हैं.

फूड चेन के सब से अहम हिस्से किसान को फालतू का माना जाता है. उन का गुस्सा वाजिब है, पर यह गुस्सा है बेकार. सरकारें जानती हैं कि थोड़े दिनों में किसान थकहार कर बैठ जाएंगे. उन के पास न राजनीतिक ताकत है, न अपनी बात कहने का तरीका. उन्हें तो खिलौना बना कर खेला जाएगा और यों ही सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा. वे अपने आंदोलन से कुछ पाएंगे, यह सपना है और इसीलिए

किसी को इस आंदोलन से डर नहीं है. किसानों के घरों से आए पुलिस वाले गोलियोंलाठियों से अपनों को सीधा कर देंगे, थोड़ी भड़ास निकलने दें.

चोटी कटने के पीछे अफवाह और अंधविश्वास का जिन्न

बड़े अफसोस की बात है कि हम आजादी की 70वीं सालगिरह मना रहे हैं पर अभी भी अफवाह पर विश्वास और अंधविश्वासों से मुक्त नहीं हो पाए हैं. हमारा एक पैर चांद पर है तो दूसरा दकियानूसी सोच के दलदल में धंसा हुआ है.

जून माह में पश्चिम राजस्थान के गांवों से महिलाओं के बाल काटने की एक दो घटनाओं से शुरू हुआ अफवाहों का जिन्न मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली तक जा पहुंचा. आए दिन 2-3 अविश्वसनीय अफवाहें मीडिया खासतौर से इलेक्ट्रोनिक चैनलों की सुर्खियों में छाई रही हैं.

घटना की शुरुआत में सामने आया कि लगभग 50 महिलाओं का एक ग्रुप है जिन्हें 1008 महिलाओं की चोटी काटनी है. यह काम पूरा होने के बाद इन महिलाओं को अदृश्य होने की शक्ति प्राप्त हो जाएगी. चोटी कटने की अफवाहों में यह भी सामने आया कि जिस महिला की चोटी कटनी होती है उसे पहले सिर में दर्द होता है. सफेद कपड़े पहने उसे कोई साया दिखता है. उस के बाद वह बेहोश हो जाती है और फिर चोटी कट जाती है. कहींकहीं यह अफवाह भी थी कि बाल कटने के 3 दिन बाद महिला की मौत हो जाती है.

इस तरह की अफवाहें व्यापक स्तर पर फैल रही है. पुलिस में  सूचना दी जा रही है पर असलियत कुछ निकल कर नहीं आ रही है. 2-4 घटनाओं के अलावा अफवाहें ज्यादा परोसी जा रही हैं. घटनाओं में घर के किसी सदस्य का शामिल होना पाया गया है. खास बात यह है कि बाल काटने की घटनाएं और अफवाहें अधिकतर कम पढेलिखे, गरीब लोगों से जुड़ी हुई सामने आ रही हैं.

इन अफवाहों से एक ऐसे भय का माहौल फैल गया है कि लोगों ने बचने के लिए अपने घरों में टोनेटोटके करवाने शुरू कर दिए. घरों के आगे हल्दी के छापे, नीम की टहनी टांकने, सूखा चमड़े का जूता लगाने से ले कर पूजापाठ, हवन, कीर्तन तक करवाए जा रहे हैं. असल में यह उसी तरह की घटना है जिस तरह कुछ समय पहले समूचे देश और विदेश तक गणेश की मूर्ति द्वारा दूध पीने की अफवाह फैली थी. चमत्कार देखने के लिए मंदिरों में भीड़ उमड़ पड़ी थी.

बाल कटने की घटनाओं के पीछे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ज्यादातर घटनाएं, अफवाहें कमजोर दिमाग की औरतों की वजह से फैल रही हैं. जिन इलाकों से इस तरह की बातें सामने आ रही हैं वहां औरतें और पुरुष शिक्षित नहीं हैं. भय की वजह से औरतों की मनोस्थिति में बाल कटने के ख्याल से उन्हें भूत, चुडैल जैसे साए दिखने का एहसास होने लगता है पर असल में ऐसा होता नहीं है.

कहींकहीं खुंदक में बाल घर के ही किसी सदस्य द्वारा काट लिए जाते हैं जिस से औरत ज्यादा भयभीत हो जाती है और मामला पुलिस तक पहुंच जाता है. असल में इस तरह की अफवाहों के पीछे अशिक्षा, अंधविश्वास तो होता ही है, औरत की आजादी का सवाल भी छिपा हुआ है. बाल घर में ही कोई काट रहा है तो जाहिर है औरत को किसी न किसी तरह डरा कर, दबा कर रखा जाए. उसे बाहर न निकलने दिया जाए. इस के पीछे स्वार्थ और दकियानूसी सोच है.

ऐसी अफवाहों के पीछे एक अर्थशास्त्र जरूर रहता है जिस से निश्चित ही भय से बचने के उपाय बताए जाते हैं. जिस से उपाय बताने वाले पंडे, पुजारियों, मौलवियों को फायदा होता है. गणेश के दूध पीने की अफवाह फैलने से मंदिरों की तिजौरियां और दानपात्र भर गए थे. धर्म का धंधा मंदा न पड़े इसलिए समयसमय पर इस तरह की अफवाहों का हथकंडा धर्म की मार्केटिंग की एक रणनीति का हिस्सा होता है.

भूमि के टायलेट में घुस गए रणवीर और फिर..

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की फिल्म ‘टायलेट : एक प्रेम कथा’ जल्द ही बड़े पर्दे पर नजर आने वाली है. अक्षय और भूमि फिलहाल इसी के प्रमोशन में जुटे हैं. फिल्म के प्रमोशन के लिए रणवीर सिंह भी आगे आए हैं.

रणवीर ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है जिसमें वह फिल्म की हीरोइन भूमि पेडनेकर का वाशरूम इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं. और जब भूमि उनसे पूछती हैं तो वह कहते हैं कि देश में टायलेट्स की काफी कमी है. इसीलिए उन्होंने भूमि का टायलेट यूज किया है.

दरअसल ये वीडियो फिल्म के प्रमोशन के लिए ही बनाई गई थी. बता दें कि इससे पहले अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम की रिलीज से पहले रणवीर ने अक्षय की फिल्म का प्रमोशन कुछ अलग अंदाज में किया था जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल भी हुआ था.

इस वीडियो को देख आपको हंसी तो खूब आएगी लेकिन इस वीडियो में बताई जा रही बात को भी आप काफी हद तक समझ पाएंगे.

हाल ही में वरुण धवन ने भी अपने इंस्टाग्राम अकांउट पर एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें वह अपने जिम इंस्ट्रक्टर के साथ नजर आ रहे हैं लेकिन एक्सरसाइज करते हुए अचानक वरुण कहते हैं कि मुझे टायलेट जाना है लेकिन उनके इंस्ट्रक्टर उन्हें रोकते हैं और कहते हैं तुम अभी नहीं जा सकते 11 अगस्त को जाना.

इंस्ट्रक्टर के इस बात पर वरुण धवन भी चौंक जाते हैं और कहते हैं ऐसा क्यों? तो इंस्ट्रक्टर उन्हें जवाब में कहते हैं क्योंकि 11 अगस्त को ही अक्षय कुमार की फिल्म टायलेट एक प्रेम कथा रिलीज होने जा रही है. तो ये वीडियो दरअसल अक्षय कुमार की फिल्म के प्रमोशन के लिए वरुण धवन ने अपने इंस्ट्रक्टर के साथ मिलकर बनाया.

A post shared by Varun Dhawan (@varundvn) on

जब इस महिला क्रिकेटर ने कहा मुझे टीम से निकाल दो

भारतीय महिला टीम की अनुभवी तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी ने खुलासा किया कि वह वुमेंस वर्ल्ड कप के पहले दो मैचों में अपने खेल से इतना इतना ज्यादा नाखुश थी कि उन्होंने कोच तुषार अरोठे से उन्हें प्लेइंग-11 से बाहर करने के लिए कह दिया था.

झूलन को कोलकाता में बंगाल क्रिकेट संघ (कैब) द्वारा आयोजित एक समारोह में विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया. आईसीसी विमेंस वर्ल्ड कप में इंग्लैंड के खिलाफ फाइनल में झूलन ने 23 रन देकर तीन विकेट लिए थे. इस खिताबी मैच में भारतीय टीम को 9 रन से हार का सामना करना पड़ा था. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने झूलन को 10 लाख रुपये की पुरस्कार राशि से नवाजा.

सम्मानित होने के बाद झूलन ने कहा, ‘महिला वर्ल्ड कप के शुरुआती दिनों में मैं अपने प्रदर्शन से खुश नहीं थी. मैं अच्छी गेंदबाजी नहीं कर रही थी और इससे काफी निराश थी.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने अपने कोच तुषार अरोथे से बात की और कहा कि मैं अच्छी गेंदबाजी नहीं कर रही हूं, इसलिए आप अगले मैच के लिए मुझे अंतिम एकादश से हटा सकते हैं. यह मैच वेस्टइंडीज के खिलाफ था.’

अनुभवी गेंदबाज झूलन ने कहा, ‘कोच ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि वह मुझे मैदान पर टीम के साथ और गेंदबाजी क्षेत्र का नेतृत्व करते देखना चाहते हैं.’ इसके बाद से ही झूलन के फार्म में सुधार आया और उन्होंने विकेटों की झड़ी लगाई.

आगे उन्होंने कहा, ‘‘सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया का मैच हमारे लिए महत्वपूर्ण था. वह दुनिया की सबसे अच्छी टीम है. लैनिंग सबसे अच्छे क्रिकेटरों में से एक हैं. मैं चाहती थी कि मैं उन्हें सही जगह पर गेंद कराऊं. मैंने मिताली से कहा कि मैं उन्हें वैसी ही गेंद करना चाहती हूं जैसे कि लैनिंग को करना चाहूंगी और उसने मुझे फीडबैक दिया. सौभाग्य से सब कुछ हमारे हिसाब से हुआ.’’

राज्य से और पिछले 10 साल से कैब से मिले समर्थन के बारे में झूलन ने कहा, ‘मैं जब 2005-06 से मुंबई में एयर इंडिया से बंगाल आई थी, तो क्रिकेट के लिए अपनी तैयारियों को लेकर मिलने वाले अवसरों के लिए आश्वस्त नहीं थी. मुंबई में मैं एयर इंडिया में लडक़ों के साथ अभ्यास करती रहती थी.’

उन्होंने कहा कि जब बीसीसीआई और भारतीय महिला क्रिकेट संघ (डब्ल्यूसीएआई) एक साथ आए थे, तो उनके दिमाग में यहीं सवाल था कि क्या उन्हें कोलकाता में अभ्यास का अवसर मिलेगा. हालांकि, उनकी यह चिंता दूर हुई और पिछले 10 साल में कैब से उन्हें अच्छा समर्थन मिला. उन्हें आशा है कि भविष्य में उन्हें और भी अवसर मिलेंगे.

49 साल बाद भारतीय टीम के नाम हो सकता है ये रिकार्ड

मौजूदा भारत-श्रीलंका सीरीज में भारत ने गाल में खेले गए पहले टेस्ट मैच में श्रीलंका को 304 रन और कोलंबो में दूसरे टेस्ट मैच में पारी और 53 रन से पराजित किया था. भारतीय टीम की बेहतरीन फार्म को देखते हुए पल्लेकल में भी वह जीत के प्रबल दावेदार के रूप में उतरेगी.

अपने 85 साल के टेस्ट इतिहास में अब तक सिर्फ एक बार विदेशी सरजमीं पर किसी सीरीज में तीन टेस्ट मैच जीतने वाली भारतीय टीम को अब श्रीलंका के खिलाफ मौजूदा टेस्ट सीरीज में न सिर्फ लगभग 50 साल बाद यह उपलब्धि दोहराने बल्कि विदेश में पहली बार लगातार तीन टेस्ट मैच जीतने का सुनहरा मौका मिला है.

विराट ब्रिगेड के नाम होगा ये रिकार्ड

विराट कोहली की अगुवाई वाली टीम ने श्रीलंका के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की सीरीज के पहले दोनों मैच आसानी से जीते हैं और अगर वह पल्लेकल में 12 अगस्त से शुरू होने वाले तीसरे और अंतिम टेस्ट मैच में भी अपना विजयी अभियान बरकरार रखती है तो फिर यह पहला अवसर होगा जबकि भारतीय टीम विदेशी सरजमीं पर तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में क्लीन स्वीप करेगी.

भारत ने इससे पहले सिर्फ एक बार विदेशी धरती पर किसी सीरीज में तीन टेस्ट मैच जीते हैं. मंसूर अली खां पटौदी की अगुवाई वाली टीम ने फरवरी-मार्च 1968 में न्यूजीलैंड को चार टेस्ट मैचों की सीरीज में 3-1 से हराया था. हालांकि इस दौरान टीम पहला टेस्ट मैच जीतने के बाद क्राइस्टचर्च में दूसरा टेस्ट मैच हार गयी थी. इसके बाद भारत ने वेलिंगटन और औकलैंड टेस्ट जीते थे.

1986 में भी मिला था ऐसा मौका

मौजूदा सीरीज से पहले भारत को 1986 में इंग्लैंड में तीन टेस्ट मैचों की सीरीज जीतने का मौका मिला था लेकिन कपिल देव की टीम पहले दोनों टेस्ट मैच जीतने के बाद तीसरे टेस्ट को ड्रा करा बैठी थी.

पाकिस्तान के खिलाफ 2004 में पहला टेस्ट मैच जीतने के बाद भारत दूसरा मैच हार गया था लेकिन उसने तीसरा टेस्ट जीतकर सीरीज अपने नाम की थी.

विदेश में इन दो टीमों को कर चुके हैं क्लीन स्वीप

अगर हम विदेशों में क्लीन स्वीप की बात करें तो भारत अब तक सिर्फ बांग्लादेश और जिम्बाब्वे के खिलाफ ही यह करिश्मा कर पाया है लेकिन तब सीरीज एक या फिर दो टेस्ट मैचों तक सीमित थी.

भारतीय सरजमीं पर किया क्लीन स्वीप

हालांकि भारतीय टीम अपनी सरजमीं पर इससे पहले तीन या इससे अधिक टेस्ट मैचों में क्लीन स्वीप कर चुका है. भारतीय टीम ने आस्ट्रेलिया को चार मैचों की सीरीज में 4-0 से हराया था. मोहम्मद अजहरूद्दीन की टीम ने 1993-94 में इंग्लैंड और श्रीलंका का तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में सूपड़ा साफ किया था.

कोहली की अगुवाई में टीम ने पिछले साल न्यूजीलैंड के खिलाफ यही करिश्मा दोहराया था. पिछले साल ही भारतीय टीम ने इंग्लैंड को पांच मैचों की सीरीज में 4-0 से हराया था जबकि 2015 में उसने दक्षिण अफ्रीका को चार मैचों की सीरीज में 3-0 से शिकस्त दी थी.

 

विराट ने स्टीव वा को छोड़ा पीछे

विराट की ये लगातार आठवीं सीरीज जीत है. जिसके बाद लगातार टेस्ट सीरीज जीत के मामले में विराट ने पूर्व आस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव वा को पीछे छोड़ दिया. जिन्होंने अपने करियर में लगातार सात सीरीज जीती थीं.

विराट ने 2015 से 2017 के बीच 8 टेस्ट सीरीज में श्रीलंका, साउथ अफ्रीका, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका को मात दी.

सबसे ज्यादा सीरीज जीतने का रिकार्ड पूर्व आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पान्टिंग के नाम है, जिन्होंने साल 2005 से 2008 के बीच लगातार 9 सीरीज जीती थीं. पान्टिंग की बराबरी करने से विराट केवल एक सीरीज जीत से दूर हैं.

श्रीलंका में दो टेस्ट सीरीज जीतने वाले पहले भारतीय कप्तान बने कोहली

कोलंबो टेस्ट मैच के बाद विराट ऐसे पहले भारतीय कप्तान बन गए हैं, जिन्होंने श्रीलंका में दो टेस्ट सीरीज जीता है. भारत ने 2015 में विराट की कप्तानी में 2-1 से सीरीज जीती थी.

टेस्ट इतिहास में ये पहला मौका भी है, जब भारत ने श्रीलंका में हो रही टेस्ट सीरीज में 2-0 की बढ़त हासिल की है. वहीं श्रीलंकाई मैदान पर भारत की ये लगातार चौथी टेस्ट जीत है. पिछले दोनों मैच भारत ने 2015 की सीरीज में जीते थे.

पल्लेकल में दोनों टीमों का आंकड़ा

भारत इससे पहले कभी पल्लेकल में टेस्ट मैच नहीं खेला है जबकि श्रीलंका ने यहां पांच टेस्ट मैच खेले हैं उनमें से एक में उसे हार और एक में जीत मिली है जबकि बाकी तीन मैच ड्रा रहे हैं. भारत ने पल्लेकल में हालांकि एक वनडे और एक टी20 मैच खेला है और दोनों में उसने जीत दर्ज की है.

गुजरात में अहमद पटेल के बहाने इमरजेंसी की रिहर्सल

गुजरात राज्यसभा चुनाव वाकई बड़ा दिलचस्प था,  रात 2 बजे के कुछ पहले घोषणा हो पाई कि दिग्गज कांग्रेसी, सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल आखिरकार आधे वोट से विजयी हो गए. दिन भर अस्सी के दशक के जासूसी उपन्यासों की तर्ज पर न्यूज चेनल्स पर सिर्फ रोमांस नाम के अनिवार्य तत्व को छोडकर रहस्य, रोमांच, कानून, दलीलें और शाकाहारी हिंसा वगेरह सब अनवरत प्रवाहित होता रहा, जिसका लुत्फ भी टीवी से चिपके लोगों ने खूब उठाया और ड्रामा खत्म होने के बाद अंगड़ाई और जम्हाई लेते, इस आत्म आश्वासन यानि बेफिक्री के साथ सो गए कि अभी 26/6/1975 जैसा आपात काल नहीं लगा है.

बात या कथानक बड़ा मामूली राजनीति के लिहाज से था, जिसके तहत भाजपा ने कुछ कांग्रेसी विधायक खरीदते उसी की पार्टी का एक बागी उम्मीदवार खड़ा करते अहमद पटेल को राज्य सभा में पहुचने से रोकने की कोशिश की थी. विधायकों का ईमान और स्वाभिमान कायम रखने की गरज से कांग्रेस अपने 44 विधायकों को बेंगलुरु तरफ एक फाइव स्टार रिसोर्ट में ले गई थी और एन वोटिंग के वक्त लाकर मूछों पर ताव दिया था. अब उनसे बड़ी मूछ तो अमित शाह की है जिन्होने आंखो ही आंखो में 2 कांग्रेसी विधायकों को अपना ईमान बेचने राजी कर लिया. पर ये नौसिखिये एमएलए कथित भुगतान के प्रति आश्वस्त होने मत पत्र अमित शाह को खुले आम दिखा बैठे.

बस गड़बड़ यहीं से शुरू हुई. कुछ कांग्रेसियों को याद आया कि यह कृत्य तो नियम विरुद्ध है और एक वक्त में ऐसे वोट कोर्ट तक रद्द कर चुकी है तो वे सीधे निर्वाचन आयोग जा पहुंचे, जिससे बिके ईमान बाले ये वोट खारिज हो जाएं और अहमद पटेल एक दफा फिर राज्य सभा पहुंच जाएं. ग्रहण के चलते इस बार का रक्षा बंधन बड़ा नीरस सा रहा था, जिससे दुखी टीवी रिपोर्टर्स ने कैमरे गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक में फिट कर रखे थे. इस फिटनेस में चुनाव आयोग के इस फैसले ने नई जान फूंक दी कि 2 ईमान रहित विधायकों के वोट गिनती में नहीं लिए जाएंगे. बस फिर शुरू हुआ असल ड्रामा जो खरीद फरोख्त की हदें पार करते लोकतन्त्र नाम की व्यवस्था पर बार बार आया.

दोनों दलों के प्रवक्ताओं और नेताओं के अलावा एंकरनुमा पत्रकारों ने भी अभी तक का संचित ज्ञान स्क्रीन पर उड़ेल दिया. खूब बहसें हुईं, सवाल जवाब हुये, आरोप प्रत्यारोप लगे और सभी एक दूसरे को अपनी गिरहवान में झांकने का सनातनी मशवरा देते रहे.  अल्प मात्रा में अशिष्टता भी हुई, जिससे दर्शकों का मनोरंजन ही हुआ. इधर अमित शाह के मतगणना स्थल पर धूनी रमा कर बैठे रहने से कइयों की बाईं आंख फड़कने लगी थी, जिसे अपशगुन का संकेत माना जाता है.

दिल्ली में देर रात अपना सुख और डिनर छोडकर दफ्तर आए चुनाव आयोग के तीन कमिश्नरों ने मतगणना के आदेश दिये, तो भाजपा को अपनी नाक कटती लगी, जिसे कम से कम कटाने उसने मतगणना मे अड़ंगा डाला कि उसकी शिकायत पर भी कारवाई हो, पर तब तक कमिश्नरों के कारिंदे साहबों की फाइलें वगेरह उनकी गाड़ियों में रखते उन्हे जाने हरी झंडी दे चुके थे.

गांधीनगर मे वन डे क्रिकेट मेच सरीखा रोमांच दिखने लगा था. इधर एंकरों ने भी हल्ला मचाना शुरू कर दिया था कि क्या भाजपा के चाणक्य अमित शाह यह बाजी जीत पाएंगे या इस बार पार्टी का असली चेहरा सामने आएगा. यहां तक बात चिंता की नहीं थी, पर मतगणना के आदेश की अवहेलना पर भाजपाई उतारू हो आए तो चेनल्स पर चर्चा यह होने लगी कि क्या अब फैसला सुबह अदालत खुलने पर होगा. तमाम हंसी ठिठोली से परे यह वक्त वाकई भयभीत कर देने वाला था कि अगर भाजपाइयों ने मतगणना नहीं होने दी तो इसका अर्थ और अंजाम क्या होगा. गांधीनगर का रिटर्निंग आफ़ीसर भाजपा के इशारे पर नाच रहा है, यह बात तो वोटिंग के तुरंत बाद सभी को समझ आ गई थी, पर अमित शाह का लगातार बजता डमरू उसे सांस वाली हवा न तो उगलने दे रहा था और न ही ढंग से निगलने दे रहा था.

अब तक इस टीवी नोवल के पन्ने पलटते लोग भी घबराने लगे थे कि यह क्लाइमेक्स तो उम्मीद से परे है. केंद्र के दर्जन भर मंत्री भागा दौड़ी करते  जीत का रास्ता तलाश रहे थे और स्क्रीन पर बैठे भाजपा प्रवक्ताओं की टीम इसे अपना हक बता रही थी. कहीं यह हक सुबह होते होते इन्दिरा गांधी के 1975 के हक जैसा न हो जाये, इस बात से डरे लोग बेमन से टीवी का खटका बंद करने ही जा रहे थे कि एंकर्स ने सुखद सूचना यह दी की मतगणना शुरू होने वाली है और जल्द ही नतीजे स्क्रीन पर होंगे, तब तक आप हमारे साथ बने रहिए. इस पर  लोगों ने नींद का लोभ और मोह छोडते अमित शाह और स्मृति ईरानी की जीत की खबर के साथ अहमद पटेल की आधे वोट से जीत का एलान भी सुना.

फिर शुरू हुआ कांग्रेसी जश्न और ये दावे कि 2017 के चुनाव में वे भाजपा को इसी तरह  गुजरात से पूरी तरह उखाड़ फेंकेगे. अब जो भी हो लेकिन आधा घंटे की मतगणना न होने देने की भाजपाई जिद जो कानून, नियमों और एक संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा बताती हुई थी हल्के में नहीं ली जा सकती और न ही इसे नजरंदाज किया जा सकता. सत्तारूढ़ दल की मनमानी और बेलगाम होने का खामियाजा देश एक बार भुगत चुका है, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौके बेमौके कर ही देते हैं पर गुजरात राज्यसभा का चुनाव और मतगणना तात्कालिक ही सही किसी इमरजेंसी से कमतर तो नहीं कहे जा सकते.

धर्म के नाम पर यौन दुराचार कब तक चलता रहेगा

धर्म अगर सदाचार सिखाता तो कैथोलिक ईसाई चर्च के मुखिया पोप को पादरियों द्वारा यौन दुराचार किए जाने के उन 2,000 मामलों को सुनना न पड़ता जो लोगों ने दक्षिण अमेरिका और यूरोप से वैटिकन के पलड़े में डाले हुए हैं. हजारों शिकायतें चर्चों में और पड़ी हैं, उन में से कुछ को वर्षों दबाए रखा जाता है तो कुछ पर लेदे कर फैसला किया जाता है.

अविवाहित रहने का संकल्प लेने वाले पादरी और अन्य कैथोलिक चर्चों के पुजारियों द्वारा यौन दुराचार किए जाने की लाखों पीडि़ताएं हैं पर ज्यादातर चुप ही रहती हैं क्योंकि पीडि़ताएं समझती हैं कि यह उन के पापों की सजा है. हिंदू धर्म की तरह ईसाई धर्म में भी पाप और पुण्य की मजेदार कहानियां होती हैं जिन का असल अर्थ यह है कि हर भक्त पापी है. इसलिए वह जम कर पुजारियों की सेवा करे, मन और धन से ही नहीं, तन से भी.

धर्म की खासीयत यही रही है कि हर प्रकार के दुराचार के बावजूद यह न केवल पिछले 4,000 वर्षों से किसी न किसी रूप में हर समाज में मौजूद है, बल्कि फलफूल भी रहा है. मानव समाज की सभ्यता की देन धर्म नहीं है. पर उस सभ्यता का लाभ कुछ जम कर उठा सकें, इस में धर्म की कोशिश सफल रही है.

तकरीबन दुनियाभर में यौन दुराचार की पीडि़त औरतें आमतौर पर पादरियों, मुल्लाओं और पंडों के खिलाफ नहीं बोलतीं क्योंकि उन्हें तो धर्म के नाम पर बेपैसे का गुलाम बना रखा गया है. शरीर के माध्यम से वे कुछ राहत पा जाती हैं. चाहे चर्च या मंदिर में रहने वाली हों या घरों में. औरतों पर धर्म का मानसिक शिकंजा इतना ज्यादा है कि वे यौन संबंधों के बदले जरा सा भी सुख पाने पर अपने को धन्य समझती हैं.

आजकल विश्वभर में कैथोलिक व प्रौटैस्टैंटी चर्चों की ही नहीं, अन्य ईसाई संप्रदायों की सताई औरतें एक बड़ी मुसीबत बन गई हैं क्योंकि हर देश में धर्मरहित कानून व्यवस्था भी बन गई है जहां धर्म के कानून के ऊपर न्यायालय हैं, जिन में शिकायतें की जा सकती हैं.

हाल के वर्षों में धर्म की पुनर्स्थापना के नाम पर हर देश में कानूनों को धर्म के नीचे रखने की कोशिश की जा रही है. इसलामिक स्टेट पश्चिम एशिया में चला और वहां नागरिक कानून व्यवस्था को हटा कर खलीफा का कानून लागू कर दिया गया, जिस के तहत धार्मिक फौज को पैसे, औरतें और मनमानी करने के सुख मिलने लगे. भारत में गौरक्षकों और रोमियो भक्षकों को मिले अनैतिक अधिकार आज सरकार के लिए ऐसे कर्मठ सिपाही मुहैया करा रहे हैं जिन की वजह से सरकार मनमानी कर पा रही है. यही पोपों के युग में सदियों तक होता रहा है.

पिछले 200 वर्षों में जो सवाल खड़े करने के अधिकार जनता को मिले हैं उन्हीं का नतीजा है कि पोप को रोम के वैटिकन में सुप्रीम कोर्ट की तरह पूरा एक कार्यालय चर्च के पादरियों के खिलाफ आई दुराचार की शिकायतें सुनने के लिए बनाना पड़ा है.

कट्टर डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी इसलिए चुनाव जीते हैं क्योंकि धार्मिक शक्तियों ने अपने प्राचीन अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए और मेहनत करनी शुरू कर दी है. वे रंग, जाति, नस्ल, भाषा किसी का भी प्रयोग कर भक्तों पर होने वाले खुद के अत्याचारों व अपराधों को दबा कर रखना चाहते हैं.

लैपटाप खरीदने से पहले जरूर पढ़ें ये खबर

मौजूदा समय में बाजार में कई लोकप्रिय और क्वालिटी ब्रैंड्स के लैपटाप उपलब्ध है. सभी कंपनियों के लैपटाप की अपनी एक अलग खासियत होती है. यूजर्स के लिए लैपटाप खरीदने के भी कई कारण हो सकते है. हर यूजर्स की अपनी-अपनी जरूरत होती है जिसके हिसाब से वह लैपटाप खरीदता है. अगर आप भी लैपटाप खरीदने जा रहे हैं तो इन टिप्स को दिमाग में रख कर ही लैपटाप खरीदें.
जरूरत जानें

अगर आप एक लैपटाप खरीदने की योजना बना रहे हैं तो हमारा सुझाव है कि सबसे पहले अपनी जरूरत को जान लें. सभी लैपटाप की कीमत उनके फीचर्स को ध्यान में रख कर रखी जाती है. यानि कि जितने हाई फीचर्स उतनी ज्यादा कीमत.

जानकारी

लैपटाप खरीदते समय यूजर्स कई कंपनियों के ब्रैंड को देखकर कनफ्यूज हो जाते है. ऐसे में जरूरी हैं कि यूजर्स लैपटाप खरीदने से पहले सभी कंपनियों के लैपटाप की अच्छे से सारी जानकारी ले लें.

इंटरनेट का सहारा

इस समस्या का समाधान आप आसानी से इंटरनेट से पा सकते हैं. यूजर्स अब नेट पर आसानी से विभिन्न ब्रैंड्स की तुलना कर सकते हैं. जिसके बाद यह खरीदार पर है कि वह अपनी जरूरत के हिसाब से किस लैपटाप को खरीदता है.

फीचर्स को समझें

लैपटाप खरीदते समय हर यूजर्स के दिमाग में उस डिवाइस के प्रोसेसर, डीवीडी प्लेयर, हार्ड डिस्क ड्राइव से लेकर चिपसेट, वायरलेस इंटरफेस आदि के बारे में सवाल रहते हैं. इसके अलावा लैपटाप के स्टैंडर्ड फीचर्स जैसे यूएसबी पोर्ट, सीरियल पोर्ट, और नेटवर्क पोर्ट्स के बारे में जानकारी लेना चाहते हैं.

नए माडल

बाजार में हर रोज नए-नए फीचर्स के साथ नए माडल उतारे जा रहे हैं. यूजर्स उन लैपटाप को खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं जो वजन में काफी हल्के होते हैं. जिसे वे आसानी से कहीं भी ले जा सकते हैं. लैपटाप के निर्माताओं द्वारा किए गए नए इनोवेटिव उपायों ने पिछले माडलों की तुलना में ज्यादा हाई माडलों की शुरुआत की है जो अधिक हाई-टेक फीचर्स के साथ आते हैं.

इन विदेशी खिलाड़ियों ने की भारतीय लड़कियों से शादी

अकसर विदेशी खिलाड़ी भारतीय लड़कियों के दीवाने हो जाते हैं. कुछ खिलाड़ी तो ऐसे हैं जिन्होंने भारतीय लड़कियों के साथ अपना घर बसा लिया. आज हम कुछ ऐसे ही खिलाड़ियों के बारे में आपको बता रहे हैं जिन्होंने विदेशी होते भी भारतीय लड़कियों के साथ शादी की.

इस फेहरिस्त में पाकिस्तान ही नहीं श्रीलंका, इंग्लैंड यहां तक की ऑस्ट्रेलिया तक के खिलाड़ी भी शामिल हैं.

शोएब मलिक-सानिया मिर्जा

पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक ने भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा से शादी की. अप्रैल 2010 में शोएब और सानिया शादी के बंधन में बंध गए. उनकी शादी हैदराबाद के एक होटल में हुई. इसे लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें भी हुई थी.

जहीर अब्बास-रीता लूथरा

पाकिस्तानी क्रिकेट के फेमस क्रिकेटर सैयद जहीर अब्बास ने भारतीय महिला रीता लूथरा से शादी की. पाकिस्‍तान के इस बेहतरीन बल्‍लेबाज और रीता की मुलाकात इंग्‍लैंड में हुई. रीता वहां पर पढ़ाई कर रही थीं. जहीर वहां पर काउंटी क्रिकेट खेलने आते थे. यही दोनों के बीच प्यार हुआ.

मुथैया मुरलीधर-नमधीमलार राममूर्ति

श्रीलंका के सफल फिरकी गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन ने चेन्नई की मधीमलार राममूर्ति से वर्ष 2005 में शादी की. मधीमलार, मलार हास्पिटल्स के स्वर्गीय डा. एस राममूर्ति और उनकी पत्नी डा. नित्या राममूर्ति की बेटी हैं. मुथैया और मधीमलार का एक बेटा भी है, जिसका नाम है नरेन.

शान टेट-माशूम सिंघा

आस्ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज शान टेट ने भारतीय महिला माशूम सिंघा से शादी की. उन्होंने 2014 में मुंबई में एक हफ्ते तक चले ग्रैंड वेडिंग वीक में शादी कर ली. शादी में जहीर खान और युवराज सिंह ने भाग लिया था.

मोहसिन खान-रीना राय

पाकिस्तान क्रिकेटर मोहसिन खान ने भारतीय अभिनेत्री रीना राय से शादी की. वो मुंबई आ गए थे. हालांकि फिर दोनों के बीच तलाक हो गया. मोहसिन वापस लौट गए.

ग्लेन टर्नर-सुखविंदर कौर गिल

न्यूजीलैंड के शानदार बल्लेबाज रह चुके ग्लेन टर्नर ने पंजाबी सुखविंदर कौर गिल से शादी की. ग्लेन जहां वर्तमान में न्यूजीलैंड क्रिकेट सिलेक्शन कमेटी के हेड हैं वहीं सुखविंदर न्यूजीलैंड में फेमस नेता हैं.

माइक बेअर्ली-माना साराभाई

भारत के मशहूर बिजनेसमैन गौतम साराभाई की बेटी माना साराभाई और इंग्‍लैंड टीम के कप्‍तान माइक बेअर्ली को एक-दूसरे से प्रेम हो गया था. मगर कई कोशिशों के बाद दोनों की शादी हुई. फिलहाल दोनों इंग्लैंड में रहते हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें