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किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी, अब कम ब्याज दर पर मिलेगा लोन

भारतीय रिजर्व बैंक ने किसानो के हित में एक अहम फैसला लिया है. किसानों को मिल रहे फसल लोन में कुछ सुधार किया गया है. किसानों को कम अवधि के लिए तीन लाख रुपये तक का फसल लोन 7 प्रतिशत की ब्याज दर पर मिलेगा. आरबीआई ने इसके लिए बैंकों को निर्देश जारी कर दिया है. साथ ही अब कम अवधि के फसल ऋण के लिए किसानों को आधार नंबर देना जरूरी होगा.

रिजर्व बैंक ने बैकों को जारी अधिसूचना में कहा है कि ब्याज छूट योजना का किसानों को फायदा देने के लिए सभी बैंकों को सुझाव दिया जाता है कि वे वित्त वर्ष 2017-18 में अल्पावधि का फसल ऋण देते समय आधार कार्ड अनिवार्य करें. आरबीआई ने कहा कि समय से पहले ऋण चुकाने वाले किसानों को ब्याज दर में तीन प्रतिशत की अतिरिक्त छूट दी जाएगी.

केंद्रीय कैबिनेट ने वित्त वर्ष 2017-18 के लिए ब्याज छूट योजना को जून की शुरुआत में मंजूरी दी थी. मंत्रिमंडल ने अल्पावधि फसल ऋण के ब्याज छूट के लिए 20,339 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी थी.

महिला क्रिकेट टीम पर भी है बीसीसीआई को ध्यान देने की जरूरत

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्वकप फाइनल मुकाबले में मेजबान इंगलैंड से हार जाने के बावजूद काफी सुर्खियां बटोरीं. भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कम से कम इसी बहाने चर्चा तो हुई. हार की मायूसी हर टीम व हर खिलाड़ी को होती है पर देखा जाए तो इस विश्वकप में हर मैच के साथ एक नया विजेता खिलाड़ी उभर कर निकला. हरमनप्रीत कौर, मिताली राज, पूनम राउत, स्मृति मंधाना, झूलन गोस्वामी जैसी खिलाडि़यों ने हर मैच में कुछ न कुछ कमाल किया. पर अनुभव से भरपूर इंगलैंड के खिलाडि़यों ने बाजी मार ली.

भारतीय महिला क्रिकेट की अनदेखी हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है. भेदभाव से परेशान हो कर पूर्व महिला क्रिकेटर एडुलजी ने बीसीसीआई के खिलाफ आवाज उठाई थी कि बीसीसीआई पुरुष क्रिकेटरों पर पानी की तरह पैसा बहाता है जबकि महिला क्रिकेटरों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करता.

यह सच भी है. आज भी महिला क्रिकेटरों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं. पैसे के मामले में वे पुरुष खिलाडि़यों से बहुत पीछे हैं. पुरुष क्रिकेटरों को एक टैस्ट मैच के लिए कम से कम 8-10 लाख रुपए मिलते हैं जबकि महिला खिलाड़ी को पूरी सीरीज के लिए मात्र 2-3 लाख रुपए ही मिल पाते हैं. मीडिया कवरेज अब तो थोड़ाबहुत मिल भी जाती है पहले तो अखबारों में कहीं एक कौलम में भी जगह नहीं मिलती थी जबकि पुरुष क्रिकेटरों के नाम पूरा पेज भरा होता है. महिला क्रिकेट मैच में स्टेडियम में दर्शक नहीं जुटते जबकि पुरुष क्रिकेट मैच में स्टेडियम खचाखच भरा होता है.

दरअसल, हमारा मर्दवादी समाज महिलाओं का सिर्फ शारीरिक सौंदर्य देखना पसंद करता है, उन का खेल प्रदर्शन नहीं. आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि टैनिस मैच को देखने के लिए मर्दों की भीड़ खूब होती है क्योंकि वहां टैनिस खिलाड़ी छोटेछोटे कपड़ों में होती हैं. यहां खेलप्रेमी जरूर होते हैं जो खेल को देखने जाते हैं पर ऐसी सोच वालों की भी कमी नहीं है जो टैनिस खिलाडि़यों के शारीरिक सौंदर्य व कपड़ों को देखने जाते हैं.

भेदभाव यहां भी है. भारतीय महिला क्रिकेट के मुकाबले महिला टैनिस खिलाडि़यों को भी खूब पैसा मिलता है. क्योंकि टैनिस खेल में ग्लैमर दिखता है और आजकल ग्लैमरहीन खेलों को कोई पूछता नहीं. यह बात पुरुषों के खेलों में लागू नहीं होती.

गाहेबगाहे महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज इस दर्द को बयां भी कर चुकी हैं कि यदि टीवी व अखबारों में महिला क्रिकेट को तवज्जुह मिलती तो शायद महिला क्रिकेट को देखने के दर्शक भी जुटते और आयोजक व प्रायोजकों की भी कमी नहीं रहती.

बीसीसीआई को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के साथसाथ घरेलू महिला क्रिकेट मैच पर भी ध्यान देना होगा. तकनीक के मामले में भी भारतीय महिला क्रिकेट टीम काफी पीछे है, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बीसीसीआई इन पर ध्यान नहीं देती. इस टीम में काफी युवा खिलाड़ी हैं जिन के पास अनुभव की कमी है. इन खिलाडि़यों को ज्यादा मैच खेलने का मौका मिलेगा तो अनुभव भी होगा. अनुभव की कमी के कारण भारतीय महिला क्रिकेट टीम विश्वकप जीतेजीतते हार तो गई पर यह अच्छी बात है कि कम से कम इसी बहाने लोगों की जबां पर आज महिला क्रिकेट टीम की चर्चा तो हो रही है.

पाला बदलवाने की भाजपा की नीति और नैतिकता का दावा

केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी जीतों के साथसाथ विधायकों, सांसदों और पार्षदों की खरीदफरोख्त को भी नेतृत्व करने का एक शस्त्र बना लिया है. रोचक बात यह है कि दूसरे जनप्रतिनिधियों को अपने पाले में लाने की तिकड़म के बावजूद उस का दूसरों से ज्यादा नैतिक होने का दावा बरकरार है.

भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, अन्नाद्रमुक, बहुजन समाज पार्टी को काले रंग से पोता जा रहा है, जबकि चुने हुए लोगों को फोड़ना भी भ्रष्टाचार ही है.

वैसे, यह शासन की बहुत पुरानी तकनीक है और हर समाज, देश, क्षेत्र व काल में अपनाई गई है. कहानियों के अनुसार, ईसा मसीह को पकड़वाने में उन्हीं के निकटवर्ती लोगों में से एक का हाथ था और राम द्वारा रावण को हराने में उसी के भाई का रहस्य खोलना था जिसे पौराणिक कथा के अनुसार राजा बना दिया गया.

नैतिकता का तो तकाजा है कि लोकतंत्र में शासक न तो पैसे का भ्रष्टाचार करें न चुने लोगों का. आज लगभग हर देश में वोट दल को मिलते हैं, वोट पाने वाले प्रतिनिधि को नहीं. देशों के विधानमंडलों में बैठे लोग अपनी पार्टी की नीति के कारण जीतते हैं. उन का अपना व्यक्तित्व उन की जीत में 5 प्रतिशत महत्त्व का भी नहीं होता. यदाकदा ही पार्टी से रूठ कर कोई स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ कर जीत पाता है.

आज देश में एक बार फिर आयारामों, गयारामों की लहर फैलाई जा रही है. वास्तविक सत्ता के निकट आने का मोह बहुत कमों को ही मिलते अवसर को लपकने से नैतिकता के नाम पर रोकता है. बिहार, उत्तर प्रदेश या गुजरात में जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध चुनाव लड़ कर जीत हासिल की उन का भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिला लेना राजनीतिक चतुराई भले ही हो पर इस से संदेश यही मिलता है कि अंधे इश्क और अंधी राजनीति में सब जायज है.

ऐसा नहीं है कि हमारी जनता दूध की धुली है कि मतदाताओं के साथ इस तरह की हुई धोखाधड़ी पर वह असल में नाराज हो. हमारा चारित्रिक व्यक्तित्व ही काले रंग से भरा है. हमारे यहां सड़कों पर गंद फैलाना, अतिक्रमण करना, घर में ही हिंसा करना, निरीह औरतों पर क्रूरता दर्शाना, गरीबों को लूटना सब जायज है. दहेज, लिंग परीक्षण, परीक्षा में अंक बढ़वाना, कोचिंग कक्षाएं, सरकारी दफ्तरों में देरी और रिश्वतखोरी उसी चरित्र का हिस्सा हैं जो चुने लोग दल बदल कर दर्शाते हैं.

आश्चर्य यही है कि सत्ता में बैठी शक्तिशाली पार्टी के खिलाफ भी विपक्ष पिछले 70 सालों में पनपता ही नहीं रहा, जनता के बल पर बीचबीच में सत्ता का स्वाद पाता रहा. चरित्र, नैतिकता कहीं तो है ही.

नए राष्ट्रपति के बहाने दलितों को अपने खेमे में लाने का काम करेगी भाजपा

भारतीय जनता पार्टी के कर्णधारों नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति चुनवा कर पार्टी पर लगे दलितविरोधी होने के दाग को मिटाने का प्रयास किया है. नए राष्ट्रपति ने जिस सहजता और संयम से नए कार्यभार को संभाला है उस से पार्टी को संतोष हुआ होगा कि उस का चयन गलत नहीं है. दलित, पिछड़ों को भाजपा के खेमे में लाने का काम अब वह और तेजी से कर सकेगी.

राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकार बहुत अधिक नहीं होते पर फिर भी इस पद पर बैठा व्यक्ति प्रधानमंत्री को भी संवैधानिक स्थान ही दे, यह दिखना जरूरी है. रामनाथ कोविंद चाहे नरेंद्र मोदी के कारण राष्ट्रपति बने हों पर उन्हें पद की गरिमा के अनुसार ही काम करना होगा. रामनाथ कोविंद कभी राजनीतिक विवादों में नहीं घिरे, इसलिए उन्हें दूसरे दलों का समर्थन मिल सकता है, ऐसा लगता है.

नए राष्ट्रपति का पहला भाषण विवादों से ऊपर रहा और थोड़ा उत्साहवर्धक रहा है. उस में उस पार्टी की नीतियों की गंध नहीं थी जिस ने उन्हें जिताया है. यह देश के लिए सुखद बात है. एक अति साधारण घर से आने के साथ वे देश के करोड़ों नागरिकों के लिए चाहे कुछ खुद न कर पाएं, पर बहुतों को यह संतोष रहेगा कि राष्ट्रपति भवन में उन के  जैसा व्यक्ति बैठा है.

नरेंद्र मोदी ने रामनाथ कोविंद का नाम चुन कर पार्टी के लिए चाहे जो भी किया हो, नए राष्ट्रपति की छवि उन्हें बहुत से विवादों से दूर रखेगी, इतना पक्का है. इस से पहले कांग्रेस ने कई ऐसे लोगों को राष्ट्रपति भवन में बैठाया है जो देश के संपन्न, समर्थ वर्ग की आंखों में किरकिरी बने रहे. नए राष्ट्रपति लगता नहीं है कि किन्हीं विवादों के निशानों पर आएंगे और विरोधी भी उन पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने से हिचकिचाएंगे.

बेतुका है विवाह विधेयक, आप भी जानिए आखिर क्या है इसका मसौदा

लोकसभा में अगर द मैरिज (कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऐंड प्रिवैंशन औफ वैस्टफुल एक्सपैंडीचर) विधेयक 2016 पारित हो पाया तो नोटबंदी के बाद अब आम लोगों को नई परेशानियां झेलनी होंगी. बड़े जोशोखरोश से इस विधेयक का मसौदा कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन यादव ने तैयार किया है.

यह मसौदा दिलचस्प भी है और चिंतनीय भी. इस मसौदे से जाहिर होता है कि सस्ती वाहवाही लूटने के चक्कर में हमारे माननीय एकदूसरे से पिछड़ना नहीं चाहते. वे इस बाबत कानून के ऐसेऐसे खाके खींच रहे हैं जिन्हें देख सिर पीट लेने की इच्छा होने लगती है कि कानून आखिर न्याय के लिए हैं या आम लोगों की रोजमर्राई जिंदगी दुश्वार बनाने के लिए. रंजीत रंजन का उत्साह बेवजह नहीं है. दरअसल, नोटबंदी की मार और परेशानियों को आम लोगों ने सब्र से झेल लिया है तो अब हर नेता अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा कर जता रहा है कि समाज और देश के लिए क्या अच्छा होगा.

यह है मसौदा

प्रस्तावित विवाह कानून के मसौदे में घोषित मंशा शादियों में फुजूलखर्ची रोकने की है. बकौल रंजीत, इस विधेयक का मकसद सादगीपूर्ण शादियों को बढ़ावा देने का है. इस से शादियों में किया जाने वाला बेवजह का खर्च रुकेगा. लोग शादियों पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं, इस से गरीब लोगों पर ज्यादा खर्च करने का दबाव बढ़ता है.

संसद पहुंच कर एकाएक ही ज्ञानी हो गईं रंजीत के पास आइडियों की भरमार है. चूंकि कह देने मात्र से लोग मानेंगे नहीं, इसलिए इस में उन्होंने जोड़ा है कि अगर कोई परिवार शादी में 5 लाख रुपए से ज्यादा की राशि खर्च करता है तो उस परिवार को इस की घोषणा सरकार के सामने करनी होगी और राशि का 10 फीसदी हिस्सा संबंधित कल्याण कोष में देना होगा. ये वे कल्याण कोष हैं जो सरकार द्वारा गरीबों की मदद के लिए बनाए जाते हैं.

अगर विधेयक पारित हुआ तो हर विवाह का पंजीकरण 2 महीने के भीतर कराना होगा और इतना ही नहीं, शादियों में खाने की बरबादी रोकने के लिए सरकार रिसैप्शन यानी प्रीतिभोज में परोसे जाने वाले पकवानों की भी सीमा तय कर सकती है. अलावा इस के, शादी करने वाले परिवार को सरकार को यह जानकारी भी देनी होगी कि कितने नातेरिश्तेदार और परिचित आमंत्रित किए गए.

होंगी परेशानियां

 लोगों की प्राइवेसी में सेंधमारी करते इस विधेयक की चर्चा इसलिए भर है कि वाकई लोग अब शादियों में दिल खोल कर खर्च करते हैं. लेकिन इस से किसी सांसद या नेता के पेट में मरोड़ें उठें, तो उस की मंशा पर शक होना भी स्वाभाविक बात है.

विधेयक कानूनी जामा पहन पाया तो अब हंसीखुशी शादी करने वालों को पूरा हिसाबकिताब सरकार को देना पड़ेगा कि उन्होंने किस काम में, कितना खर्च किया. कितने फूफाजी, मामाओं और मौसाओं को बुलाया यानी अब या तो उन्हें शादी में एक हाजिरी रजिस्टर रखना पड़ेगा या फिर विवाह समारोह की सीडी बनवा कर सरकार को देनी पड़ेगी जिस से सरकार यह तय कर पाए कि शादी धार्मिक रीतिरिवाजों के साथसाथ कानून के मुताबिक ही हुई है.

नसबंदी और नोटबंदी के बाद अब पकवान बंदी चलेगी. लोग चाह कर भी मेहमानों का स्वागत उतने से ज्यादा पकवानों से नहीं कर सकते जितने सरकार तय कर देगी या जिन्हें देख यह लगेगा कि इतने या उतने पकवानों की तादाद 5 लाख रुपए की सीमा में आ ही नहीं सकते. अगर पनीर की 2 सब्जियां बनीं, तो तय है हिसाब देने में फर्जीवाड़ा हुआ है लिहाजा, वर या वधु के अभिभावकों से जुर्माना भरवा लिया जाए जिस से किसी गरीब की लड़की की शादी सरकार करवा सके.

कोई सांसद या सरकार यह कभी नहीं कहती कि महंगाई बढ़ रही है. कहा यह जाता है कि लोग अब ज्यादा खर्च करने लगे हैं. तो जाहिर है वे टैक्सचोर या लुटेरे हैं जिन पर नकेल कसने के लिए ऐसे मूर्खतापूर्ण कानूनों का होना जरूरी है.

बात यहीं खत्म नहीं होगी, लोगों को असल दिक्कत तब पैदा पैदा होगी जब वे झक मार कर खर्चे का ब्योरा ले कर सरकार द्वारा तय किए विभाग में पहुंचेंगे और वहां बाबू नदारद मिलेगा. मिल भी गया तो दोचार चक्कर लगाए बगैर तो वह मानने से रहा. गाज उस वक्त भी गिरेगी जब कुछ दिनों बाद सरकार की तरफ से यह नोटिस आएगा कि आप के द्वारा दिया गया हिसाब गलत है. शादी में 5 लाख नहीं, बल्कि 8 लाख रुपए खर्च होना लग रहा है. इसलिए आप इस नोटिस के इतने दिनों के अंदर 80 हजार रुपए जमा करें वरना…

जाहिर है लोग एक वकील कर अदालतों के चक्कर लगाएंगे और जज के सामने गिड़गिड़ाएंगे कि हुजूर, हम ने तो सही हिसाबकिताब दिया है. सरकार खामखां इस मैरिज टैक्स वसूली के बाबत हमें परेशान कर रही है.

अब यह जज साहबों की जिम्मेदारी होगी कि वे इंसाफ छोड़ मुनीम की तरह दिए गए खर्च का ब्योरा देखें और तय करें कि झूठ कौन बोल रहा है. सरकार हारी तो उस का कुछ नहीं बिगड़ना, दूल्हे या दुलहन के मातापिता हारे तो उन्हें चपत लगानी तय है. सरकार की तरफ से लड़ रहे वकील को जनता के करों से मिले टैक्स का पैसा मिलता है, आम घर वाले को अपनी मेहनत की कमाई देनी पड़ती है.

क्या है मकसद

 सस्ती लोकप्रियता के लिए नेता हमेशा ही गरीबों के भले की ढाल लेते हैं, यह विधेयक इस का अपवाद नहीं है. वाहवाही लूटने की गरज से यह प्रावधान रख दिया गया है कि 5 लाख रुपए से ऊपर के खर्च का 10 फीसदी हिस्सा किसी गरीब लड़की की शादी में लगाया जाएगा.

यह, दरअसल, दानदक्षिणा वसूलने जैसा कदम है जिस का नाम टैक्स या जुर्माना होगा. सौ में से 2-4 गरीब लड़की वालों से घूस खा कर सरकार खुद बेहिसाब खर्च करते हुए समारोहपूर्वक उन की शादी करा देगी और बाकी पैसा बाबुओं, अफसरों व नेताओं की जेब में चला जाएगा.

मुमकिन है यह विधेयक पारित हो जाए, इसलिए शादी करने जा रहे लोगों को सचेत हो जाना चाहिए कि खर्चे और बिलों की चिंदियां संभाल कर रखना है, क्योंकि कानून बनने जा रहा है. रही बात खर्च छिपाने की, तो लोग अब मैरिजहौल वालों को अगर 5 लाख रुपया देंगे तो बिल 2 लाख रुपए का मांगेंगे जिस से शादी का 5 लाख रुपए की सीमा में होना सिद्ध किया जा सके.

केंद्र सरकार का काम विकास कम, लोगों की निजी जिंदगी में झांकना ज्यादा हो चला है. बात चिंता की है कि सरकार क्यों लोगों की खुशियों पर ग्रहण लगाने को आमादा है. नोटबंदी के दौरान जिन लोगों के पास अपनी मेहनत से कमाया पैसा था, वे बेचारे खुद को बेवजह ही चोर समझ ग्लानि व अपराधबोध से ग्रस्त थे. मानो पैसा कमाया नहीं हो, कहीं से लूटा हो. अब यही हाल शादियों में होगा, जो कम पैसों में की गईं तो मातम जैसी लगेंगी.

छुआछूत का कलंक, नहीं हो रहा अंत, अब क्या हैं इसके उपाय

भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को जब उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया तो उन्होंने सरकारी आवास में प्रवेश से पहले वहां का शुद्घीकरण कराया. इस के लिए बाकायदा गोरखपुर के मंदिर से पुजारी बुलाए गए. मुख्यमंत्री आवास के प्रवेशद्वार से ले कर सड़क तक को गंगाजल से शुद्घ किया गया. मुख्यमंत्री के दौरे के समय भी इस बात का ध्यान रखा जाने लगा कि उन को कहीं परेशानी न हो. गौतमबुद्घ की निर्वाणनगरी कुशीनगर में आदित्यनाथ के कार्यक्रम में अधिकारियों ने वहां के दलित परिवारों को शैंपू, मंजन और साबुन दिया. उन से कहा गया कि सभी लोग नहाधो कर, साफसुथरा हो कर आएं. इन सभी को मुख्यमंत्री के टीकाकरण कार्यक्रम में बुलाया गया था. यह बात सामने आते ही पूरे देश में भाजपा सरकार की मुखालाफत होने लगी. गुजरात के दलित संगठनों ने तो साबुन से तैयार महात्मा बुद्घ की 125 किलो की मूर्ति आदित्यनाथ को, लखनऊ आ कर, सौंपने का कार्यक्रम बनाया लेकिन उन को झांसी स्टेशन पर रोक कर वापस भेज दिया गया. लखनऊ में दलित अत्याचार और निदान विषय पर संगोष्ठी करने का प्रयास किया गया तो उस कार्यक्रम को भी होने नहीं दिया गया.

इन घटनाओं से साफ है कि समाज में दलितों के हालात बहुत खराब हैं. आज भी सामान्य वर्ग उन से मिलना पसंद नहीं करता. यह घटना छुआछूत और जातिप्र्रथा की पोल को खोलने के लिए पर्याप्त है.

दलित चिंतक एस आर दारापुरी कहते हैं, ‘‘कुशीनगर में जिस तरह से सरकारी संरक्षण में छुआछूत की भावना को बढ़ावा मिला, उस से पूरे दलित समाज में क्षोभ है. दलित अत्याचार और निदान विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दलितों के वर्तमान हालात पर चर्चा होनी थी पर सरकारी लोगों ने इसे होने नहीं दिया. दलित संगठनों की सोच है कि सरकार दलितों को गंदा मानती है. इसलिए मुख्यमंत्री से मिलने से पहले दलितों से नहा कर आने के लिए कहा गया. यह बाबा भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती चल रही है. इसलिए गौतमबुद्घ की 125 किलो की साबुन की मूर्ति बनाने का काम शुरू हुआ. सरकार को पता था कि विचार गोष्ठी में जो तथ्य सामने आएंगे उन का जवाब देना सरकार के लिए मुश्किल होगा. ऐसे में विचारगोष्ठी को होने से ही रोक दिया गया.’’

सहारनपुर में भले ही दलितसवर्ण साथ खड़े हो गए हों पर जाति और छुआछूत के नाम पर अभी दोनों बिरादरियों में दूरी बनी हुई है. सहारनपुर की घटना पर राजनीति शुरू हुई तो वहां पर भीमसेना सक्रिय नजर आने लगी. भीमसेना को पूरा लाभ न मिल जाए, इसलिए बहुजन समाज पार्टी ने भी अपना दखल बढ़ाया. जब बसपा नेता मायावती को लगा कि कोई लाभ नहीं मिल रहा और दलितों में उन की पैठ घट गई है तो उन्होंने दलितों के मुद्दे को ले कर राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का नाटक रचा.

बसपा से नाउम्मीदी

दलितों के बिगड़ते हालात के लिए मायावती कम जिम्मेदार नहीं हैं. दलितों के वोट पर मायावती उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री बनीं पर उन्होंने दलितों के हालात को सुधारने का काम नहीं किया. मायावती ने अपने कार्यकाल में मूर्तिपूजा और व्यक्तिपूजा को बढ़ावा दिया. जिस से दलित आंदोलन और उस में सुधार के काम पूरी तरह से बंद हो गए. बसपा के बनने से पहले डीएसफोर और दूसरे संगठन दलितों में सामाजिक चेतना जगाने का काम करते थे. मायावती ने सत्ता में आते ही इस पर रोक लगा दी.

दलित संगठनों के साथ विरोध का बरताव होने लगा. जिस से दलित आंदोलन और सामाजिक चेतना जगाने का काम बंद हो गया. इस का असर यह हुआ कि दलित अपनी लड़ाई भूल कर धर्म के आडंबर में फंसने लगे. वे नव हिंदुत्व का शिकार हो गए. भाजपा ने दलितों की इस मनोदशा को समझते हुए उन को धर्म के सहारे पार्टी से जोड़ने का काम शुरू किया. उस के नेता दलित घरों में जा कर खाना खाने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले कर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक दलितों के घर जा कर खाना खाने लगे. मध्य प्रदेश में दलितों को कुंभ के दौरान उन के पाप धोने का ढोंग नदी में नहला कर किया गया. इस की अगुआई वहां के भाजपाई  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की.

भाजपा पूरे देश में यह प्रचारित करने में लग गई कि उस ने दलितों को बराबरी का दरजा दे कर समाज से छुआछूत और जाति व्यवस्था को खत्म कर दिया है. असल में, यह एक छलावा मात्र था. दिक्कत यह है कि विरोधी दल इस बात का विरोध करने के लायक नहीं रह गए हैं.

असमंजस में दलित

उत्तर प्रदेश में लगातार दलित समुदाय के खराब होते हालात के बाद भी बसपा नेता मायावती या कोई दूसरा नेता सच बात को कहने के लिए सड़क पर नहीं उतर सका. ऐसे में भाजपा जो बात कहती रही, लोग भरोसा करते रहे. कुशीनगर और सहारनपुर की घटनाओं ने समाज की पोल को खोल दिया.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘सब से अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में दलित 20 फीसदी के करीब हैं. दलित परिवारों में 80 फीसदी लोग गांवों या शहरों में झोंपडि़यों या छोटेछोटे घरों में रहते हैं. ये लोग अभी भी भूख और गरीबी के दौर से गुजर रहे हैं. थोड़ाबहुत पैसा कमाते भी हैं तो वह नशे की आदत में उड़ जाता है. दलितों में आगे बढ़ चुके लोग पूजापाठ और नव हिंदुत्व के सहारे सवर्र्ण बनने की होड़ में लगे हैं. वे खुद भले ही छुआछूत और जातिप्रथा का शिकार हों, पर गरीब दलितों के साथ इन का व्यवहार ऊंची जातियों सरीखा होता जा रहा है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘दलितों को शैंपूसाबुन की जरूरत नहीं हैं. इन लोगों को रोजगार की जरूरत है. जिन लोगों को रोजगार मिल गया है वे किसी अगड़े से कम नहीं हैं. जिन दलितों के पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं, जो भूख और गरीबी के दौर से गुजर रहे हैं, उन्हें शैंपूसाबुन से क्या मिलेगा. अगर दलितों की हालत को सुधारने का काम किया गया होता तो इस तरह का दिखावा करने की जरूरत नहीं पड़ती. दलितों की शिक्षा और रोजगार दोनों की दशा को ठीक करने की जरूरत है. गांव की किसी भी दलित बस्ती या शहर किनारे रह रहे दलितों के हालात को देखते हुए हकीकत को समझा जा सकता है.’’

बिहार में दलितों की दशा बुरी है. वहां उन का कोई माईबाप नहीं है. दलितों के बड़े नेता रामविलास पासवान ‘राम’ वालों की पार्टी के सहयोगी बन गए तो पिछड़े मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘राम’ वालों की पार्टी से मिल साझा सरकार बना ली है. गरीबी, भुखमरी, बेकारी और पिछड़े सामंतों की वजह से बिहार के दलितों, महादलितों का पलायन दूसरे राज्यों की ओर बढ़ रहा है. वहां भी वे हिंसा, भेदभाव की चपेट में हैं.

कानून व्यवस्था की खराब हालत का असर भी सब से ज्यादा दलित जातियों पर पड़ता है. गांवदेहात तो दूर, राजधानी लखनऊ के हालात खराब हैं. विमला नाम की दलित महिला को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उस की आवाज को बंद करने के लिए विरोधियों ने उस के साथ गैंगरेप  से ले कर चेहरे पर तेजाब डालने तक का दुसाहस किया. पहले की अखिलेश सरकार ने 2, फिर योगी सरकार ने 1 लाख रुपए की सहायता जरूर दी पर उस को न्याय नहीं मिला. सहायता राशि मिलने के बाद भी उस पर एसिड अटैक किया गया. प्रशासन घटना को गलत मान रहा है. विमला अब न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण में है. विमला का सवाल है, ‘‘अगर मैं गलत बोल रही हूं तो मुझे सहायता क्यों दी गई?’’

दलितों को शिक्षित कर के ही उन की हालत में सुधार लाया जा सकता है. इस में सरकारी प्र्राथमिक स्कूलों की जिम्मेदारी सब से अहम हो जाती है. परेशानी की बात यह है कि लगातार सुधार के बाद भी सरकारी स्कूलों की शिक्षाव्यवस्था पूरी तरह से पंगु हो चुकी है.

उत्तर प्रदेश में इस समय करीब 1,200 से अधिक सरकारी स्कूलों की इमारतें खराब हालत में हैं. कुछ स्कूलों की बात छोड़ दें तो बाकी स्कूलों में बच्चों को जुलाई के अंत तक किताबें और यूनिफौर्म नहीं मिलीं. शिक्षामित्रों से ले कर शिक्षकों तक में किसी न किसी तरह का असंतोष है. सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों को परमानैंट करना गैरकानूनी ठहरा दिया है. सरकारी स्कूलों के हालात को देखते हुए यहां पर समाज के अमीर घरों के बच्चे पढ़ने नहीं आते. यहां तक कि सरकारी स्कूलों के मास्टर तक अपने बच्चों को यहां नहीं पढ़ाते हैं.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तर प्रदेश की सरकार यह तय नहीं कर पाई कि सरकारी नौकरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें. मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय सब को समान शिक्षा के अधिकार को ले कर सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘अफसर सरकार को गलत जानकारी दे कर अपना मतलब हासिल कर लेते हैं. कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. सरकार प्राथमिक शिक्षा के स्तर को उठाने का दावा करती है पर असल में सरकार की मंशा ही नहीं है कि प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सही हो. वह केवल दिखावा कर रही है. अगर सरकारी स्कूलों की हालत सुधर जाए तो गरीब परिवारों के बच्चे भी अच्छी शिक्षा हासिल कर सकते हैं.’’

शिक्षा से बनी दूरी

दलितों की हालत को सुधारने का एक जरिया है सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को सुधारा जाए. प्राइमरी स्कूलों तक जो दलितों के बच्चे पढ़ने आते हैं, कक्षा 6 के बाद स्कूलों में उन की संख्या और भी कम हो जाती है. इस की वजह संदीप पांडेय बताते हैं, ‘‘दलित परिवारों में इतनी गरीबी है कि बच्चे कमाईर् लायक होते ही स्कूल छोड़ कर पेट भरने के इंतजाम में या तो मेहनतमजदूरी करने शहर की ओर भाग जाते हैं या फिर वहीं गांव में कुछ करने लगते हैं. आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि कक्षा 5 के बाद स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में सब से अधिक दलित जाति के बच्चे होते हैं. कुछ बच्चे सच में पढ़ना चाहते हैं पर उन के परिवार की हालत ऐसी नहीं होती कि वे पढ़ा सकें.’’

आंकड़े बताते हैं कि दलित लड़कियां सब से पहले स्कूल छोड़ती हैं. लड़कों को तो वहां घर के काम पर नहीं लगाया जाता पर लड़कियों को घर के काम में लगा दिया जाता है. वे खेतों में काम करने के लिए जाने लगती हैं, जिस के कारण कई बार उन का यौन शोषण भी होता है. शिक्षा की कमी का ही नतीजा है कि आज भी दलित लड़कियों की शादी सब से कम उम्र में हो जाती है. भले ही अब यह उम्र 10-12 से बढ़ कर 16-17 वर्ष हो गई हो पर अभी भी नाबालिग की शादी हो जाती है. दलितों में 2 वर्ग हो गए हैं. एक वर्ग ऐसा है जो थोड़ा आगे बढ़ गया है. दूसरा वर्ग अभी भी वहीं है. सोच के स्तर को देखें तो दोनों ही वर्ग एकजैसे ही हैं. दलितों को अब यह बात बारबार सिखाई और समझाई जा रही है कि वे धर्म का पाठ पढ़ कर ही आगे बढ़ सकते हैं. ऐसे में वे धर्म के अंधविश्वास में फंसते जा रहे हैं.

आडंबर का कसता शिकंजा

धर्म का आडंबर कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है. सोशल मीडिया से ले कर गांवगांव में होने वाले कथा, भागवत, प्रवचन में यह बात बारबार दोहराईर् जा रही है कि धर्म की लाठी को पकड़ कर ही जीवन को पार किया जा सकता है, अगले जीवन को सुधारा जा सकता है, ताकि अगले जन्म में फिर दलित न बनना पड़े. असल बात यह है कि कोई भी दलितों को बराबरी का हक नहीं देना चाहता. सभी को लगता है कि अगर दलित आगे निकल गए तो उन की सेवा, घरों में नौकरी कौन करेगा? वोट देने के लिए लंबीलंबी  लाइनें लगाने से ले कर नारे लगाने तक में ऐसे ही लोग रहते हैं. नेता दलितों के लिए जोरशोर से भले बात करते हैं पर हकीकत में वे इन के लिए कुछ नहीं करना चाहते.

जड़ में जाति और धर्म

भाजपा ने दलित नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ उठा कर उन को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है, जिस से दलित हितों की बात उठनी बंद हो गई है. बिहार में रामविलास पासवान, महाराष्ट्र में रामदास अठावले और दिल्ली में उदित राज इस की मिसाल हैं. इन नेताओं के पीछे दलित मजबूत हालत में खड़े थे. उन के ये नेता अब भाजपा में शामिल हो कर उस के हिंदुत्व को स्वीकार कर चुके हैं तो वे भी नव हिंदुत्व की विचारधारा के साथ खड़े हो रहे हैं. जिस जातिप्रथा और छुआछूत को ले कर दलित परेशान हैं उस की जड़ में जाति और धर्म ही है.

यह बात जब तक दलित समझ नहीं पाएगा तब तक उस का भला नहीं होगा. परेशानी की बात यह है कि राजनीतिक दलों से ले कर सामाजिक संगठनों तक सभी सत्ता के जरिए ही व्यवस्था में सुधार को महत्त्व देते हैं. वे भूल जाते हैं कि सत्ता का चेहरा हमेशा एक ही होता है, केवल कुरसी पर बैठा व्यक्ति बदल जाता है. यही वजह है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों के हालात नहीं बदले. दलितों के नाम पर वोट लेने वाले अपना उल्लू सीधा करते रहे पर दलितों के हालात जस के तस हैं.

भाजपा को रास आ रहा नव हिंदुत्व

नव हिंदुत्व कट्टरवादी हिंदुत्व से अलग है. नव हिंदुत्व  में दलित और पिछड़े शामिल हैं, जो खुद को अगड़ी जाति में शामिल होने को दिखाने के लिए उन की तरह पूजापाठ करते हैं, सत्यनारायण और भागवत कथा सुनते हैं. वे इस बात को ले कर हिंदुत्व से नाराज नहीं हैं कि धर्मग्रंथों में उन के खिलाफ क्या लिखा है? ये लोग असल में कुछ पढ़ेलिखे हैं. इन में से ज्यादातर अपने गांव को छोड़ कर रोजीरोटी की तलाश में शहर आ गए हैं.

गांव में भी यह वर्ग कुछ पैसे वाला हो गया है. इस वर्ग के लिए दलित और पिछड़ा होना केवल आरक्षण के लाभ तक ही सीमित रह गया है. काफी हद तक यह वर्ग अपनी ही जाति से पूरी तरह कट गया है. नव हिंदुत्व में शामिल दलित और पिछड़ों का यह वर्ग दूसरे दलित और पिछड़ों से दूरी रखता है. यह वर्ग अपनी जाति के नेताओं को भी बहुत पसंद नहीं करता.

नव हिंदुत्व में शामिल यह वर्ग 80-90 के दशक की तरह कट्टर नहीं रह गया है. यह तिलक, तराजू और तलवार इन को मारो जूते चार’ और ‘ठाकुर बामन बनिया चोर’ जैसे नारे नहीं लगाता. पंडित और पुजारी को इस वर्ग के लोगों के घर जा कर कथा कराने में कोई एतराज नहीं रह गया है. यह वर्ग अब सुविधाभोगी हो गया है. वह अपनी सुविधा के हिसाब से जिंदगी को जीना पसंद करने लगा है. यह वर्ग राजनीतिक रूप से जागरूक है. मजेदार बात यह है कि राष्ट्रवाद की पहचान को ले कर यह वर्ग ज्यादा मुखर हो चला है. यही वजह है कि रोहित बेमुला की आत्महत्या और कन्हैया कुमार के देशद्रोही बयान जैसे मुद्दे भी इन को अपनी ओर खींच  पाने में सफल नहीं होते हैं. नव हिंदुत्व में शामिल नए वर्ग में सब से बड़ी संख्या गैर जाटव दलितों और गैर यादव पिछड़े वर्ग की है.

भाजपा की जीत का सब से बड़ा यही आधार है. अगड़ी जातियों का भाजपा पर सब से अधिक प्रभाव रहा है. जब कांग्रेस ने दलित, पिछड़ों और मुसलिमों को तवज्जुह देनी शुरू की थी तब ये जातियां धीरेधीरे कर  कांग्रेस से टूट कर भाजपा में शामिल होने लगी थीं.

भाजपा में मोदीयुग के उदय के बाद नव हिंदुत्व को बढ़ावा मिला और दलितपिछड़े पार्टी में अगली पंक्ति में खड़े हो गए. ऐसे में पार्टी के बेस वोट अगड़ी जातियों में उपेक्षा का भाव पैदा हो रहा है. मोदी सरकार की नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के बाद यह वर्ग पार्टी से नाराज हो कर भी अलग नहीं हो पाया. इस का कारण यह है कि दूसरी कोई पार्टी इन को अपने करीब नहीं दिख रही. नाराज होने के बाद भी यह वर्ग भाजपा के साथ खड़ा होने को मजबूर है. इस बात को अब सपा, बसपा और कांग्रेस भी समझने लगी हैं.

आने वाले दिनों में सपा, बसपा और कांग्रेस भी नव हिंदुत्व के पक्ष में खड़े हो सकते हैं. सपा की अखिलेश सरकार ने धार्मिक यात्राओं और बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए इस को समझने का प्रयास किया था पर अपनी धर्मविरोधी छवि के कारण वे सफल नहीं हो सकीं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी किसानयात्रा के समय मंदिरों में पूजापाठ करने का काम किया. पर वे भी नव हिंदुत्व की भावना को जमाने में असफल रहे. नव हिंदुत्व भाजपा को विजय दिलाने में सफल रहा है. असल में यही भाजपा के लिए चुनौती भी देगा. दलित और पिछड़ों के प्रभाव को अगड़ी जातियां कब तक सहन करती हैं, यह देखने वाली बात होगी.

अगड़ी जातियों को सब से अधिक मुश्किल आरक्षण को ले कर है. ऊंची जातियों को लगता है कि आरक्षण के चलते अगड़ी जातियों का हक मारा जा रहा है. वे भाजपा पर इस बात का दबाव बना सकती हैं कि आरक्षण के मुद्दे पर नई पहल हो. आरक्षण जातिगत न हो कर, आर्थिक आधार पर हो, जिस से गरीब वर्ग के अगड़ी जातियों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके.

भाजपा में एक बड़ा वर्र्ग इस बात का पक्षधर है कि आरक्षण पर नई बहस हो. बिहार चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था पर बैकफायर कर गया. इस के बाद भाजपा बारबार यह बात दोहरा रही है कि आरक्षण के वर्तमान स्वरूप में कोईर् बदलाव नहीं किया जाएगा. बिना आरक्षण और बिना राममंदिर भाजपा के लिए अपने अगड़ी जातियों के वोटबैंक को साधे रखना मुश्किल होगा.

डिजिटल मीडिया पर भी लागू एससी/एसटी ऐक्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर अनुसूचित जाति और जनजाति यानी क्रमश: दलित और आदिवासी समुदायों के खिलाफ की गई किसी भी पोस्ट या जातिगत टिप्पणी पर सजा हो सकती है. ऐसी कोई भी टिप्पणी औनलाइन अब्यूज में शामिल की जाएगी.

कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इस बात का सजा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि पोस्टकर्ता ने अपनी प्राइवेसी सैटिंग को पब्लिक या प्राइवेट कर रखा है. अगर किसी की गैरमौजूदगी में भी किसी जाति विशेष का अपमान किया गया है तो इस पर भी एससी/एसटी ऐक्ट लागू होगा. किसी भी तरह की जातिगत टिप्पणी एससी/एसटी ऐक्ट 1989 के तहत आती है. हालांकि यह फैसला फेसबुक वाल के संदर्भ में दिया गया है लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला उन वैबसाइट्स पर भी लागू होता है जिन पर प्राइवेसी सैटिंग होती है. इतना ही नहीं, यह फैसला लोगों के औनलाइन ग्रुपों पर भी लागू होता है. यानी, व्हाट्सऐप पर भी यह फैसला प्रभावी होगा.

जाहिर है अब सोशल मीडिया पर दलित आदिवासियों का अपमान करना महंगा पड़ेगा. यह भी जाहिर है कि चूंकि सोशल मीडिया इन समुदायों की बेइज्जती का एक बड़ा अड्डा बन गया है, इसलिए न्यायालय को यह फैसला लेना पड़ा. एक वर्गविशेष के स्वाभिमान के मद्देनजर यह फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन विचारणीय बात यह है कि क्या इस से जातिगत मानसिकता या पूर्वाग्रह खत्म हो जाएंगे?

सोशल मीडिया का दुरुपयोग

कल तक जो बातें चाय की गुमठियों और चौराहों पर होती थीं, वे अब सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से होने लगी हैं. दलित आदिवासियों का अपमान उन में से एक है. समाज का ढांचा जरूर थोड़ा बदला है लेकिन उस की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. व्हाट्सऐप पर जातियों के ग्रुप बन गए हैं. जितनी जातियां देश में हैं, उन से लाखगुना ज्यादा उन के ग्रुप हैं. इन ग्रुपों में तुक या मुद्दे की बातें कम होती हैं, दूसरी जाति वालों को कोसने की शाश्वत परंपरा का निर्वाह ज्यादा होता है.

तकनीक का जातिगत दुरुपयोग हमारे महान देश में ही होना मुमकिन है जो दरअसल हमारी जातिगत मानसिकता का आईना है. इस का इलाज कोई अदालत नहीं कर सकी, न कर सकती है क्योंकि जातिगत या जातिवादी व्यवस्था धर्म की देन है.

अब भला किस की मजाल कि वह धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म को ही खत्म करने की बात करे या फिर उस के समाज पर पड़ते दुष्प्रभावों की व्याख्या करे. उलटे, सोशल मीडिया या डिजिटल समाज की सुबह ही विभिन्न देवीदेवताओं की तसवीरों व उन के पुण्य स्मरण से होती है. ऐसे जड़ और धर्मांध लोगों से क्यों उम्मीद की जाए कि वे जातिगत टिप्पणियां करने से खुद को रोक पाएंगे.

धार्मिक निर्देशों के अनुयायी मनुवादी और पौराणिकवादी जातिगत व्यवस्था व समाज को तोड़ने के हिमायती कभी नहीं रहे. ऐसे में अब दलित आदिवासी भी इसी को बनाए रखने में अपना भला देखने लगे हैं. उन का बड़ा और स्वाभाविक डर आरक्षण छिन जाने का है, जो एनडीए के सत्तानशीं होने के बाद से लगातार बढ़ ही रहा है.

हालात ज्यों के त्यों यानी 18वीं सदी जैसे हैं. जाहिर है जाति की जड़ किसी के उखाड़े से नहीं उखड़ रही, बल्कि और गहराती जा रही है. अदालतें अगर एससी/एसटी ऐक्ट सोशल मीडिया पर भी लागू कर दें, तो इस जड़ और जड़ता पर कोई फर्क पड़ेगा, ऐसा लग नहीं रहा.

लोगों की मानसिकता और जातिगत पूर्वाग्रह सिर्फ और सिर्फ जागरूकता से दूर हो सकते हैं, जिस के रास्ते में धर्म सब से बड़ा रोड़ा है. शायद, इसीलिए भीमराव अंबेडकर ने धर्मग्रंथों को जला देने की बात कही थी.

– भारत भूषण श्रीवास्तव

सावधान : खाने में कहीं आप भी हरा जहर तो नहीं खा रहे

जुलाई 2017 : पंजाब में मोगा शहर के नजदीकी गांव में भिंडी की जहरीली सब्जी खा लेने से एक ही परिवार के 4 सदस्यों की हालत बिगड़ गई. घर के मुखिया रणजीत सिंह की मौत हो गई.

सितंबर 2016 : बटाला के कसबा कलानौर में मशरूम की सब्जी खाने से एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि एक दंपती की हालत गंभीर हो जाने के कारण इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा.

दिसंबर 2015 : उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के चुडि़याला क्षेत्र के खेलपुर गांव में जहरीली सब्जी खाने से 2 सगी बहनों की मौत हो गई.

नवंबर 2014 : मध्य प्रदेश के बेताल जिले के भीमपुर ब्लौक के आकी रैय्यत गांव में जहरीला खाना खाने से एक परिवार के 2 बच्चों की मौत हो गई और 4 लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए.

जनवरी 2013 : बिहार के भागलपुर जिले के सनोखर थाना क्षेत्र में जहरीली सब्जी खाने से एक ही परिवार के 3 लोगों की मौत हो गई.

बिहार, पंजाब और मध्य प्रदेश में रासायनिक व जहरीली सब्जियों से हुई ये मौतें महज बानगी हैं, असल में देश में हरी सब्जी के नाम पर जहर खा कर मरने वालों की संख्या न जाने कितनी होगी. हर दूसरे दिन अस्पताल में कोई न कोई ऐसा मामला जरूर आता है जिस में रोगी की हालत कैमिकलयुक्त सब्जी खाने से बिगड़ती है. इन में कुछ रोगी तो इलाज के बावजूद रासायनिक सब्जियों का जहर बरदाश्त नहीं कर पाते और मौत की नींद सो जाते हैं. पहले तो दूध, घी, आटा, सरसों तेल आदि में मिलावट की बात सामने आती थी पर अब कुदरती उपज यानी हरी सब्जियों में जो जहर की मिलावट की जा रही है, उस के खतरनाक परिणाम देखने को मिल रहे हैं.

आम आदमी आज ताजा सब्जियों की चाह में बीमारी और मौत खरीद रहा है. जबकि मुनाफाखोर व्यापारी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में सब्जियों में इतने कैमिकल्स मिला देते हैं कि खाने वाले की जान पर बन आती है. ये मुनाफाखोर आम आदमी की थाली में हरा जहर परोस रहे हैं.

दिल्ली पुलिस सब्जी की कई मंडियों में छापा मार कर ऐसे दर्जनों लोगों को पकड़ चुकी है जो सब्जियों में रसायन डाल कर हरी सब्जियों को फ्रैश दिखा कर बेच रहे थे.

एक गैर सरकारी संगठन वायस ने विभिन्न सब्जियों के सैंपल ले सरकारी प्रयोगशालाओं में परीक्षण करवाया तो सामने आया कि जिन तथाकथित दवाओं को बेचने पर प्रतिबंध लगा है वे भी सब्जियों में भारी मात्रा में मौजूद हैं.

इस के अलावा यह बात भी सामने आई कि मंडी में फल या सब्जी की गुणवत्ता पर किसी तरह का सरकारी नियंत्रण लागू न होने के चलते मात्र आढ़ती या फिर दवा विक्रेता की सलाह पर पैस्टीसाइड-इंसैक्टीसाइड का छिड़काव कर सब्जियों को खाने के नाम पर जहर में तबदील किया जा रहा है.

आम आदमी द्वारा खाए जाने वाले आलू से ले कर टमाटर, खीरा, ककड़ी जैसे कच्चे खाए जाने वाले सलाद और बैगन पर जहर का असर न मिटने वाला और ज्यादा खतरनाक पाया गया.

कहने के लिए देश में फूड सैफ्टी स्टैंडर्ड अथौरिटी बनी हुई है पर फलसब्जियों में कीटनाशकों के अवशेष की कितनी इजाजत है, इस का पिछले 3 दशकों में सीमा का पुनर्निर्धारण नहीं किया गया है, जबकि पैस्टीसाइड की मात्रा, जहरीलापन और संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में खेती की जगह कम और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसान सब्जियों में कैमिकल्स व कीटनाशक धड़ल्ले से डाल रहे हैं.

कैसे बनता है हरा जहर

 सब से पहले तो यह जानना जरूरी है कि मुनाफाखोर और मौत के सौदागर कुदरती उपज यानी हरी सब्जियों को जहरीला कैसे बनाते हैं. स्थानीय क्षेत्रों में सब्जी कारोबारी वजन बढ़ाने और अधिक पैसा कमाने के लालच में केला, लौकी, बैगन, करेला आदि में प्रतिबंधित औक्सीटोसीन का इंजैक्शन लगा कर सब्जी को रातोंरात बड़ा और वजनी कर देते हैं. इस से इन के वजन में बढ़ोतरी हो जाती है.

इस के अलावा दुकानदार भी परवल, तुरई, लौकी, भिंडी आदि को ताजा बनाए रखने के लिए इन्हें रासायन युक्त पानी से धोते हैं. इस से सब्जी दिखने में अधिक ताजी और हरीभरी दिखाई देती है. कुछ लोग तो कैमिकल रंग भी इस्तेमाल करते हैं. टमाटर में जीएथ्री रसायन तो वहीं अन्य सब्जियों को चमकदार बनाने के लिए मोम का उपयोग किया जाता है. केले एवं पपीते को कैमिकल में डुबो कर पकाया जाता है जो जहर बन कर सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है.

तालाब एवं डबरों में सिंघाड़ों की खेती के लिए भी खतरनाक कैमिकल व दवाएं पानी में डाली जाती हैं. भिंडी, करेला, परवल, मटर आदि रंगों व कैमिकल के प्रयोग के बिना इतने चमकदार नहीं दिख सकते, इसलिए ज्यादातर कारोबारी कैल्शियम कार्बाइड को पुडि़यों में डाल कर फलों के ढेर के बीच में रख देते हैं. उस पर बर्फ रख दी जाती है.

इस से कैल्शियम कार्बाइड की पुडि़यों पर बूंदबूंद पानी गिरता रहता है. इस से फल तो जल्दी पक जाता है लेकिन कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया यह फल सेहत को नुकसान पहुंचाता है. ज्यादातर रसायनों का इस्तेमाल मंडी में व्यापार के स्तर पर यह देख कर किया जाता है कि बाजार में किन सब्जियों की डिमांड ज्यादा है. उसी आधार पर सब्जियों में रसायन मिलाया जाता है.

गंदे पानी का जहर

 सिर्फ पैस्टीसाइड और रसायन ही सब्जियों को जहरीला नहीं बना रहे, बल्कि पानी भी है, जो हरी सब्जियों को जहरीला बना रहा है. असल में गंदा और रसायनयुक्त सिंचाई जल आज जहर बन कर अनाज, सब्जियों और फलों में शामिल हो चुका है.

देश के उत्तरपूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से सब्जियों को जहरीला बनाया जा रहा है. यहां भूजल से सिंचित खेतों में पैदा होने वाले धान में आर्सेनिक की इतनी मात्रा पाई गई है जो मानव शरीर को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है.

इतना ही नहीं, देश में नदियों के किनारे उगाई जाने वाली फसलों में भी जहरीले रसायन पाए गए हैं. कारखानों से निकला जहरीला जल जब सब्जियों को सींचने के लिए प्रयोग में लाया जाता है तो वह सब्जियों को मौत के सामान में तबदील कर देता है.

इंडियन काउंसिल औफ एग्रीकल्चर रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नदियों के किनारे उगाई गई फसलों में से 50 फीसदी में विषैले तत्त्व पाए जाने की आशंका रहती है.

मिलावट की पहचान

आमतौर पर रसायनयुक्त सब्जियों की सही पहचान तो प्रयोगशालाओं में ही होती है लेकिन फिर भी कुछ ऐसी तकनीकें होती हैं जिन से प्राथमिक स्तर पर पहचाना जा सकता है कि किन सब्जियों में कैमिकल का प्रयोग किया गया है और कौन सी सब्जियां ताजी हैं.

सब से पहले तो उन सब्जियों को परखें जिन में कैमिकल कलर यानी रासायनिक रंगों का इस्तेमाल कर उन्हें हराभरा कर दिया जाता है. इस के लिए जो सब्जी आप खरीद रहे हैं उसे गुनगुने पानी में धो कर देखें, अगर उस में कैमिकल कलर होंगे तो पानी रंगीन हो जाएगा.

इस के अलावा जिन सब्जियों में मोम का इस्तेमाल हुआ हो उन्हें ब्लेड या चाकू से खुरच कर देखा जा सकता है. छुरी से खुरचने से या डंडी के किनारे वाले भाग पर उजली परत को गौर से देखने पर मोम को पहचाना जा सकता है. इस के अलावा कैमिकल से फुलाई या पकाई गई सब्जियों का पता काटने के दौरान लगाया जा सकता है. बहुत ज्यादा हरीभरी और चमकीली सब्जियों में रसायन पाए जाने की संभावना  ज्यादा होती है, इसलिए मौसमी और प्राकृतिक दिखने वाली सब्जियों को  ही खरीदें.

हरे जहर की बीमारियां

रसायनयुक्त सब्जियों को खाने से फेफड़ों में इंफैक्शन, अल्सर, कैंसर और एलर्जी जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं. क्रोमियम से चर्मरोग व श्वास संबंधी बीमारियों के साथ शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता खत्म होने की समस्या रहती है. कौपर से एलर्जी, चर्मरोग, आंखों के कार्निया का प्रभावित होना, उल्टीदस्त, लिवर डैमेज, हाइपरटैंशन की शिकायत मिलती है. मात्रा बढ़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है. हीमोग्लोबिन के साथ जुड़ कर यह उसे कम कर देता है.

फिजीशियन डा. सी एस भार्गव का कहना है, ‘‘टौक्सिन बनने और जैनेटिक बदलाव के कारण सब्जियां कड़वी होती हैं. इन्हें कूकर ब्यूटेन भी कहते हैं. उस कड़वी सब्जी से बचें जो प्राकृतिक रूप से कड़वी नहीं होती. कड़वी सब्जी से उलटी, डायरिया और यूरीन से संबंधित समस्याएं होती हैं.’’

वहीं, डा. वीरेंद्र नाथ गर्ग बताते हैं, ‘‘रूटीन में कैमिकल वाली सब्जियां खाते रहने से लोगों में चिड़चिड़ापन आता है, उन को नींद न आने की शिकायत रहती है. कई बार फेफड़ों में भी खराबी आ जाती है.’’ उन्होंने बताया कि इस तरह की शिकायत मैट्रो सिटीज में ज्यादा देखने को मिलती है.

प्राथमिक उपचार

रसायनयुक्त सब्जी खा कर आप अपनी तबीयत नासाज महसूस करें तो कुछ प्राथमिक सावधानियां हैं जिन्हें अपना कर हानिकारक परिणाम से बचा जा सकता है.

तबीयत खराब होते देख सब से पहले तो डाक्टर से संपर्क करें और उसे अपनी तत्कालीन स्थिति से अवगत कराएं. जरूरत पड़े तो तुरंत अस्पताल भी जा सकते हैं. कड़वे जूस से यदि जी मिचले और उलटी आती है तो उसे रोकें नहीं, उलटी करने से सारी खराबी पेट से बाहर निकल जाएगी. यदि उलटी जैसा लग रहा हो या घबराहट हो रही हो तो खूब सारा पानी पिएं. इस से उल्टी आसानी से हो जाएगी और आराम मिलेगा.

एक गिलास गुनगुने पानी में 2 चम्मच नमक डाल कर पीने से भी जल्दी उलटी आएगी और राहत मिलेगी. खून की उलटी होने, बेहोशी आने या स्थिति बिगड़ने की दशा में फौरन अस्पताल जाना ही बेहतर होगा. इस तरह कुछ प्राथमिक तरीकों को अपना कर काफी हद तक आप अपनी मदद स्वयं कर सकते हैं.

कितने कैमिकल्स

 तकनीकी तौर पर सब्जियों को उगाने से ले कर बाजार तक आने में कई तरह के पैस्टीसाइड और जहरीले रसायनों से गुजरना पड़ता है.

सब्जियों में पाए जाने वाले पैस्टीसाइड और मैटल्स पर अलगअलग शोध किया गया. शोध के अनुसार, सब्जियों के साथ हम कई प्रकार के पैस्टीसाइड और मेटल्स खा रहे हैं. इन में केडमियम, सीसा, कौपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं और एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे घातक पैस्टीसाइड शामिल हैं. रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पैस्टीसाइड का उपयोग आम है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े शहरों की सब्जीमंडियों में अलगअलग सब्जियों का परीक्षण किया गया. इस में टमाटरों के 28 नमूनों का निरीक्षण किया, जिन में से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पैस्टीसाइड ज्यादा पाया गया. भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए. फूलगोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई जिस के 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था.

यह जिम्मेदारी तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग की होनी चाहिए कि वे सुनिश्चित करें कि आम आदमी की थाली में यह जहर न पहुंचे. लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं है. उदाहरण के तौर पर पिछले 3 दशकों से कीटनाशकों के इस्तेमाल को ले कर समीक्षा तक नहीं की गई. बाजार में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री भी बदस्तूर जारी है.

यह सच है कि मौजूदा दौर में कीटनाशकों पर पूरी तरह पाबंदी लगानी मुमकिन नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि इन का इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए. सरकार और प्रशासन के अलावा आम लोगों को भी थोड़ा जागरूक होने की जरूरत है क्योंकि आखिरकार हरी सब्जियों के नाम पर जहर तो हमारी ही थाली में परोसा जा रहा है.

सब्जियों को ले कर सावधानी बरतें

 –       सब्जियों को 2 से 3 बार धोने से पैस्टीसाइड्स और इंसैक्टिसाइड्स हट जाते हैं. डिटर्जैंट की कुछ बूंदें पानी में मिला कर गुनगुने पानी में धोने से सब्जियों का वैक्स और कलर हट जाता है.

–       फल और सब्जियों को छील कर ही खाएं.

–       बंदगोभी के ऊपरी हिस्से के पत्ते जरूर उतार दें.

–       मौसमी सब्जियों को ही खरीदें.

–       चमकदार सब्जियों के इस्तेमाल से बचें.

–       और्गेनिक तरीके से उगाई गई सब्जियां ही इस्तेमाल करें.

उपरोक्त सावधानियों और परीक्षण से हमें रासायनिक सब्जियों की पहचान तो हो जाएगी लेकिन समस्या यह है कि आज की भागदौड़भरी जिंदगी में इतना समय किस के पास है जो सब्जियों की जांच के लिए इतनी कसरत करे.

अपंग बच्चों की ऐसे करें देखभाल और भरें उनमें आत्मविश्वास

शारीरिक रूप से विकलांग न जाने कितने लोग आज अपनेअपने क्षेत्रों में अगर कामयाब हैं तो इस के पीछे उन के मातापिता और परिवार वालों की मेहनत व कोशिशें हैं. उन्होंने उन में आत्मविश्वास भरा और जीवन के प्रति उन की सोच को सकारात्मक बनाए रखा. सच है कि बच्चे पालना कोई बच्चों का खेल नहीं. जन्म से ले कर युवावस्था तक मातापिता अपने बच्चों की देखरेख में जरा सी भी कसर बाकी नहीं रखते. बच्चे तो गीली मिट्टी के समान होते हैं, मातापिता जैसा आकार दें, वे वैसा हो जाते हैं.

जब बात आती है शारीरिक या मानसिक रूप से विशेष बच्चों की देखभाल की तो मातापिता की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. ऐसे बच्चे को न सिर्फ मानसिक रूप से सकारात्मक रखने की बल्कि शारीरिक रूप से भी मजबूत बनाए रखने की जरूरत होती है. ऐसे में यदि मातापिता जरा सी भी लापरवाही दिखाते हैं तो बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है और वह खुद को समाज के अन्य बच्चों की तुलना में हीन समझने लगता है.

मानसिक रूप से अपंग बच्चों के पालनपोषण में न सिर्फ उन को शारीरिक रूप से सहयोग देने की जरूरत होती है बल्कि उन के अधूरे मानसिक विकास के कारण हर समय उन के साथ रहने की जरूरत होती है, जो बेहद ही जिम्मेदारी भरा काम है. विकलांगता 2 प्रकार की हो सकती है, शारीरिक और मानसिक. दोनों ही स्थितियों में विकलांग बच्चे की देखरेख में विशेष लालनपालन करने की जरूरत होती है.

आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाएं  : शारीरिक रूप से अपंग बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास आप बचपन से ही शुरू कर दें. बच्चे को किसी के ऊपर निर्भर रहने का आदी बनाने के बजाय उस को अपने काम खुद करने की आदत डलवाएं.

ऐसे करने से उस में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और वह परिवार वालों पर खुद को बोझ समझने की जगह अपने सारे काम खुद करने में सक्षम होगा. इस के लिए आप को छोटी उम्र से ही उस में आत्मनिर्भरता के गुण भरने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए. बच्चे को धीरेधीरे अपने सभी काम खुद करना सिखाएं व उस में जिम्मेदारी की भावना भरें.

किसी से तुलना करना ठीक नहीं  :  शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित या कमजोर बच्चों को अकसर दया का पात्र व मुख्यधारा से कटा हुआ माना जाता है. जबकि सचाईर् यह है कि उन को किसी की दया की नहीं, बल्कि आप के सहयोग व प्रेम की जरूरत होती है. इस में पेरैंट्स व परिवार के सदस्यों की अहम भूमिका होती है. अपंग बच्चे की तुलना न तो सामान्य बच्चों से करें और न किसी अन्य बच्चे से. यदि आप का बच्चा वह काम करने के लिए कदम बढ़ाना चाहता है जो उस के साथी बच्चे करते हैं तो उस को रोकें नहीं. दूसरे बच्चों से तुलना करने की जगह उस की आंतरिक क्षमताओं को पहचान कर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दें क्योंकि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेष गुण होता है. उस के इसी गुण को उभारें और उसे हतोत्साहित करने के बजाय उस के प्रयासों की सराहना करें.

क्षमता के अनुरूप ही आशाएं रखें :  बच्चों की क्षमताओं से ज्यादा की उम्मीद रखने से निराशा हाथ लगती है. इसलिए यह जांच लें कि आप के बच्चे में कितनी क्षमता है, इसी के आधार पर यह निर्णय लें कि वह कहां तक सफल हो सकता है. ज्यादा उम्मीदें लगाना या बच्चे पर उस की क्षमता से अधिक करने का दबाव डालने से आप का बच्चा डिप्रैशन का शिकार हो सकता है.

अपंग व सामान्य बच्चों में अंतर न करें  :  यदि घर में एक बच्चा अपंग हो और बाकी सामान्य हों तो ऐसी स्थिति में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. कई बार भाईबहन भी नादानी या शैतानी के चलते अपंग भाई या बहन को उसी की शारीरिक कमजोरी को ले कर टिप्पणी करते हैं. इस से अपंग बच्चे के मन को आघात पहुंचता है. इसलिए मातापिता का यह दायित्व बनता है कि वे अपने सभी बच्चों को आपस में मिलजुल कर रहने की सीख दें. साथ ही, उसे यह भी एहसास न होने दें कि विकलांग होने की वजह से उस की देखभाल ज्यादा हो रही है. यदि आप हर कदम पर अपने अपंग बच्चे की मदद के लिए खड़े रहेंगे तो इस से उसे अपनी शारीरिक कमी का एहसास होगा और वह इस से चिड़चिड़ा हो सकता है. इसलिए उस के अधिकांश काम उस को खुद करने दें.

सहानुभूति दर्शाने वालों को दूर रखें :  पीतमपुरा में रहने वाली कविता का कहना है कि 21 वर्षीय मेरा बड़ा बेटा एक पैर से अपाहिज है. पढ़नेलिखने में हमेशा वह अव्वल रहता है. हम ने उस को कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह शारीरिक रूप से पूर्र्ण नहीं है.

एक दिन मेरी पड़ोसिन हमेशा की तरह मेरे घर आई और बोली कि मैं आप के बेटे के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता लाई हूं. मेरे दोनों बेटे उस दिन घर में ही मौजूद थे. पड़ोसिन ने छोटे बेटे की तरफ देखते हुए कहा कि इसे तो वे देखते ही पसंद कर लेंगे. इस पर मेरे बड़े बेटे ने सिर झुका लिया और अपने कमरे में चला गया. इस तरह कई बार रिश्तेदार या पड़ोसी आदि कुछ इस तरह की बातें बोल देते हैं जिस से बच्चे के दिल को ठेस पहुंचती है. इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि यदि आप किसी के घर जा रहे हैं या कोई आप के घर आ रहा है तो इस तरह की कोई बात न हो जिस का संबंध बच्चे की शारीरिक कमियों से हो.

हीनभावना न पनपने दें  :  सुषमा के 5 बच्चों में सब से बड़े के एक पैर में पोलियो और छोटी बेटी के दोनों पैरों में पोलियो के कारण वे चलनेफिरने में असमर्थ हैं. सुषमा का कहना है कि घर में बड़ी संतान होने के नाते मेरे बेटे ने बिना इस बात की परवा किए कि वह एक पैर से लाचार है, अपने सारे कर्तव्य पूरे किए. उस ने न सिर्फ एमए तक पढ़ाई कर के अच्छी नौकरी हासिल की बल्कि अपनी अपंग बहन को रोजाना स्कूल और कालेज लाने, ले जाने का काम भी उस ने पूरा किया. नतीजा यह हुआ कि मेरी बेटी बेशक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती, लेकिन उस ने बीएड तक पढ़ाई पूरी की और एक हैंडीकैप्ट बच्चों के स्कूल में अध्यापिका के पद पर सेवारत है. आज ये जिस मुकाम पर हैं वहां पहुंचने में इन बच्चों को अन्य सामान्य बच्चों की तुलना में कई गुणा ज्यादा मेहनत करनी पड़ी, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. इस के पीछे वजह थी कि हम ने उन में कभी हीनभावना नहीं पनपने दी.

हर समय देखरेख की जरूरत होती है :  रोहिणी निवासी काजल का 15 वर्षीय बेटा जन्म से ही विकलांग है. काजल का कहना है कि जब उस का बेटा पैदा हुआ था उसी समय डाक्टरों ने बताया कि इस के दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा है. इस के कारण वह बोल पाने में तो असमर्थ है ही, चलफिर भी नहीं सकता. हमारे बच्चे में ये सब दोष हैं, यह सोच कर दुख तो हुआ लेकिन हम ने अपने बेटे के लालनपालन व उस की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी.

मुझे और मेरे पति को हर समय अपनी सभी इंद्रियां खुली रखनी पड़ती हैं, पलपल अपने बच्चे का ध्यान रखना पड़ता है. उस को रोजाना स्पीच थेरैपी के लिए और मनोचिकित्सक के पास ले कर जाते हैं. वहीं, घर में उस से बात करने की कोशिश करते हैं. दरअसल, वह सुनता और समझता तो सबकुछ है लेकिन बोलने में असमर्थ है. इसलिए हम उस की हर तरह से देखभाल करते हैं.

मनोचिकित्सक डा. आर सी जिलोहा इस बारे में बताते हैं कि अपंगता 2 तरह से होती है, एक मानसिक विकलांगता और दूसरी शारीरिक. दोनों ही परिस्थितियों में विकलांग बच्चे की जरूरतें अलगअलग होती हैं. उसी आधार पर मातापिता को देखना चाहिए कि उन के बच्चे को किस तरह की देखभाल की जरूरत है. मसलन, बच्चा मानसिक रूप से विकलांग है तो उस की क्या जरूरतें हैं और उस की किस तरह से देखभाल करनी है और शारीरिक रूप से विकलांग है तो उस की क्या जरूरतें हैं.

मानसिक रूप से विकलांग बच्चों की समझ थोड़ी कमजोर होती है. ऐसे बच्चों को छोटी से छोटी बातें भी पेरैंट्स को सिखानी पड़ती हैं, जैसे उन को किस तरह से साफसुथरे रहना है, किस तरह से खाना खाना है, किस तरह से अपने सामान को रखना चाहिए आदि. ये हर रोज की जिम्मेदारियां होती हैं मातापिता के कंधों पर.

डा. जिलोहा आगे बताते हैं कि शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों की जरूरतें अलग होती हैं. शारीरिक रूप से विकलांगता कई तरह से हो सकती है जैसे पैरों से अपाहिज होना या देखनेसुनने व बोलने में असमर्थ होना आदि. इन बच्चों में हालांकि सामान्य बच्चों जैसी सारी बातें होती हैं लेकिन वे किसी न किसी रूप में शारीरिक तौर पर अपंग होते हैं. ऐसे बच्चे हीनभावना के शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं.

पेरैंट्स को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि वे विशेष बच्चों को आम बच्चों की तरह से ही ट्रीट करें और उन को आगे बढ़ने का हौसला देते रहें. साथ ही, विशेष बच्चों की सीमा से ज्यादा उन से उम्मीदें लगाना ठीक नहीं है. जितना वे कर रहे हैं या कर सकते हैं उसी में मातापिता संतुष्ट रहें. उन में जो गुण मौजूद है उन को वे पहचानें और उसी आधार पर उन का कैरियर बनाने में उन की मदद करें.

ओम पुरी ने कब ‘मि.कबाड़ी’ की सफलता का दावा किया था?

लेखक व निर्देशक सीमा कपूर की फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ 25 अगस्त को प्रदर्शित होने जा रही है. जो कि उनके पूर्व पति स्व.ओम पुरी की अंतिम फिल्म है. इसलिए इस फिल्म को वह स्व.ओम पुरी को ही समर्पित भी कर रही हैं. आज ओम पुरी हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन ओम पुरी ने 2009 में फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ के सफल होने के दावे किए थे, जब ओम पुरी और सीमा कपूर के बीच पति पत्नी के रूप में अच्छे संबंध थे.

खुद सीमा कपूर बताती हैं-‘‘हमने फिल्म ‘मि.कबाड़ी’ की पटकथा 2009 में उस वक्त लिखी थी, जब हमारे अच्छे दिन थे. हम साथ में रहते थे. इस पटकथा को पढ़कर वह काफी खुश हुए थे. उन्होंने कहा, ‘सीमा तुम्हारा हीरो तो शौचालय का मालिक है. फिल्म तो कबाडी बदबू पर है, लेकिन इसमें से मुझे अच्छी खुशबू आ रही है. फिल्म सफल होगी.’’

शायद यही वजह रही कि संबंध खत्म होने के बावजूद उस वक्त ओम पुरी को अपनी फिल्म ‘‘मि.कबाड़ी’’ से जोड़ा, जब स्व.ओम पुरी निजी जिंदगी में परेशान चल रहे थे. ओम पुरी के साथ फिल्म की शूटिंग के दिनों की चर्चा करते हुए सीमा कपूर कहती हैं-‘‘जब यह फिल्म बन रही थी, उस वक्त जब भी वक्त मिलता था, ओमपुरी साहब लखनऊ पहुंच जाते थे. भले ही उनकी शूटिंग न हो. उस वक्त वह बहुत मानसिक वेदना से गुजर रहे थे. उन्हें सांत्वना और शांति मेरे ही पास मिलती थी. उस वक्त मैं उनका हौसला बढ़ाती थी. उन्हे जीवन दर्शन का पाठ पढ़ाने का प्रयास करती थी. कई बार सेट पर शूटिंग के दौरान उन्होंने कहा कि सीमा मैं यह सीन नहीं कर पाउंगा. तब मैंने उन्हें समझाया कि वह कर सकते हैं. मैं स्प्रिच्युली भी समझाती थी. जबकि भगवान में उनकी आस्था नहीं थी. पर उन्होंने अपनी सोच किसी पर नहीं थोपी. वह बहुत परेशान रहते थे. मैं सुबह छह बजे से शूटिंग को लेकर व्यस्त रहती थी, फिर भी जितना संभव हो पाता था उतना समय उन्हें देती थी. इसके अलावा उन्हे अपनी दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए बार बार मुंबई आना पड़ता था.’’

ईश्वर को लेकर सीमा कपूर और ओम पुरी की सोच में विरोधाभास रहा है. पर जब तक ओम पुरी व सीमा कपूर के बीच संबंध अच्छे रहे, तब तक ओम पुरी ने धर्म को लेकर उन पर अपने विचार नहीं थोपे. खुद अपने अच्छे दिनों को याद करते हुए सीमा कपूर बताती हैं-‘‘मैं तो बुद्धिजम में विश्वास करती हूं. उपनिषद भी पढ़ती हूं. मैं योग करती हूं. मेडीटेशन करती हूं. फिर भी वह मुझे हर जगह लेकर गए. मुझे बुद्ध बहुत प्रिय हैं, तो वह मुझे लेकर बौद्ध गया गए थे. जब वहां भाव में मेरे आंसू निकले, तो उस वक्त उनकी आंखें से भी आंसू निकले थे. वह भाव में तो आ जाते थे. पर समझ में नहीं पाते थे कि ईश्वर को किस रूप में या किस भाव में देखा जाए. जब तक ओम पुरी साहब के साथ मेरे संबंध अच्छे रहे, तब तक हर जगह वह मेरा साथ देते रहे.’’

यूएसबी इस्तेमाल करने वाले हो जाएं सावधान, हैक हो सकता है आपका डाटा

कंप्यूटर से किसी अन्य डिवाइस को जोड़ने के लिए हम जिस यूएसबी का प्रयोग करते हैं, क्या वह सेफ है. वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल होने वाले यूएसबी कनेक्शन्स से सूचनाएं लीक हो सकती हैं. इसके बारे में जितना सोचा गया था यह उससे कहीं ज्यादा असुरक्षित है.

आस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी औफ एडिलेड की एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई जब शोधकर्ताओं ने 50 अलग-अलग कंप्यूटर्स और एक्सटर्नल यूएसबी हब्स पर परीक्षण किया और पाया कि उनमें से 90 प्रतिशत सूचनाएं लीक होकर एक्सटर्नल यूएसबी उपकरण में आ गई.

रिसर्च एसोसिएट युवल यारोम ने बताया यूएसबी से जुड़े उपकरणों में कीबोर्ड, कार्डस्वाइपर और फिंगरप्रिंटर रीडर्स शामिल है. जो अक्सर कंप्यूटर को संवेदनशील सूचनाएं भेजते है. यह शोध दिखाता है कि अगर एक वायरस युक्त उपकरण या कोई खराब उपकरण उसी एक्सटर्नल या इंटर्नल यूएसबी हब के बराबर वाले पोर्ट में लगाया गया है, तो इन संवेदनशील सूचनाओं को हैक किया जा सकता है.

युवल यारोम ने कहा इसका मतलब है, कि पासवर्ड या अन्य निजी जानकारियां दर्शाने वाले कीस्ट्रोक्स को आसानी से चुराया जा सकता है. उन्होने बताया कि इसका उपाय यह है कि यूएसबी कनेक्शन्स को ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए उन्हें फिर से डिजाइन किया जाना चाहिए.

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